हिंदी के प्रख्यात आलोचक, लेखक और विद्वान डॉ नामवर सिंह के बारे में जितना भी कहा जाए कम है. वह हिंदी आलोचना के शलाका पुरुष थे. साल 2017 में जब साहित्य अकादमी ने अपनी सर्वाधिक प्रतिष्ठित महत्तर सदस्यता यानी फैलोशिप प्रदान की थी, तो उनकी तारीफ में ढेरों बातें कही गई थीं. अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा था, ‘नामवर सिंह की आलोचना जीवंत आलोचना है. भले ही लोग या तो उनसे सहमत हुए अथवा असहमत, लेकिन उनकी कभी उपेक्षा नहीं हुई.’

आलोचक निर्मला जैन का कहना था कि नामवर सिंह के जीवन में जो समय संघर्ष का समय था वह हिंदी साहित्य के लिए सबसे मूल्यवान समय रहा, क्योंकि इसी समय में नामवर सिंह ने गहन अध्ययन किया. आज जब नामवर सिंह नहीं हैं, तो उनके बारे में कही गई एक–एक बात याद आती है. पर यहां हम नामवर के बारे में कही गई बातों से इतर जानेंगे नामवर सिंह, अकादमिक तौर पर नामवर कैसे बने.

नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई, 1926 को बनारस जिले की चंदौली तहसील, जो अब जिला बन गया है, के जीयनपुर गांव में हुआ था. नामवर सिंह ने  प्राथमिक शिक्षा बगल के गांव आवाजापुर में हासिल की. बगल के कस्बे कमालपुर से मिडिल पास किया.  बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल से मैट्रिक किया और उदयप्रताप कालेज से इंटरमीडिएट. 1941 में कविता से लेखकीय जीवन की शुरुआत की.

नामवर सिंह की पहली कविता बनारस की ‘क्षत्रियमित्र’ पत्रिका में छपी. नामवर सिंह ने वर्ष 1949 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से बी.ए. और 1951 में वहीं से हिंदी में एम.ए. किया. वर्ष 1953 में वह बीएचयू में ही टेंपरेरी लेक्चरर बन गए. 1956 में उन्होंने ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ विषय पर पीएचडी की और 1959 में चकिया-चंदौली से लोकसभा का चुनाव लड़ा वह भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर.

वह यह चुनाव हार गए और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से कार्यमुक्त कर दिए गए. वर्ष 1959-60 में वह सागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सहायक अध्यापक हो गए. 1960 से 1965 तक बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन किया. फिर 1965 में ‘जनयुग’ साप्ताहिक के संपादक के रूप में दिल्ली आ गए. इसी दौरान दो वर्षों तक राजकमल प्रकाशन के साहित्यिक सलाहकार भी रहे. 1967 से ‘आलोचना’ त्रैमासिक का संपादन शुरू किया. 1970 में राजस्थान में जोधपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए और हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने.

1971 में ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. 1974 में थोड़े समय के लिए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ  आगरा के निदेशक बने. उसी साल दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए और 1992  तक वहीं बने रहे. वर्ष 1993 से 1996 तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष रहे.

दो बार महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति रहे. आलोचना त्रैमासिक के प्रधान संपादक के रूप में उनकी सेवाएं लंबे समय तक याद रखी जाएंगी. जैसाकि कवि लीलाधर मंडलोई ने कभी कहा था कि नामवर सिंह आधुनिकता में पारंपरिक हैं और पारंपरिकता में आधुनिक. उन्होंने पत्रकारिता, अनुवाद और लोकशिक्षण का महत्त्वपूर्ण कार्य किया, जिसका मूल्यांकन होना अभी शेष है.

साहित्य आजतक के पाठकों के लिए नामवर सिंह का लेखकीय आलोचक जीवन, एक नजर में:

प्रकाशित कृतियां

बक़लम ख़ुद – 1951 ई (व्यक्तिव्यंजक निबंधों का यह संग्रह लम्बे समय तक अनुपलब्ध रहने के बाद 2013 में भारत यायावर के संपादन में फिर आया. इसमें उनकी प्रारम्भिक रचनाएं, उपलब्ध कविताएं तथा विविध विधाओं की गद्य रचनाएं एक साथ संकलित होकर पुनः सुलभ हो गई हैं.

शोध-

    हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग – 1952, पुनर्लिखित 1954

    पृथ्वीराज रासो की भाषा – 1956, संशोधित संस्करण ‘पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य’ नाम से उपलब्ध

आलोचना-

    आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां – 1954

    छायावाद – 1955

    इतिहास और आलोचना – 1957

    कहानी : नयी कहानी – 1964

    कविता के नये प्रतिमान – 1968

    दूसरी परम्परा की खोज – 1982

    वाद विवाद और संवाद – 1989

साक्षात्कार-

    कहना न होगा – 1994

    बात बात में बात – 2006

पत्र-संग्रह-

    काशी के नाम – 2006

व्याख्यान-

    आलोचक के मुख से – 2005

नई संपादित आठ पुस्तकें-

आशीष त्रिपाठी के संपादन में आठ पुस्तकों में क्रमशः दो लिखित की हैं, दो लिखित + वाचिक की, दो वाचिक की तथा दो साक्षात्कार एवं संवाद की :-

    कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता – 2010

    हिन्दी का गद्यपर्व – 2010

    प्रेमचन्द और भारतीय समाज – 2010

    ज़माने से दो दो हाथ – 2010

    साहित्य की पहचान – 2012

    आलोचना और विचारधारा – 2012

    सम्मुख – 2012

    साथ साथ – 2012

इनके अतिरिक्त नामवर जी के जे.एन.यू के क्लास नोट्स भी उनके तीन छात्रों — शैलेश कुमार, मधुप कुमार एवं नीलम सिंह के संपादन में नामवर के नोट्स नाम से प्रकाशित हुए हैं.

