दुष्यंत कुमार की स्मृति में : साधारण जन-जीवन की असाधारण शायरी

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आज दुष्यंत कुमार की जयंती है, लेकिन उनकी गजलों की दिलचस्प दुनिया की तरह उनकी जन्म तिथि और उसे लेकर खुद उनकी प्रतिक्रिया बड़ी मजेदार थी. हकीकत में, दुष्यंत कुमार का जन्म 27 सितंबर 1931 को बिजनौर जिले के एक गांव राजपुर नवादा में हुआ था. किन्हीं कारणों से सरकारी अभिलेखों में उनकी जन्म तिथि 1 सितंबर 1933 दर्ज करा दी गई. दुष्यंत कुमार की रचनावली के संपादक विजय बहादुर सिंह ने रचनावाली के पहले खंड में इस वाकये को दर्ज किया है. दुष्यंत कुमार इस बात को यार दोस्तों के बीच बड़े ही मजेदार लहजे में बयां करते थे. कहते कि ” महीने की 27 वीं तारीख तक तो जेब खाली हो जाती है. इसलिए जन्म दिन की खुशियां तो पहली तारीख को मिले हुए वेतन पर ही मनाई जा सकती हैं.”

भले ही दुष्यंत कुमार यह बात मजाक के लहजे में कहते रहे हों, दुष्यंत की गजलों और कविताओं में भारतीय समाज की अभाव-वेदना और दुर्बल वर्गों की निरुपायता के इतने ‘मंजर’ भरे पड़े हैं कि लगता है कि खुद दुष्यंत कुमार ने अपने दौर को उन्हीं की नजरों से जिया था. यही कारण है कि सरल हिंदी में कलमबद्ध उनकी गजलें हर उस व्यक्ति और समूह के लिए नारों में तब्दील हो गईं जो परिवर्तनकामी था. अपने परिवेश की बुनियाद को हिलाने की आरजू लिए था.

 कैसे मंजर सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

ये कौन लोग थे जो दुष्यंत कुमार की गजलों में ‘गाते गाते’ चिल्लाने लगे थे? उनके गजल संग्रह ‘साये में धूप’ ने हिंदी की गजलकारी में एक ऐसी लकीर खींच दी कि गजल की विधा को लेकर पूरा साहित्य दुष्यंत-पूर्व और दुष्यंत के बाद के खांचे में खुद ब खुद ढल गया. इसका कारण उनकी गजलों की कोई सचेत काव्यगत नक्काशी नहीं थी. वह बड़े सरल शब्दों से कुछ ऐसा कह जाते कि उनकी जुबान एक आम आदमी की व्यथा-वाहक बन जाती. एक भरे पूरे कटाक्ष के साथ, उनकी गजलों का आदमी यकायक सामर्थ्यवान हो उठता है और सीधे-सीधे उन सत्ताओं से सवाल करने लगता है जिन्होंने उनसे यह वादा किया था कि ‘कहां तो तय था चिरांगा हरेक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए’. वह उस ‘आवाज’ में ‘असर’ के लिए बेकरार थे जिसे लेकर दूसरे मुतमइन थे कि पत्थर का पिघलना मुमकिन नहीं था.

दुष्यंत के गीत-गजलें दरअसल ‘पत्थर’ को पिघलाने की इसी बेकरारी की बजह से कालजयी रचनाओं में परिणित हो गईं. समाज में मानवीय परिवर्तन की कामना करने वाले हर शख्श के लिए जरूरी हो गईं .’साये में धूप’ संग्रह की पहली ही गजल में एक कटाक्ष है –

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहितयात जरूरी है इस बहर के लिए

तो उसी गजल में एक और शेर उन ‘लोगों’ की हालत-बयानी है जो वश-बेवश इस सफर के लिए मुनासिब मान लिए गए हैं. कटाक्ष और करुणा का यह अपूर्व संगम दुष्यंत कुमार की गजलों में हर ओर बिखरा हुआ है.

न हो कमीज़ तो पांवों से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफर के लिए.

सामान्यतः दुष्यंत कुमार को उनकी गजलों के परिप्रेक्ष्य में ही याद किया जाता है. यह सही भी है. हिंदी में गजल को उन्होंने जिस स्थान पर पहुंचाया वहां पहुंचकर यह धारणा खंडित हो गई कि हिंदी एक भाषा के तौर पर गजल के परंपरा-मान्य कोमल भावों को वहन नहीं कर सकती. लेकिन दुष्यंत का कवि-रूप भी कमतर नहीं ठहरता. उनके गीतों में पैठा हुआ अकुंठ और निर्मल ऐंद्रिक बोध उनके गीतों और कविताओं में हर ओर मिल जाता है. उनकी रचनावली के संपादक विजय बहादुर सिंह ने उनके काव्य संग्रह ‘सूर्य का स्वागत’ की एक कविता को उद्घृत करते हुए लिखा है कि ‘सूर्य का स्वागत की इन्हीं कविताओं ने एक समानांतर नया वातावरण रचा, जिसमें जीवन के अभावों और मुश्किलों से मुंह छिपाने या अकेले में बैठ रोने के बदले हकीकतों का सामना करने का अनूठा दम-खम और अंदाज़ था. यह एक प्रकार से कुंठा की विदाई का प्रस्थान-गीत था-

प्रसव-काल है !
सघन वेदना !
मन की चट्टानो कुछ खिसको
राह बना लूं,

….ओ स्वर-निर्झर बहो कि तुम में
गर्भवती अपनी कुंठा का कर्ण बहा लूं,
मुझको इससे मोह नहीं है
इसे विदा दूं !’

