गाँव – धीरज राणा भायला

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वो पगडंडी
तालाब किनारे की
वे शाम धुँधल की
गाँव चौबारे की।

जहाँ शर्म हया
पर्दे की शोभा थी
अब याद कहाँ
दीवारें
वे मिट्टी और गारे की।

रोटी थी
और मक्खन था
और छाछ का लोटा था।

नहीं भेदभाव था
धन-दौलत का
न प्रेम का टोटा था।

जल और हवा
और मिट्टी भी
तब आवाज़
पुकारे थी।

वो पगडंडी
तालाब किनारे की।

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बाढ़ से निपटना तो हमें सीखना ही होगा

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पूरब में असम, पश्चिम में गुजरात और दक्षिण में कर्नाटक तक बाढ़ का प्रकोप जारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से वर्षा की कुल मात्रा पूर्ववत रहेगी पर बारिश के पैटर्न में बदलाव आएगा। गर्म हवा में पानी धारण करने की शक्ति अधिक होती है। गर्म बादल बरसते है तो ताबड़तोड़ ज्यादा पानी गिरता है, लेकिन फिर सूखा पड़ जाता है। जैसे 120 दिन के मॉनसून में तीन दिन भारी वर्षा हो और शेष 117 दिन सूखा रहे। वर्षा के पैटर्न में इस बदलाव का हमारी खेती पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

धान की फसल को लगातार 120 दिन पानी की जरूरत होती है। उतना ही पानी तीन दिन में बरस जाए तो फसल मारी जाएगी। वर्षा के पैटर्न में बदलाव का दूसरा प्रभाव बाढ़ पर पड़ेगा। पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमिगत ऐक्वीफरों (भूजल भंडार) में समा जाता है जैसे वर्षा का आधा पानी ऐक्वीफर में रिस गया और आधा नालों-नदियों में बहा। ताबड़तोड़ बरसने पर वह ऐक्वीफरों में नहीं रिस पाता है। पूरा पानी नालों और नदियों की ओर बहने लगता है जिससे बाढ़ आ जाती है।

सरकारी रणनीति

इस कठिन परिस्थिति का सामना करने की सरकारी रणनीति यही है कि भाखड़ा और टिहरी जैसे नए बांध बनाए जाएं, जैसे कि लखवार व्यासी तथा पंचेश्वर में प्रस्तावित हैं। पहाड़ में होने वाली वर्षा के पानी को इन डैमों में जमा कर लिया जाए। वर्षा धीरे-धीरे हो या ताबड़तोड़, इससे डैम की भंडारण क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

बाद में इस पानी का उपयोग खेती के लिए किया जा सकता है। साथ-साथ बाढ़ वाली नदियों के दोनों तटों पर तटबंध बना दिए जाएं जिससे नदी का पानी नहर की तरह अपने रास्ते चले और बाढ़ का रूप न ले। इस नीति का फेल होना तय है क्योंकि डैम में केवल पहाड़ी वर्षा का पानी रोका जा सकता है। मैदानों की ताबड़तोड़ वर्षा का पानी तो बह ही जाएगा। गंगा के कैचमेंट में पहाड़ी हिस्सा 239 हजार वर्ग किलोमीटर का है जबकि मैदानी हिस्सा इससे तीन गुना 852 हजार वर्ग किलोमीटर का है। मैदानी वर्षा के पानी का नुकसान तो होगा ही।

दूसरी समस्या है कि स्टोरेज डैमों की आयु सीमित होती है। टिहरी हाइड्रोपावर कार्पोरेशन द्वारा कराए गए दो अध्ययनों के अनुसार टिहरी झील 140 से 170 वर्षों में पूरी तरह गाद से भर जाएगी। तब इसमें पहाड़ी वर्षा के पानी का भंडारण नहीं हो सकेगा। नदी के दोनों तटों पर बनाए गए तटबंधों में भी गाद की समस्या है। नदी द्वारा तटबंधों के बीच गाद जमा कर दी जाती है। शीघ्र ही नदी का पाट ऊंचा हो जाता है। तब तटबंधों को और ऊंचा किया जाता है। कुछ समय बाद नदी अगल-बगल की जमीन से ऊपर बहने लगती है जैसे मेट्रो ट्रेन का ट्रैक जमीन से ऊपर चलता है। लेकिन तटबंधों को ऊंचा करते रहने की सीमा है। ये टूटेंगे जरूर और तब नदी का पानी झरने जैसा गिरता और फैलता है। बाढ़ और भयावह हो जाती है।

