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भोर में ही विरहणी आंगन बुहारती,
कर्मलीना प्रतिपल सोचती विचारती,
तक रही है द्वार को दृष्टि है अनिमेष,
धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष।
उर ज्वलित विरहाग्नि से भस्म होती देह,
और भड़काते बरस नयन रूपी मेह,
पिय मिलन का ही रहा बस अभीप्सित शेष,
धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष।
थी भरी हर सौख्य से कंत थे जब पास,
है यही जीवन बचा चल रही बस श्वांस,
है व्यथित श्रृंगारहीना, योगिनी सा वेश,
धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष।
-राकेश मिश्रा

 

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