नए रोजगार देश में सिर्फ औद्योगिक उत्पादन से आ सकते हैं

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विख्यात अर्थशास्त्री एडम स्मिथ लिखते हैं कि एक भिखारी अपने समाज की कृपा पर जीता है. देश के बाकि लोग तो रोजगार करके, श्रम करके , धन अर्जित करते हैं, लेकिन सिर्फ भिखारी ही ऐसा नागरिक है जो दूसरों की उदारता पर जीता है.

18वीं शताब्दी के एडम स्मिथ के ये विचार आज के अर्थशास्त्र के सूत्र है. स्मिथ की माने तो हर हाथ को रोजगार ज़रूरी है. रोजगार नहीं तो आप एक तरह से किसी की कृपा पर निर्भर है. यानी बेरोजगार और भिखारी में ज्यादा अंतर नहीं है. अगर अंतर है भी तो बस इतना कि भिखारी , भीख मांगकर गुजारा कर सकता है पर बेरोज़गार को इतना अधिक नीचे गिरने में बार बार सोचना पड़ सकता है.

मित्रों, सोचिये. अपने आस पास के बेरोजगार भाइयों के बारे में ज़रा सोचिये. जहाँ हाथ है पर काम नहीं. काम नहीं तो कमाई नहीं. और कमाई नहीं तो जीने के लिए कोई उम्मीद भरी राह नहीं. शायद यही सब सोचकर, मानवीय आधार पर जर्मनी से लेकर नॉर्वे और जापान से लेकर इजराइल जैसे देश अपने बेरोजगार नागरिकों को भत्ता देने लगे. ये भत्ता उनके नागरिकों को भिखारी बनने नहीं देता. ये भत्ता उनके नागरिकों को कुंठित और दीन हीन होने नहीं देता. फ़िनलैंड में तो नौकरी से हटाए या छटंनी किये गए नागरिक को उसके अंतिम वेतन की 85 .1 प्रतिशत रकम तक हर महीने सरकार देती रहती है. सम्भवता यही एक आदर्श राष्ट्र की कल्पना है. यही ‘वेल्थ ऑफ़ नेशन’ है.

आइये ज़रा दलित-ब्राह्मण, कम्युनिस्ट-भाजपाई, सेक्युलर-कम्युनल, लेफ्ट-राइट से कुछ ऊपर उठकर अपने देश के उस हालात पर गौर करें जहाँ सिर्फ 54 प्रतिशत नागरिकों के पास रोज़गार है. यानी देश में 66 प्रतिशत ‘वर्किंग एज’ जनसँख्या के पास काम नहीं है. देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र बिज़नेस स्टैण्डर्ड के मुताबिक भारत में बेरोजगारी के ताजा आंकड़े और भी चिंताजनक है. समाचार पत्र का दावा है कि देश की 87 करोड़ वर्किंग एज जनसँख्या में सिर्फ 47 करोड़ ‘वर्किंग एज’ जनसँख्या के पास काम है. इन 47 करोड़ में तकरीबन आधे , खेती में लगे है जिनकी आमदनी और भी कम है. कारखानों और कंपनियों में काम करने वालों की तुलना में खेती में प्रति व्यक्ति आय एक चौथाई से भी कम है. यानी सिर्फ खेती पर अधिकतर केंद्रित होकर देश की अर्थव्यस्था में आगे कोई सुधार होने वाला नहीं है. खेती ज़रूरी है पर देश के आगे बढ़ने का रास्ता सिर्फ खेत से नहीं गुजरता है.

जाहिर है नए रोजगार देश में सिर्फ औद्योगिक उत्पादन से आ सकते हैं. देश को आज ज्यादा से ज्यादा कारखाने और भारी उद्योग की ज़रूरत है. लेकिन गैर कृषि क्षेत्र में भारत सिर्फ 2 .8 प्रतिशत की सालाना दर से आगे बढ़ रहा है जो भविष्य के लिए गहरे संकट के संकेत है. फैक्ट्री और मैन्युफैक्चरिंग का हाल तो ये है कि देश में कुछ वर्षों से कुछ लिखने -कहने लायक नहीं है. सच है कि भारत यदि चाहता तो चीन के उद्योग देश में ला सकता था. लेकिन हमने चीन में बढ़ती उत्पादन लागत की ओर गंभीरता से देखा ही नहीं. नतीजा ये हुआ की चीन के उद्योग धीरे धीरे थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया में स्थानांतरित होने लगे जबकि हम इस दिशा में कोई बड़ा प्रयास अबतक नहीं कर पाए.

निसंदेह हमारी प्राथमिकताएं कुछ और थी. हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य …बिखरे हुए थे. अगर हमने पाकिस्तान से आगे बढ़कर चीन से प्रतिस्पर्धा करने का संकल्प लिया होता तो आज तस्वीर कुछ और होती. हमने हिमालय के उस पार की चुनौती को स्वीकार किया होता तो आज हर साल लाखों भारतीयों को रोजगार मिलने की गारंटी रहती. लेकिन हम १३० करोड़ नागरिकों के आगे राष्ट्रीय लक्ष्य रखने में विफल रहे. माओ से लेकर शी- जिनपिंग हमारे नेताओं से बहुत आगे निकल गए.

मित्रों, आज ज़रूरत चीन को चुनौती देने की है ना कि दिवालिया पाकिस्तान से हर मोड़ पर मुकाबला करने की. चाहे वो कश्मीर हो या क्रिकेट. पाकिस्तान प्रतिस्पर्धी नहीं. महत्वहीन है.
हमे तो निशाना कहीं और साधना है.

वरना.

1200 साल पहले जैसे हम ग़ज़नी से पराजित हुए थे या फिर 250 साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी से….वैसे ही आज एक निर्णायक अर्थ युद्ध में हम चीन से पराजित होने के कगार पर खड़े हैं. हमे इस अप्रत्यक्ष युद्ध में उतरना है हमे चीन की चुनौती स्वीकार करनी है. अगर हम इस चुनौती से पीछे हटे, तो..  आज से बीस बरस बाद हम, आप और सब एक ऐतिहासिक हार के गुनाहगार होंगे. याद रखियेगा आज के दौर के राष्ट्र सीमाओं से नहीं अर्थ से टूटते है.

दीपक शर्मा

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(लेखक दैनिक जागरण, आजतक आदि प्रमुख मीडिया संस्थानों में बतौर पत्रकार एवं सम्पादक योगदान दे चुके हैं| वर्तमान में इंडिया संवाद के प्रमुख है)

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