लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने यों तो बड़ा ओजस्वी और तार्किक भाषण दिया, किंतु उनके समक्ष कुछ प्रश्न प्रस्तुत हैं। आश्चर्य की बात है कि ये प्रश्न उनके विरोधियों ने नहीं उनके समर्थकों ने प्रस्तुत किए हैं। भारतीय जनता पार्टी के समर्थक बड़े विचित्र हैं। उनकी दो विशेषताएं हैं, जो दुनिया के किसी अन्य राजनीतिक समुदाय में नहीं पाई जातीं। पहली, जब कोई नैरेटिव या पूर्वग्रह उनके विरुद्ध प्रस्तुत किया जाता है तो वो उससे इनकार करने के बजाय उलटे उसकी पुष्टि करने के हरसम्भव प्रयास करने लगते हैं। दो, जब उनकी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तर्क-वितर्क करके कोई बात सामने रखता है तो यह वर्ग चीख़-चीख़कर दुनिया को यह बतलाने का प्रयास करता है कि हमारे नेताओं का असली मक़सद तो इससे उलट है, ऊपर से वो जो कह रहे हैं, उस पर ध्यान मत दीजिए। ईश्वर ऐसे पोल-खोलू समर्थक संसार की किसी राजनीतिक पार्टी को न दे!

एक उदाहरण देखिए। नागरिकता संशोधन विधेयक पर एक हिंदू राष्ट्रवादी ने फ़ेसबुक पर लिखा- भारत हिंदुओं का देश है, निराश्रित हिंदुओं का यहां स्वागत किया जाना चाहिए। उस पर टिप्पणी में एक दूसरे हिंदू राष्ट्रवादी ने कहा- फिर ईसाइयों की नागरिकता को इस बिल में मान्यता क्यों दी जा रही है? उस पर प्रत्युत्तर में लेखक महोदय ने कहा- इसकी चिंता प्रधानमंत्री स्वयं कर लेंगे। तीसरे सज्जन ने उसमें जोड़ा- कभी-कभी बड़ा नुक़सान कम करने के लिए छोटे नुक़सान उठाना पड़ते हैं। यानी मुस्लिमों को प्रवेश देने से रोकने के लिए ईसाइयों का प्रवेश हाल-फ़िलहाल तो स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।

श्री अमित शाह अगर यह वार्तालाप पढ़ेंगे तो क्या माथा नहीं ठोंक लेंगे?

इसीलिए मैंने आरम्भ में कहा कि भारतीय जनता पार्टी का मुक़ाबला उसके अपने समर्थकों से है, विपक्ष से नहीं है। नागरिकता संशोधन विधेयक पर भी आपको यह नहीं देखना चाहिए कि संसद में बहस के दौरान शशि थरूर, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, असदुद्दीन ओवैसी आदि ने क्या कहा। आपको यह देखना चाहिए कि इस विधेयक पर भारतीय जनता पार्टी के ज़मीनी समर्थक क्या कह रहे हैं। यह एक आश्चर्यजनक दुराव है। या तो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व और उसके समर्थकों के बीच किसी तरह की समझ का अभाव है। या इस पार्टी के समर्थकों को कुछ वैसी बातें मालूम हैं, जिन्हें नेतृत्व अभी औपचारिक रूप से खुलकर नहीं कह सकता। अगर पार्टी सच में ही कोई दीर्घकालिक नीति बना रही है, तब तो उसका पहले ही खुलासा कर देना इसके समर्थकों की कमअक्ली ही कहलाएगी। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के धुर समर्थक और धुर विरोधी दोनों ही एक बात पर एकमत हैं, और वो ये कि पार्टी के द्वारा भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने की परियोजना पर काम किया जा रहा है।

