25 years of Operation Bluestar
चित्र में: स्वर्णमंदिर के पास वाली ईमारत से मोर्चा संभाले हुए जवान

लगभग 5000 सिख महिलाएं ,बच्चों ,बूढ़े , जवान और सेवादारों के कत्लेआम को आज 33 साल हो गए। इसे आप सब लोग ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से जानते हैं। इंदिरा गांधी की सरकार ने खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों के खिलाफ ये ऑपरेशन चलाया था, जिसमें उनके 200 लोगों ने सरेंडर किया वहीँ भिंडरावाले भी मारे गए।

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चित्र में: आत्मसमर्पण करने के लिए स्वर्णमंदिर से बाहर आते हुए कुछ युवा, बच्चे एवं महिलाएं

भारतीय सेना बताती है कि 35 औरतें और 5 बच्चे इस ऑपरेशन में मारे गए और कुल 492 जानें गईं। जबकि असली आंकड़े वहीँ है जो मैंने पहली पंक्ति में लिखा है। ऑपरेशन ब्लू स्टार से पैदा हुई आक्रोश ने इंदिरा गाँधी की जान ले ली। प्रधानमंत्री की हत्या के बाद शुरू हुए दंगों ने फिर से तीन हजार लोगों की जान ले ली। इनमें से ज्यादातर सिख थे।

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चित्र में: कार्यवाही स्थल का मुआयना करते हुए सैन्य अफसर

किताबें बताती है कि 06 जून 1984 को स्वर्ण मंदिर परिसर के अंदर सिर्फ खून ही खून था। इसमें महिलाओं और बच्चों के खून ज्यादा थे।वहां 5 जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस मनाया गया था। लगभग सात हजार श्रद्धालु वहां कीर्तन कर रहे थे तभी वहां सेना के द्वारा बम से हमला किया गया जिससे अफरातफरी मच गई और दबकर ही कई लोग मारे गए। इसके बाद जो खूनखराबा हुआ उसे भारतीय इतिहास में अल्पसंख्यकों पर हुआ पहला बड़ा हमला कह सकते हैं।

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ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर सिखों के मन में टीस आज भी है क्योंकि सरकार ने न सिर्फ उनके आस्था के केंद्र पर सेना घुसाया बल्कि अकाल तख्त को गोलियों से नेस्तनाबूद किया। हरमिंदर साहिब की तरफ गोलियां चलाई गई। ये गहरे जख्म आज भी नहीं भर पाए है और न ही भर पाएंगे। ऑपरेशन ब्लू स्टार में सेना के गोलियों के निशाना बने बेगुनाहों के परिवार के हम आसूं नहीं पोंछ पाए है। वहीँ 84 दंगा पीड़ितों के साथ भी न्याय नहीं कर पाए हैं। एक बड़े पेड़ के गिरने से धरती इतनी हिली कि 3000 सिखों को धरती में समाना पड़ा। यह कत्लेआम माफ़ी योग्य तो नहीं फिर भी आज देश को सिखों से माफ़ी मांगना चाहिए।

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चित्र में: घटनास्थल पर गोलियों के निशान दिखाते हुए सेवादार

Vikram Singh Chauhan's profile photo

विक्रम सिंह चौहान

(ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं)

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