गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज

गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज [हमारी शिक्षा और व्यवस्था, आलेख – 20]
गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज [हमारी शिक्षा और व्यवस्था, आलेख – 20]

हमें तो वास्कोडिगामा ने खोजा है, भारतीय उससे पहले थे ही कहाँ? पढाई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों का सरलीकरण करें तो महान खोजी-यात्री वास्कोडिगामा ने आबरा-कडाबरा कह कर जदू की छडी घुमाई और जिस देश का आविष्कार हुआ उसे हम आज भारत के नाम से जानते हैं? माना कि देश इसी तरह खोजे जाते हैं लेकिन अपनी ही डायरी में वास्कोडिगामा किस स्कंदश नाम के भारतीय व्यापारी का जिक्र करता है? वास्कोडिगामा स्वयं लिखता है कि उसके पास उपलब्ध से तीन गुना अधिक बडे जहाज में मसाले तथा चीड़ -सागवान की लकडियाँ ले कर अफ्रीका के जंजीबार के निकट पहुँचे इस भारतीय व्यापारी से दुभाषिये की मदद से संवाद स्थापित कर उसने उससे भारत आने की इच्छा प्रकट की। स्कंदश के जहाज के पीछे पीछे ही वह भारत पहुँचा। हे एनसीईआर्टी, हे सीबीएसई, हे यूजीसी वगैरह वगैरह, कृपया शंका समाधान करें कि हम अपना अस्तित्व कब से मानें, वास्कोडिगामा की खोज से पहले अथवा पश्चात से? अपनी ही पुरानी पुस्तकों को हम कितना जानते हैं? “जहाज के निर्माण में लोहे का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये चूंकि इससे समुद्री यात्राओं में कतिपय चट्टानों की चुम्बकीय शक्ति के प्रभाव मे आने की सम्भावना है” यह उल्लेख राजाभोज के ग्रंथ युक्ति कल्पतरु में प्राप्त होता है। इतना ही नहीं यह ग्रंथ जहाजों की संरचना व उसके निर्माण की जानकारी प्राप्त करने के दृष्टिगत उल्लेखनीय है। छोटी यात्राओं के लिये जहाज के प्रकार, लम्बी यात्राओं के लिये जहाज के गुण-अवगुण से आरंभ कर अलग अलग कार्यों के लिये प्रयोग में लाये जाने वाले अलग अलग जहाजों का वर्णन इस ग्रंथ में प्राप्त होता है। यह जानकर पहली प्रतिक्रिया हमारी क्या होनी चाहिये? हमें कुछ साईंटिस्ट टाईप लोगों को इकट्ठा करना चाहिये और एक पेपर लिखवाना चाहिये कि जैसे वैमानिक शास्त्र को हम खारिज करते हैं वैसे ही यह युक्ति कल्पतरु क्या बला है?

आप प्रश्न कीजिये कौन थे राजा भोज और तत्काल उत्तर मिलेगा वही गंगू तेली वाले? कहावत के भीतर सिमटे राजा भोज का हमने जनश्रुतियों और कहानियों में ऐसा घालमेल कर दिया है कि इतिहास ने उनकी ओर से पीठ कर ली है। कम ही लोग जानने में रुचि रखते हैं कि परमारवंशीय राजा भोज (999 – 1055 ई.) वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य के पश्चिमी हिस्से में अवस्थित मालवा क्षेत्र के शासक थे जिनकी राजधानी धारानगरी (वर्तमान धार) हुआ करती थी। चेदि के राजा गांगेयदेव तथा कर्णाटक के चालुक्य राजा तैलप द्धितीय से अनेक संघर्षोंयुद्धों, उनसे राजा भोज की विजय के पश्चात गांगेयदेव का संक्षेपीकरण गंगू तथा तैलय से तेली जोड कर, दो नितांत असमान व्यक्तियों की तुलना के लिये कहावत चलन में आयी – “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली”। आज ध्यान से विवेचित करता हूँ तो लगता है भोज अब मिथक बन गये हैं और हमारा युग गंगू बनता जा रहा है। एक शासक जिसने भारतीय ज्ञान भंडार में अपने अनेक ग्रंथों के माध्यम से अभिवृद्धि की उनमें से कुछ प्रमुख हैं – वाग्देवीस्त्रोत, अवनिकूर्मशतम, चम्पूरामायण, सुभाषित प्रबंध, शृंगारमंजरी कथा, सरस्वतीकण्ठाभरण (व्याकरण), शृंगारप्रकाश, नाममालिका, तत्वप्रकाश, शालिहोत्र, प्रश्नचूडामणि, राजमृगांक, राजमार्तण्डयोगसूत्रवृत्ति, राजमार्तण्ड (ज्योतिष), समरांगणसूत्रधार, युक्तिकल्पतरु आदि।

