स्वतंत्रता संग्राम के दस्तावेज थे पं. रामविलास

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जासं, घोसी (मऊ) :

मऊ एवं आजमगढ़ संयुक्त जनपद के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में पं. रामविलास पांडेय का नाम बेहद अदब से लिया जाता है। आज से ठीक छह वर्ष पूर्व अंतिम सांस लेने वाले पं. रामविलास पांडेय बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। मां-पिता के इस इकलौते पुत्र ने भारत मां को ही जननी का दर्जा देना श्रेयस्कर समझा। अंग्रेज जेलर पर हाथ छोड़ने वाला यह सपूत हुकूमत के दमन चक्र का हर दंश भोगा।

आजाद भारत में मंत्री बनने के बावजूद ईमानदारी एवं बेबाक वाणी की छवि को जीवंत रखा। आदर्श राजनीति को अंगीकार करने वाले ईमानदारी की प्रतिमूर्ति पं. रामविलास पांडेय एक लेखक, विचारक एवं राजनेता होने के साथ ही मंच से सच कहने से गुरेज नहीं करते थे।

आजादी की जंग के पुरोधा रहे पूर्व मंत्री पं. रामविलास पांडेय 01 जुलाई 1918 को इटौरा बुजुर्ग में पैदा हुए। हालांकि उनकी कर्मस्थली घोसी रही है। परतंत्र भारत में राजनीतिक गुरु सहदेव राम के सानिध्य में आजादी का बिगुल बजाया तो 17 मई 1940 को छह माह की कड़ी कैद मिली।

फरवरी 1943 में 12 वर्ष की कैद (हालांकि 46 में रिहा) मिली। 15 अगस्त 42 को मधुबन थाना के घेराव के बाद तो मानों आजादी के इस परिन्दे ने इंदारा, खुरहट, एवं खुंरासो कांड सहित अन्य कई घटनाओं को अंजाम दिया। 1948 में जिला परिषद के प्रथम बार सदस्य बने। 18 वर्ष तक इस पद पर रहे।

1962 में दो वर्ष हेतु विधान परिषद सदस्य बने। 1969 में विधान सभा क्षेत्र घोसी का प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान चंद्रभान गुप्त के मुख्यमंत्रित्व में मंत्री रहे। प्रदेश एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य सहित जीवन के अंतिम क्षण तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संगठन के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष रहे।

19 दिसंबर 10 को एआइसीसी की बैठक में इनकी बेबाक टिप्पणी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को झंकृत कर दिया था। उनकी पुण्यतिथि पर बुधवार की सुबह दस बजे से श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई है। स्थानीय नगर में उनके आवास पर आयोजित होनी वाली इस सभा की जानकारी उनके पुत्र रमेश चंद्र पांडेय ने दी है।

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