“चारुचंद्र की चंचल किरणें
खेल रहीं हैं जल थल में
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है
अवनि और अम्बरतल में”

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

~ मैथिलीशरण गुप्त

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