डैमों और तटबंधों से सिंचाई भी प्रभावित होती है। डैम में पानी रोक लेने से बाढ़ कम फैलती है। जब तक तटबंध टूटते नहीं, तब तक ये बाढ़ के पानी को फैलने नहीं देते हैं। बाढ़ के पानी न फैलने से भूमिगत ऐक्वीफरों में पानी नहीं रिसता है और बाद में यह सिंचाई के लिए नहीं उपलब्ध होता। चार-पांच बाढ़ झेल लेने के बाद तटबंधों के टूटने पर पानी का पुनर्भरण अवश्य होता है पर तब तक ऐक्वीफर सूख चुके होते हैं।

सिंचाई में जितनी वृद्धि डैम में पानी के भंडारण से होती है, उससे ज्यादा हानि पानी के कम पुनर्भरण से होती है। अंतिम परिणाम नकारात्मक होता है। लेकिन यह दुष्परिणाम वर्तमान में नहीं दिख रहा है, क्योंकि हम अतीत में संचित भूमिगत जल भंडारों से पानी का अति दोहन कर रहे हैं। जैसे दुकान घाटे में चल रही हो पर पुराने स्टॉक को बेच कर दुकानदार जश्न मना रहा हो, ऐसे ही हमारी सरकार बांध और तटबंध बनाकर जश्न मना रही है।

सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा अन्यथा हम सूखे और बाढ़ की दोहरी मार में डूब जाएंगे। मैदानों में ताबड़तोड़ बरसते पानी का उपयोग भूमिगत ऐक्वीफर के पुनर्भरण के लिए करना होगा। किसानों को प्रोत्साहन देकर खेतों के चारों तरफ ऊंची मेड़ बनानी होगी जिससे वर्षा का पानी खेत में टिके और भूमि में रिसे। साथ-साथ नालों में विशेष प्रकार के ‘रीचार्ज’ कुएं बनाने होंगे जिनसे पानी जमीन में डाला जाता है।

गांवों और शहरों के तालाबों को साफ करना होगा जिससे इनमें पानी इकट्टा हो और भूमि में रिसे। दूसरे, बड़े बांधों को हटाना होगा। इन बांधों की क्षमता सूई की नोक के बराबर है। जैसे टिहरी बांध मे 2.6 अरब घन मीटर पानी का भंडारण करने की क्षमता है। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश के भूमिगत ऐक्वीफरों की क्षमता 76 अरब घन मीटर, यानी लगभग 30 गुना है। टिहरी को हटा दें और बाढ़ को फैलने दें तो टिहरी से ज्यादा पानी भूमिगत ऐक्वीफरों में समा सकता है। यूं भी टिहरी जैसे बांधों की आयु सीमित है। तीसरे, नदियों के किनारे बनाए गए सभी तटबंधों को हटा देना चाहिए।

बदले रहन-सहन

बाढ़ लाना नदी का स्वभाव है। मनुष्य बाढ़ को आत्मसात करे। उसके साथ समायोजन विकसित करे। कुछ वर्ष पहले गोरखपुर में बाढ़ का अध्ययन करने का अवसर मिला था। लोगों ने बताया कि पहले बाढ़ का पानी फैल कर पतली चादर जैसा बहता था। गांव ऊंचे स्थानों पर बसाए जाते थे और सुरक्षित रहते थे। खेतों में धान की ऐसी प्रजातियां लगाई जाती थीं जो बाढ़ में भी अच्छी उपज देती थीं। हमें बाढ़ के साथ जीने की पुरानी कला को अंगीकार करना होगा अन्यथा हम भीषण बाढ़ में डूब जाएंगे और भीषण सूखे में भूखे मरेंगे।

लेखक: भरत झुनझुनवाला।।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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आख़िर क्यों सरकारी स्कूल के इस बच्चे के शर्ट में लटकाया गया ताला?

