FATHER-AND-SON

न मेरी मेहबूबा करती है,न अज़ीज़ कर पाता है,
वो दिल को खुश समझते है जब आँखे दर्द छुपता है,
कही कोने में थी गम की गट्ठर उसे भी ढूंढ निकाला ,
की मेरा चेहरा पढ़ना सिर्फ मेरे पिता को आता है।

 

मेरे हाथ जब मेरे अविकसित मूछों को ताव देती है,
मुश्किलें खुद पिता की मौजूदगी भांप लेती है,
सर पर पैर रख भागती है मुश्किलें ,
चेहरे पर बस संतोष की मुस्कान होती है,

 

मेरी लबो पर आई ख़ुशी मेरा गौरव बतलाता है ,
कि मेरी ख़ुशी समझना बस मेरे पिता को आता है।

 

जब ये दुनिया मुझे तन्हाई देती है ,
मेरे पिता की धवनि सुनाई देती है ,
मेरे लाल को न कोई फीका कर पायेगा ,
तब मुझे हरा ही हरा दिखाई देती है।

 

फिर मुझ खुदरंग पर न कोई रंग चढ़ पाता है ,
की मेरा असली रंग पहचानना सर मेरे पिता को आता है।

 

इस कलम से बड़ी ताकत क्या होगी ,
पिता के प्यार से बड़ी दौलत क्या होगी ,
ये किताबो से बीएस इतना सीखा है मैंने ,
माता पिता की सेवा से बड़ी इबादत क्या होगी।

 

इनकी से में तो पाप भी पुण्य हो जाता है ,
की मुझे समझ पाना बीएस मेरे पिता को आता है।


आतिश आलोक
एंगेल्स हाई स्कूल
हज़ारीबाग़ (झारखण्ड )

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

Advertisements