हिंदी साहित्य: आदिकाल

हिंदी साहित्य: आदिकाल

आदिकाल सन 1000 से 1325 तक

हिंदी साहित्य के इस युग को यह नाम डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे वीर-गाथा काल नाम दिया है। इस काल की समय के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखने वाले मिश्र बंधुओं ने इसका नाम प्रारंभिक काल किया और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बीजवपन काल। डॉ॰ रामकुमार वर्मा ने इस काल की प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर इसको चारण-काल कहा है और राहुल संकृत्यायन ने सिद्ध-सामंत काल।

इस समय का साहित्य मुख्यतः चार रूपों में मिलता है :

1. सिद्ध और नाथ साहित्य
2. जैन साहित्य
3. चारणी-साहित्य
4. प्रकीर्णक साहित्य

सिद्ध और नाथ साहित्य

यह साहित्य उस समय लिखा गया जब हिंदी अपभ्रंश से आधुनिक हिंदी की ओर विकसित हो रही थी। बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी उस समय सिद्ध कहलाते थे। इनकी संख्या चौरासी मानी गई है। सरहपा (सरोजपाद अथवा सरोजभद्र) प्रथम सिद्ध माने गए हैं। इसके अतिरिक्त शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा, कुक्कुरिपा आदि सिद्ध सहित्य के प्रमुख् कवि है। ये कवि अपनी वाणी का प्रचार जन भाषा में करते थे। उनकी सहजिया प्रवृत्ति मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति को केंद्र में रखकर निर्धारित हुई थी। इस प्रवृत्ति ने एक प्रकार की स्वच्छंदता को जन्म दिया जिसकी प्रतिक्रिया में नाथ संप्रदाय शुरू हुआ। नाथ-साधु हठयोग पर विशेष बल देते थे। वे योग मार्गी थे। वे निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे। तथाकथित नीची जातियों के लोगों में से कई पहुंचे हुए सिद्ध एवं नाथ हुए हैं। नाथ-संप्रदाय में गोरखनाथ सबसे महत्वपूर्ण थे। आपकी कई रचनाएं प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त चौरन्गीनाथ, गोपीचन्द, भरथरी आदि नाथ पन्थ के प्रमुख कवि है। इस समय की रचनाएं साधारणतः दोहों अथवा पदों में प्राप्त होती हैं, कभी-कभी चौपाई का भी प्रयोग मिलता है। परवर्ती संत-साहित्य पर सिध्दों और विशेषकर नाथों का गहरा प्रभाव पड़ा है।

जैन साहित्य

अपभ्रंश की जैन-साहित्य परंपरा हिंदी में भी विकसित हुई है। बड़े-बड़े प्रबंधकाव्यों के उपरांत लघु खंड-काव्य तथा मुक्तक रचनाएं भी जैन-साहित्य के अंतर्गत आती हैं। स्वयंभू का पउम-चरिउ वास्तव में राम-कथा ही है। स्वयंभू, पुष्पदंत, धनपाल आदि उस समय के प्रख्यात कवि हैं। गुजरात के प्रसिध्द जैनाचार्य हेमचंद्र भी लगभग इसी समय के हैं। जैनों का संबंध राजस्थान तथा गुजरात से विशेष रहा है, इसीलिए अनेक जैन कवियों की भाषा प्राचीन राजस्थानी रही है, जिससे अर्वाचीन राजस्थानी एवं गुजराती का विकास हुआ है। सूरियों के लिखे राम-ग्रंथ भी इसी भाषा में उपलब्ध हैं।

चारणी-साहित्य

इसके अंतर्गत चारण के उपरांत ब्रह्मभट्ट और अन्य बंदीजन कवि भी आते हैं। सौराष्ट्र, गुजरात और पश्चिमी राजस्थान में चारणों का, तथा ब्रज-प्रदेश, दिल्ली तथा पूर्वी राजस्थान में भट्टों का प्राधान्य रहा था। चारणों की भाषा साधारणतः राजस्थानी रही है और भट्टों की ब्रज। इन भाषाओं को डिंगल और पिंगल नाम भी मिले हैं। ये कवि प्रायः राजाओं के दरबारों में रहकर उनकी प्रशस्ति किया करते थे। अपने आश्रयदाता राजाओं की अतिरंजित प्रशंसा करते थे। श्रृंगार और वीर उनके मुख्य रस थे। इस समय की प्रख्यात रचनाओं में चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो, दलपति कृत खुमाण-रासो, नरपति-नाल्ह कृत बीसलदेव रासो, जगनिक कृत आल्ह खंड वगैरह मुख्य हैं। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण पृथ्वीराज रासो है। इन सब ग्रंथों के बारे में आज यह सिद्ध हुआ है कि उनके कई अंश क्षेपक हैं।

प्रकीर्णक साहित्य

खड़ी बोली के आदि-कवि अमीर खुसरो इसी समय हुए है। खुसरो की पहेलियां और मुकरियां प्रख्यात हैं। मैथिल-कोकिल विद्यापति भी इसी समय के अंतर्गत हुए हैं। विद्यापति के मधुर पदों के कारण इन्हें ‘अभिनव जयदेव’ भी कहा जाता है। मैथिली और अवहट्ट में भी इनकी रचनाएं मिलती हैं। इनकी पदावली का मुख्य रस श्रृंगार माना गया है। अब्दुल रहमान कृत ‘संदेश रासक’ भी इसी समय की एक सुंदर रचना है। इस छोटे से प्रेम-संदेश-काव्य की भाषा अपभ्रंश से अत्यधिक प्रभावित होने से कुछ विद्वान इसको हिंदी की रचना न मानकर अपभ्रंश की रचना मानते हैं।

आश्रयदाताओं की अतिरंजित प्रशंसाएं, युध्दों का सुंदर वर्णन, श्रृंगार-मिश्रित वीररस का आलेखन वगैरह इस साहित्य की प्रमुख विशेषताएं हैं। इस्लाम का भारत में प्रवेश हो चुका था। देशी रजवाड़े परस्पर कलह में व्यस्त थे। सब एक साथ मिलकर मुसलमानों के साथ लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि अलग-अलग सबको हराकर मुसलमान यहीं स्थिर हो गए। दिल्ली की गद्दी उन्होंने प्राप्त कर ली और क्रमशः उनके राज्य का विस्तार बढ़ने लगा। तत्कालीन कविता पर इस स्थिति का प्रभाव देखा जा सकता है।

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हिंदी साहित्य का इतिहास काल विभाजन

हिंदी साहित्य का इतिहास एवं काल विभाजन

साहित्य के इतिहास

साहित्य के इतिहास का अध्ययन विविध समयों की परिस्थितियों और प्रवृत्तियो के आधार पर किया जाता है इसलिए काल विभाजन की प्रक्रिया द्वारा प्रत्येक काल की सीमा का निर्धारण किया जाता है. विभिन्न युगों में साहित्यिक प्रवृत्तियों की शुरुआत, उनका उतार चढाव उनकी सीमा का निर्धारण करती हैं परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी काल विशेष में जो प्रवृत्तियाँ है, वे एकदम खत्म हो जाती है या उनमे एकदम परिवर्तन आ जाता है. काल विशेष में चलने वाली प्रवृत्तियाँ  कमोबेश होती हुयी विलुप्त होने लगती हैं. और अन्य प्रवृत्तियाँ मुख्य रूप धारण करने लगती हैं.

हिंदी साहित्य के आरम्भकाल को स्थिर करने की समस्या सदा से रही है. काल-सीमा-निर्धारण के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है. एक ओर जार्ज ग्रियर्सन, मिश्रबंधु, रामकुमार वर्मा आदि इतिहासकार अपभ्रंश भाषा के उत्तरवर्ती रूप को हिंदी का आदिम रूप मानकर उसकी शुरुआत संवत 700 से मानते है. जार्ज ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्य का क्षेत्र भाषा की दृष्टि से निर्धारित किया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि हिंदी साहित्य में न तो संस्कृत प्राकृत को और न ही अरबी फारसी मिश्रित उर्दू को समाहित किया जा सकता है.

डॉ० रामकुमार वर्मा ने इस काल को संधि काल नाम से अभिहित किया है. राहुल सांकृत्यायन इस काल को सिद्धकाल कहते हुए यह मानते हैं कि सिद्ध काव्य हिंदी का काव्य है. दूसरी ओर आचार्य रामचद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व उनके समर्थक इतिहास लेखक संवत 1000 के आस-पास वास्तविक हिंदी भाषा व साहित्य की शुरुआत मानते हैं. एक सामान्य विचारधारा के अनुसार 7वीं से 10वीं शताब्दी तक जो साहित्य सामग्री उपलब्ध होती है, उसे अंकुरण काल की रचनाएँ मानते हुए हिंदी साहित्य की पूर्वपीठिका मान लिया जाये. इसमें जैन, नाथ, व सिद्ध साहित्य को समाहित किया गया है. 10वीं शताब्दी से हिंदी साहित्य के आदिकाल की शुरुआत मानी गयी है.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पहली बार हिंदी साहित्य के इतिहास का कालगत एवं प्रवृत्तिगत दोनों रूपों में वर्गीकरण किया. सम्पूर्ण हिंदी साहित्य को तीन भागों में विभक्त कर उसकी सीमा का निर्धारण किया- आदिकाल (विक्रमी संवत 1050 से 1375 तक), मध्यकाल (विक्रमी संवत 1375 से 1900 तक), आधुनिक काल ( विक्रमी संवत 1900 से अब तक ). प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने साहित्य को 4 भागों में विभक्त किया – आदिकाल को वीरगाथा काल नाम दिया. मध्यकाल को दो भागों में विभक्त किया- पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल, उन्हें भक्तिकाल और रीतिकाल नाम दिया. आधुनिक काल को गद्यकाल नाम दिया.

11वीं शती तक अपभ्रंश के प्रभाव से हिंदी मुक्त हो चुकी थी. उसके बाद व्यापक रूप में भक्ति का आन्दोलन पूरे देश में आरम्भ हो गया और हिंदी के विविध रूपों के माध्यम से भक्तिकाव्य लिखा जाने लगा. सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना के रूप में यह एक नये युग का आरम्भ था. 17वीं शती तक आते-आते जब देश में मुगलों का साम्राज्य आया तब साहित्य की मुख्य प्रवृत्ति में भी परिवर्तन आया. भक्तिभावना की प्रधानता के स्थान पर श्रृंगार व अलंकरण की प्रवृत्ति मुख्य रूप ग्रहण करने लगी. 19वीं शती के मध्य में जब देश में अंग्रेजों का राज्य स्थापित हुआ तब सन 1857 की क्रांति ने राष्ट्रीय चेतना व राजनीतिक जागरण के क्षेत्र में आन्दोलन का रूप ले लिया.

यह आधुनिक युग का आरम्भ था. लोगों में भाग्यवाद और अकर्मण्यता की भावना लुप्त होने लगी. देश को राजनीतिक व सामाजिक रूप में स्वतंत्र कराने की इच्छा बलवती हो गई. अंग्रेजों के आने से देश में ज्ञान-विज्ञान व विदेशी सभ्यता का प्रसार होने लगा. देशी व विदेशी संस्कृतियों में संघर्ष होने लगा. अनेक परिवर्तन लक्षित हुए और आधुनिक नवजागरण प्रकाश में आया. नवजागरण की चेतना से साहित्यिक विषयों में परिवर्तन होने लगा, राष्ट्रीयता की भावना जन-जन को आंदोलित करने लगी. स्वराज्य की भावना बलवती हो गयी, जीवन के सभी क्षेत्रों में नैतिक सुधार की आवश्यकता महसूस होने लगी. व्यक्ति आत्म परीक्षण कर आत्म सुधार की भावना से भर उठा. यथार्थवादी सामाजिक चेतना का प्रादुर्भाव हुआ. यह आधुनिक युग का सूत्रपात था. इस प्रकार हम हिंदी साहित्य के इतिहास को चार कालों में विभक्त कर सकते हैं-

आदिकाल – संवत 1050 से 1375 तक

भक्तिकाल – संवत 1375 से 1700 तक

रीतिकाल – संवत 1700 से 1900 तक

आधुनिक काल – संवत 1900 से अब तक

साहित्य में किसी भी काल की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का सहज ही प्रतिफलन होता है. युगीन परिस्थितियों के अनुसार साहित्यिक प्रवृत्तियाँ परिवर्तित होने लगती हैं. इस आधार पर उनका कालविभाजन होता है और तदनुरूप नामकरण किया जाता है. एक काल में जिस प्रवृत्ति की अधिकांश रचनाएँ उपलब्ध होती हैं उनको विशेष रूप से ध्यान में रखा जाता है परन्तु इसका अर्थ नहीं कि इस प्रवृत्ति के अतिरिक्त अन्य कोई प्रवृत्ति साहित्य में उपलब्ध नहीं होती, उसका चित्रण नहीं मिलता. एक ही काल में अनेक प्रवृत्तियाँ प्रचलित रहती हैं. प्रधानता व व्यापकता के आधार पर सीमा निर्धारण व नामकरण किया जाट है. किसी भी युग का नामकरण उसकी मूल साहित्यिक चेतना, साहित्यिक प्रवृत्ति के अनुरूप ही होना चाहिए. इसके अतिरिक्त किसी राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रवृत्ति को भी आधार बनाया जा सकता है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’में इस बात को स्पष्ट कर दिया है – “जिस कालखंड के भीतर किसी विशेष ढंग की रचनाओं की प्रचुरता दिखाई पड़ी है, वह एक अलग काल माना गया है और उसका नामकरण उन्हीं रचनाओं के स्वरुप के अनुसार किया गया है.”

हिंदी साहित्य के जन्म के समय देश की स्थिति शोचनीय थी, निरंतर विदेशी आक्रमण हो रहे थे. सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् उत्तर भारत की राजशक्ति नष्ट हो गयी. एक केन्द्रीय शक्ति के अभाव में अलग-अलग राजवंशों ने अपनी सत्ता के प्रसार के उद्देश्य से युद्ध किये. इस्लाम की शक्ति ने भी भारत पर अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया. महमूद गजनवी ने भारत पर 16 बार आक्रमण किया. धीरे-धीरे मुसलमान साम्राज्य की स्थापना हो गयी. राजनैतिक संघर्ष के साथ-साथ सामाजिक परिस्थितियां भी चिंताजनक थीं. चारण कवि अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा में जो यशोगान करते थे, वह साहित्य के रूप में प्रकाशित होता था. जिनमें वीरता का वर्णन होते हुए भी वह राष्ट्रीय भावना से रहित था. इस साहित्य में श्रृंगार रस का भी अंश मिलता है क्योकि चारण कवि जिन आश्रयदाताओं को युद्ध के लिए उत्साहित करते थे, उनके युद्धों का कारण कोई न कोई रमणी स्त्री होती थी जिसको पाने की प्रतिद्वंद्विता लगी रहती थी.

आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को वीरगाथा काल नाम देते हुए यह लक्षित किया कि इस काल में दो प्रकार की रचनाएँ मिलती हैं- अपभ्रंश की और देशभाषा की. अपभ्रंश की पुस्तकों में कई तो जैनों के धर्म तत्व निरूपण सम्बन्धी ग्रन्थ हैं जो साहित्य कोटि में नहीं आते और जिनका उल्लेख केवल यह दिखाने के लिए ही किया गया है की अपभ्रंश भाषा का व्यवहार कब से हो रहा था. साहित्यिक पुस्तकें केवल चार हैं- विजयपाल रासो, हम्मीर रासो, कीर्तिलता, कीर्तिपताका. देश भाषा काव्य की 8 पुस्तकें प्रसिद्ध हैं- खुमान रासो, बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो, जयचंद प्रकाश, जयमयंकजस चन्द्रिका, परमालरासो, खुसरो की पहेलियाँ और विद्यापति की पदावली. आचार्य शुक्ल का कहना है कि “इन्ही 12 पुस्तकों की दृष्टि से आदिकाल का लक्षण- निरूपण और नामकरण हो सकता है. इन पुस्तकों में से अंतिम दो और बीसलदेव रासो को छोड़कर शेष सब ग्रन्थ वीरगाथात्मक ही है अतः आदिकाल का नाम वीरगाथा काल ही रखा जा सकता है.

आचार्य शुक्ल को लगता है कि जब से मुसलमानों की चढाइयों का आरम्भ होता है तब से हम हिंदी साहित्य की प्रवृत्ति एक विशेष रूप से बंधती हुई पाते हैं. राजाश्रित कवि और चारण कवि जिस प्रकार नीति-श्रृंगार के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे राजाश्रित कवि अपने राजाओं के शौर्य, पराक्रम और प्रताप का वर्णन अनूठी उक्तियों के साथ किया करते थे और अपनी वीरोल्लास भरी कविताओं से वीरों को उत्साहित किया करते थे. इस वीरगाथा को हम दोनों रूपों में पाते हैं- मुक्तक के रूप में भी और प्रबंध के रूप में भी. यही प्रबंध परंपरा रासो के नाम से पाई जाती है. साहित्यिक प्रबंध के रूप जो सबसे प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध है, वह है पृथ्वीराज रासो. वीरगीत के रूप में हमें सबसे पुरानी पुस्तक बीसलदेव रासो मिलती है इसी को लक्ष्य कर इस काल को वीरगाथा काल कहा है.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब इस काल का नामकरण किया था, उस समय उस काल की अनेक रचनाएँ, ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध थी. जिन बारह रचनाओं को शुक्ल जी ने नामकरण का आधार बनाया, उनमे से कुछ संदिग्ध हैं, कुछ परवर्ती रचनाएँ हैं. इन रचनाओं के आधार पर इस काल की साहित्यिक प्रवृत्तियो की रूप रेखा स्पष्ट नहीं है. शुक्ल जी ने जिन जैन- सिद्ध नाथों की रचनाओं को धार्मिक प्रवृत्तियों के साथ साथ उच्च कोटि का कवित्व भी दृष्टिगत होता है जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती. कतिपय ग्रन्थों के आधार पर किसी काल विशेष का नामकरण नहीं किया जा सकता. इसलिए ‘वीरगाथा काल’ यह नाम एकांगी सिद्ध होता है.

डॉ० रामकुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य के आरंभिक काल को दो भागों में विभक्त कर उनका नामकरण संधिकाल और चारण काल किया है. संधिकाल के अंतर्गत उन्होंने सिद्धों व जैन कवियों की रचनाओं को समाहित किया है. चारण काल नाम वीरगाथाकाल की तरह चरित काव्यों का द्योतक है.

डॉ० वर्मा ने एक ही कालखंड के दो नाम निश्चित किये हैं. संधिकाल से दो भाषाओ- अपभ्रंश और हिंदी की संधि का बोध होता है. किसी एक कालखंड को दो नाम देना दो भिन्न कालों का ज्ञान कराता है. जिस सामग्री के आधार पर चारण काल नाम दिया गया है, वह सामग्री पर्याप्त व प्रामाणिक नहीं है.

राहुल सांकृत्यायन ने इस काल को सिद्ध सामंत काल कहा है और समय आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक माना है. वस्तुतः यह नाम दो काव्यधाराओं को स्पष्ट करता है. सिद्धों व सामंतों की रचनाएँ. साहित्य के किसी भी कालखंड का नामकरण उसकी प्रमुख प्रवृत्ति के आधार पर किया जाता है. सामंत कहने से हमारा ध्यान चारण साहित्य की ओर ही जाता है जो सर्वथा प्रमाणिक नहीं है.

चंद्रधर शर्मा गुलेरी और डॉ० धीरेन्द्र वर्मा इस काल को अपभ्रंश काल कहते हैं. उनके द्वारा रखा गया यह नाम भाषा की प्रधानता पर आधारित है जबकि साहित्य के किसी काल का नामकरण उस काल की विशेष साहित्यिक प्रवृत्तियो या वर्णित प्रतिपाद्य विषय के आधार पर होना चाहिए. अपभ्रंश काल कहने से यह भ्रम भी होता है कि यहाँ हिंदी नहीं, अपभ्रंश भाषा की बात की जा रही है. इस प्रकार यह नाम भ्रामक सिद्ध होता है.

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इस काल को आदिकाल कहना उचित समझते हैं. यह नामकरण भी यह भ्रम उत्पन्न करता है की हिंदी साहित्य की परम्पराएँ, काव्य रूढ़ियाँ इस काल में नवीन रूप में सामने आईं जबकि पूर्ववर्ती परम्पराएँ बहुत पुष्ट रूप में इस काल में दृष्टिगत होती है.

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इस काल को बीजवपन काल के नाम से पुकारा है . कुछ विद्वानों ने इस काल को प्रारंभिक काल, आविर्भाव काल भी कहा है. ये नाम वास्तव में ‘आदिकाल’ नाम में ही समाहित हो जाते हैं. इस प्रकार सामान्यतः इस कालखंड को आदिकाल के नाम से जाना जाता है.

भक्तिकाल के सीमा निर्धारण और नामकरण के विषय में विद्वानों में प्रायः कोई विवाद नहीं है. देश में गौरव और गर्व को ठेस पहुँची क्योकि उनके सामने ही मंदिरों को नष्ट किया जा रहा था, लूटा जा रहा था, महापुरुषों का अपमान हो रहा था. जब मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हुआ तब हिन्दू जाति के  जनता का आत्मगौरव और आत्मविश्वास डगमगाने लगा, उसे अपने पौरुष पर गर्व नहीं रहा. जनता उदास और हताश हो गयी . ऐसी स्थिति में उसका ध्यान भगवान की शक्ति और करुणा पर गया. भक्त कवियो ने जनता के ह्रदय में भक्ति का संचार किया. उन्होंने ईश्वर के प्रेमस्वरूप का वर्णन करते हुए हिन्दू-मुसलमानों के आपसी भेद-भाव को समाप्त करने की कोशिश की और मानव को मानव के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया. एक ओर रामानुजाचार्य ने जिस सगुण भक्ति का निरूपण किया था, उनकी शिष्य परंपरा में स्वामी रामानंद जी ने विष्णु के अवतार श्रीराम की उपासना पर बल दिया, दूसरी ओर वल्लभाचार्य जी ने श्रीकृष्ण के प्रेममय रूप से जनता को मुग्ध किया. इस प्रकार राम व कृष्ण के प्रति समर्पित भक्त कवियों की परम्पराएँ चलने लगीं. यह सगुण काव्यधारा थी जिसका विशाल साहित्य इस काल में उपलब्ध होता है.

मुसलमानों का राज्य स्थापित हो जाने पर देश में नई परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगी. एक ऐसे भक्तिमार्ग का भी विकास होने लगा जिसने हिन्दू – मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने का प्रयास किया, एकेश्वरवाद का प्रचलन प्रारम्भ हुआ जिसमें एक ओर कबीर आदि कवियों ने निराकार ईश्वर के प्रति अपनी हार्दिक भावनाएं व्यक्त की . वो ईश्वर कण-कण में विद्यमान है इसलिए ऊँच-नीच व जाति-पाति का कोई भेद-भाव नहीं, कोई अलगावनहीं. मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की भावना प्रबल हुई. ज्ञान पर विशेष बल दिया गया. इसी के साथ प्रेम तत्व को प्रधानता देने वाले ईश्वर की भक्ति की ओर उन्मुख सूफियों का एक वर्ग सामने आया जिन्होंने स्वयं मुसलमान होते हुए भी हिन्दुओं के घरों की प्रेमकहानियों को अपने काव्य का प्रतिपाद्य बनाया. लौकिक प्रेम के माध्यम से उस अलौकिक अव्यक्त सत्ता से मिलने की कल्पना की. मनुष्य के साथ –साथ प्रकृति का भी योगदान स्पष्ट किया जो मनुष्य के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करती है. पेड़-पौधे भी मानव की ख़ुशी व गम में उसके साथ होते है, पशु-पक्षी भी मानव की भावनाओं के साथ प्रभावित होते है. उसका सन्देश तक पहुँचा देते हैं.

इन सबके कारण भक्ति व मानवता की सामान्य भावना का विकास हुआ, जाति-पाति का भेदभाव समाप्त करने का प्रयास हुआ, लोगो में आत्मगौरव का भाव जागृत हुआ, भक्ति के उच्च सोपान की ओर बढ़ते हुए जीवन में कर्म, ज्ञान और भक्ति का सूत्रपात हुआ. अनेक संत कवि व सूफी कवि उत्कृष्ट काव्य रचना करने लगे. आचार्य शुक्ल लिखते हैं- “सूफी कवियों ने मुसलमान होकर हिन्दुओं की कहानियाँ हिन्दुओ की ही बोली में पूरी सहृदयता से कहकर उनके जीवन की मर्मस्पर्शिनी अवस्थाओं के साथ अपने उदार ह्रदय का पूर्ण सामंजस्य दिखा दिया. कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत होती हुयी परोक्ष सत्ता की एकता का आभास दिया था. प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी थी. यह जायसी द्वारा पूरी हुई.

इस प्रकार सगुण व निर्गुण दो वर्ग बन गए. एक ओर तुलसीदास ने राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप को जनता के समक्ष प्रस्तुत किया. अपने सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ रामचरितमानस के माध्यम से लोगों के सामने जीवन की विविध परिस्थितियों व समस्याओं को सामने रखा, साथ ही उनके समाधान का संकेत भी दिया. राम के आदर्श रूप को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी. उनके सत-चित आनंद स्वरुप ने लोगों के ह्रदय को स्पर्श किया. तुलसीदास जी के विषय में आचार्य शुक्ल का कथन है- “भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि यदि किसी को कह सकते हैं तो वह तुलसीदास जी को और कवि जीवन का कोई एक पक्ष लेकर चले हैं. जैसे- वीरकाल के कवि उत्साह को, भक्तिकाल के दूसरे कवि प्रेम और ज्ञान को. अलंकार काल के कवि दाम्पत्य या श्रृंगार को पर इनकी वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे भावों और व्यवहारों तक है. एक ओर तो वह व्यक्तिगत साधना के मार्ग में विरागपूर्ण शुद्ध भगवदभक्ति का उपदेश देती है, दूसरी ओर लोकपक्ष में आकर पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों का सौन्दर्य दिखाकर मुग्ध करती है. व्यक्तिगत साधना के साथ ही साथ लोकधर्म की अत्यंत उज्ज्वल छटा उसमें वर्तमान है. दूसरी ओर कृष्ण के प्रेमस्वरूप ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया.

निर्गुण धारा के प्रवर्तक कबीरदास हुए जिन्होंने हिन्दू- मुसलमान के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया. बहु देवोपासना, मूर्तिपूजा का विरोध किया, साथ ही मुसलमानों के रोजा नमाज़ आदि की निस्सारता को भी दिखाया. दोनों जातियों के कट्टरपन को दूर करने का प्रयास किया. ईश्वर –प्रेम की शुद्ध भावना और व्यक्तिगत सात्विक जीवन पर विशेष बाल दिया. देश में भक्तिकाव्य की दो शाखाएं – निर्गुण व सगुण समानान्तर रूप में चली. निर्गुण धरा की दो शाखाएं हुईं- संत काव्य और सुफिकव्य. सगुण काव्यधारा भी दो शाखाओं में विभक्त हुयी- रामकाव्यधारा और कृष्णकाव्यधारा. इन सभी धाराओं ने लोगों की आचरण की शुद्धता पर बल देते हुए उनके अन्दर आत्मगौरव का भाव जागृत किया. इन कवियों ने मन-वचन-कर्म की सरलता और समानता को भक्ति का श्रेष्ठ व सरल लक्षण बताया. इस काल में आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति के विषयों को लेकर काव्य रचना होती रही. भक्तिकाल में हिंदी साहित्य अपनी पूर्ण प्रौढ़ता को प्राप्त कर चुका था इसलिए इस युग को ‘हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल’ भी कहा जाता है.

भक्तिकाल के बाद रीतिकाल में लक्षणग्रन्थोंकी प्रचुरता होने लगी. ‘रीति’ शब्द का प्रयोग संस्कृत काव्यशास्त्र में रीति संप्रदाय से जुड़ा है जहाँ रीति को काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार किया गया परन्तु हिंदी में इस शब्द का प्रयोग काव्य लेखन की परंपरागत परंपरा और रुढ़ि के रूप में किया गया.

रीतिकाल का रचनाकाल मुग़ल सम्राट औरंगजेब के शासन के साथ आरम्भ होता है. औरंगजेब के शासनकाल में मुग़ल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया था. इन शासकों में विलासी मनोवृत्ति विशेष रूप से मिलती है. मुसलमान सम्राटों के समान तत्कालीन सामंतो, नबाबों और हिन्दू राजाओं ने भी ऐश्वर्यमय विलासी जीवन बिताना आरंभ कर दिया था. धार्मिक क्षेत्र में भी संत कवियों का सुधारवादी आन्दोलन शिथिल पड़ गया था. सगुणोपासक भक्त कवियों की धार्मिक भावना में अब श्रृंगारी मनोवृत्ति ने प्रवेश कर लिया था. कृष्ण भक्त कवियों ने राधा और कृष्ण की प्रेम क्रीडाओं का चित्रण करके अलौकिक प्रेम की जो धारा बहाई थी, वह धीरे-धीरे लौकिक श्रृंगार में परिणत हो रही थी. भक्तिकाल के कवियों ने लोगों के मन में संसार से विरक्त होने का भाव जागृत करने की अतिशय कोशिश की जिससे मानव मन कुण्ठित होने लगा. इसी की प्रतिक्रिया स्वरुप भक्ति के साथ-साथ भोग की भावना प्रकट होने लगी जिससे रीतिकाल में श्रृंगार, भक्ति व नीतिपरक काव्य की रचना होने लगी. राधा और कृष्ण को सामान्य नायक-नायिका के रूप में चित्रित कर आध्यात्मिकता के स्थान पर भौतिकता प्रकट होने लगी. काव्य में रस- निरूपण व अलंकार निरूपण की शुरुआत हो गयी. कवियों ने एक यह एक परिपाटी बना ली कि वे अलंकार या रस का लक्षण देकर उदाहरण रूप में अपनी सरस कविताएँ प्रस्तुत करने लगे. अधिकतर कविताएँ श्रृंगार रस की होती थी.

इस काल के नामकरण के विषय में विद्वानों में मतभेद है. शुक्ल जी ने रीति परंपरा को ध्यान में रखते हुए रीतिकाल नाम दिया. डॉ० भागीरथ मिश्र भी लिखते हैं कि इस काल के कवि को रस, अलंकार, नायिका भेद,ध्वनि आदि के वर्णन के सहारे ही अपनी कवित्त प्रतिभा दिखाना आवश्यक था. यह युग रीति पद्धति का ही युग था. इससे सम्बंधित असंख्य ग्रन्थ लिखे गए.

मिश्रबंधुओं ने इस काल को अलंकृत काल कहा और यह तर्क दिया कि इस युग में कविता को अलंकृत करने की परिपाटी रही है जबकि वास्तविकता यह है कि इस काल में कवित्त प्रधान काव्य की रचना हुई जिसने आध्यात्मिकता के स्थान पर आत्मानुभूति युक्त लोक जीवन को प्रधानता दी, केवल अलंकृत चमत्कार पर बल नहीं दिया. इस काल के काव्य में अलंकारों के साथ –साथ रस पर भी बल दिया गया, इतर काव्यांगो को भी काव्य में उचित स्थान प्राप्त हुआ इसलिए यह नाम एकांकी सिद्ध होता है.

पं० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस काल का नामकरण श्रृंगारकाल किया है. यह नाम इस आधार पर किया गया कि इस काल में काव्य की व्यापक प्रवृत्ति श्रृंगार वर्णन ही थी मगर यह श्रृंगारिक भावना कवियों की कविता का प्रेरक तत्व नहीं थी. वे अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न कर आर्थिक रूप से संपन्न होना चाहते थे.इस काल के कवियों ने मुख्य रूप से काव्यांग निरूपण की परिपाटी को अपनाया था . इसके अतिरिक्त यह तर्क भी दिया जाता है कि इस काल में श्रृंगार के साथ-साथ वीर व भक्तिपरक रचनाएँ भी लिखी गई थीं. ‘रीति’ शब्द में श्रृंगार, वीर, भक्ति, काव्यशास्त्र सभी विषय समाहित हो जाते है. श्रृंगार की प्रवृत्ति को भी रीति के अंतर्गत स्वीकार किया जा सकता है. इसलिए श्रृंगारकाल यह नाम अनुपयुक्त सिद्ध होता है.

इस काल के समस्त कवियों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है- रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध व रीतिमुक्त. रीति परंपरा का प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सभी में देखा जा सकता है. डॉ० नगेन्द्र का कथन है कि इस काल को रीतिकाल कहना अधिक वैज्ञानिक और संगत है क्योकि इस युग में रीति सम्बन्धी ग्रन्थ ही अधिकांशतः नहीं लिखे गए अपितु इस युग के कवियों की प्रवृत्ति भी ऐसे ही ग्रन्थ रचने की थी. रीति निरूपण की यह प्रवृत्ति अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि और परंपरा के साथ आई थी. इस प्रकार आज लगभग सभी इतिहासकार इस नाम को अधिक उपयुक्त व युक्तिसंगत मानते हैं.

डॉ० भागीरथ मिश्र का कथन है कि इस काल को कलाकाल कहने से कवियों की रसिकता की उपेक्षा होती है, श्रृंगार काल कहने से वीर रस और राजप्रशंसा की. रीतिकाल कहने से प्रायः कोई भी महत्वपूर्ण वस्तुगत विशेषता उपेक्षित नहीं होती और प्रमुख प्रवृत्ति सामने आ जाती है. यह युग रीति पद्धति का युग था . यह धारणा वास्तविक रूप से सही है.आधुनिक काल के नामकरण पर भी विद्वानों में मतभेद हैं शुक्ल जी ने पद्य के स्थान पर खड़ी बोली में साहित्य रचना को लक्षित कर इस काल को गद्यकाल कहा है. इस काल में खड़ी बोली गद्य की विविध विधाओं के विकसित होने की दिशा में नवीन विषयों पर साहित्य रचना होने लगीं थी इसलिए इसे आधुनिक काल कहा गया. डॉ० बच्चन सिंह लिखते है – “आधुनिक शब्द दो अर्थों की सूचना देता है. पहला- मध्यकाल से भिन्नता. मध्यकाल अपने अवरोध, जड़ता और रूढ़िवादिता के कारण स्थिर और एकरस हो चुका था, एक विशिष्ट ऐतिहासिक प्रक्रिया ने उसे पुनः गद्यात्मक बनाया. दूसरा- इहलौकिक दृष्टिकोण. इस समय धर्म, दर्शन, साहित्य, चित्र आदि सभी के प्रति नए दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ. मध्यकाल में पारलौकिक दृष्टि से मनुष्य इतना अधिक आच्छन्न था कि उसे अपने परिवेश की सुध ही नहीं थी पर आधुनिक युग में वह अपने पर्यावरण के प्रति अधिक सतर्क हो गया. आधुनिक युग की पीठिका के रूप में इस देश में जिन दार्शनिकों चिंतकों और धार्मिक व्याख्याताओं का आविर्भाव हुआ, उनकी मूल चिन्ताधारा इहलौकिक ही है. सुधार, परिष्कार और अतीत का पुनराख्यान नवीन दृष्टिकोण की देंन है, आधुनिक युग की ऐतिहासिक प्रक्रिया का ही परिणाम है .

इस काल में देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में जिस प्रकार की उथल-पुथल हुयी और उसके प्रभाव स्वरुप साहित्य में पुनर्जागरण की चेतना सामने आई, राष्ट्रीयता का स्वरुप स्पष्ट होने लगा, हर स्थिति में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया जाने लगा. राष्ट्रीय चेतनाका विकास होने से देश के प्राचीन गौरव का गुणगान होने लगे, अंग्रेजी साम्राज्य का विरोध होने लगा, व्यक्ति की निजी संवेदनाएं, भावनाएं व विचार अभिव्यक्त होने लगा, साहित्यकारों ने नवीनता का परिचय दिया. हिंदी गद्य के विकास ने जनता की अभिव्यक्ति को सरल व सुगम बना दिया और आधुनिकता का आरम्भ हो गया. काव्य की पहुँच एक सीमित वर्ग तक थी. गद्य की विधाएँ जन-जन तक पहुँची. अंग्रेजों के कारण ज्ञान-विज्ञान के प्रसार से जनता में जागृति आई, वैज्ञानिक अध्ययन होने लगे. गद्य की इस विविधता व अनेकरूपता को देखकर ही आचार्य शुक्ल ने इस काल को गद्यकाल के नाम से अभिहित किया. साहित्य के सशक्त साधन के रूप में गद्य की अनेक विधाओं का विकास हुआ. प्राचीन संस्कृति के उद्धार की बातें होने लगी, वैचारिक स्वतंत्रता व सामाजिक सुधार की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ. भारतेंदु व उनके सहयोगी लेखको ने साहित्य के माध्यम से, अनेक पत्र पत्रिकाओं के सहारे अपनी बात सामान्य जनता तक पहुँचाने का प्रशंसनीय प्रयास किया.

हिंदी साहित्य के पूर्व कालों में साहित्य विशेष रूप से काव्यमय था. आधुनिक युग में भी काव्य सम्बन्धी अनेक शैलियों का विकास हुआ, साथ ही गद्य की विविध विधाओ- उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध आलोचना का उद्भव और विकास भी हुआ. इसलिए विविध शैलियों, साहित्यरूपो, प्रवृत्तियों और विचारधाराओं से परिपूर्ण इस युग को आधुनिक युग कहा जाता है. इस काल के साहित्य में विविधता दिखाई देती है.हिंदी काव्य सर्जना के अनेक मोड़ दृष्टिगत होता है. जिनमें काल्पनिकता और आदर्शवादी भूमिकाओ के स्थान पर यथार्थवादी भौतिकता की रचनाएँ प्रस्तुत हुईं. इसी यथार्थवादी भूमिका के कारण इस काल में गद्य साहित्य की विविध धाराओं का  भी विकास हुआ जिनमे जीवन की समस्याओं और संघर्षों का चित्रण मिलता है. भोगे हुए जीवन का वास्तविक चित्र हमारे सामने प्रस्तुत होता है. गद्य और पद्य दोनों धाराओं ने आधुनिक काव्य में साहित्य को पुष्ट किया.

हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

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राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है। हिन्दी और अंग्रेजी की स्पर्द्धा देशी भाषाओं और राष्ट्रभाषा के द्वंद्व में बदल गई है, मनों को जोड़ने वाला सूत्र तलवार करार दे दिया गया है, पराधीनता की भाषा स्वाधीनता का गर्व हो गई है। निश्चय ही इसके पीछे दास मन की सक्रियता है। कैसा अजब लगता है, जब कोई इसलिए आंदोलन करे कि हमें दासता दो, बेड़ियाँ पहनाओ !

भाषा के बारे में हमारा सोच और रवैया वही है जो जीवन के बारे में है। कोई भी मूल्य नष्ट होने से बचा है कि भाषा और स्वाभिमान बचे रहें ? मुझे लगता है कि अब राजनीति, नौकरशाही, पूँजीवाद या साम्राज्यवाद को कोसना बेकार है; जब तक जनता खुद ही अपना हित-अनहित न देखेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। इसलिए कोई भी समस्या हो, वह सीधे जनता को निवेदित या संबोधित होनी चाहिए। लोगों को विभाजनकारी षड्यंत्रों के हवाले करके हम भाषा के भीतर कोई संवेदन, कोई हार्दिकता पैदा नहीं कर रहे हैं।

अहिन्दीभाषी अगर गलती से यह समझ रहे हों कि हिन्दी न रहेगी तो उनका भला होगा, तो उन्हीं से बात करनी होगी कि हिन्दी चली जाएगी तो अंग्रेजी आएगी, राजभाषा के रूप में अंग्रेजी का चरित्र देशी भाषा और जनता से नफरत करना सिखाता है। हिन्दी की कोई स्पर्द्धा देशी भाषाओं से नहीं है। वह उन्हें फूलते-फलते देखना चाहती है, उनसे आत्मालाप करना चाहती है।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के बारे में कुछ कहने में झिझक होती है, क्योंकि सौभाग्य या दुर्भाग्य से हम हिन्दीभाषी हैं, जबकि यह होना हमने नहीं चुना है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का स्वप्न भी हिन्दीभाषियों का नहीं था। राष्ट्रभाषा के रूप में इसकी आवश्यकता सबसे पहले अहिन्दीभाषियों ने ही अनुभव की। हिन्दीभाषियों ने तो उनके स्वर में स्वर मिलाया, ताकि उन्हें नाकारा न मान लिया जाए। फिर भी विडंबना यह है कि उन्हीं पर हिन्दी थोपने या हिन्दी का साम्रज्यवाद स्थापित करने का आरोप लगाया जाता है। यह हिन्दी हम पर किसने थोपी है ? हमारी हिन्दी तो संतों-भक्तों की गोद में पली है, आज तक कभी वह सत्ता की मोहताज नहीं रही। माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में तो वह सिंहासनों से तिरस्कृत रही है। हिन्दी को कभी संस्कृत, पाली, अरबी, फारसी या अंग्रेजी की तरह राज्याश्रय नहीं मिला। तमगा बनने की उसकी इच्छा रही ही नहीं, अलबत्ता वह देश की बाँसुरी, तलवार और ढाल जरूर बनी है। जब भी देश को एक सूत्र में पिरोने की जरूरत पड़ी, जब भी उसके विद्रोह को वाणी देने की आवश्यकता हुई, हिन्दी ने पहले की है। तभी राजा राममोहन राय के पहले समाचार-पत्र की वह भाषा बनी। गांधी की अखंड भारत की आवाज को उसने जन-जन तक पहुँचाया। अफ्रीका से लौटने पर जब गांधी जी ने पहला भाषण हिन्दी में दिया था और कुछ लोगों ने आपत्ति की थी तो उन्होंने कहा था कि मैं हिन्दी में नहीं, भारत की भाषा में बोल रहा हूँ। हिन्दी में ही सुभाषचंद्र बोस की ललकार दसों दिशाओं में गूँजी थी। संभवतः इन्हीं सेवाओं को याद करके स्वतंत्र भारत के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा का सम्मान दिया गया। भारतीय जनता के संवाद और एकात्मता के लिए इस रूप में मात्र उसकी अनिवार्यता को रेखांकित किया गया था। क्या देश को आज एकात्मता और संवाद की जरूरत नहीं रह गई है ?

