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“पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।”

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यह मांसभक्षियों का सबसे प्रिय तर्क है। और मज़े की बात यह है कि मांसभक्षियों को यह भी नहीं पता कि यह एक “आत्मघाती” तर्क है, यानी यह तर्क स्वयं की ही काट करता है। ज़ाहिर है, मांसभक्षण से “प्रोटीन” मिले या ना मिले, “तर्कक्षमता” तो अवश्य ही नहीं मिलती है।

वो इसलिए कि जब मांसभक्षियों से कहा जाता है कि वे अपने भोजन के लिए पशुओं की हत्या क्यों करते हैं, तिस पर जब वे प्रत्युत्तर देते हैं कि पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है, तो वे वास्तव में अपने पर लगाए आरोप को पहले ही स्वीकार कर लेते हैं, और अब केवल “प्रतिरक्षा” के तर्क दे रहे होते हैं!

तो अगर मांसभक्षियों पर लगाए गए आरोप के दो चरण हैं, पहला यह कि “क्या वे भोजन के लिए प्राणियों की हत्या करके अनैतिक कृत्य करते हैं” और दूसरा यह कि “प्राणी और हत्या जैसी श्रेणियों की सीमाएं और अतियां क्या हैं”, तो वे दूसरे चरण की क़ीमत पर पहले चरण को स्वयं ही स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद दूसरे चरण की विवेचना भर शेष रह जाता है। दरअसल, मांसभक्षी पहले ही जानते हैं कि वे एक घोर अनैतिक कृत्य कर रहे होते हैं, और वे भीतर तक ग्लानि से भरे होते हैं।

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आप एक ऐसे अपराधी की कल्पना कीजिए, जिसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। उससे कहा जाता है कि “तुमने चोरी की है।” ऐसे में वह अपने बचाव में यह नहीं कहता कि “यह झूठ है, मैंने चोरी नहीं की है।” वह “आत्मप्रवंचना” से भरा तर्क गढ़ते हुए कहता है कि “जज साहब, आप भी तो अपने अर्दली को उसकी योग्यता से कम तनख़्वाह देते हैं। यह भी मेरी नज़र में एक चोरी है।”

इसमें पेंच यह है कि चोर एक “तथ्य” के रूप में अपने अपराध को पहले ही स्वीकार कर चुका होता है, लेकिन अब उसकी रुचि दूसरों को भी चोर सिद्ध करने में होती है, जो कि चोरी नहीं चोरी की एक “हाइपोथीसिस” है। इससे न्यायाधीश का काम बहुत आसान हो जाता है। अब उसे यही सिद्ध करना है कि वह अपने अर्दली को जितनी और जैसी तनख़्वाह दे रहा है, वह चाहे जो हो, उसे चोरी की श्रेणी में तो क़तई नहीं रखा जा सकता।

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तो स्थापना यह है कि : मनुष्यों में जीवन होता है। पशुओं में जीवन होता है। पेड़-पौधों में भी जीवन होता है।

इस आधार पर : अगर मनुष्य की हत्या अपराध है, अगर पशु की हत्या अपराध है, तो पेड़-पौधों की हत्या को भी अपराध माना जाना चाहिए।

यही ना, मांसभक्षी महोदय! आप यही सिद्ध करना चाहते हैं ना?

तो जब आप स्वयं ही यह मान रहे होते हैं कि पशु की हत्या मनुष्य की हत्या जितना बड़ा अपराध है, तब बहुत संभव है कि तर्कों के जंजाल में उलझने के बाद आपको यह जानकर अच्छा ना लगे कि पेड़-पौधों से फल और सब्ज़ी लेना पेड़-पौधों की हत्या करना उसी तरह से नहीं है, जिस तरह से गाय से दूध और भेड़ से ऊन लेना गाय और भेड़ की हत्या कर देने जैसा नहीं है। हां, यह उनका दोहन और शोषण अवश्य है। और शाकाहारी भी प्रकृति का शोषण करता है। किंतु मांसाहारी तो नृशंसता के साथ अपने पर्यावास की हत्या करता है।

मैं पेड़ से फल लेता हूं। पेड़ पर फिर फल उग आता है। मैं गाय की गर्दन काट देता हूं। गाय का जीवन समाप्त हो जाता है। कोई मूर्ख ही इन दोनों को समान बता सकता है। हां, आप यह अवश्य कह सकते हैं कि पेड़ को काट देना उसी तरह से अपराध है, जैसे पशुओं की हत्या कर देना। और मांसभक्षियों को यह जानकर ख़ुशी होना चाहिए कि लगभग सभी शाकाहारी ना केवल पेड़ काटने के विरोधी होते हैं, बल्क‍ि वे तो चाहते हैं कि पृथ्वी पर “वेजीटेशन” को ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में बढ़ाया जाए।

