किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा।
मेरी ख्वाबों की दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।।

भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है।
यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।।

poor sleeping on footpath in India
चित्र स्रोत : गूगल

खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है।
इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।।

उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई।
मेरा खत फाड़कर के वो कबूतर मार डालेगा।।

कहीं भी हूँ बुरा मैं काम कोई कर नहीं सकता।
बुरा कुछ गर करूँ भगवान का डर मार डालेगा।।

मुझे इस पिंजरे में रख मगर ये जान ले दानव।
उड़ा पंछी नहीं तो उसको ही पर मार डालेगा।।

राहुल गर्ग

 

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27 विचार “किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा&rdquo पर;

  1. Kya baat h bahut ache gazal h bhai…..Keep it up….God bless u

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  2. धर्मेन्द्र 'असर' 14 अप्रैल 2018 — 4:09 अपराह्न

    यह ग़ज़ल मौलिक रूप से राहुल गर्ग की ही है, जो कि सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी द्वारा लिखी गई ग़ज़ल में प्रयोग किये गए रदीफ़ और काफिये पर लिखी गई है।
    दोनों ही ग़ज़लें अलग-अलग भावों को दर्शाती हैं और एक-दूसरे से बिलकुल अलग हैं।
    सुरेन्द्र चतुर्वेदी जी के लिए ये गौरव की बात होनी चाहिए कि कोई उनसे प्रेरित होकर इतने बेहतरीन तरीके से ग़ज़ल कह पा रहा है। उनसे मेरा यही सवाल है कि क्या उन्होंने ये शब्द पैदा किए हैं और अब इन पर किसी का कोई अधिकार नही है , या उनसे पहले किसी ने इन शब्दों का प्रयोग नही किया? अगर किया गया है तो क्या आदरणीय सुरेन्द्र चतुर्वेदी जी भी चोर हैं?
    सादर धन्यवाद…☺️

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    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


      पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
      द्वारा – प्रधान संपादक
      प्रधान संपादक
      लिटरेचर इन इंडिया समूह

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  3. धर्मेन्द्र 'असर' 14 अप्रैल 2018 — 4:09 अपराह्न

    यह ग़ज़ल मौलिक रूप से राहुल गर्ग की ही है, जो कि सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी द्वारा लिखी गई ग़ज़ल में प्रयोग किये गए रदीफ़ और काफिये पर लिखी गई है।
    दोनों ही ग़ज़लें अलग-अलग भावों को दर्शाती हैं और एक-दूसरे से बिलकुल अलग हैं।
    सुरेन्द्र चतुर्वेदी जी के लिए ये गौरव की बात होनी चाहिए कि कोई उनसे प्रेरित होकर इतने बेहतरीन तरीके से ग़ज़ल कह पा रहा है। उनसे मेरा यही सवाल है कि क्या उन्होंने ये शब्द पैदा किए हैं और अब इन पर किसी का कोई अधिकार नही है , या उनसे पहले किसी ने इन शब्दों का प्रयोग नही किया? अगर किया गया है तो क्या आदरणीय सुरेन्द्र चतुर्वेदी जी भी चोर हैं?
    सादर धन्यवाद…☺️

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    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


      पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
      द्वारा – प्रधान संपादक

      लिटरेचर इन इंडिया समूह

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  4. अमूमन एक शायर के लिए सबसे ख़ुशी की बात यही होती है कि उनका शेर लोगों की जबाँ पे चढ़ जाए।
    पढ़ने वाले लोग अक्सर दाद देकर शायर की उस आला ग़ज़ल को सम्मान देते है।यही बात अगर एक ग़ज़लकार या ग़ज़ल लिखने की कोशिश करने वाले अदने से लोगो पे लागू हो तो वो उस शायर की जमीं पर ग़ज़ल कहकर उस शायर को सम्मान देते है।
    और है भी यूँ ही कि अगर एक सच्चे ग़ज़लकार की जमीं पर कोई उनसे अच्छी ग़ज़ल कह दे तो वो उन्हें दिल से दाद देते है।
    हज़ारो शायरों ने एक ही जमीं पर कितनी ग़ज़ले कहीं है।राजेश रेड्डी साहब की तो ये सबसे बड़ी ख़ासियत है कि वो एक पुरानी जमीं को भी एकदम रवाँ कर देते है।
    कितने ही तरही मुशायरों में शायरों का एक दूसरे के प्रति ये सम्मान देखने को मिलता है।

