हॉर्स रेस

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शिखर बहुराष्ट्रीय कंपनी के वातानुकूलित कमरे में बैठा हुआ था। उम्र होगी यही कोई पैंतीस के आस-पास। चेहरे पर थकान ने अपना बसेरा बना लिया था, फिर भी गाल और ललाट आत्मविश्वास से दमक रहे थे। अभी वह थोड़ा रिलैक्सड महसूस कर रहा था, क्योंकि कंपनी के टारगेट पूरे हो चुके थे। जो बाकी थे उनके भी पूरे होने की पक्की उम्मीद थी।

तभी उसके ऑफिस का एक बंदा सौरभ घबराया हुआ उसके पास आया। बोला, “सर, माय वाइफ इज सफरिंग फ्रॉम हेवी फीवर। आइ विल हैव टू गो… राइट नाउ… सर।”

दो पलों के लिए शिखर भी घबराकर उसकी बातें सुनता रहा। फिर बोला, श्योर-श्योर’। प्लीज गो…। सौरभ! तुम फौरन उन्हें अस्पताल लेकर जाओ और डॉक्टर से मिलने के बाद मुझे फोन करना। किसी चीज की जरूरत हो तो हेजिटेड मत करना… और पैसे की चिंता मत करना।”

“यस सर…।”

“हाँ, अभी कोई है उनके साथ?”

“हाँ, मेरी माँ है। माँ का ही फोन आया था।”

“ओके! प्लीज गो… फास्ट। टेक केयर।”

“थैंक यू सर… थैंक यू…।”

यह कहता हुआ और मन ही मन अपने बॉस को दुआएँ देता हुआ सौरभ जिस तरह घबराया हुआ आया था, उसी तरह घबराया हुआ निकल गया। शिखर का चेहरा थोड़ा गंभीर हुआ जैसे वह कुछ सोच रहा हो। सौरभ की पत्नी अस्पताल में भर्ती हो गई। शेखर ने फोन करके उसका हालचाल पूछा और अस्पताल जाकर सौरभ की पत्नी को देख आया। उसके चले जाने के बाद सौरभ की माँ उसके व्यवहार की इतनी तारीफ करती रहीं और दुआएँ देती रहीं। सौरभ तो रात-दिन अपने बॉस की तारीफ करने लगा था। पर वह समझ नहीं पा रहा था कि इतने ऊँचे पद पर पहुँचकर भी शिखर को क्यों अभिमान छू तक नहीं गया है? अपने एम्प्लॉयों के प्रति इतना प्यार? यह कम ही देखने में आता है।

उसके बाद से सौरभ के दिल में शिखर के लिए बड़ी इज्जत हो गई। अक्सर उसके मुँह से शिखर के लिए तारीफ-भरे शब्द निकल ही जाते। पर ऑफिस में सिर्फ वही अकेला नहीं था तारीफ करने वाला, सभी उसकी तारीफ करते थे। शिखर अपने एम्प्लॉइज के बीच अपने रुतबे नहीं, बल्कि अपने सौम्य व्यवहार के कारण कद्र पा रहा था।

एक दिन ऑफिस की ओर से पार्टी थी। सौरभ अपने दोस्तों विवेक और अयाज के साथ ड्रिंक ले रहा था। तभी शिखर भी अपना ग्लास हाथ में थामे आया और उनके बीच बैठ गया।

शिखर ने सौरभ से पूछा, “सौरभ! बताओ कैसी है तुम्हारी वाइफ?”

“बिल्कुल ठीक सर! और आपने तो सुनते ही मुझे छुट्टी दे दी।”

“अरे कैसे नहीं देता? …मैं भी समझता हूँ फैमिली की अहयिमत…।”

यह कहने के बाद उसने आँखें बड़ी-बड़ी कर सौरभ को देखा। फिर अपने ग्लास से चुस्की ली। थोड़ी देर तक एक मौन छा गया। सौरभ और अयाज गौर से शिखर को देखते हुए सोचने लगे कि इन शब्दों के पीछे आखिर कुछ तो है।

तभी शिखर बोला, “एक बार मेरी भी वाइफ बीमार पड़ी थी, पर उस समय मेरी ही बेरुखी ने कोमल को मुझसे दूर कर दिया… कोमल… मेरी वाइफ। वह समय ऐसा था… ऐसा कि मैं कुछ समझता ही न था… आज सोचता हूँ तो बस सोचकर रह जाता हूँ। जो बीत गया उसके लिए क्या कर सकता हूँ?”

फिर वह कुछ देर के लिए चुप हो गया और उसने एक ही बार में अपना ग्लास खाली कर दिया। फिर कहना शुरू किया। आँखें कहीं अदृश्य में खो गई थीं।

वह बोलने लगा, “तब मेरी नई-नई शादी हुई थी। मैं उसे लेकर अपनी नौकरी पर आया था। एक दिन कोमल बीमार थी और बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। मैं ऑफिस के लिए जब निकलने लगा तो उसने कहा, कि आज मत जाओ। मेरी तबीयत ठीक नहीं है। पता नहीं मैं आज टायलेट तक भी कैसे जाऊँगी। शायद गिर जाऊँगी…। उसकी आवाज में कमजोरी साफ घुली हुई थी और वह रुक-रुककर बोल रही थी। आँखें पूरी तरह खुल भी नहीं रही थीं। इस पर मैंने कहा, “कोमल डार्लिंग! आज जाना बहुत जरूरी है। नहीं गया तो डील चौपट हो जाएगी…। कोई बात होगी तो तुम मुझे फोन कर देना।”

फिर कोमल कुछ बोली नहीं, वैसे ही चुपचाप आँखें बंद कर पड़ी रही। और मैं ऑफिस निकल गया। उसी रात जब मैं ऑफिस से लौटा तो देखा बुखार से उसका बदन तप रहा था और वह बेहोश थी – न जाने कब से। मैंने फिर एंबुलेंस बुलाई। इस घटना के बाद बहुत दिनों तक मैं अफसोस करता रहा कि यदि रुक ही जाता तो क्या होता?

मैं अब यह समझता हूँ कि जितना समय मुझे अपनी न्यूली वेड पत्नी को देना चाहिए था, उतना मैं नहीं दे पाता था। दफ्तर जाने के बाद अपने निपट अकेलेपन को कोमल कैसे काटती थी वह देख तो नहीं पाता था, परंतु अनुमान न लगा पाता हो ऐसा भी नहीं था। लेकिन मैं इस अकेलेपन की कल्पना करने से भी डरता था जबकि वह उसे झेल रही थी।

कोमल उस एक कमरे के फ्लैट में बिल्कुल बेचैन हो जाती। यह मैं जानता हूँ कि सन्नाटा अनाकौंडा की तरह मुँह फाड़े उसे निगलने की कोशिश में लगा रहता होगा। किसी-किसी तरह वह दिन काटती होगी। सवेरे की चाय वह नौ बजे पीती थी हाथ में कप लिए अपने माहौल से खीझी हुई। उसे लगता था कि वह कैद होकर रह गई है।

कभी-कभी हम बात करते तो वह यह सब बताती। कभी ही कभी… ऐसे बात भी कहाँ हो पाती थी? दो बातें करने के लिए फोन मिलाती तो मेरा फोन बिजी आता। कभी मैं बात करता तो कभी यह कहकर फोन बंद भी कर देता, अच्छा… अभी तुमसे बात करता हूँ। बस, थोड़ी ही देर में।

और वह थोड़ी देर बाद का समय कभी न आता। वह रात तक इंतजार करती रह जाती।

शायद वह अपने खाने के लिए कुछ नहीं बनाती थी। रात का बचा खा लेती थी और कभी-कभी तो सारे दिन बिस्तर में ही पड़ी रह जाती थी। किसी-किसी तरह उसका दिन कटता तो शाम होती और फिर शाम रात में बदल जाती। टीवी देखते-देखते आँखें थक जातीं, तो जाकर सो जाती थी रात को मैं आता तो मेरे साथ ही खाती। अक्सर ऐसा होता कि मैं अपनी डुप्लीकेट चाभी से लॉक खोकर घर में प्रवेश करता।

मेरी आहट सुनते ही वह जग पाती। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर जाती और वह चहकती हुई आवाज में पूछती, “आ गए?”

“हूँ… आज ऑफिस में इतना काम था।” मैं बोलता।

“छोड़ो… यह ऑफिस गाथा। पेट में खलबली हुई मची है। खाना गरम करती हूँ।”

“पर मैं तो…।” मुझे कहना ही पड़ता, क्योंकि ऐसा हो जाता था मुझसे।

“क्या मैं तो?” वह बोलती।

“मैं तो मीटिंग से खाकर आया हूँ।” एक अपराध भाव लिए मैं बोलता।

“तो तुमने मुझे बता क्यूँ नहीं दिया? एक कॉल तो कर देते?”

अरे, इस कदर बिजी था कि भूल गया। अच्छा, अब से ख्याल रखूँगा। सॉरी…।”

और मैं उसे मनाने की पूरी कोशिश करने लगता। जब ऐसा एक बार नहीं कितनी बार हुआ तब अंत में कोमल ने खाने पर मेरा इंतजार करना छोड़ दिया था।

शुरू-शुरू में मेरे देर से आने पर कोमल इंतजार करते-करते थककर सो जाया करती थी। बाद में यह इंतजार भी खत्म हो गया था। मैं कब जाकर सो जाता था, उसे मालूम नहीं होता। रोज की यही कहानी हो चली थी।

और मैं उसे मनाने की पूरी कोशिश करता। पर मैं पूरी तरह जान नहीं पाता था कि उसके दिल पर क्या बीतती होगी? वैसे औरतें अधिक भावुक होती हैं। वह नहीं थी ऐसी बात नहीं है। वह भी थी। ज्यादा तो नहीं कहूँगा, क्योंकि ज्यादती मेरी ओर से उसके प्रति हो रही थी। उसे सिर्फ सहना पड़ रहा था।

उसका रात का खाना मेरी ही वजह से अनियमित हो गया। अकेलेपन के कारण वह खाने के प्रति अपनी रुचि ही खो बैठी थी। शायद उसे गहरी उदासी घेरने लगी थी। वह भीतर-ही-भीतर बीमार रहने लगी थी… शायद! शायद वह डिप्रेशन की शिकार हो गई थी। और मैं भी उसकी ओर ध्यान नहीं दे पा रहा था। मुझे चाहिए था कि मैं उसे कहीं घुमाने ले जाता। आध-एक घंटे भी अंतरंगता के साथ उससे बातें करता। उसे भीतर से समझने की कोशिश करता कि वह क्या चाहती है? उसे क्या अच्छा लगता है? एक बड़ी कॉमन-सी बात है कि अपने पति के साथ घूमना, सैर-सपाटा, रेस्तराँ में खाना और यदि पैसे न भी हो तो कम से कम साथ में हँस-बोलकर समय बिता लेना सभी औरतों को अच्छा लगता है। पर मैं उसके साथ समय भी तो नहीं दे पा रहा था?

