बागों के पहरेदार से होते दरवाजे
और कलियों सी नाजुक होतीं खिड़कियाँ
कितना भी मन को बहलाएँ
कितना भी सुख-दुःख बांटे
दरवाजों सी समझदार
कभी बन नही पातीं खिड़कियाँ !

Darwaje aur Khidkiyan - Minakshi Vashisth

हर मौसम में अविचल रहते दरवाजे
इक झोके से सिहर उठती खिड़कियाँ
ये खुल जाती हैं मौसम में चुपके-चुपके
पुरवाई में महक उठती  खिड़कियाँ!

बंधन में जकड़े रहते जब दरवाजे
किरणों के स्वागत में खुलती खिड़कियाँ
रिमझिम फुहारो में लहराता इनका आँचल
बूंदों के संग हौले-हौले थिरकती हैं खिड़कियाँ!

सबके लिये मुस्काते रहते दरवाजे
तन्हाई में सिसकती हैं खिड़कियाँ
जब उतरता है वसंत खिडकियों पर
दिन-दिन भर बतियाती रहतीं खिड़कियाँ!

ये बतियाती हैं फूलों से तितली से
ये बतियाती हैं चिड़ियों, गिलहरियों से
अरे भले ही मौन साध ले दरवाजे
होती है बातून बड़ी ही खिड़कियाँ!

जब दुनियाँ से झूठ बोलते दरवाजे
सारा सच दिखला देती हैं खिड़कियाँ
भावशून्य अक्खड़ होते हैं दरवाजे
चंचल ,नटखट भोली-भाली खिड़कियाँ!

ऋतु बदले पर मन ना बदलें दरवाजे
और मौसम की हो जाती हैं खिड़कियाँ
पल में हो जाती हैं बागों की
बहारों की
हो जाती हैं चाँदनी रातों की
बरसातों की
गाती, गुनगुनाती हैं बुलबुलों के साथ-साथ
जुगनुओं सी जगमगाती खिड़कियाँ!

अजी खिड़कियों को होता है
खिड़कियों से प्यार
खिड़कियों को करते देखा
खिड़कियों से तकरार
खिड़कियाँ खनकती है
खिड़कियाँ सिसकती है
और खुल के खिलखिलातीं खिड़कियाँ!

सीधे सम्भले गम्भीर होते दरवाजे
चुलबुली शैतान होती खिड़कियाँ!
अल्हड़ नादान होती खिड़कियाँ !!

Minakshi Vaishth | मीनाक्षी वशिष्ठ

मीनाक्षी वशिष्ठ
पिता-गोबिन्द प्रसाद शर्मा
माता-गायत्री देवी शर्मा
निवासी-टूंडला (फिरोजाबाद)
शिक्षा – बी.ए,एम.ए(अर्थशास्त्र), बी.एड, एम.ए (साहित्य) अध्ययन जारी

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