श्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान जो तर्क दिए, उनका सार यह था कि इस बिल का सरोकार धर्म से नहीं वर्ग से है। अल्पसंख्यक एक वर्ग है। हम पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को शरण देना चाहते हैं। यह बिल मुस्लिमों के विरोध में नहीं है, यह एक संयोग ही है कि इन तीनों देशों में मुस्लिम अल्पंसख्यक नहीं हैं, अगर होते तो हम उनका भी स्वागत करते। किंतु नेहरू-लियाकत संधि का जैसे भारत ने पालन किया है, वैसे उसका पालन पाकिस्तान और बांग्लादेश ने नहीं किया है, और हम वैसी स्थिति में इन देशों के अल्पसंख्यकों की भारत की नागरिकता को मान्यता देते हैं (बशर्ते वे छह वर्षों से यहां रह रहे हों)। अमित शाह ने अंत में कहा- हमें शरणार्थी और घुसपैठिये के बीच के अंतर को समझना चाहिए।

ऊपर से देखने पर ये वाजिब बातें लगती हैं। किंतु इनमें गहरी तर्कगत भूलें भी हैं।

पहली भूल तो यह है कि किसी देश में कोई वर्ग अगर बहुसंख्यक है तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उस वर्ग के सभी जन वहां वर्चस्व की स्थिति में हैं। अगर भारत में बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच दलित और आदिवासी स्वयं को शोषित और वंचित अनुभव कर सकते हैं और किसी दूसरे देश में शरण लेना चाहते हैं तो उन्हें कम से कम बहुसंख्यक हिंदू कहकर तो आने से नहीं रोका जा सकेगा। जैसे भारत में दलित हैं, वैसे पाकिस्तान में अहमदिया हैं, या सूफ़ी और शिया हैं, जो बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा होने के बावजूद प्रताड़ित हैं।

इसलिए भारतीय जनता पार्टी ऊपर से भले ये दिखा रही हो कि हम दूसरे देश के दुखियारों को अपने देश में शरण देना चाहते हैं, किंतु कोई भी साफ़ तौर पर इस बात को सिद्ध नहीं कर सकता है कि किसी देश के बहुसंख्यक समुदाय का एक हिस्सा उन्हीं मानदंडों पर दुखियारा नहीं हो सकता है। किंतु ग़ैर-मुस्लिम कोटि का निर्धारण करके इस विधेयक ने स्वत: ही अपनी सीमाएं बांध दीं।

दूसरे, जो हिंदू राष्ट्रवादी यह मानकर प्रसन्न हो रहे हैं कि ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों की नागरिकता को मान्य कर देने भर से भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हो रहा है, उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि क्या सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध उनके हिंदू राष्ट्र की परिभाषा में समाते हैं? और श्रीलंका के हिंदू-तमिल कैसे उनकी हिंदू राष्ट्र की परिभाषा में नहीं समाते हैं, जिन्हें इस विधेयक के लाभों से वंचित रखा गया है? ईसाइयों के प्रति हिंदू राष्ट्रवाद का रुख़ तो स्पष्ट ही है। बौद्धों के प्रति उनका रवैया भी संशय के दायरे में है। पारसियों को वे कैसे स्वीकार करेंगे? सबसे पहले तो यह कि सावरकर-गोलवलकर प्रणीत हिंदू राष्ट्रवाद की आधुनिक व्याख्या वो कैसे करेंगे?

सावरकर ने 1937 में अहमदाबाद में हिंदू महासभा के 19वें सत्र को सम्बोधित करते हुए कहा था कि वे सभी लोग हिंदू हैं, जो सिंधु नदी से हिंद महासागर तक फैली भारतभूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानते हैं। इस परिभाषा के अनुसार पारसी, बौद्ध, ईसाई हिंदू राष्ट्रवाद की धारणा के अनुरूप नहीं हो सकेंगे। हिंदू राष्ट्रवादियों के समस्त उत्साह-प्रदर्शन के बावजूद इससे बचने का उपाय नहीं है कि नागरिकता संशोधन विधेयक हिंदू की परिभाषा लेकर सामने नहीं चला है। कम से कम फ़िलवक़्त तो नहीं। अभी तो आर्य, द्रविड़, कोल, मुंडा, किरात, गोंड जातियों को हिंदू-फ़ोल्ड में कैसे स्वीकारें, दलितों-आदिवासियों-बौद्धों का क्या करें, और ख़ालिस्तान-समर्थक सिखों को कैसे हिंदू कहें, इसी प्रश्न का समाधान खोजना शेष है। यह दुविधा इसलिए भी निर्मित होती है, क्योंकि अतीत में भारत कभी भी हिंदू राष्ट्र नहीं था। हिंदू राष्ट्र एक आधुनिक अवधारणा है। वह मुस्लिम लीग प्रणीत मुस्लिम राष्ट्र का प्रतिकार है। दूसरे शब्दों में हिंदू राष्ट्र के स्वप्न का आधार भविष्य में है, अतीत में नहीं है। इसलिए उसकी रूपरेखाएं अतीत के किसी दृष्टांत को सामने रखकर स्पष्ट नहीं हो सकती हैं।