मैं उसके साथ अपराध कर रहा था… अन्याय… सौरभ! पर तब मेरे पास इतनी चेतना ही न थी कि मैं अपने किए का विश्लेषण करता। जिंदगी जैसे एक हॉर्स रेस थी और मैं उसका घुड़सवार। अपनी महत्वाकांक्षा के घोड़े को बेतहाशा दौड़ा रहा था… दौड़… दौड़… दौड़। मेरी आँखें फिनिश लाइन पर फिक्सड थीं। मुझे किसी तरह यह दौड़ जीतनी थी… बस। वही मेरा गोल था। इधर-उधर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था मुझे।

जानते हो सौरभ? अब जब तुमसे कह रहा हूँ तो कह ही दूँ। आज तुमसे सब कह देना चाहता हूँ। क्यों रखूँ दिल में? क्यों? मुझे दिल पर इसे झेलना बहुत भारी लगता है।

वह चाहती थी कि हमारे बच्चे हों और हमारे बीच का खालीपन भरे। उसका अकेलापन दूर हो। पर मैं टाल देता था। उसकी यह माँग नाजायज थी क्या? कतई नहीं। वह प्यारे-प्यारे बच्चों के सपने देखने लगी थी। एक दिन अपने सपने मुझे सुनाने लगी तो मैं बोला, नहीं कोमल, अभी नहीं। देखो, अभी हमारे पास क्या है? न अपना मकान है, न अपनी गाड़ी है। वह इस दुनिया में आएगा तो हम क्या दे सकेंगे उसे? न अच्छे खिलौने, न महँगे स्कूलों में एडमिशन – कुछ भी तो नहीं हो सकेगा। यही अगर वह कुछ साल बाद हमारी गोद में आए तो कितना कुछ मिलेगा उसे?” …और जानते हो यह सुनकर उसकी आँखों में आँसू आ गए थे। उसने अपनी बड़ी-बड़ी सजल आँखों से देखते हुए कहा था, “शिखर! तुम नहीं जानते कि बच्चे अपने माता-पिता से यदि सच में कुछ चाहते हैं तो वो है प्यार-दुलार, उनकी ममता-भरी निगाहें। बाकी चीजें तो दिखावे की होती हैं। और फिर जब तक वह यह सब समझने लायक होगा तब तक तो हमारे पास सब कुछ हो जाएगा न? फिर चिंता क्यों करते हो? फिर देर क्यूँ?”

“तुम नहीं समझती” मैं कहता, “उसे समय भी तो देना होगा। कहाँ है हमारे पास समय?”

“तुम्हारे पास नहीं है, मेरे पास तो है न?”

“क्या अकेले कर लोगी सब? क्या मेरी थोड़ी भी जरूरत नहीं पड़ेगी?” तब वह चुप हो जाती।

वह सब समझती थी, पर मैं ही नहीं समझता था। मैं नहीं समझ पाया था उसकी भावनाओं को और मैं कितना कठोर बना रहा, वह कितनी बेबस कि मुझसे एक बच्चा भी न पा सकी।”

यह कहने के बाद शिखर की आँखें भर आई। कुछ सोचकर उसने फिर कहना शुरू किया,

“मुझसे वह अक्सर शिकायत करती थी कि मैं उसे घुमाने नहीं ले जाता हूँ। वह ठीक ही तो कहती थी कि “अगर तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं है तो तुमने शादी ही क्यूँ की?”

मैं कहता, “माँ-बाप का दबाव था कि शादी कर लो, इसीलिए की।”

तो वह कहती, “तो आज भुगत तो मैं रही हूँ न? तुम तो चले जाते हो बाहर… ऑफिस… होटल… पार्टी… हँसना-बोलना। और मैं?”

तो मैं कहता, “तुम्हें किसी ने मना किया है? तुम भी बाहर जाओ। बाजार में घूमो… कपड़े खरीदो।”

हाँ-हाँ… मैं अकेली घूमती रहूँ बाजार में? कपड़े खरीदूँ और पहनूँ… किसलिए?” वह कहती।

वह ठीक ही तो कहती थी, कि तुम हफ्ता में एक दिन भी मेरे लिए नहीं निकाल सकते, एक दिन भी मुझे नहीं दे सकते शिखर! …सैटरडे को भी निकल जाते हो।”

सच, मैं तो अपने कामों की धुन में शनिवार को भी व्यस्त हो जाता था। फिर उसके दूसरे दिन रविवार को भी उससे बात करने की फुर्सत नहीं होती, क्योंकि उस दिन मुझे अपने कपड़े साफ करने की जरूरत पड़ती और उन्हें प्रेस करने की। सप्ताह-भर की प्लानिंग करता। घर पर भी रहकर लैपटॉप पर व्यस्त रहता। सोचो सौरभ… वह किस टेंशन से गुजर रही होगी?

मुझे याद है वह हमारे बीच का अंतिम वाकया था। उस दिन शनिवार था और शनिवार के दिन भी मैं तैयार होने लगा तो कोमल ने कहा था, “शिखर! याद है आज क्या दिन है?”

“हाँ, शनिवार है। तुम यही न कहोगी कि आज मैं क्यूँ काम के लिए निकल रहा हूँ?”

“नहीं शिखर! आज कुछ और भी है। जरा याद तो करो?”

“क्या है कोमल? लेट हो रही है। पहेलियाँ मत बुझाओ। बहुत बड़ी डील है। मैं इसे ले सका तो मालूम है मेरी सैलेरी में कितना हाइक हो जाएगा और मैं कहाँ पहुँच जाऊँगा?”

“क्या तुम्हारी जिंदगी में डील और सैलरी हाइक के अलावे किसी और चीज के लिए कोई जगह नहीं?”

“है क्यों नहीं? पर सब कुछ तो उसके बाद ही है न?”

“उसके बाद?” उसने दोहराया था।

“हाँ! ऑबवियसली!” मैंने भी अपनी बात पर जोर दिया।

वह मुझे घूरने लगी। जब मैं उसकी आँखों को बर्दाश्त नहीं कर पाया तो बोला, “किसके लिए कर रहा हूँ यह सब? अपने लिए क्या?”

“मुझे नहीं चाहिए यह सब। बस मुझे अपना थोड़ा-सा समय दे दो।” उसकी आँखों में अब एक सच्ची याचना थी।

“तब मैंने कहा, “कोमल! प्लीज… इमोशनल बातें बंद करो। बताओ आज क्या है?”

“आज हमारी शादी की तीसरी एनीवर्सरी है।” वह बोली।

उसे लगा कि यह सुनकर मैं चौंक जाऊँगा, खुश हो जाऊँगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टे मैं सुनकर भी उदासीन बना रहा।

मैं काम के बोझ से, जो कि मेरा ही अपना ओढ़ा हुआ था – आसमान छूने की मेरी अपनी ही जिद का परिणाम था, इस तरह दबा हुआ था कि उसकी आँखों में प्यार न देख पाया। ऊपर के मन से बोला “हाँ, ओह! मैं तो भूल ही गया। आज शाम को जल्दी लौटता हूँ। तुम तैयार रहना। हम टॉप रेस्तराँ में डिनर लेने चलेंगे।”

यह कहकर मैंने उसे चूम लिया और ओके… बाय कहता हुआ निकल गया। मैंने महसूस किया कि मैं नाटक कर रहा हूँ।

फिर उसके बाद तो… कौन मुझे बताता कि उसने क्या किया? पर जब ऑफिस से लौटा तो देखा।

मैंने रात के आठ बजे का समय उसे दिया था और ठीक आठ बजे उसका फोन आया, “कब आ रहे हो?”

“तुम तैयार होओ, मैं निकलूँगा आधे घंटे में।”

फिर उसका फोन नहीं आया। मैं इधर क्लायंट के चक्कर में फँस गया था। क्लायंट बोला कि वह एक मीटिंग से निकलकर मुझसे मिलेगा। 6 बजे की मीटिंग 7.30 बजे शुरू हुई। वह घंटे-भर चली। फिर क्लाइंट ने कहा कि मैं मैंनेजिंग डायरेक्टर शमशाद से मिल लूँ। फिर उनके आने में देर हुई। जब वे आए तो नौ बज चुके थे। वे आधे घंटे तक मेरा दिमाग चाटते रहे। इस बीच मैं सोच रहा था कि कोमल का फोन क्यों नहीं आ रहा? तभी आधे-अधूरे दिमाग से सुनता हूँ कि वे मुझसे हाथ मिलाते हुए कह रहे हैं “सो कोंग्रेचुलेशन! दिस डील गोज टू यू शिखर!”