स्वाधीनता निश्चिंतता और पूर्णविराम नहीं, एक सतत तप है। जिस दिन इस तथ्य को कोई देश भूल जाता है, वही उसके विघटन का पहला दिन होता है। ठीक उसी वक्त देश अपनी पहचान खोने लगता है और अपने अस्तित्व से इंकार करने लगता है। आज हम विघटन के उसी चरम दौर से गुजर रहे हैं। राष्ट्रभाषा को खारिज करने के बहाने, अनजाने ही हम समस्त देशी भाषाओं को निरस्त करते चले जा रहे हैं। यह किसी भयावह संकट की पूर्व सूचना है।

पिछले दिनों अर्थात् उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में, भारत में तीन दुर्घटनाएँ एक साथ तेजी से घटित हुईं-उग्र प्रांतीयतावाद, सांप्रदायिक उन्माद और अंग्रेजी की पूर्ण प्रतिष्ठा। ये बातें अकारण एक साथ पैदा नहीं हुईं-इनका एक-दूसरे से नाभि नाल संबंध है-ये सभी राष्ट्र की अस्मिता को खंडित करने और उसे फिर से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पराधीनता के अंधे कुएँ में धकेलने वाली घटनाएँ हैं। इन तीनों मामलों में विदेशी शक्तियों के साथ विघटनकारी शक्तियों की दिलचस्पी अकारण नहीं है।

सबसे पहले आपसे अपनी भाषा छीनी जा रही है, ताकि आप किसी भी मामले में परस्पर आत्मीय संवाद कायम न कर सकें, जैसे आक्रामण सेनाएँ पुलों को उड़ा देती हैं। गूँगा और संवादहीन देश आपस में सिर्फ अपना माथा ही फोड़ सकता है। आपको अपनी भाषा के बदले जो परदेशी भाषा दी गई है वह जोड़ने वाली नहीं है, क्योंकि वह भारत की जनता को परस्पर जोड़ने के लिए लाई भी नहीं गई थी। गुलामों को अधिक गुलाम बनाने का इससे नायाब तरीका अंग्रेजों के पास दूसरा न था।

इस सत्य को न समझते हुए आज भी कुछ लोग तर्क देते हैं कि अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए कुछ लोगों ने ही स्वाधीनता और सामाजिक सुधारों के लिए संघर्ष किया था। यानी अंग्रेजी शिक्षा ने ही उनमें स्वाधीनता की आकांक्षा पैदा की थी; उन्हें स्वाधीनता के लिए एकजुट किया था। यह सुनकर लगता है कि ये लोग इतिहास की क्रूरता को चुनौती देने वाले इतिहास से अपरिचित हैं। विकल्पहीन अवस्था में हमेशा विद्रोही शक्तियाँ प्राप्त साधनों को ही हथियार बना लेती हैं, जैसे आसन्न उपस्थित शत्रु से निपटने के लिए पत्थर, डंडा या नाखून तक बंदूक बन जाते हैं। जापानियों, चीनियों यहूदियों यहाँ तक कि खुद अंग्रेजों ने भी अपने-अपने पराधीन काल में विजेताओं की भाषाएँ शस्त्रों की तरह इस्तेमाल की थीं, जिन्हें स्वाधीनता के बाद सबने फेंक दिया। आज भी अफ्रीकी नीग्रो, गोरों के विरुद्ध अंग्रेजी में ही साहित्य लिख रहे हैं, परंतु इसकी तीव्र वेदना उनके साहित्य में झलकती है। इसीलिए वे अपनी बोलियों के जरिए स्वयं अपनी भाषा गढ़ने में व्यस्त हैं। इस दृष्टि से किसी अनिवार्य ऐतिहासिक तदर्थता को प्रमाण के रूप में लेना चीजों का सरलीकरण करना और सच्चाई को भुलाना है।

स्वाधीनता के बाद से हमारे देश में, हिन्दी के बारे में कुतर्कों के ऐसे जाल लगातार फैलाए जाते रहे हैं। उन्हीं का परिणाम है कि हिन्दी आज तक अपना अनिवार्य ऐतिहासिक स्थान नहीं पा सकी है। मेरी जानकारी में किसी महत्त्वपूर्ण स्वाधीन राष्ट्र में उसकी राष्ट्रभाषा इतने समय तक अपदस्थ नहीं रही। यहाँ तो स्थिति यह है कि यह सिलसिला लगातार तेज होता जा रहा है।

यह स्थिति क्यों पैदा हुई, इसके क्या कारण रहे हैं, इस पर हम अगले पृष्ठों में विचार करेंगे, परंतु आज तो देश के आम पढ़े लिखे लोगों की मानसिकता को इतना प्रदूषित किया जा चुका है कि कभी-कभी लगता है कि राष्ट्रभाषा के बारे में बात करना और सांप्रदायिक दंगे कराना एक ही बात है। ऐसी क्रूर और गुलाम मानसिकता पैदाकरने वाले लोग ही आज बड़ी हसरत से अंग्रेज और अंग्रेजी राज को याद करते हैं-इससे क्या यह साबित नहीं होता कि भारत में अंग्रेजों और अंग्रेजी राज की भूमिका को अलग करना सरासर नासमझी दिखाना है।

कथित उदारता दिखाते हुए, स्वाधीनता के प्रारंभिक नाजुक और भावनापूर्ण काल में हम भयानक चूक कर बैठे थे। तब क्या पता था (जबकि होना चाहिए था) कि हिन्दी के साथ 15 वर्षो तक अंग्रेजी जारी करने का निर्णय हिन्दी को अपदस्थ करने की भूमिका साबित होगा। इस अंतराल में अंग्रेजों के उच्छिष्ट नौकरशाहों, स्वार्थी राजनीतिज्ञों, विदेशी शक्तियों, मतलबी पूँजीपतियों वगैरह ने अपनी रणनीति तैयार कर ली थी और भारतीय भाषाओं तथा प्रांतवाद को आगे करके राष्ट्रभाषा पर चौतरफा आक्रमण कर दिया था। इतिहास में भी हम देख चुके हैं कि मामूली छूट के सहारे ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना जाल फैलाया था और बाद में समस्त देशी राज्यों को एक-एक कर हड़पते हुए संपूर्ण संप्रभुता हासिल कर ली थी। वही चरित्र तो अंग्रेजी का है-एक राजभाषा के रूप में।

इतिहास और संस्कृति के मर्मज्ञ डॉ. राममनोहर लोहिया ने बहुत सही आंदोलन चलाया था-अंग्रेजी हटाओ। इस बारे में उन्होंने उस बुजुर्गी सलाह को नजर अंदाज कर दिया था कि हिन्दी को समर्थ बनाइए, नाहक अंग्रेजी का विरोध क्यों करते हैं ?’ लोहिया जानते थे कि इस दिखावटी अहिंसक सलाह के निहितार्थ क्या हैं ? वास्तव में किसी भी विदेशी भाषा को राष्ट्रभाषा का विकल्प बनाए रखना पराधीनता को स्वाधीनता का विकल्प बनाए रखने की तरह है। वे यह भी जानते थे कि अंग्रेजी की उपस्थिति में कोई भी देशी भाषा पनप नहीं सकती, क्योंकि अपने ऐतिहासिक चरित्र के अनुरूप वह एक से दूसरी को पिटवाने का काम करती रहेगी।

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

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हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका स्वरूप भी समावेशी एवंसंश्लिष्ट अधिक रहा है।

यद्यपि यह अवान्तर होगा तथापि मैं यह कहने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा हूँ कि हिन्दीकाव्य भाषा के उद्गमकालीन संश्लिष्ट स्वरूपको ओझल करने के कारण हिन्दी के अधिकांश विद्वानों ने हिन्दी के इन कवियों की काव्य-भाषा पर विचार करते समय उसका वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण नहीं किया है। किसी ने उसको ब्रज,किसी ने अवधी,किसी ने भोजपुरी,किसी ने पंजाबी तो किसी ने खड़ी बोली के दायरे में खींचने की कोशिश की है। किसी ने यदि ब्रज की साहित्यिक परम्परा पर लेखनी चलाई है तो उसकी प्रवृत्ति आलोच्य काव्य कृति को ब्रज की सिद्ध करने की रही है।

इसी प्रकार अवधी की साहित्यिक परम्परा का इतिहास लिखने वालों ने विवेच्य काव्य कृति में अवधी ढूँढ़ने का प्राणायाम किया है। कुछ विद्वानों ने अपभ्रंश की रचनाओं को भी विवेच्य साहित्यिक परम्परा का अंग स्वीकार कर लिया है। हम अपने‘अपभ्रंश के विविध भाषिक रूपों से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के विविध रूपों का विकास’शीर्षक आलेख में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि कुछ विद्वानों ने अपभ्रंश एवं आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के संक्रमण काल के रचनाकारों एवं उनकी कृतियों को अपनी अपनी भाषा के साहित्य की सबसे पहली रचना मानने का मत स्थापित किया है। इनकी भाषा को आधुनिक भारतीय आर्य भाषा की सीमा के अन्तर्गत स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह बात हमने समस्त आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के संदर्भ में कही है और यह बात हिन्दी पर तो लागू होती ही है। हिन्दी के विशेष संदर्भ को ध्यान में रखकर उदाहरण प्रस्तुत हैं –

1.हरिप्रसाद शास्त्री द्वारा नेपाल की राजशाही लाइब्रेरी से सन्1907में ताड़पत्रों पर लिखे गए चर्यापद या सिद्धों की रचनाएँ- ‘बौद्ध गान ओ दोहा’(आठवीं से बारहवीं शताब्दी)।श्री राहुल सांकृत्यायन ने इसकी भाषा मगही माना है जो हिन्दी के बिहारी उपवर्ग की उपभाषा है।

2.‘पुष्य’‘पुष्प’ (विक्रम सम्वत1020अर्थात963के आसपास)

हिन्दीकेसंदर्मेंडॉ.हीरालालजैन ने इनका वास्तविक नाम पुष्पदंत’ माना है तथाइनका रचनाकाल विक्रम सम्वत 1020 अर्थात 963 के आसपास माना है। डॉ. हीरा लाल जैन के मतानुसार मान्यकेट राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय (सन् 939 से 968 ईस्वी) के मंत्री भरत तथा उनके पुत्र नन्न का इन्हें आश्रय प्राप्त था। उन्होंने इनकी रचनाओं का रचनाकाल इस प्रकार माना है-

(अ) तिसट्ठि पुरिस गुणालंकार (महापुराण) (रचनाकाल – 965 ईस्वी के आसपास)

(आ) णायकुमार चरिउ (चरित कथा) (रचनाकाल – सन् 971 ईस्वी में रचना पूर्ण हुई)

(इ) जसहर चरिउ (यशोधर कथा) (रचनाकाल सन् 972 ईस्वी में रचना पूर्ण हुई)

  1. आचार्यहेमचन्द्रसूरी(1087-1172)उनके’त्रिषष्ठिशलाकापुरुश चरित'(पुराण काव्य) एवं देशीनाममाला (कोश ग्रंथ) तथा अभिधानचिंतामणि (पर्यायवाची कोश) में तत्कालीन युग की भाषिक सामग्री उपलब्ध है। इस आधार पर कुछ विद्वान इन्हें हिन्दी का आदि कवि मानते हैं। डॉ. शिव प्रसाद सिंह ने अपनी ’सूर पूर्व ब्रजभाषा साहित्य‘ पुस्तक में आचार्य हेमचन्द्र के शौरसेनी अपभ्रंश के उदाहरणों की भाषा को ‘ब्रज भाषा की पूर्व पीठिका’ ठहराया है।

हमने उपर्युक्त तीनों की सामग्री की भाषा का विश्लेषण करते हुए इन्हें अपभ्रंश एवं आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के संक्रमण काल की रचनाएँ माना है।

इधर अधिकांश विश्वविद्यालयों के हिन्दी के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में हिन्दी भाषा वाले कोर्स में निम्न विषय समाहित हैं –

1.‘काव्यभाषा के रूप में ब्रज एवं ऐतिहासिक विकास’

2.कव्यभाषा के रूप में अवधी का ऐतिहासिक विकास’

3.काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली का ऐतिहासिक विकास’

इसकी परिणति यह हुई है कि हिन्दी की साहित्यिक परम्परा का इतिहास समावेशी एवं संश्लिष्ट रूप में नहीं लिखा जा रहा है जैसा1.गार्सा द तासी (इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी),2.शिवसिंह सेंगर (शिव सिंह सरोज),3.जार्ज ग्रियर्सन (द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिट्रैचर आफ हिंदोस्तान),4.मिश्र बंधु (मिश्र बंधु विनोद),5.रामचंद्र शुक्ल ( हिन्दी साहित्य का इतिहास),6हजारी प्रसाद द्विवेदी ( हिन्दी साहित्य की भूमिका;हिन्दी साहित्य का आदिकाल;हिन्दी साहित्य :उद्भव और विकास),7.रामकुमार वर्मा ( हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास) तथा8.डॉ धीरेन्द्र वर्मा (हिन्दी साहित्य) आदि विद्वानों ने अपने अपने ग्रंथों में हिन्दी साहित्य की सभी उपभाषाओं अथवा इनके मेलजोल से निर्मित भाषा में लिखे गए साहित्य का इतिहास काल, धाराओं, प्रवृत्तियों को आधार बनाकर लिखा है;अलग अलग उपभाषाओं को आधार बनाकर नहीं।

हिन्दी के पाठ्यक्रम को समावेशी एवं संश्लिष्ट दृष्टि से न बनाकर ब्रज, अवधी एवं खड़ी की अलग अलग पहचान करने वाली भेद दृष्टि से बनाने के कारण पिछले दो दशकों में बाजार में ‘ब्रज की साहित्यिक परम्परा’,‘अवधी की साहित्यिक परम्परा’,‘खड़ी बोली की साहित्यिक परम्परा’जैसे शीर्षक के ग्रंथों अथवा पुस्तकों की बाढ़ सी आ गई है।

एक ही काव्य कृति की भाषा को एक विद्वान ब्रज बताता है दूसरा उसकी भाषा को अवधी ठहराता है और तीसरा ताल ठोककर उसे खड़ी बोली की सिद्ध करता है। शोध कार्य को तमाशा बना दिया गया है। प्रकाशक को पुस्तक चाहिए। अध्यापक को पुस्तक चाहिए। शिक्षार्थी को पुस्तक चाहिए। रचना को अपनी बोली या उपभाषा की बताने एवं प्रमाणित करने की कमोबेश यही स्थिति राजस्थानी, मैथिली, भोजपुरी आदि उपभाषाओं की साहित्यिक परम्परा का इतिहास लिखने वाले विद्वानों की भी है।

हिन्दी की समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा को ओझल करने के कारण कबीर की भाषा पर विचार करते समय किसी ने उसको ब्रज, किसी ने अवधी, किसी ने भोजपुरी, किसी ने पंजाबी तो किसी ने खड़ी बोली कहा है। कबीर के लिए यह भाषा न ब्रज थी, न अवधि, भोजपुरी, न पंजाबी और न खड़ी बोली। उनके लिए यह ‘भाखा’ थी। उनकी सधुक्कड़ी में विभिन्न उपभाषिक रूप एकाकार हो गए हैं। बहुत जोर लगाकर विश्लेषण करने पर ही हमें विभिन्न उपभाषिक तत्त्व नज़र आते हैं। उदाहरण के लिए अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए मैं कबीर के साहित्य के कुछ अंश का भाषिक विश्लेषण करने के बाद ब्रज, अवधी एवं खड़ी तीनों के रूपों से सम्बंधित कुछ व्याकरणिक व्यवस्थागत सामग्री (शब्द नहीं) प्रस्तुत कर रहा हूँ—

हिन्दी की उपभाषा का नाम पुरुषवाचक सर्वनाम के सम्बंध कारकीय रूप
ब्रज मेरो, हमारो, तेरो, तुम्हारो
अवधी मोर, मोरा, हमरा, हमार, तोर, तोरा, तुम्हार
खड़ी मेरा, हमारा, तेरा, तुम्हारा
हिन्दी की उपभाषा का नाम निजवाचक सर्वनाम के सम्बंध कारकीय रूप
ब्रज अपनो
अवधी आपन
खड़ी अपना
हिन्दी की उपभाषा का नाम होना क्रिया का भूतकालिक रूप
ब्रज भयौ
अवधी भएउ/भवा
खड़ी हुआ/हूआ/हूवा/भया
हिन्दी की उपभाषा का नाम भूत निश्चयार्थक क्रिया रूप
ब्रज गयो/भयौ/मिलियो/मिलिओ/मिल्यौ/आयौ
अवधी गएउ/भएउ/आवा
खड़ी गया/भया/मिला/मिलिया/मिल्या/आया
भोजपुरी भैला/ भैल/ मिलैला

काव्य कृतियों की मिश्रित भाषा की ओर से मुँह फेर लेने अथवा अपनी बोली के प्रति दुराग्रह की सीमा तक अंध भक्ति होने के कारण कृति की भाषा को अपने पाले में खींचने की जबर्दस्त कोशिश करने के कारण ही सम्भवतः विभिन्न काव्य रचनाओं की भाषा के बारे में भिन्न भिन्न मत नज़र आते हैं। यह आलोचना अथवा समीक्षा पद्धति की वैज्ञानिकता का मज़ाक है। मगर जो है वह है। इस दृष्टि से कुछ काव्य ग्रंथों की भाषा के सम्बंध में संक्षिप्त टिप्पणियाँ प्रस्तुत हैं:

1.प्राकृत पैंगलम् -हिन्दी की उपभाषाओं पर कार्य करने वाले विद्वान इसकी भाषा के सम्बंध में एकमत नहीं हैं। ब्रज भाषा पर कार्य करने वाले विद्वानों ने इसे ब्रज भाषा का ग्रंथ माना है। डॉ. शिव प्रसाद सिंह ने अपनी‘सूर पूर्व ब्रजभाषा साहित्य’पुस्तक में इसे अवहट्ट या पिंगल अपभ्रंश में लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक माना है जिसमें बारहवीं से चौदहवीं सदी तक की बहुत सी ब्रज रचनाएँ संकलित की गई हैं। उनके गुरु एवं शोध प्रबंध के निर्देशक डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक कदम आगे बढ़ाकर प्राकृत पैंगलम् को ब्रजभाषा का ग्रंथ मान लिया है जो उनके द्वारा डॉ. शिव प्रसाद सिंह को दिए गए निम्न प्रमाण पत्र से प्रमाणित होता है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्द हैं –

“डॉ. सिंह ने प्राकृत पैंगलम्, पृथ्वीराज रासो और औक्तिक ग्रंथों में प्रयुक्त होने वाली ब्रजभाषा के विभिन्न स्वरूपों का बहुत अच्छा विवेचन किया है”।

मगर भाषावैज्ञानिक डॉ. उदय नारायण तिवारी के अनुसार इसमें अवधी,भोजपुरी,मैथिली और बंगला के प्राचीनतम रूप भी मिलते हैं।

(देखें- हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास पृष्ठ 152)

डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया ने इसमें खड़ी बोली के तत्व भी ढूढ़ निकाले हैं।

(देखें प्राकृत पैंगलम की शब्दावली और वर्तमान:हिन्दी:सम्मेलन पत्रिका,वर्ष47, अंक3)

वस्तुतः यहकिसी एक काल की रचना नहीं है। यह नवीं से चैदहवीं शताब्दी तक की रचनाओं के उदाहरणों का ग्रंथ है।इस कारण इसको आधार बनाकर हिन्दी के अनेक उपभाषिक रूपों का उद्भव दिखाना वैसे भी असंगत है।

(2)उक्तिव्यक्तिप्रकरबारहवीं  शताब्दी में बोलने वालों को संस्कृत सिखाने के लिए यह ग्रंथ लिखा है। इसमें पुरानी कोसली के समानान्तर संस्कृत के रूपों के उदाहरण दिए गए हैं। अवधी पर कार्य करने वाले विद्वानों ने इसे प्राचीन अवधी का ग्रंथ माना है मगर ब्रज पर कार्य करने वाले विद्वानों ने इसमें ‘चले’  एवं ‘करे’ जैसे क्रिया रूप ढूढ़ निकाले हैं

तथा  पर कार्य करने वाले को इसमें ‘जा’ क्रिया का रूप मिलगया है।

(3)गोरखनाथ की काव्य-भाषा इनकी भाषा के सम्बंध में भी मतभेदहैं। ‘गगन मंडल मैंऊँधा कूबा, वहाँ अमृत काबासा‘जैसी काव्य पंक्तियों में खड़ी बोली के दर्शन होते हैं तो‘चीटीं केरा नेत्र में गज्येन्द्रसमाइला’

जैसी काव्य पंक्तियों में भोजपुरी झाँकती नजर आतीहै।

डॉ. कमल सिंह ने ‘गोरखनाथ और उनका हिन्दी साहित्य’ शीर्षक ग्रंथ लिखा है और उनकादावा है कि गोरखनाथ खड़ीबोली की पूर्व परम्परा के कवि हैं।

जिस प्रकार उक्ति व्यक्तिप्रकरण में अवधी अधिक है मगर एवं खड़ी बोली केतत्व भी मिल जाते हैं

वैसेहीगोरखनाथ की भाषा का झुकाव खड़ी बोलीकी ओर अधिक है मगर इसमें राजस्थानी,

हरियाणवी, भोजपुरी के अलावा पूर्वी पंजाबी के तत्व भी मिल जाते हैं। एक उदाहरण देखें –

मेरा गुर तीन छंद गावै।

ना जाणों गुर कहाँ गैला,मुझ नींदड़ी न आवै।।

इन दो पंक्तियों में‘गैला’भोजपुरी है, ‘जाणों’हरियाणवीं’ है, ‘नींदड़ी’राजस्थानी है। शेष भाषिक तत्व ब्रज एवं खड़ी बोली के हैं।

वास्तव में गोरखनाथ की भाषा भी कबीर की तरह है।

(4) चंदबरदाई कृत ‘पृथ्वीराजरासो’अपने ग्रंथ की भाषा के सम्बंध में कवि ने ग्रंथ में कहा है –

उक्ति धर्म विशालस्य राजनीति नवं रसं।

षड् भाषा पुराणं च कुरानं कथितं मया।।39।।

(विशाल धर्म की उक्ति, राजनीति, नव रसोंको षड्भाषा में पुराण तथा कुरान स्वरूप मैंनेकहा।)

कवि का लक्ष्यार्थ यह प्रतीत होता है कि पुराण तथा कुरान तो क्रमशः थक पृथक संस्कृतएवं  अरबी में लिखे गए हैं अर्थात्पुराण की भाषा संस्कृत है और कुरान की भाषा अरबीहैमगर इस ग्रंथ में षड् भाषाओं का समाहार है। पृथ्वीराजरासो की भाषा के अध्ययन से यहस्पष्ट है कि इसका मूल ढाँचा अपभ्रंश काल सम्पर्कभाषासाहित्यिक शौरसेनी अपभ्रंश सेउद्भूत तत्कालीन जन प्रचलित ब्रज का है मगर इसमें संस्कृत,

प्राकृत,अपभ्रंश तथा मागधी,शौरसेनी एवं पैशाची से प्रसूत तत्कालीन जन प्रचलितभाषिक रूपों की  शब्दावली का भीप्रयोग हुआहै। इसकी भाषा को समझने की दृष्टि से कुछ उदाहरण प्रस्तुतहैं –

(1) तिन कहों नाम (2) जिन सुनत सुद्ध भव होत (3)जिहि पढ़त सुनत

भाषा के व्याकरण की दृष्टि से सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसकी भाषा में एक ओर अपभ्रंश काल की संश्लिष्ट विभक्तियों का प्रयोग मिलता है वहीं दूसरी ओर परसर्गों का भी धड़ल्ले से प्रयोग मिलता है। इसकी भाषा में जिन परसर्गों का जिन कारकीय अर्थों को व्यक्त करने के लिए अधिक प्रयोग हुआ है उन्हे तालिका में प्रस्तुत किया जा रहा है –

कारक का नाम कारकीय अर्थ द्योतक परसर्ग
करण कारक सम/सों/ते/त/सैं
सम्प्रदान कारक सम/सों/प्रति
अपादान कारक पास/कहँ/कों

अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

79877_bigअपभ्रंश: भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें


वैदिक, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा इतिहास के अध्ययन से अब यह स्पष्ट हो गया है कि वेदों के रचना-काल में तथा उसके भी पूर्ववर्ती युग में जनभाषा में तथा साहित्यिक भाषा में भाषिक ही नहीं, शब्द-रुपों की रचना में भी अन्तर था यह अन्तर कई स्तरों पर लक्षित होता है। जैसे-कि उच्चारण, रूप-रचना, वैकल्पिक प्रयोग, अन्य भाषाओं से गृहीत शब्दावली, दैवीवाक्-मानुषीवाक् के रूप में।

 

ऋग्वेद के उल्लेख से यह पता चलता है कि पणियों और असुरों की भाषा ‘मृध्रवाक्’ थी। यद्यपि निरुक्तकार ने ‘मृध्रवाक्’ का अर्थ ‘मृदु वाचः’ किया है, किन्तु परवर्ती काल में यह शब्द ‘विभाषा’ या ‘अपशब्द’ के लिए रूढ़ हो गया। शतपथब्राह्मण तथा महाभाष्य के उल्लेखों से यह निश्चित हो जाता है कि एक को सुरभाषा तथा दूसरी को असुरभाषा कहते हैं।

 

ऋग्वेद में भी यह उल्लेख मिलता है कि राष्ट्र की सामान्य जनता से सम्पर्क करने वाला यह विचार करता है कि मैं संस्कृत या दैवीवाक् में बोलूँ या जनभाषा में? यही नहीं भाषा की दृष्टि से ऋग्वेद तथा अथर्ववेद इन दोनों की भाषा में अन्तर है। ऋग्वेद की भाषा साहित्यिक है किन्तु अथर्ववेद में जनभाषा के रूप उपलब्ध होते हैं। भाषावैज्ञानिकों ने ‘छान्दस्’ भाषा में प्रयुक्त वट, तट, वाट, कट, विकट, कीकट, निकट, दण्ड, अण्ड, पट, घट, क्षुल्ल आदि शब्दों को कथ्य भाषा (प्राकृत) से अधिगृहीत स्वीकार किया है। डॉ। नेमिचन्द्र शास्त्री के शब्दों में, ” छान्दस् भाषा की पद-रचना का अध्ययन प्राकृत अध्ययन के बिना अपूर्ण है ‘छान्दस्’ में तृतीया के बहुवचन में ‘देव’ शब्द का देवेभिः (ऋग्वेद 1.1.1) और प्रथमा के बहुवचन में देव एवं जन शब्द का क्रमशः देवा, देवासः जना एवं जनासः (ऋग्वेद 1.3.7) रूप पाये जाते हैं जो कि प्राकृत के रूप है।

 

इसी प्रकार चतुर्थी के लिए षष्ठी विभक्ति का प्रयोग तथा पाटी के लिए चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग भी प्राकृत तत्त्व-सिद्धि के लिए पर्याप्त प्रमाण है। इसी प्रकार अकारान्त शब्द का प्रथमा के एक वचन में ओकारान्त हो जाना ही प्राकृत-तत्त्व की जानकारी के अभाव में यथार्थ रूप में विश्लेषित नहीं किया जा सकता है। यथा-सः चित्सो चित् (ऋग्वेद 1.1 9 1.11) संवत्सरः अजायतसंवत्सरों अजायत (ऋग्वेद 10.1 9 0.2)। वैयाकरण पाणिनि ने ‘छान्दस्’ की इस प्रवृत्ति का नियमन करने के लिए ‘हशि च’ (6.1.144) एवं ‘अतोरोरप्लुतादप्लुते’ (6.1.113) सूत्र लिखे हैं।

 

वस्तुतः इन सूत्रों के मूल उद्देश्य ओकारान्त वाले प्रयोगों का साधुत्व प्रदर्शित करना है और प्राकृत के मूल शब्दों पर संस्कृत का आवरण डाल देना है। विसर्ग सन्धि के कतिपय नियम भी ‘छान्दस्’ की प्राकृत प्रवृत्ति के संस्कृतीकरण के लिए ही लिखे गये हैं। ”
यद्यपि भारतीय आर्यभाषाओं के इतिहास में समकालिक विवरण निर्देश करने हेतु यह एक प्रवृत्ति-सी हो गयी है कि प्राचीन मध्यकालीन तथा आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया जाता है, किन्तु प्रो। ए। एम। घाटगे की राय में उनका विभाजन क्षेत्रीय आधारों पर किया जाना चाहिए।

 

उदाहरण के लिए जो उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में बोली के रूप में विकसित हुई उनको उत्तरपश्चिमी, मध्यप्रदेशीय, पूर्वीय तथा दक्षिणीय विभाग उचित होंगे। इस बात के अनेक प्रमाण उपलब्ध होते हैं कि वेदों में प्राकृततत्त्व कम नहीं है। कदाचित् सर्वप्रथम स्कोल्ड ने यास्क के ‘निरुक्त’ का विवेचन करते हुए सन् 1926 में हमारा ध्यान इस ओर आकृष्ट किया था कि इन शब्दों की व्युत्पत्तियों का विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इनमें से कुछ ध्वनिग्रामीय विशेषताओं के आधार पर मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं की अवस्था की सूचक है।
सन् 1928 में ए.सी. वुलनर ने अपने एक निबन्ध में ‘प्राकृतिक एण्ड नान-आर्यन स्ट्रेटा इन द वाकेबुलरी ऑव संस्कृत’ जो आशुतोष मेमोरियल वाल्यूम ‘में पटना में प्रकाशित हुआ था, इस विषय का परीक्षण कर ऊहापोह किया था। सन् 1931 एच में, आर्टेल ने अपने एक निबन्ध ‘प्राकृतिज्म इन छान्दोग्योपनिषद्’ (गाइगर फेलेशियन वाल्यूम, लिपजिग 1931) में ध्वनिग्रामीय दृष्टि से वैदिक ग्रन्थों में जो शब्द-रूप मिलते हैं, उनका गहराई से अध्ययन प्रस्तुत किया। तदनन्तर ब्लूमफील्ड और इजर्टन ने वैदिक पाठों में उपलब्ध विविधता तथा उनके अन्तर्भेदों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

 

इसी समय वाकरनागल का एक महत्त्वपूर्ण निबन्ध-‘आर्यभाषाओं में प्राकृततत्त्व ‘प्रकाशित हुआ। सन् 1944 से 1946 के बीच टेडेस्को ने चार लेख लिखे, जिनमें यह प्रतिपादित किया गया है परवर्ती संस्कृत-साहित्य की अपेक्षा ऋग्वेद और अथर्ववेद पर मध्यकालिक प्रवृत्तियाँ अधिक स्पष्ट रूप से लक्षित होती है, क्योंकि तब तक संस्कृत भाषा का मानकीकरण नहीं किया गया था। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण अपने शोधपूर्ण निबन्ध में सन् 1966 में एमेन्यू ने ‘द डायलेक्ट्स आँव ओल्ड इण्डो-आर्यन’ में यह सिद्ध किया है कि पाणिनि भी प्राकृत से प्रभावित थे। उनके व्याकरण में स्पष्ट रूप से प्राकृततत्त्व लक्षित होता है। निष्कर्ष रूप में एमेन्यू लिखते हैं-
“ऐसा जान पड़ता है कि कम-से-कम वैदिक संहिताओं के समय में ब्राह्मण साहित्य में ऐसे ध्वनिग्रामीय रूप उपलब्ध हैं जो समकालीन बोलियों के हैं और जिनका प्रमाणीकरण मध्यकालीन बोलियों से होता है।”

 

वैदिक संस्कृत में ‘यहाँ’ के लिए ‘इह’ शब्द का प्रयोग उपलब्ध है, किन्तु पालि और शौरसेनी प्राकृत में ‘इध’ मिलता है। अवेस्ता में यह ‘इद’ है अशोक के गिरनार के शिलालेखों में भी इध शब्द का प्रयोग मिलता है। अतः इससे यह स्पष्ट है कि ‘इह’ की अपेक्षा ‘इध’ रूप प्राचीन है।

 

वेदों की भाषा में और प्राकृतों में अनेक समानताएँ लक्षित होती हैं। सबसे अधिक समानता यह है कि इन दोनों में स्वर भक्ति प्रचुरता से उपलब्ध होती है। पाश्चात्य विद्वानों में जर्मन भाषा के विद्वान रिचर्ड पिशल ने प्राकृत भाषाओं का तुलनात्मक तथा भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत कर उल्लेखनीय कार्य किया है। यथार्थ में वैदिक भाषा के साथ प्राकृतों का तुलनात्मक अध्ययन कर उन्होंने भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में एक नवीन दिशा प्रशस्त की है। वैदिक काल में प्रचलित जनभाषा की सबसे प्रमुख विशेषता है-विभक्तियों का परस्पर विनिमय। आर्यभाषाओं के विकास के इतिहास में यह प्रवृत्ति निरन्तर विकसित होती रही है।

 

अपभ्रंश और अवहट्ट में भी यही प्रवृत्ति मूल में लक्षित होती है। डॉ। हरदेव बाहरी के शब्दों में-

 

“वैदिक काल में भी प्राकृतें थीं और जिस प्रकार वे साहित्यिक भाषा से प्रभावित होती थीं उसी प्रकार साहित्यिक भाषा को भी प्रभावित करती थीं।”

 

वेद में रूपों का वैविध्य और ध्वनिद्वैध जन-भाषाओं के अस्तित्व को प्रमाणित करता है। वेद में अनेक प्रादेशिक तथा प्राकृत शब्द और प्रयोग मिलते हैं। उच्चा, नीचा, पश्चा, भोतु (सं। भवतु) शिथिर (सं। शिथिल) जर्भरी, तुर्फरी, फरफरिका (पर्फरीका) तैमात, ताबुवम, वंच, वेस (सं। वेष), दूलभ (सं। दुर्लभ), दूडम (दुर्दुम) , सुवर्ग (सं। स्वर्ग), इन्दर (इन्द्र) इत्यादि वेद के शब्द प्राकृत के हैं संस्कृत के नहीं।
ब्राह्मण ग्रन्थों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक काल में कई बोलियाँ प्रचलित थीं। अफगानिस्तान से लेकर पंजाब तक पश्चिमोत्तरी बोली प्रचलित थीं। जिसमें ‘र’ की प्रधानता थी। पंजाब से मध्य उत्तर प्रदेश तक मध्यवर्ती बोली का प्रचलन था, जिसमें ‘र्-ल्’ दोनों की प्रधानता थी। पूर्वी बोली का प्रचार-प्रसार देश के पूर्वी भागों में था, जिसमें ‘ल्’ का प्राधान्य था .1 टी। पी। भट्टाचार्य के अनुसार ब्रह्मोपासना तथा तीर्थकरों की अवधारणा में समानता लक्षित होती है। दोनों के दार्शनिक विचारों में साम्य है। प्राग्वैदिक फोनेशियन वैदिक काल में पणि कहे जाते थे जो उत्तरवर्ती काल में व्रात्य तथा वणिक् कहे गये।

 

ऑर्टेल, वाकरनागल, टेडेस्को और जी.वी. देवस्थली के उन शोध कार्यों से यह निश्चित हो जाता है कि ब्लूमफील्ड और एजर्टन ने जिन ‘वैदिक वेरिएण्टस्’ का संकलन किया था, उनमें जो ध्वन्यात्मक रूप उपलब्ध होते हैं, वे अधिकतर मध्यकालीन भारतीय बोलियों से बहुत कुछ समानता लिये हुए हैं। यहाँ तक कि पाणिनी कात्यायन और पजंतलि की रचनाओं में भी प्राकृत का प्रभाव परिलक्षित होता है। यदि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए, तो वेदों में उल्लिखित पणि, असुर और व्रात्यों की भाषा मृदुवाक, मधुरवाणी प्राकृत ही थी। ‘व्रात्य’ शब्द का अर्थ है-व्रत से निष्पन्न। व्रात्यों का यश: कीर्तन ‘ऋग्वेद’ के अनेक सूक्तों में किया गया है।

 

‘अथर्ववेद’ के पन्द्रहवें काण्ड का नाम ही ‘व्रात्यसूक्त’ है। ‘ऋग्वेद’ में स्पष्ट शब्दों में निर्वचन किया गया है3-जो भूतल पर मूर्धस्थानीय है अहिंसक हैं अपने यश और व्रतों की अद्रोह से रक्षा करते हैं, वे व्रात्य हैं। “यही नहीं, ‘वेदमीमांसा’ (पृ। 95) में ज्येष्ठ व्रात्य को ‘अर्हत्’ शब्द से निर्दिष्ट किया गया है। व्रात्यों की भाषा को प्राकृत मानने का आधार ‘शाक्यायन श्रौतसूत्र’ (165.100.28) है। ‘ताण्ड्य ब्राह्मण’ के उल्लेखों से भी यह स्पष्ट होता है कि यज्ञ-याग के विरोधी और वेदों का पठन किये बिना, अदीक्षित ही ज्ञान की चर्चा करने वाले स्वसम्बुद्ध ज्ञानवादी व्रात्य थे। डॉ। शारदा चतुर्वेदी के शब्दों में प्राकृत युग के तीर्थकर और बौद्ध से आरम्भ कर आज के नाथ सम्प्रदाय एवं आधुनिक युग का आउल-बाउल सभी संप्रदाय व्रात्यदलों के हैं। चिरकाल से ही ये लोग अपने तात्त्विक सिद्धान्त अप्रमार्जित प्राकृत भाषा में कहते हैं। इस तरह इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि व्रात्यों की यह प्राकृत भाषा आज के नाथ संप्रदाय और आउल-वाउल संप्रदाय तक प्राकृत भाषा के रूप में चली आ रही है। वास्तव में यह वणिकों तथा व्रतियों की भाषा रही है।

 

यथार्थ में वेदों तथा वैदिक युग की रचना से लेकर आज तक जो भी साहित्य उपलब्ध होता है, वह स्पष्ट रूप में प्राकृतों की छाप लिये हुए है। इस देश के किसी एक भाग में नहीं, किन्तु उत्तर से पश्चिम, पश्चिम से पूर्व तथा पूर्व से दक्षिण तक की लगभग सभी भाषाएँ एवं बोलियाँ प्राकृत से प्रभावपन्न रही हैं। उदाहरण के लिए निम्नलिखित शब्द हैं-चरु (ऋग्वेद 9, 52, 3) बृहत् काष्ठपात्र। प्राकृत में यह ‘चरु’ बुन्देली बिहारी में ‘चरुआ’ व्रज में ‘चरुवा’ हिन्दी में ‘चरु’ ‘चरुआ’ गुजराती में चरु मराठी में लंहदा में चर्वी और सिन्धी में ‘चरू’ है। इसी प्रकार के शब्द हैं-दूलह (अथर्व, 4, 9, 8,) प्राकृत में ‘दूलह’ हिन्दी में ‘दूलह’ हैं। पंजाबी में ‘दूलो’ सिन्धी में ‘दुलहु’, मैथिली में ‘दुल्हा’, राजस्थानी-गुजराती ‘दूलो’ नेपाली में ‘दूलोहो’ एवं व्रज-बुन्देली अवधी आदि में ‘दूलह’ आज भी प्रचलित है। ‘ऋग्वेद’ में प्रयुक्त उच्चा (1, 123, 2) नीचा (2, 13, 12) तथा वो (1, 20, 5) आदि शब्द आज भी हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में ऊँच-नीच वो (लोग) रूप में प्रचलित हैं।

 

यथार्थ में आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं को वेदों से तथा वैदिक युग की बोली से जोड़ने वाली भाषा-परम्परा की कड़ी का नाम प्राकृत है। यह एक ओर जहाँ कुछ बातों में भारोपीय भाषाओं से विशेषतः अवेस्ता से साम्य लिये हुए हैं, वहीं ऐसी विशेषताएँ भी सहेजे हुए है जो इसकी अपनी मौलिकता को प्रकाशित करने वाली है। ह्रस्व ऍ, ऑ का प्रयोग प्राकृत अपभ्रंश की मौलिक विशेषता है। भले ही कालान्तर में लोकभाषा में ऍ, ऑ, का प्रयोग प्रचलित नहीं रहा हो, किन्तु आज तक भाषा का यह प्रवाह इन स्वर-ध्वनियों को सुरक्षित बनाये हुए है। प्राकृतों में और वेदों में एक स्वर के स्थान पर दूसरे स्वर के विनिमय की प्रवृत्ति लक्षित होती है, जैसे कि-‘तन्वम् ‘के लिए तनुवम्, (तै। सं। 7-22-1)’ सवर्ग ‘के लिए’ सुवर्ग ‘( तै। सं। 4-2-3) ‘गोष’ के लिए ‘गोषु’ गच्छति (ऋक् सं। 1,83,1) ‘तम्’ के लिए ‘तमु’ (ऋक् सं। 10,107,6) ‘नु’ (ऋक् सं। 10,168,1) इत्यादि। इसी प्रकार वैदिक भाषा में मूर्धन्य ध्वनियों का प्रयोग ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ का प्रयोग द्विवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग शब्दरुपों में वैकल्पिक प्रयोग, विभक्ति तथा क्रिया-रूपों में लाघव, कृदन्त प्रत्ययों का सरलीकरण आदि विशेषताएँ उसमें प्राकृत-तत्त्व के सम्मिश्रण को सूचित करने वाली है।

 

प्राकृत में यह अन्तर अवश्य है कि प्राचीन भारतीय आर्यभाषा के ‘ऋ’ वर्ण का अभाव है। इसके स्थान पर प्राकृत में अ, इ, उ, ए आदि का प्रयोग मिलता है। अतः प्रो। विल्सन भी मुक्त भाव से यह स्वीकार करते हैं कि प्राकृत उस बोली का प्रतिनिधित्व करती है जो किसी समय में बोली जाती थी। क्योंकि आज जनभाषाओं के जो परिवर्तित रूप उपलब्ध होते हैं, उनके परिवर्तन की जानकारी प्राकृत व्याकरण से ही मिलती है। विशुद्ध काल-व्यापिता की दृष्टि से देखा जाए तो मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं और बोलियों का विनियोग प्राचीन भारतीय आर्यभाषाओं की अपेक्षा अधिक व्यापक है।