तीसरे, कोई भी यह पूछेगा कि भारतीय जनता पार्टी को सारे काम छोड़कर इस नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित करवाने की क्यों कर सुध आई? यह तो भारत की प्राथमिकता के प्रश्नों में आज शामिल नहीं है। भारत के सामने इससे कहीं बड़ी चुनौतियां हैं। उल्टे, इससे और नई समस्याएं पैदा हो रही हैं, जैसे कि असम में असमिया-बंगाली-मुस्लिम संघर्ष का जनसांख्यिकीय त्रिकोण उभरकर सामने आ रहा है। असम सुलग रहा है। आज दुनिया की यह स्थिति है कि कोई भी देश शरणार्थियों को प्रवेश देने के प्रश्न पर सहज नहीं है। स्थानीय आबादी के भरण-पोषण और रोज़गार के गहरे संकट तीसरी दुनिया के देशों के सामने हैं। वैसे में यह नागरिकता संशोधन विधेयक क्यों कर भाजपा की प्राथमिकता बना है, यह चिंतन का विषय है। इससे कौन-सा राजनीतिक लाभ पार्टी प्राप्त करना चाहती है? इससे लाभ अधिक हैं या नुक़सान अधिक हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी अपने धुर-समर्थकों के तुष्टीकरण की राजनीति के दुष्चक्र में फंस गई है? अंग्रेज़ी में इसे “प्लेइंग टु द गैलेरी” कहा जाता है। तब आप चाहे जितना ओजस्वी और तार्किक भाषण दें, औचित्य के प्रश्न तो पूछे ही जाते हैं। यह भी देखा जाता है कि आपमें स्टेट्समैनशिप कितनी है। यानी आप राजधर्म का पालन करने वाले शासक की तरह सोचते हैं, या अपने समर्थकों को प्रसन्न करने वाले किसी अति-उत्साही दलनायक की तरह।

शेखर गुप्ता का कहना है कि अभी तक पाकिस्तान कहता था कि विभाजन की परिघटना अधूरी रह गई है। वह कश्मीर के संदर्भ में ऐसा कहता था। किंतु अब भारत कह रहा है कि विभाजन अपनी तार्किक-परिणति तक नहीं पहुंचा और वह ऐसा शरणार्थियों और अल्पसंख्यकों के प्रश्न को सामने रखकर कह रहा है। किंतु ऐतिहासिक विक्षोभ बर्र के छत्ते की तरह होता है, उसको छेड़ने पर अतीत के अनेक प्रेत सामने चले आते हैं। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से भारतीय जनता पार्टी की दृष्टि अतीत-केंद्रित क्यों हो चली है? उसके लिए इतिहास भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण क्यों हो गया है? यह एक रहस्य का विषय है। मई 2019 में जब सभी विश्लेषकों ने एकमत से यह स्वीकार कर लिया था कि भाजपा पहले से भी बड़ा जनादेश पाकर अब अपनी राजनीतिक-स्थिति के चरम पर जा पहुंची है, तब उसके द्वारा दर्शाया जा रहा यह उद्वेग, बेसब्री और अपने प्राथमिक लक्ष्यों से ध्यान चूकना भी पृथक से एक विमर्श का विषय माना जाना चाहिए। इति।

सुशोभित | Sushobhit
सुशोभित