डील तो मुझे मिल गई, पर तब तक साढ़े नौ बज चुके थे और मुझे घर पहुँचते-पहुँचते कम-से-कम साढ़े दस या ग्यारह बज ही जाना था। मुझे डील मिलने की कोई खुशी नहीं थी।

कोमल से मैं बहुत ही प्यार करता था और उसे दुख देकर मुझे भी दुख होता था, सौरभ! पर मैंने जान-बूझकर यह सब नहीं किया। पर क्या होता जा रहा था? …मुझे? वक्त को? लगता था कि अपना कोई जोर नहीं, बस मैं भागा जा रहा हूँ। भागा जा रहा हूँ। कभी मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ था कि घर पहुँचने के पहले घबराहट हो। पर उस दिन लिफ्ट में कदम रखते ही दिल धक-धक करने लगा था। पर उस दिन शायद मेरे दिल को पूर्वानुमान हो गया था – मेरा दिल शायद जान रहा था कि बहुत अजीब घटेगा मेरे साथ।

मैं अंदर गया और सीधे बेडरूम में चला गया यह सोचते हुए कि वह गुस्सा कर सो गई होगी। रूठी होगी तो उसे मना लूँगा। पर देख रहा हूँ कि बिछावन पर एक खूबसूरत सलवार सूट निकालकर रखा हुआ है। उसी के साथ उसी रंग की चूड़ियाँ, खुले डब्बे से बाहर झाँकती नई सुनहली सैंडिलें!

यह सब देखकर अचानक सारा माजरा समझ में आ गया। लगा मुझे बिजली का झटका लगा है। और मैं समझ गया कि वह चली गई है, क्योंकि वहीं पर डब्बे से दबाकर रखा गया एक कागज था जिस पर लिखा था… “मैं जा रही हूँ। मैं समझ गई तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है।” हाँ, वह चली गई थी। मैंने उसे बहुत बुलाया पर वह नहीं आई।

सौरभ! डील तो मुझे मिली… मैं अपने मकाम पर तो पहुँचा, पर मैंने अपनी वाइफ खो दी, वाइफ क्या अपनी लाइफ ही खो दी। व्हाट आइ पेड फॉर इट… नो बडी विल पे…। मैं जानता हूँ कि इसको पाने के लिए मैंने क्या खोया है। मेरी तरह कोई न खोए।”

शिखर का चेहरा अजीब हो गया था… रुआँसा और पराजित। सौरभ ने अपने बॉस का ऐसा चेहरा कभी नहीं देखा था।

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा

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उस दिन शाम को पाँच बजे ही संजीव ऑफिस से वापस आ गया था। लिफ्ट से ऊपर जाकर उसने अपार्टमेंट की घंटी बजाई तो रोज की तरह दरवाजा नहीं खुला। वह बाहर खड़ा इंतजार करता रहा। फिर दूसरी और तीसरी बार भी बजाई तो दरवाजा वैसे ही बंद रहा। तब उसे लगा कि उसके पापा कहीं चले गए हैं। यदि वे भीतर होते तो फौरन दरवाजा खोलते। लेकिन उन्हें मालूम भी तो नहीं था कि इस समय वह आ जाएगा, वर्ना वे बाहर नहीं जाते।

उसने अपने पिता रवींद्र बाबू को कॉल किया, “हलो पापा, कहाँ हैं आप?” रवींद्र बाबू नुक्कड़ वाली स्नैक्स की दुकान में खड़े समोसे खा रहे थे। उन्होंने सोचा कि संजीव ऑफिस से फोन कर रहा है। इसलिए इत्मीनान से बोले, “संजीव? कहो किसलिए फोन किया?”

यदि वे जानते कि संजीव बाहर खड़ा है तो इस तरह शांति से बात न करते। उनकी आवाज में घबराहट घुली होती… घर पहुँचने के लिए बेताब हो जाते।

संजीव ने कहा, “आप कहाँ हैं?”

“मैं इस गली की स्नैक्स वाली दुकान में समोसे खा रहा हूँ। मैं तुम दोनों के लिए भी लेता आऊँगा।” उनकी आवाज में वही शांति बरकरार थी।

संजीव ने कहा, “अच्छा, लेते आइएगा। पर अभी आइए। मैं घर के बाहर खड़ा हूँ।”

यह सुनते ही वे बेचैन हो गए। बोले, “ओ! आ गए क्या? अच्छा, मैं आ रहा हूँ तुरंत।”

उनकी आवाज में एक खुशी घुल गई थी। संजीव ऑफिस से आ गया है यह सुनकर उन्हें बड़ा अच्छा लगा था। बच्चों का घर लौटना उन्हें अपरिमित खुशी दे जाता था, क्योंकि उनके आसपास पसरा हुआ सन्नाटा दूर हो जाता था। जल्दी-जल्दी मुँह चलाकर वे मुँह में भरे समोसे को निगलने लगे। समोसे खाते हुए दुकानदार से बोले, “अच्छा, चार समोसे और पैक कर दो।”

यह कहकर वे एक हाथ से पेपर प्लेट थामे हुए दूसरे हाथ से अपनी जेब में बटुआ टटोलने लगे। पर बटुआ तो लेकर चले ही नहीं थे तो मिलता कैसे? टटोलते-टटोलते यह महसूस हुआ। तब तक हाथों में कुछ खुदरे नोट आ गए थे। उन्हें उँगलियों में थामकर दुकानदार की ओर बढ़ाते हुए बोले, “लो भाई, पैसे ले लो। मैं बटुआ तो घर पर ही भूल गया।”

दुकानदार ने नोट थामते हुए कहा, “कोई बात नहीं थी। पैसे फिर मिल जाते।” रवींद्र बाबू लगभग हर रोज इसी स्नैक्स की दुकान पर आते और कुछ-कुछ खाते। इसी से दुकानदार उन्हें पहचानता था। शाम के चार बजते कि खाने से अधिक बाहर निकलने की इच्छा जोर मारती। बाहर आकर लोगों को चलते-फिरते, आते-जाते देखते तो उन्हें लगता कि उनकी नसों में भी खून दौड़ रहा हैं। तब अपने हिस्से के अकेलेपन में निष्क्रिय हुआ दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो उठता, तरह-तरह के ख्याल दिल की धड़कनों के साथ गुँथ जाते और वे पूरी जिजीविषा से भर उठते।

रवींद्र बाबू ने पेपर प्लेट डस्टबिन के हवाले किया। पेपर नैपकिन से हाथ पोंछते हुए समोसों का पैकेट उठाया और चल दिए। चार कदम चले होंगे तो मुँह में बसे स्वाद ने याद दिलाया कि वे पानी पीना तो भूल ही गए। सोचा कि चलो, कोई बात नहीं, घर जाकर ही पी लेंगे। अभी बेचारा संजीव घर के बाहर खड़ा होगा थका-माँदा। यह स्थिति बड़ी खराब होती है कि घर पहुँचो और घर में ताला बंद। पास में चाभी नहीं।

संजीव ने एक चाभी सुरुचि को दे रखी थी और दूसरी वह खुद रखता था। सुरुचि ऑफिस से उसके पहले ही घर पहुँच जाती थी। अतः चाभी उसके पास रहनी चाहिए थी कि उसे इंतजार न करना पड़े। अभी पापा के आने पर उसने अपने वाली चाभी पापा को दे दी।

रवींद्र बाबू वहाँ पहुँचे तो देखा कि संजीव बैग लिए खड़ा है। उन्होंने अपनी जेब टटोलकर चाभी निकाली। संजीव ने चाभी उनके हाथ से ले ली, क्योंकि वह जानता था कि उन्हें चाभी की होल में घुमाने में समय लगेगा। उन्हें डबल लॉक वाले डोर खोलने की आदत नहीं थी। दरवाजा खोलकर संजीव ने अपना बैग सोफे पर डाला और बैठ गया। रवींद्र बाबू ममता-भरी आँखों से उसे देखते हुए सोच रहे थे कि बेचारे बच्चे बारह-बारह घंटे बहुराष्ट्रीय कंपनियों में खटते हैं, तब जाकर एक मोटी पगार घर में आती है। इन्हीं रुपयों से सब कुछ होता है, नहीं तो शहर में एक कोठरी भी न हो पाए।

उन्होंने पूछा, “चाय पियोगे? बना दूँ?”

संजीव ने कहा, “नहीं, कॉफी पीकर आया हूँ ऑफिस से। और आपसे मैं चाय बनवाकर पियूँगा?” फिर थोड़ी देर बाद बोला, “सुरुचि अब आती ही होगी, वह तो बनाएगी ही।”

करीब घंटे-भर बाद सुरुचि आई। वह भी संजीव की तरह ही थकी हुई थी। आते ही अपने कमरे से लगे वाश-रूम में हाथ-मुँह धोने वाली चली गई। फिर चाय बनाकर एक-एक कप संजीव और रवींद्र बाबू के सामने रख दी और अपना कप हाथ में लेकर टीवी धीमी आवाज में खोलकर बैठ गई। संजीव लैपटॉप पर व्यस्त हो गया।

रवींद्र बाबू ने टोका, “अब तुम्हें ऑफिस में कम काम था कि यहाँ आकर भी लैपटॉप में सिर खपाने लगे?”

संजीव ने कहा, “पापा! आप नहीं समझिएगा। इससे कितनी सारे बातें हल हो जाती हैं। सारा काम ही हो जाता है इससे।”

यह सुनकर रवींद्र बाबू कुछ प्रशंसा और अचरज-भरी दृष्टि से उसे देखने लगे। सुरुचि को शायद टीवी के प्रोग्राम अच्छे नहीं लग रहे थे। वह अपने कमरे में उठकर चली गई।

यही दृश्य हर शाम का हुआ करता था और सवेरे का बिल्कुल इससे उल्टा। नौ बजते-बजते संजीव और सुरुचि दोनों ही ऑफिस के लिए निकल जाते थे। तब घर में वे ही अकेले बच जाते। पिंजरे में बंद मैना की तरह छटपटाने लगते। कभी पेपर पढ़ते, कभी कोई पत्रिका उलटते तो कभी टीवी ऑन करते। इन सबसे जब ऊबते तो सो जाते। यहाँ किसी से उनकी जान-पहचान न थी, न अपना कोई दोस्त ही था कि उसके यहाँ बैठकर कुछ वक्त गुजार लेते।

उन्हें अपने बेटे के पास आए हुए एक महीना हो गया था। एक नई दिनचर्या से उन्हें गुजरना पड़ रहा था। ऐसा न था कि वे कभी अपना घर-शहर छोड़कर बाहर नहीं रहे। जब तक नौकरी में रहे, कई जगहों पर गए, कितने तरह के लोगों और उनकी संस्कृतियों से मिलना-जुलना हुआ। पर तब की बात और थी। एक पूरा परिवार था – पत्नी, छोटे-छोटे बच्चे। दफ्तर से आते तो अपने को सबसे घिरा हुआ पाते। चारों ओर चहल-पहल का माहौल। अब वह बात न थी। अब उनकी पत्नी गुजर चुकी थी और साथ-साथ एक लंबा वक्त भी। सदा बदलती रहने वाली दुनिया ने इतना बदल दिया था उनकी जिंदगी को!

पहली बार जब वे इस महानगर में आए थे उन्हें अजीब लगा था कि यहाँ तो सारे दिन दरवाजा बंद रहता है। कई-कई घंटे एकांत में बताते हुए वे एक इनसान का चेहरा देखने को तरस जाते। जिस रात को वे आए उसके सवेरे आपस में कुछ बातचीत भी न हुई और बेटा-बहू दफ्तर चले गए तो वे बेचैन होने लगे कि तभी दरवाजे की घंटी बजी। वे खुश हुए कि चलो कोई आया। शायद पड़ोसी हो। पर पड़ोसी क्या दूसरे लोक में रहते थे? उनके फ्लैट भी दिन-दिन भर बंद रहते। शाम को मियाँ-बीवी थके-माँदे लौटते तो बंद घर खुलता। उन्हें यह सब नहीं मालूम था। तभी सोच बैठे कि पड़ोसी आया होगा। खुश होकर दरवाजा खोला था उन्होंने। सामने खड़ा था नेपाली रसोइया। उन्हें याद आया कि जाते-जाते सुरुचि बोल गई थी, “पापाजी, नेपाली खाना बनाने आएगा। जो मर्जी हो बनवा लीजिएगा। वह चाय-कॉफी भी बना देगा।”

नेपाली को देखकर वे मुस्कुरा उठे। बोले, “तो तुम प्रीतम हो?”

“हाँ साब।” उसने कहा था।

“ठीक है, आओ। मुझे सुरुचि ने तुम्हारे बारे में बताया था।”

“आप भैया के पापा हो न?”

“हाँ।”

“मुझे मालूम है। भाभी जी बोला था कि आप आएगा।”

वह पूरे अधिकार के साथ भीतर चला आया। उनकी ओर घूमकर बोला, “क्या खाओगे आप?”

“जो रोज बनाते हो, वही बना दो।” रवींद्र बाबू बोले।

इतना सुनते ही वह अपने काम में मशगूल हो गया। वे पास ही सोफे पर बैठे हुए सिंक से पानी निकलने की आवाज, कढ़ाई में सब्जी छौंके जाने की छनक, प्रेशर कुकर की सीटी, कढ़ाई और छलनी की आपसी ठनर-मनर सुनते रहे। मुश्किल से बीस मिनट बीते होंगे कि नेपाली ने सारा खाना तैयार करके टेबुल पर लगा दिया। उसके बाद बाहर जाते हुए बोला, “दरवाजा बंद कर लो साब।”

रवींद्र बाबू उसके काम की तेजी को देखकर अवाक हो गए थे। भला इतनी जल्दी खाना कैसे बन गया? वे जितना चकराए उतना ही उदास भी हुए उसे बाहर निकलते देखकर। वह सिटकिनी खोलकर चला गया था और वे पीछे उसकी पीठ निहारते रह गए थे। वाह! आया भी और चला भी गया। क्या बनाया होगा उसने? डायनिंग टेबल पर लगे कैसरोल्स को उन्होंने खोल-खोलकर देखा था। पूरा उत्तर भारतीय खाना था। एक भी आइटम कम नहीं। चावल, दाल, सब्जी के साथ सलाद और चटनी तक बनाकर रख दी थी उसने! रसोइया को आया देखकर उनके मन में एक छिपी आशा जगी थी कि उन दोनों के बीच थोड़ी बातचीत होगी। कुछ वह पूछेगा, कुछ ये पूछेंगे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, धत…!

धीरे-धीरे उस महानगर में रहते हुए रवींद्र बाबू ने सीख लिया था कि कैसे समय बिताया जाए। वे अपने मित्रों को कॉल करते और देर तक मोबाइल पर बातें करते रहते। जब तक बातें होती रहतीं, उन्हें लगता कि वे एक चलती-फिरती, जीती-जागती दुनिया से जुड़े हुए हैं, वरना इस शहर के अनजाने चेहरों के समुद्र में एक भी पहचाना चेहरा उन्हें नजर नहीं आता था। तब उनकी मनःस्थिति एक भटके हुए जहाज की हो जाती। कहाँ जाएँ… क्या करें… सब कुछ अपरिचित… अटूट एकाकीपन।

अकेले रेल या बस में सफर करना उन्हें कभी बुरा नहीं लगा था, बल्कि कभी-कभी तो उन्होंने इसे एन्जॉय भी किया था। एकदम भीड़-भाड़ से मुक्त। परंतु अपना विधुर जीवन जीते हुए उन्हें लगता था कि जिंदगी का एकाकी सफर रेल या बस का सफर नहीं है जो इसका लुत्फ उठा लिया जाए। इसे जो जीता है वही समझता है। जीवन संगिनी को गुजरे एक अरसा हो गया था। पत्नी की जरूरत जितनी पहले थी, उससे कम आज नहीं थी। बल्कि उन्हें लगता था कि अभी उसका होना अधिक जरूरी था। अब उनकी जिंदगी क्या थी? एक सूखे पत्ते की तरह उड़कर वे यहाँ से वहाँ चले जाते थे – जिधर हवा ले गई, उधर ही उड़ गए। अपना कोई वजूद ही नहीं रह गया था।

वे यहाँ पर अपने परिचित बनाने की कोशिश करने लगे थे। शुरू-शुरू में सिक्योरिटी गार्ड, दुकानदार और सब्जीवालों से ही कुछ जरूरत से अधिक बातें करने लगे थे ताकि वे इन्हें पहचानें। जाते-जाते दोस्ताना नजरों से उन्हें देखते। धीरे-धीरे आस-पास के लोग इन्हें जानने लगे थे। इन्हें अच्छा लगता था जब कोई आँखों में पहचान लिए इनकी ओर देखता और इनका हाल-चाल पूछ लेता। घर में सब्जी लाने का काम इन्होंने अपने जिम्मे ले लिया था कि इसी बहाने लोगों से कुछ बात भी हो जाएगी। बातचीत करके थोड़ा प्रफुल्लित महसूस करते थे।

फिर भी पूरे दिन की लंबाई में पसरा हुआ समय नहीं कटता था। खाना बन जाता था, कपड़े धुल जाते थे। काम खत्म है। खाना लगा हुआ है, वे खाएँ या न खाएँ। निपट अकेले रहते हुए खाने की इच्छा भी दब जाती थी। कुछ-कुछ करके समय को टुकड़ों-टुकड़ों में काटने की कोशिश जी-जान से जारी रहती। फ्लैट के पूरब में आंजनेय का मंदिर था। कभी-कभी उधर निकल जाते। उत्तर की ओर बड़ा सुंदर गणेश मंदिर था। शाम को टहलते हुए किसी दिन उधर भी निकल जाते। दर्शन करके बाहर आते तो वहीं प्रांगण में बेंच पर शांति के साथ बैठकर समय बिताते। इतना करने के बाद भी समय बिताना मुश्किल था खासकर दिन का। तो उन्होंने सोचा कि ठीक है, अब वे ही बाल्कनी में रखे गमलों में पानी डाल दिया करेंगे। कुछ समय इसमें भी कटेगा।

यही सोचकर उन्होंने सुरुचि से एक दिन कहा था, “बेटा, इन गमलों को मैं ही सींच दिया करूँगा। जब तक मैं हूँ तब तक तुम बाई को मना कर दो।”

सुरुचि बोली थी, “पापा जी! आप सींचेंगे तो बाई की आदत खराब हो जाएगी। गमले सींचना उसका काम है।”

यह सुनकर रवींद्र बाबू चुप हो गए थे। ठीक ही तो कह रही थी वह। अब दो दिनों के लिए बाई की आदत क्यों खराब कर जाएँ?

उस दिन बेटा-बहू के दफ्तर जाने के बाद उन्होंने अखबार उठा लिया था। अखबार की एक-एक खबर पर नजर दौड़ाने लगे। रोज की वे ही सारी बातें। राजनीतिक उथल-पुथल, अपराध – उसमें भी बलात्कार। मन चिड़चिड़ा गया। एक भी खबर ऐसी नहीं थी कि मन खुश हो। उन्होंने अखबार एक ओर रख दिया था। पत्रिकाएँ तो पहले ही पढ़ी जा चुकी थीं। अकेले बैठकर सोचने लगे कि क्या किया जाए?