यूपी के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले एक छात्र की एक तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। वायरल हो रही इस तस्वीर को देखने के बाद शायद आपको हंसी आ जाए लेकिन जब आप इस तस्वीर की सच्चाई जानेंगे तब आपकी आँखों में शायद आंसू आ जाएँ।

जी हाँ! दरअसल उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के एक सरकारी स्कूल में जब ये कक्षा 6 में पढ़ने वाला बच्चा अपनी शर्ट में बटन की जगह ताला लगा कर स्कूल पहुंचा तब वहां मौजूद अन्य बच्चे और अध्यापक उसे इस हालत में देखकर अपनी हंसी नहीं रोक पाए और वहीँ मौजूद एक अध्यापक ने उसकी तस्वीर खींच ली। लेकिन शायद किसी ने इसके पीछे की उसकी मजबूरी को नहीं समझा!

जहाँ तक हमें इस तस्वीर के बारे में सच्चाई पता चली है वो ये है कि इस बच्चे ने ऐसा अपने अध्यापक की डांट से बचने के लिए किया।

दरअसल यह बच्चा हर रोज यही शर्ट पहन कर स्कूल आता था, जिसमें टूटा हुआ था। इस कारण उसके अध्यापक ने उसे डांट लगाईं थी कि आगे से वो दूसरी शर्ट पहन कर आये या फिर इस शर्ट में बटन लगा कर आये। लेकिन शायद उस अध्यापक को उसकी मजबूरी का जरा भी अंदाजा नहीं था।

और फिर टीचर की डांट से बचने के लिए इस बच्चे ने ऐसा काम किया है। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले इस छात्र ने कुछ दिन पहले क्लास में उसकी शर्ट फट गई थी। खबरों के मुताबिक बच्चे का नाम शत्रुधन निषाद है और इसके पास सिर्फ एक ही शर्ट है जिसे पहन कर वो स्कूल आता है और टीचर की डांट की बाद वो अपनी फटी शर्ट को एक ताले और सेफ्टी पिन से फिक्स करके स्कूल आया।

इस बच्चे को स्कूल जाना बेहद ही पसंद है और इस बिना बटन वाले शर्ट में यह स्कूल जाना नहीं चाहता था। इसलिए छात्र ने एक तरीका ढूंढ़ा। उसने बटन की जगह ताला लगाकर अपनी शर्ट को बंद कर लिया।

सरकारी स्कूल में इसे यह ड्रेस कई साल पहले मिली थी। उसी ड्रेस को वह कई साल से पहनता आ रहा है। आप इसके ड्रेस की हालत देखकर ही पता लगा सकते हैं कि इस बच्चे की हालत क्या है। जगह-जगह इसकी शर्ट फटी हुई है और शर्ट के दो बटन भी टूट गए।

पत्रिका न्यूज़ से साभार 

बिहार में जंगलराज पार्ट 2: स्कूल मास्टर की बारह साल की बेटी ‘नैंसी’ के साथ जो हुआ, रूह काँप उठेगी।

मधुबनी। जिले के लौकही प्रखंड के अंधरामठ थाना क्षेत्र के महादेवमठ गांव निवासी कुमार रवींद्र झा की बारह वर्षीया पुत्री नैन्सी झा का शव शनिवार की रात महादेवमठ गांव स्थित तिलयुगा नदी से बरामद किया गया। शव मिलते ही महादेवमठ गांव के लोग निर्मली-कुनौली पथ को महादेवमठ के पास जाम कर डीएम व एसपी को स्वयं आ वार्ता करने की मांग के साथ हत्यारे की शीघ्र गिरफ्तारी की मांग करने लगे। ग्रामीण शव के साथ सड़क जाम कर रहे थे। बाद में एसडीओ व डीएसपी के साथ वार्ता के बाद जाम हटा दिया गया।

मालूम हो कि नैन्सी का अपहरण गत 25 मई को कर लिया गया था। इस घटना पर नैंसी के पिता कुमार रवींद्र झा द्वारा 25 मई को ही अंधरामठ थाना में अज्ञात के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई थी। नैन्सी के शव का पोस्टमार्टम के लिए शनिवार देर रात ही जिला मुख्यालय सदर अस्पताल भेज दिया गया। घटना को लेकर चौकसी के ख्याल से महादेवमठ सहित आसपास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है।

लोगों ने बताया कि लाश देखकर साफ़ पता चल रहा था कि दरिंदो ने पहले कुकर्म किया, फिर गला काटा, फिर लाश को जला कर नदी में फेंक दिया।