    कुछ समय पहले मैंने भी सुरेंद्र चतुर्वेदी जी की जमीं पर एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की।और इस रचना को literature india नाम की एक e-पत्रिका में भी छपवाया।
    अब इस बात पर आदरणीय सुरेंद्र चतुर्वेदी जी ने मेरी रचनाओं पे ये लिखा कि तुम चोर हो तुमने मेरी ग़ज़ल में उलटफेर करके इसे अपने नाम से लिख डाला। मात्र किसी की जमीं पर ग़ज़ल कह देने से उसे एक पत्रिका से आजीवन प्रतिबंधित करवा दिया जाता है?और उसकी ग़ज़ल को जिस शायर की जमीं पर लिखी गई उस शायर के नाम से डाल दिया जाता है??
    नीचे दोनों ग़ज़ल प्रेषित करके इल्म ओ हुनर के उस्तादों और भाइयों से ये बात पूछना चाहता हूँ क्या इन दोनों ग़ज़लों के ख़यालात मिलते है?

    मैं मिसाल के तौर पे दोनों ग़ज़ले यहाँ प्रेषित कर रहा हूँ-
    किसी दिन देख कर मौका मुक़द्दर मार डालेगा ,
    किनारा हूँ मैं जिसका वो समंदर मार डालेगा.

    इबादत में नहीं लगता है दिल ये सोच कर मेरा,
    जिसे में पूजता हूँ वो ही पत्थर मार डालेगा .

    लड़ा मैं जंगे मैदां उम्र भर तलवार के दम पर,
    कहाँ मालूम था छोटा सा नश्तर मार डालेगा.

    दरो दीवार पर दिखते हैं तेरी याद के धब्बे ,…
    कभी तन्हाई में मुझको मेरा घर मार डालेगा.

    मुनासिब तो यही होगा न आये नींद अब वर्ना,
    वगरना ख्व़ाब के बच्चों को बिस्तर मार डालेगा.

    उसे इक शेर में कह दूँ मैं दिल की बात तो लेकिन,
    भरी महफिल में वो कह कर मुकर्रर मार डालेगा.

    बना ले मुझको उस दुनिया का वारिस या मेरे मौला ,
    वगरना मुझको इस दुनिया का चक्कर मार डालेगा____Surendra Chaturvedi

    किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा।।
    मिरी प्यारी सी दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।।
    भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है।
    यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।।
    खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है।
    इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।।
    उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई।
    मिरा खत फाड़कर के वो कबूतर मार डालेगा।।
    कहीं भी हूँ बुरा मैं काम कोई कर नहीं सकता।
    बुरा कुछ गर करूँ भगवान का डर मार डालेगा।।
    मुझे इस पिंजरे में रख मगर ये जान ले दानव।
    उड़ा पँछी नहीं तो उसको ही पर मार डालेगा।।
    राहुल गर्ग

    आप गुणीजन बताये की क्या सही है

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    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


      पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
      द्वारा – प्रधान संपादक

      लिटरेचर इन इंडिया समूह

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  5. सुरेश अग्रवाल 14 अप्रैल 2018 — 5:28 अपराह्न

    बहुत बड़े बड़े फनकारों ने मिलते जुलते काफिये और रदीफ़ पे अपनी ग़ज़ले क्षीण हैं,, ख्याल तो एक भी शेर का मिलता नहीं, बड़े शाइर को दिल भी बड़ा रखना चाहिए।

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    1. सुरेश अग्रवाल 14 अप्रैल 2018 — 5:37 अपराह्न

      क्षीण नही,,,, कहीं ,, पढ़े
      पत्रिका के संपादक मंडल ने भी बच्चे के साथ अन्याय किया है,, राहुल की अपनी ग़ज़ल है ये।

