कली – अशोक सिंह

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एक कली मुरझाई सी जैसे विपदा से घिरी हुई।
हिलना डुलना सब छोड़ दिया बस डाल सहारे पड़ी हुई‍।

मैं देख चकित रह गया इसे यह भी तो एक नादानी है।
क्यों जीवन लीला छोड़ कर ये मरने के लिए ही ठानी है।

मैं रह न सका और पूछ दिया आखिर क्या तुझे परशानी है।
क्यूं तेरे जैसी प्यारी कली जीवन से हार यूँ मानी है।

वो सहमी सी पर बोल उठी मैं प्यास के मारे मरती हूँ।
दो बूँद मुझे पिलादे तू मैं तुझसे निवेदन करती हूँ।

यह सुन कर मैं स्तब्ध-सा था क्या ऐसा जमाना होता है।
कोई जल का यूं अपमान करे कोई प्यास के मारे रोता है।

देख दशा इस प्यारी कली की आखों से अश्रु प्रवाह हुआ।
न जाने इस अंधे समाज मे मेरा क्यूं अवतार हुआ।

मेरे असुओं की पीङा ने उस रूठी कली को खिला दिया।
वह कली ही मेरी दोस्त बनी बाकी को मैनें भुला दिया॥

 

Ashok_Singh_Azamgarh

अशोक सिंह
आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

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