तभी कमरे के बाहर लगे गमलों की ओर उनका ध्यान गया। उनमें रोपे गए पौधों को देखकर वे सोचने लगे कि इन्हें देखकर तो पता ही नहीं चलता कि क्या मौसम है? सभी मौसमों में एक-सा ही रहते हैं। क्या जाड़ा, क्या गरमी और क्या बरसात? वे उठकर फूलों को निहारने लगे थे। तभी वे चौंके। नहीं, उनका सोचना सही नहीं था। अभी वसंत है और कुछ पौधों में सुआपंखी कोंपलें फूट रही हैं। यह देखकर अपने अकेलेपन में भी वे मुस्कुराने लगे। गौर से देखने के लिए अपना चश्मा ठीक कर वे पौधों पर झुक गए। वाह! कुदरत का करिश्मा! फूलों को सब पता है। उन्हें मालूम है कि वसंत आ रहा है। इस महानगर को मालूम हो न हो काम और जाम को फर्क पड़े या न पड़े! ये अपनी मौन आवाज में कह रहे हैं कुछ। इनकी सुनता भी कौन है? वे उन पौधों से बात करने लगे।

बोले, “तुम बोल रहे हो, मैं सुन रहा हूँ। मुझे भी मालूम है मेरे दोस्त कि वसंत आ गया है।”

अचानक उन्हें लगा जैसे कितने सारे नन्हें-मुन्नों से घिरे हुए हैं वे! उनके इर्द-गिर्द कितने सारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। उनकी बाँहें हैं… बाँहें नहीं – पंख हैं… हरे-हरे पंख। वे सब ढूँढ़ रहे हैं आकाश, हवा और उजाला। वे अपने को तितली-जैसा हल्का महसूस करने लगे। कितनी हल्की हो गई थी उनकी साँसें? उन्होंने चारों ओर नजर घुमाई। हवा और आकाश को काटती हुई ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें थीं, पर इस बाल्कनी में थोड़ा आकाश था, उसका खुलापन था, थोड़ा जीवन था… थोड़ी ताजगी… थोड़ी संजीवनी! हाँ, अब यही बैठेंगे वे, हवा और आकाश से बातें करते हुए। यहीं से दुनिया भी दिखती हैं, लोग भी दिखते हैं। अब रोज उनके बैठने की प्रिय जगह वही बाल्कनी हो गई थी। वे रोज ध्यान से एक-एक पौधे को देखते। पौधों में निकले अँखुए हर दिन थोड़ा बढ़े हुए लगते। एक सरसों के बराबर उगा अँकुर छोटी-छोटी पत्तियों में खुलने लगा था। देखते-ही-देखते कितनी ही धानी पत्तियाँ निकल आई थीं। पौधे झबरीले हो उठे थे।

उस दिन वे शाम को सब्जी लेकर लौटे तो मन न होते हुए भी टीवी खेाल दी। अचानक उन्हें अपने जबड़ों में दर्द महसूस हुआ। फिर यह टीसता चला गया और इतना बढ़ा कि दवा की जरूरत महसूस होने लगी। फोन करके संजीव को कहना चाहा कि लौटते हुए वह दवा लेता आए, पर उसे आने में अभी देर थी। दाँत का दर्द इस तरह बर्दाश्त से बाहर हो चला कि संजीव के आने तक वे इंतजार नहीं कर सकते थे। इस स्थिति में भी उन्हें ही दवा के लिए निकलना पड़ेगा। किसको कहते? घर में था कौन?

अतः वे दवा लाने चल दिए। दवा की दुकान नजदीक ही थी। शाम की स्याही घिरने लगी थी। सड़क पर वाहनों की आवा-जाही बनी हुई थी। किनारे चलने वाले पदयात्रियों की भी कमी नहीं थी। इसी भीड़ में रवींद्र बाबू खीझे हुए चल रहे थे। कभी-कभी उनका हाथ अपने दुखते हुए जबड़े पर चला जाता। दर्द और भीड़ ने उन्हें इस तरह जकड़ लिया था कि उन्हें लगने लगा कि न जाने किस दुनिया में वे आ गए हैं। गाड़ियों की हेडलाइट से आँखें चौंधिया जा रही थीं। वे सड़क पार करने के लिए एक ओर खड़े थे। तभी एक स्कूटर उन्हें मारती हुई निकल गई। इसके बाद की बात उन्हें नहीं मालूम।

आँखें खुलीं तो वे अस्पताल के बेड पर थे। बगल में खड़ी नर्स इंजेक्शन देने की तैयारी कर रही थी और संजीव पास में था। उन्हें होश में आया देख उसने पूछा, “कैसे हैं पापा?”

“पैरों में बहुत दर्द है और दाँत में भी। क्या हुआ है मुझे?” उन्होंने कराहते हुए कहा।

संजीव बोला, “आपको स्कूटर से धक्का लग गया था।”

“हाँ… अभी याद आ रहा है। मैं दवा लाने निकला था, क्योंकि दाँत में बहुत दर्द हो रहा था। एक स्कूटर मुझे मारते हुए निकल गई थी। …फिर पता नहीं क्या हुआ। मैं गिर गया था।”

“आप स्कूटर के धक्के से गिरकर बेहोश हो गए थे। यह तो अच्छा हुआ कि वहाँ कुछ लोगों ने आपको पहचान लिया और आकर सिक्युरिटी गार्ड से कहा। उसी ने मुझे खबर की।”

रवींद्र बाबू सुनकर चुप रहे। उन्हें अब वह दुर्घटना याद आने लगी थी।

संजीव ने कहा, “पापा! आपने दवा के लिए मुझे फोन कर दिया होता। आप स्वयं क्यों निकल गए?”

रवींद्र बाबू ने कराहते हुए कहा, “दर्द इतना था कि मैं तुम्हारे आने तक इंतजार नहीं कर सकता था।”

संजीव बोला, “खुशकिस्मती से आप बच गए पापा! आपको कुछ हो जाता तो?”

अभी रवींद्र बाबू भी यही सोच रहे थे कि वे भाग्य से बच गए। उनके पैरों की हड्डियाँ भी सही-सलामत थीं। वे डर गए यह सोचकर कि अपाहिज भी हो जा सकते थे। तब उन्हें कौन देखता?

अस्पताल से आने के बाद उन्होंने संजीव के यहाँ कुछ दिन और बिताए। अब वे सवेरे सैर के लिए उस समय जाते जब सड़क पर वाहन नहीं रहते थे। दुर्घटना के डर से बाहर न निकलते, यह भी संभव न था। इसीलिए वाहनों से बचते हुए वे फ्लैट से निकलकर स्नैक्स वाली दुकान से होते हुए अगले दोराहे तक जाते। फिर उस मुख्य सड़क को पकड़ते जिस पर बहुत कम गाड़ियाँ चलती थीं, साथ ही वह चौड़ी भी थी। वे सड़क की दोनों ओर लगे पेड़ों को पहचानते हुए जाते – यह शिरीष है, यह गुलमोहर, यह अमलताश, यह लैगनटेशिया और यह न जाने क्या? इस तरह वे एक अजीब आनंद से भर जाते। वे सोचने लगते कि यदि ये पेड़ न होते तो न जाने दुनिया कैसी लगती? धरती कैसी दिखती? शायद केशरहित स्त्री की तरह कुरुप।

एक दिन कुछ झिझकते हुए संजीव से बोले, “बेटा! अब मैं वापस जाना चाहता हूँ। काफी दिन हो गए यहाँ पर रहते हुए।”

संजीव ने कहा, “क्यों? कुछ समय और रहिए न हमारे साथ? क्या तकलीफ है आपको यहाँ पर?”

“तकलीफ तो कुछ भी नहीं, तुम लोग इतना ध्यान रखते हो मेरा! फिर भी…। बहुत दिन हो गए बाहर निकले हुए। अब जाऊँगा। ठीक है, अगले सप्ताह के लिए टिकट करा दो।”

हवाई अड्डे पर रवींद्र बाबू अपनी ट्रॉली लुढ़काते हुए निकल रहे थे तो एक परिचित चेहरा सामने की भीड़ में खड़ा इनका इंतजार कर रहा था। ड्राइवर असलम ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर इनके हाथ से ट्रॉली ले ली। कार पर बैठते ही उन्होंने अपने सर को पिछली सीट से टिका दिया था। कार पूरी रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर बढ़ी जा रही थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। कार शहर से गुजरती हुई अपने गंतव्य की ओर मुड़ गई जो ढाई घंटे की दूरी पर स्थित था। सड़क के दाएँ-बाएँ धूल में नहाए पेड़-पौधे खड़े थे। महुआ की महक समेटे हुए खुली हवा आई और प्राणों में उतर गई। घर के कमरे में दाखिल होते ही सन्नाटे ने उनके लिए बाँहें फैला दीं। उन्होंने सन्नाटे को आलिंगन में भर लिया। आगोश से छूटकर सन्नाटे ने कहा, “मैंने तुम्हें बहुत मिस किया, रवींद्र!”

रवींद्र बाबू ने कहा, “मैंने भी तुम्हें बहुत मिस किया।”

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा

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पेड़ का तबादला

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सुदूर कहीं निर्जन में एक अनाम पेड़ था जिसे वहाँ के लोग अब तक पहचान नहीं सके थे। धरती की गहराई से एक जीवन निकला था – हरे रंग का जीवन, एक बिरवा। कोमल-कोमल दो चार पत्तियों को लेकर इठलाता हुआ। उसके भीतर पूरी जिजीविषा भरी हुई थी। वह अपने चारों ओर फैले निसर्ग को बड़े कौतूहल के साथ देखता, पहचानता और स्वीकार करता। उसे यह दुनिया बहुत प्यारी लगती थी और घटित होने वाली एक-एक बात उसे जीने के लिए प्रेरित करती थी। बच्चे की तरह वह अपने परिवेश को जानने और समझने की कोशिश करता था और एक-एक रहस्य पर से पर्दा उठाकर देखना चाहता था कि यह हो रहा है तो कैसे? यह क्या है? वह क्या है? इस तरह की जिज्ञासाओं की कमी न थी उसके दिल में। बीतते हुए हर दिन के साथ वह कुछ-न-कुछ नया सीखता था। कई बातें उसने गिरह बाँधकर रख ली थीं वे बातें जिनसे उसकी सुरक्षा जुड़ी हुई थी। ऐसे स्थावर होने के नाते उसकी बहुत सारी मजबूरियाँ थीं, पर उसे तो अपने अस्तित्व की सीमाओं के भीतर ही जीना था। अपने चारों ओर की संवेदनाओं को वह पूरी ऊर्जा के साथ ग्रहण करता था और उसके एहसास बहुत घने होते थे। जब वह सुखी होता तो हँस लेता, दुखी होता तो रो लेता। केवल बोल नहीं सकता था, चल नहीं सकता था। वह बाल-पेड़ बढ़ रहा था और उसे बढ़कर एक वृक्ष बना जाना था।