नामवर जी का अब तक का सम्पूर्ण लेखन तथा उपलब्ध व्याख्यान भी इन पुस्तकों में शामिल है. बाद में आयीं दो पुस्तकें ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जययात्रा’ तथा ‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ वस्तुतः पूर्व प्रकाशित सामग्रियों का ही एकत्र प्रस्तुतिकरण हैं.

संपादन कार्य

अध्यापन एवं लेखन के अलावा उन्होंने 1965 से 1967 तक जनयुग (साप्ताहिक) और 1967 से 1990 तक आलोचना (त्रैमासिक) नामक दो हिंदी पत्रिकाओं का संपादन भी किया.

संपादित पुस्तकें

    संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो – 1952 (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के साथ)

    पुरानी राजस्थानी – 1955 (मूल लेखक- डॉ एल. पी. तेस्सितोरी; अनुवादक- नामवर सिंह)

    चिन्तामणि भाग-3 (1983)

    कार्ल मार्क्स : कला और साहित्य चिन्तन (अनुवादक- गोरख पांडेय)

    नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ

    मलयज की डायरी (तीन खण्डों में)

    आधुनिक हिन्दी उपन्यास भाग-2

    रामचन्द्र शुक्ल रचनावली (सह सम्पादक – आशीष त्रिपाठी)

इनके अलावा स्कूली कक्षाओं के लिए कई पुस्तकें तथा कुछ अन्य पुस्तकें भी संपादित

नामवर पर केंद्रित साहित्य

    आलोचक नामवर सिंह (1977) – सं रणधीर सिन्हा

    ‘पहल’ का विशेषांक – अंक-34, मई 1988 ई० – सं -ज्ञानरंजन, कमला प्रसाद, यह विशेषांक पुस्तक रूप में भी प्रकाशित हुआ, लेकिन लंबे समय से अनुपलब्ध है. इसके अलावा पूर्वग्रह (अंक-44-45, 1981ई०) तथा दस्तावेज (अंक-52, जुलाई-सितंबर, 1991) के अंक भी नामवर पर ही केन्द्रित थे.

    नामवर के विमर्श (1995) – सं- सुधीश पचौरी, पहल, पूर्वग्रह, दस्तावेज आदि के नामवर जी पर केन्द्रित विशेषांकों में से कुछ चयनित आलेखों के साथ कुछ और नयी सामग्री जोड़कर तैयार पुस्तक.

    नामवर सिंह : आलोचना की दूसरी परम्परा (2002) – सं- कमला प्रसाद, सुधीर रंजन सिंह, राजेंद्र शर्मा – ‘वसुधा’ का विशेषांक (अंक-54, अप्रैल-जून 2002; पुस्तक रूप में वाणी प्रकाशन से

    आलोचना के रचना पुरुष : नामवर सिंह (2003) – सं- भारत यायावर, पुस्तक रूप में वाणी प्रकाशन से

    नामवर की धरती (2007) – लेखक – श्रीप्रकाश शुक्ल, आधार प्रकाशन, पंचकूला हरियाणा

    जे.एन.यू में नामवर सिंह (2009) – सं- सुमन केसरी

    ‘पाखी’ का विशेषांक (अक्टूबर 2010) – सं- प्रेम भारद्वाज, पुस्तक रूप में नामवर सिंह: एक मूल्यांकन नाम से सामयिक प्रकाशन से

    ‘बहुवचन’ का विशेषांक (अंक-50, जुलाई-सितंबर 2016) – ‘हिन्दी के नामवर’ शीर्षक से, पुस्तक रूप में अनन्य प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली से

सम्मान

    साहित्य अकादमी पुरस्कार – 1971 ‘कविता के नये प्रतिमान’ के लिए

    शलाका सम्मान हिंदी अकादमी, दिल्ली की ओर से

    ‘साहित्य भूषण सम्मान’ उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से

    शब्द साधक शिखर सम्मान – 2010 (‘पाखी’ तथा इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी की ओर से)

    महावीरप्रसाद द्विवेदी सम्मान – 21 दिसंबर 2010

    साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता – 2017

बीबीसी ने हिंदी का प्रकाश स्तम्भ कहा

यह हिंदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है. सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिंह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं वे हमेशा खाली ही रहेंगी.

इनमें से कई लोग नब्बे वर्ष के परिपक्व और कई उपलब्धियां देख चुके जीवन को पार कर चुके थे, लेकिन उनका न होना प्रकाश स्तंभों के बुझने की तरह है.

आधुनिक कविता की व्यावहारिक आलोचना की सबसे अधिक लोकप्रिय किताब ‘कविता के नए प्रतिमान’ लिखने वाले डॉ. नामवर सिंह कई दशकों तक खुद हिंदी साहित्य के प्रतिमान बने रहे. वे हिंदी के उन चंद कृति व्यक्तित्वों में थे जिनके पास न सिर्फ हिंदी, बल्कि भारतीय भाषाओं के साहित्य की एक विहंगम और समग्र दृष्टि थी और इसीलिए दूसरी भाषाओं में हिंदी के जिस व्यक्ति को सबसे पहले याद किया जाता रहा, वे नामवर सिंह ही हैं.

एक तरह से वे हिंदी के ब्रांड एम्बेसेडर थे. प्रगतिशील-प्रतिबद्ध साहित्य का एजेंडा तय करने का काम हो या ‘आलोचना’ के संपादक के तौर पर साहित्यिक वैचारिकता का पक्ष या जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में प्रोफ़ेसरी, सबमें उनका कोई सानी नहीं था.