 

डॉ। वैद्य के अनुसार आज हमें अपभ्रंश से एक प्राकृत भाषा का ही बोध होता है। जिसकी विशेषता चण्ड, हेमचन्द्र, त्रिविक्रम, पुरुषोत्तम, मार्कण्डेय तथा अन्य वैयाकरणों द्वारा निश्चित है। अपभ्रंश का अध्ययन भारत की आधुनिक भाषाओं के-विशेषतः हिन्दी, गुजराती, मराठी, बँगला तथा उनकी उपभाषाओं के विकास को ठीक-ठीक समझने के लिए अत्यावश्यक है। “

 

प्राचीन भारतीय आर्यभाषाओं के विकास-क्रम में प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं का महत्त्वपूर्ण योग रहा है। ये भाषाएँ विभिन्न युगों में बोली तथा भाषाओं में होने वाली परिवर्तनों की संसूचक है। डॉ। चटर्जी ने ठीक ही कहा है कि ‘वैदिक’ शब्द का ‘संस्कृत’, ‘प्राकृत’ और भाषा का प्रयोग संक्षिप्त और सुविधा के लिए तथा भारतीय आर्यभाषाओं की तीन अवस्थाओं के लिए किया गया है, और ‘प्राकृत’ तथा ‘भाषा’ के मध्य में संक्रमणशील अवस्था जो कि प्राकृत या मभाआ की ही एक अंग थी, सुविधा की दृष्टि से ‘अपभ्रंश’ कही जाती है।

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

5 quintessentially Indian things that will have to go if we #RemoveMughalsFromBooks

खड़ी बोली हिंदी के भाषिक और साहित्यिक विकास में जिन भाषाओँ और बोलियों का विशेष योगदान रहा है उनमे  अपभ्रंश और अवहट्ट भाषाएँ भी है| हिंदी को अपभ्रंश और अवहट्ट से जो कुछ भी मिला उसका पूरा लेखा जोखा इन तीनों की भाषिक और साहित्यिक संपत्ति का तुलनात्मक विवेचन करने से प्राप्त होता है |

अपभ्रंश और अवहट्ट का व्याकरणिक रूप –

अपभ्रंश कुछ -कुछ और अवहट्ट बहुत कुछ वियोगात्मक भाषा बन रही थी, अर्थात विकारी शब्दों (संगे, सर्वनाम, विशेषण,और क्रिया) का रूपांतर संस्कृत की विभक्तियों से मुक्त होकर पर्सर्गों और स्वतंत्र शब्दों या शब्द्खंडों की सहायता से होने लगा था | इससे भाषा के सरलीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई | अपभ्रंश और अवहट्ट का सबसे बड़ा योगदान पर्सर्गों के विकास में है | सर्वनामों में हम और तुम काफी पुराने हैं | शेष सर्वनामों के रूप भी अपभ्रंश और अवहट्ट में संपन्न हो गए थे | अपभ्रंश मइं से अवहट्ट में मैं हो गया था | तुहुँ से तू प्राप्त हो गया था | बहुत से अपभ्रंश और अवहट्ट के सर्वनाम पूर्वी और पश्चिमी बोलियों को मिले | सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्रिया की रचना में क्रिदंतीय रूपों का विकास था जो अपभ्रंश और अवहट्ट में हुआ | भविष्यत् काल के रूप इतर बोलियों को मिले ; अवहट्ट में, भले हीं छिटपुट, ग-रूप आने लगा था | इसी से कड़ी बोली को गा गे गी प्राप्त हुए | अपभ्रंश और अवहट्ट में संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग भी ध्यातव्य है | इसी के आगे हिंदी में सकना,चुभना,आना,लाना,जाना,लेना,देना,उठाना,बैठना का अंतर क्रियाओं से योग करने पर संयुक्त क्रियाओं का विकास हुआ और उनमें नई अर्थवत्ता विकसित हुई | अपभ्रंश काल से तत्सम शब्दों का पुनरुज्जीवन, विदेशी शब्दावली का ग्रहण, देशी शब्दों का गठन द्रुत गति से बढ़ चला | प्राकृत तो संस्कृत की अनुगामिनी थी – तद्भव प्रधान | अपभ्रंश और अवहट्ट की उदारता ने हिंदी को अपना शब्द्भंदर भरने में भारी सहायता दी |
साहित्यिक योगदान
सिद्धों और नाथों की गीत परंपरा को संतों ने आगे बढ़ाया | सिद्धों के से नैतिक और धार्मिक आचरण सम्बन्धी उपदेश भी संत्काव्य के प्रमुख लक्ष्मण हैं | इस प्रकार हिंदी साहित्य के इतिहास में चारण काव्य और भक्तिकाल का सूफी काव्य, संतकाव्य, रामभक्ति काव्य और कृष्णभक्ति काव्य को प्रेरित करने में अपभ्रंश और अवहट्ट काव्य परम्परा का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त रहा है| यदि उस पूर्ववर्ती काव्य में पाए जाने वाले नये-नये उपमानों, नायिकाओं के नख-शिख वर्णनों, नायकों के सौन्दर्य के चित्रण, छंद और अलंकार योजना को गहराई से देखा जाये तो स्पष्ट हो जायेगा की रीति काल के साहित्य तक उसका प्रभाव जारी रहा | ऐसा लगता है सन १८०० तक थोड़े अदल-बदल के साथ वैसी ही भाषा, वैसे ही काव्यरूप और अभिव्यक्ति के वैसे ही उपकरण काम में लाये जाते रहे | क्रान्ति आई तो खड़ी बोली के उदय के साथ |
अपभ्रंश और अवहट्ट में दोहा-चौपाई जैसे वार्णिक छंदों का भरपूर प्रयोग हुआ है | हिंदी के प्रबंध काव्यों-सूफियों की रचनाओं में और रामभक्तों के चरित-काव्यों-में इन्ही दो को अधिक अपनाया गया है| अपभ्रंश और अवहट्ट में चऊपई १५ मात्राओं का छंद  था | हिंदी के कवियों ने इसमें एक मात्रा बढाकर चौपाई बना लिया | छप्पय छंद का रिवाज़ भी उत्तरवर्ती अपभ्रंश में चल पड़ा था | दोहा को हिंदी के मुक्तक काव्य के लिए अधिक उपयुक्त माना गया | कबीर, तुलसी, रहीम, वृन्द और विशेषता बिहारी ने इसका अत्यंत सफल प्रयोग किया |
अलंकार योजना में अपभ्रंश और अवहट्ट के कवियों ने लोक में प्रचलित नए-नए उपमान और प्रतीक लाकर एक अलग परंपरा की स्थापना की जिसका हिंदी के कवियों ने विशेष लाभ उठाया | कबीर जैसे लोकप्रिय कवियों

में इस तरह के प्रयोग अधिकता से मिलते हैं |
अरबी का प्रभाव फ़ारसी के द्वारा हिंदी पर पड़ा मगर सीधे नहीं | अरबी फ़ारसी में अनेक ध्वनिया हिंदी से भिन्न है, परन्तु उनमे पाँच ध्वनियाँ ऐसी है जिनका प्रयोग हिंदी लेखन में पाया जाता है, अर्थात, क़,ख़,ग़,ज़,फ़ |इनमे क़ का  उच्चारण पूरी तरह अपनाया नहीं जा सका| खड़ी बोली हिंदी को अंग्रेजी की एक स्वर-ध्वनि और दो व्यंजन-ध्वनिया अपनानी पड़ी क्योंकि बहुत से ऐसे शब्द हिंदी हिंदी ने उधार में लिए है जिनमे ये ध्वनिया आती है | अंग्रेजी से अनुवाद करके सैंकड़ो-हजारो शब्द ज्ञान-विज्ञान और  साहित्य में अपना रखे हैं | अंग्रेजी से सम्पर्क होने के बाद से हिंदी गद्य साहित्य के विकास में अभूतपूर्व प्रगति हुई है | गद्य के सभी विधाओं में बांगला साहित्य अग्रणी रहा |

आरंभिक हिंदी- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपना “हिंदी साहित्य का इतिहास ” सिद्धो की वाणियों से शुरू किया है | सरहपा, कन्हापा आदि सिद्ध कवियों ने अपनी भाषा को जन से अधिक निकट रखा | इसमें हिंदी के रूप असंदिग्ध है| कुछ विद्वानों ने जैन कवि पुष्यदंत को हिंदी का आदि कवि माना है| पउम चरिउ के महाकवि स्वैम्भू ने अपनी भाषा को देशी भाषा कहा है | अवधी के प्रथम कवि मुल्ला दाऊद की भाषा को आरंभिक हिंदी नहीं कहा जा सकता, उनका रचनाकाल चौदहवीं शताब्दी का अंतिम चरण माना गया | उनसे पहले अन्य बोलियों की साफ़ सुथरी रचनाएँ उपलब्ध है |
नाथ जोगियों की वाणी में आरंभिक हिंदी का रूप अधिक निखरा हुआ है| इसी परंपरा को बाद में जयदेव, नामदेव, त्रिलोचन,बेनी, सधना, कबीर आदि ने आगे चलाया |
इससे भी स्पष्ट और परिष्कृत खड़ी बोली का दक्खिनी रूप है जिसमें शरफुद्दीन बू-अली ने लिखा |
9 . शुद्ध खड़ी बोली (हिन्दवी की) के नमूने अमीर खुसरो की शायरी में प्राप्त होते है | खुसरो की भाषा का देशीपन देखिये |
10.खड़ी बोली में रोड़ा कवि की रचना “रौल बेलि” की खड़ी बोली कुछ पुरानी |
11. राजस्थान और उसके आस-पास हिंदी के इस काल में चार प्रकार की भाषा का प्रयोग होता रहा है | एक तो अपभ्रंश-मिश्रित पश्चिमी हिंदी जिसके नमूने स्वयंभू के पऊम चरिऊ में मिल सकते हैं, दूसरी डिंगल, तीसरी शुद्ध मरु भाषा (राजस्थानी) और चौथी पिंगल भाषा |  राजस्थान इस युग में साहित्य और संस्कृति का एक मात्र केंद्र रह गया था | सारे उत्तरी भारत में पठान आक्रमणकारियों की मारकाट, वाही-तबाही मची थी | हिंदी के आदिकाल का अधिकतम साहित्य राजस्थान से ही प्राप्त हुआ है |
12. डिंगल को चारण वर्ग की भाषा कह सकते हैं |यह लोकप्रचलित भाषा नहीं थी | पिंगल एक व्यापक क्षेत्र की भाषा थी जो सरस और कोमल तो थी ही, शास्त्र-सम्मत और व्यवस्थित भी थी | यह ब्रजमंडल की भाषा नहीं थी |
आदिकाल की भाषा के ये तेरह रूप है जो प्रारंभिक या पुरानी हिंदी के आधार है| पं० चक्रधर शर्मा गुलेरी का मत सही जान पड़ता है की 11 वी शताब्दी की परवर्ती अपभ्रंश (अर्थात अवहट्ट) से पुरानी हिंदी का उदय माना जा सकता है| किन्तु, संक्रांति काल की सामग्री इतनी कम है की उससे किसी भाषा के ध्वनिगत और व्याकरणिक लक्षणों की  पूरी-पूरी जानकारी नहीं मिल सकती |

अपभ्रंश काव्य

जब से प्राकृत बोलचाल की भाषा न रह गई तभी से अपभ्रंश साहित्य का आविर्भाव समझना चाहिए। पहले जैसे ‘गाथा’ या ‘गाहा’ कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही पीछे ‘दोहा’ या ‘दूहा’ कहने से अपभ्रंश या लोकप्रचलित काव्यभाषा का बोध होने लगा। इस पुरानी प्रचलित काव्यभाषा में नीति, श्रृंगार, वीर आदि की कविताएँ तो चली ही आती थीं, जैन और बौद्ध धार्माचार्य अपने मतों की रक्षा और प्रचार के लिए भी इसमें उपदेश आदि की रचना करते थे। प्राकृत से बिगड़कर जो रूप बोलचाल की भाषा ने ग्रहण किया वह भी आगे चलकर कुछ पुराना पड़ गया और काव्य रचना के लिए रूढ़ हो गया। अपभ्रंश नाम उसी समय से चला। जब तक भाषा बोलचाल में थी तब तक वह भाषा या देशभाषा ही कहलाती रही, जबवह भी साहित्य की भाषा हो गई तब उसके लिए अपभ्रंश शब्द का व्यवहार होने लगा।
भरत मुनि (विक्रम तीसरी शताब्दी) ने ‘अपभ्रंश’ नाम न देकर लोकभाषा को ‘देशभाषा’ ही कहा है। वररुचि के ‘प्राकृतप्रकाश’ में भी अपभ्रंश का उल्लेख नहीं है। अपभ्रंश नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है, जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि. संवत् 650 के पहले) को संस्कृत; प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है। भामह (विक्रम सातवीं शती) ने भी तीनों भाषाओं का उल्लेख किया है। बाण ने ‘हर्षचरित’ में संस्कृत कवियों के साथ भाषाकवियों का भी उल्लेख किया है। इस प्रकार अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी में रचना होने का पता हमें विक्रम की सातवीं शताब्दी में मिलता है। उस काल की रचना के नमूने बौध्दों की वज्रयान शाखा के सिध्दों की कृतियों के बीच मिलतेहैं।
संवत् 990 में देवसेन नामक एक जैन ग्रंथकार हुए हैं। उन्होंने भी ‘श्रावकाचार’ नाम की एक पुस्तक दोहों में बनाई थी, जिसकी भाषा अपभ्रंश का अधिक प्रचलित रूप लिए हुए है, जैसे
जो जिण सासण भाषियउ सो मइ कहियउ सारु।
जो पालइ सइ भाउ करि सो सरि पावइ पारु
इन्हीं देवसेन ने ‘दब्ब-सहाव-पयास’ (द्रव्य-स्वभाव प्रकाश) नामक एक और ग्रंथ दोहों में बनाया था, जिसका पीछे से माइल्ल धावल ने ‘गाथा’ या साहित्य की प्राकृत में रूपांतर किया। इसके पीछे तो जैन कवियों की बहुत-सी रचनाएँ मिलती हैं, जैसे श्रुतिपंचमी कथा, योगसार, जसहरचरिउ, णयकुमारचरिउ इत्यादि। ध्यान देने की बात यह है कि चरित्रकाव्य या आख्यान काव्य के लिए अधिकतर चौपाई, दोहे की पद्ध ति ग्रहण की गई है। पुष्पदंत (संवत् 1029) के ‘आदिपुराण’ और ‘उत्तरपुराण’ चौपाइयों में हैं। उसी काल के आसपास का ‘जसहरचरिउ’ (यशधार चरित्र) भी चौपाइयों में रचा गया है, जैसे
बिणुधावलेण सयडु किं हल्लइ । बिणु जीवेण देहु किं चल्लइ।
बिणु जीवेण मोक्ख को पावइ । तुम्हारिसु किं अप्पइ आवइ
चौपाई-दोहे की यह परंपरा हम आगे चलकर सूफियों की प्रेम कहानियों में, तुलसी के रामचरितमानस में तथा छत्राप्रकाश, ब्रजविलास, सबलसिंह चौहान के महाभारत इत्यादि अनेक आख्यान काव्यों में पाते हैं।
बौद्ध धर्म विकृत होकर वज्रयान संप्रदाय के रूप में देश के पूरबी भागों में बहुत दिनों से चला आ रहा था। इन बौद्ध तांत्रिकों के बीच वामाचार अपनी चरम सीमा को पहुँचा। ये बिहार से लेकर आसाम तक फैले थे और सिद्ध कहलाते थे। ‘चौरासी सिद्ध ‘ इन्हीं में हुए हैं जिनका परंपरागत स्मरण जनता को अब तक है। इन तांत्रिक योगियों को लोग अलौकिक शक्ति सम्पन्न समझते थे। ये अपनी सिद्धि यों और विभूतियों के लिए प्रसिद्ध थे। राजशेखर ने ‘कर्पूरमंजरी’ में भैरवानंद के नाम से एक ऐसे ही सिद्ध योगी का समावेश किया है। इस प्रकार जनता पर इन सिद्ध योगियों का प्रभाव विक्रम की दसवीं शताब्दी से ही पाया जाता है, जो मुसलमानों के आने पर पठानों के समय तक कुछ-न-कुछ बना रहा। बिहार के नालंदा और विक्रमशिला नामक प्रसिद्ध विद्यापीठ इनके अड्डे थे। बख्तियार खिलजी ने इन दोनों स्थानों कोजब उजाड़ा तब से ये तितर-बितर हो गए। बहुत-से भोट आदि अन्य देशों को चले गए।
चौरासी सिध्दों के नाम ये हैंलूहिपा, लीलापा, विरूपा, डोंभिपा, शबरीपा, सरहपा, कंकालीपा, मीनपा, गोरक्षपा, चौरंगीपा, वीणापा, शांतिपा, तंतिपा, चमरिपा, खड्गपा, नागार्जुन, कण्हपा, कर्णरिपा, थगनपा, नारोपा, शीलपा, तिलोपा, अजनंगपा छत्रापा, भद्रपा, दोखंधिपा, अजोगिपा, कालपा, धोंभीपा, कंकणपा, कमरिपा, डेंगिपा, भदेपा, तंधोपा, कुक्कुरिपा, कुचिपा, धर्मपा, महीपा, अचिंतिपा, भल्लहपा, नलिनपा, भूसुकुपा, इंद्रभूति, मेकोपा, कुठालिपा, कमरिपा, जालंधारपा, राहुलपा, घर्वरिपा, धोकरिपा, मेदिनीपा, पंकजपा, घंटापा, जोगीपा, चेलुकपा, गुंडरिपा, निर्गुणपा, जयानंत, चर्पटीपा, चंपकपा, भिखनपा, भलिपा, कुमरिपा, चँवरिपा, मणिभद्रपा (योगिनी), कनखलापा (योगिनी), कलकलपा, कतालीपा, धाहुरिपा, उधारिपा, कपालपा, किलपा, सागरपा, सर्वभक्षपा, नागबोधिपा, दारिकपा, पुतलिपा, पनहपा, कोकालिपा, अनंगपा, लक्ष्मीकरा (योगिनी), समुदपा, भलिपा।
(‘पा’ आदरार्थक ‘पाद’ शब्द है। इस सूची के नाम पूर्वापर कालानुक्रम से नहीं हैं। इनमें से कई एक समसामयिक थे।)
वज्रयानशाखा में जो योगी ‘सिद्ध ‘ के नाम से प्रसिद्ध हुए वे अपने मत का संस्कार जनता पर भी डालना चाहते थे। इससे वे संस्कृत रचनाओं के अतिरिक्त अपनी बानी अपभ्रंशमिश्रित देशभाषा या काव्यभाषा में भी बराबर सुनाते रहे। उनकी रचनाओं का एक संग्रह पहले म म. हरप्रसाद शास्त्री ने बँग्ला अक्षरों में ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ के नाम से निकाला था। पीछे त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन जी भोट देश में जाकर सिध्दों की और बहुत-सी रचनाएँ लाए। सिध्दों में सबसे पुराने ‘सरह’ (सरोजवज्र भी नाम है) हैं जिनका काल डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य1 ने विक्रम संवत् 690 निश्चित किया है। उनकी रचना के कुछ नमूने नीचे दिए जाते हैं
अंतस्साधना पर जोर और पंडितों को फटकार
पंडिअ सअल सत्ता बक्खाणइ। देहहि रुद्ध बसंत न जाणइ।
अमणागमण ण तेन विखंडिअ। तोवि णिलज्ज भणइ हउँ पंडिअ

जहि मन पवन न संचरइ, रवि ससि नांह पवेश।
तहि बढ चित्त बिसाम करु, सरहे कहिअ उवेस
घोर अंधारे चंदमणि जिमि उज्जोअ करेइ
परम महासुह एखु कणे दुरिअ अशेष हरेइ
जीवंतह जो नउ जरइ सो अजरामर होइ
गुरु उपएसें बिमलमइ सो पर धाण्णा कोइ
दक्षिण मार्ग छोड़कर वाममार्ग ग्रहण का उपदेश
नादनबिंदुनरविनशशिमंडल। चिअराअ सहाबे मूकल।
उजुरे उजु छाँड़ि मा लेहु रे बंक। निअहि बोहि मा जाहु रे लंक
लूहिपा या लूइपा (संवत् 830 के आसपास) के गीतों से कुछ उद्ध रणए
काआ तरुवर पंच बिड़ाल। चंचल चीए पइठो काल।
दिट करिअ महासुह परिमाण। लूइ भणइ गुरु पुच्छिअ जाण

भाव न होइ, अभाव ण जाइ। अइस संबोहे को पतिआइ?
लूइ भणइ बट दुलक्ख बिणाण। तिअ धाए बिलसइ उह लागेण।
विरूपा (संवत् 900 के लगभग) की वारुणीप्रेरित अंतर्मुख साधना की पद्ध ति देखिए
सहजे थिर करि वारुणी साधा । अजरामर होइ दिट काँधा।
दशमि दुआरत चिद्द देखइआ । आइल गराहक अपणे बहिआ।
चउशठि घड़िए देट पसारा । पइठल गराहक नाहि निसारा।
कण्हपा (संवत् 900 के उपरांत) की बानी के कुछ खंड नीचे उध्दृत किए जाते हैं
एक्कणकिज्जइ मंत्र ण तंत। णिअ धारणी लइ केलि करंत।
णिअ घर घरणी जाब ण मज्जइ। ताब की पंचवर्ण बिहरिज्जइ
जिमि लोण बिलज्जइ पाणिएहि, तिमि घरिणी लइ चित्त।
समरस जइ तक्खणे जइ पुणु ते सम नित्ता
वज्रयानियों की योगतंत्र साधनाओं में मद्य तथा स्त्रियों का विशेषत: डोमिनी, रजकी आदि का अबाध सेवन एक आवश्यक अंग था। सिद्ध कण्हपा डोमिनी का आह्वान गीत इस प्रकार गाते हैं
नगर बाहिरे डोंबी तोहरि कुड़ियाछइ।
छोइ जाइ सो बाह्म नाड़िया।
आलो डोंबि! तोए सम करिब म साँग। निघिण कण्ह कपाली जोइलाग
एक्क सो पदमा चौषट्टि पाखुड़ी। तहि चढ़ि नाचअ डोंबी बापुड़ी
हालो डोंबी! तो पुछमि सदभावे। अइससि जासि डोंबी काहरि नावे

गंगा जउँना माझे रे बहइ नाई।
ताहि बुड़िलि मातंगि पोइआ लीले पार करेइ।
बाहतु डोंबी, बाहलो डोंबी बाट त भइल उछारा।
सद्गुरु पाअ पए जाइब पुणु जिणउरा

