मैं नश्वर था पर तुम्हारे हाथों मृत्यु का अधिकारी नहीं
मैं बूढ़ा अवश्य था पर जनजीवन का अपकारी नहीं

 

मैं जब बच्चा था तुम पैदा ही नहीं हुए थे धरती पर
न यह भीड़भाड़ थी, न शोर था, जीवन था प्रगति पर

 

पेड़ की आत्‍मा - Jagdish Sharma Sahaj

 

मैं मौन रहकर तुम्हें देखता था निस्तब्ध सा खड़ा था
शीतल छाया देने को तुम्हें प्रचंड सूर्य से भी लड़ा था

 

जब भी तुम्हारा जी ललचाता तुम मेरे फल चखते थे
कितने ही पत्थर मुझ पर तुम वृथा ही मारा करते थे

 

मैंने देखा है तुम्हारे दादा,परदादा, और पिता को यहाँ
मेरे आश्रय में खड़े होते और ले जाते चिता को यहाँ

 

कालांतर में मैं भी बढ़ा और मेरा कलेवर बड़ा हुआ
अनगिनत पंछियों के गुँजन से मैं फिर से खड़ा हुआ

 

सफेद  बगुले, तीतर ,सारस, बटेरों का आश्रय रहा
मैं मजबूत इरादों के साथ डटकर खड़ा अक्षय रहा

 

रैन बसेरा देकर चिड़ियों को मैं हर पल गर्वित रहा
अनजान परिन्दों की बोलियाँ सुनकर मैं हर्षित रहा

 

आज तुमने मेरी हत्या कर अप्राकृतिक हनन किया
बेजुबानो के आशियानों का दो दिन में दमन किया

 

मिटा दिया अस्तित्व तुमने इतने सुन्दर जीवन का
क्यों सुनाई नहीं दिया शोर हत्या में मेरे क्रन्दन का

 

हे मानव ! तुम इस धरती पर निन्दित, हत्यारे दानव हो.
तुम ही विपदा के कारण हो तुम ही विपदा के कारक हो

 

अभिशापित हो तुम युग युग से हरियाली के बाधक हो
अपने सुख की खातिर तुम कितने युग से संहारक हो.

जगदीश शर्मा सहज Jagdish Sharma Sahaj

जगदीश शर्मा सहज
अशोकनगर, म0प्र0

गर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: 

editor_team@literatureinindia.com

समाचार: 

news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: 

adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें