‘नरेन्द्र कोहली’ के उपन्यासों में चित्रित नारी स्वतंत्रता की सार्वकालिक समस्याएँ

सुप्रसिद्ध उपन्यासकार श्री नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी 1940 ईस्वीं को स्यालकोट, पंजाब ( विभाजन पूर्व) में हुआ। यह नगर अब पाकिस्तान में है। नरेन्द्र कोहली एक दायित्ववान रचनाकार है। मानव जीवन में पाये जाने वाले अंतर्विरोध, विसंगतियों और सामाजिक विषमताओं को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया है। कोहली जी ने भारत की प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं रामकथा, महाभारत कथा तथा भगवत गीता की कथा को आधार बनाकर इन्हें एक नवीन और आधुनिक दृष्टि से युगीन संदर्भों के तहत देखने-परखने का प्रयत्न किया है। उनके कृतित्व और व्यक्तित्व का आकलन एवं मूल्यांकन करना इस अध्याय का उद्देश्य है। कोहली जी की साहित्यिक कृतियों का संपूर्ण भारत में स्वागत हुआ और उन रचनाओं को कई पुरस्कारों से भी नवाजा गया है।

Narendra Kohli | Literature in India

नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में चित्रित नारी स्वतंत्रता की समस्या सार्वकालिक है।  प्राचीनकाल से लेकर आज तक समस्या उसी तरह बरकरार है जैसे पहले थी, स्थिति में सुधार क्षणिक होती है अर्थात कुछ समय के लिए लगता है कि समाज के लोगों की मानसिकता नारी के प्रति एकदम बदल गयी और वे लोग भी नारी को समान अधिकार देने के पक्ष में दिखते है परन्तु दूसरे ही पल नारी के ऊपर हुए अत्याचार की किसी एक घटना मानो आज भी प्राचीनकाल की परम्परा को जीवित रखे हुए है जबकि समाज के विकास में नारी के योगदानों को नकारा नही जा सकता है क्योकि परिवार का विकास करने के साथ ही समाज को भी एक नई दिशा प्रदान करने में नारी की अहम भूमिका होती है।

 “एक पुरूष को शिक्षित होने से एक व्यक्ति शिक्षित होता है परन्तु एक नारी के शिक्षित होने से पूरा परिवार शिक्षित होता है” क्योकि परिवार को एक सूत्र में बांधने का कार्य नारी ही करती है तथा अपने अथक प्रयासों से संपूर्ण परिवार को एक साथ लेकर विकास के पथ पर अग्रसर होती है। समाज में स्त्री और पुरूष का महत्व समान है। दोनों परिवार तथा समाज के अभिन्न और अनिवार्य अंग माने जाते है। दोनों के संबंध समाज व्यवस्था को सन्तुलित एवं संगठित रखते है, परस्पर सहयोग के बिना जीवन रूपी रथ आगे नहीं बढ़ सकता। इतिहास इस बात का साक्षी है कि वैदिक युग तक नारी का बड़ा पूजनीय स्थान था। विवाह में भी वर और कन्या की इच्छा और पसंद का ध्यान रखा जाता था । कोहली जी के उपन्यासों में चित्रित पंक्ति नारी स्वतंत्रता की स्थिति को प्रसांगिक करती है।

सारी समस्याएँ जिनका संबंध नारी की सुरक्षा से है, उसकी जड़ में पुरुष की विकृत मनोवृत्तियाँ ही काम करती है।अभी तक लंबा सफर बाकी है, कारण कि समस्या है नारी को पुरुष की मानसिकता से मुक्त कर लेने की क्योकि वह तो अब भी यही समझता है कि वह उसकी दासी अहि, संपत्ति है, मन बहलाने का साधन है।प्राचीनकाल से ही भारत में नारी को शक्ति, देवी और न जाने क्या-क्या कहा गया है जो अब भी जारी है।मगर इन सब के पीछे नारी को जो रुप दिया गया वह तमाम वर्जनाओं,

