लोकप्रिय गीत

  • आवारा हूँ (श्री ४२०)
  • रमैया वस्तावैया (श्री ४२०)
  • मुड मुड के ना देख मुड मुड के (श्री ४२०)
  • मेरा जूता है जापानी (श्री ४२०)
  • आज फिर जीने की (गाईड)
  • गाता रहे मेरा दिल (गाईड)
  • पिया तोसे नैना लागे रे (गाईड)
  • क्या से क्या हो गया (गाईड)
  • हर दिल जो प्यार करेगा (संगम)
  • दोस्त दोस्त ना रहा (संगम)
  • सब कुछ सीखा हमने (अनाडी)
  • किसी की मुस्कराहटों पे (अनाडी
  • सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है (तीसरी कसम)
  • दुनिया बनाने वाले (तीसरी कसम)

ढेर सारे नगमे देकर सिर्फ़ 43 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले शैलेंद्र आज ज़िंदा होते तो 93 साल के होते, उनके जाने के पचास साल बाद भी उनके गाने लोगों की ज़बान पर हैं.

सरल और सहज शब्दों से जादूगरी करने वाले शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त, 1923 को रावलपिंडी में हुआ था. मूल रूप से उनका परिवार बिहार के भोजपुर का था. लेकिन फ़ौजी पिता की तैनाती रावलपिंडी में हुई तो घर बार छूट गया. रिटायरमेंट के बाद शैलेंद्र के पिता अपने एक दोस्त के कहने पर मथुरा में बस गए.

कॉलेज के दिनों में ही, आज़ादी से पहले वे नवोदित कवि के तौर पर कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेने लगे थे.

हंस, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं में उनकी कविताएं छपने लगी थीं. इस दौरान 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के वक़्त कॉलेज के साथियों के साथ वे जेल भी पहुंच गए. जेल से छूटने के बाद पिता ने काम तलाशने का फ़रमान जारी कर दिया.

शैलेंद्र के शुरुआती जीवन के बारे में उनकी बेटी अमला शैलेंद्र बताती हैं, “बाबा को कम उम्र में ही मालूम चल गया था कि घर चलाने के लिए काम-धंधा करना होगा. ऐसी स्थिति में वे साहित्य प्रेम छोड़कर रेलवे की परीक्षा पास करके काम पर लग गए. पहले झांसी और बाद में उनकी पोस्टिंग मुंबई हो गई.”

मुंबई के दिनों के बारे में अमला बताती हैं, “कई बार ये कहानियां वे हम लोगों को सुनाते थे कि वे रेल कारखाने में जाते तो थे, लेकिन काम में मन नहीं लगता था. तो किसी पेड़ के नीचे बैठकर कविता लिखते थे. उनके साथी कहते थे, अरे काम करो, इससे घर चलेगा, कविता से नहीं. लेकिन देखिए कि बाबा को उनकी लिखाई ही आगे लेकर आई.”

कविता और प्रगतिशील नज़रिए के चलते शैलेंद्र इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गए. 1947 में जब देश आज़ादी के जश्न और विभाजन के दंश में डूबा था तब उन्होंने एक गीत लिखा था, ‘जलता है पंजाब साथियों…’ जन नाट्य मंच के आयोजन में शैलेंद्र जब इसे गा रहे थे तब श्रोताओं में राजकपूर भी मौजूद थे.

राजकपूर ख़ुद 23 साल के थे, लेकिन पहली फ़िल्म ‘आग’ बनाने की तैयारी कर चुके थे. राजकपूर ने शैलेंद्र की प्रतिभा को पहचान लिया.

अमला बताती हैं, “राज अंकल ने बाबा से ये गीत मांगा था. बाबा ने कह दिया कि वे पैसे के लिए नहीं लिखते.” तब शैलेंद्र अकेले थे. अगले साल शादी हुई तो मुंबई में गृहस्थी जमाने की चुनौती थी. आर्थिक मोर्चे पर शैलेंद्र तंगी महसूस करने लगे थे.

अमला बताती हैं, “जब मेरी मां गर्भवती हुई, शैली भइया होने वाले थे. बाबा की आर्थिक ज़रूरतें बढ़ रही थीं, तब वे राज अंकल के पास गए. उन दिनों वे बरसात बना रहे थे. फ़िल्म लगभग पूरी हो चुकी थी. लेकिन उन्होंने कहा कि दो गानों की गुंजाइश है, आप लिखो. बाबा ने तब लिखा था बरसात में ‘हमसे मिल तुम सजन, तुमसे मिले हम’ और ‘पतली कमर है, तिरछी नज़र है’…”

इसके बाद इन दोनों का साथ अगले 16-17 सालों तक बना रहा. ‘बरसात’ से लेकर मेरा नाम जोकर तक राजकपूर की सभी फ़िल्मों के थीम गीत शैलेंद्र ने ही लिखे. राजकपूर उन्हें कविराज कहकर बुलाते थे. आवारा फ़िल्म ने राजकपूर को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाया.

(शैलेंद्र की बेटी अमला शैलेंद्र से बातचीत सुनिए)

‘आवारा हूं, आवारा हूं, गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं’ की लोकप्रियता के बारे में अमला शैलेंद्र बताती हैं, “हम दुबई में रहते हैं. हमारे पड़ोस में तुर्कमेनिस्तान का एक परिवार रहता है. उनके पिता एक दिन हमारे घर आ गए, कहने लगे योर डैड रोट दिस सांग आवारा हूं..आवारा हूं और उसे रूसी भाषा में गाने लगे.”