उनका साहित्य पढ़ाने का तरीका शुष्क और किताबी नहीं, बल्कि इतना सम्प्रेषनीय और प्रभावशाली होता था कि उनके ही नहीं, दूसरी कक्षाओं के छात्र और प्राध्यापक भी उन्हें सुनने आ जाते थे. जेएनएयू के हिंदी विभाग की धाक काफी समय तक बनी रहने का श्रेय नामवरजी को ही जाता है जिन्होंने विभाग की बुनियाद भी रखी थी

गृहमंत्री रजनाथ सिंह के साथ नामवर सिंह

छपना यानी ‘साहित्य में स्वीकृति की मुहर’

एक लम्बे समय तक नामवर सिंह को अध्ययन और अध्यवसाय का पर्याय माना जाता रहा. जेएनयू से पहले उन्हें बहुत से लोगों ने दिल्ली के तिमारपुर इलाके में एक कमरे के घर में देखा होगा जहां दीवार पर लातिन अमेरिकी छापामार क्रांतिकारी चे ग्वारा की काली-सफ़ेद तस्वीर लटकती थी और वे एक तख्त पर किताबों से घिरे हुए किसी एकांत साधक की तरह रहते थे.

कई लोग यह मानते हैं कि उस दौर का गहन अध्ययन जीवन भर उनके काम आता रहा. उनके संपादन में ‘आलोचना’ का बहुत सम्मान था और उसमें किसी की रचना का प्रकाशित होने का अर्थ था: साहित्य में स्वीकृति की मुहर.

उन दिनों जब इन पंक्तियों का लेखक दिल्ली आया तो साहित्य अकादेमी के तत्कालीन उपसचिव और नयी कविता के एक प्रमुख कवि भारत भूषन अग्रवाल ने कहा, “अरे, आप अपनी कवितायें मुझे दीजिये. मैं उन्हें ‘आलोचना’ में छपवाऊंगा!” दिलचस्प यह था कि तब तक इस लेखक की कवितायें ‘आलोचना’ के नए अंक में प्रकाशित हो गयी थीं.

जिस तरह निराला अपना जन्मदिन अपनी प्रिय ऋतु वसंत की पंचमी को मनाते थे वैसे ही नामवर सिंह का जन्मदिन पहली मई को मनाया जाता रहा. यह मजदूर दिवस की तारीख है और संयोग से स्कूल में नामांकन के समय उनके जन्म की यही तारीख लिखवाई गयी थी.

बाद में वे वास्तविक तारीख 26 जुलाई को जन्मदिन मनाने लगे. युवावस्था में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरे और हार गए, जिसके नतीजे में उन्हें विश्वविद्यालय की नौकरी से हटना पड़ा. फिर दिल्ली आकर उन्होंने कुछ समय पार्टी के मुखपत्र ‘जनयुग’ का संपादन किया.

सागर और वहां से इस्तीफ़ा देने को विवश किये जाने के बाद जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग का प्रमुख बनना नामवर सिंह के जीवन का एक अहम मोड़ था.

पाठ्यक्रम में प्रगतिशील साहित्य को शामिल करने आदि कुछ मुद्दों के कारण उन्हें वहां से भी मुक्त होना पड़ा. फिर उन्हें जेएनयू में हिंदी विभाग की बुनियाद रखने का ज़िम्मा मिला और वे वर्षों तक उसके अध्यक्ष रहे. उसके बाद की कहानी उनकी दुनियावी कामयाबी की मिसाल है.

नामवर सिंह

‘कविता के नए प्रतिमान’

‘कविता के नए प्रतिमान’ का प्रकाशन (1968) किसी परिघटना से कम नहीं था जिसने समकालीन हिंदी कविता की आलोचना में एक प्रस्थापना-परिवर्तन किया. उससे पहले तक आधुनिक, छायावादोत्तर कविता को प्रगतिशील नज़रिए से पढ़ने-परखने की व्यवस्थित दृष्टि का अभाव था और अकादमिक क्षेत्र में डॉ. नगेन्द्र की रस-सिद्धांतवादी मान्यताओं का बोलबाला था.

ये मान्यताएं नयी काव्य संवेदना को देख पाने में असमर्थ थीं इसलिए उसे खारिज करती थीं. ‘कविता के नए प्रतिमान’ ने नगेन्द्र की रूमानी आलोचना का ज़बरदस्त खंडन किया और आधुनिक काव्य भूमियों की पड़ताल के लिए पुराने औजारों को निरर्थक मानते हुए ‘नए’ प्रतिमानों की ज़रूरत रेखांकित की.

इस पद का ज़िक्र हालांकि सबसे पहले कवि-आलोचक विजयदेव नारायण साही ने लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक ‘नयी कविता के प्रतिमान’ के सन्दर्भ में करते हुए कहा था कि अब ‘नयी’ कविता के प्रतिमानों का नहीं, बल्कि कविता के ‘नए’ प्रतिमानों की ज़रुरत है. लेकिन नामवर सिंह ने साही के भाववाद से हटकर उन्हें एक सुव्यवस्थित शक्ल देकर समाज-सापेक्ष पड़ताल का हिस्सा बनाया.

साही परिमल ग्रुप के पुरोधा थे जिसके प्रगतिशील लेखकों से गहरे मतभेद थे. एक तरह से नामवर सिंह ने परिमलीय नयेपन को प्रगतिशील अंतर्वस्तु देने का काम किया.