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      1. महोदय/महोदया,

        अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

        इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

        हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

        हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

        आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


        पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
        द्वारा – प्रधान संपादक

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  6. अरे संपादक मंडल वाले भाई साहब ज़मीन मिल रही है इसका ये मतलब नही है के ग़ज़ल चौबे जी की हो गई | आप को संपादक हैं आपकी ये ज़ानकारी होनी चाहिए | एडिट करके बच्चे का नाम लिखा जाये | ग़ज़ल उसी की है

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    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


      पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
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  7. सम्पादक मंडल विवेक से काम ले और अपनी गलती सुधारे ग़ज़ल राहुल गर्ग की है बस जमीन एक सी है और जमीन का कोई कॉपीराइट नही होता।बिना सोचे समझे किया गया कार्य है यह।राहुल गर्ग को उचित सम्मान मिले,और प्रतिबंध हटाया जाए।जिससे आपकी मैगज़ीन का भी सही दिशा में सम्मान हो

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    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


      पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
      द्वारा – प्रधान संपादक

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  8. ये बात वाक़ई समझ नहीं आयी। अगर ये ज़मीन जिस पर ग़ज़ल कही गयी है सुरेंद्र साहब लिखवा कर लाये थे तो वेबसाइट को ग़ज़ल के साथ बैनामा भी पोस्ट करना चाहिये था। कविताकोश और रेख़्ता पर इसी ज़मीन में दसियों ग़ज़लें मिल जाएंगी। कहीं मीर, ग़ालिब, दाग़ या फ़ैज़ की कोई ग़ज़ल इसी ज़मीन में निकल आयी तो क्या वेबसाइट ग़ज़ल के नीचे उनका नाम लिख कर सुरेंद्र जी को चोर घोषित कर देगी? शर्मनाक स्थिति है ये।

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      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


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  9. इस तरह की टिप्पणियां जहां कहीं कोई समानता का वजूद नहीं हैं दोनों रचनाओं के भावों में उस परिपेक्ष्य में ये केवल प्रतिभा को क्षतिग्रस्त और आत्मविश्वास को चूर चूर नहीं करेंगी मान्यवर बल्कि साहित्य जगत में एक बड़ी क्षति के रूप में भी उभरेगी।
    इसलिए राहुल जी को उनका नाम रचना के साथ जोड़ कर प्रतिबंध को हटा दिया जाए🙏🙏

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    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


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  10. नमस्कार!

    हम आपकी टिप्पणियों पर पुनः विचार कर रहे हैं लेकिन इसी के साथ यह अवगत कराना चाहेंगे कि आपत्ति के पश्चात राहुल जी ने भी ग़ज़ल हटाने का अनुरोध किया था।

    आजीवन प्रतिबंध हमारी नीति के अनुसार है। अपितु हम पुनः अवलोकन कर रहे हैं और अगर आप सभी द्वारा आपत्ति सही पायी जाती है तो प्रतिबंध हटाते हुए पुनः प्रकाशित किया जाएगा।

    सादर!
    लिटरेचर इन इंडिया टीम

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    1. आप सभी टिप्पणियों पर विचार कर रहे है ये बहुत अच्छी बात है सादर।
      और आपने ठीक कहा आपत्ति जब शायर साहब ने की थी तब ही मैंने आपको बोल दिया था कि कृपया ये ग़ज़ल मिटा दीजिए।