मैं अपनी बात रखने से पूर्व बधाई देना चाहूंगा प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू जी को जिन्होंने दस वर्षों के अथक परिश्रम के पश्चात लगभग आठहजार श्लोकों वाले राजाभोज कृत समरांगणसूत्रधार को अनूदित व विश्लेषित किया है। मैं स्वयं जलविद्युत क्षेत्र में कार्यरत हूँ अत: इस ग्रंथ के एक उद्धरण ने मेरा ध्यान खींचा। इकत्तीसवें अध्याय में उल्लेख मिलता है – “धारा च जलभारश्च पयसो भ्रमणं तथा, यथोच्छ्रायो यथाधिक्यं यथा नीरंध्रतापि च। एवमादीनि भूजस्य जलजानि प्रचक्षते” अर्थात बहती हुई जलधारा का भार तथा वेग का शक्ति उत्पादन हेतु विशेष यंत्र में उपयोग किया जाता है। जलधारा यंत्र को घुमाती है। यदि जलधारा अधिक ऊंचाई से गिरे तो उसका बहुत प्रभाव होता है एवं यंत्र उसके भार व वेग के अनुपात में धूमता है। इससे शक्ति उत्पन्न होती है। यही ग्रंथ आगे बताता है कि जल का किस तरह संग्रहण किया जा सकता है एवं उसे विविध उपयोग में लिया जा सकता है। हाईड्रो इंजीनियर्स क्या मुझे बता सकते हैं कि जो कुछ यह श्लोक कह रहा है क्या गलत है? अगर नहीं, तो मेरा अगला प्रश्न यह नहीं कि आप समरांगण सूत्रधार से क्यों परिचित नहीं अपितु जानना चाहता हूँ कि आप उन सारे विदेशियों को जानते हैं जिन्होंने बांध कैसे बनाये का प्रारूप सामने रखा लेकिन आप राजाभोज को क्यों नहीं जानते?

मैकेनिकल इंजीनियरिंग के विद्यार्थी कृयपा अपनी पाठ्यपुस्तक खोल लें और सबसे बुनियादी पाठ व्हाट इस मशीन/यंत्र ही निकाल लें। अब आप समरांगण सूत्रधार के उल्लेखों से मिलान करें – यंत्र वे होते हैं जिनके विभिन्न पुर्जों में परस्पर सह-सम्बंध होते हैं जिससे उनके संचालन में सहजता होती है। यंत्र वे होते हैं जिनके संचालन उपरांत हमें विशेष ध्यान न रखना पडे, कम ऊर्जा का प्रयोग हो, न्यूनतम ध्वनि उत्पन्न करे आदि। यंत्र इस तरह तैयार किये जाने चाहिये कि उसके कल-पुर्जे ढीले न हों, गति कम-ज्यादा न हो तथा वह लम्बे समय तक कार्य करने योग्य हो। कुछ यंत्र एक ही क्रिया बार-बार करते रहते है तथा विशिष्ट कालांतर मे काम करते हैं। कुछ यंत्र विशेष ध्वनि उत्पन्न करने के लिये होते हैं तो कुछ को वस्तुओं का आकार बड़ा या छोटा करने के लिये उपयोग में लाया जाता है। इसी तारतम्य में ग्रंथ का यह श्लोक देखें कि – “तिर्यगूर्ध्वंमध: पृष्ठे पुरत: पार्श्वयोरपि। गमनं सरणं पात इति भेदा: क्रियोद्भवा” अर्थात किसी मशीन की किसी कार्य की उपादेयता के अनुरूप विभिन्न प्रकार की गतियाँ होती हैं जैसे तिर्यग्‌ (slanting), ऊर्ध्व (upwards), अध: (downwards), पृष्ठे (backwards), पुरत: (forward) एवं पार्श्वयो (sideways). वस्तुत: आप ग्रंथ पढते जायेंगे और आधुनिक अभियंत्रिकी के सूत्रों और परिभाषाओं से निरंतर परिचित होते रहेंगे। वही प्रश्न पुन: कि उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों का समुचित प्रयोग क्यों नहीं होता?

