नमक स्वादानुसार, निखिल सचान, Namak Swadanusar, Nikhil Sachal

पुस्तक समीक्षा: नमक स्वादानुसार

जीवन में नमक की जितनी आवश्यकता है उससे कहीं ज्यादे जरूरी है उसका संतुलित होना. मतलब कि व्यक्ति के जरूरत के हिसाब से होना. नमक की मात्र थोड़ी कम या अधिक हुई नहीं कि आपका जायका बिगड़ जाएगा. जी हां, निखिल सचान की पहली किताब “नमक स्वादानुसार” भी कुछ इसी तरीके के साथ प्रस्तुत किया गया है कि आप चीजों को अपने अनुसार ले सकें. निखिल ने सहज, सरल और लोकभाषा में अपना खिलंदड़ प्रयोग किया है तो बदलते माहौल के अनुसार अंग्रेजी का भी बेधड़क प्रयोग किया है. सच तो ये है कि अंग्रेजी को रोमन लिपि में ही लिख दिया है जिसे देवनागरी लिपि में भी उकेरना उचित नहीं समझा. उन्होंने सायास ही ऐसा किया होगा कि जो रोमन में नहीं समझ पाएंगें वे शायद देवनागरी में भी नहीं समझ पाएंगें क्योंकि उसे पढ़ने के लिए किसी डिक्शनरी की जरूरत नहीं है. अलबत्ता वे शब्द कहानी के समय-परिस्थिति से मेल खाते हैं.

नमक स्वादानुसार, निखिल सचान, Namak Swadanusar, Nikhil Sachal

निखिल की भाषा यदि रोजमर्रा की सामान्य बोलचाल की भाषा है तो यह भी स्पष्ट कर देना लाजिमी है कि कहानियों में प्रयोग किए गए कुछ शब्द बुद्धिजीवी एवं सभ्य समाज के लोगों को चुभ सकता है लेकिन न सिर्फ ये शब्द कहानी के लिहाज से उपयुक्त हैं बल्कि ये शब्द गलत अर्थों में इस्तेमाल भी नहीं किए गए हैं. अलबत्ता वे अपना मुहावारानुमा एक विशिष्ट अर्थ रखते हैं. लेखक ने “टोपाज” कहानी में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में लिखा है-

“वो इसलिए बिकता है कि वो उस भाषा में बात करता है जो भाषा लोगों को समझ आती है. वो इसलिए भी बिकता है क्योंकि हम जब दिन भर, इधर–उधर लात खाकर घर वापस आते हैं तो हम किताब अपनी दिमागी चोटों और फितूर को हल्का करने के लिए उठाते हैं, कोई फिलास्फर बनने के लिए नहीं.”

कहानियों के विषय का चयन जितना सुंदर है उसकी प्रस्तुति भी उतनी ही अच्छी है. बिम्बों का जितना शानदार प्रयोग किया गया है उतना ही उदाहरण दर उदाहरण देकर तथ्यों को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है. कहानियों के बीच ही लेखक साहित्य के बदले स्वरूप पर लिखते हैं –

“समय बदल गया है मेरे दोस्त! फ़िल्में और किताबें लिटरेचर नहीं रह गई हैं बल्कि एक मार्केटिंग एक्सरसाइज़ हो गई हैं. अगर मार्केट में सौ में से नब्बे लोग कमअक्ल हैं और दस लोग ‘सेल्फ परोक्लेमड इंटेलेक्चुअल’. तो तुम उन नब्बे लोगों के लिए लिखोगे या दस लोगों के लिए? दस के लिए लिखोगे, तो उसमें से पांच लोग खरीदेंगें और तीन को पसंद आएगी. दो लोग कह देंगें कि नमक कम है और तेल ज्यादा. इससे अच्छा उन नब्बे लोगों के लिए लिखों. कचरा पढकर भी कम से कम पचास लोग कहेंगें कि ‘माशाल्लाह! कितनी गहरी बात कह दी!, ओए होए! मजा ही आ गया साहब! और अगर अपने लिए ही लिखना है तो अपने पास ही लिखकर क्यों नहीं रख लेते हो? उसके छपने की परवाह ही न करो.”

यदि सार के रूप में कह दिया जाय कि “नमक स्वादानुसार” भी उपरोक्त कथन के समर्थन में ही लिखा गया है या वही चीजें इसमें भी लगती हैं कि गहरी से गहरी बातों को भी बेहद ही बेतख्लुफी के साथ कह दी गई है तो कोई गलत बात नहीं होगी. और कहने के तरीके तो हर लेखक के अलग –अलग भी हो सकते हैं और उस पर उदय प्रकाश जैसे लेखकों के प्रभाव भी दिख सकते हैं. और जो लोग राग-दरबारी को आराम से पढ़ सकते हैं उनकों हगने –मूतने और उसके बहाने अमीरी –गरीबी के विश्लेषण में क्या समस्या हो सकती है?

पहले गंभीर साहित्य और लुग्दी साहित्य की बात होती थी. लेकिन व्यावसायिक दौर में लुग्दी साहित्य भी अपने तेवर को बदलकर गंभीर साहित्य से तुलना कर लोकप्रिय साहित्य के रूप में दिखने की कोशिश में लगी है. फिर चीजों को देखने और पढ़ने का नज़र होता है. ऐसा भी तो नहीं है कि लोकप्रिय साहित्य में समाज नहीं होता या उसके दुःख दर्द नहीं होते? क्रांति की बात नहीं होती? फर्क बस होता है नमक के स्वाद का जिसे कहते हैं “नमक स्वादानुसार”.

पुस्तक :- नमक स्वादानुसार

लेखक :- निखिल सचान

प्रकाशक :- हिंद युग्म, नई दिल्ली

मूल्य :- 130 रुपए

पृष्ठ :- 165

समीक्षक: सुशील कुमार भारद्वाज

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