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“लिबरल कम्‍युनिस्‍ट व्‍यावहारिक होते हैं। उन्‍हें सैद्धांतिकी वाले तरीके से नफ़रत होती है। उनके लिहाज से आज कोई एकल शोषित वर्ग नहीं है। केवल कुछ ठोस समस्‍याएं हैं जिन्‍हें हल किया जाना है- अफ्रीका में भुखमरी, मुस्लिम औरतों की बदहाली, धार्मिक कट्टरपंथी हिंसा। जब कभी अफ्रीका में मानवीय संकट होता है- और लिबरल कम्‍युनिस्‍ट मानवीय संकटों से वाकई मोहब्‍बत करते हैं, जो उनके भीतर के सर्वश्रेष्‍ठ को बाहर निकाल लाता है!- तो उनके हिसाब से पुराने किस्‍म के साम्राज्‍यवाद विरोधी जुमले में फंसने का कोई अर्थ नहीं होता। इसके बजाय हम सभी को केवल उस चीज़ पर ध्‍यान एकाग्र करना चाहिए जो समस्‍या को सुलझाने में कारगर हो: लोगों को, सरकारों को और कारोबारों को एक उद्यम में जोड़ा जाए; राजकीय मदद पर भरोसा किए बगैर चीज़ों को हरकत में लाया जाए; संकट को सृजनात्‍मक और अपारंपरिक तरीके से देखा जाए और झंडे पर बहस न की जाए…।

लिबरल कम्‍युनिस्‍टों को ”दक्षिण अफ्रीका में नस्‍लभेद” जैसे उदाहरण पसंद आते हैं। उन्‍हें छात्रों का विद्रोह भी प्‍यारा लगता है- क्‍या ग़ज़ब की युवा ऊर्जा का विस्‍फोट है! आखिर, वे भी तो कभी जवान थे और सड़कों पर हुआ करते थे पुलिस वालों से लड़ते-भिड़ते हुए…। आज अगर वे बदल गए हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि उन्‍होंने हकीकत से समझौता कर लिया है बल्कि इसलिए कि दुनिया को वास्‍तव में बदलने के लिए उन्‍हें बदलने की ज़रूरत थी, अपनी जिंदगी में वास्‍तविक क्रांतिकारी बदलाव लाने की ज़रूरत थी। मार्क्‍स ने भी तो आखिर पूछा था- भाप के इंजन के आविष्‍कार के मुकाबले राजनीति उभारों की क्‍या हैसियत? हमारी जिंदगी को बदलने में तमाम इंकलाबों ने जितनी भूमिका निभायी, क्‍या उन सब के मुकाबले अकेले कहीं ज्‍यादा भूमिका इसने नहीं निभायी? मार्क्‍स अगर आज होते तो क्‍या यह नहीं पूछते- आखिर वैश्विक पूंजीवाद के खिलाफ़ तमाम विरोध प्रदर्शनों की इंटरनेट के आविष्‍कार के सामने हैसियत ही क्‍या है?

सबसे बड़ी बात ये है कि लिबरल कम्‍युनिस्‍ट सही मायने में विश्‍व नागरिक होते हैं। वे भले लोग होते हैं जिन्‍हें चीज़ों की चिंता होती है। वे लोकरंजक कट्टरपंथियों और गैर-जिम्‍मेदार, लोभी पूंजीवादी निगमों की चिंता करते हैं। वे आज की समस्‍याओं के पीछे ‘गहरे कारण’ देखते हैं: दरअसल व्‍यापक गरीबी और नाउम्‍मीदी ही है जो कट्टरपंथी हिंसा का पोषण करती है। इसीलिए उनका लक्ष्‍य पैसे कमाना नहीं, दुनिया को बदलना होता है। अब इस प्रक्रिया के फलस्‍वरूप कुछ पैसे अगर हाथ आ ही गए तो शिकायत क्‍या करनी!”

(वायलेंस, स्‍लावोज जि़ज़ेक, नोट: लिबरल कम्‍युनिस्‍ट से लेखक का आशय लिबरल लोगों से है)

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(अभिषेक श्रीवास्तव जी के फेसबुक पृष्ठ से साभार)
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