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कर्म में अरुणोदय से  लीन ।
वस्त्र धारें हैं जीर्ण, मलीन  ।
बदन उसका है आभाहीन  ।

क्षुधा की पूर्ति मात्र है धर्म ।
न जाने दर्प न माने शर्म ।
तनिक प्रारब्ध, कठिन है कर्म ।

नही कोई है अपना ठौर ।
बनेगा कार्यस्थल कल और ।
अथक औ अंतहीन यह दौर

झेलती नन्ही संतति साथ ।
पंक से सने युगल लघु हाथ ।
लिखा क्या विधि ने इनके माथ ।

ताकते माँ को निश्छल नैन।
अपूरित क्षुधा करे बेचैन।
मिले वक्षामृत जब हो रैन।

ताप हो, ठिठुरन हो, बरसात।
सहे कैसे यह कोमल गात।
काल को देते निशदिन मात।

विवश, असहाय, विपन्ना नार।
झेलती अगणित अत्याचार ।
न दे पाती निज सुत को प्यार । 

हुई फिर तप्त आज शिशु देह।
न आया काम जननि का नेह।
उमड़ आये नयनो के मेंह।

अभागन कर न सकी कुछ त्राण।
चलाया यम ने घातक वाण।
नही बच सका पुत्र का प्राण।

आह! यह कैसा अत्याचार?
निठुर घातक प्रकृती की मार।
करे बस असहायों पर वार।

करे बस असहायों पर वार—–

Rakesh Mishra Gorakhpur

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