इस मामले में किसी की गिरफ्तारी की सूचना नहीं है। हालांकि अंधरामठ थाना पुलिस कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। थानाध्यक्ष राजीव कुमार ने बताया कि घटना का उछ्वेदन करने का पुलिस सार्थक प्रयास कर रही है। शीघ्र ही हत्यारे को पुलिस गिरफ्त में ले लिया जाएगा।

बिहार में जंगल राज: दुल्हन और परिवार की महिलाओं को थाने ले जाकर बेरहमी से पीटा

बिहार राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने ‘न्याय के साथ विकास’ की बात कर के जनता का विश्वास तो जरूर जीता; परन्तु शासन में, व्यवहार में या विचार में न न्याय दिखता है और न ही विकास। आखिर क्या हो गया है उस छवि को, जिसके लिए आप जाने जाते थे? आम जनमानस ने सुशासन जैसे न्यायप्रिय शब्द से आपको सम्मानित किया। फिर क्यों…न्याय की तो बात ही मत करिए; अन्याय अपने उच्चतम स्तर को पार कर नए रिकॉर्ड बना रहा है।

पुलिस रक्षक होती है लेकिन भक्षक का काम कर रही है। अमानवीय व्यवहार कर पुलिस प्रशासन जनता से लगातार दूर जा रही है। याद रहे लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था मे सत्ता को जनसेवा का सर्वोत्तम साधन मान गया है।

पूर्व के राजशाही व्यवस्था मे पुण्यप्रतापी राजा अपने आप को प्रजापालक मान कर शासन करते थे। परंतु जब राजा ही क्रूर और भोगी (200 साल अंग्रेज/800 साल मुस्लिम आक्रांता) बन अत्याचार करने लगे तब उनके जनघाती प्रवृत्ति और जनता की वेदना कोख से लोकतंत्र का जन्म हुआ । पुलिस जनता के सहयोग के लिए होनी चाहिए परन्तु पुलिस नित्य दिन जनता पर अमानवीय प्रयोग कर आपके सुसाशन की छवि को पैरों तले रौंदने का काम कर रही है| ऐसे पुलिस अधिकारी और इनके सहयोगियों को तत्काल प्रभाव से निलम्बित करना चाहिए और पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए।

जिस प्रकार से मुजफ्फरनगर में बिहार पुलिस ने पीड़ित लड़की सहित लड़की पक्ष के परिवार की महिलाओं और पुरुषों को बर्बरता पूर्वक मारा गया है यह संवैधानिक तो छोड़िए मानवीय मूल्यों को भी तार-तार करने वाला है।

पीड़ित लड़की के परिवार के लिए न्याय की व्यवस्था की जाए अन्यथा जागरूक ज़िम्मेदार जनता आंदोलन करने को मजबूर हो जाएगी|

अपने विचार जरूर प्रकट करें कि क्या शादी के दिन दुल्हन को उठा कर थाने में ले जाकर पुरुष पुलिस कर्मियों द्वारा रात भर पिटाई करना न्यायसंगत है? क्या यही सुशासन है? क्या यह जंगल राज नहीं है? आख़िर भारत के किस कानून और संविधान के द्वारा पुलिस कर्मियों को यह अधिकार दिया गया?

अभिषेक कुमार सिंह

छोटे शहर की लड़की का पीरियड्स

Nepalese Girls | Literature in India

पीरियड्स यानि उजले स्कर्ट में लग जाने वाले खून के धब्बों से होने वाली शर्मिंदगी, चार लड़कियों की उपाय निकालने वाली फुसफुसाहट ,घर के मर्दों से पैड को छुप- छुपाकर रखने से लेके यूज करने की कोशिश, पूजा ना करने से लेके दादी, बुआ,मर्दों को खाना- पानी ना देने की अनुमति वाली अशुद्धता।पीरियड्स यानि छूआआछूत,पूर्वाग्रह, घृणा और फिर कई सारी मिथ्याएं।

हमारे लिए पीरियड्स के मायने कुछ ऐसे ही रहे हैं। हम, कभी ना रूके, कभी ना झुके, आगे- आगे बढ़ते ही रहे – स्टे्फ्री वाली लड़की की तरह नहीं थे। हम उन छोटे शहर, कस्बों में रहने वाली लड़कियों में से थे जहां लड़कियों को पीरियड्स आते हैं तो उन्हें ऐसा एहसास कराया जाता है मानो वो उस नाली के पानी से भी ज्यादा गंदी हो। किसी बंद कमरे में कपड़ा या पैड थमा दिया जाता है और कुछ पूछने, कुछ आपत्ति जताने पर बस स्ससससससससस………..भैया, पापा को कुछ मत बताना कहकर चुप करा दिया जाता है। फिर भाई के साथ खेलना बंद- वो जिद्द करता है, क्या हुआ इसे, खेलने दो न। जवाब मिलता है- बड़ी हो गई है अपने उम्र के लड़कों के साथ खेलो।