दुष्यंत कुमार की मूल्य-चेतना के निर्माण में उनकी ‘तटस्थ- दया’ से घृणा का बड़ा हाथ था. वह ऐसे लोगों पर बरसते थे जो आहतों के लिए ‘आह बेचारे’ कहकर आगे बढ़ जाते थे. वह इस सुविधावादी मध्यमवर्गीय संवेदना के धुर आलोचक थे. ‘आवाजों के घेरे’ संग्रह की एक कविता में वह इस स्कूल के विचारकों की खबर लेते हैं-

‘इस समर को दूर से देखने वालो,
यह सरल है
आहतों पर दया दिखलाओ
‘आह बेचारे!’ कहो..

किन्तु जो सैनिक पराहत
भूमि पर लुंठित पड़े हैं
तुम्हारा साहित्य उन तक जाता
यह तटस्थ दया तुम्हारी
और संवेदना उनको बींधती है .

इस समर को दूर से देखने वालो
ये उदास उदास आंखें मांगती हैं
दया मत दो
इन्हें उत्तर दो’
(प्रश्न-दृष्टियाँ: आवाजों के घेरे)

दुष्यंत कुमार की इसी जीवन-दृष्टि का परिणाम थीं उनकी गजलें और उनकी कविताएं. बेलौस और बिना लाग-लपेट.. सच बोल देने का बेखौफ अंदाज.

“मैं हूं… मैं दुष्यंत कुमार
मेरी कार अगर देशी शराब की दुकान पर खड़ी है
तो मेरी जेब को चरित्र की कसौटी पर मत कसो
अगर हंसना जरूरी है तो
मेरी रुचि पर नहीं, मेरी मजबूरी पर हंसो
धन्यवाद और साभार की मुद्रा में
खड़े हुए लोगो !
मैं तुम पर नहीं
अपने जूतों पर नजर डालता हुआ चल रहा हूं
यह सोचता हुआ कि हद हो गई है
कि वह मुकाम भी जहां मैं उंगली रख सकता था
होठों से छूने पड़े.”

अपने ‘जूतों पर नज़र डालकर ‘चलते चलते भी उनकी नजरों से कोई नहीं बचा. न सजदे में जिस्म झुकाए, बोझ से दुहरा हुआ इंसान और न वो शरीफ लोग जो ‘लहूलुहान नजारों’ का ‘जिक्र आने पे उठे, दूर जाके बैठ गए.’ न वो गड़रिये जिनके लिए उन्होंने ‘जलते हुए वन के वसंत ‘ में कहा था कि ‘गड़रिए कितने सुखी हैं! स्वेच्छा से जिधर चाहते हैं ,उधर भेड़ों को हांके लिए जाते हैं.’ उनकी नज़र से कोई नहीं बचा, न गूंगे बहरे लोग और न ऐसे लोगों से बसे हुए शहर जहां  बारात और  वारदात दोनों ने प्रतिक्रिया का एक सा स्तर पा लिया है..

‘इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

दुष्यंत कुमार की गजलों और कविताओं में ‘जनता’ के लिए एक डर है. एक जायज डर जो हर लोकप्रेमी सृजनकार के हृदय में रहकर उसे बेचैन रखता है. उनकी यह चिंता उनकी मानवता में अपार आस्था से निसृत होती है. वह लोगों को बांसों की तरह इस्तेमाल होते हुए नहीं देखना चाहते थे. उनकी कविता आदमी को इस्तेमाल किए जाने के विरोध में सृजित होती है; वह साधारण आदमी जिसने

‘बाजार से रसोई तक
जरा सी चढ़ाई पार करने में
आयु को खपा दिया.
रोज बीस कदम रखे
एक पग बढ़ा
मेरे आस पास शाम ढल आई!
मेरी सांस फूलने लगी
मुझे उस भविष्य तक पहुंचने से पहले ही
रुकना पड़ा.
लगा, मुझे केवल आदर्शों ने मारा
सिर्फ सत्य ने छला
मुझे पता नहीं चला.’

(जलते हुए वन का वसंत)

बाजार से रसोई के बीच दौड़ते हुए साधारण जन के लिए रचे गए काव्य ने दुष्यंत कुमार को अमर कर दिया है. उनकी गजलें इसी साधारण जन-जीवन की असाधारण शायरी है. उनकी शायरी में यह साधारण मनुष्य ही उनका नायक है. यही साधारण मनुष्य उनके काव्य का प्रतिमान है.

धर्मेंद्र सिंह भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं…

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धर्मेंद्र सिंह

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