निषेधों और सीमाओं से भरा हुआ है।

धार्मिक और सामाजिक मान्यताएँ गढ़कर संस्कार और पाप-पुण्य की परिभाषाएँ बनाकर उन्हें उनके दायरों में बंदकर दिया गया है।आजकल दहेज ने थोड़ा गिरगिट की तरह रंग बदला है। लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा और नौकरी कामहत्व उनके विवाह के समय पता चलता है। एक पढ़े-लिखे, रोजगार शुदा लड़के के लिए पढ़ी-लिखी रोजगार शुदापत्नी मात्र नहीं चाहिए, उसके साथ-साथ तिलक, दहेज के रुप में मोटी रकम और घर भर का सामान भी चाहिए। उनके मानसिक तथा आत्मिक विकास के द्वारों पर ताले लगा दिए गये। उनकी साहित्यिक उन्नति के मार्ग पर अनेकों प्रतिबंध लगा दिए गये। ’स्त्री शूद्रो नाधीताम्’ जैसे वाक्य रचकर उसे शूद्र की कोटि में रख दिया ।

हिन्दी ही नहीं संसार के अनेक उपन्यासों में भी स्त्री की समस्या एक ध्यानाकर्षक विषय रही है। हर युग की समस्याएँ एवं समाधान भिन्न-भिन्न होती है। जो आज का सत्य है वह कल काल बाह्य हो  जायेगा किंतु दु:खद घटना यही है कि पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी अपनी आस्थाएँ, अपनी मान्यताएं एवं सिद्धांत थोपना चाहती है और यही दो पीढ़ियों का वैचारिक संघर्ष प्रारंभ होता है। स्वार्थ, भ्रष्टाचार, शोषणवृत्ति, एकाधिकार, पुरानी नौकरशाही से साँठ-गाँठ, सत्तालिप्सा आदि के कारण जनता की आस्था उखड़ने लगी है। आम-आदमी को उन्हीं क्रूर स्थितियों, विसंगतियों का शिकार होना पड़ा जो गुलाम भारते में थी, बल्कि सही मायने में उसका दर्द और गहरा और दुहरा हो गया है। आम जनता की व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति कोहली जी के इन उपन्यासों में समकालीन असंतोष के बोध के साथ लेकर चलती है। समाज की ऐसी विषम स्थिति में पूँजी का केन्द्रीकरण होता गया और भारतीय जीवन दो वर्गों में अति गंभीर और अति गरीब में बह गया। नरेन्द्र कोहली ने अपने समय की महत्वपूर्ण समस्याओं से उलझने और उसे एक नयी दिशा देने का प्रयास किया है। वर्तमान समाज में सामूहिक हित की भावना का सर्वथा लोप हो चुका है।

व्यक्तिगत स्वार्थ की दलदल में ही सारा देश फँसा हुआ है। आपसी अलगाव के दुष्परिणाम सारा देश भुगत रहा है। संकीर्ण स्वार्थी मनोवृत्ति में ही अन्याय, अत्याचार और शोषण फलता-फूलता है। आधुनिक युग में समाज सुधारकों का ही नहीं साहित्यकारों का ध्यान भी नारी से सम्बद्ध विभिन्न समस्याओं की ओर विशिष्ट रूप से आकृष्ट हुआ। युग – युग से पीड़ित व प्रताड़ित नारी जीवन के विभिन्न पहलुओं का चित्रण कोहली जी ने बड़े ही संवेदनशीलता के साथ किया। नरेन्द्र कोहली एक सजग और संवेदनशील रचनाकार हैं। उन्होने अपने पौराणिक उपन्यासों में प्राचीन समय में स्त्री की जो स्थिति थी उसका सजीव प्रमाणिक एवं कलात्मक चित्रण करने के साथ ही नारी के जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी उन्होने बड़े ही कुशलतापूर्वक उजागर किया है तथा प्रत्येक स्थिति को प्राचीन समाज से वर्तमान समाज बीच सफलतापूर्वक दर्शाया है। कोहली जी ने अपने एक से अधिक उपन्यासों के माध्यम से नारी से जुड़ी समस्याओं को लोगों को बीच प्रस्तुत किया तथा उसके निदान के लिए लोगों की मानसिकता टटोलनी चाही।