      मैं नहीं जानता आपकी सूफी साहब से क्या बात हुई परन्तु मेरी उस मेल का कोई जवाब मुझे प्राप्त नहीं हुआ था।
      और उसके बाद जब आपने मेरी ग़ज़ल को सूफी साहब के हवाले से डाला और मुझे आजीवन प्रतिबंधित किया तब भी तो मैंने आपसे एक ही सवाल पूछा था कि एक ही जमीन पर ग़ज़ल कहने का प्रचलन बहुत पुराना है और मैंने कह दी इस बात से अगर शायर साहब और आपको कोई परेशानी भी हुई तो उसकी भरपाई में fb से रचना हटाकर और आपसे रचना हटाने के लिए बोलकर कर चुका था तो ये ग़ज़ल सूफी साहब के नाम से डाल और एक तरफा जांच के आधार पे चोर कह देना कितना उचित है यही सवाल मैंने आपसे मेल में भी पूछा था और अब भी पूछता हूँ।
      और आजीवन प्रतिबंध हटना बस मेरे हक की लड़ाई है वरना मै आपकी प्रतिष्ठित पत्रिका मैं अब प्रकाशित नहीं होना चाहता।
      🙏
      शायद ये पत्रिका हम जैसे छोटे लोगो के लिए नहीं है हमारी इस भूल को क्षमा करें कि हम जैसे नौसिखियों ने पत्रिका में छपने का सपना देखा।
      आपके सम्पादक मण्डल को नमन इस मामले पे पुनर्विचार करने के लिए🙏
      सादर धन्यवाद

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      1. महोदय/महोदया,

        अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

        इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

        हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

        हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

        आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


        पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
        द्वारा – प्रधान संपादक

        लिटरेचर इन इंडिया समूह

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  11. और इस प्रश्न को भी जो आपसे ईमेल द्वारा पूछा गया था आपकी बुद्धिमता और अनुभव पे पूरी तरह विशवास करते हुए फिर पूछना चाहता हूँ।

    कृपया इस मैसेज को पूरा जरूर पढ़ें।

    मैंने अदब की दुनिया में सुरेंद्र चतुर्वेदी जी को फेसबुक के जरिए जाना। उनके कलाम मुझे खुद भी बहुत पसंद है।
    और उनकी एक ग़ज़ल है:-

    किसी दिन देख कर मौका मुक़द्दर मार डालेगा ,
    किनारा हूँ मैं जिसका वो समंदर मार डालेगा.

    इबादत में नहीं लगता है दिल ये सोच कर मेरा,
    जिसे में पूजता हूँ वो ही पत्थर मार डालेगा .

    लड़ा मैं जंगे मैदां उम्र भर तलवार के दम पर,
    कहाँ मालूम था छोटा सा नश्तर मार डालेगा.

    दरो दीवार पर दिखते हैं तेरी याद के धब्बे ,…
    कभी तन्हाई में मुझको मेरा घर मार डालेगा.

    मुनासिब तो यही होगा न आये नींद अब वर्ना,
    वगरना ख्व़ाब के बच्चों को बिस्तर मार डालेगा.

    उसे इक शेर में कह दूँ मैं दिल की बात तो लेकिन,
    भरी महफिल में वो कह कर मुकर्रर मार डालेगा.

    बना ले मुझको उस दुनिया का वारिस या मेरे मौला ,
    वगरना मुझको इस दुनिया का चक्कर मार डालेगा____Surendra Chaturvedi

    और इसी जमीन पर मैंने एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की थी।जमीन यानी उसी रदीफ़ और काफ़िया पर-
    तो कुछ इस तरह से मेरे पास अवसर थे
    बिस्तर मार डालेगा
    बन्दर मार डालेगा

    किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा।।
    मिरी प्यारी सी दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।।
    भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है।
    यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।।
    खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है।
    इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।।
    उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई।
    मिरा खत फाड़कर के वो कबूतर मार डालेगा।।
    कहीं भी हूँ बुरा मैं काम कोई कर नहीं सकता।
    बुरा कुछ गर करूँ भगवान का डर मार डालेगा।।
    मुझे इस पिंजरे में रख मगर ये जान ले दानव।
    उड़ा पँछी नहीं तो उसको ही पर मार डालेगा।।
    राहुल गर्ग