Happy to Bleed | Literature in India

पापा के पैर दबाते हुए आपको अपने कमरे में जाने की हिदायत मिल जाती है। फिर पापा को कहा जाता है- वो बच्ची नहीं रही, पैर दबवाने की आदत छोड़ो, बेटे से दबवाया करो।

भाई के बार- बार पूछने पर कि बहन हमारे साथ पूजा में शामिल क्यों नहीं हो रही के सवाल पर वो नहाई नहीं है आज, जैसे बचकाने बहाने बनाकर आपको शर्मिंदगी महसूस करायी जाती है।

यूज की हुई पैड को किसी कोने में सबसे छुपाकर रखा करो। कितनी बार बताऊं कि पुरूषों की नज़र नहीं पड़नी चाहिए उस पर, नज़र पड़ जाने से उनकी आयु छिन्न हो जाती है। जब सुबह सभी सोए रहें तभी पैड फेंक दिया करो….जैसी ना जाने कितनी निराधार हिदायते मिलती हैं।
पर कुछ चीज़ें वैसी की वैसी ही रह जाती हैं। लड़कियों को ऐसी स्थिति में भी एक अच्छी डायट नहीं मिलती। उनके लिए दूध- घी जैसी चीज़ें नहीं होती। चर्बी हो जाने का डर होता है। फिर प्रेगनेंसी में प्रॉब्लम होगी। फल, ड्राई फ्रूट्स वगैरह तो लड़कों के खाने की चीज़े हैं। वो बाहर खेलते- कूदते हैं, लड़कियों का क्या घर में ही तो रहना है। मैंने अक्सर लड़कियों को इन दिनों में बेहोश होते, दर्द से कलपते ,रोते देखा है।

Bleed Village | Literature in India

घर में चार बहने हों तो पैड का खर्च एक मिडल क्लास फैमिली कैसे उठाएगी? वैसे भी कपड़ों से काम चल ही जाता है। फिर वो कैसे भी कपड़े हों….चार दिन की ही तो बात है। वैसे भी साफ- सफाई सदियों से चली आ रही मिथ्याओं के आगे कुछ मायने नहीं रखती। पैड को लेकर कई मिथ्याएं गांव- घर में प्रचलित है। आप गांव जाएंगे तब हैरानी होगी यह देखकर की माहवारी को लेकर जागरूकता की कितनी कमी है वहां। काले- ऊजले पॉलिथिन में पैड देने और मंदिर में प्रवेश की लड़ाईयों के इतर इनकी दुनिया हमारी दुनिया से कितनी पिछड़ी है।

मैंने देखा है महावारी वाली लड़कियों को अपने यूज किए हुए कपड़ों को धोकर – सुखाते हुए। गंदी जगहों पर कपड़ों को सुखाने के बाद वापस उनका इस्तेमाल करते। अधिकतर गरीबी में ऐसा करने पर विवश हैं मगर कुछ ऐसी भी हैं जिन्हें लगता है पैड यूज करना हराम है। पैड यूज करने से औरतें प्रेगनेंट नहीं हो पाती जैसी चीज़ें भी सुनने को मिलती हैं। कभी- कभी उनकी प्रतिक्रियाएं हास्यास्पद लग सकती हैं मगर हमें उन पर हंसने की बजाय खुद पर हंसना चाहिए कि हमने अपने स्तर पर क्या कोशिश की थी ? हमने क्या कोशिश की थी पीरियड्स से जुड़े टैबू से लड़ने की?
मैंने की थी। उस टैबू से लड़ने की जिसे दूर करने में अभी भी दशक लगेंगे। पीरियड्स में मैं अशुद्द होती हूं, यह वाली बात जमती नहीं थी मुझे। पूजा ना करने का लॉजिक समझ नहीं आता था इसलिए पीरियड्स के बारे में किसी को बिना कुछ बताए मैं पूजा करती थी। कभी- कभी मां को पता चलता तो वह खूब पिटाई करतीं। मगर मैं बाज़ नहीं आती। घर में हंगामा बढ़ता ही गया। मैं बहस करती कि क्यों ना करूं पूजा? नहाया तो है मैंने। मुझे उतना ही कोसा जाता। भगवान के सामने कान पकड़ के माफी मांगने, सर पटकने तक को कहा जाता। पाप हो गया है, लड़की है, माफ कर दीजिए ऐसी बातें मां भगवान को बोलती। मां का भी दोष नहीं था। वो तो वही कर रही थी जो उसे सिखाया गया था बचपन में। पर उसकी बेटी जिद्दी थी। मान ही नहीं रही थी। मां भी परेशान थी, डर रही थी कि कहीं पाप न लगे। रोज की खिच- खिच, डांट, मारपीट से आखिरकार मैंने पूजा करना छोड़ ही दिया।