हिडिम्बा , सैरंध्री, कुंती ,मत्सयगंधा आदि उपन्यासों में नरेन्द्र कोहली जी ने समाज के हर उस कड़ी को छूने की कोशिश की है जो नारी की समस्याओं का कारण है। अन्धविश्वास एवं रूढ़िवाद  में उलझे हुए भारतीय समाज की नारी घर की चाहरदीवारी के बीच  बन्द  कर दी गयी थी। पति के कार्यों में हस्तक्षेप करना उनके लिए वर्जित था। मृत्यु  पर्यन्त नारी के पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े रखना मानो पुरूष प्रधान समाज का मुख्य कार्य था  –

पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने ।

पुत्रश्व स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्य मर्हति ।।

वेद, पुराणों और शास्त्रों में भारतीय नारी और पत्नी का भव्य चित्र खींचा गया है, किन्तु वास्तविकता यह है  कि आज आर्य समाज  में अधिकांश रूप में पत्नी का दासी रूप और पति का स्वामी रूप दिखलाई देता है। गृह साम्राज्ञी  या गृह लक्ष्मी का रूप  बहुत कम है। पति परमेश्वर  है , पत्नी को उसकी पूजा करनी चाहिए और आँख मूँदकर उसकी हर आज्ञा का पालन करना चाहिए। पौराणिक काल में नारी को महज एक उपहार की वस्तु समझा जाता था। उच्च आसन पर आरूढ़ व्यक्ति को खुश करने के लिए उपहार स्वरूप सुन्दरी दी जाती थी। महानगरों, नगरों में रहने वाली तथा सुशिक्षित स्त्रियों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है।वह किसी को मोहताजहोकर जीना नहीं चाहती, अपने पाँव पर खड़ी होना चाहती है।यहाँ भी विविध वर्गों की स्त्रियों की विभिन्नमजबूरियाँ और शोषण है।

अफसोस की बात यह है कि कस्बों और देहातों में तो आज भी 80% महिलाएँ बदतर जिंदगी

जीने के लिए बाध्य हैं। पुरुष प्रधान समाज रचना में सारे बंधन, सारी मर्यादाएँ उसी के लिए बनी है|रामकथा और कृष्ण कथा की शोषित नारियों में जहाँ राजपरिवार की स्त्रियाँ इतनी पीड़ित है

तो सामन्य जन की बात की क्या?

क्योंकि यथा राजा तथा प्रजा वाली व्यक्ति हर युग में लागू होती है।सामाजिक वर्जनाओं और रूढ़ियों के कारण आज भी 90% स्त्रियों को अपना  जीवन साथी चुनने

का अधिकार समाज ने नहीं दिया है।

पुरूष एवं स्त्री का हर स्थिति में कंधे से कंधा मिलाकर चलना ही देश के भविष्य की रचना करता है अर्थात देश को विकास के पथ पर अग्रसर करता है तथा यह हमें सोचना चाहिए कि हमारे देश से इन असामाजिक तत्वों को कैसे हटाया जाए। हमारे देश का उध्दार कैसे हो। इन अत्याचारों से, पक्षपात से औरतों – लड़कियों को कैसे दूर रखा जाए। हम यह कर सकते हैं; क्योंकि हम पर देश का भविष्य टिका हुआ है। उपन्यासकार ने समाज की सही स्थिति को दर्शाया है । स्त्रियाँ समस्त परिवार के लिए रात-दिन खटती रहती है। पुरुषों से ज्यादा मेहनत करती है परंतु अपने श्रम के बदले आर्थिक मूल्य नहीं भोगती। समाज में नारी स्वतंत्रता की स्थिति आज भी विषमताओं से घिरा हुआ है।उनके लिए जीवन साथी उनके अभिभावक ही खोजते हैं।यदि कोई स्त्री पहल करे तो भी परिवार और समाज खुलकर उसका विरोध करते हैं। उसके लिए एक ही मार्ग बाकी रह जाता है या तो वह अनचाहे व्यक्ति से विवाह करले अथवा आत्मदाह कर ले। पुरुष प्रधान समाज में यह समस्या विकराल होते दिख रही है।

