किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा

poor sleeping on footpath in India

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा।
मेरी ख्वाबों की दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।।

भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है।
यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।।

खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है।
इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।।

उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई।
मेरा खत फाड़कर के वो कबूतर मार डालेगा।।

कहीं भी हूँ बुरा मैं काम कोई कर नहीं सकता।
बुरा कुछ गर करूँ भगवान का डर मार डालेगा।।

मुझे इस पिंजरे में रख मगर ये जान ले दानव।
उड़ा पंछी नहीं तो उसको ही पर मार डालेगा।।

सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

नोट: यह रचना हमें राहुल गर्ग नामक व्यक्ति ने प्रेषित करके अपनी मौलिक रचना बताई एवं हमारे संपादन मंडल द्वारा इस रचना को प्रकाशन हेतु स्वीकृति भी प्राप्त हो गयी| लेकिन इस गज़ल के मौलिक रचनाकार ने हमसे संपर्क करके अपनी कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की|

इस गंभीर प्रकरण में हमारी जांच के पश्चात यह प्रमाणित हुआ कि वास्तव में इसके मौलिक रचनाकार सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी जी हैं| इस तरह की ओछी हरकत लिटरेचर इन इंडिया समूह कदापि बर्दाश्त नहीं करेगा|

अतः सर्वसम्मत्ति एवं लिटरेचर इन इंडिया समूह के नियमों के अनुसार चोरी की रचना को अपनी मौलिक रचना बताकर प्रेषित करने वाले व्यक्ति राहुल गर्ग को लिटरेचर इन इंडिया में प्रकाशन हेतु आजीवन प्रतिबंधित किया जाता है|

 

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2 विचार “किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा&rdquo पर;

  1. Kya baat h bahut ache gazal h bhai…..Keep it up….God bless u

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