Happy to Bleed Village | Literature in India

अब मैं पीरियड्स के दिनों में पूजा नहीं करती। आम दिनों में भी नहीं करती। मगर दोस्तों के कहने पर पीरियड्स में मंदिर जरूर चली जाती हूं। हां, वहां मां नहीं है न, घरवाले नहीं है, मगर देखो न कितना अनोखा है सबकुछ। जिसने अपने परिवार की मानसिकता के सामने हार मान लिया आज वो तुमसे बदलाव की उम्मीद लगाए बैठी है। यही विरोधाभास है, यही तो हास्यास्पद है। इस पर हंस लेना मगर उसके पहले मेरी कि कोशिश को नज़रअंदाज मत करना। कोई ऐसी कोशिश , ऐसा संघर्ष करता दिखे तो उसका बस साथ देना, तुम लड़की हो और आर्थिक रूप से सक्षम हो तो किसी गरीब व्यस्क लड़की को एक पैड गिफ्ट करना क्योंकि सरकार भी पितृसत्ता से ग्रसित है। कई साल लगेंगे सैनिटरी पैड्स को टैक्स फ्री करने में इसलिए अपनी कोशिश बरकरार रखना। याद रहे तुम एक लड़की को हैप्पी मेन्सट्रुएशन वाली फील दे सकती हो।

प्रेरणा शर्मा

ये लेख, Youth Ki Awaaz द्वार शुरु किए गए अभियान #IAmNotDown का हिस्सा है। इस अभियान का मकसद माहवारी से जुड़े स्वच्छता मिथकों पर बात करना है।

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एक गाँव जो 190 साल से है वीरान

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जैसलमेर के पश्चिम में 18 किलोमीटर दूर कुलधरा नाम का एक ऐसा गाँव है जहाँ क़रीब दो शताब्दियों से मरघट जैसी शांति है.

रात की बात तो दूर दिन में भी कोई अकेला इंसान खंडहर बन चुके घरों में घुसने से डरता है.

ऐसी मान्यता है कि पालीवाल ब्राह्मणों ने कुलधरा और जैसलमेर के चारों और 120 किलोमीटर इलाक़े में फैले 83 अन्य गांवों को लगभग 500 सालों तक आबाद किया था.

इन पालीवाल ब्राह्मणों ने 1825 में गाँव छोड़ते समय शाप दिया था कि इस जगह जो भी बसेगा नष्ट हो जाएगा.

पालीवालों के 5,000 परिवारों ने उस समय के जैसलमेर रियासत के दीवान सालिम सिंह के अत्याचारों से परेशान होकर गाँव छोड़ा.

सालिम सिंह ने दो जैसलमेर राजाओं मूलराज और गज सिंह के समय दीवान के तौर पर काम किया. सालिम सिंह ने पालीवालों के करों और लगान में इतनी बढ़ोतरी कर दी कि उनका व्यापार और खेती करना मुश्किल हो गया.

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ब्रिटिश राज्य के राजस्थान में राजनीतिक नुमाइंदे जेम्स टॉड ने पालीवालों के कुलधरा छोड़ने के बारे में लिखा है.

कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी किताब ‘ऐनल्स एंड एंटिक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान’ में लिखा है कि सालिम सिंह के अत्याचारों की वजह से ‘यह पैसे वाला समाज लगभग स्व निर्वासन में है और बैंकर्स अपनी मेहनत के मुनाफे के साथ घर लौटने को डरते हैं’.