काआ नावड़ि ख्रटि मन करिआल। सदगुरु बअणे धर पतवाल।
चीअ थिर करि गहु रे नाई। अन्न उपाये पार ण जाई
कापालिक जोगियों से बचे रहने का उपदेश घर में सास-ननद आदि देती ही रहती थीं, पर वे आकर्षित होती ही थीं जैसे कृष्ण की ओर गोपियाँ होती
थीं
राग देस मोह लाइअ छार। परम भीख लवए मुत्तिहार।
मारिअ सासु नणंद घरे शाली।माअ मारिया, कण्ह भइल कबाली
थोड़ा घट के भीतर का विहार देखिए
नाड़ि शक्ति दिअ धारिअ खदे । अनह डमरू बाजइ बीर नादे।
काण्ह कपाली जोगी पइठ अचारे। देह नअरी बिहरइ एकारे
इसी ढंग का कुक्कुरिपा (संवत् 900 के उपरांत) का एक गीत लीजिए
ससुरी निंद गेल, बहुड़ी जागअ । कानेट चोर निलका गइ मागअ।
दिवसइ बहुणी काढ़इ उरे भाअ । रति भइले कामरू जाअ
रहस्यमार्गियों की सामान्य प्रवृत्ति के अनुसार सिद्ध लोग अपनी बानी को ऐसी पहेली के रूप में भी रखते थे जिसे कोई बिरला ही बूझ सकता है। सिद्ध तंतिपा की अटपटी बानी सुनिए
बेंग संसार बाड़हिल जाअ । दुहिल दूध के बेंटे समाअ।
बलद बिआएल गविआ बाँझे । पिटा दुहिए एतिना साँझे।
जो सो बुज्झी सो धानि बुधी । जो सो चोर सोई साधी।
निते निते षिआला षिहे षम जूझअ । ढेंढपाएर गीत बिरले बूझअ।
बौद्ध धर्म ने जब तांत्रिक रूप धारण किया, तब उसमें पाँच ध्यानी बुध्दा और उनकी शक्तियों के अतिरिक्त अनेक बोधिसत्वों की भावना की गई जो सृष्टि का परिचालन करते हैं। वज्रयान में आकर ‘महासुखवाद’ का प्रवर्तन हुआ। प्रज्ञा और उपाय के योग से इस महासुख दशा की प्राप्ति मानी गई। इसे आनंदस्वरूप ईश्वरत्व ही समझिए। निर्वाण के तीन अवयव ठहराए गए शून्य, विज्ञान और महासुख। उपनिषद् में तो ब्रह्मानंद के सुख के परिणाम का अंदाजा कराने के लिए उसे सहवाससुख से सौ गुना कहा गया] था, पर वज्रयान में निर्वाण के सुख का स्वरूप ही सहवाससुख के समान बताया गया। शक्तियों सहित देवताओं के ‘युगनद्ध ‘ स्वरूप की भावना चली और उनकी नग्न मूर्तियाँ सहवास की अनेक अश्लील मुद्राओं में बनने लगीं, जो कहीं-कहीं अब भी मिलती हैं। रहस्य या गुह्य की प्रवृत्ति बढ़ती गई और ‘गुह्यसमाज’ या ‘श्रीसमाज’ स्थान-स्थान पर होने लगे। ऊँचे-नीचे कई वर्णों की स्त्रियों को लेकर मद्यपान के साथ अनेक बीभत्स विधान वज्रयानियों की साधना के प्रधान अंग थे। सिद्धि प्राप्त करने के लिए किसी स्त्री का (जिसे शक्ति योगिनी या महामुद्रा कहते थे) योग या सेवन आवश्यक था। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिस समय मुसलमान भारत आए उस समय देश के पूरबी भागों में (बिहार, बंगाल और उड़ीसा में) धर्म के नाम पर बहुत दुराचार फैला था।
रहस्यवादियों की सार्वभौम प्रवृत्ति के अनुसार ये सिद्ध लोग अपनी बानियों के सांकेतिक दूसरे अर्थ भी बताया करते थे, जैसे
काआ तरुवर पंच बिड़ाल
(पंच बिड़ाल बौद्ध शास्त्रों में निरूपित पंच प्रतिबंध आलस्य, हिंसा, काम, विचिकित्सा और मोह। ध्यान देने की बात यह है कि विकारों की यही पाँच संख्या निर्गुण धारा के संतों और हिन्दी के सूफी कवियों ने ली। हिंदू शास्त्रों में विकारों की बँधी संख्या 6 है।)
गंगा जउँना माझे बहइ रे नाई।
(इला-पिंगला के बीच सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से शून्य देश की ओर यात्रा) इसी से वे अपनी बानियों की भाषा को ‘संधयाभाषा’ कहते थे। 2
ऊपर उध्दृत थोड़े-से वचनों से ही इसका पता लग सकता है कि इन सिध्दों द्वारा किस प्रकार के संस्कार जनता में इधर-उधर बिखेरे गए थे। जनता की श्रध्दा शास्त्रज्ञ विद्वानों पर से हटा कर अंतर्मुख साधना वाले योगियों पर जमाने का प्रयत्न ‘सरह’ के इस वचन ‘घट में ही बुद्ध हैं यह नहीं जानता, आवागमन को भी खंडित नहीं किया, तो भी निर्लज्ज कहता है कि मैं पंडित हूँ’ में स्पष्ट झलकता है। यहाँ पर यह समझ रखना चाहिए कि योगमार्गी बौध्दों ने ईश्वरत्व की भावना कर ली थीए
प्रत्यात्मवेद्यो भगवान उपमावर्जित: प्रभु:।
सर्वग: सर्वव्यापी च कत्तर् हत्तर् जगत्पत्ति:।
श्रीमान् वज्रसत्वोऽसौ व्यक्त भाव प्रकाशक:।
एव्यक्त भावानुगत तत्वसिद्धि
(दारिकपा की शिष्या सहजयोगिनी चिंता कृत)
इसी प्रकार जहाँ रवि, शशि, पवन आदि की गति नहीं वहाँ चित्त को विश्राम कराने का दावा ‘ऋजु’ (सीधे, दक्षिण) मार्ग छोड़ कर ‘बंक’ (टेढ़ा, वाम) मार्ग ग्रहण करने का उपदेश भी है। सिद्ध कण्हपा कहते हैं कि ‘जब तक अपनी गृहिणी का उपभोग न करेगा तब तक पंचवर्ण की स्त्रियों के साथ विहार क्या करेगा?’ वज्रयान में ‘महासुह’ (महासुख) वह दशा बतलाई गई है जिसमें साधक शून्य में इस प्रकार विलीन हो जाता है जिस प्रकार नमक पानी में। इस दशा का प्रतीक खड़ा करने के लिए ‘युगनद्ध ‘ (स्त्री-पुरुष का आलिंगनबद्व जोड़ा) की भावना की गई। कण्हपा का यह वचन कि ‘जिमि लोण बिलिज्जइ पाणि एहि तिमि घरणी लइ चित्त’ इसी सिध्दांत का द्योतक है। कहने की आवश्यकता नहीं कि कौल कापालिक आदि इन्हीं वज्रयानियों से निकले। कैसा ही शुद्ध और सात्विक धर्म हो, ‘गुह्य’ और ‘रहस्य’ के प्रवेश से वह किस प्रकार विकृत और पाखंडपूर्ण हो जाता है, वज्रयान इसका प्रमाण है।
गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल भी बौध्दों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिध्दों में गोरखनाथ (गोरक्षपा) भी गिन लिए गए हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मार्ग अलग कर लिया। योगियों की इस हिंदू शाखा ने वज्रयानियों के अश्लील और बीभत्स विधानों से अपने को अलग रखा, यद्यपि शिव शक्ति की भावना के कारण कुछ श्रृंगारमयी वाणी भी नाथपंथ के किसी-किसी ग्रंथ (जैसे शक्ति संगमतंत्र) में मिलती है। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिध्दों का लीला क्षेत्र भारत का पूरबी भाग था। गोरख ने अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में राजपूताने और पंजाब में किया। पंजाब में नमक के पहाड़ों के बीच बालनाथ योगी का स्थान बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। जायसी की पद्मावत में ‘बालनाथ का टीला’ आया है।
गोरखनाथ के समय का ठीक पता नहीं। राहुल सांकृत्यायन जी ने वज्रयानी सिध्दों की परंपरा के बीच उनका जो स्थान रखा है, उसके अनुसार उनका समय विक्रम की दसवीं शताब्दी आता है। उनका आधार वज्रयानी सिध्दों की एक पुस्तक ‘रत्नाकर जोपम कथा’ है, जिसके अनुसार मीननाथ के पुत्र मत्स्येंद्रनाथ कामरूप के मछवाहे थे और चर्पटीपा के शिष्य होकर सिद्ध हुए थे। पर सिध्दों की अपनी सूची में सांकृत्यायन जी ने ही मत्स्येंद्र को जलंधर का शिष्य लिखा है, जो परंपरा से प्रसिद्ध चला आता है। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) थे, यह तो प्रसिद्ध ही है। सांकृत्यायन जी ने मीननाथ या मीनपा को पालवंशी राजा देवपाल के समय में अर्थात् संवत 900 के आसपास माना है। यह समय उन्होंने किस आधार पर स्थिर किया, पता नहीं। यदि सिध्दों की उक्त पुस्तक में मीनपा के राजा देवपाल के समय में होने का उल्लेख होता तो वे उसकी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते। चौरासी सिध्दों के नामों में हेरफेर होना बहुत संभव है। हो सकता है कि गोरक्षपा और चौरंगीपा के नाम पीछे से जुड़ गए हों और मीनपा से मत्स्येंद्र का नाम साम्य के अतिरिक्त कोई संबंध न हो। ब्रह्मानंद ने दोनों को बिल्कुल अलग माना भी है (सरस्वती भवनस्टडीज)। संदेह यह देखकर और भी होता है कि सिध्दों की नामावली में और सब सिध्दों की जाति और देश का उल्लेख है, पर गोरक्ष और चौरंगी का कोई विवरण नहीं। अत: गोरखनाथ का समय निश्चित रूप से विक्रम की दसवीं शताब्दी मानते नहीं बनता।
महाराष्ट्र के संत ज्ञानदेव ने, जो अलाउद्दीन के समय (संवत् 1358) में थे, अपने को गोरखनाथ की शिष्य परंपरा में कहा है। उन्होंने यह परंपरा इस क्रम से बताई है
आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गैनीनाथ, निवृत्तिनाथ और ज्ञानेश्वर।
इस महाराष्ट्र परंपरा के अनुसार गोरखनाथ का समय महाराज पृथ्वीराज के पीछे आता है। नाथ परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ के गुरु जलंधरनाथ माने जाते हैं। भोट के ग्रंथों में भी सिद्ध जलंधर आदिनाथ कहे गये हैं। सब बातों का विचार करने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जलंधर ने ही सिध्दों से अपनी पंरपरा अलग की और पंजाब की ओर चले गए। वहाँ काँगड़े की पहाड़ियों तथा और स्थानों में रमते रहे। पंजाब का जलंधर शहर उन्हीं का स्मारक जान पड़ता है। नाथ संप्रदाय के किसी ग्रंथ में जलंधर को बालनाथ भी कहा गया] है। नमक के पहाड़ों के बीच ‘बालनाथ का टीला’ बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। मत्स्येंद्र जलंधर के शिष्य थे, नाथपंथियों की यह धारणा ठीक जान पड़ती है। मीनपा के गुरु चर्पटीनाथ हो सकते हैं, पर मत्स्येंद्र के गुरु जलंधर ही थे। सांकृत्यायन जी ने गोरख का जो समय स्थिर किया है वह मीनपा को राजा देवपाल का समसामयिक और मत्स्येंद्र का पिता मानकर। मत्स्येंद्र का मीनपा से कोई संबंध न रहने पर उक्त समय मानने का कोई आधार नहीं रह जाता और पृथ्वीराज के समय के आसपास ही विशेषत: कुछ पीछे गोरखनाथ के होने का अनुमान दृढ़ होता है।
जिस प्रकार सिध्दों की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है, उसी प्रकार नाथों की संख्या नौ। अब भी लोग ‘नवनाथ’ और ‘चौरासी सिद्ध ‘ कहते सुने जाते हैं। ‘गोरक्षसिध्दांतसंग्रह’ में मार्ग प्रवर्तकों के नाम गिनाए गए हैं
नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चंद्र, सत्यनाथ, भीमनाथ, गोरक्षनाथ, चर्पट, जलंधर और मलयार्जुन।
इन नामों में नागार्जुन, चर्पट और जलंधर सिध्दों की परंपरा में भी हैं। नागार्जुन (संवत् 702) प्रसिद्ध रसायनी भी थे। नाथपंथ में रसायन की सिद्धि है। नाथपंथ सिध्दों की परंपरा से ही छंटकर निकला है, इसमें कोई संदेह नहीं।
इतिहास से इस बात का पता लगता है कि महमूद गजनवी के भी कुछ पहले सिंध और मुलतान में कुछ मुसलमान बस गए थे जिनमें कुछ सूफी भी थे। बहुत-से सूफियों ने भारतीय योगियों से प्राणायाम आदि की क्रियाएँ सीखीं, इसका उल्लेख मिलता है। अत: गोरखनाथ चाहे विक्रम की दसवीं शताब्दी में हुए हों, चाहे तेरहवीं में उनका मुसलमानों से परिचित होना अच्छी तरह माना जा सकता है, क्योंकि जैसा कहा जा चुका है, उन्होंने अपने पंथ का प्रचार पंजाब और राजपूताने की ओर किया।
इतिहास और जनश्रुति से इस बात का पता लगता है कि सूफी फकीरों और पीरों के द्वारा इस्लाम को जनप्रिय बनाने का उद्योग भारत में बहुत दिनों तक चलता रहा। पृथ्वीराज के पिता के समय में ख्वाजा मुईनुद्दीन के अजमेर आने और अपनी सिद्धि का प्रभाव दिखाने के गीत मुसलमानों में अब तक गाए जाते हैं। चमत्कारों पर विश्वास करने वाली भोली-भाली जनता के बीच अपना प्रभाव फैलाने में इन पीरों और फकीरों को सिध्दों और योगियों से मुकाबला करना पड़ा, जिनका प्रभाव पहले से जमा चला आ रहा था। भारतीय मुसलमानों के बीच, विशेषत: सूफियों की परंपरा में, ऐसी अनेक कहानियाँ चलीं जिनमें किसी पीर ने किसी सिद्ध या योगी को करामात में पछाड़ दिया। कई योगियों के साथ ख्वाजा मुईनुद्दीन का भी ऐसा ही करामाती दंगल कहा जाता है।
ऊपर कहा जा चुका है कि गोरखनाथ की हठयोग साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी अत: उसमें मुसलमानों के लिए भी आकर्षण था। ईश्वर से मिलाने वाला योग हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए एक सामान्य साधना के रूप में आगे रखा जा सकता है, यह बात गोरखनाथ को दिखाई पड़ी थी। उसमें मुसलमानों को अप्रिय मूर्तिपूजा और बहुदेवोपासना की आवश्यकता न थी। अत: उन्होंने दोनों के विद्वेषभाव को दूर करके साधना का एक सामान्य मार्ग निकालने की संभावना समझी थी और वे उसका संस्कार अपनी शिष्य परंपरा में छोड़ गए थे। नाथ संप्रदाय के सिध्दांत ग्रंथों में ईश्वरोपासना के बाह्यविधानों के प्रति उपेक्षा प्रकट की गई है, घट के भीतर ही ईश्वर को प्राप्त करने पर जोर दिया गया है, वेदशास्त्र का अध्ययन व्यर्थ ठहराकर विद्वानों के प्रति अश्रध्दा प्रकट की गई है, तीर्थाटन आदि निष्फल कहे गए हैं।
1. योगशास्त्रां पठेन्नित्यं किमन्यै: शास्त्रविस्तरै:।
2. न वेदो वेद इत्याहुर्वेदा वेदो निगद्यते।
परात्मा विद्यते येन स वेदो वेद उच्यते।
न संधया संधिरित्याहु: संधया संधिर्निगद्यते
सुषुम्णा संधिग: प्राण: सा संधया संधिरुच्यते
अंतस्साधना के वर्णन में हृदय दर्पण कहा गया है जिसमें आत्मा के स्वरूप का प्रतिबिंब पड़ता है
3. हृदयं दर्पणं यस्य मनस्तत्रा विलोकयेत्।
दृश्यते प्रतिबिम्बेन आत्मरूपं सुनिश्चितम्
परमात्मा की अनिर्वचनीयता इस ढंग से बताई गई है
शिवं न जानामि कथं वदामि। शिवं च जानामि कथं वदामि।
इसके संबंध में सिद्ध लूहिपा भी कह गए हैं
भाव न होइ, अभाव न होइ। अइस संबोहे को पतिआइ?
‘नाद’ और बिंदु’ संज्ञाएँ वज्रयान सिध्दों में बराबर चलती रहीं। गोरखसिध्दांत में उनकी व्याख्या इस प्रकार की गई है
नाथांशो नादो, नादांश: प्राण:, शक्त्यंशो बिन्दु: बिन्दोरंश: शरीरम्।
एगोरक्षसिध्दांतसंग्रह (गोपीनाथ कविराज संपादित)
‘नाद’ और ‘बिंदु’ के योग से जगत् की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोगी दोनों मानते थे।
तीर्थाटन के संबंध में जो भाव सिध्दों का था, वही हठयोगियों का भी रहा। ‘चित्तशोधन प्रकरण’ में वज्रयानी सिद्ध आर्यदेव (कर्णरीपा) का वचन है
प्रतरन्नपि गंगायां नैव श्वान शुद्धि मर्हति।
तस्माद्ध र्मधियां पुंसां तीर्थस्नानं तु निष्फलम्
धर्मे यदि भवेत् स्नानात् कैवत्तर्नां कृतार्थता।
नक्तं दिवं प्रविष्टानां मत्स्यादीनां तु का कथा
जनता के बीच इस प्रकार के प्रभाव क्रमश: ऐसे गीतों के रूप में निर्गुणपंथी संतों द्वारा आगे भी बराबर फैलते रहे, जैसे
गंगा के नहाये कहो को नर तरिगे, मछरी न तरी जाको पानी में घर है।
यहाँ पर यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि चौरासी सिध्दों में बहुत-से मछुए, चमार, धोबी, डोम, कहार, लकड़हारे, दरजी तथा बहुत-से शूद्र कहे जाने वाले लोग थे। अत: जाति-पाँति के खंडन तो वे आप ही थे। नाथ संप्रदाय भी जब फैला, तब उसमें भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों के बहुत-से लोग आए जो शास्त्रज्ञान सम्पन्न न थे, जिनकी बुद्धि का विकास बहुत सामान्य कोटि का था।3 पर अपने को रहस्यदर्शी प्रदर्शित करने के लिए शास्त्रज्ञ पंडितों और विद्वानों को फटकारना भी वे जरूरी समझते थे। सद्गुरु का माहात्म्य सिध्दों में भी और उनमें भी बहुत अधिक था।
नाथपंथ के जोगी कान की लौ में बड़े-बड़े छेद करके स्फटिक के भारी-भारी कुंडल पहनते हैं, इससे कनफटे कहलाते हैं। जैसा पहले कहा जा चुका है, इस पंथ का प्रचार राजपूताने तथा पंजाब की ओर ही अधिक रहा। अत: जब मत के प्रचार के लिए इस पंथ में भाषा के भी ग्रंथ लिखे गए तब उधर की ही प्रचलित भाषा का व्यवहार किया गया। उन्हें मुसलमानों को भी अपनी बानी सुनानी रहती थी जिनकी बोली अधिकतर दिल्ली के आसपास की खड़ी बोली थी। इससे उसका मेल भी उनकी बानियों में अधिकतर रहता था। इस प्रकार नाथपंथ के इन जोगियों ने परंपरागत साहित्य की भाषा या काव्यभाषा से, जिसका ढाँचा नागर अपभ्रंश या ब्रज का था, अलग एक ‘सधुक्कड़ी’ भाषा का सहारा लिया जिसका ढाँचा कुछ खड़ी बोली लिए राजस्थानी था। देशभाषा की इन पुस्तकों में पूजा, तीर्थाटन आदि के साथ हज, नमाज आदि का भी उल्लेख पाया जाता है। इस प्रकार की एक पुस्तक का नाम है, ‘काफिरबोध’4
नाथपंथ के उपदेशों का प्रभाव हिंदुओं के अतिरिक्त मुसलमानों पर भी प्रारंभ काल में ही पड़ा। बहुत-से मुसलमान, निम्न श्रेणी के ही सही, नाथपंथ में आए। अब भी इस प्रदेश में बहुत-से मुसलमान जोगी गेरुआ वस्त्र पहने, गुदड़ी की लंबी झोली लटकाए, सारंगी बजा-बजाकर ‘कलि में अमर राजा भरथरी’ के गीत गाते फिरते हैं और पूछने पर गोरखनाथ को अपना आदिगुरु बताते हैं। ये राजा गोपीचंद के भी गीत गाते हैं जो बंगाल में चटगाँव के राजा थे और जिनकी माता मैनावती कहीं गोरख की शिष्या और कहीं जलंधर की शिष्या कही गई हैं।
देशभाषा में लिखी गोरखपंथ की पुस्तकें गद्य और पद्य दोनों में हैं और विक्रम संवत् 1400 के आसपास की रचनाएँ हैं। इनमें सांप्रदायिक शिक्षा है। जो पुस्तकें पाई गई हैं उनके नाम ये हैं गोरख-गणेश गोष्ठी, महादेव-गोरख-संवाद, गोरखनाथ जी की सत्रह कला, गोरख बोध, दत्ता-गोरख-संवाद, योगेश्वरी साखी, नरवइ बोध, विराट पुराण, गोरखसार, गोरखनाथ की बानी। ये सब ग्रंथ गोरख के नहीं, उनके अनुयायी शिष्यों के रचे हैं। गोरख के समय जो भाषा लिखने-पढ़ने में व्यवहृत होती थी उसमें प्राकृत या अपभ्रंश शब्दों का थोड़ा या बहुत मेल अवश्य रहता था। उपर्युक्त पुस्तकों में ‘नरवइ बोध’ के नाम (नरवइ त्र नरपति) में ही अपभ्रंश का आभास है। इन पुस्तकों में अधिकतर संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद हैं। यह बात उनकी भाषा के ढंग से ही प्रकट होती है। ‘विराट पुराण’ संस्कृत के ‘वैराट पुराण’ का अनुवाद है। गोरखपंथ के ये संस्कृत ग्रंथ पाए जाते हैं
सिद्ध -सिध्दांत-पद्ध ति, विवेक मार्तंड, शक्ति-संगम-तंत्र, निरंजन पुराण, वैराटपुराण।
हिन्दी भाषा में लिखी पुस्तकें अधिकतर इन्हीं के अनुवाद या सार हैं। हाँ, ‘साखी’ और ‘बानी’ में शायद कुछ रचना गोरख की हों। पद का एक नमूना देखिए
स्वामी तुम्हई गुर गोसाईं । अम्हेजोसिषसबदएकबूझिबा
निरारंबे चेला कूण बिधि रहै । सतगुरु होइ स पुछया कहै
अबधू रहिया हाटे बाटे रूष विरष की छाया।
तजिबा काम क्रोध लोभ मोह संसार की माया
सिध्दों और योगियों का इतना वर्णन करके इस बात की ओर ध्यान दिलाना हम आवश्यक समझते हैं कि उनकी रचनाएँ तांत्रिक विधान, योगसाधना, आत्मनिग्रह, श्वास-निरोधा, भीतरी चक्रों और नाड़ियों की स्थिति, अंतर्मुख साधना के महत्व इत्यादि की सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, जीवन की स्वाभाविक अनूभूतियों और दशाओं से उनका कोई संबंध नहीं। अत: वे शुद्ध साहित्य के अंतर्गत नहीं आतीं। उनको उसी रूप में ग्रहण करना चाहिए जिस रूप में ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ग्रंथ। उनका वर्णन यहाँ केवल दो बातों के विचार से किया गया है
(1) पहली बात है भाषा। सिध्दों की उध्दृत रचनाओं की भाषा देशभाषा मिश्रित अपभ्रंश या पुरानी हिन्दी की काव्य भाषा है, यह तो स्पष्ट है। उन्होंने भरसक उसी सर्वमान्य व्यापक काव्यभाषा में लिखा है जो उस समय गुजरात, राजपूताने और ब्रजमंडल से लेकर बिहार तक लिखने-पढ़ने की शिष्ट भाषा थी। पर मगध में रहने के कारण सिध्दों की भाषा में कुछ पूरबी प्रयोग भी (जैसे भइले, बूड़िलि) मिले हुए हैं। पुरानी हिन्दी की व्यापक काव्यभाषा का ढाँचा शौरसेनीप्रसूत अपभ्रंश अर्थात् ब्रज और खड़ी बोली (पश्चिमी हिन्दी) का था। वही ढाँचा हम उध्दृत रचनाओं के जो, सो मारिआ, पइठो, जाअ, किज्जइ, करंत जाब (जब तब), ताब (तब तक), मइअ, कोइ, इत्यादि प्रयोगों में पाते हैं। ये प्रयोग मागधी प्रसूत पुरानी बँग्ला के नहीं, शौरसेनीप्रसूत पुरानी पश्चिमी हिन्दी के हैं। सिद्ध कण्हपा की रचनाओं को यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो एक बात साफ झलकती है। वह यह कि उनके उपदेश की भाषा तो पुरानी टकसाली हिन्दी (काव्यभाषा) है, पर गीत की भाषा पुरानी बिहारी या पूरबी बोली मिली है। यही भेद हम आगे चलकर कबीर की ‘साखी’, ‘रमैनी’ (गीत) की भाषा में पाते हैं। साखी की भाषा तो खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य ‘सधुक्कड़ी’ भाषा है पर रमैनी के पदों की भाषा में काव्य की ब्रजभाषा और कहीं-कहीं पूरबी बोली भी है।
सिध्दों में ‘सरह’ सबसे पुराने अर्थात्, वि. संवत् 690 के हैं। अत: हिन्दी काव्यभाषा के पुराने रूप का पता हमें विक्रम की सातवीं शताब्दी के अंतिम चरण में लगता है।
(2) दूसरी बात है सांप्रदायिक प्रवृत्ति और उसके संस्कार की परंपरा। वज्रयानी सिध्दों ने निम्न श्रेणी की प्राय: अशिक्षित जनता के बीच किस प्रकार के भावों के लिए जगह निकाली, यह दिखाया जा चुका है। उन्होंने बाह्य पूजा, जाति-पाँति, तीर्थाटन इत्यादि के प्रति उपेक्षा बुद्धि का प्रचार किया, रहस्यदर्शी बनकर शास्त्रज्ञ विद्वानों का तिरस्कार करने और मनमाने रूपकों के द्वारा अटपटी बानी में पहेलियाँ बुझाने का रास्ता दिखाया, घट के भीतर चक्र, नाड़ियाँ, शून्य देश आदि मानकर साधना करने की बात फैलाई और नाद, बिंदु सुरति, निरति, ऐसे शब्दों की उद्ध रणी करना सिखाया। यही परंपरा अपने ढंग पर नाथपंथियों ने भी जारी रखी। आगे चलकर भक्तिकाल में निर्गुण संत संप्रदाय किस प्रकार वेदांत के ज्ञानवाद, सूफियों के प्रेमवाद तथा वैष्णवों के अहिंसावाद और प्रपत्तिवाद को मिलाकर सिध्दों और योगियों द्वारा बनाए हुए इस रास्ते पर चल पड़ा, यह आगे दिखाया जाएगा। कबीर आदि संतों को नाथपंथियों से जिस प्रकार ‘साखी’ और ‘बानी’ शब्द मिले, उसी प्रकार ‘साखी’ और ‘बानी’ के लिए बहुत कुछ सामग्री और ‘सधुक्कड़ी’ भाषा भी।
ये ही दो बातें दिखाने के लिए इस इतिहास में सिध्दों और योगियों का विवरण दिया गया है। उनकी रचनाओं का जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियों और दशाओं से कोई संबंध नहीं। वे सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, अत: शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकतीं। उन रचनाओं की परंपरा को हम काव्य या साहित्य की कोई धारा नहीं कह सकते। अत: धर्म संबंधी रचनाओं की चर्चा छोड़, अब हम सामान्य साहित्य की जो कुछ सामग्री मिलती है, उसका उल्लेख उनके संग्रहकर्ताओं और रचयिताओं के क्रम से करते हैं।
हेमचंद्र गुजरात के सोलंकी राजा सिद्ध राज जयसिंह (संवत् 1150-1199) और उनके भतीजे कुमारपाल (संवत् 1199-1230) के यहाँ इनका बड़ा मान था। ये अपने समय के सबसे प्रसिद्ध जैन आचार्य थे। इन्होंने एक बड़ा भारी व्याकरण ग्रंथ ‘सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन’ सिद्ध राज के समय में बनाया, जिसमें संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का समावेश किया। अपभ्रंश के उदाहरणों में इन्होंने पूरे दोहे या पद्य उध्दृत किए हैं, जिनमें से अधिकांश इनके समय से पहले के हैं। कुछ दोहे देखिए
भल्ला हुआ जु मारिया बहिणि महारा कंतु।
लज्जेजं तु वयंसिअहु जइ भग्गा घरु एंतु
(भला हुआ जो मारा गया, हे बहिन! हमारा कंत। यदि वह भागा हुआ घर आता तो मैं अपनी समवयस्काओं से लज्जित होती।)
जइ सो न आवइ, दुइ ! घरु काँइ अहोमुहु तुज्झु।
वयणु ज खंढइ तउ, सहि ए ! सो पिउ होइ न मुज्झु
(हे दूती? यदि वह घर नहीं आता, तो तेरा क्यों अधोमुख है? हे सखी! जो तेरा वचन खंडित करता है श्लेष से दूसरा अर्थ; जो तेरे मुख पर चुंबन द्वारा क्षत करता है वह मेरा प्रिय नहीं।)
जे महु दिण्णा दिअहड़ा दइएँ पवसंतेण।
ताण गणंतिए अंगुलिउँ जज्जरियाउ नहेण
जो दिन या अवधि दयित अर्थात् प्रिय ने प्रवास जाते हुए मुझे दिए थे उन्हें नख से गिनते-गिनते मेरी उँगलियाँ जर्जरित हो गईं।
पिय संगमि कउ निद्दड़ी? पियहो परक्खहो केंव।
मइँ बिन्निवि विन्नासिया, निंद्द न एँव न तेंव
(प्रिय के संगम में नींद कहाँ और प्रिय के परोक्ष में भी क्यों कर आवे? मैं दोनों प्रकार से विनाशिता हुई न यों नींद, न त्यों।)
अपने व्याकरण के उदाहरणों के लिए हेमचंद्र ने भट्टी के समान एक ‘द्वयाश्रय काव्य’ की भी रचना की है जिसके अंतर्गत ‘कुमारपालचरित’ नामक एक प्राकृत काव्य भी है। इस काव्य में भी अपभ्रंश के पद्य रखे गए हैं।
सोमप्रभ सूरि ये भी एक जैन पंडित थे। इन्होंने संवत् 1241 में ‘कुमारपालप्रतिबोध’ नामक एक गद्यपद्यमय संस्कृत-प्राकृत काव्य लिखा जिसमें समय-समय पर हेमचंद्र द्वारा कुमारपाल को अनेक प्रकार के उपदेश दिए जाने की कथाएँ लिखी हैं। यह ग्रंथ अधिकांश प्राकृत में ही है बीच-बीच में संस्कृत श्लोक और अपभ्रंश के दोहे आए हैं। अपभ्रंश के पद्यों में कुछ तो प्राचीन हैं और कुछ सोमप्रभ और सिद्धि पाल कवि के बनाए हैं। प्राचीन में से कुछ दोहे दिए जाते हैं
रावण जायउ जहि दिअहि दह मुह एक सरीरु।
चिंताविय तइयहि जणणि कवणु पियावउँ खीरु
(जिस दिन दस मुँह एक शरीर वाला रावण उत्पन्न हुआ तभी माता चिंतित हुई कि किसमें दूध पिलाऊँ।)
बेस बिसिट्ठह बारियइ जइवि मणोहर गत्ता।
गंगाजल पक्खालियवि सुणिहि कि होइ पवित्ता?
(वेश विशिष्टों को वारिए अर्थात्, बचाइए, यदि मनोहर गात्र हो तो भी। गंगाजल से धोई कुतिया क्या पवित्र हो सकती है?)
पिय हउँ थक्किय सयलु दिणु तुह विरहग्गि किलंत।
थोड़इ जल जिमि मच्छलिय तल्लोविल्लि करंत
(हे प्रिय! मैं सारे दिन तेरी विरहाग्नि में वैसी ही कड़कड़ाती रही जैसे थोड़े जल में मछली तलवेली करती है।)
जैनाचार्य मेरुतुंग इन्होंने संवत् 1361 में ‘प्रबंधचिंतामणि’ नामक एक संस्कृत ग्रंथ ‘भोजप्रबंध’ के ढंग का बनाया जिसमें बहुत-से पुराने राजाओं के आख्यान संग्रहीत किए। इन्हीं आख्यानों के अंतर्गत बीच-बीच में अपभ्रंश के पद्य भी उध्दृत हैं, जो बहुत पहिले से चले आते थे। कुछ दोहे तो राजा भोज के चाचा मुंज के कहे हुए हैं। मुंज के दोहे अपभ्रंश या पुरानी हिन्दी के बहुत ही पुराने नमूने कहे जा सकते हैं। मुंज ने जब तैलंग देश पर चढ़ाई की थी तब वहाँ के राजा तैलप ने उसे बंदी कर लिया था और रस्सियों से बाँधकर अपने यहाँ ले गया था। वहाँ उसके साथ तैलप की बहन मृणालवती से प्रेम हो गया। इस प्रसंग के दोहे देखिए
झाली तुट्टी किं न मुउ, किं न हुएउ छरपुंज।
हिंदइ दोरी बँधीयउ जिम मंकड़ तिम मुंज
(टूट पड़ी हुई आग से क्यों न मरा? क्षारपुंज क्यों न हो गया? जैसे डोरी में बँधा बंदर वैसे घूमता है मुंज।)
मुंज भणइ, मुणालवइ! जुब्बण गयुं न झूरि।
जइ सक्कर सय खंड थिय तो इस मीठी चूरि
(मुंज कहता है, हे मृणालवती! गए हुए यौवन को न पछता। यदि शर्करा सौ खंड हो जाय तो भी यह चूरी हुई ऐसी ही मीठी रहेगी।)
जा मति पच्छइ संपजइ सा मति पहिली होइ।
मुंज भणइ, मुणालवइ! बिघन न बेढइ कोइ
(जो मति या बुद्धि पीछे प्राप्त होती है यदि पहिले हो तो मुंज कहता है, हे मृणालवति! विघ्न किसी को न घेरे।)
बाह बिछोड़बि जाहि तुहँ हउँ तेवइँ का दोसु।
हिअयट्ठिय जइ नीसरहि, जाणउँ मुंज सरोसु
(बाँह छुड़ाकर तू जाता है, मैं भी वैसे ही जाती हूँ क्या हर्ज है? हृदयस्थित अर्थात् हृदय से यदि निकले तो मैं जानूँ कि मुंज रूठा है।)
एउ जम्मु नग्गुहं गिउ, भड़सिरि खग्गु न भग्गु।
तिक्खाँ तुरियँ न माणियाँ, गोरी गली न लग्गु
(यह जन्म व्यर्थ गया। न सुभटों के सिर पर खड़्ग टूटा, न तेज घोड़े सजाए, न गोरी या सुंदरी के गले लगा।)
फुटकल रचनाओं के अतिरिक्त वीरगाथाओं की परंपरा के प्रमाण भी अपभ्रंश मिली भाषा में मिलते हैं।
विद्याधर इस नाम के एक कवि ने कन्नौज के किसी राठौर सम्राट (शायद जयचंद) के प्रताप और पराक्रम का वर्णन किसी ग्रंथ में किया था। ग्रंथ का पता नहीं पर कुछ पद्य ‘प्राकृत-पिंगल सूत्र’ में मिलते हैं, जैसे
भअ भज्जिअ बंगा भंगु कलिंगा तेलंगा रण मुत्ति चले।
मरहट्ठा धिट्ठा लग्गिअ कट्ठा सोरट्ठा भअ पाअ पले
चंपारण कंपा पब्बअ झंपा उत्थी उत्थी जीव हरे।
कासीसर राणा किअउ पआणा, बिज्जाहर भण मंतिवरे
यदि विद्याधार को समसामयिक कवि माना जाय तो उसका समय विक्रम की तेरहवीं शताब्दी समझा जा सकता है
शारंगधर इनका आयुर्वेद का ग्रंथ तो प्रसिद्ध ही है। ये अच्छे कवि और सूत्रकार भी थे। इन्होंने ‘शारंगधर पद्ध ति’ के नाम से एक सुभाषित संग्रह भी बनाया है और अपना परिचय भी दिया है। रणथंभौर के सुप्रसिद्ध वीर महाराज हम्मीरदेव के प्रधान सभासदों में राघवदेव थे। उनके भोपाल, दामोदर और देवदास ये तीन पुत्र हुए। दामोदर के तीन पुत्र हुए शारंगधर, लक्ष्मीधर और कृष्ण। हम्मीरदेव संवत् 1357 में अलाउद्दीन की चढ़ाई में मारे गए थे। अत: शारंगधर के ग्रंथों का समय उक्त संवत् के कुछ पीछे अर्थात् विक्रम की चौदहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में मानना चाहिए।
‘शारंगधर पद्ध ति’ में बहुत-से शाबर मंत्र और भाषा-चित्र-काव्य दिए हैं जिनमं बीच-बीच में देशभाषा के वाक्य आए हैं। उदाहरण के लिए श्रीमल्लदेव राजा की प्रशंसा में कहा हुआ यह श्लोक देखिए
नूनं बादलं छाइ खेह पसरी नि:श्राण शब्द: खर:।
शत्रुं पाड़ि लुटालि तोड़ हनिसौं एवं भणन्त्युद्भटा:
झूठे गर्वभरा मघालि सहसा रे कंत मेरे कहे।
कंठे पाग निवेश जाह शरणं श्रीमल्लदेवं विभुम्
परंपरा से प्रसिद्ध है कि शारंगधर ने हम्मीर रासो नामक एक वीरगाथा काव्य की भी भाषा में रचना की थी। यह काव्य आजकल नहीं मिलता उसके अनुकरण पर बहुत पीछे का लिखा हुआ एक ग्रंथ ‘हम्मीररासो’ नाम का मिलता है। ‘प्राकृत-पिंगलसूत्र’ उलटते-पलटते मुझे हम्मीर की चढ़ाई, वीरता आदि के कई पद्य छंदों के उदाहरणों में मिले। मुझे पूरा निश्चय है कि ये पद्य असली ‘हम्मीररासो’ के ही हैं। अत: ऐसे कुछ पद्य नीचे दिए जाते हैं
ढोला मारिय ढिल्लि महँ मुच्छिउ मेच्छ सरीर।
पुर जज्जल्ला मंतिवर चलिअ वीर हम्मीर
चलिअ वीर हम्मीर पाअभर मेइणि कंपइ।
दिगमग णह अंधार धूलि सुररह आच्छाइहि
दिगमग णह अंधार आण खुरसाणुक उल्ला।
दरमरि दमसि विपक्ख मारु ढिल्ली मह ढोल्ला
¼दिल्ली में ढोल बजाया गया, म्लेच्छों के शरीर मूर्च्र्छित हुए। आगे मंत्रिवर जज्जल को करके वीर हम्मीर चले। चरणों के भार से पृथ्वी काँपती है। दिशाओं के मार्गों और आकाश में अंधेरा हो गया है, धूल सूर्य के रथ को आच्छादित करती है। ओल में खुरासनी ले आए। विपक्षियों को दलमल कर दबाया, दिल्ली में ढोल बजाया।)
पिंघउ दिड़ सन्नाह, बाह उप्परि पक्खर दइ।
बंधु समदि रण धाँसेउ साहि हम्मीर बअण लइ
अड्डुउ णहपह भमउँ, खग्ग रिपु सीसहि झल्लउँ।
पक्खर पक्खर ठेल्लि पेल्लि पब्बअ अप्फालउँ
हम्मीर कज्ज जज्जल भणइ कोहाणल मह मइ जलउँ।
सुलितान सीस करवाल दइ तज्जि कलेवर दिअ चलउँ
(दृढ़ सन्नाह पहले, वाहनों के ऊपर पक्खरें डालीं। बंधुबांधवों से विदा लेकर रण में धँसा हम्मीर साहि का वचन लेकर। तारों को नभपथ में फिराऊँ, तलवार शत्रु के सिर पर जड़न्नँ, पाखर से पाखर ठेल-पेल कर पर्वतों को हिला डालूँ। जज्जल कहता है कि हम्मीर के कार्य के लिए मैं क्रोध से जल रहा हूँ। सुलतान के सिर पर खड्ग देकर शरीर छोड़कर मैं स्वर्ग को जाऊँ।)
पअभर दरमरु धारणि तरणि रह धुल्लिअ झंपिअ।
कमठ पिट्ठ टरपरिअ, मेरु मंदर सिर कंपिअ
कोहे चलिअ हम्मीर बीर गअजुह संजुत्तो।
किअउ कट्ठ, हा कंद! मुच्छि मेच्छिअ के पुत्तो
(चरणों के भार से पृथ्वी दलमल उठी। सूर्य का रथ धूल से ढँक गया। कमठ की पीठ तड़फड़ा उठी; मेरुमंदर की चोटियाँ कंपित हुईं। गजयूथ के साथ वीर हम्मीर क्रुद्ध होकर चले। म्लेच्छों के पुत्र हा कष्ट! करके रो उठे और मूर्च्छित हो गए।)
अपभ्रंश की रचनाओं की परंपरा यहीं समाप्त होती है। यद्यपि पचास-साठ वर्ष पीछे विद्यापति (संवत् 1460 में वर्तमान) ने बीच-बीच में देशभाषा के भी कुछ पद्य रखकर अपभ्रंश में दो छोटी-छोटी पुस्तकें लिखीं, पर उस समय तक अपभ्रंश का स्थान देशभाषा ले चुकी थी। प्रसिद्ध भाषा तत्वविद् सर जार्ज ग्रियर्सन जब विद्यापति के पदों का संग्रह कर रहे थे, उस समय उन्हें पता लगा था कि ‘कीर्तिलता’ और ‘कीर्तिपताका’ नाम की प्रशस्ति संबंधी दो पुस्तकें भी उनकी लिखी हैं। पर उस समय इनमें से किसी का पता न चला। थोड़े दिन हुए, महामहोपाध्याय पं. हरप्रसाद शास्त्री नेपाल गए थे। वहाँ राजकीय पुस्तकालय में ‘कीर्तिलता’ की एक प्रति मिली जिसकी नकल उन्होंने ली।
इस पुस्तक में तिरहुत के राजा कीर्तिसिंह की वीरता, उदारता, गुणग्राहकता आदि का वर्णन, बीच में कुछ देशभाषा के पद्य रखते हुए, अपभ्रंश भाषा के दोहा, चौपाई, छप्पय, छंद गाथा आदि छंदों में किया गया है। इस अपभ्रंश की विशेषता यह है कि यह पूरबी अपभ्रंश है। इसमें क्रियाओं आदि के बहुत-से रूप पूरबी हैं। नमूने के लिए एक उदाहरण लीजिए
रज्ज लुद्ध असलान बुद्धि बिक्कम बले हारल।
पास बइसि बिसवासि राय गयनेसर मारल
मारंत राय रणरोल पडु, मेइनि हा हा सद्द हुअ।
सुरराय नयर नाअर-रमणि बाम नयन पप्फुरिअ धुअ
दूसरी विशेषता विद्यापति के अपभ्रंश की यह है कि प्राय: देशभाषा कुछ अधिक लिए हुए है और उसमें तत्सम, संस्कृत शब्दों का वैसा बहिष्कार नहीं है। तात्पर्य यह है कि वह प्राकृत की रूढ़ियों से उतनी अधिक बँधी नहीं है। उसमें जैसे इस प्रकार का टकसाली अपभ्रंश है
पुरिसत्तोण पुरिसओ, नहिं पुरिसओ जम्म मत्तोन।
जलदानेन हु जलओ, न हु जलओ पुंजिओ धूमो
वैसे ही इस प्रकार की देशभाषा या बोली भी है
कतहुँ तुरुक बरकर । बाट जाए ते बेगार धार
धारि आनय बाभन बरुआ । मथा चढ़ावइ गायक चुरुआ
हिंदू बोले दूरहि निकार । छोटउ तुरुका भभकी मार
अपभ्रंश की कविताओं के जो नए-पुराने नमूने अब तक दिए जा चुके हैं, उनसे इस बात का ठीक अनुमान हो सकता है कि काव्य भाषा प्राकृत की रूढ़ियों से कितनी बँधी हुई चलती रही। बोलचाल तक के तत्सम संस्कृत शब्दों का पूरा बहिष्कार उसमें पाया जाता है। ‘उपकार’, ‘नगर’, ‘विद्या’, ‘वचन’ ऐसे प्रचलित शब्द भी ‘उअआर’, ‘नअर’, ‘बिज्जा’, ‘बअण’ बनाकर ही रखे जाते थे। ‘जासु, ‘तासु’ ऐसे रूप बोलचाल से उठ जाने पर भी पोथियों में बराबर चलते रहे। विशेषण विशेष्य के बीच विभक्तियों का समानाधिकरण अपभ्रंश काल में कृदंत विशेषणों से बहुत कुछ उठ चुका था, पर प्राकृत की परंपरा के अनुसार अपभ्रंश की कविताओं में कृदंत विशेषणों में मिलता है जैसे ‘जुब्बण गयुं न झूरि’ गए को यौवन को न झूर गए यौवन को न पछता। जब ऐसे उदाहरणों के साथ हम ऐसे उदाहरण भी पाते हैं जिनमें विभक्तियों का ऐसा समानाधिकरण नहीं है तब यह निश्चय हो जाता है कि उसका सन्निवेश पुरानी परंपरा का पालन मात्र है। इस परंपरा पालन का निश्चय शब्दों की परीक्षा से अच्छी तरह हो जाता है। जब हम अपभ्रंश के शब्दों में ‘मिट्ठ’ और ‘मीठी’ दोनों रूपों का प्रयोग पाते हैं तब उस काल में ‘मीठी’ शब्द के प्रचलित होने में क्या संदेह हो सकता है?
ध्यान देने पर यह बात भी लक्षित होगी कि ज्यों-ज्यों काव्यभाषा देशभाषा की ओर अधिक प्रवृत्त होती गई त्यों-त्यों तत्सम संस्कृत शब्द रखने में संकोच भी घटता गया। शारंगधर के पद्यों और कीर्तिलता में इसका प्रमाण मिलता है।
संदर्भ
1. बुद्धि स्ट एसोटेरियम
2. डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य, बुद्धि स्ट एसोटेरियम।
3. दि सिस्टम ऑव मिस्टिक कल्चर इंट्रोडयूस्ड बाई गोरखनाथ डज नाट सीम टु हैव वाइड्ली थू्र दि एजुकेटेड क्लासेज। गोपीनाथ कविराज ऐंड झा (सरस्वती भवन स्टडीज)।
4. यह तथा इसी प्रकार की कुछ और पुस्तकें मेरे प्रिय शिष्य डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल के पास हैं।

हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

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अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति

दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे वे बेचारी स्थिर हो गईं। उनकी अनस्थिरता- उनका विकास बंद हो गया। यह लिखित प्राकृत की बात हुई, कथित प्राकृत की नहीं। जो प्राकृत लोग बोलते थे उसका विकास बंद नहीं हुआ। वह बराबर विकसित होती, अथवा यों कहिए कि बिगड़ती गई। लिखित प्राकृत के आचार्यों और पंडितों ने इसी विकास-पूर्ण भाषा का अपभ्रंश नाम से उल्लेख किया है। उनके हिसाब से वह भाषा भ्रष्‍ट हो गई थी। सर्वसाधारण की भाषा होने के कारण अपभ्रंश का प्रचार बढ़ा और साहित्‍य की स्थिरीभूत प्राकृत का कम होता गया। धीरे-धीरे उसके जानने वाले दो ही चार रह गए। फल यह हुआ कि वह मृत भाषाओं की पदवी को पहुँच गई। उसका प्रचार बिल्‍कुल ही बंद हो गया। वह ”मर” गई। अब क्‍या हो? लोग लिखना पढ़ना जानते थे। मूर्ख थे ही नहीं। लिखने के लिए ग्रंथों की रचना के लिए कोई भाषा चाहिए जरूर थी। इससे वही अपभ्रंश काम में आने लगी। उसी में पुस्‍तकें लिखी जाने लगीं। इन पुस्‍तकों में से कुछ अब तक उपलब्‍ध हैं। इनकी भाषा उस समय की कथित भाषा का नमूना है। जिस तरह की भाषा में ये पुस्‍तकें हैं उसी तरह की भाषा उस समय बोली जाती थी। पर किस समय व‍ह बोली जाती थी, इसका ठीक-ठीक पता नहीं चलता। जो प्रमाण मिले हैं उनसे सिर्फ इतना ही मालूम होता है कि छठे शतक में अपभ्रंश भाषा में कविता होती थी। ग्‍यारहवें शतक के आरंभ तक इस तरह की कविता के प्रमाण मिलते हैं। इस पिछले, अर्थात् ग्‍यारहवें, शतक में अपभ्रंश भाषाओं का प्रचार प्रायः बंद हो चुका था। वे भी मरण को प्राप्‍त हो चुकी थीं। तीसरे प्रकार की प्राकृत-भाषाओं के लिखित नमूने बारहवें शतक के अंत और तेरहवें के प्रारंभ से मिलते हैं। और लिखी जाने के पहले इन तीसरी तरह की प्राकृत भाषाओं का रूप जरूर स्थिर हो गया होगा। अतएव कह सकते हैं कि हिंदुस्‍तान की वर्तमान संस्‍कृतोत्‍पन्‍न भाषाओं का जन्‍म कोई 1000 ईसवी के लगभग हुआ।

अपभ्रंश भाषाओं के भेद

इस देश की वर्तमान भाषाओं के विकास की खोज के लिए हमें लिखित प्राकृतों के नहीं, किंतु लिखित अपभ्रंश भाषाओं के आधार पर विचार करना चाहिए। किसी-किसी ने परिमार्जित संस्‍कृत से वर्तमान भाषाओं की उत्‍पत्ति मानी है। यह भूल है। इस समय की बोल-चाल की भाषाएँ न संस्‍कृत से निकली हैं, न प्राकृत से, किंतु अपभ्रंश से। इसमें कोई संदेह नहीं कि संस्‍कृत और प्राकृत की सहायता से वर्तमान भाषाओं से संबंध रखने वाली अनेक बातें मालूम हो सकती हैं, पर ये भाषाएँ उनकी जड़ नहीं। जड़ के लिए तो अपभ्रंश भाषाएँ ढूँढ़नी होंगी।

लिखित साहित्‍य में सिर्फ एक ही अपभ्रंश भाषा का नमूना मिलता है। वह नागर अपभ्रंश है। उसका प्रचार बहुत करके पश्चिमी भारत में था। पर प्राकृत व्‍याकरणों में जो नियम दिए हुए हैं उनसे अन्‍यान्‍य अपभ्रंश भाषाओं के मुख्‍य-मुख्‍य लक्षण मालूम करना कठिन नहीं। यहाँ पर हम अपभ्रंश भाषाओं की सिर्फ नामावली देते हैं और यह बतलाते हैं कि कौन वर्तमान भाषा किस अपभ्रंश से निकली है।

बाहरी शाखा की अपभ्रंश भाषाएँ

सिंध नदी के अधोभाग के आसपास जो देश है उस में ब्राचड़ा नाम की अपभ्रंश भाषा बोली जाती थी। वर्तमान समय की सिंधी और लहँडा उसी से निकली हैं। लहँडा उस प्रांत की भाषा है जिसका पुराना नाम केकय देश है। संभव है केकय देश वालों की भाषा, पुराने जमाने में, कोई और ही रही हो। अथवा उस देश में असंस्‍कृत आर्य-भाषाएँ बोलने वाले कुछ लोग बस गए हों। अर्थात् उसमें संस्‍कृत और असंस्कृत दोनों तरह की आर्य-भाषाओं के शब्‍द मिल गए हों।

कोहिस्‍तानी और काश्‍मीरी भाषाएँ किस अपभ्रंश से निकली हैं, नहीं मालूम। जिस अपभ्रंश भाषा से ये निकली हैं वह ब्राचड़ा से बहुत कुछ समता रखती रही होगी।

नर्मदा के पार्वत्‍य में, अरब समुद्र से ले कर उड़ीसा तक, उत्तर दक्षिण दोनों तरफ, बहुत सी बोलियाँ बोली जाती रही होंगी। वैदर्भी अथवा दाक्षिणात्‍य नाम की अपभ्रंश भाषा से उनका बहुत कुछ संबंध रहा होगा। इस भाषा का प्रधान स्‍थल विदर्भ, अर्थात् वर्तमान बरार था। संस्कृत-साहित्‍य में इस प्रांत का नाम महाराष्‍ट्र है। वैदर्भी और उससे संबंध रखने वाली अन्‍य भाषाओं और बोलियों से वर्तमान मराठी की उत्‍पत्ति हो सकती है। पर मराठी के उस अपभ्रंश से निकलने के अधिक प्रमाण पाए जाते हैं जो महाराष्‍ट्र देश में बोली जाती थी। जिस प्राकृत भाषा का नाम महाराष्‍ट्री है वह साहित्‍य की प्राकृत है। पुस्‍तकें उसी में लिखी जाती थीं, पर वह बोली न जाती थी। बोलने की भाषा जुदा थी।

दाक्षिणात्‍य-भाषा-भाषी प्रदेश के पूर्व से ले कर बंगाल की खाड़ी तक ओडरी या उत्‍कली अपभ्रंश प्रचलित थी। वर्तमान उड़िया भाषा उसी से निकली है।

जिन प्रांतों में ओडरी भाषा बोली जाती थी उनके उत्तर, अधिकतर छोटा नागपुर, बिहार और संयुक्‍त प्रांतों के पूर्वी भाग में मागधी प्राकृत की अपभ्रंश, मागध भाषा, बोली जाती थी। इसका विस्‍तार बहुत बड़ा था। वर्तमान बिहारी भाषा उसी से उत्‍पन्‍न है। इस अपभ्रंश की एक बोली अब तक अपने पुराने नाम से मशहूर है। वह आजकल मगही कहलाती है। मगही शब्‍द मगधी का ही अपभ्रंश है। मागध अपभ्रंश की किसी समय यही प्रधान बोली थी। यह अपभ्रंश भाषा पुरानी पूर्वी प्राकृत की समकक्ष थी। ओडरी, गौड़ी और ढक्‍की भी उसी के विकास प्राप्‍त रूप थे। उनके ये रूप बिगड़ते-बिगड़ते या विकास होते-होते, हो गए थे। मगही गौड़ी, ढक्‍की और ओडरी इन चारों भाषाओं की आदि जननी वही पुरानी पूर्वी प्राकृत समझना चाहिए। उसी से मागधी का जन्‍म हुआ और मागधी से इन सब का।

मागधी के पूर्व गौड़ अथवा प्राच्‍य नाम की अपभ्रंश भाषा बोली जाती थी। उसका प्रधान अड्डा गौड़ देश अर्थात वर्तमान मालदा जिला था। इस अपभ्रंश ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व तक फैल कर वहाँ वर्तमान बँगला भाषा की उत्‍पत्ति की।

प्राच्‍य अपभ्रंश ने कुछ दूर और पूर्व जा कर, ढाका के आस-पास ढक्‍की अपभ्रंश की जड़ डाली। ढाका, सिलहट, कछार और मैमनसिंह जिलों में जो भाषा बोली जाती है वह उसी से उत्‍पन्‍न है।

इस प्राच्‍य या गौड़ अपभ्रंश ने हिंदुस्‍तान के पूर्व, गंगा के उत्तरी हिस्‍सों तक, कदम बढ़ाया। वहाँ उसने उत्तरी बंगाल और आसाम में पहुँच कर आसामी की सृष्टि की। उत्तरी और पूर्वी बंगाल की भाषाएँ या बोलियाँ मुख्‍य बंगाल की किसी भाषा या बोली से नहीं निकलीं। वे पूर्वोक्‍त गौड़ अपभ्रंश से उत्पन्‍न हुई हैं जो पश्चिम की तरफ बोली जाती थीं।

मागध अपभ्रंश उत्तर, दक्षिण और पूर्व तीन तरफ फैली हुई थी। उत्तर में उसकी एक शाखा ने उत्तरी बँगला और आसामी की उत्‍पत्ति की, दक्षिण में उड़िया की, पूर्व में ढक्‍की की और उत्तरी बँगला और उड़िया के बीच में बँगला की। ये भाषाएँ अपनी जनता से एक सा संबंध रखती हैं। यही कारण है जो उत्तरी बँगला सुदूर, दक्षिण में बोली जाने वाली उड़िया से, मुख्‍य बँगला भाषा की अपेक्षा अधिक संबंध रखती है – दोनों में परस्‍पर अधिक समता है।

जैसा कि लिखा जा चुका है पूर्वी और पश्चिमी प्राकृतों की मध्‍यवर्ती भी एक प्राकृत थी। उसका नाम था अर्द्धमागधी। उसी के अपभ्रंश से वर्तमान पूर्वी हिंदी की उत्‍पत्ति है। यह भाषा अवध, बघेलखंड और छत्तीसगढ़ में बोली जाती है।

भीतरी शाखा

यहाँ तक बाहरी शाखा की अपभ्रंश भाषाओं का जिक्र हुआ। अब रहीं भीतरी शाखा की अपभ्रंश भाषाएँ। उनमें से मुख्‍य अपभ्रंश नागर है। बहुत करके यह पश्चिमी भारत की भाषा थी जहाँ नागर ब्राह्मणों का अब तक बाहुल्‍य है। इस अपभ्रंश में कई बोलियाँ शामिल थीं, जो दक्षिणी भारत के उत्तर की तरफ प्रायः समग्र पश्चिमी भारत में, बोली जाती थीं। गंगा-यमुना के बीच के प्रांत का जो मध्‍यवर्ती भाग है उसमें नागर अपभ्रंश का एक रूप, शौरसेन, प्रचलित था। वर्तमान पश्चिमी हिंदी और पंजाबी उसी से निकली है। नागर अपभ्रंश का एक और भी रूपांतर था। उसका नाम था आवंती। यह अपभ्रंश भाषा उज्‍जैन प्रांत में बोली जाती थी। राजस्‍थानी इसी से उत्‍पन्‍न है। गौर्जरी भी इसका एक रूप-विशेष था। वर्तमान गुजराती की जड़ वही है। आवंती और गौर्जरी, मुख्‍य नागर अपभ्रंश से बहुत कुछ मिलती थीं।

पूर्वी पंजाब से नेपाल तक, हिंदुस्‍तान के उत्तर, पहाड़ी प्रांतों में, जो भाषाएँ बोली जाती हैं वे किस अपभ्रंश या प्राकृत से निकली हैं, ठीक-ठीक नहीं मालूम। पर वहाँ की भाषाएँ वर्तमान राजस्‍थानी से बहुत मिलती हैं। और जो लोग पहाड़ी भाषाएँ बोलते हैं उनमें से कितने ही यह दावा रखते हैं कि हमारे पूर्वज राजपूताना से आ कर यहाँ बसे थे। इससे जब तक और कोई प्रमाण न मिले तब तक इन पहाड़ी भाषाओं को भी राजपूताने की पुरानी आवंती से उत्‍पन्‍न मान लेना पड़ेगा।

परिमार्जित संस्‍कृत

जैसा कि लिखा जा चुका है कि प्रारंभिक, किंवा पहली, प्राकृत से संबंध रखने वाली कई एक भाषाएँ या बोलियाँ थीं। उनका धीरे-धीरे विकास होता गया। भारत की वर्तमान भाषाएँ उसी विकास का फल हैं। परिमार्जित संस्‍कृत भी इसी पहली प्राकृत की किसी शाखा से उत्‍पन्‍न हुई है। जिस स्थिर और निश्चित अवस्‍था में उसे हम देखते हैं वह वैयाकरणों की कृपा का फल है। व्‍याकरण बनाने वालों ने नियमों की श्रृंखला से उसे ऐसा जकड़ दिया कि वह जहाँ की तहाँ रह गई। उसका विकास बंद हो गया। संस्‍कृत को नियमित करने के लिए कितने ही व्‍याकरण बने। उनमें से पाणिनि का व्‍याकरण सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस व्‍याकरण ने संस्‍कृत को नियमित करने की पराकाष्‍ठा कर दी। उसने उसे बे-तरह स्थिर कर दिया। यह बात ईसा के कोई 300 वर्ष पहले हुई। धार्मिक ग्रंथ सब इसी में लिखे जाने लगे। और विषयों के भी विद्वत्तापूर्ण ग्रंथों की रचना इसी परिमार्जित संस्‍कृत में होने लगी। परंतु प्राकृत भाषाओं के वैयाकरणों ने संस्‍कृत के शब्‍दों और मुहावरों की कदर न की। प्राकृत व्‍याकरणों में उनके नियम न बनाए। प्राकृत के जो ग्रंथ उपलब्‍ध हैं उनमें भी संस्‍कृत के शब्‍द और मुहावरे नहीं पाए जाते। प्राकृत वालों ने संस्‍कृत का बहिष्‍कार सा किया और संस्‍कृत वालों ने प्राकृत का। प्राकृत और संस्‍कृत के व्‍याकरणों और ग्रंथों में तो पंडितों ने एक दूसरे के शब्‍दों, मुहावरों और नियमों को न स्‍वीकार किया। पर बोलने वालों ने इस बात की परवा न की। उच्‍च प्राकृत बोलने वाले बातचीत में संस्‍कृत शब्‍दों का प्रयोग करते थे। य‍ह बात अब भी होती है, अर्थात् भारत की संस्‍कृतोत्‍पन्‍न वर्तमान भाषा बोलने वाले पुस्‍तकों ही में नहीं, किंतु बोलचाल में भी, संस्‍कृत-शब्‍दों का व्‍यवहार करते हैं। इन संस्‍कृत-शब्‍दों की, प्राकृत-काल में वही दशा हुई जो पुरानी प्राकृत से आए हुए शब्‍दों की हुई थी। वे बोलने वालों के मुँह में विकृत हो गए। बोलते-बोलते उनका रूप बिगड़ गया। यहाँ तक कि फिर वे एक तर‍ह के प्राकृत हो गए।