प्राचीनकाल से आज तकसमस्या का स्थाई समाधान नहीं हो सका बल्कि इस समस्या ने अपने

रुप ही बदल लिये हैं।

“उस नराधम का वहीं वध कर देना मध्यम पाण्डव। वह जीवित रहने योग्य नहीं है। वह जीवित रहा तो जाने कितनी असहाय नारियों का अपमान और अपहरण करेगा। सारी स्त्रियों के पति इतने वीर और समर्थ नहीं होते कि अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा कर सकें। उस नराधम का वध कर देना|”

सदियों से नारी पुरूष की तुलना में स्वयं को हीन और कमतर मानती रही है और अपनी रक्षा का भार पुरुषों को सौंपती रही है लेकिन आज शिक्षा व आत्मनिर्भरता के प्रभावस्वरूप वह अपने हीन ग्रंथि से मुक्त होने लगी है। आज उसे अपने गुलामी का एहसास होने लगा है। पात्रों के माध्यम से उपन्यासकार ने नारी समस्या तथा जड़ हुए मानसिकता को दर्शाया है सीता एक आर्दश स्त्री है  तथा पंच कन्याओं में से एक हैं । सीता स्वयं को अहिल्या के समान पीड़ित मानती  हैं। वह चाहती हैं कि राम आयें और उसको स्वीकार कर अज्ञात कुलशीला का कलंक धोयें। सीता जानती है कि राम से विवाह हो जाना , जीवन को एक नयी दिशा मिलना है , अन्याय के विरूद्ध चिरसंघर्षरत एक साथी मिलना उसका जन्म सार्थक होना है। अहिल्या की जड़ता किसी शाप का परिणाम न होकर समाज की जड़ता का प्रतीक होने के साथ ही वह स्थिति है जिसमें इन्द्र के द्वारा छली जाकर वह अपने त्यागमय जीवन में संपूर्ण मानव समाज से वर्षों तक एकांत में रहकर जड़वत जीवन यापन करने के लिए विवश हो जाती है। समाज भी अहिल्या की उपेक्षा करता है। राम आते हैं और अहिल्या को समाज प्रतिष्ठा दिलाते हैं। गांधारी के आँखों पर पट्टी बाँध लेने का दो मत सामने उजागर होता है – एक है – गांधारी का अपनी आँखों पर पट्टी बाँधना उसके पातिव्रत्य का एक अंग मानना और दूसरा नारी विद्रोह तथा प्रतिवाद के रूप में। गांधारी में नारी – सुलभ भावना भी है ।

मनु ने भी अपने सामाजिक ग्रन्थ ‘मनु स्मृति’ में लिखा है-

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफलाः क्रियाः ।’’

