असलियत मैं भी जानती हूँ…… और तुम भी

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उदास रात

रात का हर पहर ढल गया
चाँद खिड़की से आगे निकल गया
ख्वाबों का माला बिखर गया
और मनका नैनों से फिसल गया।।
नसीब की चादर क्यों झीनी है
मेहनत की सुगंध भीनी-भीनी है
कोई रफ्फू का हुनर सिखा दे
हमें मुकद्दर की झोली सीनी है।।
औरों के जख्मों को मरहम दिया हमने
बेपनाह हमदर्दी और खैरमकदम किया हमने
हमारा ही ज़ख्म नासूर बन गया तो क्या
हर दफ़ा ही तो उसे नज़र अंदाज किया हमने।।
इंसानियत के मुल्क में बाजार ऐसा हो
आह सबकी बिके मुस्कान पैसा हो
चोरियां दिल की हों हर रोज जहाँ
खैरियत फिर भी पहरा दे हर शाम ऐसा हो।।
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उस पार की असलियत

मर्यादाएं मैं भी जानती हूँ और तुम भी…………
अधिकार मैं भी जानती हूँ और तुम भी।।
हया का एक झीना सा पर्दा है बीच में……….
वरना उस पार की असलियत मैं भी जानती हूँ…… और तुम भी।।
क्या खूब साझेदारी है हमारी।
तुम्हारे लिए पूरा घर खुशियों का बिछौना मेरे दर्द के लिए कमरे का कोना
तुम्हारी फरमाइशें पापा की ख्वाहिशें
मेरी जरूरतें हिदायत भरी सूरतें
कुछ खोखले रिवाजों को बो दिया था फलक में किसी ने बाअदब निभाये जा रही हूँ……..
ये मैं भी जानती हूँ……. और तुम भी।।
दीक्षा धनक
दीक्षा धनक
पिता का नाम- अनिल कुमार केशरवानी
माता का नाम- सीता देवी
रूचि- हिंदी लेख, कवितायेँ, गजल, कहानियां आदि।
शिक्षा- ग्रेजुएशन (महामाया राजकीय महाविद्यालय कौशाम्बी सम्बद्ध- कानपुर विश्वविद्यालय)
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