परिमार्जित संस्‍कृत का शब्‍द-विभाग

जो शब्द संस्‍कृत से आ कर प्राकृत में मिल गए हैं वे ”तत्‍सम” शब्‍द कहलाते हैं। और मूल प्राकृत शब्‍द जो सीधे प्राकृत से आए हैं ”तद्भव’ कहलाते हैं। पहले प्रकार के शब्‍द बिलकुल संस्‍कृत हैं। दूसरे प्रकार के प्रारंभिक प्राकृत से आए हैं, अथवा यों कहिए कि वे उस प्राकृत या प्राकृत की उस शाखा से आए हैं जिससे खुद संस्‍कृत की उत्‍पत्ति हुई हैं। इन दो तरह के शब्‍दों के सिवा एक तीसरी तरह के शब्‍द भी प्रचलित हो गए हैं। ये वे तत्‍सम शब्‍द हैं जो प्राकृत-भाषा-भाषियों के मुँह में बिगड़ते-बिगड़ते कुछ और ही रूप के हो गए हैं। इनको ‘अर्द्ध-तत्‍सम” कह सकते हैं। ”तत्‍सम” शब्‍दों का स्‍वभाव ‘अर्द्ध-तत्‍सम’ होने का है। फल इसका यह हुआ है कि ‘अर्द्ध-तत्‍सम’ शब्‍द धीरे-धीरे इतने बिगड़ गए हैं कि उनका और ‘तद्भव’ शब्‍दों का भेद पहचानना मुश्किल हो गया है। दोनों प्रायः एक ही तरह के हो गए हैं। इस देश के वैयाकरणों ने कुछ शब्‍दों को, ‘देश्‍य’ संज्ञा भी दी है। परंतु ये शब्‍द भी प्रायः संस्कृत ही से निकले हैं, इससे इनको भी ‘तद्भव’ शब्‍द ही मानना चाहिए। कुछ द्राविड़ भाषा के भी शब्‍द परिमार्जित संस्‍कृत में आ कर मिल गए हैं। उनकी संख्‍या बहुत कम है। अधिक संख्‍या उन्‍हीं शब्‍दों की है जो पुरानी संस्‍कृत से आए हैं। यहाँ पुरानी संस्‍कृत से मतलब संस्‍कृत की उन पुरानी शाखाओं से है जो परिमार्जित संस्‍कृत की जननी नहीं हैं। पुरानी संस्‍कृत की जिस शाखा से परिमार्जित संस्‍कृत निकली है उसे छोड़ कर और शाखाओं से ये शब्‍द आए हैं। इनकी भी गिनती ‘तद्भव’ शब्‍दों में है।

हिंदी का शब्‍द-विभाग

हिंदी से मतलब यहाँ पर, पूर्वी और पश्चिमी दोनों तरह की हिंदी से है। शब्‍द-विभाग के संबंध में हिंदी का भी ठीक वही हाल है जो संस्‍कृत का है। अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी और द्राविड़ भाषाओं के शब्‍दों को छोड़ कर शेष सारा शब्‍द-समूह, संस्‍कृत ही की तरह, तत्‍सम, अर्द्ध-तत्‍सम और तद्भव शब्‍दों में बँटा हुआ है। हिंदी में जितने तद्भव शब्‍द हैं या तो वे प्रारंभ की प्राकृ‍तों से आए हैं, या दूसरी शाखा की प्राकृतों से होते हुए संस्‍कृत से आए हैं। परंतु ठीक-ठीक कहाँ ये आए हैं, इसके विचार की इस समय जरूरत नहीं। दूसरे दरजे की प्राकृत भाषाओं के जमाने में चाहे वहे तद्भव रहे हों, चाहे तत्‍सम, आधुनिक भाषाओं में वे विशुद्ध तद्भव हैं। क्‍योंकि आधुनिक भाषाएँ तीसरे दर्जें की प्राकृत हैं, और ये सब शब्‍द दूसरे दरजे की प्राकृतों से आए हैं। परंतु आज कल के तत्‍सम और अर्द्धतत्‍सम शब्‍द प्रायः परिमार्जित संस्‍कृत से लिए गए हैं। उदाहरण के लिए ”आज्ञा” शब्‍द को देखिए। वह विशुद्ध संस्‍कृत शब्‍द है। पर हिंदी में आता है। इससे तत्‍सम हुआ। इसका अर्द्धतत्‍सम रूप है ”अग्‍याँ”। इसे बहुधा अपढ़ और अच्‍छी हिंदी न जानने वाले लोग बोलते हैं। इसी का तद्भव शब्‍द ”आन” है। यह संस्‍कृत से नहीं, किंतु दूसरी शाखा की प्राकृत के ”आणा’ शब्‍द का अपभ्रंश है। इसी तरह ‘राजा’ शब्‍द तत्‍सम है, ”राय” तद्भव। प्रत्‍येक शब्‍द के तत्‍सम, अर्द्धतत्‍सम और तद्भव रूप नहीं पाए जाते। किसी के तीनों रूप पाए जाते हैं। किसी के सिर्फ दो, किसी का सिर्फ एक ही। किसी-किसी शब्‍द के तत्‍सम और तद्भव दोनों रूप हिंदी में मिलते हैं। पर अर्थ उनके जुदा-जुदा हैं। संस्‍कृत ‘वंश’ शब्‍द को देखिए। उसका अर्थ ‘कुटुंब’ भी है और ‘बाँस’ भी। उसके अर्द्ध-तत्‍सम ‘बंस’ शब्‍द का अर्थ तो कुटुंब है, पर उस से दूसरा अर्थ नहीं निकलता। वह अर्थ उसके तद्भव शब्‍द ‘बाँस’ से निकलता है।

हिंदी पर संस्‍कृत का प्रभाव

हिंदी ही पर नहीं, किंतु हिंदुस्‍तान की प्रायः सभी वर्तमान भाषाओं पर, आज सैकड़ों वर्ष से संस्‍कृत का प्रभाव पड़ रहा है। संस्‍कृत के अनंत शब्‍द आधुनिक भाषाओं में मिल गए हैं। परंतु उसका प्रभाव सिर्फ वर्तमान भाषाओं के शब्‍द-समूह पर ही पड़ा है, व्‍याकरण पर नहीं। हिंदी-व्‍याकरण पर आप चाहे जितना ध्‍यान दीजिए, उसका चाहे विचार कीजिए, संस्‍कृत का प्रभाव आपको उसमें बहुत कम ढूँढ़े मिलेगा। संस्‍कृत शब्‍दों का प्रयोग तो हिंदी में बढ़ता जाता है, पर संस्‍कृत व्‍याकरण के नियमों के अनुसार हिंदी-व्‍याकरण में बहुत ही कम फेर-फार होते हैं। बहुत ही कम क्‍यों, यदि कोई कहे कि बिलकुल नहीं होते, तो भी अत्‍युक्ति न होगी। आचार, आहार, विचार, विहार, जल, फल, फल, कला, विद्या आदि सब तत्‍सम शब्‍द हैं। ये तद्वत हिंदी में लिख दिए जाते हैं। बहुत कम फेर फार होता है। और होता भी है तो विशेष कर के बहुवचन में जैसे आहारों, विचारों, कलाओं, विद्याओं आदि। यदि इन में विभक्तियाँ लगाई जाती हैं तो संस्‍कृत की तरह इनका रूपांतरण नहीं हो जाता। हिंदी में पुरुष और वचन के अनुसार क्रियाओं का रूप तो बदल जाता है, पर विभक्तियाँ लगने से संज्ञाओं के रूपों में बहुत कम अदल-बदल होता है। इसी के तत्‍सम शब्‍दों से क्रिया का काम नहीं निकलता। यदि ऐसे शब्‍दों को क्रिया का रूप देना होता है तो एक तद्भव शब्‍द और जोड़ना पड़ता है। ‘दर्शन’ शब्‍द तत्‍सम है। अब इससे यदि क्रिया का काम लेना हो तो ‘करना’ और जोड़ना पड़ेगा। अतएव सर्वसाधारण लक्षण यह है कि हिंदी में जितने नाम या संज्ञाएँ हैं सब या तो तत्‍सम हैं, या अर्द्धतत्‍सम हैं, या तद्भव हैं, पर क्रियाएँ जितनी हैं सब तद्भव हैं। यह स्‍थूल लक्षण है। इसमें कुछ अपवाद भी हैं, पर उनके कारण इस व्‍यापक लक्षण में बाधा नहीं आ सकती है।

जब से इस देश में छापेखाने खुले और शिक्षा की वृद्धि हुई तब से हिंदी में संस्‍कृत के तत्‍सम शब्‍दों का प्रयोग बहुत अधिकता से होने लगा। संस्‍कृत के कठिन-कठिन शब्‍दों को हिंदी में लिखने की चाल सी पड़ गई। किसी-किसी पुस्‍तक के शब्‍द यदि गिने जायँ तो फीसदी 50 से भी अधिक संस्‍कृत के तत्‍सम शब्‍द निकलेंगे। बँगला में तो इस तरह के शब्‍दों की और भी भरमार है। किसी-किसी बँगला पुस्‍तक में फीसदी 88 शब्‍द विशुद्ध संस्‍कृत के देखे गए हैं। ये शब्‍द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे-सादे बोलचाल के शब्‍द लिखे ही न जा सकते हों। नहीं, जो अर्थ इन संस्‍कृत शब्‍दों से निकलता है उसी अर्थ के देने वाले अपनी निज की भाषा के शब्‍द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड़ गई है कि बोलचाल के शब्‍द लोगों को पसंद नहीं आते। वे यथा-संभव संस्‍कृत के मुश्किल-मुश्किल शब्‍द लिखना ही जरूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिंदी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती है, दूसरी वह जो पुस्‍तकों, अखबारों और सामायिक पुस्‍तकों में लिखी जाती है। कुछ अखबारों के संपादक इस दोष को समझते हैं, इससे वे बहुधा बोलचाल ही की हिंदी लिखते हैं। उपन्‍यास की कुछ पुस्‍तकें भी सीधी-सादी भाषा में लिखी गई हैं। जिन अखबारों और पुस्‍तकों की भाषा सरल होती है उनका प्रचार भी औरों से अधिक होता है उनका प्रचार भी औरों से अधिक होता है। इस बात को जान कर भी लोग क्लिष्‍ट भाषा लिख कर भाषा-भेद बढ़ाना नहीं छोड़ते। इसका अफसोस है। कोई कारण नहीं कि जब तक बोलचाल की भाषा के शब्‍द मिलें, संस्‍कृत के कठिन तत्‍सम शब्‍द क्‍यों लिखे जायँ? घर शब्‍द क्‍या बुरा है जो ‘गृह’ लिखा जाय? कलम क्‍या बुरा है जो लेखनी लिखा जाय? ऊँचा क्‍या बुरा है जो ‘उच्‍च’ लिखा जाय? संस्‍कृत जानना हम लोगों का जरूर कर्तव्‍य है। पर उसके मेल से अपनी बोलचाल की हिंदी को दुर्बोध करना मुनासिब नहीं। पुस्‍तकें लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उनमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय। जितने ही अधिक लोग इन्‍हें पढ़ेंगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा। तब क्‍या जरूरत है कि भाषा क्लिष्‍ट करके पढ़ने वालों की संख्‍या कम की जाय? जो संस्‍कृत-भाषा हजारों वर्ष पहले बोली जाती थी उसे मिलाने की कोशिश कर के अपनी भाषा के स्‍वाभाविक विकास को रोकना बुद्धिमानी का काम नहीं। स्‍वतंत्रता सब के लिए एक सी लाभदायक है। कौन ऐसा आदमी है जिसे स्‍वतंत्रता प्‍यारी न हो? फिर क्‍यों हिंदी से संस्‍कृत की पराधीनता भोग कराई जाय? क्‍यों न वह स्‍वतंत्र कर दी जाय? संस्‍कृत, फारसी, अंगरेजी आदि भाषाओं के जो शब्‍द प्रचलित हो गए हैं उनका प्रयोग हिंदी में होना ही चाहिए। वे सब अब हिंदी के शब्‍द बन गए हैं। उनसे घृणा करना उचित नहीं।

डाक्‍टर ग्रियर्सन की राय है कि काशी के कुछ लोग हिंदी की क्लिष्‍टता को बहुत बढ़ा रहे हैं। वहाँ संस्‍कृत की चर्चा अधिक है। इस कारण संस्‍कृत का प्रभाव हिंदी पर पड़ता है। काशी में तो किसी-किसी को उच्‍च भाषा लिखने का अभिमान है। यह उनकी नादानी है। यदि हिंदी का कोई शब्‍द न मिले तो संस्‍कृत का शब्‍द लिखने में हानि नहीं, जान-बूझ कर भाषा को उच्‍च बनाना किसी के पैरों में कुल्‍हाड़ी मारना है। जिन भाषाओं से हिंदी की उत्‍पत्ति हुई है उनमें मन के सारे भावों के प्रकाशित करने की शक्ति थी। वह शक्ति हिंदी में बनी हुई है। उस का शब्‍द-समूह बहुत बड़ा है। पुरानी हिंदी में उत्तमोत्तम काव्‍य, अलंकार और वेदांत के ग्रंथ भरे पड़े हैं। कोई बात ऐसी नहीं, कोई भाव ऐसी नहीं, कोई विषय ऐसा नहीं जो विशुद्ध हिंदी शब्‍दों में न लिखा जा सकता हो। तिस पर भी बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है, कि कुछ लोग, कुछ वर्षों से, एक बनावटी क्लिष्‍ट भाषा लिखने लगे हैं। पढ़ने वालों की समझ में उनकी भाषा आवेगी या नहीं, इसकी उन्‍हें परवा नहीं रहती। सिर्फ अपनी विद्वत्ता दिखाने की उन्‍हें परवा रहती है। बस। कला-कौशल और विज्ञान आदि के पारिभाषिक शब्‍दों का भाव आदि संस्‍कृत-शब्‍दों में दिया जाय तो हर्ज नहीं। इस बात की शिकायत नहीं। शिकायत साधारण तौर पर सभी तरह की पुस्‍तकों में संस्‍कृत शब्‍द भर देने की है। इन्‍हीं बातों के ख्‍याल से गवर्नमेंट ने मदरसों की प्रारंभिक पुस्‍तकों की भाषा बोलचाल की कर दी है। अतएव हिंदी के प्रतिष्ठित लेखकों को भी चाहिए कि संस्‍कृत के क्लिष्‍ट शब्‍दों का प्रयोग यथासंभव कम किया करें।

द्राविड़ भाषाओं का प्रभाव

प्राचीन आर्य जब भारतवर्ष में पहले पहल पधारे तब भारतवर्ष उजाड़ न था। आबाद था। जो लोग यहाँ रहते वे आर्यों की तरह सभ्‍य न थे। आर्यों ने धीरे-धीरे उनको आगे हटाया और उनके देश पर कब्‍जा कर लिया। प्राचीन आर्यों के ये प्रतिपक्षी वर्तमान द्राविड़ और मुंडा जाति के पूर्वज थे। उनमें और आर्यों में वैर-भाव रहने पर भी कुछ दिनों बाद सब पास-पास रहने लगे। परस्‍पर का भेद-भाव बहुत कम हो गया। आपस में शादी ब्‍याह तक होने लगे। परस्‍पर के रीति-रस्‍म बहुत-कुछ एक हो गए। इस निकट संपर्क के कारण द्राविड़ भाषा के बहुत से शब्‍द संस्‍कृतोत्‍पन्‍न आर्य-भाषाओं में आ गए। वे प्राकृत और अपभ्रंश से होते हुए वर्तमान हिंदी में भी आ पहुँचे हैं। यद्यपि उनका वह पूर्वरूप नहीं रहा, तथापि ढूँढ़ने से अब भी उनका पता चलता है। आदिम आर्य एशिया के जिस प्रांत से भारत में आए थे उस प्रांत में भारत की बहुत सी चीजें न होती थीं। इससे भारत में आ कर आर्यों ने उन चीजों के नाम द्राविड़ और मुंडा जाति के पूर्वजों से सीखे और उन्‍हें अपनी भाषा में मिला लिया। इसके सिवा कोई-कोई बातें ऐसी भी हैं जिन्‍हें आर्य लोग कई तरह से कह सकते थे। इस दशा में उनके कहने का जो तरीका द्राविड़ लोगों के कहने के तरीके से अधिक मिलता था उसी को वे अधिक पसंद करते थे। पुरानी संस्‍कृत का एक शब्द है ‘कृते’, जिसका अर्थ है ‘लिए’। होते-होते इसका रूपांतर ‘कहुँ’ हुआ। वर्तमान ‘को’ इसी का अपभ्रंश है। इसका कारण यह है कि द्राविड़ भाषा में एक विभक्ति थी ‘कु’। वह संप्रदान कारक के लिए थी और अब तक है। उसे देख कर पुराने आर्यों ने संप्रदान कारक के और चिह्नों को छोड़ कर ‘कृते’ के ही अपभ्रंश को पसंद किया। जिन लोगों का संपर्क द्राविड़ों के पूर्वजों से अधिक था उन्‍हीं पर उनकी भाषा का अधिक असर हुआ, औरों पर कम या बिल्‍कुल ही नहीं। यही कारण है कि आर्य-भाषाओं की कितनी ही शाखाओं में द्राविड़ भाषा के प्रभाव का बहुत ही कम असर देखा जाता है। किसी-किसी भाषा में तो बिल्‍कुल ही नहीं है।

भाषा-विकास के नियमों के वशीभूत हो कर कठोर वर्ण कोमल हो जाया करते हैं और बाद में बिल्‍कुल ही लोप हो जाते हैं। प्राचीन संस्‍कृत के ‘चलति’ (जाता है, चलता है) शब्‍द को देखिए। वह पहले तो ‘चलति’ हुआ, फिर ‘चलई’। ‘त’ बिल्‍कुल ही जाता रहा। भाषा शास्‍त्र के एक व्‍यापक नियमानुसार यह परिवर्तन हुआ। पर कहीं-कहीं इस नियम के अपवाद पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए संस्‍कृत ‘शोक’ शब्‍द को लीजिए। उसे ‘सोअ’ होना चाहिए था। पर ‘सोअ’ न हो कर ‘सोग’ हो गया। अर्थात् ‘क’ व्‍यंजन का रूपांतर ‘ग’ बना रहा। यह इसीलिए हुआ, क्‍योंकि द्राविड़ भाषा में इस तरह के व्‍यंजनों का बहुत प्राचुर्य है। अतएव सिद्ध है कि संस्‍कृतोत्‍पन्‍न आर्य-भाषाओं पर द्राविड़ भाषाओं का असर जरूर पड़ा। और उस असर के चिह्न हिंदी में भी पाए जाते हैं।

और भाषाओं का प्रभाव

मुसलमानों के संपर्क से फारसी के अनेक शब्‍द हिंदी में मिल गए हैं। साथ ही इसमें कितने ही शब्‍द अरबी के और थोड़े से तुर्की के भी आ मिले हैं पर ये अरबी और तुर्की के शब्‍द फारसी से हो कर आए हैं। अर्थात् फारसी बोलने वालों ने जिन अरबी और तुर्की शब्‍दों को अपनी भाषा में ले लिया था वही शब्‍द मुसलमानों के संयोग से हिंदुस्‍तान में प्रचलित हुए हैं। खास अरबी और तुर्की बोलने वालों के संयोग से हिंदी में नहीं आए। यद्यपि अरबी, तुर्की और फारसी के बहुत से शब्‍द हिंदी में मिल गए हैं, तथापि उनके कारण हिंदी के व्‍याकरण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इन विदेशी भाषाओं के शब्‍दों ने हिंदी की शब्‍द-संख्‍या जरूर बढ़ा दी है, पर व्‍याकरण पर उनका कुछ भी असर नहीं पड़ता। हाँ, इन शब्दों के कारण एक बात लिखने लायक जो हुई है वह यह है कि मुसलमान और फारसीदाँ हिंदू जब ऐसी हिंदी लिखते हैं, जिसमें फारसी, अरबी और तुर्की के शब्‍द अधिक होते हैं, तब उनके वाक्‍य-विन्‍यास का क्रम साधारण हिंदी से कुछ जुदा तरह का जरूर हो जाता है।

फारसी, अरबी और तुर्की के सिवा पोर्चुगीज, डच और अंगरेजी भाषा के भी कुछ शब्‍द हिंदी में आ मिले हैं। उनमें अंग्रेजी शब्‍दों की संख्‍या अधिक है। इसका कारण अंगरेजों का अधिक संपर्क है। यह संपर्क जैसे-जैसे बढ़ता जायगा तैसे-तैसे और भी अधिक अंगरेजी शब्‍दों के आ मिलने की संभावना है।

सारांश

यहाँ तक जो कुछ लिख गया उससे मालूम हुआ कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्‍कृत थी। उसके कुछ नमूने ऋग्‍वेद में वर्तमान हैं। उसका विकास होते-होते कई प्रकार की प्राकृतें पैदा हो गईं। हमारी विशुद्ध संस्‍कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृतों के बाद अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति हुई और उनसे वर्तमान संस्‍कृतोत्‍पन्‍न भाषाओं की। हमारी वर्तमान हिंदी, अर्धमागधी और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है। अतएव जो लोग यह समझते हैं कि हिंदी की उत्‍पत्ति प्रत्‍यक्ष संस्‍कृत से है वे डाक्‍टर ग्रियर्सन की सम्मति के अनुसार भूलते हैं। डाक्‍टर साहब की राय सयुक्तिक जान पड़ती है। वे आज कई वर्षों से भाषाओं की खोज का काम कर रहे हैं। इस खोज में जो प्रमाण उनको मिले हैं उन्‍हीं के आधार पर उन्‍होंने अपनी राय कायम की है। एक बात तो बिल्‍कुल साफ है कि हिंदी में संस्‍कृत शब्‍दों की भरमार अभी कल से शुरू हुई है। परिमार्जित संस्‍कृत चाहे सर्वसाधारण की बोली कभी रही भी हो, पर उसके बाद हजारों वर्ष तक जो भाषाएँ इस देश में बोली गई होंगी उन्‍हीं से आज कल की भाषाओं और बोलियों की उत्‍पत्ति मानना अधिक संभवनीय जान पड़ता है। जिस परिमार्जित संस्‍कृत को कुछ ही लोग जानते थे उससे सर्वसाधारण की बोलियों और भाषाओं का उत्‍पन्‍न होना बहुत कम संभव मालूम होता है।

यह निबंध यद्यपि हिंदी ही की उत्‍पत्ति का दिग्‍दर्शन करने के लिए है तथापि प्रसंगवश और-और भाषाओं की उत्‍पत्ति और उनके बोलने वालों की संख्‍या आदि का भी उल्‍लेख कर दिया गया है। आशा है पाठकों को यह बात नागवार न होगी।

आज तक‍ कुछ लोगों का ख्‍याल था कि हिंदी की जननी संस्‍कृत है। यह बात भारत की भाषाओं की खोज से गलत साबित हो गई। जो उद्गम-स्‍थान परिमार्जित संस्‍कृत का है, हिंदी जिन भाषाओं से निकली है उनका भी वही है। इस बात को सुन कर बहुतों को आश्‍चर्य होगा। संभव है उन्‍हें यह बात ठीक न जँचे, पर जब तक इसके खिलाफ कोई सबूत न दिए जायँ, तब तक इस सिद्धांत को मानना ही पड़ेगा।

बिहारी भाषा

भाषाओं की जाँच से एक और भी नई बात मालूम हुई है। वह यह है कि बिहारी भाषा यद्यपि हिंदी से बहुत कुछ मिलती-जुलती है तथापि वह उसकी शाखा नहीं। वह बँगला से अधिक संबंध रखती है, हिंदी से कम। इसी से बिहारियों की गिनती हिंदी बोलने वालों में नहीं की गई। उसे एक निराली भाषा मानना पड़ा है। वह पूर्वी उपशाखा के अंतर्गत है और बँगला, उड़िया और आसामी की बहन है। पूर्वी हिंदी बिहारी की डाँड़ामेंड़ी है, पर पूर्वी हिंदी की तरह वह अर्द्धमागध अपभ्रंश से नहीं निकली। वह पुराने मागध अपभ्रंश से उत्‍पन्‍न हुई। बँगला देश के वासी ‘स’ को ‘श’ उच्‍चारण करते हैं। बिहारियों को भी ऐसा ही उच्‍चारण करना चाहिए था, क्‍योंकि उनकी भाषा का उत्‍पत्ति-स्‍थान वही है जो बंगालियों की भाषा का है। पर बिहारी ऐसा नहीं करते। इससे उनकी भाषा की उत्‍पत्ति के विषय में संदेह नहीं करना चाहिए। पूर्वी हिंदी बोलने वालों से बिहारियों का अधिक संपर्क रहा है और अब भी है। बिहारियों की भाषा यद्यपि बँगला की बहन है तथापि बंगाल की अपेक्षा संयुक्‍त प्रांत से ही उनका हेल-मेल अधिक रहा है। इसी से उच्‍चारण बंगालियों की ‘श’ वाली विशेषता बिहारियों की बोली से धीरे-धीरे जाती रही है। यद्यपि बिहारी ‘स’ को ‘श’ नहीं उच्‍चारण करते, तथापि ‘स’ को ‘श’ वे लिखते अब तक हैं। अब तक उनकी यह आदत नहीं छूटी।

बिहारी भाषा के अंतर्गत पाँच बोलियाँ हैं। उनके नाम और बोलने वालों की संख्‍या नीचे दी जाती है –

मैथिली 10, 387, 898

मगही 6,584,497

भुजपुरी 17, 367, 078

पूर्वी 236, 259

अज्ञात नाम 4,112

कुल 34, 579, 844

इस भाषा में विद्यापति ठाकुर बहुत प्रसिद्ध कवि हुए। और भी कितने ही कवि हुए हैं जिन्‍होंने नाटक और काव्‍य-ग्रंथों की रचना की है।

बिहारियों की प्रधान लिपि कैथी है।

पूर्वी हिंदी

अर्द्धमागधी प्राकृत के अपभ्रंश से पूर्वी हिंदी निकली है। जैन लोगों के प्रसिद्ध तीर्थंकर महावीर ने इसी अर्द्धमागधी में अपने अनुगामियों को उपदेश दिया था। इसी से जैन लोग इस भाषा को बहुत पवित्र मानते हैं। उनके बहुत से ग्रंथ इसी भाषा में हैं। तुलसीदास ने अपनी रामायण इसी पूर्वी हिंदी में लिखा है। इसके तीन भेद हैं। अथवा यों कहिए कि पूर्वी हिंदी में तीन बोलियाँ शामिल हैं। अवधी, बघेली, और छत्तीसगढ़ी। इनमें से अवधी भाषा में बहुत कुछ लिखा गया है। मलिक मुहम्‍मद जायसी और तुलसीदास इस भाषा के सबसे अधिक प्रसिद्ध कवि हुए। जिसे ब्रज-भाषा कहते हैं। उसका मुकाबला, कविता की अगर और किसी भाषा ने किया है तो अवधी ही ने किया है। रीवाँ दरबार के कुछ कवियों ने बघेली भाषा में भी पुस्‍तकें लिखी हैं, पर अवधी भाषा के पुस्‍तक-समूह के सामने वे दाल में नमक के बराबर भी नहीं हैं। छत्तीसगढी में तो साहित्‍य का प्रायः अभाव ही समझना चाहिए।

पश्चिमी हिंदी

पूर्वी हिंदी तो मध्‍यवर्ती शाखा से निकली है अर्थात् बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी है, पश्चिमी हिंदी की बात जुदा है। वह भीतरी शाखा से संबंध रखती है और राजस्‍थानी, गुजराती और पंजाबी की बहन है। इस भाषा के कई भेद हैं। उनमें से हिंदुस्‍तानी, ब्रज-भाषा, कन्‍नौजी, बुंदेली, बाँगरू और दक्षिणी मुख्‍य हैं। इनके बोलने वालों की संख्‍या इस प्रकार है।

हिंदुस्‍तानी (खास) 7,072,745

और तरह की हिंदुस्‍तानी जिसमें

फुटकर भाषाएँ शामिल हैं 5,921,384

ब्रजभाषा 8,380,724

कन्‍नौजी 5,082,006

बुंदेली 5,460,280

बाँगरू 2,505,158

दक्षिणी 6,292,628

कुल 40,714,925

याद रखिए यह वर्गीकरण डाक्‍टर ग्रियर्सन का किया हुआ है। इसमें कहीं उर्दू का नाम नहीं आया। हिंदी के जो दो बड़े-बड़े विभाग किए गए हैं उनमें से एक में भी उर्दू अलग भाषा या बोली नहीं मानी गई। जिसको लोग उर्दू कहते हैं उसके बोलने वालों की संख्‍या हिंदुस्‍तानी बोलने वालों में शामिल है। इस भाषा के विषय में कुछ विशेष बातें लिखनी हैं। इससे उसे आगे के लिए रख छोड़ते हैं।

ब्रज-भाषा

गंगा-यमुना के बीच के मध्‍यवर्ती प्रांत में, और उसके दक्षिण, देहली से इटावे तक, ब्रज-भाषा बोली जाती है। गुड़गाँवा और भरतपुर, करोली और ग्‍वालियर की रियासतों में भी ब्रजभाषा के बोलने वाले हैं। पुराने जमाने में शूरसेन देश के एक भाग का नाम था ब्रज। उसी के नामानुसार ब्रजभाषा का नाम हुआ है। इस भाषा के कवियों में सूरदास और बिहारी सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। अंगरेजी-विद्वानों की, विशेष कर के ग्रियर्सन साहब की, राय में सूरदास और तुलसीदास का परस्‍पर मुकाबला ही नहीं हो सकता, क्‍योंकि उनकी राय में तुलसीदास केवल कवि ही न थे, समाज-संशोधक भी थे। मनुष्‍य के मानसिक विकारों का जैसा अच्‍छा चित्र तुलसीदास ने अपनी कविता में खींचा है वैसा और किसी से नहीं खींचा गया।

कन्‍नौजी

कन्‍नौजी, ब्रजभाषा से बहुत कुछ मिलती जुलती है। इटावा से इलाहाबाद के पास तक, अंतर्वेद में इसका प्रचार है। अवध के हरदोई और उन्‍नाव जिलों में भी यही भाषा बोली जाती है। हरदोई में ज्‍यादा उन्‍नाव में कम। इस भाषा में कुछ भी साहित्‍य नहीं है। कोई 100 वर्ष हुए श्रीरामपुर के पादरियों ने बाइबल का एक अनुवाद इस प्रांतिक भाषा में प्रकाशित किया था। उसे देखने से मालूम होता है कि तब की और अब की भाषा में फर्क हो गया है। कितने ही शब्‍द जो पहले बोले जाते थे अब नहीं बोले जाते।

बुंदेली

बुंदेली बुंदेलखंड की बोली है। झाँसी, जालौन, हमीरपुर और ग्‍वालियर राज्‍य के पूर्वी प्रांत में यह बोली जाती है। मध्‍यप्रदेश के दमोह, सागर, सिउनी, नरसिंहपुर जिलों की भी बोली बुंदेली ही है। छिंदवाड़ा और हुशंगाबाद तक के कुछ हिस्‍सों में यह बोली जाती है। बाइबल के एक आध अनुवाद के सिवा इसमें भी कोई साहित्‍य नहीं है। ब्रजभाषा, कन्‍नौजी और बुंदेली आपस में एक दूसरे से बहुत कुछ मिलती जुलती हैं।

बाँगरू

हिसार, झींद, रोहतक, करनाल आदि जिलों की भाषा बाँगरू है। इन प्रांतों की बोलियों के हरियानी और जादू आदि भी नाम हैं, पर बाँगरू नाम अधिक सयुक्तिक और अधिक व्‍यापक है, क्‍योंकि बाँगरू में, अर्थात पंजाब के दक्षिण-पूर्व में जो ऊँचा और खुश्‍क देश है उसमें, यह बोली जाती है। देहली के आस-पास की भी यही भाषा है। पर करनाल के आगे यह नहीं बोली जाती। वहाँ से पंजाबी शुरू होती है।

दक्षिणी

दक्षिण के मुसलमान जो हिंदी बोलते हैं उसका नाम दक्षिणी हिंदी रक्‍खा गया है। इस हिंदी के बोलने वाले बंबई, बरोदा, बरार, मध्‍यप्रदेश, कोचीन, कुग, हैदराबाद, मदरास, माइसोर और ट्रावनकोर तक में पाए जाते हैं। ये लोग अपनी भाषा लिखते यद्यपि फारसी अक्षरों में हैं, तथापि फारसी शब्‍दों की भरमार नहीं करते। ये लोग मुझे या मुझ को की जगह ‘मेरे को’ बोलते हैं और कभी-कभी ‘मैं खाना खाया’ की तरह के ‘ने’ विहीन वाक्‍य प्रयोग करते हैं। दक्षिणी हिंदी बोलने वालों की संख्‍या थोड़ी नहीं है। कोई 63 लाख है। सुदूरवर्ती माइसोर, कुर्ग, मदरास और ट्रावनकोर तक में इस हिंदी को बोलने वाले हैं, और लाखों हैं।

हिंदुस्‍तानी

हिंदुस्‍तानी के दो भेद हैं। एक तो वह जो पश्चिमी हिंदी की शाखा है, दूसरी वह जो साहित्‍य में काम आती है। पहली गंगा-यमुना के बीच का जो देश है उसके उत्तर में, रुहेलखंड में, और अंबाला जिला के पूर्व में, बोली जाती है। यह पश्चिमी हिंदी की शाखा है। यही धीरे-धीरे पंजाबी में परिणत हो गई है। मेरठ के आस-पास और उसके कुछ उत्तर में यह भाषा अपने विशुद्ध रूप में बोली जाती है। वहाँ उसका वही रूप है जिसके अनुसार हिंदी (हिंदुस्‍तानी) का व्‍याकरण बना है। रुहेलखंड में यह धीरे-धीरे कन्‍नौजी में और अंबाले में पंजाबी में परिणत हो गई है। दूसरी वह है जिसे पढ़े लिखे आदमी बोलते हैं और जिसमें अखबार और किताबें लिखी जाती हैं। हिंदुस्‍तानी की उत्‍पत्ति और उसके प्रकारादि के विषय में आज तक भाषाशास्‍त्र के विद्वानों की जो राय थी वह भ्रांत साबित हुई है। मीर अम्‍मन ने अपने ‘बागोबहार’ की भूमिका में हिंदुस्‍तानी भाषा की उत्‍पत्ति के विषय में लिखा है कि यह अनेक भाषाओं के मेल से उत्‍पन्‍न हुई है। कई जातियों और कई देशों के आदमी जो देहली के बाजार में परस्‍पर मिलते-जुलते और बातचीत करते थे वही इस भाषा के उत्‍पादक हैं। यह बात अब तक ठीक मानी गई थी और डाक्‍टर ग्रियर्सन आदि सभी विद्वानों ने इस मत को कबूल कर लिया था। पर भाषाओं की जाँच पड़ताल से यह मत भ्रामक निकला। हिंदुस्‍तानी और कुछ नहीं, सिर्फ ऊपरी दोआब की स्‍वदेशी भाषा है। वह देहली की बाजारू बोली हरगिज नहीं। हाँ उसके स्‍वाभाविक रूप पर साहित्‍य-परिमार्जन का जिलो जरूर चढ़ाया गया है और कुछ गँवार मुहावरे उससे जरूर निकाल डाले गए हैं। बस उसके स्‍वाभाविक रूप में इतनी ही अस्‍वाभाविकता आई है। इस भाषा का ‘हिंदुस्‍तानी’ नाम उन लोगों का रखा हुआ नहीं है, यह साहब लोगों की कृपा का फल है। हम लोग तो इसे हिंदी ही कहते हैं। देहली के बाजार में तुर्क, अफगान और फारस वालों का हिंदुओं से संपर्क होने के पहले भी यह भाषा प्रचलित थी। पर उसका नाम उसी समय से हुआ। देहली में मुसलमानों के संयोग से हिंदी-भाषा का विकास जरूर बढ़ा। विकास ही नहीं, इसके प्रचार में भी वृद्धि हुई। इस देश में जहाँ-जहाँ मुगल बादशाहों के अधिकारी गए, वहाँ-वहाँ अपने साथ वे इस भाषा को भी लेते गए। अब इस समय इस भाषा का प्रचार इतना बढ़ गया है कि कोई प्रांत, कोई सूबा, कोई शहर ऐसा नहीं जहाँ इसके बोलने वाले न हों। बंगाली, मदरासी, गुजराती, महाराष्‍ट्र, नेपाली आदि लोगों की बोलियाँ जुदा-जुदा हैं। पर वे यदि हिंदी बोल नहीं सकते तो प्रायः समझ जरूर सकते हैं। उनमें से अधिकांश तो ऐसे हैं जो बोल भी सकते हैं। भिन्‍न-भिन्‍न भाषाएँ बोलने वाले जब एक दूसरे से मिलते हैं तब वे अपने विचार हिंदी ही में प्रकट करते हैं। उस समय और कोई भाषा काम नहीं देती। उससे इसी को हिंदुस्‍तान की प्रधान भाषा मानना चाहिए। और यदि देश भर में कभी एक भाषा होगी तो यही होगी।

‘हिंदुस्‍तानी’ नाम यद्यपि अंगरेजों का दिया हुआ है तथापि है बहुत सार्थक। इससे हिंदुस्‍तान भर में बोली जाने वाली भाषा का बोध होता है। यह बहुत अच्‍छी बात है। इस नाम के अंतर्गत साहित्‍य की हिंदी, सर्वसाधारण हिंदी, दक्षिणी हिंदी और उर्दू सबका समावेश हो सकता है। अतएव हमारी समझ में इस नाम को स्‍वीकार कर लेना चाहिए।

उर्दू

उर्दू कोई जुदा भाषा नहीं। वह हिंदी ही का एक भेद है, अथवा यों कहिए कि हिंदुस्‍तानी की एक शाखा है। हिंदी और उर्दू में अंतर इतना ही है कि हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और संस्‍कृत के शब्‍दों की उसमें अधिकता रहती है। उर्दू, फारसी लिपि में लिखी जाती है और उसमें फारसी, अरबी के शब्‍दों की अधिकता रहती है। ‘उर्दू’ शब्‍द ‘उर्दू-ए-मुअल्‍ला’ से निकला है जिसका अर्थ है ‘शाही फौज का बाजार’। इसी से किसी-किसी का खयाल था कि यह भाषा देहली के बाजार ही की बदौलत बनी है। पर यह खयाल ठीक नहीं। भाषा पहले ही से विद्यमान थी और उसका विशुद्ध रूप अब भी मेरठ-प्रांत में बोला जाता है। बात सिर्फ यह हुई कि मुसलमान जब यह बोली बोलने लगे तब उन्‍होंने उसमें अरबी, फारसी के शब्‍द मिलाने शुरू कर दिए, जैसे कि आजकल संस्‍कृत जानने वाले हिंदी बोलने में आवश्‍यकता से जियादह, संस्‍कृत-शब्‍द काम में लाते हैं। उर्दू पश्चिमी हिंदुस्‍तानी के शहरों की बोली है। जिन मुसलमानों या हिंदुओं पर फारसी भाषा और सभ्‍यता की छाया पड़ गई है वे, अन्‍यत्र भी, उर्दू ही बोलते हैं। बस, और कोई यह भाषा नहीं बोलता। इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुत से फारसी, अरबी के शब्‍द हिंदुस्‍तानी भाषा की सभी शाखाओं में आ गए हैं। अपढ़ देहातियों ही की बोली में नहीं, किंतु हिंदी के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध लेखकों की परिमार्जित भाषा में भी अरबी फारसी के शब्‍द आते हैं। पर ऐसे शब्‍दों को अब विदेशी भाषा के शब्‍द न समझना चाहिए। वे अब हिंदुस्‍तानी हो गए हैं और छोटे-छोटे बच्‍चे और स्त्रियाँ तक उन्‍हें बोलती हैं। उनसे घृणा करना या उन्‍हें निकालने की कोशिश करना वैसी ही उपहासास्‍पद बात है जैसी कि हिंदी से संस्‍कृत के धन, वन, हार और संसार आदि शब्‍दों को निकालने की कोशिश करना है। अंगरेजी में हजारों शब्‍द ऐसे हैं जो लैटिन से आए हैं। यदि कोई उन्‍हें निकाल डालने की कोशिश करे तो कैसे हो सकता है?