टॉड ब्रिटिश साम्राज्य से चाहते थे वो सालिम सिंह के कुशासन की वजह से जैसलमेर रियासत से अपनी संधि तोड़े.

1818 की संधि सुनिश्चित करती थी कि ब्रिटिश सेना जैसलमेर को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखेगी. टॉड यह भी लिखते हैं कि ‘सालिम सिंह ने साजिश के तहत पालीवालों की सम्पत्ति को कम किया’.

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वो कहते हैं कि गज सिंह के पहले दो साल के शासन (1820-21) में ही 14 लाख रुपये की सम्पत्ति अर्जित की गई.

पालीवाल ब्राह्मण उस समय की सिंध रियासत (अब पाकिस्तान में) और दूसरे देशों से पुराने सिल्क रूट से अनाज, अफीम, नील, हाथी दांत के बने आभूषण और सूखे मेवों का ऊँटों के कारवां पर व्यापार करते थे. इसके अलावा वे कुशल किसान और पशुपालक थे.

जैसलमेर पर दो पुस्तकें लिखने वाले स्थानीय इतिहासकार नन्द किशोर शर्मा कहते हैं, ‘पालीवाल सिंह के अत्याचारों से दुखी थे लेकिन अपने गाँवों को छोड़ने का फैसला उन्होंने तब किया जब सालिम सिंह ने उनकी एक लड़की पर बुरी नज़र डाली. सिंह की पहले से सात बीवियां थीं.’

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नन्द किशोर शर्मा जैसलमेर में दो सांस्कृतिक संग्रहालय चलाते हैं.

उन्होंने अपनी किताब ‘जैसलमेर, दि गोल्डेन सिटी’ में लिखा है कि सालिम सिंह ने लड़की सौंपने के लिए पालीवालों को एक दिन का समय दिया जिस पर पालीवाल बहुत गुस्सा थे. उन्होंने काठोरी गाँव में पंचायत की और जैसलमेर छोड़ने का फैसला किया.

राजस्थान पुरातत्व विभाग के दस्तावेज़ भी शर्मा के कथन की पुष्टि करते हुए प्रतीत होते हैं, “कालचक्र का एक और प्रतिकूल दौर आया और ब्राह्मण समाज को तत्कालीन जैसलमेर रियासत से मजबूर होकर अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए सन 1825 में सभी आबाद गांवों को एक ही दिन में छोड़ना पड़ा.”

ऐसा माना जाता है की पालीवाल जैसलमेर से निकलकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में बस गए. उन्होंने जो गाँव छोड़े उनमें से अधिकतर कुछ नए नामों के साथ फिर से आबाद हो गए.

लेकिन कुलधरा और कुछ हद तक खाबा (इसके एक हिस्से में पाकिस्तान से विस्थापित हिन्दू रहते हैं) आज तक वीरान हैं.

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दो दशक पहले राजस्थान सरकार ने उस समय कुलधरा और खाबा को अपने अधिकार में ले लिया जब तीन विदेशी पर्यटक कुलधरा में गुप्त खजानों की खोज करते हुए पकड़े गए. भारतीय पुरातत्व विभाग ने दोनों स्थानों को संरक्षित स्मारक घोषित किया है.

एक गैर सरकारी संस्थान जैसलमेर विकास समिति, जिसके अध्यक्ष जैसलमेर के ज़िलाधिकारी हैं, कुलधरा और खाबा की देखरेख राजस्थान पुरातत्व विभाग के साथ मिलकर करती है.

कुलधरा में 600 से अधिक घरों के अवशेष, एक मंदिर, एक दर्जन कुएं, एक बावली, चार तालाब और आधा दर्जन छतरियां हैं. घरों के अन्दर के हिस्सों में पालीवालों ने तहखाने बनाये थे जहाँ संभवत वे अपने आभूषण, नकदी और अन्य कीमती सामान रखते होंगे.

पारानोर्मल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के गौरव तिवारी जो 17 से ज़्यादा बार कुलधरा और खाबा जा चुके हैं, बताते हैं कि उन्होंने वहां अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर आत्माओं की उपस्थिति दर्ज की. लेकिन जैसलमेर विकास समिति के द्वारपाल पद्माराम इसका ज़ोरदार खंडन करते हैं.

राजस्थान सरकार ने कुलधरा की इमारतों के नवीनीकरण और मरम्मत के लिए 4 करोड़ रुपये दिए हैं.

(बीबीसी हिन्दी)