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जियो उस प्यार में
जो मैंने तुम्हें दिया है
उस दुख में नहीं जिसे
बेझिझक मैंने पिया है।
उस गान में जियो
जो मैंने तुम्हें सुनाया है
उस आह में नहीं जिसे
मै ने तुम से छिपाया है।
उस द्वार से गुज़रो
जो मैं ने तुम्हारे लिये खोला है
उस अंधकार के लिये नहीं
जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की
भावना से टटोला है।
वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ बुनूँगा
वे कांटे गोखरू तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ चुनूँगा।
वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे लिये बनाता हूँ बनाता रहूँगा
मैं जो रोड़ा हूँ उसे हथौड़े से तोड़ तोड़
मैं जो कारीगर हूँ करीने से
सँवारता सजाता हूँ सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुंचाने का
उदार उद्यम ही मेरा हो
फिर वहां जो लहर हो तारा हो
सोन तरी हो अरुण सवेरा हो
वह सब ओ मेरे वर्य!
तुम्हारा हो तुम्हारा हो तुम्हारा हो।

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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