उर्दू में यदि अरबी, फारसी के शब्‍दों की भरमार न की जाय तो उसमें और हिंदी में कुछ भी भेद न रहे। पर उर्दू वालों को फारसी, अरबी के शब्‍द लिखने और बोलने की जिद सी है। कोई-कोई लेखक इन वैदेशिक शब्‍दों के लिखने में सीमा के बाहर चले जाते हें। इनकी भाषा सर्वसाधारण को प्रायः वैसी ही मालूम होती है जैसी कि दक्षिणी अफरीका के जंगली आदिमियों को जानसन की अंगरेजी यदि सुनाई जाय तो मालूम हो। बड़े-बड़े वाक्‍य आप देखिए – में, ने, से, का, की, के, चला, मिला, हिला आदि के सिवा आप को एक भी हिंदुस्‍तानी शब्‍द उनमें न मिलेगा। व्‍याकरण भर हिंदुस्‍तानी, बाकी सब फारसी, अरबी शब्‍द। हमारी भाषा को शुरू-शुरू में हिंदुओं ने भी खूब बिगाड़ा है। फारसी पढ़-पढ़ कर वे मुसलमानी राज्य में मुलाजिम हुए और, फारसी, अरबी के शब्‍दों की भरमार करके अपनी भाषा का रूप बदला। मुसलमान तो बहुत समय पहले अपना सारा काम फारसी में ही करते थे। पर हिंदुओं ने शुरू ही से ऐसी भाषा का प्रचार किया। अब तो मुसलमान और फारसीदाँ हिंदू, दोनों ऊँचे दरजे की उर्दू लिख-लिख कर इन प्रांतों की भाषा पर एक अत्‍याचार कर रहे हैं।

हिंदी

‘हिंदी’ शब्‍द कई अर्थों का बोधक है। अंगरेज लोग इसके दो अर्थ लगाते हैं। कभी-कभी तो वे इसे उस भाषा का बोधक समझते हैं जिसे हम, हिंदी लिखने वाले, इन प्रांतों के लोग, हिंदी कहते हैं – अर्थात् वह भाषा जो ‘हिंदुस्‍तानी’ की शाखा है और जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। कभी-कभी वे इसे उस भाषा या बोली के अर्थ में प्रयोग करते हैं जो बंगाल और पंजाब के बीच के देहात में बोली जाती है। पर कोई-कोई मुसलमान इसे फारसी का शब्‍द मानते हैं और ‘हिंद के निवासी’ के अर्थ में बोलते हैं। हिंद (हिंदुस्‍तान) के रहने वालों को वे हिंदी कहते हैं। ‘हिंदी’ मुसलमान भी हो सकते हैं और हिंदू भी। अमीर खुसरो ने ‘हिंदी’ को इसी अर्थ में लिखा है। इस हिसाब से जितनी भाषाएँ इस देश में बोली जाती हैं सब हिंदी कही जा सकती हैं।

जिसे हम हिंदी या उच्‍च हिंदी कहते हैं वह देवनागराक्षर में लिखी जाती है। इसका प्रचार कोई सौ सवा सौ वर्ष के पहले न था। उसके पहले यदि किसी को देवनागरी में गद्य लिखना होता था तो वह अपने प्रांत की भाषा – अवधी, बघेली, बुंदेली या ब्रजभाषा आदि – में लिखता था। लल्‍लूलाल ने प्रेमसागर में पहले-पहले यह भाषा देवनागरी अक्षरों में लिखी, और उर्दू लिखने वाले जहाँ अरबी-फारसी के शब्‍द प्रयोग करते वहाँ उन्‍होंने अपने देश के शब्‍द प्रयोग किए। याद रहे, लल्‍लूलाल ने कोई भाषा नहीं ईजाद की। उनके प्रेमसागर की भाषा दोआब में पहले ही से बोली जाती थी। पर उसी का उन्‍होंने प्रेमसागर में प्रयोग किया और आवश्‍यकतानुसार संस्‍कृत के शब्‍द भी उसमें मिलाए। तभी से गद्य की वर्तमान हिंदी का प्रचार हुआ। गद्य पहले भी था। कितनी ही पुस्‍तकों की टीकाएँ आदि गद्य में लिखी गई थीं। पर वे सब प्रांतिक भाषाओं में थीं। लल्‍लूलाल ने वर्तमान हिंदी की नींव डाली और उसमें उन्‍हें कामयाबी हुई। यहाँ तक कि अब स्‍वप्‍न में भी किसी को गद्य लिखते समय अपने प्रांत की अवधी, बघेली या ब्रजभाषा याद नहीं आती। पद्य लिखने में वे चाहे उनका भले ही अब तक पिंड न छोड़ें।

हिंदी में एक बड़ा भारी दोष इस समय यह घुस रहा है कि उसमें अनावश्‍यक संस्‍कृत शब्‍दों की भरमार की जाती है। इसका उल्‍लेख हम एक जगह पहले भी कर आए हैं। इससे हिंदी और उर्दू का अंतर बढ़ता जाता है। यह न हो तो अच्‍छा। इन प्रांतों की गवर्नमेंट ने बड़ा अच्‍छा काम किया जो प्रा‍रंभिक शिक्षा की पाठ्य पुस्‍तकों की भाषा एक कर दी। उर्दू और हिंदी दोनों में उसने कुछ फर्क नहीं रक्‍खा। फर्क सिर्फ लिपि का रक्‍खा है। अर्थात् कुछ पुस्‍तकें फारसी लिपि में छापी जाती हैं, कुछ नागरी में। यदि हम लोग हिंदी में संस्‍कृत के और मुसलमान उर्दू में अरबी फारसी के शब्‍द कम लिखें तो दोनों भाषाओं में बहुत थोड़ा भेद रह जाय और संभव है, किसी दिन दोनों समुदायों की लिपि और भाषा एक हो जायँ। इससे यह मतलब नहीं कि संस्‍कृत कोई न पढ़े। नहीं, हिंदू और मुसलमान जो चाहे शौक से संस्‍कृत, अरबी और फारसी पढ़ सकते हैं। पर समाचार-पत्रों, मासिक पुस्‍तकों और सर्वसाधारण के लिए उपयोगी पुस्‍तकों में जहाँ तक संस्‍कृत और अरबी-फारसी के शब्‍दों का कम प्रयोग हो अच्‍छा है। इससे पढ़ने और समझने वालों की संख्‍या बढ़ जायगी। जिससे बहुत लाभ होगा।

पद्य

‘हिंदुस्‍तानी’, अर्थात् वर्तमान बोलचाल की भाषा, के सबसे पुराने नमूने उर्दू की कविता में पाए जाते हैं। उर्दू क्‍यों उसे रेख्‍ता कहना चाहिए। सोलहवीं सदी के अंत में इस भाषा में कविता होने लगी। दक्षिण में इस कविता का आरंभ हुआ। कोई 100 वर्ष बाद औरंगाबाद के वली नामक शायर ने उसकी बड़ी उन्‍नति की। वह ‘रेख्‍ता का पिता’ कहलाया। धीरे-धीरे देहली में भी इस कविता का प्रचार हुआ। अठारहवीं सदी के अंत में सौदा और मीर तकी ने इस कविता में बड़ा नाम पाया। इसके बाद लखनऊ में भी इस भाषा के कितने ही नामी-नामी कवि हुए और कितने ही काव्‍य बने। और अब तक बराबर इस में कविता होती जाती हैं। खेद है, हिंदी में अभी कुछ ही दिन से बोलचाल की भाषा में कविता शुरू हुई है।

डाक्‍टर ग्रियर्सन की राय है कि गद्य की हिंदी, अर्थात् बोलचाल की भाषा, में अच्‍छी कविता नहीं हो सकती। दो एक आदमियों ने गद्य की भाषा में कविता लिखने की को‍शिश भी की, पर उन्‍हें बे-तरह नाकामयाबी हुई और उपहास के सिवा उन्‍हें कुछ भी न मिला। इस पर हमारी प्रार्थना है कि डाक्‍टर साहब की राय सरासर गलत है। यदि दो एक आदमी गद्य की हिंदी में अच्‍छी कविता न लिख सके तो इससे यह कहाँ साबित हुआ कि कोई नहीं लिख सकता। डाक्‍टर साहब जब से विलायत गए हैं तब से इस देश के हिंदी-साहित्‍य से आपका संपर्क छूट सा गया है। अब उनको चाहिए कि अपनी पुरानी राय बदल दें। बोलचाल की भाषा में कितनी ही अच्‍छी-अच्‍छी कविताएँ निकल चुकी हैं और बराबर निकलती जाती हैं। जितने प्रसिद्ध-प्रसिद्ध समाचार पत्र और सामयिक पुस्‍तकें हिंदी की हैं उनमें अब बोलचाल की भाषा की अच्‍छी-अच्‍छी कविताएँ हमेशा ही प्रकाशित हुआ करती हैं। अब उर्दू और हिंदी प्रायः एक ही भाषा है और उर्दू में अच्‍छी कविता होती है तब कोई कारण नहीं कि हिंदी में न हो सके –

बात अनोखी चाहिए भाषा कोई हो।

गद्य

बोलचाल की भाषा की कविता में उर्दू – उर्दू क्‍यों हिंदुस्‍तानी – यद्यपि हिंदी से जेठी है, तथापि गद्य दोनों का साथ ही साथ उत्‍पन्‍न हुआ है। कलकत्ते के फोर्ट विलियम कालेज के लिए उर्दू और हिंदी की पुस्‍तकें एक ही साथ तैयार हुईं। लल्‍लूलाल का प्रेमसागर और मीर अम्‍मन का बागेबहार एक ही समय की रचना है। तथापि उर्दू भाषा और फारसी अक्षरों का प्रचार सरकारी कचहरियों और दफ्तरों में हो जाने से उर्दू ने हिंदी की अपेक्षा अधिक उन्‍नति की। कुछ दिनों से समय ने पलटा खाया है। वह हिंदी की भी थोड़ी बहुत अनुकूलता करने लगा है। हिंदी की उन्‍नति हो चली है। कितने ही अच्‍छे-अच्‍छे समाचार पत्र और मासिक पुस्‍तकें निकल रही हैं। पुस्‍तकें भी अच्‍छी-अच्‍छी प्रकाशित हो रही हैं। आशा है बहुत शीघ्र उसकी दशा सुधर जाय। हिंदी भाषा और नागरी लिपि में गुण इतने हैं कि बहुत ही थोड़े साहाय्य और उत्‍साह से वह अच्‍छी उन्‍नति कर सकती है।

लिपि

जिसे हिंदुस्‍तानी कहते हैं, अर्थात् जिस में फारसी, अरबी के क्लिष्‍ट शब्‍दों का जमघटा नहीं रहता, वह तो देवनागरी लिपि में लिखी जा सकती ही है। उसकी तो कुछ बात ही नहीं है जिसे उर्दू कहते हैं – जिसमें आज कल मुसलमान और उर्दूदाँ हिंदू अखबार और साधारण विषयों की पुस्‍तकें लिखते हैं – वह भी देवनागरी लिपि में लिखी जा सकती है। पर डाक्‍टर ग्रियर्सन की राय है कि वह नहीं लिखी जा सकती। खेद है, हमारी राय आप की राय से नहीं मिलती। कुछ दिन हुए इस विषय पर हम ने एक लेख सरस्‍वती में प्रकाशित किया है और यथाशक्ति इस बात को सप्रमाण साबित भी कर दिया है कि उर्दू के अखबारों और रिसालों की भाषा अच्‍छी तरह देवनागरी में लिखी जा सकती है, और लेख का मतलब समझने में किसी तरह की बाधा नहीं आती। मुसलमान लोग अपने अरबी फारसी के धार्मिक तथा अन्‍यान्‍य ग्रंथ आनंद से फारसी, अरबी लिपि में लिखें। उनके विषय किसी को कुछ नहीं कहना। कहना साधारण साहित्‍य के विषय में है जो देवनागरी लिपि में आसानी से लिखा जा सकता है। देवनागरी लिपि के जानने वालों की संख्‍या फारसी लिपि के जानने वालों की संख्‍या से कई गुना अधिक है। इस दशा में सारे भारत में फारसी लिपि का प्रचार होना सर्वथा असंभव और नागरी का सर्वथा संभव है। यदि मुसलमान सज्‍जन हिंदुस्‍तान को अपना देश मानते हों, यदि स्‍वदेश-प्रीति को भी कोई चीज समझते हों, यदि एक लिपि के प्रचार से देश को लाभ पहुँचना संभव जानते हों तो हठ, दुराग्रह और कुतर्क छोड़ कर उन्‍हें देवनागरी लिपि सीखनी चाहिए।

हिन्दी साहित्य का इतिहास

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हिन्दी साहित्य पर यदि समुचित परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा है कि युग-युग में इसका नाम परिवर्तित होता रहा है। कभी ‘वैदिक’, कभी ‘संस्कृत‘, कभी ‘प्रकृत’, कभी ‘अपभ्रंश’ और अब – हिन्दी[1] आलोचक कह सकते हैं कि वैदिक संस्कृत और हिन्दी में तो जमीन-आसमान का अन्तर है। पर ध्यान देने योग्य है कि हिब्रू, रूसी, चीनी, जर्मन और तमिल आदि जिन भाषाओं को ‘बहुत पुरानी’ बताया जाता है, उनके भी प्राचीन और वर्तमान रूपों में जमीन-आसमान का ही अन्तर है। पर लोगों ने उन भाषाओं के नाम नहीं बदले और उनके परिवर्तित स्वरूपों को ‘प्राचीन’, ‘मध्यकालीन’, ‘आधुनिक’ आदि कहा गया जबकि हिन्दी के सन्दर्भ में प्रत्येक युग की भाषा का नया नाम रखा जाता रहा।

किन्तु हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में प्रचलित धारणाओं पर विचार करते समय हमारे सामने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न दसवीं शताब्दी के आसपास की प्राकृताभास भाषा तथा अपभ्रंश भाषाओं की ओर जाता है। अपभ्रंश शब्द की व्युत्पत्ति और जैन रचनाकारों की अपभ्रंश कृतियों का हिन्दी से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए जो तर्क और प्रमाण हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में प्रस्तुत किये गए हैं उन पर विचार करना भी आवश्यक है। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही पद्य रचना प्रारम्भ हो गई थी।

साहित्य की दृष्टि से पद्यबद्ध जो रचनाएँ मिलती हैं वे दोहा रूप में ही हैं और उनके विषय, धर्म, नीति, उपदेश आदि प्रमुख हैं। राजाश्रित कवि और चारण नीति, शृंगार, शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे। यह रचना-परम्परा आगे चलकर शैरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इस भाषा को विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किन्तु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिन्दी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब और किस देश में प्रारम्भ हुआ। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में हिन्दी शब्द का प्रयोग विदेशी मुसलमानों ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य ‘भारतीय भाषा’ का था।

अनुक्रम

हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन का इतिहास

आरंभिक काल से लेकर आधुनिक व आज की भाषा में आधुनिकोत्तर काल तक साहित्य इतिहास लेखकों के शताधिक नाम गिनाये जा सकते हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास शब्दबद्ध करने का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण था।

हिन्दी साहित्य के इतिहासकार और उनके ग्रन्थ

हिन्दी साहित्य के मुख्य इतिहासकार और उनके ग्रन्थ निम्नानुसार हैं –

  1. गार्सा द तासी: इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी (फ्रेंच भाषा में; फ्रेंच विद्वान, हिन्दी साहित्य के पहले इतिहासकार)
  2. शिवसिंह सेंगर: शिव सिंह सरोज
  3. जार्ज ग्रियर्सन: द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिट्रैचर आफ हिंदोस्तान
  4. मिश्र बंधु: मिश्र बंधु विनोद
  5. रामचंद्र शुक्ल: हिंदी साहित्य का इतिहास
  6. हजारी प्रसाद द्विवेदी: हिन्दी साहित्य की भूमिका; हिन्दी साहित्य का आदिकाल; हिन्दी साहित्य:उद्भव और विकास
  7. रामकुमार वर्मा: हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास
  8. डॉ धीरेन्द्र वर्मा: हिन्दी साहित्य
  9. डॉ नगेन्द्र: हिन्दी साहित्य का इतिहास; हिन्दी वांड्मय 20वीं शती
  10. रामस्वरूप चतुर्वेदी: हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1986
  11. बच्चन सिंह: हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली
  12. डा० मोहन अवस्थी : हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास
  13. बाबू गुलाब राय: हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास

हिन्दी साहित्य के विकास के विभिन्न काल

हिन्दी साहित्य का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है। यह वह समय है जब सम्राट् हर्ष की मृत्यु के बाद देश में अनेक छोटे छोटे शासनकेन्द्र स्थापित हो गए थे जो परस्पर संघर्षरत रहा करते थे। विदेशी मुसलमानों से भी इनकी टक्कर होती रहती थी। धार्मिक क्षेत्र अस्तव्यस्त थे। इन दिनों उत्तर भारत के अनेक भागों में बौद्ध धर्म का प्रचार था। बौद्ध धर्म का विकास कई रूपों में हुआ जिनमें से एक वज्रयान कहलाया। वज्रयानी तांत्रिक थे और सिद्ध कहलाते थे। इन्होंने जनता के बीच उस समय की लोकभाषा में अपने मत का प्रचार किया। हिन्दी का प्राचीनतम साहित्य इन्हीं वज्रयानी सिद्धों द्वारा तत्कलीन लोकभाषा पुरानी हिन्दी में लिखा गया। इसके बाद नाथपंथी साधुओं का समय आता है। इन्होंने बौद्ध, शांकर, तंत्र, योग और शैव मतों के मिश्रण से अपना नया पंथ चलाया जिसमें सभी वर्गों और वर्णों के लिए धर्म का एक सामान्य मत प्रतिपादित किया गया था। लोकप्रचलित पुरानी हिन्दी में लिखी इनकी अनेक धार्मिक रचनाएँ उपलब्ध हैं। इसके बाद जैनियों की रचनाएँ मिलती हैं। स्वयंभू का “पउमचरिउ‘ अथवा रामायण आठवीं शताब्दी की रचना है। बौद्धों और नाथपंथियों की रचनाएँ मुक्तक और केवल धार्मिक हैं पर जैनियों की अनेक रचनाएँ जीवन की सामान्य अनुभूतियों से भी संबद्ध हैं। इनमें से कई प्रबंधकाव्य हैं। इसी काल में अब्दुलरहमान का काव्य “संदेशरासक’ भी लिखा गया जिसमें परवर्ती बोलचाल के निकट की भाषा मिलती है। इस प्रकार ग्यारहवीं शताब्दी तक पुरानी हिन्दी का रूप निर्मित और विकसित होता रहा।

आदिकाल (1000 से 1300 ई)

ग्यारहवीं सदी के लगभग देशभाषा हिन्दी का रूप अधिक स्फुट होने लगा। उस समय पश्चिमी हिन्दी प्रदेश में अनेक छोटे छोटे राजपूत राज्य स्थापित हो गए थे। ये परस्पर अथवा विदेशी आक्रमणकारियों से प्राय: युद्धरत रहा करते थे। इन्हीं राजाओं के संरक्षण में रहनेवाले चारणों और भाटों का राजप्रशस्तिमूलक काव्य वीरगाथा के नाम से अभिहित किया गया। इन वीरगाथाओं को रासो कहा जाता है। इनमें आश्रयदाता राजाओं के शौर्य और पराक्रम का ओजस्वी वर्णन करने के साथ ही उनके प्रेमप्रसंगों का भी उल्लेख है। रासो ग्रन्थों में संघर्ष का कारण प्राय: प्रेम दिखाया गया है। इन रचनाओं में इतिहास और कल्पना का मिश्रण है। रासो वीरगीत (बीसलदेवरासो और आल्हा आदि) और प्रबंधकाव्य (पृथ्वीराजरासो, खमनरासो आदि) – इन दो रूपों में लिखे गए। इन रासो ग्रन्थों में से अनेक की उपलब्ध प्रतियाँ चाहे ऐतिहासिक दृष्टि से संदिग्ध हों पर इन वीरगाथाओं की मौखिक परंपरा अंसदिग्ध है। इनमें शौर्य और प्रेम की ओजस्वी और सरस अभिव्यक्ति हुई है।

इसी कालावधि में मैथिल कोकिल विद्यापति हुए जिनकी पदावली में मानवीय सौंदर्य ओर प्रेम की अनुपम व्यंजना मिलती है। कीर्तिलता और कीर्तिपताका इनके दो अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। अमीर खुसरो का भी यही समय है। इन्होंने ठेठ खड़ी बोली में अनेक पहेलियाँ, मुकरियाँ और दो सखुन रचे हैं। इनके गीतों, दोहों की भाषा ब्रजभाषा है।

भक्तिकाल (1300 से 1650 ई.)

मुख्य लेख : भक्ति काल

तेरहवीं सदी तक धर्म के क्षेत्र में बड़ी अस्तव्यस्तता आ गई। जनता में सिद्धों और योगियों आदि द्वारा प्रचलित अंधविश्वास फैल रहे। थे, शास्त्रज्ञानसंपन्न वर्ग में भी रूढ़ियों और आडंबर की प्रधानता हो चली थी। मायावाद के प्रभाव से लोकविमुखता और निष्क्रियता के भाव समाज में पनपने लगे थे। ऐसे समय में भक्तिआंदोलन के रूप में ऐसा भारतव्यापी विशाल सांस्कृतिक आंदोलन उठा जिसने समाज में उत्कर्षविधायक सामाजिक और वैयक्तिक मूल्यों की प्रतिष्ठा की।

भक्ति आंदोलन का आरंभ दक्षिण के आलवार संतों द्वारा दसवीं सदी के लगभग हुआ। वहाँ शंकराचार्य के अद्वैतमत और मायावाद के विरोध में चार वैष्णव संप्रदाय खड़े हुए। इन चारों संप्रदायों ने उत्तर भारत में विष्णु के अवतारों का प्रचारप्रसार किया। इनमें से एक के प्रवर्तक रामानुजाचार्य थे, जिनकी शिष्यपरंपरा में आनेवाले रामानंद ने (पंद्रहवीं सदी) उत्तर भारत में रामभक्ति का प्रचार किया। रामानंद के राम ब्रह्म के स्थानापन्न थे जो राक्षसों का विनाश और अपनी लीला का विस्तार करने के लिए संसार में अवतीर्ण होते हैं। भक्ति के क्षेत्र में रामानंद ने ऊँचनीच का भेदभाव मिटाने पर विशेष बल दिया। राम के सगुण और निर्गुण दो रूपों को माननेवाले दो भक्तों – कबीर और तुलसी को इन्होंने प्रभावित किया। विष्णुस्वामी के शुद्धाद्वैत मत का आधार लेकर इसी समय बल्लभाचार्य ने अपना पुष्टिमार्ग चलाया। बारहवीं से सोलहवीं सदी तक पूरे देश में पुराणसम्मत कृष्णचरित्‌ के आधार पर कई संप्रदाय प्रतिष्ठित हुए, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली वल्लभ का पुष्टिमार्ग था। उन्होंने शांकर मत के विरुद्ध ब्रह्म के सगुण रूप को ही वास्तविक कहा। उनके मत से यह संसार मिथ्या या माया का प्रसार नहीं है बल्कि ब्रह्म का ही प्रसार है, अत: सत्य है। उन्होंने कृष्ण को ब्रह्म का अवतार माना और उसकी प्राप्ति के लिए भक्त का पूर्ण आत्मसमर्पण आवश्यक बतलाया। भगवान्‌ के अनुग्रह या पुष्टि के द्वारा ही भक्ति सुलभ हो सकती है। इस संप्रदाय में उपासना के लिए गोपीजनवल्लभ, लीलापुरुषोत्तम कृष्ण का मधुर रूप स्वीकृत हुआ। इस प्रकार उत्तर भारत में विष्णु के राम और कृष्णअवतारों प्रतिष्ठा हुई।

इस प्रकार इन विभिन्न मतों का आधार लेकर हिन्दी में निर्गुण और सगुण के नाम से भक्तिकाव्य की दो शाखाएँ साथ साथ चलीं। निर्गुणमत के दो उपविभाग हुए – ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी। पहले के प्रतिनिधि कबीर और दूसरे के जायसी हैं। सगुणमत भी दो उपधाराओं में प्रवाहित हुआ – रामभक्ति और कृष्णभक्ति। पहले के प्रतिनिधि तुलसी हैं और दूसरे के सूरदास

ज्ञानश्रयी शाखा के प्रमुख कवि कबीर पर तात्कालिक विभिन्न धार्मिक प्रवृत्तियों और दार्शनिक मतों का सम्मिलित प्रभाव है। उनकी रचनाओं में धर्मसुधारक और समाजसुधारक का रूप विशेष प्रखर है। उन्होंने आचरण की शुद्धता पर बल दिया। बाह्याडंबर, रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर उन्होंने तीव्र कशाघात किया। मनुष्य की क्षमता का उद्घोष कर उन्होंने निम्नश्रेणी की जनता में आत्मगौरव का भाव जगाया। इस शाखा के अन्य कवि रैदास, दादू हैं।

प्रेमाश्रयी धारा के सर्वप्रमुख कवि जायसी हैं जिनका “पदमावत’ अपनी मार्मिक प्रेमव्यंजना, कथारस और सहज कलाविन्यास के कारण विशेष प्रशंसित हुआ है। इनकी अन्य रचनाओं में “अखरावट’ और “आखिरी कलाम’ आदि हैं, जिनमें सूफी संप्रदायसंगत बातें हैं१ इस धारा के अन्य कवि हैं कुतबन, मंझन, उसमान, शेख, नबी और नूर मुहम्मद आदि।

आज की दृष्टि से इस संपूर्ण भक्तिकाव्य का महत्व उसक धार्मिकता से अधिक लोकजीवनगत मानवीय अनुभूतियों और भावों के कारण है। इसी विचार से भक्तिकाल को हिन्दी काव्य का स्वर्ण युग कहा जा सकता है।

रीतिकाल (1650 से 1850 ई.)

१७०० ई. के आस पास हिन्दी कविता में एक नया मोड़ आया। इसे विशेषत: तात्कालिक दरबारी संस्कृति और संस्कृतसाहित्य से उत्तेजना मिली। संस्कृत साहित्यशास्त्र के कतिपय अंशों ने उसे शास्त्रीय अनुशासन की ओर प्रवृत्त किया। हिन्दी में ‘रीति’ या ‘काव्यरीति’ शब्द का प्रयोग काव्यशास्त्र के लिए हुआ था। इसलिए काव्यशास्त्रबद्ध सामान्य सृजनप्रवृत्ति और रस, अलंकार आदि के निरूपक बहुसंख्यक लक्षणग्रन्थों को ध्यान में रखते हुए इस समय के काव्य को ‘रीतिकाव्य’ कहा गया। इस काव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों की पुरानी परंपरा के स्पष्ट संकेत संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी और हिन्दी के आदिकाव्य तथा कृष्णकाव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों में मिलते हैं।

रीतिकाव्य रचना का आरंभ एक संस्कृतज्ञ ने किया। ये थे आचार्य केशवदास, जिनकी सर्वप्रसिद्ध रचनाएँ कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचंद्रिका हैं। केशव के कई दशक बाद चिन्तामणि से लेकर अठारहवीं सदी तक हिन्दी में रीतिकाव्य का अजस्र स्रोत प्रवाहित हुआ जिसमें नर-नारी-जीवन के रमणीय पक्षों और तत्संबंधी सरस संवेदनाओं की अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्ति व्यापक रूप में हुई।

रीतिकाल के कवि राजाओं और रईसों के आश्रय में रहते थे। वहाँ मनोरंजन और कलाविलास का वातावरण स्वाभाविक था। बौद्धिक आनंद का मुख्य साधन वहाँ उक्तिवैचित्रय समझा जाता था। ऐसे वातावरण में लिखा गया साहित्य अधिकतर शृंगारमूलक और कलावैचित्रय से युक्त था। पर इसी समय प्रेम के स्वच्छंद गायक भी हुए जिन्होंने प्रेम की गहराइयों का स्पर्श किया है। मात्रा और काव्यगुण दोनों ही दृष्टियों से इस समय का नर-नारी-प्रेम और सौंदर्य की मार्मिक व्यंजना करनेवाला काव्यसाहित्य महत्वपूर्ण है।

रीतिकाव्य मुख्यत: मांसल शृंगार का काव्य है। इसमें नर-नारीजीवन के स्मरणीय पक्षों का सुंदर उद्घाटन हुआ है। अधिक काव्य मुक्तक शैली में है, पर प्रबंधकाव्य भी हैं। इन दो सौ वर्षों में शृंगारकाव्य का अपूर्व उत्कर्ष हुआ। पर धीरे धीरे रीति की जकड़ बढ़ती गई और हिन्दी काव्य का भावक्षेत्र संकीर्ण होता गया। आधुनिक युग तक आते आते इन दोनों कमियों की ओर साहित्यकारों का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट हुआ।

आधुनिक काल (1850 से अब तक)

इन्हें भी देखें –

हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल,

आधुनिक हिंदी पद्य का इतिहास,

आधुनिक हिंदी गद्य का इतिहास

उन्नीसवीं शताब्दी

यह आधुनिक युग का आरंभ काल है जब भारतीयों का यूरोपीय संस्कृति से संपर्क हुआ। भारत में अपनी जड़ें जमाने के काम में अँगरेजी शासन ने भारतीय जीवन को विभिन्न स्तरों पर प्रभावित और आंदोलित किया। नई परिस्थितियों के धक्के से स्थितिशील जीवनविधि का ढाँचा टूटने लगा। एक नए युग की चेतना का आरंभ हुआ। संघर्ष और सामंजस्य के नए आयाम सामने आए।

नए युग के साहित्यसृजन की सर्वोच्च संभावनाएँ खड़ी बोली गद्य में निहित थीं, इसलिए इसे गद्य-युग भी कहा गया है। हिन्दी का प्राचीन गद्य राजस्थानी, मैथिली और ब्रजभाषा में मिलता है पर वह साहित्य का व्यापक माध्यम बनने में अशक्त था। खड़ीबोली की परंपरा प्राचीन है। अमीर खुसरो से लेकर मध्यकालीन भूषण तक के काव्य में इसके उदाहरण बिखरे पड़े हैं। खड़ी बोली गद्य के भी पुराने नमूने मिले हैं। इस तरह का बहुत सा गद्य फारसी और गुरुमुखी लिपि में लिखा गया है। दक्षिण की मुसलिम रियासतों में “दखिनी’ के नाम से इसका विकास हुआ। अठारहवीं सदी में लिखा गया रामप्रसाद निरंजनी और दौलतराम का गद्य उपलब्ध है। पर नई युगचेतना के संवाहक रूप में हिन्दी के खड़ी बोली गद्य का व्यापक प्रसार उन्नीसवीं सदी से ही हुआ। कलकत्ते के फोर्ट विलियम कालेज में, नवागत अँगरेज अफसरों के उपयोग के लिए, लल्लू लाल तथा सदल मिश्र ने गद्य की पुस्तकें लिखकर हिन्दी के खड़ी बोली गद्य की पूर्वपरंपरा के विकास में कुछ सहायता दी। सदासुखलाल और इंशाअल्ला खाँ की गद्य रचनाएँ इसी समय लिखी गई। आगे चलकर प्रेस, पत्रपत्रिकाओं, ईसाई धर्मप्रचारकों तथा नवीन शिक्षा संस्थाओं से हिन्दी गद्य के विकास में सहायता मिली। बंगाल, पंजाब, गुजरात आदि विभिन्न प्रान्तों के निवासियों ने भी इसकी उन्नति और प्रसार में योग दिया। हिन्दी का पहला समाचारपत्र “उदंत मार्तड‘ १८२६ ई. में कलकत्ते से प्रकाशित हुआ। राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मणसिंह हिन्दी गद्य के निर्माण और प्रसार मैं अपने अपने ढंग से सहायक हुए। आर्यसमाज और अन्य सांस्कृतिक आंदोलनों ने भी आधुनिक गद्य को आगे बढ़ाया।

गद्यसाहित्य की विकासमान परंपरा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से अग्रसर हुई। इसके प्रवर्तक आधुनिक युग के प्रवर्तक और पथप्रदर्शक भारतेंदु हरिश्चंद्र थे जिन्होंने साहित्य का समकालीन जीवन से घनिष्ठ संबंध स्थापित किया। यह संक्रांति और नवजागरण का युग था। अँगरेजों की कूटनीतिक चालों और आर्थिक शोषण से जनता संत्रस्त और क्षुब्ध थी। समाज का एक वर्ग पाश्चात्य संस्कारों से आक्रांत हो रहा था तो दूसरा वर्ग रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था। इसी समय नई शिक्षा का आरंभ हुआ और सामाजिक सुधार के आंदोलन चले। नवीन ज्ञान विज्ञान के प्रभाव से नवशिक्षितों में जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ जो अतीत की अपेक्षा वर्तमान और भविष्य की ओर विशेष उन्मुख था। सामाजिक विकास में उत्पन्न आस्था और जाग्रत समुदायचेतना ने भारतीयों में जीवन के प्रति नया उत्साह उत्पन्न किया। भारतेंदु के समकालीन साहित्य में विशेषत: गद्यसाहित्य में तत्कालीन वैचारिक और भौतिक परिवेश की विभिन्न अवस्थाओं की स्पष्ट और जीवंत अभिव्यक्ति हुई। इस युग की नवीन रचनाएँ देशभक्ति और समाजसुधार की भावना से परिपूर्ण हैं। अनेक नई परिस्थितियों की टकराहट से राजनीतिक और सामाजिक व्यंग की प्रवृत्ति भी उद्बुद्ध हुई। इस समय के गद्य में बोलचाल की सजीवता है। लेखकों के व्यक्तित्व से संपृक्त होने के कारण उसमें पर्याप्त रोचकता आ गई है। सबसे अधिक निबंध लिखे गए जो व्यक्तिप्रधान और विचारप्रधान तथा वर्णनात्मक भी थे। अनेक शैलियों में कथासाहित्य भी लिखा गया, अधिकतर शिक्षाप्रधान। पर यथार्थवादी दृष्टि और नए शिल्प की विशिष्टता श्रीनिवासदास के “परीक्षागुरु‘ में ही है। देवकीनंदन का तिलस्मी उपन्यास ‘चंद्रकांता’ इसी समय प्रकाशित हुआ। पर्याप्त परिमाण में नाटकों और सामाजिक प्रहसनों की रचना हुई। भारतेंदु, प्रतापनारायण, श्री निवासदास, आदि प्रमुख नाटककार हैं। साथ ही भक्ति और शृंगार की बहुत सी सरस कविताएँ भी निर्मित हुई। पर जिन कविताओं में सामाजिक भावों की अभिव्यक्ति हुई वे ही नए युग की सृजनशीलता का आरंभिक आभास देती हैं। खड़ी बोली के छिटफुट प्रयोगों को छोड़ शेष कविताएँ ब्रजभाषा में लिखी गई। वास्तव में नया युग इस समय के गद्य में ही अधिक प्रतिफलित हो सका।

बीसवीं शताब्दी

इस कालावधि की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ दो हैं – एक तो सामान्य काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली की स्वीकृति और दूसरे हिन्दी गद्य का नियमन और परिमार्जन। इस कार्य में सर्वाधिक सशक्त योग सरस्वती संपादक महावीरप्रसाद द्विवेदी का था। द्विवेदी जी और उनके सहकर्मियों ने हिन्दी गद्य की अभिव्यक्तिक्षमता को विकसित किया। निबंध के क्षेत्र में द्विवेदी जी के अतिरिक्त बालमुकुंद, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पूर्णसिंह, पद्मसिंह शर्मा जैसे एक से एक सावधान, सशक्त और जीवंत गद्यशैलीकार सामने आए। उपन्यास अनेक लिखे गए पर उसकी यथार्थवादी परंपरा का उल्लेखनीय विकास न हो सका। यथार्थपरक आधुनिक कहानियाँ इसी काल में जनमी और विकासमान हुई। गुलेरी, कौशिक आदि के अतिरिक्त प्रेमचंद और प्रसाद की भी आरंभिक कहानियाँ इसी समय प्रकाश में आई। नाटक का क्षेत्र अवश्य सूना सा रहा। इस समय के सबसे प्रभावशाली समीक्षक द्विवेदी जी थे जिनकी संशोधनवादी और मर्यादानिष्ठ आलोचना ने अनेक समकालीन साहित्य को पर्याप्त प्रभावित किया। मिश्रबंधु, कृष्णबिहारी मिश्र और पद्मसिंह शर्मा इस समय के अन्य समीक्षक हैं पर कुल मिलाकर इस समय की समीक्षा बाह्यपक्षप्रधान ही रही।

सुधारवादी आदर्शों से प्रेरित अयोध्यासिंह उपाध्याय ने अपने “प्रियप्रवास’ में राधा का लोकसेविका रूप प्रस्तुत किया और खड़ीबोली के विभिन्न रूपों के प्रयोग में निपुणता भी प्रदर्शित की। मैथिलीशरण गुप्त ने “भारत भारती’ में राष्ट्रीयता और समाजसुधार का स्वर ऊँचा किया और “साकेत’ में उर्मिला की प्रतिष्ठा की। इस समय के अन्य कवि द्विवेदी जी, श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, नाथूराम शर्मा, गयाप्रसाद शुक्ल आदि हैं। ब्रजभाषा काव्यपरंपरा के प्रतिनिधि रत्नाकर और सत्यनारायण कविरत्न हैं। इस समय खड़ी बोली काव्यभाषा के परिमार्जन और सामयिक परिवेश के अनुरूप रचना का कार्य संपन्न हुआ। नए काव्य का अधिकांश विचारपरक और वर्णनात्मक है।

सन्‌ १९२०-४० के दो दशकों में आधुनिक साहित्य के अंतर्गत वैचारिक और कलात्मक प्रवृत्तियों का अनेक रूप उत्कर्ष दिखाई पड़ा। सर्वाधिक लोकप्रियता उपन्यास और कहानी को मिली। कथासाहित्य में घटनावैचित्य की जगह जीते जागते स्मरणीय चरित्रों की सृष्टि हुई। निम्न और मध्यवर्गीय समाज के यथार्थपरक चित्र व्यापक रूप में प्रस्तुत किए गए। वर्णन की सजीव शैलियों का विकास हुआ। इस समय के सर्वप्रमुख कथाकार प्रेमचंद हैं। वृंदावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास भी उल्लेख्य है। हिन्दी नाटक इस समय जयशंकर प्रसाद के साथ सृजन के नवीन स्तर पर आरोहण करता है। उनके रोमांटिक ऐतिहासिक नाटक अपनी जीवंत चारित्र्यसृष्टि, नाटकीय संघर्षों की योजना और संवेदनीयता के कारण विशेष महत्व के अधिकारी हुए। कई अन्य नाटककार भी सक्रिय दिखाई पड़े। हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में रामचंद्र शुक्ल ने सूर, तुलसी और जायसी की सूक्ष्म भावस्थितियों और कलात्मक विशेषताओं का मार्मिक उद्घाटन किया और साहित्य के सामाजिक मूल्यों पर बल दिया। अन्य आलोचक है श्री नंददुलारे वाजपेयी, डा. नगेंद्र तथा डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी।

काव्य के क्षेत्र में यह छायावाद के विकास का युग है। पूर्ववर्ती काव्य वस्तुनिष्ठ था, छायावादी काव्य भावनिष्ठ है। इसमें व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों का प्राधान्य है। स्थूल वर्णन विवरण के स्थान पर छायावादी काव्य में व्यक्ति की स्वच्छंद भावनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई। स्थूल तथ्य और वस्तु की अपेक्षा बिंबविधायक कल्पना छायावादियों को अधिक प्रिय है। उनकी सौंदर्यचेतना विशेष विकसित है। प्रकृतिसौंदर्य ने उन्हें विशेष आकृष्ट किया। वैयक्तिक संवेगों की प्रमुखता के कारण छायावादी काव्य मूलत: प्रगीतात्मक है। इस समय खड़ी बोली काव्यभाषा की अभिव्यक्तिक्षमता का अपूर्व विकास हुआ। जयशंकर प्रसाद, माखनलाल, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’, महादेवी, नवीन और दिनकर छायावाद के उत्कृष्ट कवि हैं।

सन्‌ १९४० के बाद छायावाद की संवेगनिष्ठ, सौंदर्यमूलक और कल्पनाप्रिय व्यक्तिवाद प्रवृत्तियों के विरोध में प्रगतिवाद का संघबद्ध आंदोलन चला जिसकी दृष्टि समाजबद्ध, यथार्थवादी और उपयोगितावादी है। सामाजिक वैषम्य और वर्गसंघर्ष का भाव इसमें विशेष मुखर हुआ। इसने साहित्य को सामाजिक क्रांति के अस्त्र के रूप में ग्रहण किया। अपनी उपयोगितावादी दृष्टि की सीमाओं के कारण प्रगतिवादी साहित्य, विशेषत: कविता में कलात्मक उत्कर्ष की संभावनाएँ अधिक नहीं थीं, फिर भी उसने साहित्य के सामाजिक पक्ष पर बल देकर एक नई चेतना जाग्रत की।

प्रगतिवादी आंदोलन के आरंभ के कुछ ही बाद नए मनोविज्ञान या मनोविश्लेषणशास्त्र से प्रभावित एक और व्यक्तिवादी प्रवृत्ति साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हुई थी जिसे सन्‌ १९४३ के बाद प्रयोगवाद नाम दिया गया। इसी का संशोधित रूप वर्तमानकालीन नई कविता और नई कहानियाँ हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि द्वितीय महायुद्ध और उसके उत्तरकालीन साहित्य में जीवन की विभीषिका, कुरूपता और असंगतियों के प्रति अंसतोष तथा क्षोभ ने कुछ आगे पीछे दो प्रकार की प्रवृत्तियों को जन्म दिया। एक का नाम प्रगतिवाद है, जो मार्क्स के भौतिकवादी जीवनदर्शन से प्रेरणा लेकर चला; दूसरा प्रयोगवाद है, जिसने परंपरागत आदर्शों और संस्थाओं के प्रति अपने अंसतोष की तीव्र प्रतिक्रियाओं को साहित्य के नवीन रूपगत प्रयोगों के माध्यम से व्यक्त किया। इसपर नए मनोविज्ञान का गहरा प्रभाव पड़ा।

प्रगतिवाद से प्रभावित कथाकारों में यशपाल, उपेंद्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर और नागार्जुन आदि विशिष्ट हैं। आलोचकों में रामविलास शर्मा,नामवर सिंह, विजय देव नारायण साही प्रमुख हैं। कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, रांगेय राघव, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। निबन्ध विधा में इस दौर में आछार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्या निवास मिश्र और कुबेरनाथ राय ने विशेष ख्याति अर्जित की|

