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वो पगडंडी
तालाब किनारे की
वे शाम धुँधल की
गाँव चौबारे की।

जहाँ शर्म हया
पर्दे की शोभा थी
अब याद कहाँ
दीवारें
वे मिट्टी और गारे की।

रोटी थी
और मक्खन था
और छाछ का लोटा था।

नहीं भेदभाव था
धन-दौलत का
न प्रेम का टोटा था।

जल और हवा
और मिट्टी भी
तब आवाज़
पुकारे थी।

वो पगडंडी
तालाब किनारे की।

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