क्या बच्चों का सही तरीके से इलाज नहीं होता है? : रवीश कुमार

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गोरखपुर के बीआरडी अस्तपाल में बच्चों के मरने की घटना से एक बात साबित हो गई. 12 अगस्त को 48 घंटे में 30 बच्चों की मौत के बाद हम सबने ख़ूब बहस की, चर्चा की, मुख्यमंत्री से लेकर सरकार को घेरा, फिर चुटकुले बनाए और उसके बाद सब नॉर्मल हो गया. सिस्टम भी समझ गया कि ये लोग पहले गुस्सा करेंगे फिर चुटकुला बनाकर नॉर्मल हो जाएंगे. आजकल हम और आप सिस्टम के बदलने पर नॉर्मल नहीं होते, बल्कि सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने के बाद नॉर्मल हो जाते हैं. नॉर्मल हो गए तभी तो गोरखपुर के उसी अस्पताल से बच्चों के मरने की खबर आ रही है, अब तो कई और अस्पतालों से ऐसी खबरें आने लगी हैं. एक असर अच्छा हुआ है कि कुछ दिन के लिए ही सही अखबारों के पत्रकारों ने अस्पतालों में बच्चों की मौत पर ध्यान देना शुरू किया है. थोड़े दिन में वे भी नार्मल हो जाएंगे क्योंकि बदलेगा तो कुछ भी नहीं.

राजस्थान के बांसवाड़ा में 90 बच्चों की मौत
राजस्थान के बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में जुलाई-अगस्त के महीने में 90 बच्चों की मौत हो गई है. इनमें से 43 की दम घुटने से मौत हुई है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने ज़िला कलेक्टर को जांच के आदेश दिए हैं. जुलाई महीने में 50 बच्चों की मौत हुई है. अगस्त में 40 बच्चों की मौत हुई है. बच्चों की मौत sick newborn care unit में हुई है, ये एक तरह का बच्चों का आईसीयू होता है. अप्रैल में भी 20 और मई में 18 बच्चों की मौत हो गई है. कितनी आसानी से मैं भी संख्या गिन रहा हूं जैसे दो का पहाड़ा हो. जिनके घरों में मौत हुई होगी, कितनी उदासी होगी. उन्हें क्या ऐसा भी लगता होगा कि सिस्टम ने उन्हें फेल किया. उनके बच्चों की जान बच सकती थी. इन बच्चों और इनकी माओं में कुपोषण कारण बताया गया है. राजस्थान के जनजातीय महिलाओं के लिए पुकार कार्यक्रम चलता है. दावा किया जाता है कि इसके तहत बहुत से बच्चों की जान बचाई भी गई है.

जमशेदपुर में तीन महीने में 164 बच्चों ने गंवाई जान

जमशेदपुर के कोल्हान झेत्र में एक अस्पताल है महात्मा गांधी मेमोरियल अस्पताल में मई जून जुलाई अगस्त में 164 बच्चों की मौत हुई है. अस्पताल की रिपोर्ट कहती है कि जून महीने में 60 बच्चों की मौत हो गई थी. जांच तो मई और जून में हुई मौत के बाद ही होनी चाहिए थी, लेकिन जब खबर आई की 30 दिनों में 64 की मौत हुई है तो हड़कंप मच गया. जांच के लिए चार सदस्यों की कमेटी भी बन गई. हमें बताया गया कि कुपोषण के कारण ज्यादातर बच्चों की मौत हो रही है. ये सभी ग्रामीण क्षेत्र के हैं.

रांची के रिम्स में भी 133 बच्चों की मौत

यही नहीं रांची के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में भी 28 दिन के भीतर 133 बच्चे मर गए. एक अखबार ने लिखा है कि आठ महीने में 739 बच्चों की मौत हो गई है. मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार से छह हफ्तों के भीतर जवाब देने के लिए कहा है. अखबार में छपे बयानों में रिम्स के निदेशक ने कहा है कि हम 88 प्रतिशत बच्चों को बचा लेते हैं. 13 प्रतिशत बच्चों की मौत हो जाती है. क्या यह सामान्य आंकड़ा है. राज्य के मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन जांच नाम की सक्रियता कहीं गोरखपुर की घटना के बाद तो नहीं बढ़ी है. अस्पताल के निदेशक ने कहा है कि ज़्यादातर बच्चे बिना ऑक्सीजन और बिना किसी नर्सिंग के लाए जाते हैं, इसलिए भी दम तोड़ देते हैं. यह तो और पोल खुल गई हमारे सिस्टम की.

पैमाने पर फेल नजर आएंगे राज्य

सवाल है कि क्या हम भी सरकार से स्वास्थ्य को लेकर सवाल करते हैं और क्या सरकार आपके सामने इस बारे में कोई दावे करती है. अगर आप ठीक से खरोंच कर देखेंगे तो देश के तमाम राज्य इस पैमाने पर फेल नज़र आएंगे. इसलिए सरकार बनाम सरकार का खेल खेलने से कोई लाभ नहीं होने वाला है. गोरखपुर को लेकर जब हंगामा शांत हो गया तब हमारे सहयोगी कमाल ख़ान ने एक और रिपोर्ट की. यह बात बिल्कुल सही है कि तीस सालों से गोरखपुर में एक्सिफ्लाइटिस की समस्या है. टीकाकरण की योजना है मगर इसके बाद भी इस बीमारी से होने वाली मौत कम नहीं की जा सकी है.

बच्चों के वार्ड में गूंजती है दर्दनाक चीख

ये कमाल खान के ही शब्द हैं कि बच्चों के वार्ड में हर थोड़ी देर बाद किसी मां की दर्दनाक चीख गूंजती है, जो वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर देती है. एक मां वो रोती है जिसके बच्चे की मौत हो गई है और बाकी माएं इस अंदेशे से चीखती हैं कि कहीं उनका बच्चा भी न मर जाए. मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल कहते हैं कि बच्चे गंभीर हालत में आते हैं इसलिए मर जाते हैं. मरने वाले बच्चों को सिर्फ एन्सिफ्लाइटिस नहीं होती है और भी बीमारियां होती हैं. अकेले इस मेडिकल कालेज में इस साल 1346 बच्चों की मौत हो गई है. एक महीने में तो 386 बच्चे मर गए. अस्पताल के प्रिसिंपल का कहना है कि सभी ज़िम्मेदारी के साथ ड्‌यूटी कर रहे हैं. इस समय मरीज़ों की संख्या भी बहुत है.

2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत हुई 

हमने स्वास्थ्य सेवाओं पर सीएजी की रिपोर्ट का प्राइम टाइम में कई बार ज़िक्र किया है. एक बार और सही. गांवों में स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत हुई थी, ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. आपको जान कर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि सरकारों को भी यह जानकर कोई फर्क नहीं पड़ा कि 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में खर्च न होने वाली राशि 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. 6 राज्य ऐसे हैं जहां 36.31 करोड़ की राशि किसी और योजना में लगा दी गई. जब से बच्चों की मौत की रिपोर्टिंग बढ़ी है सरकार अपनी तैयारी नहीं बताती है. जांच कमेटी बन जाती है दो चार तबादले और निलंबन से हम लोग खुश हो जाते हैं. हम जानना चाहेंगे कि किस तरह से फंड में कमी की गई, उसका क्या असर पड़ा.

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