नए मनोविज्ञान से प्रभावित प्रयोगों के लिए सचेष्ट कथाकारों में अज्ञेय प्रमुख हैं। मनोविज्ञान से गंभीर रूप में प्रभावित इलाचंद्र जोशी और जैनेंद्र हैं। इन लेखकों ने व्यक्तिमन के अवचेतन का उद्घाटन कर नया नैतिक बोध जगाने का प्रयत्न किया। जैनेंद्र और अज्ञेय ने कथा के परंपरागत ढाँचे को तोड़कर शैलीशिल्प संबंधी नए प्रयोग किए। परवर्ती लेखकों और कवियों में वैयक्तिक प्रतिक्रियाएँ अधिक प्रखर हुईं। समकालीन परिवेश से वे पूर्णत: संसक्त हैं। उन्होंने समाज और साहित्य की मान्यताओं पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। व्यक्तिजीवन की लाचारी, कुंठा, आक्रोश आदि व्यक्त करने के साथ ही वे वैयक्तिक स्तर पर नए जीवनमूल्यों के अन्वेषण में लगे हुए हैं। उनकी रचनाओं में एक ओर सार्वभौम संत्रास और विभीषिका की छटपटाहट है तो दूसरी ओर व्यक्ति के अस्तित्व की अनिवार्यता और जीवन की संभावनाओं को रेखांकित करने का उपक्रम भी। हमारा समकालीन साहित्य आत्यंतिक व्यक्तिवाद से ग्रस्त है और यह उसकी सीमा है। पर उसका सबसे बड़ा बल उसकी जीवनमयता है जिसमें भविष्य की सशक्त संभावनाएँ निहित हैं।

हिन्दी एवं उसके साहित्य का इतिहास

संस्कृत का उद्गम

  • ३२२ ईसा पूर्व – मौर्यों द्वारा ब्राह्मी लिपि का विकास।
  • २५० ईसा पूर्व – आदि संस्कृत का विकास। (आदि संस्कृत ने धीरे धीरे १०० ईसा पूर्व तक प्राकति का स्थान लिया।)
  • ३२० ए. डी. (ईसवी)- गुप्त या सिद्ध मात्रिका लिपि का विकास।

अपभ्रंश तथा आदि-हिन्दी का विकास

अपभ्रंश का अस्त तथा आधुनिक हिन्दी का विकास

  • १२८३ – अमीर ख़ुसरो की पहेली तथा मुकरियाँ में “हिन्दवी” शव्द का सर्वप्रथम उपयोग।
  • १३७० – “हंसवाली” की आसहात ने प्रेम कथाओं की शुरुआत की।
  • १३९८-१५१८ – कबीर की रचनाओं ने निर्गुण भक्ति की नींव रखी।
  • १४००-१४७९ – अपभ्रंश के आखरी महान कवि रघु
  • १४५० – रामानन्द के साथ “सगुण भक्ति” की शुरुआत।
  • १५८० – शुरुआती दक्खिनी का कार्य “कालमितुल हकायत्” — बुर्हनुद्दिन जनम द्वारा।
  • १५८५ – नाभादास ने “भक्तमाल” लिखी।
  • १६०१ – बनारसीदास ने हिन्दी की पहली आत्मकथा “अर्ध कथानक” लिखी।
  • १६०४ – गुरु अर्जुन देव ने कई कवियों की रचनाओं का संकलन “आदि ग्रन्थ” निकाला।
  • १५३२-१६२३ – गोस्वामी तुलसीदास ने “रामचरित मानस” की रचना की।
  • १६२३ – जाटमल ने “गोरा बादल की कथा” (खडी बोली की पहली रचना) लिखी।
  • १६४३ – आचार्य केशव दास ने “रीति” के द्वारा काव्य की शुरुआत की।
  • १६४५ – उर्दू का आरंभ

आधुनिक हिन्दी

  • १७९६ – देवनागरी रचनाओं की शुरुआती छ्पाई।
  • २००० – आधुनिक हिंदी का अंतर्राष्ट्रीय विकास

 

हिंदी भाषा और उसका विकास

 

Hindi_devnagari.pngहिन्दी” वस्तुत: फारसी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है-हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित। हिन्दी शब्द की निष्पत्ति सिन्धु -सिंध से हुई है क्योंकि ईरानी भाषा में “स” को “ह” बोला जाता है। इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है। कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा । इसी “हिंद” से हिन्दी शब्द बना।

आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है,वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है,जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। वैदिक भाषा में वेद,संहिता एवं उपनिषदों – वेदांत का सृजन हुआ है। वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी,जिसे लौकिक संस्कृत भी कहा जाता है। संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है। अनुमानत: ८ वी.शताब्दी ई.पू.में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था। संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये। वाल्मीकि ,व्यास,कालिदास,अश्वघोष,भारवी,माघ,भवभूति,विशाख,मम्मट,दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान विभूतियाँ है। इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है।

संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते ५०० ई.पू.के बाद तक काफ़ी बदल गई,जिसे “पालि” कहा गया। महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होंने पालि के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया। संभवत: यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही। पहली ईसवी तक आते-आते पालि भाषा और परिवर्तित हुई,तब इसे “प्राकृत” की संज्ञा दी गई। इसका काल पहली ई.से ५०० ई.तक है। पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषायें- पश्चिमी,पूर्वी ,पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी ,अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी,जिन्हें मागधी,शौरसेनी,महाराष्ट्री,पैशाची,ब्राचड तथा अर्धमागधी भी कहा जा सकता है।

आगे चलकर,प्राकृत भाषाओं के क्षेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषायें प्रतिष्ठित हुई। इनका समय ५०० ई.से १००० ई.तक माना जाता है। अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यत: दो रूप मिलते है – पश्चिमी और पूर्वी । अनुमानत: १००० ई.के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का जन्म हुआ। आधुनिक आर्य भाषाओं में,जिनमे हिन्दी भी है, का जन्म १००० ई.के आसपास ही हुआ था,किंतु उसमे साहित्य रचना का कार्य ११५० या इसके बाद प्रारम्भ हुआ। अनुमानत: तेरहवीं शताब्दी में हिन्दी भाषा में साहित्य रचना का कार्य प्रारम्भ हुआ,यही कारण है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी को ग्राम्य अपभ्रंशों का रूप मानते है। आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता है –

अपभ्रंश ………………………………………….आधुनिक आर्य भाषा तथा उपभाषा

पैशाची …………………………………………….लहंदा ,पंजाबी
ब्राचड ………………………………………………सिन्धी
महाराष्ट्री …………………………………………..मराठी.
अर्धमागधी………………………………………..पूर्वी हिन्दी.
मागधी …………………………………………….बिहारी ,बंगला,उड़िया ,असमिया.
शौरसेनी …………………………………………..पश्चिमी हिन्दी,राजस्थानी ,पहाड़ी,गुजराती.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि हिन्दी भाषा का उद्भव ,अपभ्रंश के अर्धमागधी ,शौरसेनी और मागधी रूपों से हुआ है.

 

 

यूजीसी क्या है?

विकिपीडिया के अनुसार-

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भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास काफी पुराना है। इसके मूल में १९वीं शताब्दी है, जब वाइसरॉय लॉर्ड मैकाले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं शताब्दी में सन् १९२५ में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक और संबंधित क्षेत्रों के बारे में सूचना का आदान-प्रदान किया जाने लगा था। भारतीय स्वतंत्रता उपरांत १९४८ में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन की नींव रखी गई। इसके अंतर्गत देश में शिक्षा की आवश्यकताओं और उनमें सुधार पर काम किए जाने पर विचार किया जाता था। इस आयोग ने सलाह दी कि आजादी पूर्व के यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिटी को फिर से गठित किया जाए। उसका एक अध्यक्ष हो और उसके साथ ही देश के बड़े शिक्षाविदों को भी इस समिति के साथ जोड़ा जाए।

सन् १९५२ में सरकार ने निर्णल लिया कि केंद्रीय और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों को दी जाने वाले वित्तीय सहयोग के मामलों को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के अधीन लाया जाएगा। इस तरह २८ दिसंबर १९५३ को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने औपचारिक तौर पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की नींव रखी थी। इसके बाद हालांकि १९५६ में जाकर ही यूजीसी को संसद में पारित एक विशेष विधेयक के बाद सरकार के अधीन लाया गया और तभी औपचारिक तौर पर इसे स्थापित माना गया। भारत भर में क्षेत्रीय स्तर पर अपने कार्यो को सुचारू रूप से आरंभ करने के लिए यूजीसी ने कई स्थानों पर अपने कार्यालय खोले। विकेंद्रीकरण की इस प्रक्रिया में यूजीसी ने देश में छह स्थानों पर अपने कार्यालय खोले।

 

हमारे देश में उच्च शिक्षा की शुरुआत का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी जड़ें उन्नीसवीं सदी तक जाती हैं जब लॉर्ड मैक्कॉले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं सदी में सन् 1925 में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक और संबंधित क्षेत्रों के बारे में सूचना का आदान-प्रदान किया जाने लगा था।

आजादी के बाद 1948 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन की नींव रखी गई। इसके अंतर्गत देश में शिक्षा की जरूरतों और उनमें बेहतरी पर काम किए जाने पर विचार किया जाता था। इस कमीशन ने सलाह दी कि आजादी पूर्व के यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिटी को फिर से गठित किया जाए। जिसका एक चेयरमैन हो और उसके साथ ही देश के बड़े शिक्षाविदों को भी इस कमिटी के साथ जोड़ा जाए।

सन् 1952 में सरकार ने केंद्रीय और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों को दी जाने वाले वित्तीय सहयोग के मामलों को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के अधीन लाया जाएगा। इस तरह 28 दिसंबर 1953 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने औपचारिक तौर पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की नींव रखी थी। इसके बाद हालांकि 1956 में जाकर ही यूजीसी को संसद में पारित एक विशेष विधेयक के बाद सरकार के अधीन लाया गया और तभी औपचारिक तौर पर इसे स्थापित माना गया।

देश भर में क्षेत्रीय स्तर पर अपने कार्यो को सुचारू रूप से अंजाम देने के लिए यूजीसी ने कई स्थानों पर अपने कार्यालय खोले। विकेंद्रीकरण की इस प्रक्रिया में यूजीसी ने देश में छह स्थानों पर अपने कार्यालय खोले। यूजीसी के मौजूदा चेयरमैन सुखदेव थोराट हैं जो फरवरी 2006 से इस पद पर आसीन हैं।

उच्च शिक्षा हेतु शिक्षा प्रत्यायन कार्य विश्वविद्यालय अनुदाय आयोग के निम्न १५ संस्थानों द्वारा किया जाता है।

यूजीसी नेट की तैयारी कैसे करें – संदेश आचार्य

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) नई दिल्ली द्वारा शोध को बढ़ावा देने हेतु एवं शिक्षकों की पात्रता निर्धारण करने हेतु राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) का आयोजन वर्ष 1948 से किया जा रहा है। उक्त परीक्षा वर्ष में दो बार जून एवं दिसंबर माह में आयोजित की जाती है।

परीक्षा के दो मुख्य उद्देश्य है। प्रथम शोध कार्य करने हेतु छात्रवृत्ति प्रदान करना एवं द्वितीय शिक्षकों हेतु पात्रता मापदंड निर्धारित करना है। किसी भी विषय के स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त एवं अंतिम वर्ष में अध्ययनरत छात्र परीक्षा में प्रतिभागी हो सकते हैं।

इस परीक्षा में तीन प्रश्न-पत्रों का आयोजन एक ही दिन में किया जाता है। प्रथम एवं द्वितीय प्रश्न-पत्र का वस्तुनिष्ठ प्रकार के जबकि तृतीय प्रश्न-पत्र वर्णात्मक प्रकार का होता है। प्रथम प्रश्न-पत्र का पाठ्यक्रम समस्त विद्यार्थियों हेतु एक समान है, जबकि द्वितीय एवं तृतीय प्रश्न-पत्र विद्यार्थी के स्नातकोत्तर विषय की विषय वस्तु पर आधारित होते हैं।

नेट परीक्षा का प्रथम प्रश्न-पत्र मुख्यतः शिक्षण एवं शोध अभिवृत्ति पर आधारित है। साथ ही तर्क एवं गणितीय अभिक्षमता, सून प्रौद्योगिकी, पर्यावरण तथा अपठित गद्यांश से संबंधित प्रश्नों का समावेश भी इस प्रश्न-पत्र में होता है। इस प्रश्न-पत्र में कुल 60 प्रश्न पूछे जाते हैं। जिन में से 50 प्रश्नों को 75 मिनट में हल करना होता है। परीक्षा में ऋणात्मक अंकन नहीं किया जाता है। इस प्रश्न-पत्र से संबंधित विषयवस्तु की तैयारी निम्न प्रकार से की जा सकती हैः-

(1) शिक्षण एवं शोध अभिवृत्ति : इस विषय वस्तु से संबंधित अध्ययन हेतु बीए एवं एमएड की पाठ्य पुस्तकें सहायक सिद्ध हो सकती है। शिक्षा मनोविभाग, शैक्षिक शोध एवं शैक्षिक तकनीकी आदि से संबंधित पाठ्य पुस्तकों के अध्ययन से संबंधित विषय वस्तु के अध्ययन कर शिक्षण एवं शोध अभिवृत्ति के प्रश्न को हल किया जा सकता है।

(2) तार्किक एवं गणितीय अभिक्षमता : नेट परीक्षा में चित्रात्मक एवं कथनात्मक दोनों प्रकार के तार्किक प्रश्नों के साथ सामान्य गणितीय अभिक्षमता एवं ग्रॉफिय निरूपण के प्रश्नों का समावेश होता है। इस हेतु बैंक प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें एवं कक्षा 5-10 तक की गणित विषय की पाठ्य पुस्तकों को प्रयोग में लाया जा सकता है। साथ ही इस विषय वस्तु हेतु प्रतिदिन अभ्यास की भी आवश्यकता होती है तभी विद्यार्थी गति एवं शुद्धता के मापदंडों तक पहुंच कर इन प्रश्नों का हल करने में सक्षम होगा।

(3) सूचना प्रौद्योगिकी : इस विषय वस्तु से संबंधित प्रश्न मुख्यतः इंटरनेट, सम्प्रेषण एवं ऑपरेटिंग तंत्र पर आधारित होते है। साथ ही कुछ प्रश्न इस क्षेत्र की नवीनतम जानकारी से भी जुड़े होते है। इस हेतु कम्प्यूटर की आधारभूत पुस्तकों का अध्ययन मददगार साबित हो सकता है। इस क्षेत्र की नवीनतम जानकारियों हेतु कम्प्यूटर से संबंधित प्रकाशित पत्रिकाएं, दैनिक समाचार-पत्रों का अध्ययन कर सफलता प्राप्त की जा सकती है।

(4) पर्यावरण विज्ञान : नेट के प्रथम प्रश्न-पत्र में पर्यावरण विज्ञान से संबंधित प्रश्नों का समावेश भी होता है। जिसमें पर्यावरणीय समस्याओं, सम्मेलनों व नवीनतम जानकारी से जुड़े प्रश्न होते हैं। इस हेतु विभिन्न प्रकाशनों के पर्यावरण विशेषांक, कक्षा 6-10 तक की पर्यावरण से संबंधित पाठ्य पुस्तकों आदि का अध्ययन कर उक्त प्रश्नों को हल किया जा सकता है।

 

अगर आप यूजीसी की परीक्षा में सफल होना चाहते हैं तो आपके लिए बेहतर यही है कि आप सिर्फ रिवीजन करें। अगर आप रिवीजन कम समय में बेहतर तरीके से करते हैं, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है…
सफल होने वाले लोग पहले से योजना बनाते हैं और उसी के अनुरूप तैयारी करते हैं। किसी भी  परीक्षा में आप बेहतर प्रदर्शन तभी कर पाएंगे, जब आप इस परीक्षा की तैयारी सिलेबस के अनुरूप करेंगे। आप इस परीक्षा की तैयारी कर लिए होंगे, लेकिन अब इसे फाइनल टच देने का समय आ गया है।

कई स्टूडेंट्स बेहतर पढ़ाई करने के बावजूद रिविजन के अभाव में परीक्षा में सफल नहीं होते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि वे फाइनल टच नहीं देते हैं। इस समय टीचिंग का जॉब इस समय काफी हॉट हो रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इस जॉब में सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ ही हैवी सैलरी मिलती है। इसके साथ ही सरकारी नौकरी करने का अलग से एडवांटेज होता है। इस कारण काफी संख्या में स्टूडेंट्स सम्मिलित होते हैं। अगर आप भी पढऩे और पढ़ाने के शौकीन हैं और कॉलेज में लेक्चरर बनकर ज्ञान से स्टूडेंट्स को लाभान्वित  करना चाहते हैं, तो आपके लिए इस समय बेहतरीन अवसर है।

पैसा के साथ डिग्री
इस परीक्षा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सबसे अधिक माक्र्स लानेवाले स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप की सुविधा मिलती है। अगर आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, तो स्कॉलरशिप के माध्यम से आप अपनी पढ़ाई आसानी से कर सकते हैं। जो स्टूडेंट्स इस परीक्षा में सबसे अधिक अंक लाते हैं, उनकी मेरिट लिस्ट बनाई जाती है और इनमें से कुछ को जूनियर रिसर्च फेलोशिप यानी जेआरएफ और शेष को नेट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट के लिए चुना जाता है। जेआरएफ में चुने गए स्टूडेंट्स को रिसर्च के लिए स्कॉलरशिप दिए जाते हैं, जबकि नेट क्वालीफाई को स्कॉलरशिप नहीं दिए जाते हैं। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करनेवाले स्टूडेंटस ही लेक्चरर या रीडर पद के योग्य होते हैं।

 

आवश्यक योग्यता
सामान्य अभ्यर्थियों के लिए संबंधित विषय में कम से कम 55 प्रतिशत अंकों के साथ किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से अपनी विषयों में स्नातकोत्तर अनिवार्य है। एससी, एसटी तथा समाज के विकलांग व्यक्तियों के लिए 50 प्रतिशत अंकों से स्नातकोत्तर होना जरूरी है।  लेक्चरर पद की पात्रता प्राप्त करने की चाह रखने वाले अभ्यर्थियों के लिए उम्र सीमा का कोई बंधन नहीं है, वहीं जेआरएफ के लिए उम्र सीमा सामान्य उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम 19 और अधिकतम 28 वर्ष है, जबकि एससी, एसटी तथा विकलांग व्यक्तियों को अधिकतम उम्र सीमा में पांच वर्ष की छूट का प्रावधान है।

एक्यूरेसी है महत्वपूर्ण
इस परीक्षा में आप तभी  सफल हो सकते हैं, जब आप स्पीड और एक्यूरेसी का ध्यान रखेंगे। ऑब्जेक्टिव परीक्षा में इसका काफी महत्व होता है। आपके लिए बेहतर होगा कि निर्धारित समय सीमा के अंदर प्रश्नों को एक्यूरेसी के साथ हल करने का अभ्यास करें। यदि आप इसका अभ्यास करते हैं, तो समय रहते कमजोरी का पता चल जाएगा, जिसे आप आसानी से दूर कर सकते हैं। इस परीक्षा में  बेहतर अंक तभी ला सकते हैं, जब आपका अपनी विषय पर पकड़ होगा। इस कारण सबसे पहले आप अपनी विषय से रिलैटेड प्रश्नों का हल करें। बाजार मे इससे संबंधित काफी पुस्तक उपलब्ध होते हैं। करेंट रिसर्च पर गहरी निगाह रखें। इस परीक्षा की तैयारी कुछ दिनों में संभव नहीं है। इसकी पूरी तैयारी आप तभी कर पाएंगे, जब आप प्लानिंग से तैयारी करेंगे।

 

विषय पर पकड़ जरूरी
प्रश्नों का स्तर स्नातकोत्तर स्तर का होता है। इस कारण उसके सिलेबस और विषय की समझ पहले विकसित करें। बेहतर स्ट्रेटेजी यह होगा कि आप प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करें। उसके बाद संक्षिप्त नोट्स बनाएं और उसी को बार-बार पढ़ें। इस तरह की रणनीति अपनाने से फायदा यह होगा कि आप कम समय में बेहतर तैयारी कर पाएंगे और परीक्षा के समय बेहतर प्रदर्शन करेंगे।

 

बाजार में इसके लिए नोट्स भी मिलते हैं। यदि आप चाहें, तो इसकी सहायता ले सकते हैं। तैयारी के लिए महत्वपूर्ण अध्याय को एक जगह नोट भी कर सकते हैं। इस लिस्ट में उन्हीं को शामिल करें, जिससे हर वर्ष या सर्वाधिक प्रश्न पूछे जा रहे हैं। प्राय: ऑब्जेक्टिव टाइप के प्रश्नों में अभ्यर्थियों के समक्ष तीन तरह के प्रश्न रहते हैं। पहला-आसान, दूसरा-50-50 और तीसरा लकी। इस परीक्षा में निगेटिव मार्किंग का प्रावधान है। इस कारण दो विकल्प को अपनाना कारगर हो सकता है। परीक्षा और सिलेबस के बारे में विस्तृत रूप से जानना चाहते हैं, तो वेबसाइट देख सकते हैं।

http://www.ugcnetonline.in

आधुनिक हिंदी सहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन

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हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना के साथ साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापेखाने के आते ही साहित्य के संसार में एक नयी क्रांति हुई।

आधुनिक हिन्दी साहित्य में गद्य का विकास

आधुनिक हिन्दी गद्य का विकास केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा। पूरे देश में और हर प्रदेश में हिन्दी की लोकप्रियता फैली और अनेक अन्य भाषी लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। हिन्दी गद्य के विकास को विभिन्न सोपानों में विभक्त किया जा सकता है।

१.
भारतेंदु पूर्व युग
१८०० ईस्वी से १८५० ईस्वी तक

२.
भारतेंदु युग
१८५० ईस्वी से १९०० ईस्वी तक

३.
द्विवेदी युग
१९०० ईस्वी से १९२० ईस्वी तक

४.
रामचंद्र शुक्ल व प्रेमचंद युग
१९२० ईस्वी से १९३६ ईस्वी तक

५.
अद्यतन युग
१९३६ ईस्वी से आजतक

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भारतेंदु पूर्व युग

हिन्दी में गद्य का विकास १९वीं शताब्दी के आसपास हुआ। इस विकास में कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इस कॉलेज के दो विद्वानों लल्लूलाल जी तथा सदल मिश्र ने गिलक्राइस्ट के निर्देशन में क्रमश: प्रेमसागर तथा नासिकेतोपाख्यान नामक पुस्तकें तैयार कीं। इसी समय सदासुखलाल ने सुखसागर तथा मुंशी इंशा अल्ला खां ने रानी केतकी की कहानी की रचना की इन सभी ग्रंथों
की भाषा में उस समय प्रयोग में आनेवाली खड़ी बोली को स्थान मिला। आधुनिक खड़ी बोली के गद्य के विकास में विभिन्न धर्मों की परिचयात्मक पुस्तकों का खूब सहयोग रहा जिसमें ईसाई धर्म का भी योगदान रहा। बंगालके
राजा राम मोहन राय ने १८१५ ईस्वी में वेदांतसूत्र का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करवाया। इसके बाद उन्होंने १८२९ में बंगदूत नामक पत्र हिन्दी में निकाला। इसके पहले ही १८२६ में कानपुर के पं जुगल किशोर ने हिन्दी का पहला समाचार पत्र उदंतमार्तंड कलकत्ता से निकाला। इसी समय गुजराती भाषी आर्यसमाज संस्थापक स्वामी दयानंद ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश हिन्दी में लिखा।

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भारतेंदु युग

भारतेंदु हरिश्चंद्र (१८५५-१८८५) को हिन्दी-साहित्य के आधुनिक युग का प्रतिनिधि माना जाता है। उन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगज़ीन और हरिश्चंद्र पत्रिका निकाली। साथ ही अनेक नाटकों की रचना की। उनके प्रसिद्ध नाटक हैं – चंद्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी। ये नाटक रंगमंच पर भी बहुत लोकप्रिय हुए। इस काल में निबंध नाटक उपन्यास तथा कहानियों की रचना हुई। इस काल के लेखकों में बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधा चरण गोस्वामी, उपाध्याय बदरीनाथ चौधरी ‘प्रेमघन’, लाला श्रीनिवास दास, बाबू देवकी नंदन खत्री, और किशोरी लाल गोस्वामी आदि उल्लेखनीय हैं। इनमें से अधिकांश लेखक होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे। श्रीनिवासदास के उपन्यास परीक्षागुरू को हिन्दी का पहला उपन्यास कहा जाता है। कुछ विद्वान श्रद्धाराम फुल्लौरी के उपन्यास भाग्यवती को हिन्दी का पहला उपन्यास मानते हैं। बाबू देवकीनंदन खत्री का चंद्रकांता तथा चंद्रकांता संतति आदि इस युग के प्रमुख उपन्यास हैं। ये उपन्यास इतने लोकप्रिय हुए कि इनको पढ़ने के लिये बहुत से अहिंदी भाषियों ने हिंदी सीखी। इस युग की कहानियों में ‘शिवप्रसाद सितारे हिन्द’ की राजा भोज का सपना महत्त्वपूर्ण है।

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द्विवेदी युग

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर ही इस युग का नाम ‘द्विवेदी युग’ रखा गया। सन १९०३ ईस्वी में द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के संपादन का भार संभाला। उन्होंने खड़ी बोली गद्य के स्वरूप को स्थिर किया और पत्रिका के माध्यम से रचनाकारों के एक बड़े समुदाय को खड़ी बोली में लिखने को प्रेरित किया। इस काल में निबंध, उपन्यास, कहानी, नाटक एवं समालोचना का अच्छा विकास हुआ। इस युग के निबंधकारों में पं महावीर प्रसाद द्विवेदी, माधव प्रसाद मिश्र, श्याम सुंदर दास, चंद्रधर शर्मा गुलेरी , बाल मुकंद गुप्त और अध्यापक पूर्ण सिंह आदि उल्लेखनीय हैं। इनके निबंध गंभीर, ललित एवं विचारात्मक हैं, किशोरीलाल गोस्वामी और बाबू गोपाल राम गहमरी के उपन्यासों में मनोरंजन और घटनाओं की रोचकता है। हिंदी कहानी का वास्तविक विकास ‘द्विवेदी युग’ से ही शुरू हुआ। किशोरी लाल गोस्वामी की इंदुमती कहानी को कुछ विद्वान हिंदी की पहली कहानी मानते हैं। अन्य कहानियों में बंग महिला की दुलाई वाली, शुक्ल जी की ग्यारह वर्ष का समय, प्रसाद जी की ग्राम और चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था महत्त्वपूर्ण हैं। समालोचना के क्षेत्र में पद्मसिंह शर्मा उल्लेखनीय हैं। “हरिऔध”, शिवनंदन सहाय तथा राय देवीप्रसाद पूर्ण द्वारा कुछ नाटक लिखे गए।

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रामचंद्र शुक्ल एवं प्रेमचंद युग

गद्य के विकास में इस युग का विशेष महत्त्व है। पं रामचंद्र शुक्ल (१८८४-१९४१) ने निबंध, हिन्दी साहित्य के इतिहास और समालोचना के क्षेत्र में गंभीर लेखन किया। उन्होंने मनोविकारों पर हिंदी में पहली बार निबंध लेखन किया। साहित्य समीक्षा से संबंधित निबंधों की भी रचना की। उनके निबंधों में भाव और विचार अर्थात् बुद्धि और हृदय दोनों का समन्वय है। हिंदी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखा गया उनका इतिहास आज भी अपनी सार्थकता बनाए हुए है। जायसी, तुलसीदास और सूरदास पर लिखी गयी उनकी आलोचनाओं ने भावी आलोचकों का मार्गदर्शन किया।

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इस काल के अन्य निबंधकारों में जैनेन्द्र कुमार जैन, सियारामशरण गुप्त, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और जयशंकर प्रसाद आदि उल्लेखनीय हैं। कथा साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद ने क्रांति ही कर डाली। अब कथा साहित्य केवल मनोरंजन, कौतूहल और नीति का विषय ही नहीं रहा बल्कि सीधे जीवन की समस्याओं से जुड़ गया। उन्होंने सेवा सदन, रंगभूमि, निर्मला, गबन एवं गोदान आदि उपन्यासों की रचना की। उनकी तीन सौ से अधिक कहानियां मानसरोवर के आठ भागों में तथा गुप्तधन के दो भागों में संग्रहित हैं। पूस की रात, कफ़न , शतरंज के खिलाड़ी, पंच परमेश्वर, नमक का दरोगा तथा ईदगाह आदि उनकी कहानियां खूब लोकप्रिय हुयीं। इसकाल के अन्य कथाकारों में विश्वंभर शर्मा ‘कौशिक”, वृंदावनलाल वर्मा, राहुल सांकृत्यायन , पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, उपेन्द्रनाथ अश्क, जयशंकर प्रसाद , भगवतीचरण वर्मा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। नाटक के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का विशेष स्थान है। इनके चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी जैसे ऐतिहासिक नाटकों में इतिहास और कल्पना तथा भारतीय और पाश्चात्य नाट्य पद्यतियों का समन्वय हुआ है।
लक्ष्मीनारायण मिश्र, हरिकृष्ण प्रेमी, जगदीशचंद्र माथुर आदि इस काल के उल्लेखनीय नाटककार हैं।

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अद्यतन काल

इस काल में गद्य का चहुंमुखी विकास हुआ। पं हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल , नंददुलारे वाजपेयी, नगेंद्र, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा डा रामविलास शर्मा आदि ने विचारात्मक निबंधों की रचना की है। हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, विवेकी राय, और कुबेरनाथ राय ने ललित निबंधों की रचना की है। हरिशंकर परसांई , शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रवींन्द्रनाथ त्यागी, तथा के पी सक्सेना, के व्यंग्य आज के जीवन की विद्रूपताओं के उद्घाटन में सफल हुए हैं। जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल, इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर, रांगेय राघव और भगवती चरण वर्मा ने उल्लेखनीय उपन्यासों की रचना की। नागार्जुन, फणीश्वर नाथ रेणु, अमृतराय, तथा राही मासूम रज़ा ने लोकप्रिय आंचलिक उपन्यास लिखे हैं। मोहन राकेश , राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी , कमलेश्वर, भीष्म साहनी , भैरव प्रसाद गुप्त, आदि ने आधुनिक भाव बोध वाले अनेक उपन्यासों और कहानियों की रचना की है। अमरकांत, निर्मल वर्मा तथा ज्ञानरंजन आदि भी नए कथा साहित्य के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। प्रसादोत्तर नाटकों के क्षेत्र में लक्ष्मीनारायण लाल, लक्ष्मीकांत वर्मा, तथा मोहन राकेश के नाम उल्लेखनीय हैं। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा बनारसीदास चतुर्वेदी आदि ने संस्मरण रेखाचित्र व जीवनी आदि की रचना की है। शुक्ल जी के बाद पं हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, नंद दुलारे वाजपेयी, नगेन्द्र, रामविलास शर्मा तथा नामवर सिंह ने हिंदी समालोचना को समृद्ध किया। आज गद्य की अनेक नयी विधाओं जैसे यात्रा वृत्तांत, रिपोर्ताज, रेडियो रूपक, आलेख आदि में विपुल साहित्य की रचना हो रही है और गद्य की विधाएं एक दूसरे से मिल रही हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य में पद्य का विकास आधुनिक काल की कविता के विकास को निम्नलिखित धाराओं में बांट सकते हैं।

१.
नवजागरण काल (भारतेंदु युग)
१८५० ईस्वी से १९०० ईस्वी तक

२.
सुधार काल (द्विवेदी युग)
१९०० ईस्वी से १९२० ईस्वी तक

३.
छायावाद
१९२० ईस्वी से १९३६ ईस्वी तक

४.
प्रगतिवाद प्रयोगवाद
१९३६ ईस्वी से १९५३ ईस्वी तक

५.
नई कविता व समकालीन कविता
१९५३ ईस्वी से आजतक

नवजागरण काल (भारतेंदु युग)

इस काल की कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पहली बार जन-जीवन की समस्याओं से सीधे जुड़ती है। इसमें भक्ति और श्रंगार के साथ साथ समाज सुधार की भावना भी अभिव्यक्त हुई। पारंपरिक विषयों की कविता का माध्यम ब्रजभाषा ही रही लेकिन जहां ये कविताएं नव जागरण के स्वर की अभिव्यक्ति करती हैं, वहां इनकी भाषा हिन्दी हो जाती है। कवियों में भारतेंदु हरिश्चंद्र का व्यक्तित्व प्रधान रहा। उन्हें नवजागरण का अग्रदूत कहा जाता है। प्रताप नारायण मिश्र ने हिंदी हिंदू हिंदुस्तान की वकालत की। अन्य कवियों में उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘पेमघन’ के नाम उल्लेखनीय हैं।

सुधार काल (द्विवेदी युग)

हिंदी कविता को नया रंगरूप देने में श्रीघर पाठक का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्हें प्रथम स्वच्छंदतावादी कवि कहा जाता है। उनकी एकांत योगी और कश्मीर सुषमा खड़ी बोली की सुप्रसिद्ध रचनाएं हैं। रामनरेश द्विवेदी ने अपने पथिक मिलन और स्वप्न महाकाव्यों में इस धारा का विकास किया। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ के प्रिय प्रवास को खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना गया है। महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी बोली में अनेक काव्यों की रचना की। इन काव्यों में भारत भारती, साकेत, जयद्रथ वध पंचवटी और जयभारत आदि उल्लेखनीय हैं। उनकी ‘भारत भारती’ में स्वाधीनता आंदोलन की ललकार है। राष्ट्रीय प्रेम उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर है। इस काल के अन्य कवियों में सियाराम शरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान , नाथूराम शंकर शर्मा तथा गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

छायावाद

कविता की दृष्टि से यह मह इस काल में एक दूसरी धारा भी थी जो सीधे सीधे स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी थी। इसमें माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, नरेन्द्र शर्मा , रामधारी सिंह दिनकर , श्रीकृष्ण सरल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इस युग की प्रमुख कृतियों में जय शंकर प्रसाद की कामायनी और आंसू, सुमित्रानंदन पंत का पल्लव, गुंजन और वीणा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की गीतिका और अनामिका, तथा महादेवी वर्मा की यामा, दीपशिखा और सांध्यगीत आदि कृतियां महत्वपूर्ण हैं। कामयनी को आधुनिक काल का
सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य कहा जाता है। छायावादोत्तर काल में हरिवंशराय बच्चन का नाम उल्लेखनीय है। छायावादी काव्य में आत्मपरकता, प्रकृति के अनेक रूपों का सजीव चित्रण, विश्व मानवता के प्रति प्रेम आदि की अभिव्यक्ति हुई है। इसी काल में मानव मन सूक्ष्म भावों को प्रकट करने की क्षमता हिंदी भाषा में विकसित हुई|

प्रगतिवाद

सन १९३६ को आसपास से कविता के क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन दिखाई पड़ा प्रगतिवाद ने कविता को जीवन के यथार्थ से जोड़ा। प्रगतिवादी कवि कार्ल मार्क्स की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हैं। युग की मांग के अनुरूप छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी बाद की रचनाओं में प्रगतिवाद का साथ दिया। नरेंद्र शर्मा और दिनकर ने भी अनेक प्रगतिवादी रचनाएं कीं। प्रगतिवाद के प्रति समर्पित कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन शास्त्री और मुक्तिबोध के नाम उल्लेखनीय हैं। इस धारा में समाज के शोषित वर्ग -मज़दूर और किसानों-के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गयी, धार्मिक रूढ़ियों और सामाजिक विषमता पर चोट की गयी और हिंदी कविता एक बार फिर खेतों और खलिहानों से जुड़ी।

प्रयोगवाद

प्रगतिवाद के समानांतर प्रयोगवाद की धारा भी प्रवाहित हुई। अज्ञेय को इस धारा का प्रवर्तक स्वीकर किया गया। सन १९४३ में अज्ञेय ने तार
सप्तक का प्रकाशन किया। इसके सात कवियों में प्रगतिवादी कवि अधिक थे। रामविलास शर्मा, प्रभाकर माचवे, नेमिचंद जैन, गजानन माधव मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर और भारतभूषण अग्रवाल ये सभी कवि प्रगतिवादी हैं। इन कवियों ने कथ्य और अभिव्यक्ति की दृष्टि से अनेक नए नए प्रयोग किये। अत: तारसप्तक को प्रयोगवाद का आधार ग्रंथ माना गया। अज्ञेय द्वारा संपादित प्रतीक में इन कवियों की अनेक रचनाएं प्रकाशित हुयीं। नई कविता और समकालीन कविता सन १९५३ ईस्वी में इलाहाबाद से “नई कविता” पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इस पत्रिका में नई कविता को प्रयोगवाद से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित किया गया। दूसरा सप्तक(१९५१), तीसरा सप्तक(१९५९) तथा चौथे सप्तक के कवियों को भी नए कवि कहा गया। वस्तुत: नई कविता को प्रयोगवाद का ही भिन्न रूप माना जाता है। इसमें भी दो धराएं परिलक्षित होती हैं।
वैयक्तिकता को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करने वाली धारा जिसमें अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त प्रमुख हैं तथा प्रगतिशील धारा जिसमें गजानन माधव मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन शास्त्री , रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह तथा सुदामा पांडेय धूमिल आदि उल्लेखनीय हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना में इन दोनों धराओं का मेल दिखाई पड़ता है। इन दोनो ही धाराओं में अनुभव की प्रामाणिकता, लघुमानव की प्रतिष्ठा तथा बौधिकता का आग्रह आदि प्रमुख प्रवृत्तियां हैं। साधारण बोलचाल की शब्दावली में असाधारण अर्थ भर देना इनकी भाषा की विशेषता है। समकालीन कविता मे गीत नवगीत और गज़ल की ओर रूझान बढ़ा है। आज हिंदी की निरंतर गतिशील और व्यापक होती हुई काव्यधारा में संपूर्ण भारत के सभी प्रदेशों के साथ ही साथ संपूर्ण विश्व में लोकिप्रिय हो रही है। इसमें आज देश विदेश में रहने वाले अनेक नागरिकताओं के असंख्य विद्वानों और प्रवासी भारतीयों का योगदान निरंतर जारी है।

(अभिव्यक्ति-अनुभूति से साभार)

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पूर्णिमा वर्मन का नाम वेब पर हिंदी की स्थापना करने वालों में अग्रगण्य है। १९९६ से निरंतर वेब पर सक्रिय, उनकी जाल पत्रिकाएँ अभिव्यक्ति तथा अनुभूति वर्ष २००० से अंतर्जाल पर नियमित प्रकाशित होने वाली पहली हिंदी पत्रिकाएँ हैं। इनके द्वारा उन्होंने प्रवासी तथा विदेशी हिंदी लेखकों को एक साझा मंच प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है। लेखन एवं वेब प्रकाशन के अतिरिक्त वे जलरंग, रंगमंच, संगीत तथा हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय विकास के अनेक कार्यों से जुड़ी हैं।

ईसुरी की अलौकिक फाग नायिका रजऊ और बुन्देली परम्पराएँ – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

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बुन्देली माटी के यशस्वी कवि ईसुरी की फागें कालजयी हैं. आज भी ग्राम्यांचलों से लेकर शहरों तक, चौपालों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस फागों को केंद्र में रखकर गायन, संगोष्ठियों आदि के आयोजन किये जाते हैं. ईसुरी की फागों में समाज के अन्तरंग और बहिरंग दोनों का जीवंत चित्रण प्राप्य है. मानव जीवन का केंद्र नारी  होती है. माँ, बहिन, दादी-नानी, सखी, भाभी, प्रेयसी, पत्नी, साली, सास अथवा इनसे सादृश्य रखनेवाले रूपों में नारी जीवन रथ के सञ्चालन में प्रेरक होती है. संभवतः इसीलिए वह नौ दुर्गा कहलाती है. ईसुरी की फागों में नारी का चित्रण उसे केंद्र में रखकर किया गया है.

नारी चित्रण की सहजता, स्वाभाविकता, जीवन्तता, मुखरता तथा सात्विकता के पञ्चतत्वों से ईसुरी ने अपनी फागों का श्रृंगार किया है. ईसुरी ने अपनी प्रेरणास्रोत ‘रजऊ’ को केंद्र में रखकर नारी-छवियों के मनोहर शब्द-चित्र अंकित किये हैं. रसराज श्रृंगार ईसुरी को परम प्रिय हैं. श्रृंगार के संयोग-वियोग ही नहीं ममत्व और सखत्व भाव से भी ईसुरी ने फागों को लालित्य और चारुत्व प्रदान किया है. अपनी व्याकुलता का वर्णन हो या रजऊ की कमनीय काया का रसात्मक चित्रण ईसुरी रसमग्न होने पर भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते, अश्लील नहीं होते. रजऊ काल्पनिक चरित्र है या वास्तविक इस पर मतभेद हो सकते हैं किन्तु उसका चित्रण इतना जीवंत है की उसे वास्तविक मानने की प्रेरणा देता है. सम्भवत: ईसुरी अपनी पत्नि ‘राजाबेटी’ को ही रचनाओं में ‘रजऊ’ के रूप में चित्रित करते रहे.  चलचित्र नवरंग के नायक-नायिका का चरित्र ईसुरी से प्रेरित होकर लिखा गया हो सकता है. जो भी हो रजऊ नारी की मनोरम छवियों के शब्दांकन का माध्यम तो है ही.