वह विश्व राजनीति में पूंजीवादी और समाजवादी ब्लॉक के बीच शीतयुद्ध का दौर था जिसकी छाया से साहित्य भी अछूता नहीं रहा. हिंदी के शीतयुद्ध में एक तरफ परिमलीय लेखक और हीरानन्द सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे तो दूसरी तरफ प्रगतिशील साहित्य का मोर्चा था, जिसकी बागडोर तमाम आपसी मतभेदों के बावजूद डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह के हाथों में रही.

नामवर सिंह की किताब

‘कविता के नए प्रतिमान’ इसी दौर की कृति हैं जिसने डॉ. नगेन्द्र के साथ-साथ अज्ञेय के साहित्यिक आभामंडल को ढहाने का काम किया. नामवर जी ने अज्ञेय के नव-छायावाद के बरक्स रघुवीर सहाय की कविता को, और बाद में गजानन माधव मुक्तिबोध को भी केंद्रीयता देते हुए नया विमर्श शुरू किया.

रघुवीर सहाय हालांकि अज्ञेय की पाठशाला से ही निकले थे, लेकिन उनके सरोकार कहीं ज्यादा सामजिक और लोकतांत्रिक नागरिकता से जुड़े थे इसलिए नामवर जी ने कविता की सामाजिकता और लोकतंत्र पर जिस बहस की शुरुआत की वह लम्बे समय तक सार्थक बनी रही.

पत्रकारिता का अनुभव होने के कारण उनकी भाषा अकादमिक जटिलता से मुक्त और ज्यादा सम्प्रेषनीय थी. यह किताब आलोचना को एक रणनीति को सामने रखती थी और बाद में खुद नामवर जी उसे ‘पोलिमिकल’ यानी दाँव-पेच और उखाड़-पछाड़ से भरी हुई मानने लगे. वर्षों बाद उन्होंने जैसे भूल-सुधार करते हुए अज्ञेय की कविता पर पुनर्विचार किया और उनके समग्र अवदान को भी रेखांकित किया.

नामवर सिंह की किताब

नयीकहानी में ‘नयी’ क्या ?

इससे पहले भी नामवर जी की एक किताब ‘कहानी: नयी कहानी’ (1964) चर्चित रही जिसमें उन्होंने यह जांचने की कोशिश की कि ‘नयी कहानी’ आन्दोलन में नया क्या है.

उन्होंने उसके प्रमुख कथाकारों मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर की त्रयी की कहानियों के बरक्स निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ को पहली ‘नयी’ कहानी के रूप में मान्यता दी.

ज़्यादातर आलोचकों की राय में मोहन राकेश की ‘मलबे का मालिक’ पहली नयी कहानी थी, लेकिन नामवर जी ने ऐसी कहानियों को ‘अधूरा अनुभव’ कह कर खारिज किया. दरअसल वाद-विवाद उन्हें शुरू से ही प्रिय था हालांकि उनकी एक और किताब ‘वाद विवाद संवाद’ बहुत बाद में (1989) में आयी.

नामवर सिंह की किताब

नामवर सिंह मानते थे कि “मेरा वास्तविक काम ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में है”, जिसका प्रकाशन 1982 में हुआ.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ‘लोकमंगलवादी’ सैद्धांतिकी से अलग आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की ‘लोकोन्मुखी क्रांतिकारी’ संस्कृति-समीक्षा की राह पर चलती इस किताब से उन्होंने जैसे अपने गुरु को श्रद्धांजलि दी.

उन्होंने तुलसीदास की बजाय सूरदास और कबीर की प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उसकी भूमिका में नामवर सिंह लिखते हैं: “यह प्रयास परंपरा की खोज का ही है. सम्प्रदाय-निर्माण का नहीं. पण्डितजी स्वयं सम्प्रदाय-निर्माण के विरुद्ध थे. यदि ‘सम्प्रदाय का मूल अर्थ है गुरु-परम्परा से प्राप्त आचार-विचारों का संरक्षण’, तो पण्डितजी के विचारों के अविकृत संरक्षण के लिए मेरी क्या, ‘किसी की भी आवश्यकता नहीं है.”

हिंदी भाषा को हमेशा रखा आगे

नामवर सिंह व्यावहारिक आलोचना ही नहीं, कुछ व्यावहारिक विवादों के लिए भी जाने गए. एक लम्बे समय तक हिंदी और उर्दू की प्रगतिशील या तरक्कीपसंद धाराओं में एकजुटता और अंतर्क्रियाएं बनी रहीं. कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक मंचों प्रगतिशील लेखक संघ, इंडियन पीपुल्स थिएट्रिकल एसोसिएशन (इप्टा) आदि की सांस्कृतिक गतिविधियों में हिंदी-उर्दू लेखकों-रंगकर्मियों का ऐतिहासिक योगदान था जिसकी धमक हिंदी सिनेमा तक में सुनाई दी.

बाद में जब प्रगतिशील लेखक संघ में हिंदी-उर्दू के मसले पर मतभेद शुरू हुए और उर्दू लेखकों ने उपेक्षित किये जाने और उर्दू को उसका ‘वाजिब हक’ न मिलने की बहस शुरू की तो नामवर जी ने एक लेख ‘बासी भात में खुदा का साझा’ के ज़रिये हिंदी का पक्ष लिया.

नतीजतन, उर्दू में नामवर के समकक्ष कहे जाने वाले और उन्हीं के साथ जवाहर लाल विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद हसन से उनकी वैचारिक-व्यक्तिगत दूरियां बढ़ गयीं. हिंदी और उर्दू, दोनों के साहित्य पर आलोचकों का वर्चस्व रहा है और यह हमारे साहित्यों को एक औपनिवेशिक देन है, और उसके दिग्गजों के आपसी मतभेदों ने तरक्कीपसंद अदब में कई भीतरी दरारें पैदा कीं.

