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क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

आज नहीं क्या हो सकता जो कल होता,
सच्चा प्रयत्न  नहीं   कभी   विफल होता,
क्या एकता में ही केवल बल होता?
क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

बौने बामन ने अकेले राजा बलि को बांधा था,
तीन पग में नभ, महि और स्वर्ग तक को लांघा था।

एक अकेले विप्र ने क्षत्रिय हीन जग था किया,

हाथ में परशु को थामे जब विप्र था क्रोधित हुआ।

रावण के महाबली राक्षस लज्जित मुख छिपाये थे,
लंकेश के दरबार में जब अंगद पांव गड़ाये थे।

शक्ति लगी जब लक्ष्मण जी को तुरत मुर्छा खाये थे,

पवन वेग से पवनसुत तब अकेले संजीवन लाये थे।

ज्यों प्रभाकर उदित होते रात्रि को परास्त कर,

त्यों अभिमन्यु था घुसा चक्र व्यूह को ध्वस्त  कर।

एक अकेला सूर्य हर लेता निशा का अंधकार,

संपूर्ण वन में  होता हमेशा  सिंह ही का अधिकार।

होते जीवन में मनुज के संघर्ष अनंत,
संघर्ष ही तो वीरों का होता वसंत।

कभी नहीं वो विकल होते सामर्थ्य जिनमें प्रबल होता,
धैर्य नहीं खोते वो वीर भुजाओं में जिनके बल होता।
क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?
क्या एकता मे ही केवल बल होता?

करना है अब विश्व विजय

सूर्य कब तक छिपा रहेगा, बादलों की ओट में…
देख चुके है शक्ति कितनी विपत्तियों की चोट में।
देख कर मेरी प्रभा को चकित सब रह जायेंगे..
निज घरों में तम मिटाने, दीप्ति मुझसे पायेंगे।

कौड़ियों को कौन पूछे अब कनक खनकायेंगे,
मां के चरणों में मही क्या व्योम तक झुकायेंगे।
दान को विचर रहे जो दानवीर कहलायेंगे,
तीनों लोकों का ऐश्वर्य गेह में सजायेंगे।

पृथक हुआ माणिक जो पत्थरों के बीच से,
बज्र बनकर छूटेगा जैसे हड्डियाँ दधीचि से।
‘वाह’ की गुंजन चहु दिशाओं में छा जायेगी,
नाम मेरा इतिहास में अमृत फिर पा जायेगी।

संकटों की सेना को कुछ यूँ धूल चटाना है,
शौर्य की किरणों से अब इस रात्रि को मीटाना है।
ठोकरों से पथ के अपने जग को मैने जाना है,
प्राप्त कर  विश्राम होगा जो संकल्प मैने ठाना है।

भानु में न अग्नि हो न जल हो श्याम घन में,
सौंदर्य की न लालसा अब माधुर्य न हो जीवन में,
हो केवल निश्चय दृढ़, हो केवल लक्ष्य विजय,
संपूर्ण धरा का स्वामी बनकर करना है अब विश्व विजय।।

राजन कुमार झा |
Rajan Kumar Jha

राजन कुमार झा

ज़ी मीडिया में पत्रकार हैं। कविताओं और गज़लों में रुचि है।

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