रोबोट हमें रहस्यमय लगता है। यह तकनीक हमें अपनी ओर खींचती है। श्री कृष्ण जुगनू जी के एक आलेख का, जिसमें वे समरांगण सूत्रधार के उद्धरणों को सामने रखते हैं, संक्षेपीकरण कर रहा हूँ। समरांगण सूत्रधार ग्रन्थ में स्त्री पुरुष प्रतिमा यंत्र का उल्लेख मिलता है जिसकी तुलना आप रोबोट से कर सकते हैं। राजा भोज ने अपने समय के किन्हीं विश्वकर्मा मुनि के ग्रंथ का उल्लेख किया है यद्यपि तकनीक बहुत स्पष्टता से सामने नहीं रखी गयी है। कुछ उदाहरण देखें कि “अथ दासादि परिजनवर्गेर्विना तत्कृत्याना सर्वेशा यथावन्निर्वहणाय कल्पितस्य स्त्रीपुरुषप्रतिमायन्त्र घटना” अर्थात घर पर सेवक और परिजन न हो तो कार्य सम्पादन हेतु स्त्री पुरुष प्रतिमा यंत्र का उपयोग हो सकता है। ग्रंथ में आगे उल्लेख है कि स्त्रीपुरुषप्रतिमायन्त्र के अंग संयोजन में प्रयुक्त कीलों को अत्यधिक चिकनाई वाला बनाये और सविधि लगाये, यह रचना काष्ठमय होगी किन्तु उस पर चमडा मढ़ कर नर नारी मय रूप दिया जायेगा। यह रूप अतीव रमणीय करना चाहिए। इस काया निर्माण के बाद उसके उसके रन्धो में जाने वाली शलाकाओ को सूत्रत: संयोजित किया जाना चाहिए। उल्लेख मिलता है कि – “ग्रीवाचलनप्रसरणविकुज्चनादीनि विदधाति |
करग्रहणाताम्बुलप्रदानजलसेचनप्रणामादि” अर्थात ऐसे विधान पूर्वक बनाया गया यंत्र मानव ग्रीवा को चलाता है ,हाथो को फैलता समेटता है अर्थात ऐसे विचित्र कौतुहल करता है यही नही वो ताम्बुल की मनुहार करता देता है, जल की सिचाई करता है और नमस्कार भी करता है। श्री जुगनू अपने आलेख में उद्धरित करते हैं कि इस तरह के स्त्रीपुरुषप्रतिमायन्त्र अथवा रोबोट का उलेख महाभारत और कालिदास रचित रघुवंश की मल्लिनाथ की टीका में भी है।

आपके तर्कों को मान लिया जाये कि यंत्रिकी और जलविद्युत को ले कर जो कुछ राजाभोज ने लिखा वह सपना अथवा कपोल कल्पना है, हमारा विमान शास्त्र कल्पना है, स्त्रीपुरुषप्रतिमायन्त्र कल्पना है तब भी क्या ये अतीव उत्कृष्ट संकल्पनायें नहीं हैं? हमारे पास ऐसी उन्नत संकल्पनायें धूल फांकती हैं और हम जापान की ओर प्यासी निगाह से तकते हैं कि हमसे डॉलर ले लो हमको रोबोट दे दो? राजाभोज ने सरस्वतीकण्ठाभरण नाम से काव्यशास्त्र लिखा, इसी नाम से व्याकरण ग्रंथ की रचना की इतना ही नहीं अध्ययन-अध्यापन के लिये राज्य में कई सरस्वतीकण्ठाभरण शालायें बनवायीं। राजा भोज की राजधानी धार में ऐसी ही एक शाला अथवा शिक्षा संसथान है जिसे भोजशाला के नाम से जाना तो जाता है लेकिन यहाँ की कहानी अधिक दु:खद हो जाती है। धार की भोजशाला में बहुत अधिक संख्या में शिलांकित साहित्य देखा जा सकता है जिसे आप शिलांकित पुस्तकालय की संज्ञा भी दे सकते हैं। जैसे बख्तियार खिलजी ने नालंदा को नष्ट किया आप उसकी तुलना धार की भोजशाला से भी कर सकते हैं। वर्ष 1401 में अलाउद्दीन खिलजी तथा दिलावर खां गौरी की सेनाओं से माहलकदेव और गोगादेव ने युद्ध लड़ तथा विजित हो कर मालवा में सल्तनत की स्थापना की। तलवार लहराने वालों के लिये शिक्षा संस्थान किस काम के थे अत: इसी स्थान पर खिलजी ने मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवाया। राजा भोज की भोजशाला को भूल जाईये लेकिन उनके ग्रंथों के भीतर विद्यार्थी उतर सकें इसकी तो समुचित व्यवस्था होनी चाहिये? वैज्ञानिक युग है, मत कीजिये आँख बंद कर विश्वास, परंतु जो कभी जान गया और दस्तावेजीकृत भी किया गया उसपर समझ विकसित करने में परेशानी क्यों है? [अगली कड़ी में जारी……..]

गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज | Rajeev Ranjan Prasad
राजीव रंजन प्रसाद

सम्पादक – साहित्य शिल्पी ई-पत्रिका (www.sahityashilpi.com)

[हमारी शिक्षा और व्यवस्था, आलेख – 20] 

 

गर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: 

editor_team@literatureinindia.com

समाचार: 

news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: 

adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

Advertisements

3 विचार “गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज&rdquo पर;

  1. हमारी व्यवस्था ऐसी है कि हम अपने ही इतिहास से अनजान हैं। हम प्रत्येक विदेशी चीज की प्रशंसा करते हैं लेकिन अपने यहाँ के इतिहास की खोजबीन नहीं करते हैं। अगर कोई विदेशी आकर इन सब की खोज करने लगे तो हमें

    Liked by 1 व्यक्ति

    1. बहुत खुशी होती है लेकिन अपने लोगों को इतना महत्व नहीं देते हैं।

      Liked by 1 व्यक्ति

    2. बिलकुल सही बात कही आपने रूपेंद्र जी|

      Liked by 1 व्यक्ति

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this:
search previous next tag category expand menu location phone mail time cart zoom edit close