कालक्रम से वह बढ़ता भी गया। और जैसे-जैसे बढ़ता गया, वैसे-वैसे अपने चारों ओर के वातावरण, अपने साथी-समाज का ज्ञान उसे होता गया। वह धीरे-धीरे बहुत कुछ सोचने-समझने लगा कि दुनिया क्या है? अपने चतुर्दिक खड़े पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं को पहचानने लगा। मौसमों का आना-जाना भी समझने लगा, इस तरह कि ऋतुओं का पूर्वाभास भी उसे होने लगा। कब किस मौसम में उसके चारों ओर का परिवेश क्या रूप ले लेगा, उसे मालूम रहता था।

जब वह एक छोटा झुरमुट था तो छोटी-छोटी चिड़ियाँ आतीं और उसकी डालों पर बैठकर फुदकतीं। चीं-चीं-चीं-चीं बोलतीं और उड़ जातीं। तितलियाँ आतीं और उसकी पत्तियों को छूती हुई निकल जातीं। कई पंछी उसे अपनी रात का बसेरा-बसेरा बनाए हुए थे। कितने कीड़े-मकोड़े उसकी डालियों पर रेंगते या चलते। किशोरावस्था में ये सारी गतिविधियाँ और बढ़ गई और उसे यह सब बड़ा अच्छा लगने लगा, क्योंकि जिंदगी का हर अनुभव उसके लिए अभी नया-नया था। उसे दुनिया की सारी बात नई लगती। इन्हीं अनुभवों में कुछ अनुभव प्रिय होते, कुछ सामान्य, कुछ अप्रिय, कुछ पीड़ादायक। पंछी-प्राणियों का उसके पास आना, उससे मिलना-जुलना उसे बहुत सुख पहुँचाता था। हवाएँ और हल्की धूप भी सुख देती थीं। प्रचंड सूर्य-किरणों से कष्ट तो होता था, परंतु वह उनसे जूझना सीख रहा था। तब वह अपने पैरों से जमीन के कलेजे की सरसता टटोलने लगता और जमीन से ठंडक पाकर सूर्य से लड़ता। हाँ, आँधी से उसे कठिन पीड़ा होती। वह जैसे समूल उखाड़कर उसे नष्ट कर देना चाहती थी। उसकी डालियों को थप्पड़ लगाती, हिलाती-झुकाती, उड़ाने लगती। तब वह बेबस हो जाता। उसे भय लगता था तेज आँधियों से। वर्षा तो उसकी दोस्त थी। बचपन से उसे जीवन-दे रही थी, परंतु कभी-कभी वह भी क्यों दुश्मन बन आँधी का साथ देने लगती थी? यह बात उसकी समझ में नहीं आती थी।

उसके दिन बड़े मजे में गुजर रहे थे। उसके चारों ओर कई अन्य पेड़ थे और पैरों के पास हरी दूबों से भरी धरती थी जिसमें लड़के अपनी गायों और भेड़ों को लेकर चराने चले आते थे। उन चौपायों को वह निर्विकार भाव से निहारता। कोई-कोई गाय उसकी पत्तियाँ चर जाती तो उसे बहुत पीड़ा होती। वह सोचने लगता कि उस चरवाहे के पास दो हाथ हैं जिनसे वह अपनी रक्षा के साथ-साथ बहुत-कुछ कर सकता है यानी जो चाहे वही कर सकता है। उसके दो पैर भी हैं जिनसे वह चलकर कहीं से कहीं चला जा सकता है। उसे आश्चर्य होता कि कैसे इन्हीं दो पैरों पर वे अपने अस्तित्व को उठाए कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं। यह सुख उन जैसे वृक्षों और पौधों को नहीं मिलता। उसके समान जो अन्य पेड़-पौधे हैं वे जमीन में गड़े हुए हैं और गतिशील नहीं हो सकते। उन्हें तो मजबूर होकर अपनी जगह के ही हवा-पानी में रहना है, उसी जमीन पर उसी जगह कीलित रहना है। खैर, यह तो प्रकृति का बना हुआ विधान है। जिसमें कोई इधर से उधर नहीं कर सकता। चलो, यदि उन सबों को जीना है तो इसी तरह जीना है।

वे चरवाहे अक्सर उसकी डालियों पर चढ़ जाते जिनका भार उठाना उसे बुरा नहीं लगता था, क्योंकि उसके पास जितनी शक्ति थी उसकी तुलना में उन बच्चों का, या कभी-कभी सयाने का भी भार क्या था? पर उनसे उसे खीझ होती थी कि बैठेंगे ठंडी छाँह में पर उसके प्रति कृतज्ञ होने के बजाय अपने ढोरों से चरवाएँगे उसकी पत्तियाँ! उफ! ये मनुष्य भी न… सिर्फ अपनी ओर से सोचते हैं। और मनुष्य ही क्यों? सब अपनी ओर से सोचते हैं। मनुष्य हर-हमेशा जीत इसलिए जाता है कि उसके पास कुटिल बुद्धि का अपरिमित खजाना है। यह सोचते ही अनाम पेड़ मुस्कुरा उठा।

पर उसके बाद से उसे मनुष्यों और चरने वाले पशुओं से डर लगने लगा कि न जाने कब मनुष्य उसे काट दे या पशु उसे चर जाएँ। पर वह कर कुछ नहीं सकता था। पैर तो थे नहीं जो जानवरों की तरह भाग सकता। मुँह तो था नहीं जो अपनी हँसी-व्यथा बयान कर सकता था या चिल्लाकर किसी को अपनी सहायता के लिए बुला सकता? सिर्फ सोच और समझ सकता था।

पर यह भी सच था कि उसे अपनी दुनिया बहुत अच्छी लगने लगी थी। एक दिन दो चरवाहे लड़के आए और उसकी छाया में बैठ कर बातें करने लगे। वह उन दोनों की बातें बड़े ध्यान से सुनने लगा।

उनमें से एक ने कहा, “मालूम है? शहर में पेड़ लगाए जा रहे हैं। उसके लिए पेड़ों को उखाड़-उखाड़कर मँगवाया जा रहा है।’

दूसरे ने कहा, “हें… पेड़? पेड़ लगेंगे? कि पौधे लगते हैं?”

“पेड़… पेड़! पेड़ लगाए जा रहे हैं। बड़े-बड़े पेड़।”

“तो इन्हें उखाड़ेगा कौन?”

“मशीन! ये मशीन से उखाड़ लिए जाते हैं और ट्रक पर लादकर ले जाया जाता है उन्हें। फिर रोप दिया जाता है।”

“हाँ… ऐसा क्या?”

“हाँ… ऐसा…! ऐसा होता है।” दूसरे लड़के का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया।

इधर यह सुनते ही अनाम पेड़ की पत्तियाँ हिलने लगीं। पेड़ भय से काँपने लगा। वह सोचने लगा क्या पता उसे भी उखाड़ लिया जाए? ना… ना…ऐसा न हो। ऐसा न हो… वह दिल में मनाने लगा। उसे उन दोनों लड़कों की बातों पर विश्वास हो गया था कि जब वे बोल रहे हैं तो सही ही बोल रहे हैं।

अब वह डर के मारे सहमा-सहमा रहने लगा था। न हवा अच्छी लगती थी, न अपने माहौल की कोई अन्य चीज। बस एक ही चिंता समाई हुई थी कि कहीं उसे उखाड़ न लिया जाए। उस लड़के के शब्द याद आ रहे थे… “हें! पेड़ लगेंगे कि पौधे लगते हैं?”

“पेड़… पेड़! पेड़ लगाए जा रहे हैं।”

“मशीन! ये मशीन से उखाड़ लिए जाते हैं… फिर रोप दिया जाता है।”

उसे दुख हुआ अपने अस्तित्व पर। उसके पास पैर नहीं… नहीं तो वह दौड़कर कहीं भाग जाता और छुप जाता।

और सचमुच वह दिन आ गया। उस दिन कुछ लोग आए और पेड़ों का चुनाव करने लगे। एक ने उसे देखकर कहा “अरे! यह देखो तो? यह कौन-सा पेड़ है?” कैसा खुबसूरत है? यहाँ इसे कौन देख रहा है?”

“हाँ सचमुच! ऐसा पेड़ मैंने नहीं देखा। इसकी पत्तियों का कटाव देखो और इसका हरापन देखो। …आखिर इसका नाम क्या है?”

“पता नहीं क्या है? …क्यों न इसे ही ले चलें?”

“नहीं, कहीं यह विरल जाति का पेड़ है उखड़ने से कही सूख न जाए!”

“नहीं इसे हम ध्यान से रोपेंगे और इसका ख्याल रखेंगे। यह सुनकर पेड़ रोने लगा। उसकी पत्तियाँ हिल-हिल कर छटपटाने लगीं। कुछ दिनों बाद वह ट्रक पर लदा हुआ भागा जा रहा था। बिना पैरों के ही दौड़ रहा था। गति… गति… गति… इतनी तेज गति। सारी पृथ्वी उसे घूमती हुई मालूम पड़ रही थी। उसे चक्कर आ रहे थे। एक जगह पहुँचकर रोपा गया उसे।

उसे दूसरी धरती मिली। बिना वर्षा के ही पानी मिल गया। अब वह खड़ा था एक सड़क के किनारे मनुष्य की गुलामी करता हुआ। उसकी सड़कों को ठंडक पहुँचाता हुआ। हरित महानगर के हरे सपने को पूरा करता हुआ। उसने कभी इस दिन की कल्पना भी न की थी। कहाँ पहले वह जी रहा था अपनी दुनिया में जहाँ उसे जरूरत न थी अन्य कुछ की। सब कुछ था उसके चारों ओर। अद्भुत प्रकृति और प्रकृति का लाड़-प्यार।

और कहाँ यह पंछियों और जीवों से शून्य लोहे और कंकड़-पत्थर की नगरी जहाँ रंग-बिरंगी गाड़ियाँ ही दौड़ रही थीं चारों ओर। उससे नजर उठी तो मनुष्य पर गई। कभी-कभार गायें और कुत्ते भी दिख जाते थे। परंतु सब जैसे अपनी मंजिल से दूर दीन-हीन बने भटक रहे हों। वह कहाँ आ गया था? यह कौन सी दुनिया थी?