कोहली जी ने अपने उपन्यासों में चित्रित विभिन्न नारी पात्रों के माध्यम से भी समाज की विषमता तथा नारी के प्रति लोगों की मानसिकता को चित्रित करने की सफल प्रयास की है तथा उनके प्रयास बहुत हद तक प्रसांगिकता के कसौटी पर खरे भी उतरते है। राजमाता सत्यवती, कुंती, गांधारी, अंबा, अंबिका, अंबालिका, द्रौपदी, माद्री, उत्तरा हिडिंबा, कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी, सीता, मंदोदरी, उलूपी, चित्रांगदा, सुभद्रा, शूर्पनखा आदि की अलग – अलग व्यथाएँ हैं जिनपर साकेत जैसे न जाने कितने ग्रंथ बन सकते हैं। ऋषि गौतम की पत्नी बिना वजह सामाजिक शोषण का शिकार होकर पत्थर हो गयी। कोहली जी हमेशा ही नारीमुक्ति के पक्षधर रहे हैं। जीवन – निर्वाह के लिए शिक्षा  की जरूरत है। सत्युग से आज तक स्त्री जाति पर कड़े सामाजिक बन्धन लगे हुए हैं। अगर वह उसे तोड़ने का प्रयत्न भी करती है तो समाज आसमान पाताल एक कर उसका जीना दूभर कर देता है। किन्तु राम के युग में स्त्री समाज की ठोस मान्यताओं को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थी। जबकि महाभारतकालीन समय में स्त्री की स्थिति कुछ विभिन्न थी। नारी को शिक्षा से वंचित रखना यानी पूरे परिवार को अंधकार में रखना है। शिक्षा के अभाव में नारी अज्ञानी और अंधविश्वासी हो जाती है और स्वयं ही अपने लिए प्रगति के मार्ग बंद कर देती है। शिक्षा को मनुष्य की तीसरी आँख कहा जाता है । इसी कारण कोहली जी नारी शिक्षा के महत्व को स्वीकार करते हैं। नारी शिक्षा की जरूरत सिर्फ नारी वर्ग के लिए ही नहीं , बल्कि देश के विकास के लिए भी आवश्यक है। उनकी सोंच में मूलभूत परिवर्तन लाने, आर्थिक गतिविधियों में उनकी अभिरूचि उत्पन्न कर उन्हे आर्थिक – स्वालम्बन की ओर अग्रसारित करने जैसे अहम उद्धेश्यों की पूर्ति हेतु पिछले कुछ दशकों में विशेष प्रयास किया गए हैं।

उपनिषदों में भी कहा गया है – ’’सृष्टि की सम्पूर्ण रिक्तता की पूर्ति स्त्री से मानी गयी है।’’

कोहली जी ने नारी सशक्तिकरण पर जोर देते हुए समाज को अपने अद्भुत लेखनी के माध्यम से आइना दिखाने की चेष्टा की है ताकि लोगों का नजरियां बदल सकें और स्त्री को भी समाज में वहीं सम्मान , सत्कार और अधिकार मिलें जिनकी वह हक़दार है । स्त्रियों को उनके अधिकार दिलाने हेतु देश में विभिन्न संस्थाएं भी क्रियशील है जो उनकी आवाज को एक दिशा देती तथा समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करती की स्त्रियां भी किसी से कम नही वे जो चाहे वह कर सकती है तथा परिवार के विकास के साथ समाज का विकास एवं समाज के विकास के साथ देश के विकास में भी सक्षम है , जिस प्रकार किसी विद्वान को अपने ज्ञान का विकास करने से नहीं रोक सकते, वैसे ही नारी को अपने अधिकार प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता और वह समय भी आयेगा जब नारी समाज में पूर्ण रूप से सारें अधिकार मिलेंगे ।

विषमताओं, अत्याचारों और शोषण के खिलाफ आवाज उठानी होगी ।

जड़ हुयी मानसिकता को चेतन अवस्था में लानी होगी

स्त्रियों को उनकी खोयी हुई सम्मान लौटानी होगी

तभी मिलेगा स्त्रियों को उनका अधिकार

तभी बढ़ेगा समाज में स्त्रियों के प्रति सत्कार ।।

जय हिंद , जय नारीशक्ति ।

Amit Kumar Dikshit | West Bengal

अमित कुमार दीक्षित

कोलकाता, पश्चिम बंगाल

सूचना – उपरोक्त विचार लेखक के अपने हैं| इस लेख को लिटरेचर इन इंडिया समूह किसी प्रकार से सहमति अथवा असहमति प्रदान नहीं करता है|

 

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