इस गाने की कामयाबी का एक और दिलचस्प उदाहरण अमला बताती हैं. “नोबल पुरस्कार से सम्मानित रूसी साहित्यकार अलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन की एक किताब है ‘द कैंसर वार्ड’. इस पुस्तक में कैंसर वार्ड का एक दृश्य आता है, जिसमें एक नर्स एक कैंसर मरीज़ की तकलीफ़ इस गाने को गाकर कम करने की कोशिश करती है.”

हालांकि इस गीत के लिए पहले-पहले राजकपूर ने मना कर दिया था. शैलेंद्र ने अपने बारे में धर्मयुग के 16 मई, 1965 के अंक में – ‘मैं, मेरा कवि और मेरे गीत’ शीर्षक से लिखे आलेख में बताया – “आवारा की कहानी सुने बिना, केवल नाम से प्रेरित होकर मैंने ये गीत लिखा था. मैंने जब सुनाया तो राजकपूर साहब ने गीत को अस्वीकार कर दिया. फ़िल्म पूरी बन गई तो उन्होंने मुझे फिर से गीत सुनाने को कहा और इसके बाद अब्बास साहब को गीत सुनाया. अब्बास साहब की राय हुई कि यह तो फ़िल्म का मुख्य गीत होना चाहिए.”

शैलेंद्र अपने जीवन के अनुभवों को ही कागज़ पर उतारते रहे. इस दौरान उन्होंने सिनेमाई मीटर की धुनों का भी ख़्याल रखा और आम लोगों के दर्द का भी. एक बार राजकपूर की टीम के संगीतकार शंकर-जयकिशन से उनका किसी बात पर मनमुटाव हो गया.

इस वाक़ये के बारे में अमला शैलेंद्र बताती हैं, “कुछ अनबन हो गई थी और फिर शंकर-जयकिशन ने किसी दूसरे गीतकार को अनुबंधित भी कर लिया था. बाबा ने उन्हें एक नोट भेजा – ‘छोटी सी ये दुनिया, पहचाने रास्ते, तुम कभी तो मिलोगे, कहीं तो मिलोगे, तो पूछेंगे हाल’. नोट पढ़ते ही अनबन ख़त्म. जोड़ी टूटने वाली नहीं थी और आख़िर तक दोनों साथ रहे.”

शैलेंद्र का उनके समकालीन कितना सम्मान करते थे, इसका एक दूसरा उदाहरण 1963 में तब देखने को मिला जब साहिर लुधियानवी ने साल का फ़िल्म फेयर अवार्ड यह कह कर लेने से इनकार कर दिया था कि उनसे बेहतर गाना तो शैलेंद्र का लिखा बंदिनी का गीत – ‘मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे’ है.

शैलेंद्र ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी पर जब ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म का निर्माण शुरू किया था, तब उनकी आर्थिक मुश्किलों का दौर शुरू हुआ.

फ़िल्मी कारोबार से उनका वास्ता पहली बार पड़ा था, वे क़र्ज़ में डूब गए और फ़िल्म की नाकामी ने उन्हें बुरी तोड़ दिया. ये भी कहा जाता है कि इस फ़िल्म की नाकामी के चलते ही उनकी मृत्यु हो हुई. लेकिन अमला शैलेंद्र इससे इनकार करती हैं.

अमला बताती हैं, “ये ठीक बात है कि फ़िल्म बनाने के दौरान काफ़ी पैसे लग गए थे. घर में पैसे नहीं थे. लेकिन बाबा अपने जीवन में पैसों की परवाह कभी नहीं करते थे. उन्हें इस बात का फ़र्क़ नहीं पड़ा था कि फ़िल्म नाकाम हो गई क्योंकि उस वक़्त में वे सिनेमा में सबसे ज़्यादा पैसा पाने वाले लेखक थे. जो लोग सोचते हैं कि फ़िल्म के फ़्लाप होने और पैसों के नुक़सान के चलते शैलेंद्र की मौत हुई, वे ग़लत सोचते हैं.”

अमला यह ज़रूर बताती हैं कि इस फ़िल्म को बनाने के दौरान उनके मन को ठेस पहुंची थी. वे कहती हैं, “उन्हें धोखा देने वाले लोगों से चोट पहुंची थी, बाबा भावुक इंसान थे. इस फ़िल्म को बनाने के दौरान उन्हें कई लोगों से धोखा मिला. इसमें हमारे नज़दीकी रिश्तेदार और उनके दोस्त तक शामिल थे. जान पहचान के दायरे में कोई बचा ही नहीं था जिसने बाबा को लूटा नहीं. नाम गिनवाना शुरू करूंगी तो सबके नाम लेने पड़ जाएंगे.”

ये बात दूसरी है कि ‘तीसरी कसम’ को बाद में कल्ट फ़िल्म माना गया. इस बेहतरीन निर्माण के लिए उन्हें राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया. मशहूर निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास ने इसे सैलूलाइड पर लिखी कविता बताया था.

ज़्यादा शराब पीने के कारण लिवर सिरोसिस से शैलेंद्र का निधन 14 दिसंबर, 1966 को हुआ था. महज़ 43 साल की उम्र में वो इस दुनिया को छोड़ गए.

ये भी दिलचस्प संयोग है कि शैलेंद्र का निधन उसी दिन हुआ जिस दिन राजकपूर का जन्मदिन मनाया जाता है. राजकपूर ने नार्थकोट नर्सिंग होम में अपने दोस्त के निधन के बाद कहा था, “मेरे दोस्त ने जाने के लिए कौन सा दिन चुना, किसी का जन्म, किसी का मरण. कवि था ना, इस बात को ख़ूब समझता था.”

शैलेंद्र तो चले गए लेकिन भारतीय फ़िल्मों को दे गए 800 गीत, जो हमेशा उनकी याद दिलाने के लिए मौजूद हैं.

(संदर्भ: बीबीसी हिन्दी )

 

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