    तरही मुशायरे में तो होता ही यही है कि एक शायर का मिसरा आपको दे दिया जाता है और आपको उसी रदीफ़ और काफिये पे एक ग़ज़ल कहनी होती है। इसमें बड़े-बड़े अदब के रचनाकारों ने भाग लिया है।
    किसी की जमीन पे ग़ज़ल कहने का प्रचलन बहुत पुराना रहा है। बड़े बड़े शायरों ने ग़ालिब की जमीन और जॉन साहब की जमीन पर शेर कहे हैं। तो ये एक शायर के लिए एक बहुत सम्मान की बात हुई।मैंने भी सुरेंद्र चतुर्वेदी जी की कई पोस्ट पे बेहतरीन कमेंट किए थे क्योंकि वो वाकई ज़बरदस्त थी।
    अब उन्ही से प्रेरित होकर जब मैंने ये ग़ज़ल डाली तो उन्होंने मुझे फेसबुक पे मैसेज किया कि तुम चोर हो और तुमने मेरी ग़ज़ल में हेरा फेरी करके अपनी बना ली।
    इस बात पर मैंने अपनी ग़ज़ल डिलीट कर दी थी और आपको भी उसी दिन ये मैसेज किया था कि कृपया आप ये ग़ज़ल डिलीट कर दीजिए। क्योंकि अगर ये बात शायर को पसंद नहीं आयी तो गलत है।

    किन्तु इस तरह से जो ग़ज़ल मैंने लिखी उसे आप ने सुरेंद्र चतुर्वेदी जी के नाम से डाल दिया और साथ ही ये भी लिखा कि राहुल गर्ग ने अपनी मौलिक रचना बता कर इसे प्रेषित किया था।
    अगर एक ही जमीं पर ग़ज़ल लिखना सुरेंद्र जी कि नज़रो में गुनाह था तो उसकी भरपाई मैंने आपको ग़ज़ल डिलीट करने को कहकर कर दी थी।
    और ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमे एक ही जमीन पर कई ग़ज़लेँ हैं, फिलबदिह तक में ये बहुत ज्यादा प्रचलित है। इसमें रदीफ़ और काफ़िया मूल शायर का रहता है लेकिन सारे ख़्याल और सब कुछ हमारा रहता है।
    आप दोनों ग़ज़लों को एक बार फिर पढ़ सकते हैं दोनों ही ग़ज़लों के भाव में जमीन आसमान का अंतर है उनकी ग़ज़ल में रूमानी बात की गई है और मेरी ग़ज़ल में रोजमर्रा कि जिंदगी की।

    एक ही जमीं पर ग़ज़ल का एक उदाहरण-

    बे-क़रारी सी बे-क़रारी है

    वस्ल है और फ़िराक़ तारी है

    जो गुज़ारी न जा सकी हम से

    हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है

    निघरे क्या हुए कि लोगों पर

    अपना साया भी अब तो भारी है

    बिन तुम्हारे कभी नहीं आई

    क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है

    आप में कैसे आऊँ मैं तुझ बिन

    साँस जो चल रही है आरी है

    उस से कहियो कि दिल की गलियों में

    रात दिन तेरी इंतिज़ारी है

    हिज्र हो या विसाल हो कुछ हो

    हम हैं और उस की यादगारी है

    इक महक सम्त-ए-दिल से आई थी

    मैं ये समझा तिरी सवारी है

    हादसों का हिसाब है अपना

    वर्ना हर आन सब की बारी है

    ख़ुश रहे तू कि ज़िंदगी अपनी

    उम्र भर की उमीद-वारी है

    जॉन एलिया साहब

    अब इस जमीं पर कई बार काफ़ी कुछ कहा जा चुका है विभिन्न शायरों के द्वारा-

    काफ़िया और रदीफ़ शायर के पास

    बेक़रारी है
    गुज़ारी है
    सवारी है

    बेक़रारी सी बेक़रारी है
    दिन भी भारी है रात भी भारी है
    जिंदगी की बिसात पर अक्सर
    जीती बाजी भी हारी है
    तोड़ो दिल शौक से मेरा तोड़ो
    चीज़ मेरी नहीं तुम्हारी है
    बाहर ए हस्ती उठा न सका कोई
    ये गमे दिल जहाँ से भारी है
    आँख से छुपकर दिल में बैठे हो
    हाय कैसी ये पर्दादारी है

    ताहिर फ़राज साहब

    दर्द हल्का है, साँस भारी है
    जिये जाने की रस्म जारी है

    आप के बाद हर घड़ी हमने
    आप के साथ ही गुज़ारी है

    रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो
    दिन की चादर अभी उतारी है

