मीमांसा दर्शन का स्वरूप

मीमांसा दर्शन सोलह अध्यायों का है, जिसमें बारह अध्याय क्रमबद्ध हैं। शास्त्रसंगति, अध्यायसंगति, पादसंगति और अधिकारसंगतियों से सुसंबद्ध है।

इन बारह अध्यायों में जो छूट गया है, उसका निरूपण शेष चार अध्यायों में किया गया है जो ‘संकर्षकांड’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसमें देवता के अधिकार का विवेचन किया गया है। अत: उसे ‘देवता कांड’ भी कहते हैं अथवा द्वादश अध्यायों का परिशिष्ट भी कह सकते हैं।

भास्कर राय दीक्षित ने संकर्षण कांड की व्याख्या के अंत में लिखा है कि षोडषाध्यायी मीमांसा के रहते हुए भी पठनपाठन मध्य काल में द्वादशाध्याय का ही होता था।

जिस तरह चतुष्पदा गायत्री के रहने पर भी विद्वान् वर्ग त्रिपदा गायत्री को ही जपते हैं, उसी तरह वर्तमान काल में द्वादशाध्यायी मीमांसा का ही अध्ययन अध्यापन प्रचलित है।

कुछ विद्वानों के अनुसार मीमांसा के बिना वाक्यार्थ का निर्णय करना कठिन है, क्योंकि अमुक वाक्य उपस्थित अर्थ में प्रमाण है अथवा अन्य अर्थ में, इस विचार के निर्णय में जो निष्कर्ष आता है उसे मीमांसा कहा गया है, किंतु यहाँ मीमांसा शब्द का अर्थ दर्शन से है।

धर्मज्ञान के लिए परस्पर विरोध रहित वेदमंत्रों के अर्थों के विचार का नाम मीमांसा है। और विचारपूर्वक प्राप्त धर्मज्ञान मीमांसा का फल है। यही बात जैमिनि ने अपने मीमांसा दर्शन में कही है – अथातो धर्म जिज्ञासा। 1.1.1। कुमारिल भट्ट ने इसे इस प्रकार वर्णन किया है –

धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्।

आगे वाक्यार्थ निर्णयोपयोगी सहस्रों न्यायों का वर्णन किया गया है। यहाँ तक छह अध्यायों का संक्षिप्त विषयनिर्देश किया गया।

इस दर्शन में प्राप्ताप्राप्त विवेक न्याय से, अथवा अदग्ध दहन न्याय से उद्देश्य विधेय भाव का विचार कर वेद-वाक्यार्थ-निर्णय से कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान होता है। इसलिए धर्मज्ञान ही मीमांसा दर्शन का प्रयोजन है। इस दर्शन में धर्मविचार से उपक्रम (प्रारंभ) है। व्याकरण के लिए “पदशास्त्र”, वैशेषिक न्याय के लिए “प्रमाणशास्त्र” और मीमांसा के लिए “वाक्यशास्त्र” का प्रयोग संस्कृत साहित्य में होता है। इस शास्त्र में ही धर्मविचार की चर्चा हैं। भारतीय जनता का मुख्य उद्देश्य धर्मानुष्ठान है। अनुष्ठान फल के बिना नहीं हो सकता और फलसाधनता भी साधन सामग्री के बिना नहीं हो सकती। अत: संक्षेप में साधन का भी विवेचन किया जाता है।

अनुष्ठान के पूर्व धर्म का लक्षण, प्रमाण और साधन फल जानना आवश्यक है। इस शास्त्र में साधन, अंग और शेष, ये तीनों पर्यायवाचक शब्द हैं। ऐसे ही साध्य, शेषी और अंगी ये तीनों पर्यायवाची हैं। उदाहरण के लिए स्वर्गप्राप्ति के निमित्त दर्श पूर्णमास का अनुष्ठान यदि करना हो तो उसमें दर्श और पूर्णमास अंगी होंगे और प्रयाज आदि अंग होंगे। दर्श याग अमावस्या तिथि को और पूर्णमास याग पूर्णिमा तिथि को होता है।) इसमें अंगी प्रधान अंग का प्रयोजक है और अंग प्रयोज्य है। इस प्रकार धर्मप्राप्ति के साधनों को जानकर अनुष्ठान के लिए पौर्वापर्य का भी ज्ञान अपेक्षित है एवं फल के लिए अनुष्ठेय अग्नि होत्रादि कर्मों के प्रकरण में पूर्वांग और उत्तरांग साधनों का भी विवेचन है, जिनके लिए “प्रकृति” शब्द का प्रयोग होता है। किंतु सौर्यादि कर्मके सन्निधि में अंग का पाठ नहीं है। उस स्थल पर आकांक्षा के उदय होने पर दर्श पूर्णमास में प्रतिपादित अंगों को लेना होता है जिसे अतिदेश कहते हैं। (यहाँ तक उत्तर षट्क का संक्षिप्त विषयनिर्देश हुआ)।

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