वह याद करता पंछियों को, छोटे-छोटे प्राणियों को। पंछी यहाँ भी थे, पर ये दूसरे किस्म के थे। फिर वह हरी-भरी दुनिया, ठंडी बहती हुई हवा, उसकी छाया में सुस्ताते चौपाए, गरीब चरवाहे। उसके भाई-बंधु, आत्मीय पेड़-पौधे सब सपने हो गए। सड़क के किनारे खड़ा, वह प्रतिपल अपने अतीत को याद करता रहता था।

अंजना वर्मा

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नंदन पार्क – अंजना वर्मा

इस बार जोर की ठंड पड़ रही थी और सूरज भी कोहरे की लिहाफ ओढ़ कर सो गया था। कहाँ सब सोच रहे थे कि अब ठंड चली गई। समय भी तो उसके जाने का हो गया था, पर अब जाते-जाते वह अपना असली चेहरा दिखा रही थी। मेहनतकश लोगों में जवान लोग तो ठीक थे, बूढ़े और बच्चों के लिए मुश्किल हो गई थी। कई बुजुर्ग, पेड़ की पीली पत्तियों की तरह चुपचाप खिसक गए तो कई बूढ़े लोगों ने खाट पकड़ ली। इसी ठंड में हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी। लगातार दो दिनों से फूही बरसती रही। एक दिन छूटी भी तो तापमान नहीं बढ़ा। शंकर की माँ भी ठंड के कारण बीमार पड़ गई और उसका खाना-पीना सब छूट गया। जब वह खाँसने लगती तो खाँसते-खाँसते बेदम हो जाती। चौबीसों घंटे खाट के पास बोरसी लेकर बैठी रहती, क्योंकि उसे लगता था कि ठंडा उसकी हड्डियों में समा गया है। बोरसी न रहे तो उसकी जान ही निकल जाए!

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मुहल्ले वालों ने ठंड से निजात पाने के लिए सड़क के किनारे अलाव लगा लिया था। सवेरे-शाम वह धुधुआती हुई जल उठती। लकड़ी न रहती तो टायर, कूड़ा कुछ भी डाल दिया जाता। जो आता वह वहाँ बैठ जाता।

शंकर पेंटर था और यही काम करते हुए अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा था। खर्च की लगाम पकड़े रहता कि वह नियंत्रण से बाहर न हो जाए। हफ्ते-भर से वह घर में बैठा हुआ था। मौसम सही रहता तो वह अपने काम पर होता। पर ऐसे मौसम में जब सूरज के दर्शन न हों, काम कौन करवाता?

इसी ठंड में एक दिन वह पान-गुटखा खरीदने के लिए दुकान तक गया था – दोनों हाथ अपनी बगल में दबाए हुए, टोपी के ऊपर से मफलर बाँधे हुए ठंड से जैसे लड़ता हुआ। दुकान पर उसकी भेंट संजय से हो गई तो संजय ने चुटकी ली, क्यों शंकर? तू बोल रहा था न कि जाड़ा चला गया? यह क्या है? उस दिन जब तू चाची के लिए स्वेटर खरीद रहा था तो मैंने कहा था न कि अपने बच्चों के लिए भी स्वेटर खरीद दे तो तू यही कहकर टाल गया कि ठंड तो अब जा रही है। देख, कैसी ठंड घिर आई है। टीवी में बोल रहा था कि तापमान चार डिग्री तक पहुँच गया हैं। देख, वह दुगुने जोश के साथ लौट आई है।”

यह सुनकर शंकर झेंपते हुए बोला, “आई है तो रहेगी थोड़े ही न? अब कल से ही जाड़ा खत्म होने लगेगा, देखना।”

उसके बोलने का अंदाज ऐसा था कि संजय मुस्कुराने लगा और उसके साथ-साथ दुकानदार भी। गुटखे का आदी शंकर कुछ गुटखे के पैकेट लेकर चलता बना।

पान-गुटखे की दुकान से बाएँ ओर जो सड़क जाती थी, उसमें कामगार लोग रहते थे। उसकी दाएँ ओर की सड़क पर मध्यवर्गीय लोगों के मकान थे। उसी कतार में कुछ अपार संपदा से भरे धनाढ्यों के घर भी थे। बीच में एक पार्क था, जिसे पार्क नहीं मैदान ही कहना चाहिए। वह जमीन पार्क के लिए तो थी, पर अभी तक इस तरह की कोई शुरुआत न होने से कठोर बनी पसरी हुई थी। उस पर उगी हुई दूब शीत की मार झेलती हुई पीली और सूखी दिखाई देने लगी थी। इस पार्क में चहलकदमी करने वालों की कमी नहीं थी। सवेरे-सवेरे सैर या जॉगिंग करने वाले लोग इसका पूरा लाभ उठाते। इसकी खुली हुई हवा में जी-भरकर साँसें लेते, कई लोग आकर शांति से बैठते, तो कई योगाभ्यास, व्यायाम वगैरह करते। इन सबसे अलग कुछ ऐसे लोग भी थे जो इस हरी-भरी जमीन पर कुछ नहीं करते, बल्कि अपनी मेहनत और अपना समय बचाने के लिए अपने कदमों से इसे तिरछा या सीधा नापकर जल्दी-से-जल्दी उस पार पहुँच जाते। ले-देकर यह दो मुहल्लों के बीच का इकलौता दुलारा मैदान था।

इसी मैदान से सटा मंत्री जी का आलीशान बंगला था जिसके अहाते में उनकी कई गाड़ियाँ लगी रहती थीं। द्वार पर सिक्युरिटी तैनात रहते और ऊँचे फाटक के बाहर सड़क के किनारे पैरवीकारों की रंग-बिरंगी गाड़ियाँ मंत्री जी की शान में चार चाँद लगातीं रहतीं।

आज कितने दिनों बाद चमकदार धूप निकली थी और एक वृहत पैरेसॉल की तरह आसमान में छा गई थी। इसके पसरते ही चारों ओर चहल-पहल शुरू हो गई। कई दिनों से कमरे और घरों में दुबके हुए लोग बाहर निकल आए। मेहनतकशों की गली की जवान औरतें कमर में पल्लू खोंसकर अपने बच्चों के कपड़े और पोतड़े धो-धोकर सूखने के लिए अलगनी पर डालने लगीं। सड़कों पर आवा-जाही बढ़ गई। इतने दिनों से शिथिल पड़ा यातायात आज अचानक सक्रिय हो उठा जिससे सड़कों पर वाहनों का जाम लग गया।

शंकर की माँ सूरज की किरणें देखते ही बिछावन से उठकर बाहर छज्जे के नीचे धूप में आकर बैठ गई। सर्दियों में धूप का पीछा करने की उसकी पुरानी आदत थी, इस तरह कि धूप खिसकने के साथ-साथ उसकी चटाई भी खिसकती जाती थी तब तक, जब तक कि सूरज डूब नहीं जाता। इस शहर में वह शंकर के बुलाने से आई थी नहीं तो वह नहीं आती, ऐसे बेस्ट की कोठरी में उसका दम घुटने लगता था।

दस बज रहे थे और शंकर अभी भी बिस्तर में था। कोई और दिन होता तो उसके हाथों में ब्रश होता और वह उदास दीवारों को रंगीन बनाता हुआ उन्हें हँसाने की कोशिश में लगा होता। आज बिस्तर में धूप की छुअन मिल गई थी उसे और वह गरमाया पड़ा हुआ था। इस सर्दी में बहुत दिनों बाद ऐसा सुख मिल रहा था, नहीं तो एक कंबल में करवट बदलते और शरीर को सिकोड़ते हुए रात बीत जाती थी।

उसकी बीवी पूजा ने उसे झिंझोड़कर जगाया, “उठो न? कब तक सोये रहोगे?”

“छोड़, सोने दे मुझे।” पूजा ने छोड़ दिया। सचमुच कितनी मुश्किल से उसे सोने का समय मिलता है। फिर काम शुरू हो जाएगा तो वह न ढंग से सो पाएगा, न खा पाएगा।

शंकर बिस्तर में पड़े-पड़े अपनी बंद पलकों से भी कमरे के भीतर-बाहर फैली रोशनी का जाएजा लेता रहा। आज धूप उसकी कोठरी की मटमैली दीवारों को चमकाने के बाद वहीं पैर पसारकर बैठ गई है – यह एहसास उसके भीतर ऊर्जा भर रहा था।

वह आराम से ग्यारह बजे सोकर उठा जबकि उसकी आँखें स्वतः खुल गई। उसने उठकर गुटखा का एक पाउच मुँह के हवाले किया। स्वेटर पहनकर मफलर बाँधते हुए बाहर जाने लगा तो पूजा ने कहा, “अरे-अरे! उठकर सीधे कहाँ चल दिए?”

“तो क्या यहीं बैठा रहूँ? जरा एक चक्कर लगाकर आता हूँ। कुछ काम-धंधे के बारे में भी पता कर लूँ।”

इसके बाद किसी जवाब की आशा किए बिना वह सीधे बाहर निकल गया। वह जाएगा और अपने दोस्तों-परिचितों से इधर-उधर की बातें करेगा। यह एक चक्कर लगाना व्यर्थ नहीं होता था। इस तरह घूमते-फिरते वह काम की तलाश करता था। कोई संगी-साथी बता ही देता था कि फलाँ जगह एक पेंटर की जरूरत है।

यह मुहल्ला ऐसा था कि लोगों के आधे काम तो सड़कों पर ही होते थे। लकड़ियाँ हैं तो सड़कों पर सूखेंगी। बच्चे हैं तो सड़कों पर खेलेंगे। औरतें बाल झाड़ेंगी तो सड़कों पर बैठकर। बड़ियों और पापड़ की खटिया भी सड़कों के किनारे आधी सड़क घेरती हुई बिछेगी। एक कोठरी में कितना जीवन समा सकता है?

