प्राण तुम्हारी पदरज फूली – अज्ञेय

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प्राण तुम्हारी पदरज फूली
मुझको कंचन हुई तुम्हारे चरणों की
यह धूली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

आई थी तो जाना भी था –
फिर भी आओगी, दुःख किसका?
एक बार जब दृष्टिकरों के पद चिह्नों की
रेखा छू ली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी,
गीत शब्द का कब अभिलाषी?
अंतर में पराग-सी छाई है स्मृतियों की
आशा धूली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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