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शरद चाँदनी
बरसी
अंजुरी भर कर पी लो

ऊँघ रहे हैं तारे
सिहरी सिरसी
ओ प्रिय कुमुद ताकते
अनझिप
क्षण में
तुम भी जी लो!

सींच रही है ओस
हमारे गाने
घने कुहासे में
झिपते
चेहरे पहचाने

खम्भों पर बत्तियाँ
खड़ी हैं सीठी
ठिठक गये हैं मानो
पल-छिन
आने-जाने
उठी ललक
हिय उमगा
अनकही
अलसानी
जगी लालसा
मीठी,
खड़े रहो ढिंग
गहो हाथ
पाहुन मम भाने,
ओ प्रिय रहो साथ
भर भर कर अंजुरी
पी लो

बरसी
शरद चाँदनी
मेरा
अंत:स्पन्दन
तुम भी क्षण क्षण जी लो!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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