नामवर सिंह

‘वाचिक’ परम्परा

नामवर सिंह आलोचना में एक और ‘परम्परा’ के लिए भी याद किये जाते हैं और वह है— ‘वाचिक’ परम्परा. द्विवेदी जी बहुत कुछ लिखने के अलावा उस ‘वाचिक’ धारा के भी समर्थक थे जिसकी लीक कबीर, नानक, दादू आदि की यायावरी और प्रवचनों से बनी थी. कहानी उनकी निगाह में ‘गल्प’ थी, गप्प का तत्सम रूप.

नामवर जी ने भी जीवन के उत्तरार्ध में ‘वाचिक’ शैली में ही काम किया जिसका कुछ उपहास भी हुआ. ‘दूसरी परंपरा की खोज’ के बाद उनकी करीब एक दर्ज़न किताबें आयीं जिनमें ‘आलोचक के मुख से’, ‘कहना न होगा’, ‘कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता’, ‘बात बात में बात’ आदि प्रमुख हैं, लेकिन वे ज़्यादातर ‘लिखी हुई’ नहीं, ‘बोली हुई’ हैं.

लेकिन यह देखकर आश्चर्य होता है कि करीब तीन दशक तक वे कभी-कभार ‘आलोचना’ के संपादकीयों को छोड़कर बिना कुछ लिखे, सिर्फ इंटरव्यू, भाषण और व्याख्यान के ज़रिये प्रासंगिक बने रहे. इसकी एक वजह यह भी थी कि उनका गंभीर लेखन जिस तरह बोझिल विद्वता से मुक्त था, वैसे ही उनकी वाचिकता भी सरस थी हालांकि उसमें वह प्रामाणिकता कम थी जो उनके लेखन में पायी जाती है.

उदाहरण की तरह देखा गया नामवर का जीवन

नामवर सिंह के अंतर्विरोधों की चर्चा भी हिंदी में एक प्रिय विषय रहा है. वे ‘महाबली’ माने गए और उनके ‘पतन’ पर भी बहुत लिखा गया. नामवर जी वाम-प्रगतिशील साहित्य के एक प्रमुख रणनीतिकार आलोचक थे और अपने जीवन के सबसे जीवंत दौर में हिंदी विमर्शों पर उनका गहरा प्रभाव रहा.

कविता की उनकी पहचान भी अचूक मानी गयी और ज़्यादातर कवि अपनी कविता पर उनकी राय जानने के लिए लालायित रहते थे. हरिवंश राय बच्चन के एक गीत की पंक्ति को कुछ बदल कर कहा जाए तो उनका रोमांच ऐसा था कि ‘तुम छू दो, मेरा गान अमर हो जाए’.

यह भी उन्हीं की खूबी थी कि वे अपने समझौतों को एक वैचारिक औचित्य दे सकते थे. उनसे प्रभावित कई लोगों को मलाल रहा कि वे एक खुद एक सत्ताधारी, ताकतवर प्रतिष्ठान बन गए और आजीवन हिन्दुत्ववादी संघ परिवार का तीखा विरोध करने के बावजूद उसके द्वारा संचालित संस्थाओं से दूरी नहीं रख पाए. ऐसे विचलनों के कारण प्रगतिशील लेखक संघ को उन्हें हटाने को विवश होना पड़ा.

ट्विटर पोस्ट @rajnathsingh: प्रख्यात साहित्यकार एवं समालोचक डा. नामवर सिंह के निधन से हिंदी भाषा ने अपना एक बहुत बड़ा साधक और सेवक खो दिया है। वे आलोचना की दृष्टि ही नहीं रखते थे बल्कि काव्य की वृष्टि के भी विस्तार में उनका बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने हिंदी साहित्य के नए प्रतिमान तय किए और नए मुहावरे गढ़े।

पांच दशक से भी ज्यादा समय तक नामवर सिंह हिंदी साहित्य की प्रस्थापनाओं, बहसों और विवादों के केंद्र में रहे. चर्चा ‘दूसरा नामवर कौन?’ के मुद्दे पर भी हुई और कई आलोचकों-प्राध्यापकों ने नामवर जैसा बनने की कोशिश की, लेकिन उनकी तरह का दर्ज़ा किसी को हासिल नहीं हुआ.

खुद नामवर कहते थे कि ‘हर साहित्यिक दौर को अपना आलोचक पैदा करना होता है. मैं जिस पीढ़ी का आलोचक हूँ, उसके बाद की पीढ़ी का आलोचक नहीं हो सकता.’

जिन आलोचकों ने उनसे अलग राह पर चलने, उनकी परंपरा से हटकर चलने की कोशिश की और आलोचना को व्यावहारिकता से कुछ हटकर गहरे सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की कोशिश की, वे कुछ हद तक कामयाब रहे.

नामवर जी के व्यक्तित्व और काम पर दर्ज़न भर पुस्तकें और कई पत्रिकाओं के विशेष अंक प्रकाशित हुए: ‘नामवर के विमर्श’, ‘आलोचना के रचना पुरुष, ‘नामवर की धरती’, ‘जेएनयू में नामवर सिंह’ ‘आलोचक नामवर सिंह’, ‘पहल’ और ‘बहुवचन के विशेषांक आदि इसके कुछ उदाहरण हैं.

किसी आलोचक को इतनी प्रशस्तिपूर्ण किताबें कम ही नसीब हो पाती हैं. हिंदी में आलोचना की फिलहाल जो दुर्दशा है, उसमें ‘नामवर के बाद कौन?’ की बहस भी संभव नहीं लगती.