यह प्रश्न ईसुरी के जन्मकाल में भी सिर उठाने लगा होगा कि रजऊ कौन है? यदि उनकी पत्नि है तो ईसुरी को उसके रूप-सौन्दर्य की सार्वजनिक चर्चा रुचिकर न लगना स्वाभाविक है. यदि उनकी प्रेमिका थी, तो प्रेम की पवित्रता तथा प्रेमिका के पारिवारिक जीवन की शांति के लिये वे उसे प्रगट नहीं कर सकते होंगे. यदि कोई एक या अनेक नारियों से प्रेरणा लेकर रजऊ का चित्रण किया गया हो तो कौन कहाँ है कहना न ईसुरी के लिये वर्षों बाद संभव रहा होगा, न अन्यों के लिये पश्चातवर्ती काल में खोज पाना संभव होगा. अंतिम संभावना यह कि रजऊ काल्पनिक अथवा प्रकृति से प्रेरित होकर गढ़ा चरित्र हो, यह सत्य हो तो भी अन्य जन अलौकिकता की अनुभूति न कर पाने के कारण लौकिक मांसल देह की कल्पना करें यह स्वाभाविक है. स्वयं ईसुरी ने देहज मानी जा रही रजऊ को अदेहज कहकर इस विवाद के पटाक्षेप का प्रयास किया:

नइयाँ रजऊ काऊ के घर में बिरथा कोई न भरमें

सबमें है, सब सें है न्यारी सब ठौरन में भरमें

कौ कय अलख-खलक की बातें लखी न जाय नजर में

ईसुर गिरधर रँय राधे में राधे रँय गिरधर में

उल्लेख्य यह है कि यह रजऊ सब में होकर भी किसी में नहीं है तो यह आत्मा के सिवा और क्या हो सकती है? ईसुरी अलख-खलक अर्थात परमसत्ता और उसकी रचना का संकेत देकर बताते हैं कि रजऊ ईश्वरीय है सांसारिक नहीं. राधा-कृष्ण के उदाहरण के सन्दर्भ में यह तथ्य है कि गोकुलवासी कृष्ण के जीवन में राधा नाम का कोई  चरित्र कभी नहीं आया. कृष्ण पर रचित सबसे पुरानी और प्रथम कृति हरिवंश पुराण में ऐसा कोई चरित्र नहीं है. राधा का चरित्र चैतन्य महाप्रभु की भावधारा के साथ-साथ कृष्ण की पराशक्ति के रूप में विकसित हुआ जबकि विष्णु के अवतार मान्य कृष्ण के साथ लक्ष्मी रूप में रुक्मणि उनकी अर्धांगिनी हैं. इस प्रसंग से ईसुरी यह संकेतित करते हैं कि जिस तरह कृष्ण के साथ संयुक्त की गयी राधा काल्पनिक हैं वैसे ही रजऊ भी काल्पनिक है.

रजऊ का रूप-लावण्य अलौकिक है. उसका अंग-अंग जैसा है वैसा त्रिभुवन में खोजने पर भी किसी अन्य का नहीं मिला. यह अनन्यता उसके काल्पनिक होने पर ही आ सकती है:

नग-नग बने रजऊ के नोने ऐसे की के होने

गाल नाक उर भौंह, चिबुक लग अँखियाँ करतीं टोने

ग्रीवा जुबन पेट कर जाँगें सब हुई भौत सलौने

ईसुरी दूजी रची न विधना छानौ त्रिभुवन कौने

ईसुरी रजऊ के प्रति इतने समर्पित हैं कि उसके घर की देहरी होना चाहते हैं ताकि उसके आते-जाते समय चरण-धूल का स्पर्श पा सकें. ऐसा अनन्य समर्पण भाव ईश्वरीय तत्व के प्रति ही होता है. यहाँ भी ईसुरी रजऊ का काल्पनिक और दैवीय होना इंगित करते हैं:

विधना करी देह ना मेरी रजऊ के घर की देरी

आउत-जात चरण की धूरा लगत जात हर बेरी

ईसुरी संसार के परम सत्य, तन की नश्वरता से सुपरिचित हैं. वे इस संसार में आकर बुरा काम करने से डरते हैं तो किसी अन्य की पत्नि से प्रेम कैसे कर सकते है? अपनी पत्नि की दैहिक सुन्दरता का सार्वजनिक बखान भी नैतिक नहीं माना जा सकता. स्पष्ट है कि उनमें कबीराना वैराग के प्रति लगाव है, वे देह-गेह-नेह की क्षणभंगुरता से सुपरिचित हैं तथा तुलसी की  रत्नावली के प्रति दैहिक आसक्ति की तरह रजऊ में आसक्त नहीं हैं. उनकी रजऊ परमसत्ता से साक्षात् का माध्यम है, काल्पनिक है:

तन कौ कौन भरोसो करनें आखिर इक दिन मरनें

जौ संसार ओस कौ बूँदा पवन लगें सें ढुरनें

जौ लौ जी की जियन जोरिया की खाँ जे दिन मरनें

ईसुर ई संसार में आकें बुरे काम खाँ डरनें

कहते हैं ‘भगत के बस में हैं भगवान’. भक्त जितना भगवान् चाहता है उतना ही भगवान् भी उसे चाहते हैं. ‘राम ते अधिक राम कर दासा’, इस कसौटी पर भी रजऊ अलौकिक है. वह भी ईसुरी को उतना ही चाहती है जितना ईसुरी उसे चाहते हैं. वह कामना करती है कि ईसुरी उँगली का छल्ला हो जाएँ तो वह मुँह पोछते समय गालों पर उनका  स्पर्श पा सके, बार-बार घूँघट खोलते समय आँखों के सामने रहेंगे, उसे ईसुरी के दर्शन पाने के लिये ललचाना नहीं पड़ता:

जो तुम छैल छला हो जाते परे उँगरियन राते

मो पोछ्त गालन खाँ लगते कजरा देत दिखाते

घरी-घरी घूँघट खोलत में नजर के सामें राते

ईसुर दूर दरस के लानें ऐसे कायँ ललाते

ईसुरी ने रजऊ के माध्यम से बुंदेलखंड की गरिमामयी नारी जीवन के विविध चरणों का चित्रण किया है. किशोरी रजऊ चंचलतावश आते-जाते समय घूँघट उठा-उठाकर कनखियों से ईसुरी को देखते हुए भी अनदेखा करना प्रदर्शित करते हुए उन्हें अपनी रूप राशि के दर्शन सुअवसर देती है:

चलती कर खोल खें मुइयाँ रजऊ वयस लरकइयाँ

हेरत जात उँगरियन में हो तकती हैं परछइयाँ

लचकें तीन परें करया में फरकें डेरी बइयाँ

बातन मुख झर परत फूल से जो बागन में नइयाँ

धन्य भाग वे सैयाँ ईसुर जिनकी आयँ मुनइयाँ

कैशोर्य में आभूषणों के प्रति आकर्षण और आभूषण मिलने पर सज्जित होकर गर्वसहित प्रदर्शन करना किस युवती  को प्रिय नहीं होता? रजऊ बैगनी धोती, करधनी, पैंजना आदि से सज्जित हो अपनी गजगामिनी देह का प्रदर्शन करते हुई नित्य ही ईसुरी के दरवाजे के सामने से निकलती है:

दोरें कड़तीं रोज रजउआ हाँती कैसो छौआ

छीताफली पैजना पैरें होत जात अर्रौंआ

ककरिजिया धोती पै लटकै करदौनी की टौआ

ईसुर गैल गली उड़ जातीं जैसें कारो कौआ

लावण्यमयी रजऊ को कुदृष्टि से बचाने के लिये एक नहीं दस-दस बार राई-नोन से नज़र उतारना भी पर्याप्त नहीं है, ईसुर मंत्र पढ़वा कर लट बँधवाने, गले में यंत्र डालने के बाद भी संतुष्ट नहीं हो पाते और खुद राई-नोन उतारते हैं:

नौने नई नजर के मारें राती रजऊ हमारे

रोजई रोज झरैया गुनियाँ दस-दस बेराँ झारें

मन्त्र पढ़ा कें लट बँदवाई जन्तर गरे में डारें

ईसुर रोजऊँ रजऊ के ऊपर राई नौंन उतारें

समय के साथ रजऊ के मन में अपने स्वामी के घर जाने का भाव उदित हो तो क्या आश्चर्य? अलौकिक रजऊ आत्मा से मिलन की और लौकिक रजऊ प्रियतम से मिलन की राह देखे, यही जीवन का विकास क्रम है:

वे दिन गौने के कब आबैं जब हम ससुरे जाबैं

बारे बलम लिबौआ होकें डोला सँग सजाबैं

गा हा गुइयाँ गाँठ जोर कें दौरें नौ पौंचाबें

हांते लगा सास-ननदी के चरनन सीस नबाबैं

ईसुर कबै फलाने जू की दुलहिन् टेर कहाबैं

इस फाग में डोला सजना, गाँठ जोड़ना, द्वार पर हाथे लगाना और वधु को उसके नाम से न पुकार कर अमुक की दुलहिन कहकर पुकारना जैसी बुन्देली लोक परम्पराओं का सरस संकेतन अद्भुत मिठास लिये है. यहाँ ‘घर सें निकसी रघुबीर बधू’ कहते तुलसी की याद आती है.

परमात्मा एक है किन्तु आत्माएँ अनेक हैं. पारस्परिक द्वेष पाल कर उसे नहीं पाया जा सकता किन्तु ऐक्य भाव से उसे पाना सहज है. लौकिक जगत में सौतिया डाह से नर्क बनते घर सत्य सर्वज्ञात है. ईसुरी इस त्रासदी का जीवंत वर्णन करते हैं:

सो घर सौत सौत कें मारें सौंज बने ना न्यारें

नारी गुपता भीतर करतीं लगो तमासो द्वारे

अपनी-अपनी कोदें झीकें खसमें फारें डारें

एक म्यान में कैसें पटतीं ईसुर दो तरवारें

बुन्देलखंड में गुदना गुदाने का रिवाज़ चिरकाल से प्रचलित रहा है. अधुनातन युवा पीढ़ी ‘टैबू’ के नाम से इसे अपना रही है. ईसुरी की रजऊ अललौकिक है, वह सांसारिक नश्वरता से जुड़े चिन्हों का गुदना गुदवाना नहीं चाहती. अंततः वह गोदनारी से अपने अंग-अंग में कृष्ण जी के विविध नाम गोद दिये जाने का अनुरोध करती है:

गोदौ गुदनन की गुदनारी सबरी देह हमारी

गालन पै गोविन्द गोद दो कर में कुंजबिहारी

बइयन भौत भरी बनमाली गरे धरौ गिरधारी

आनंदकंद लेव अँगिया में माँग में लिखौ मुरारी

करया कोद करइयाँ ईसुर गोद मुखन मनहारी

अंगों के नाम के साथ कृष्ण के ऐसे नामों का चयन जिनका प्रथमाक्षर समान हो आनुप्रसिक सौन्दर्य तथा लालित्य संवर्धक है. अलौकिक हो या लौकिक रजऊ को मान-मर्यादा का पालन कर अपने लक्ष्य ताक पहुँचाने की सीख देना स्वजनों और वरिष्ठों का कर्त्तव्य है:

बाहर रेजा पैर कड़ें गये, नीचो मूड़ करें गये

जी सें नाव धरैं ना केऊ ऐसी चाल चलें गये

हवा चहै उड़ जैहे झूना घूँघट हाँत धरैं गये

ईसुर इन गलियन में बिन्नू धीरें पाँव धरैं गये

अपने प्रियतम को टेरती अलौकिक रजऊ को संसार में सर्वत्र चोर-लुटेरे दिखाई देते हैं. उसे प्रियतम को पाये बिना सागर में आगे यात्रा करने का चाव नहीं, वह कहती है कि मुर्गे के जागने पर जगाते रह जाओगे अर्थात उसके पहले ही रजऊ प्रभु प्राप्ति की राह पर जा चुकी होगी:

अब ना जाव मुसाफिर आगे जात बिदा दिन माँगें

मिलने नहीं गाँव कोसन लौं परती इकदम डांगें

है अँधियारी रात गैल में चोर-चबाई लाँगें

परों सुनत दो जने लूट लये मार मार के साँगें

ईसुर कात रओ उठ जइयो अरुनसिखा जब जागें

बुन्देलखण्ड के जन जीवन के सटीक चित्रण के साथ-साथ लोक रंग और लोक परंपराओं का सरस वर्णन, सांसारिकता और आध्यात्मिकता का सम्यक सम्मिश्रण, श्रृंगार के विविध पक्षों का अंकन, छंद विधान के प्रति सजगता, चारुत्व तथा लालित्यमय भाषा, सहज बोधगम्य भाषा ईसुरी की फागों का वैशिष्ट्य है. लोक के अंकन के साथ लोक के मंगल से अनुप्राणित ये फागें बुंदेलखंड के गाँवों-शहरों में निरंतर गायी जाती हैं. ईसुरी की फागें बुन्देली ही नहीं हिंदी साहित्य की भी अनमोल विरासत है जिसे आधुनिक भाषा, शब्दावली, सन्दर्भों और बिम्ब-प्रतीकों को समाहित करते हुई लिखा जाना चाहिए.

Sanjiv verma ‘Salil’, 94251 83244

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नेपियर टाउन जबलपुर 

४८२००१ ​

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हिंदी उपन्यास का प्रारम्भ

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हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के “परीक्षागुरु ‘ (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का “पूर्णप्रकाश’ और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए। हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात प्रेमचंद (१८८०-१९३६) से हुआ। प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। आपके “सेवासदन’, “रंगभूमि’, “कायाकल्प’, “गबन’, “निर्मला’, “गोदान’, आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के “हृदयपरिवर्तन’ के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनकी रुझान समाजवाद की ओर भी हुई, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। जयशंकर प्रसाद के “कंकाल’ और “तितली’ उपन्यासों में भिन्न प्रकार के समाजों का चित्रण है, परंतु शैली अधिक काव्यात्मक है। प्रेमचंद की ही शैली में, उनके अनुकरण से विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि अनेक लेखकों ने सामाजिक उपन्यास लिखे, जिनमें एक प्रकार का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद अधिक था। परंतु पांडेय बेचन शर्मा “उग्र’, ऋषभचरण जैन, चतुरसेन शास्त्री आदि ने फरांसीसी ढंग का यथार्थवाद और प्रकृतवाद(नैचुरॉलिज़्म) अपनाया और समाज की बुराइयों का दंभस्फोट किया। इस शेली के उपन्यासकारों में सबसे सफल रहे “चित्रलेखा’ के लेखक भगवतीचरण वर्मा, जिनके “टेढ़े मेढ़े रास्ते’ और “भूले बिसरे चित्र’ बहुत प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की “गिरती दीवारें’ का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रणवाली रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की “बूँद और समुद्र’ इसी यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर आंचलिकता मिलानेवाला एक श्रेष्ठ उपन्यास है। सियारामशरण गुप्त की नारी’ की अपनी अलग विशेषता है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास जैनेंद्रकुमार से शुरू हुए। “परख’, “सुनीता’, “कल्याणी’ आदि से भी अधिक आप के “त्यागपत्र’ ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैनेंद्र जी दार्शनिक शब्दावली में अधिक उलझ गए। मनोविश्लेषण में स. ही. वात्स्यायन “अज्ञेय’ ने अपने “शेखर : एक जीवनी’, “नदी के द्वीप’, “अपने अपने अजनबी’ में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता उपन्यासकला में दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। सामाजिक विकृतियों पर इलाचंद्र जोशी के “संन्यासी’, “प्रेत और छाया’, “जहाज का पंछी’ आदि में
अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का “सूरज का सातवाँ घोड़ा’ और नरेश मेहता का “वह पथबंधु था’ उत्तम उपलब्धियाँ हैं। ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का ” बाणभट्ट की आत्मकथा ‘ एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के
“महारानी लक्ष्मी बाई’, “मृगनयनी’ आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यमयता द्विवेदी जी जैसी नहीं है।
राहुल सांकृत्यायन (१८९५-१९६३), रांगेय राघव (१९२२-१९६३) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।
यथार्थवादी शैली सामाजिक यथार्थवाद की ओर मुड़ी और “दिव्या’ और “झूठा सच’ के लेखक भूतपूर्व क्रांतिकारी यशपाल और “बलचनमा’ के लेखक नागार्जुन इस धारा के उत्तम प्रतिनिधि हैं। कहीं कहीं इनकी रचनाओं
में प्रचार का आग्रह बढ़ गया है। हिंदी की नवीनतम विधा आंचलिक उपन्यासों की है, जो शुरु होती है फणीश्वरनाथ “रेणु’ के “मैला आँचल’ से और उसमें अब कई लेखक हाथ आजमा रहे हैं, जैसे राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, शैलेश मटियानी, राजेंद्र अवस्थी, मनहर चौहान, शिवानी इत्यादि।

हिंदी के प्रारंभिक उपन्यास

हिंदी के मौलिक कथासाहित्य का आरम्भ ईशा अल्लाह खाँ की “रानी केतकी की कहानी” से होता है। भारतीय वातावरण में निर्मित इस कथा में लौकिक परंपरा के स्पष्ट तत्व दिखाई देते हैं। खाँ साहब के पश्चात् पं. बालकृष्ण भट्ट ने “नूतन ब्रह्मचारी” और
“सौ अजान और एक सुजान” नामक उपन्यासों का निर्माण किया। इन उपन्यासों का विषय समाजसुधार है। भारतेंदु तथा उनके सहयोगियों ने राजनीतिज्ञ या समाजसुधारक के रूप में लिखा। बावू देवकीनंदन सर्वप्रथम ऐसे उपन्यासलेखक थे जिन्होंने विशुद्ध उपन्यासलेखक के रूप में लिखा। उन्होंने
कहानी कहने के लिए ही कहानी कही। वह
अपने युग के घात प्रतिघात से प्रभावित थे।
हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में खत्री जी ने जो परंपरा स्थापित की वह एकदम नई थी।
प्रेमचंद ने भारतेंदु द्वारा स्थापित परंपरा में
एक नई कड़ी जोड़ी। इसके विपरीत बाबू
देवकीनंदन खत्री ने एक नई परंपरा स्थापित
की। घटनाओं के आधार पर उन्होंने कहानियों की एक ऐसी शृंखला जोड़ी जो कहीं टूटती नजर नहीं आती। खत्री जी की कहानी कहने
की क्षमता को हम ईशांकृत “रानी केतकी की कहानी’ के साथ सरलतापूर्वक संबद्ध कर सकते हैं। वास्तव में कथासाहित्य के इतिहास में खत्री जी की “चंद्रकांता’ का प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटना है। यह हिंदी का प्रथम मौलिक उपन्यास है। खत्री जी के उपन्यास
साहित्य में भारतीय संस्कृति की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है। मर्यादा आपके उपन्यासों का प्राण है।
उपन्यास साहित्य की विकासयात्रा में पं. किशोरीलाल गोस्वामी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। यह उपन्यासों की दिशा में घर करके बैठ गए। आधुनिक जीवन की विषमताओं के चित्र आपके जासूसी उपन्यासों में पाए जाते हैं। गोस्वामी जी के उपन्यास साहित्य में वासना का झीना परदा प्राय: सभी कहीं पड़ा हुआ है।
जासूसी उपन्यासलेखकों में बाबू गोपालराम गहमरी का नाम महत्वपूर्ण है। गहमरी जी ने अपने उपन्यासों का निर्माण स्वयं अनुभव की हुई घटनाओं के आधार पर किया है, इसलिए कथावस्तु पर प्रामाणिकता की छाप है। कथावस्तु हत्या या लाश के पाए जाने के विषयों से संबंधित है। जनजीवन से संपर्क होने के कारण उपन्यासों की भाषा में ग्रामीण प्रयोग प्राय: मिलते हैं।
हिंदी के आरम्भिक उपन्यासलेखकों में बाबू
हरिकृष्ण जौहर का तिलस्मी तथा जासूसी उपन्यास लेखकों में महत्वपूर्ण स्थान है। तिलस्मी उपन्यासों की दिशा में जौहर ने बाबू देवकीनंदन खत्री द्वारा स्थापित उपन्यासपरंपरा को विकसित करने में महत्वपूर्ण योग दिया है। आधुनिक जीवन
की विषमाओं एवं सभ्य समाज के यथार्थ
जीवन का प्रदर्शन करने के लिए ही बाबू हरिकृष्ण जौहर ने जासूरी उपन्यासों का निर्माण किया है। “काला बाघ’ और “गवाह गायब’ आपके इस दिशा में महत्वपूर्ण उपन्यास हैं।।
हिंदी के आरम्भिक उपन्यासों का निर्माण लोकसाहित्य की आधारशिला पर हुआ। कौतूहल और जिज्ञासा के भाव ने इसे विकसित किया। आधुनिक जीवन की विषमताओं ने जासूसी उपन्यासों की कथा को जीवन के यथार्थ में प्रवेश कराया। असत्य पर सत्य की सदैव ही विजय होती है यह सिद्धांत
भारतीय संस्कृति का केंद्रबिंदु है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यासों में यह प्रवृत्ति मूल रूप से पाई जाती है।

सन्दर्भ – विकिपीडिया, हजारी प्रसाद द्विवेदी

आखिर क्या है समालोचना – अनामिका

आलोचना शब्द की उत्पत्ति ‘लुच’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है – देखना. साहित्य के सन्दर्भ मे समालोचना भी प्रयोग होता है, जिसका अर्थ है – ‘सम्यक प्रकार से देखना या परखना’.
ड्राईडन के अनुसार –
आलोचना वह कसौटी है जिसकी सहायता से किसी रचना का मूल्यांकन किया जाता है. वह उन विशेषताओं का लेखा प्रस्तुत करती है जो साधारणतः किसी पात्र को आनंद प्रदान कर सकें.
मैथ्थ्यु आररनल्ड के अनुसार –
“But the criticism, real criticism is essentially the exercise of this quality curiosity and disinterested love of a free play of mind”.

टी. एस . इलियट पाश्चात्य आलोचना के प्रमुख समीक्षक माने जाते हैं.नयी आलोचना पर इलियट का पर्याप्त प्रभाव पडा है. जब काव्य तथा समीक्षा दोनो माध्यमों से साहित्यकार अपने एक ही विशिष्ट दृष्टीकोण को अभिव्यक्त तथा पुष्ट करता है तो उसकी कवि तथा समालोचक दोनो रूपो में मान्यता मिलती है. कोई भी जागरूक साहित्यकार अपने युग की चेतना के निर्माण में यदि अपनी कविता द्वारा योग देता है तो उसका समीक्षात्मक साहित्य भी इसे अनिवार्य रूप से प्रभावित करता है.

इलियट आलोचना के संबंध मे महत्वपूर्ण बात
कहते हैं. वे कहते हैं कि आलोचना के क्षेत्र मे परंपरा का अनुगमन रुढ़िवाद नही है. प्राचीन परंपराएं मानव के भावी जीवन के विकास की आधारभूमि होती हैं और वर्तमान को भी प्रभावित करती हैं. इलियट कहते हैं की आलोचना के दो दृष्टिकोण हैं.

१. कवि के तत्कालिक समय की दृष्टि से कवि का मूल्यांकन करने के लिए.
२. वर्तमान समय मे उसकी उपादेयता के लिए
इलियट के अनुसार उत्कृष्ट आलोचना वह है जिसमे लोकदृष्टि हो तथा जो अध्येता को रसास्वादन की सूझ-बूझ और क्षमता प्रदान कर सके. कविता की भाषा के सन्दर्भ मे इलियट का कहना है की उसमे उच्चता का गुण अत्यंत आवश्यक है. कविता मे कल्पना का प्रयोग वांछित होता है, परंतु वह यथार्थ के धरातल से जुड़ी रहनी चाहिए.
इन विद्वानों के विचार पढ़ कर आलोचनाओ के विभिन्न कार्य सामने आते हैं.
१. रचना का भाव और कृतिकार के उद्देश्य को प्रकट करना.
२. रचना के गुण दोषों का उद्घाटन करना.
३. रचना की व्याख्या करना और अपने मन पर पड़ने वाली प्रतिक्रिया का प्रेषण करना.

समालोचक रचना की परख अलग अलग उद्देश्यों और दृष्टिकोण से करता है, उसकी आलोचना के मानदंड भी भिन्न-भिन्न होते हैं. इसी आधार पर समालोचना भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है…
जैसे ..
शास्त्रीय आलोचना – जब कोई आलोचक शास्त्रीय नियमों को आधार बनाकर काव्य का मूल्यांकन करता है तो इसे शास्त्रीय आलोचना कहते हैं. इसमें न तो व्याख्या की जाती है, न प्रभाव का अंकन होता है, न मूल्यांकन होता है और न निर्णय दिया जाता है. काव्यशास्त्र के सिद्धांतो को आधार बनाकर यह आलोचना की जाती है.

निर्णयात्मक आलोचना – निर्णयात्मक आलोचना में आलोचक एक न्यायाधीश की भांति कृति को अच्छा बुरा अथवा मध्यम बताता है. निर्णय के लिए वह कभी शास्त्रीय सिद्धांतो को आधार बनता है तो कभी व्यक्तिगत रूचि को. बाबु गुलाब रायbमानते हैं की यदि निर्णय के लिए शास्त्रीय सिद्धांतो को आधार बनाया जाये तो इसमें सुगमता रहती हैं. आलोचना का यह रूप प्रायः व्यक्तिगत वैमनस्य निकालने का साधन बनकर रह जाता है. जहाँ पाठक स्वयं पर निर्णय थोपा हुआ महसूस करता है, वहीँ लेखक स्वयं को उपेक्षित अनुभव करता है.

ऐतिहासिक आलोचना –  इस अल्लोचना पद्धति में किसी रचना का विश्लेषण तत्कालीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में किया जाता है. उदाहरण के लिए राम काव्य की रचना – वाल्मीकि, तुलसी, मैथिलीशरण गुप्त ने की, किन्तु उनकी कृतियों में उपलब्ध आधारभूत मौलिक अंतर तद्युगीन परिस्थितियों की उपज है.

प्रभाव वादी आलोचना –  इस आलोचना में कृतिकार की कृति को पढ़कर मन पर पड़े प्रभावों की समीक्षा की जाती है. किन्तु हर व्यक्ति की रूचि भिन्न भिन्न होती है अतः एक कृति को कोई अच्छा कह सकता है और कोई बुरा. इसलिए इस आलोचना में प्रमाणिकता का सर्वथा अभाव रहता है.

मार्क्सवादी आलोचना –  मार्क्सवाद सामाजिक जीवन को एक आवयविक पूर्ण रूप से देखता है. जिसमें अलग अलग अवयव एक दूसरे पर निर्भर करते हैं. वह मानता है की सामाजिक जीवन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका भौतिक आर्थिक संबंधो द्वारा श्रम के रूपों द्वारा अदा की जाती है. अतः लेखक का कर्तव्य है कि किसी युग के सामन्य विश्लेषण में वह उस युग के सम्पूर्ण सामाजिक विकास का पूरा चित्र प्रस्तुत करे. वह कहता है कि कला के अनन्य प्रकारों में साहित्य इसलिए भिन्न है कि साहित्य में रूप की तुलना में विषय का महत्त्व है.इसलिए वह सबसे पहले कृति को विषय का अपने विश्लेषण का विषय बनता है.और तब कृति की अभिव्यक्ति की शक्ति द्वारा सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का निर्धारण करता है. मार्क्सवादी आलोचक एक सीमा तक शिक्षक भी होता है. उसे सबसे पहले लेख के प्रति अपने रुख में शिक्षक होना चाहिए.

आलोचक लेखक से बहुत कुछ सीखता है. श्रेष्ठ आलोचक लेखक के प्रति प्रशंसा और जोश की दृष्टि रखता है. उसका कर्तव्य है की वह नए लेखकों को उनकी ग़लतियाँ बताये साथ ही सामाजिक जीवन को समझने में उसकी सहायता करे. आलोचक पाठक की भी सहायता करता है. वह उसे अच्छे साहित्य का आस्वादन करा कर उसकी रूचि का परिष्कार करता है. मार्क्सवाद का मानना है की आलोचक को स्वयं को एक शिशु के रूप में देखना चाहिए. उसे विनम्र, विराट, प्रतिभाशाली साहित्य का अवलोकन करना चाहिए.

प्रेमचंद की लेखन शैली

प्रेमचंद हिंदी के युग प्रवर्तक रचनाकार हैं।
उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है।वे सर्वप्रथम उपन्यासकार थे जिन्होंने उपन्यास साहित्य को तिलस्मी और ऐयारी से बाहर निकाल कर उसे वास्तविक भूमि पर ला खड़ा किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। प्रेमचंद की रचनाओं को देश में ही नहीं विदेशों में भी आदर प्राप्त हैं। प्रेमचंद और उनकी साहित्य
का अंतर्राष्ट्रीय महत्व है। आज उन पर और उनके साहित्य पर विश्व के उस विशाल जन समूह को गर्व है जो साम्राज्यवाद, पूँजीवाद और सामंतवाद के साथ संघर्ष में जुटा हुआ है।

वर्ण्य विषय

प्रेमचंद की रचनाओं में जीवन की विविध समस्याओं का चित्रण हुआ है। उन्होंने मिल मालिक और मजदूरों, ज़मीदारों और किसानों तथा नवीनता और प्राचीनता का संघर्ष दिखाया है। प्रेमचंद के युग-प्रवर्तक अवदान की चर्चा करते हुए डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं :

“प्रथमतः उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को ‘मनोरंजन’ के स्तर से उठाकर जीवन के साथ
सार्थक रूप से जोड़ने का काम किया। चारों और फैले हुए जीवन और अनेक सामयिक समस्याओं …ने उन्हें उपन्यास लेखन के लिए
प्रेरित किया।” [1]

प्रेमचंद ने अपने पात्रों का चुनाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से किया है, किंतु उनकी दृष्टि समाज से उपेक्षित वर्ग की ओर अधिक रहा है। प्रेमचंद जी ने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद को अपनाया है। उनके पात्र प्रायः वर्ग के प्रतिनिधि रूप में सामने आते हैं। घटनाओं ने विकास के साथ-साथ उनकी रचनाओं में पात्रों के चरित्र का भी विकास होता चलता है। उनके कथोपकथन मनोवैज्ञानिक होते हैं। प्रेमचंद जी एक सच्चे समाज सुधारक और क्रांतिकारी लेखक थे। उन्होंने अपनी कृतियों में स्थान-स्थान पर दहेज, बेमेल विवाह आदि का सबल विरोध किया है। नारी के प्रति उनके मन में स्वाभाविक श्रद्धा थी। समाज में उपेक्षिता, अपमानिता और पतिता स्त्रियों के प्रति उनका ह्रदय सहानुभूति से परिपूर्ण रहा है।

जीवन-दर्शन

मूर्धन्य आलोचक हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं,
“अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार- व्यवहार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता….समाज के विभिन्न आयामों को उनसे अधिक विश्वसनीयता से दिखा पाने वाले परिदर्शक
को हिन्दी-उर्दू की दुनिया नहीं जानती. परन्तु आप सर्वत्र ही एक बात लक्ष्य करेंगे. जो संस्कृतियों औए संपदाओं से लद नहीं गए हैं, अशिक्षित निर्धन हैं, जो गंवार और जाहिल हैं, वो उन लोगों से अधिक आत्मबल रखते हैं और न्याय के प्रति अधिक सम्मान दिखाते हैं, जो शिक्षित हैं, चतुर हैं, जो दुनियादार हैं जो शहरी हैं। यही प्रेमचंद का जीवन-दर्शन है। ” [2] प्रेमचंद ने अतीत का गौरव राग नहीं गाया, न ही भविष्य की हैरत-अंगेज़ कल्पना की. वे
ईमानदारी के साथ वर्तमान काल की अपनी वर्तमान अवस्था का विश्लेषण करते रहे. उन्होंने देखा की ये बंधन भीतर का है, बाहर
का नहीं. एक बार अगर ये किसान, ये गरीब, यह अनुभव कर सकें की संसार की कोइ भी शक्ति उन्हें नहीं दबा सकती तो ये निश्चय ही अजेय हो जायेंगे. सच्चा प्रेम सेवा ओर त्याग में ही अभिव्यक्ति पाता है। प्रेमचंद का पात्र जब प्रेम करने लगता है तो सेवा की ओर अग्रसर होता है और अपना सर्वस्व परित्याग कर देता है।[2]

भाषा

प्रेमचंद की भाषा सरल और सजीव और व्यावहारिक है। उसे साधारण पढ़े-लिखे लोग भी समझ लेते हैं। उसमें आवश्यकतानुसार अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी आदि के शब्दों का भी प्रयोग है। प्रेमचंद की भाषा भावों और विचारों के अनुकूल है। गंभीर भावों को व्यक्त करने में गंभीर भाषा और सरल भावों को व्यक्त करने में सरल भाषा को अपनाया गया है। इस कारण भाषा में स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आ गया है। प्रेमचंद जी की भाषा पात्रों के अनुकूल है। उनके हिंदू पात्र हिंदी और मुस्लिम पात्र उर्दू बोलते हैं। इसी प्रकार ग्रामीण पात्रों की भाषा ग्रामीण है। और शिक्षितों की भाषा शुद्ध और परिष्कृत भाषा है।
डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं : “उनके उपन्यासों की भाषा की खूबी यह है कि शब्दों के चुनाव एवं वाक्य-योजना की दृष्टि से उसे ‘सरल’ एवं ‘बोलचाल की भाषा’ कहा जाता है। पर भाषा की इस सरलता को निर्जीवता, एकरसता एवं
अकाव्यात्मकता का पर्याय नहीं समझा जाना चाहिए.
“भाषा के सटीक, सार्थक एवं व्यंजनापूर्ण प्रयोग में वे अपने समकालीन ही नहीं, बाद के
उपन्यासकारों को भी पीछे छोड़ जाते हैं। [3]

शिल्प

डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं :
” प्रेमचंद ने सहज सामान्य मानवीय व्यापारों को मनोवैज्ञानिक स्थितियों से जोड़कर उनमें एक सहज-तीव्र मानवीय रुचि पैदा कर
दी.”
शिल्प और भाषा की दृष्टि से भी प्रेमचंद ने हिन्दी उपन्यास को विशिष्ट स्तर प्रदान किया। …चित्रणीय विषय के अनुरूप शिल्प के अन्वेषण का प्रयोग हिन्दी उपन्यास में पहले प्रेमचंद ने ही किया। उनकी विशेषता यह है कि उनके द्वारा प्रस्तुत किये गए दृश्य अत्यंत सजीव गतिमान और नाटकीय हैं।” [4]

शैली

प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू दोनों की शैलियों को मिला दिया है। उनकी शैली में जो चुलबुलापन और निखार है वह उर्दू के कारण ही है। प्रेमचंद की शैली की दूसरी विशेषता सरलता और सजीवता है। प्रेमचंद का हिंदी और उर्दू दोनों पर अधिकार था, अतः वे भावों को व्यक्त करने के लिए बड़े सरल और सजीव शब्द ढूँढ़ लेते थे। उनकी शैली में अलंकारिकता का भी गुण विद्यमान है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों के द्वारा शैली में विशेष लालित्य आ गया है। इस प्रकार की अलंकारिक शैली का परिचय देते हुए वे लिखत हैं- ‘अरब की भारी तलवार ईसाई की हल्की कटार के सामने शिथिल हो गई। एक सर्प के भाँति फन से चोट करती थी, दुसरी नागिन की भाँति उड़ती थी। एक लहरों की भाँति लपकती थी दूसरी जल की मछलियों की भाँति चमकती थी।’
चित्रोपमता भी प्रेमचंद की शैली में खूब मिलती है। प्रेमचंद भाव घटना अथवा पात्र का ऐसे ढंग से वर्णन करते हैं कि सारा दृश्य आँखों के सम्मुख नाच उठता है उसका एक चित्र-सा खिंच जाता है। रंगभूमि उपन्यास के सूरदास की झोपड़ी का दृश्य बहुत सजीव है-
‘कैसा नैराश्यपूर्ण दृश्य था। न खाट न बिस्तर, न बर्तन न भांडे। एक कोने में एक मिट्टी का घड़ा जिसको आयु का अनुमान उस पर जमी हुई काई से हो सकता था। चूल्हे के पास हांडी थी। एक पुरानी चलनी की भाँति छिद्रों से भरा हुआ तवा और एक छोटी-सी कठौत और एक
लोटा। बस यही उस घर की संपत्ति थी।’
प्रेमचंद के पात्रों के उत्तर-प्रत्युत्तर उनकी शैली में अभिनयात्मकता का गुण भी समावेश कर देते हैं। उनकी शैली में हास्य-व्यंग्य का भी पुट रहता है, किंतु उनका व्यंग्य ऐसा नहीं होता जो किसा का दिल दुखाए। उसमें एक ऐसी मिठास रहती है जो मनोरंजन के साथ-साथ हमारी आँखें भी खोल देती हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है- ‘वह गाँव में पुण्यात्मा मशहूर थे। पूर्णमासी को नित्य सत्यनारायण की कथा सुनते पर पटवारी होने के नाते खेत बेगार में जुतवाते थे, सिंचाई बेगार में करवाते थे और आसामियों को एक दूसरे से लड़वा कर रकमें मारते थे। सारा गाँव उनसे काँपता था। परमार्थी थे। बुखार के दिनों में सरकारी कुनैन बाँट कर यश कमाते थे।’
मुहावरों और सूक्तियों का प्रयोग करने में प्रेमचंद जी बड़े कुशल थे। उन्होंने शहरी और ग्रामीण दोनों ही प्रकार के मुहावरों का खूब प्रयोग किया है। प्रेमचंद की सी मुहावरेदार शैली कदाचित ही किसी हिंदी लेखक की हो। क्षमा कहानी में प्रयुक्त एक सूक्ति देखें-‘जिसको तलवार का आश्रय लेना पड़े वह सत्य ही नहीं है।’ प्रेमचंद जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट रूप से अंकित है।
प्रेमचंद की सिद्धहस्त लेखनी के कुछ नमूने
‘गोदान’ का क्लाईमैक्स प्रेमचंद के सर्वप्रसिद्ध मार्मिक उपन्यास ‘गोदान’ का क्लाईमैक्स देखिये:
धनिया ने होरी की देह छुई तो कलेजा सन से
हो गया। मुख कांतिहीन हो गया था। कांपती हुई आवाज़ से बोली – कैसा जी है तुम्हारा? होरी ने अस्थिर आँखों से देखा और बोला — तुम आ गये गोबर? मैंने मंगल के लिये गाय ले ली है। वह खड़ा है, देखो। धनिया ने मौत की सूरत देखी थी। उसे पहचानती थी। उसे दबे पाँव आते भी देखा था, आँधी की तरह भी देखा था। उसके सामने सास मरी, ससुर मरा, अपने दो बालक मरे, गाँव के पचासों आदमी मरे। प्राण में एक धक्का-सा लगा। वह आधार जिस पर जीवन टिका हुआ था, जैसे खिसका जा रहा था; लेकिन नहीं यह धैर्य का समय है, उसकी शंका निर्मूल है, लू लग गयी है, उसी से अचेत हो गये हैं।
उमड़ते हुए आँसुओं को रोककर बोली — मेरी ओर देखो, मैं हूँ, धनिया; मुझे नहीं पहचानते?
होरी की चेतना लौती। मृत्यु समीप आ गयी थी; आग दहकनेवाली थी। धुँआँ शान्त हो गया था। धनिया को दीन आँखों से देखा, दोनों कोनों से आँसू की दो बूंदें ढुलक पडीं। क्षीण स्वर में बोला — मेरा कहा सुना माफ़ करना धनियाँ! अब जाता हूँ। गाय की लालसा मन में ही रह गयी। अब तो यहाँ के रुपए किरया-करम में जायँगे। रो मत धिनया, अब कब तक जिलायेगी? सब दुर्दशा तो हो गयी। अब मरने दे। और उसकी आँखें फिर बंद हो गयीं। उसी वक्त हीरा और शोभा डोली लेकर पहुँच गये।
होरी को उठाकर डोली में लिटाया और गाँव की ओर चले। गाँव में यह ख़बर हवा की तरह फैल गयी।
सारा गाँव जमा हो गया। होरी खाट पर पड़ा शायद सब कुछ देखता था, सब कुछ समझता था; पर ज़बान बंद हो गयी थी। हाँ, उसकी आँखों से बहते हुए आँसू बतला रहे थे कि मोह का बंधन तोड़ना कितना कठिन हो रहा है। जो कुछ अपने से नहीं बन पड़ा, उसी के दु:ख का नाम तो मोह है। पाले हुए कर्तव्य और निपटाये हुए कामों का क्या मोह! मोह तो उन अनाथों को छोड़ जाने में है, जिनके साथ हम अपना कर्तव्य न निभा सके; उन अधूरे मंसूबों में है, जिन्हें हम न पूरा कर सके।
मगर सब कुछ समझकर भी धनिया आशा की मिटती हुई छाया को पकड़े हुए थी। आँखों से आँसू गिर रहे थे, मगर यंत्र की भाँति दौड़-दौड़कर कभी आम भून कर पना बनाती, कभी होरी की देह में गेहूँ की भूसी की मालिश करती। क्या करे, पैसे नहीं हैं, नहीं किसी को भेजकर डाक्टर बुलाती। हीरा ने रोते हुए
कहा — भाभी, दिल कड़ा करो, गो-दान करा दो, दादा चले।
धनिया ने उसकी ओर तिरस्कार की आँखों से देखा। अब वह दिल को और कितना कठोर करे? अपने पति के प्रति उसका जो धर्म है, क्या वह उसको बताना पड़ेगा? जो जीवन का संगी था उसके नाम को रोना ही क्या उसका धर्म है? और कई आवाजें आयीं — हाँ गो-दान करा दो, अब यही समय है। धनिया यंत्र की भांति उठी, आज जो सुतली बेची थी उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली — महराज, घर में न गाय है, न बिछया, न पैसा।
यही पैसे हैं, यही इनका गो-दान है। और पछाड़ खाकर गिर पडी।

संदर्भ
1. ↑ अध्याय १६, पृ. ५७४, हिन्दी साहित्य
का इतिहास, डॉ॰ नगेन्द्र,
३३वां संस्करण-२००७, मयूर पेपरबैक्स, नौएडा
2. ↑ अ आ हिन्दी साहित्य : उद्भव और
विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल
प्रकाशन, नई दिल्ली. छ्ठा संस्करण,
छठी आवृत्ति, पृ २२८-२३०।
3. ↑ अध्याय १६, पृ. ५७७-५७८, हिन्दी साहित्य
का इतिहास, डॉ॰ नगेन्द्र,
३३वां संस्करण-२००७, मयूर पेपरबैक्स, नौएडा
4. ↑ अध्याय १६, पृ. ५७७-५७८, हिन्दी साहित्य
का इतिहास, डॉ॰ नगेन्द्र,
३३वां संस्करण-२००७, मयूर पेपरबैक्स, नौएडा