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पेड़-पौधों का अध्ययन “वनस्पति शास्त्र” के तहत किया जाता है। जीव-जंतुओं का अध्ययन “जीव विज्ञान” के तहत किया जाता है। ये दोनों विज्ञान ही अलग है। प्राणियों में “स्नायु तंत्र” होता है, पेड़-पौधों में नहीं होता। प्राणी “चर” होते हैं, पेड़-पौधे “अचर” होते हैं। प्राणि‍यों में रक्त-मांस-मज्जा की एक संपूर्ण संरचना होती है, पेड़-पौधों में यह कुछ नहीं होता। आपको संभवत: यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिन अंशों में पेड़-पौधों में जीवन होता है, उससे न्यून अंशों में पत्थरों में भी जीवन होता है। हिमालय पर्वत भी अंतत: एक जीवित संरचना है और वह प्रतिवर्ष 6 सेंटीमीटर की गति से बढ़ रहा है। मेरे प्रिय मांसभक्षियो, क्या आप पर्वतों में सुरंग बनाने के लिए किए जाने वाले विस्फोटों की तुलना भीड़भरे बाज़ारों में आतंकवादियों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों से करना चाहते हैं, यह कहकर कि जीवन तो पत्थरों में भी होता है! आप चाहें तो कह लीजिए। आपकी मूर्खताओं का उपहास करने का अधिकार तब अवश्य हमारे पास सुरक्ष‍ित रहेगा।

इसी बात पर मुझे एक चुटकुला याद आया। आइए, फिर से न्यायालय परिसर में चलते हैं। एक व्यक्त‍ि ने सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी। उसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। उस पर सैकड़ों हत्याओं का आरोप लगाया गया। हत्यारे ने अपने बचाव में तर्क किया कि न्यायाधीश महोदय, आपको पता है जीवाणुओं में भी जीवन होता है। आप आज सुबह घर से न्यायालय तक चलकर आए, उसमें करोड़ों जीवाणुओं की मृत्यु हो गई। मैंने अगर सैकड़ों मनुष्यों को मारा है तो आप भी करोड़ों जीवाणुओं के हत्यारे हैं। न्यायाधीश ने दयनीय दृष्ट‍ि से उसकी ओर देखा और उसे उचित सज़ा सुना दी।

मेरे प्रिय मांसभक्षियो, यह चुटकुला आप हैं। आप एक भद्दा मज़ाक़ हैं।

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प्रसंगवश, यह भी याद आया कि बहुधा मांसभक्षी कहते हैं कि एक गाय की हत्या के ऐवज़ में एक मनुष्य की हत्या कर देना कहां तक उचित है। क्या तब उन्हें उन्हीं का यह तर्क नहीं दिया जाना चाहिए कि जीवन तो गाय में भी होता है? और तब अगर वे कहेंगे कि गाय में जो जीवन था और मनुष्य में जो जीवन है, उन दोनों में चेतना के अंशों का बड़ा अंतर है, तो क्या यही बात पेड़-पौधों, पत्थरों, पर्वतों की चेतना के अंशों के बारे में भी नहीं कही जा सकती?

जब शहर में प्लेग फैल जाता है तो लाखों की संख्या में चूहों की हत्या की जाती है। जब कोई बाघ आदमख़ोर हो जाता है तो उसे बंदूक़ की गोली से मार गिराया जाता है। जब आप पैदल चलते हैं तो आपके जाने-अनजाने ही कितने ही कीट-पतंगे कुचलकर मारे जाते हैं। इनमें से किसी की भी तुलना “फ़ैक्टरी फ़ॉर्मिंग” के तहत पशुओं को अमानवीय रूप से पालकर, क़त्लख़ानों में भयावह मशीनों से उनकी हत्या कर आपकी तश्तरी में भोजन की तरह प्रस्तुत किए जाने से नहीं की जा सकती, जबकि जीवन तो चूहों में भी था, आदमख़ोर बाघ में भी था, कीट-पतंगों में भी था और पेड़-पौधों में तो था ही। हत्या की मंशा, हत्या का प्रकार, ये सभी “न्यायशास्त्र” के अध्ययन का विषय होते हैं, जबकि मांसभक्षियों के तर्कों की तो पूरी बुनियाद ही अन्याय की लंपट लालसा के आधार पर टिकी होती है।

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किसी बुद्धिमान व्यक्त‍ि ने एक बार कहा था कि आप किसी अबोध बच्चे को एक सेब और एक ख़रग़ोश दीजिए। अगर वह सेब के साथ खेलने लगे और ख़रग़ोश को मारकर खाने लगे तो मैं मान लूंगा कि मांसाहार स्वाभाविक है।

इसी पर मैं आगे यह भी जोड़ना चाहूंगा कि अगर पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, जैसे पशुओं में होता है तो आप जिस तरह से अपने बच्चों को आम के बाग़ में ले जाते हैं, उसी तरह से उन्हें कभी क़त्लख़ानों में क्यों नहीं लेकर जाते?

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