हाँ, नामवर के होने का अर्थ पर काफी विचार किया गया और अब उनके विदा लेने के बाद शायद नामवर के न होने का अर्थ पर उतने ही गंभीर विचार की दरकार होगी.

उनये उनये भादरे, बरखा की जल चादरें

फागुनी शाम

फागुनी शाम

अंगूरी उजास

बतास में जंगली गंध का डूबना

ऐंठती पीर में

दूर, बराह-से

जंगलों के सुनसान का कूंथना.

बेघर बेपरवाह

दो राहियों का

नत शीश

न देखना, न पूछना.

शाल की पंक्तियों वाली

निचाट-सी राह में

घूमना घूमना घूमना.

उनये उनये भादरे

उनये उनये भादरे

बरखा की जल चादरें

फूल दीप से जले

कि झुरती पुरवैया की याद रे

मन कुएं के कोहरे-सा रवि डूबे के बाद इरे.

भादरे.

उठे बगूले घास में

चढ़ता रंग बतास में

हरी हो रही धूप

नशे-सी चढ़ती झुके अकास में

तिरती हैं परछाइयाँ सीने के भींगे चास में

घास में.

कभी जब याद आ जाते

नयन को घेर लेते घन,

स्वयं में रह न पाता मन

लहर से मूक अधरों पर

व्यथा बनती मधुर सिहरन

न दुःख मिलता न सुख मिलता

न जाने प्राण क्या पाते!

तुम्हारा प्यार बन सावन,

बरसता याद के रसकन

कि पाकर मोतियों का धन

उमड़ पड़ते नयन निर्धन

विरह की घाटियों में भी

मिलन के मेघ मंड़राते।

झुका-सा प्राण का अंबर,

स्वयं ही सिंधु बन-बनकर

ह्रदय की रिक्तता भरता

उठा शत कल्पना जलधर.

ह्रदय-सर रिक्त रह जाता

नयन-घट किंतु भर आते

कभी जब याद आ जाते.

(साभार-hindisamay.com)

द वायर में छपा कृष्ण प्रताप सिंह का एक लेख ‘नामवर सिंह को क्यों लगता था कि हिंदी समाज को अपने साहित्यकारों से लगाव नहीं है’

एक साक्षात्कार में नामवर सिंह ने कहा था कि विदेश में दो लोग जब बात करते हैं तो कुछ देर के अंदर ही उनकी बातचीत में मिल्टन, शेक्सपियर, चेखव के उद्धरण आने लगते हैं, लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं दिखता. हिंदी में बहुत से जनकवि हैं लेकिन हिंदी जगत में उनकी रचनाएं उस रूप में प्रचारित नहीं होतीं.

नामवर सिंह. (फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन/फेसबुक)

नामवर सिंह. (फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन/फेसबुक)

अब जब बीते 19 फरवरी को नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में रात 11:50 बजे मौत से हार जाने वाले 92 वर्षीय नामवर सिंह हमारे बीच नहीं रहे, रूपक बांधना हो तो कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य में दूसरी परंपरा का अन्वेषण करने वाले इस ‘लिविंग लीजेंड’ का आभामंडल ऐसा था कि मौत को भी दिन के उजाले में उसके पास फटकने का साहस नहीं हुआ.

इसलिए वह रात दबे पांव उनके पास आई और असावधान पाते ही घात कर बैठी. यकीनन, जैसा कि वरिष्ठ लेखक व पत्रकार ओम थानवी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में कहा है, यह ‘हिंदी में फिर सन्नाटे की ख़बर’ है.

इस कारण और भी कि वे ‘नायाब आलोचक’ भर नहीं थे. लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार, वे अज्ञेय के बाद के हिंदी के सबसे बड़े ‘स्टेट्समैन’ थे, तो अपने छोटे भाई काशीनाथ सिंह के अनुसार हिंदी के आलोचकों में उनकी जैसी लोकप्रियता अन्य किसी को नहीं मिली.

इन विछोह-विह्वल क्षणों में लेखक-कवि, प्रशंसक और आलोचक उनके कृतित्व व व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके और उनके सृजन के बारे में ऐसी और भी जानें कितनी बातें कहेंगे.

लेकिन, बेहतर होगा कि उन्हें संवेदनाओं और भावनाओं के इस अतिरेक से परे, जब भी और जैसे भी, याद किया जाए, हिंदी संसार से जुड़े उनके उस असंतोष को भी भुलाया न जाए.

इसे उन्होंने एक साक्षात्कार में यह कहकर व्यक्त किया था, ‘हिंदी भाषा और साहित्य का काफी विस्तार हुआ है. उसकी रचनाशीलता की दुनिया भी व्यापक हुई है. बहुत से सर्जकों ने उसे समृद्ध किया है. कई महत्वपूर्ण लेखकों ने कुछ विश्वस्तरीय रचनाएं भी दी हैं. लेकिन अभी भी हिंदी भाषी समाज को अपने साहित्यकारों से बहुत प्यार या लगाव नहीं है. विदेशों में मैं देखता हूं कि जब दो लोग बात करते हैं तो पांच-सात मिनट के अंदर ही उनकी बातचीत में मिल्टन, हेमिंग्वे, शेक्सपियर, ब्रेख्त व चेखव आदि के उद्धरण सामने आने लगते हैं. लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं दिखता. हिंदी में बहुत से जनकवि हैं लेकिन हिंदी जगत में उनकी रचनाएं उस रूप में प्रचारित नहीं होतीं.’