    कल का हर वाक़या तुम्हारा था
    आज की दास्ताँ हमारी है

    -गुलज़ार साहब

    एक ही जमीन पर तीन ग़ज़ले मगर ख़यालात अलग

    फिर मेरी इस रचना को-

    किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा।।
    मिरी प्यारी सी दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।।
    भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है।
    यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।।
    खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है।
    इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।।
    उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई।
    मिरा खत फाड़कर के वो कबूतर मार डालेगा।।
    कहीं भी हूँ बुरा मैं काम कोई कर नहीं सकता।
    बुरा कुछ गर करूँ भगवान का डर मार डालेगा।।
    मुझे इस पिंजरे में रख मगर ये जान ले दानव।
    उड़ा पँछी नहीं तो उसको ही पर मार डालेगा।।
    राहुल गर्ग

    जिसकी जमीं सुरेंद्र चतुर्वेदी जी की रचना की है मतलब काफ़िया और रदीफ़ उसे चोरी कह देना और मेरी इस रचना को सुरेंद्र चतुर्वेदी जी के नाम से लिखना और ये लिखना की राहुल गर्ग ने ये रचना मौलिक बोलकर चोरी की भेजी है कितना उचित है?

    सादर धन्यवाद

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    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


      पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
      द्वारा – प्रधान संपादक

      लिटरेचर इन इंडिया समूह

      Like

  12. सुरेश अग्रवाल 15 अप्रैल 2018 — 8:48 अपराह्न

    संपादक महोदय, अगर आपको कुछ गलत लगा भी तो राहुल की वो ग़ज़ल हटा सकते थे, लेकिन राहुल की रचना पर किसी और का नाम लिख देना भी ठीक नहीं
    हालांकि इस जमीन पर सूफी साहब से पहले बहुत लोगो ने ग़ज़ल कही है तो क्या ,,,,,,
    आगे लिखना ठीक नही लगता मुझे।

    Like

    1. महोदय/महोदया,

      अगर हमारी तरफ़ से कोई त्रुटि हुई है तो हम क्षमाप्रार्थी हैं| हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार हैं| हमारी नीति के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी और की रचना को अपने नाम से भेजता है तो आजीवन प्रतिबन्ध का प्रावधान पूर्व में ही सर्वसम्मति से निर्धारित है|

      इस सन्दर्भ में अवगत कराना चाहेंगे कि राहुल गर्ग जी द्वारा आपत्ति के तुरंत बाद ही रचना हटाने का अनुरोध करना ही इस कार्यवाही का कारण था| अब हमें राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हो चुका है अतः पुनः हम रचना को उनके नाम से प्रकाशित कर रहे हैं|

      हमारी टीम व्यक्तिगत द्वेष एवं भेदभाव में विश्वास नहीं रखती| राहुल गर्ग जी द्वारा पूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त न होने की स्थिति में ही यह कार्यवाही की गयी थी|

      हम पुनः आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार है| इसी कड़ी में हमें कभी-कभी मौलिक रचनाओं के संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं|

      आपको हुए कष्ट का हमें खेद है और हम पुनः सहानुभूति, विश्वास और प्रोत्साहन हेतु सदैव तत्पर रहेंगे| राहुल गर्ग जी प्रकाशनार्थ अन्य रचनाएँ पूर्ववत सम्पादक मण्डल को प्रेषित कर सकते हैं|


      पत्र – १५ अप्रैल, २०१८
      द्वारा – प्रधान संपादक

      लिटरेचर इन इंडिया समूह

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  13. धर्मेन्द्र 'असर' 15 अप्रैल 2018 — 11:10 अपराह्न

    आदरणीय सम्पादक मण्डल,
    सादर प्रणाम!
    इस संदर्भ में मेरा एक प्रश्न है कि राहुल गर्ग से आपने पहले स्पष्टीकरण माँगा क्यों नही सीधे फैसला लेने का कोई विशेष कारण?
    और राहुल गर्ग के द्वारा भेजे गए मेल पर भी आपने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नही की। इस सब का क्या कारण था?

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