बाढ़ से निपटना तो हमें सीखना ही होगा

Image result for bihar me badh

पूरब में असम, पश्चिम में गुजरात और दक्षिण में कर्नाटक तक बाढ़ का प्रकोप जारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से वर्षा की कुल मात्रा पूर्ववत रहेगी पर बारिश के पैटर्न में बदलाव आएगा। गर्म हवा में पानी धारण करने की शक्ति अधिक होती है। गर्म बादल बरसते है तो ताबड़तोड़ ज्यादा पानी गिरता है, लेकिन फिर सूखा पड़ जाता है। जैसे 120 दिन के मॉनसून में तीन दिन भारी वर्षा हो और शेष 117 दिन सूखा रहे। वर्षा के पैटर्न में इस बदलाव का हमारी खेती पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

धान की फसल को लगातार 120 दिन पानी की जरूरत होती है। उतना ही पानी तीन दिन में बरस जाए तो फसल मारी जाएगी। वर्षा के पैटर्न में बदलाव का दूसरा प्रभाव बाढ़ पर पड़ेगा। पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमिगत ऐक्वीफरों (भूजल भंडार) में समा जाता है जैसे वर्षा का आधा पानी ऐक्वीफर में रिस गया और आधा नालों-नदियों में बहा। ताबड़तोड़ बरसने पर वह ऐक्वीफरों में नहीं रिस पाता है। पूरा पानी नालों और नदियों की ओर बहने लगता है जिससे बाढ़ आ जाती है।

सरकारी रणनीति

इस कठिन परिस्थिति का सामना करने की सरकारी रणनीति यही है कि भाखड़ा और टिहरी जैसे नए बांध बनाए जाएं, जैसे कि लखवार व्यासी तथा पंचेश्वर में प्रस्तावित हैं। पहाड़ में होने वाली वर्षा के पानी को इन डैमों में जमा कर लिया जाए। वर्षा धीरे-धीरे हो या ताबड़तोड़, इससे डैम की भंडारण क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

बाद में इस पानी का उपयोग खेती के लिए किया जा सकता है। साथ-साथ बाढ़ वाली नदियों के दोनों तटों पर तटबंध बना दिए जाएं जिससे नदी का पानी नहर की तरह अपने रास्ते चले और बाढ़ का रूप न ले। इस नीति का फेल होना तय है क्योंकि डैम में केवल पहाड़ी वर्षा का पानी रोका जा सकता है। मैदानों की ताबड़तोड़ वर्षा का पानी तो बह ही जाएगा। गंगा के कैचमेंट में पहाड़ी हिस्सा 239 हजार वर्ग किलोमीटर का है जबकि मैदानी हिस्सा इससे तीन गुना 852 हजार वर्ग किलोमीटर का है। मैदानी वर्षा के पानी का नुकसान तो होगा ही।

दूसरी समस्या है कि स्टोरेज डैमों की आयु सीमित होती है। टिहरी हाइड्रोपावर कार्पोरेशन द्वारा कराए गए दो अध्ययनों के अनुसार टिहरी झील 140 से 170 वर्षों में पूरी तरह गाद से भर जाएगी। तब इसमें पहाड़ी वर्षा के पानी का भंडारण नहीं हो सकेगा। नदी के दोनों तटों पर बनाए गए तटबंधों में भी गाद की समस्या है। नदी द्वारा तटबंधों के बीच गाद जमा कर दी जाती है। शीघ्र ही नदी का पाट ऊंचा हो जाता है। तब तटबंधों को और ऊंचा किया जाता है। कुछ समय बाद नदी अगल-बगल की जमीन से ऊपर बहने लगती है जैसे मेट्रो ट्रेन का ट्रैक जमीन से ऊपर चलता है। लेकिन तटबंधों को ऊंचा करते रहने की सीमा है। ये टूटेंगे जरूर और तब नदी का पानी झरने जैसा गिरता और फैलता है। बाढ़ और भयावह हो जाती है।

डैमों और तटबंधों से सिंचाई भी प्रभावित होती है। डैम में पानी रोक लेने से बाढ़ कम फैलती है। जब तक तटबंध टूटते नहीं, तब तक ये बाढ़ के पानी को फैलने नहीं देते हैं। बाढ़ के पानी न फैलने से भूमिगत ऐक्वीफरों में पानी नहीं रिसता है और बाद में यह सिंचाई के लिए नहीं उपलब्ध होता। चार-पांच बाढ़ झेल लेने के बाद तटबंधों के टूटने पर पानी का पुनर्भरण अवश्य होता है पर तब तक ऐक्वीफर सूख चुके होते हैं।

सिंचाई में जितनी वृद्धि डैम में पानी के भंडारण से होती है, उससे ज्यादा हानि पानी के कम पुनर्भरण से होती है। अंतिम परिणाम नकारात्मक होता है। लेकिन यह दुष्परिणाम वर्तमान में नहीं दिख रहा है, क्योंकि हम अतीत में संचित भूमिगत जल भंडारों से पानी का अति दोहन कर रहे हैं। जैसे दुकान घाटे में चल रही हो पर पुराने स्टॉक को बेच कर दुकानदार जश्न मना रहा हो, ऐसे ही हमारी सरकार बांध और तटबंध बनाकर जश्न मना रही है।

सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा अन्यथा हम सूखे और बाढ़ की दोहरी मार में डूब जाएंगे। मैदानों में ताबड़तोड़ बरसते पानी का उपयोग भूमिगत ऐक्वीफर के पुनर्भरण के लिए करना होगा। किसानों को प्रोत्साहन देकर खेतों के चारों तरफ ऊंची मेड़ बनानी होगी जिससे वर्षा का पानी खेत में टिके और भूमि में रिसे। साथ-साथ नालों में विशेष प्रकार के ‘रीचार्ज’ कुएं बनाने होंगे जिनसे पानी जमीन में डाला जाता है।

गांवों और शहरों के तालाबों को साफ करना होगा जिससे इनमें पानी इकट्टा हो और भूमि में रिसे। दूसरे, बड़े बांधों को हटाना होगा। इन बांधों की क्षमता सूई की नोक के बराबर है। जैसे टिहरी बांध मे 2.6 अरब घन मीटर पानी का भंडारण करने की क्षमता है। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश के भूमिगत ऐक्वीफरों की क्षमता 76 अरब घन मीटर, यानी लगभग 30 गुना है। टिहरी को हटा दें और बाढ़ को फैलने दें तो टिहरी से ज्यादा पानी भूमिगत ऐक्वीफरों में समा सकता है। यूं भी टिहरी जैसे बांधों की आयु सीमित है। तीसरे, नदियों के किनारे बनाए गए सभी तटबंधों को हटा देना चाहिए।

बदले रहन-सहन

बाढ़ लाना नदी का स्वभाव है। मनुष्य बाढ़ को आत्मसात करे। उसके साथ समायोजन विकसित करे। कुछ वर्ष पहले गोरखपुर में बाढ़ का अध्ययन करने का अवसर मिला था। लोगों ने बताया कि पहले बाढ़ का पानी फैल कर पतली चादर जैसा बहता था। गांव ऊंचे स्थानों पर बसाए जाते थे और सुरक्षित रहते थे। खेतों में धान की ऐसी प्रजातियां लगाई जाती थीं जो बाढ़ में भी अच्छी उपज देती थीं। हमें बाढ़ के साथ जीने की पुरानी कला को अंगीकार करना होगा अन्यथा हम भीषण बाढ़ में डूब जाएंगे और भीषण सूखे में भूखे मरेंगे।

लेखक: भरत झुनझुनवाला।।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s