इसी साक्षात्कार में उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि अब उनकी याददाश्त कमज़ोर हो गई है. सेहत भी ठीक नहीं रहती और वे ख़ुद कुछ भी लिखने में असमर्थ हो गए हैं. इस असमर्थता को उनकी लंबी यात्रा की थकान माना जाए या बढ़ती उम्र व बुढ़ापे की अनिवार्य परिणति, इसके गरिमापूर्वक और ईमानदार स्वीकार के लिए उनकी प्रशंसा ही करनी होगी. वरना साहित्य में न सही, देश की राजनीति में तो ख़ुद को कभी भी असमर्थ या बूढ़ा मानने का रिवाज नहीं है.

इस रिवाज के विपरीत उन्होंने अपनी एक कविता की इन पंक्तियों में अपने तन-मन के टूटने के कारणों की पड़ताल काफी पहले ही शुरू कर दी थी…

नभ के नीले सूनेपन में,

हैं टूट रहे बरसे बादर,

जानें क्यों टूट रहा है तन!

वन में चिड़ियों के चलने से,

हैं टूट रहे पत्ते चरमर,

जानें क्यों टूट रहा है मन!

आश्चर्य नहीं कि उनके इस निरंतर गहराती गई टूटन के साथ दुनिया को अलविदा कहने के साथ ही, न सिर्फ हिंदी बल्कि सारी भारतीय भाषाओं को अपने तन-मन थोड़े और टूटे लग रहे हैं.

यह ऐसी टूटन है, जिसका तुरत-फुरत, एक-दो दिन, कुछ महीनों या सालों में समाधान मुमकिन नहीं होने वाला. इसलिए भी कि वे हमारे साहित्य-संसार को ऐसे कठिन समय में छोड़ गए हैं, जब उसे अपने सामने उपस्थित तमाम चुनौतियों से निपटने के लिए उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी.

इसके चलते जो रिक्ति या कि अभाव पैदा हुआ है, उसके मद्देनज़र उनके योगदान को रेखांकित करने में किसी हड़बड़ी की कतई ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनके जैसी शख़्सियतें (जिनसे समग्रता में सहमत होना भी असहमत होने जितना ही कठिन हो) सदियों में एक दो ही पैदा होती हैं, तो सदियों तक बार-बार भुलाई और नए सिरे से याद भी की जाती रहती हैं.

इसे यों भी समझ सकते हैं कि वाराणसी ज़िले के चंदौली अंचल के, जो अब ज़िला बन गया है, जिस जीयनपुर गांव में नामवर (कहना चाहिए राम जी, क्योंकि तब उनके पिता ने उनका राम जी नाम ही रखा था, वह तो पड़ोस की चाची ने उसे बदलकर नामवर कर दिया) पैदा हुए, भले ही वह कायाकल्प के बाद अम्बेडकरनगर बन गया है, जीयनपुर नाम है कि लोगों के ज़ेहन से उतरता ही नहीं है.

कहना ज़रूरी है कि ‘वाद विवाद संवाद’ के रस में पगे, ‘बेचैनी और तड़प से भरते, द्वंद्व के लिए ललकारते, कभी नि:शस्त्र करते और कभी वार चूकते’ नामवर ने साहित्य-संसार में अपनी लंबी उपस्थिति के दौरान ही अपने लिए जितना अकेलापन व असहमतियां अपने लेखन या सृजन से पैदा कीं, उससे ज़्यादा अपने व्याख्यानों से पैदा कर डाली थीं. तभी तो किसी ने उन्हें ‘अचूक अवसरवादिता’ का तो किसी ने ‘तिकड़मी’ आलोचक तक कह डाला.

यह भी कहा गया कि वे अपने विचार बदलते रहते हैं, उनमें निरंतरता नहीं है और वे साहित्य का नहीं, राजनीति का विमर्श करते हैं यानी सत्ता का डिसकोर्स.

इन तोहमतों को लेकर वे प्राय: कहा करते थे, ‘मैं कठघरे में खड़ा एक मुजरिम हूं.’ एक वक्तव्य में उन्होंने लोगों को यह सिखाते हुए कि ‘सत्य के लिए किसी से नहीं डरना चाहिए, गुरु से भी नहीं और वेद से भी नहीं’, कहा था कि लोगों को जितनी शिकायतें मुझसे हैं, उतनी मैं ख़ुद भी अपने आप से करता हूं- इरादे बांधता हूं, जोड़ता हूं, तोड़ देता हूं.

अलबत्ता, इसमें यह बात भी जोड़ते थे, ‘आप हर सूरत में अनिवार्य हैं, हर सूरत में प्रासंगिक हैं. इसलिए आपसे सबसे ज़्यादा शिकायतें हैं.’

लेकिन अब वे नहीं हैं तो अंदेशा होता है, इसलिए और भी कि सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसा चलन बढ़ता जा रहा है कि उन्हें खलनायक बनाकर ‘बुरी-बुरी’ चीज़ों के लिए ही याद किया जाने लगे या ऐसा स्तुति गान शुरू कर दिया जाए, जिसमें उनके व्यक्तित्व के दूसरे ज़रूरी पहलू छिप कर रह जाएं.

इनमें से कोई भी बात न नामवर के हित में होगी और न ही साहित्य संसार के, क्योंकि किसी भी सर्जक को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उसे उसकी उत्कृष्टताओं के लिए याद किया जाए, ऐसी वस्तुनिष्ठता से, जिसे व्यक्ति पूजा में कतई दिलचस्पी न हो.
नामवर के संदर्भ में इस तरीके के आज़माने की एक बड़ी सुविधा यह है कि वे अपने पीछे जो थाती छोड़ गए हैं, उसमें उत्कृष्ट ही सबसे ज़्यादा है.

कुछ महानुभाव फिर भी इस तरीके से परहेज बरतने के फेर में हों, तो उन्हें नामवर के संघर्ष के दिनों का वह प्रसंग पढ़ाना दिलचस्प होगा, जिसमें एक नौकरी के आवेदन के सिलसिले में हो रहे इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि आपको इस नौकरी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में से एक को चुन लेने को कहा जाए तो आप क्या करेंगे?

बिना पल गंवाये नामवर का जवाब था, ‘मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को चुन लूंगा.’

पूछने वाले ने कहा, ‘लेकिन अभी तो आप कह रहे थे कि आपको नौकरी की बहुत ज़रूरत है.’

तो नामवर बोले, ‘सो तो है ही, लेकिन मैं आपसे कह दूं कि इस नौकरी के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ दूंगा, तो भी मुझे नहीं मालूम कि आप मुझे यह नौकरी देंगे या नहीं, लेकिन अच्छी तरह मालूम है कि इतना कहते ही मैं आपकी और अपनी दोनों की निगाह में इतना गिर जाऊंगा कि शायद टके सेर भी न रह जाऊं.’

प्रसंगवश, वे आज़ादी के तुरंत बाद की कांग्रेस सरकारों के वर्चस्व के दिन थे, जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय युवकों को सायास नौकरियों से वंचित किया जा रहा था.

कहने का आशय यह कि आगे जो लोग नामवर सिंह की नाहक निंदा या ग़ैरज़रूरी स्तुति में लौ लगाएंगे, नामवर की शान में तो खैर वे क्या गुस्ताख़ी कर पाएंगे, उन्हें अनिवार्य रूप से उक्त प्रसंग के नामवर जैसा टके सेर भी न रह जाने का ख़तरा उठाना पड़ेगा.

एनडीटीवी चीफ सब एडिटर प्रभात उपाध्याय का एक लेख

करीबन 6 फीट का डील-डौल… झक सफेद धोती-कुर्ता और ऊपर खादी की सदरी…मुंह में पान गुलगुलाते हुए…नामवर सिंह जी को जब भी देखा ऐसे ही देखा…दिल्ली में बनारस को जीते हुए. कल वे दुनिया को अलविदा कह गए और उनके साथ ही दिल्ली में बनारस की एक पहचान भी रुख़सत हो गई. मैं हिंदी साहित्य का छात्र नहीं रहा हूं, लेकिन हिंदी से साबका साहित्य के जरिये ही हुआ. कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, कविता और बहुत बाद में आलोचना तक पहुंचा (सिर्फ पहुंच ही पाया). और इसी पड़ाव पर नामवर सिंह के नाम से रूबरू हुआ. हिंदी की दुनिया में आपसी टांग खिंचाई के बीच दिल्ली की तमाम सभा और गोष्ठियों में मैंने नामवर सिंह के लिए बेपनाह इज्ज़त देखी. समकालीन हिंदी साहित्यकारों में शायद ही इतनी इज्ज़त और अदब किसी को अता हुई हो. नामवर सिंह को और करीब से जानने का मौका उनके छोटे भाई और ख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह के संस्मरण ‘घर का जोगी जोगड़ा’ से मिला. 

बनारस की ‘ऊसर भूमि’ जीयनपुर से निकल नामवर सिंह ने बीएचयू, सागर और जेएनयू में हिंदी साहित्य की जो पौध रोपी, उनमें से तमाम अब ख़ुद बरगद बन गए हैं. 93 साल…एक सदी में सिर्फ 7 बरस कम. पिछले दो ढाई महीनों को छोड़कर नामवर सिंह लगातार सक्रिय रहे और हिंदी की थाती संजोते-संवारते रहे. आखिरी घड़ी तक लगे रहे. कई मौकों पर उनका विवादों से भी नाता जुड़ा. लेकिन उन्हीं के शब्दों में, ‘सलूक जिससे किया मैंने आशिकाना किया’. और जब मौका आया तो अपनी भूल-चूक स्वीकार भी की. मसलन उन्होंने माना कि “रेणु” को समझने में उनसे देरी हुई. एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि ‘आपको कैसे लोगों से ईर्ष्या होती है?’ उन्होंने कहा – “जो वही चीज कह या लिख देते हैं जिसे सटीक ढंग और सलीके से कहने के लिए मैं सालों-साल बेचैन रहा”.

नामवर सिंह कहते थे कि किताब और कलम के बिना मैं जीवन की ‘कल्पना’ भी नहीं कर सकता हूं. कुछ महीनों पहले उन्होंने ‘प्राइम टाइम’ के लिए इंटरव्यू दिया था. यह शायद उनका आखरी इंटरव्यू था. हर कोने में किताबों का कब्ज़ा…पुरस्कार…ट्रॉफी…सर्टिफिकेट. इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया कि ‘हिंदी समाज़ अपने बुजुर्गों को अकेला क्यों छोड़ देता है?’ तो नामवर जी ने तपाक से कहा- ‘मेरे पास काम की कमी नहीं है’. उन्होंने आगे कहा- “मरेंगे हम किताबों पर, वरक होगा कफ़न अपना”. नामवर सिंह का यह उत्तर उनकी जीवटता का उदाहरण तो था ही, साथ ही हिंदी समाज पर गंभीर टिप्पणी भी थी. नामवर सिंह कहते थे कि दिल्ली तो सिर्फ उनके दिमाग में है, दिल तो बनारस में ही है. अब भले ही वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके रचे और कहे गए शब्दों की ख़ुशबू आपको जरूर मिल जाएगी. लोलारक कुंड के रास्तों पर, जहां से उन्होंने यह यात्रा शुरू की थी और जहां वापस लौटना चाहते थे.