अभी कुछ दूर आगे बढ़ा तो रामबाग वाली चाची दिखाई पड़ीं जो कई दिनों से बीमार चल रही थीं। आज उनकी भी खाट बाहर धूप में बिछी थी जिस पर वह बैठी हुई थीं।

शंकर ने कहा, “पैर लागूँ चाची? अब कैसी हो?”

पप्पू को देखकर चाची ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कुरा न सकीं, नहीं तो वह मुस्कुरातीं और आशीर्वादों की झड़ी लगा देतीं। वह बस इतना बोल सकीं, “ठीक हूँ बेटा। आज ही तो उठकर बैठी हूँ। कई दिनों से बीमार थी। बड़ी सेवा की मेरी बहुओं ने। बेटा तो मुझे दूध-रोटी खिलाए बिना काम पर जाता न था। इन्हीं सबकी सेवा से उठ बैठी हूँ।”

शंकर सुनकर भीतर-ही-भीतर मुस्कुराया। बात-बात में अपने बेटे और बहुओं की तारीफ करना चाची की आदत थी। इतना कहने के बाद वह हाँफने लगीं और चुप हो गई।

शंकर मैदान से होकर गुजरने लगा तो उसने देखा कि आज वहाँ बच्चों का क्रिकेट चल रहा है। मेहनतकश मुहल्ले के सारे बच्चे अपने तन पर पुराना-धुराना, सिर्फ कहने-भर को गरम कपड़ा डाले मैदान में डटे हुए थे। उसके दोनों बच्चे मोहित और रोहित भी थे उसी वेशभूषा में। मोहित ने लकड़ी के एक पट्टे को बल्ला बनाया हुआ था और रोहित समेत सभी बाल खिलाड़ियों ने अपना मोर्चा सँभाल रखा था। जोश और मस्ती में कोई कमी न थी। वह देर तक खड़ा देखता रहा। बड़े अच्छे लग रहे थे ये खेलते हुए बच्चे!

घर पहुँचा तो देखा माँ की चटाई आगे खिसक आई है। वह उस पर बैठी धूप सेंक रही थी। उसने हाथ बढ़ाकर कहा, “चल माँ! तुझे वहाँ मैदान में बैठा दूँ। वहाँ दिन-भर धूप सेंकना। पूरी देह गरमा जाएगी।” उसकी माँ ने कहा, “ना रे बाबा! अभी तो मुझसे एक कदम भी न चला जाएगा। और तू सवेरे-सवेरे उठकर कहाँ चला गया था?”

“वो थोड़ा काम के चक्कर में निकला था, माँ!

यहाँ बित्ते-भर धूप के लिए चक्कर काट रही है माँ… शंकर ने सोचा। गाँव में जब वह था तो पैसे की कमी जरूर थी, पर धूप, हवा, पानी और आसमान इफराद थे। रोशनी, हवा और आसमान का अनंत विस्तार था। तब वह नहीं समझता था कि ये चीजें सिमट भी सकती हैं और अब वह देख रहा था कि इनका सिमटना कैसा होता है?

जब भी गाँव याद आता गाँव के पेड़ जरूर याद आते। वे लीची के बगीचे और उनमें धमाचौकड़ी! लीची की सबसे ऊँची टहनियों पर चढ़ने वाला वही हुआ करता था और चंद खट्टी इमलियों के लिए इमली के भुतहा कहे जाने वाले पेड़ों पर भी वही चढ़ता था। एक बार तो उसने लीची की डालियों में छुपकर माँ को खूब रुलाया था। माँ ने स्कूल न जाने के लिए उसे पीटा था। बस वह भी गुस्साकर लीची के पेड़ पर चढ़ गया और डालियों में छुपकर बैठा रहा। उधर उसकी माँ उसे घर में और आस-पास न देखकर गाँव में ढूँढ़ने निकली।

गाँव के एक-एक बच्चे और सयाने से घर-घर में झाँक-झाँककर, रास्ते-पैरे में रोक-रोककर पूछती रही। घंटों भटकने के बाद जब वह न मिला और कोई सकारात्मक उत्तर भी नहीं आया तो उसी पेड़ के नीचे बैठकर सुबक-सुबककर रोने लगी आँचल से आँखे पोंछते हुए। तब शंकर से न रहा गया। उसने ऊपर से एक लीची तोड़कर माँ के सामने गिरायी। माँ ने चेहरा उठाकर ऊपर देखा तो वह हँस रहा था। इधर माँ हँसने के बजाय फिर बिगड़ गई और बोली, “तूने कितना हैरान किया मुझे? तुझे समझ में आया कि मुझ पर क्या बीतेगी? शैतान कहीं का।”

फिर दो पलों में ही गुस्सा गायब हो गया और वह कोमल आवाज में बोली, “आ, उतर आ। अब न मारूँगी तुझे… आ जा बेटा!”

वह उतरा तो माँ ने उसे कलेजे से लगा लिया, “ऐसे कहीं रूठते हैं? मेरी तो जान ही निकल गई थी। तू कहीं चला जाएगा तो मैं क्या करूँगी रे?” और वह रोने लगी थी। वह अपने हाथों से माँ के आँसू पोंछने लगा। “अच्छा, चल अब खा ले। अभी तक भूखा है तू!” माँ बोली।

और तब माँ ने जो अपने हाथों से उसे रोटी खिलाई तो वह आज तक नहीं भूला उन प्यार-भरे कौरों का स्वाद! ऐसे तो अक्सर माँ के हाथों से खाते हुए वह यही सोचता था कि कैसा भी खाना हो, माँ के हाथों से इतना स्वादिष्ट क्यों हो जाता है? एक दिन तो वह पूछ भी बैठा था, “क्या माँ, तुम्हारे हाथों से कोई रस निकलकर खाने में मिल जाता है क्या? तुम्हारे हाथ से खाना इतना स्वादिष्ट क्यों हो जाता है?

माँ ने हल्की-सी चपत उसके गाल पर लगाते हुए कहा, “धत पगले! कैसी बातें करता है!” और वह हँसने लगी थी।

गाँव में उसने जितना मौज किया, वह यही सोचता कि आज के जमाने में वह उसके बच्चों को नसीब नहीं होगा। वे जान भी न पाएँगे कि खुली हवा और खुली धरती में स्वच्छंद विचरने का आनंद क्या होता है? उसने अपने भीतर कितनी शुद्ध हवा और कितनी धूप भरी थी! नदी में नहा-नहाकर उसने अपनी त्वचा को कितना सींचा था जल से? धूल-मिट्टी से भी। काम की तलाश में जब वह इस शहर में आया था तो यही बात उसे सबसे अधिक अखरी थी। एक छोटे-से ऐसे बेस्ट के कमरे में रहना और माँ के लिए एक और कमरा लेना। इसी में तो उसकी आय का अधिकांश निकल जाता था। ऊपर से हर मौसम में तबाही।

वह सोचता गाँव में प्रकृति जो दुख देती है तो उसका निदान भी साथ में उपस्थित कर देती है। गर्मी है तो हवा-पानी है, जाड़ा है तो धूप और आग है। शहर की सुख-सुविधाएँ सिर्फ पैसे वालों के लिए है, गरीबों के लिए नहीं। पहले तो मन बिल्कुल उचाट हो जाता था, पर अब तो उसे इसी माँद में जीने की आदत हो गई थी। पर वह नहीं चाहता था कि यह अँधेरा माँद उसके बच्चों को मिले। वह तो पिता के निधन के कारण पूरा पढ़ नहीं पाया। परंतु वह अपने बच्चों को पढ़ाने का संकल्प ले चुका था।

पर कैसे होगा यह सब? उसने सोचा था कि मोहित ओर रोहित को अच्छे स्कूल में पढ़ाएगा। परंतु स्कूल की फीस ही सुनकर पीछे हट गया था। हजारों रुपये महीने के खर्च हो जाएँगे। उस पर से जितना बड़ा स्कूल उतना ज्यादा ढीप-ढाप। एक बोरी किताबें, बढ़िया यूनिफॉर्म और तरह-तरह के ताम-झाम। ऊपर से समय-समय पर अभिभावकों से पैसे निकलवाने के लिए फरमान जारी हो जाएगा। उसका दिल बैठ गया था कि वह नहीं सकेगा। सरकारी स्कूल में पढ़ाए तो उल्टे कुछ पैसे भी मिल जाएँगे, साथ ही दिन का खाना मिलेगा सो अलग। अतः उसे सरकारी स्कूल में अपने बच्चों का नामांकन करवाना पड़ा था। ऐसे भी तो बच्चे पढ़ेंगे ही चाहे जैसा भी पढ़ें!

अब रोज ही मैदान में बच्चों की जमघट लगने-लगी। पर सूरज की किरणों से सुनहरे बने मैदान में इन बच्चों का खेलना-हँसना और चहकना वहाँ सैर करने वालों को जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें लग रहा था कि मैदान की गरिमा कहीं भंग हो गई है।

रोज की तरह ‘गंधा’ मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे। घूमने के दौरान उन्हें मलिक मिल गए। अपने भारी-भरकम छह फुट्टे शरीर से टावर की तरह हिलते हुए वे मलिक के पास पहुँचे और हलो कहकर जाते हुए मलिक को रोका।

“हलो मिस्टर मलिक! इधर इस मैदान को देख रहे हैं न आप?”

“हाँ… क्या? क्या हुआ?”

“क्या आपको नहीं लगता कि ये मैदान अब कुछ डर्टी हो गया? पहले कैसा था और अब कैसा हो गया है?”

“हाँ-हाँ, राइट। ठीक कहते हैं आप। यही तो मैं भी सोच रहा था कि इसकी सूरत अब क्यों बदल गई है? हम…!” कहकर माथे पर बल देते हुए मलिक ने चारों ओर नजरें दौड़ाई।

“आजकल उस गली के लड़के दिन-भर मैदान पर कब्जा जमाए रहते हैं। उसी की वजह से ये गंदगी हो गई है। अपना तो अब इधर आने का मन नहीं करता है। ये यंग लोग ही अच्छे हैं जो सीधे जिम चले जाते हैं।” गंधा ने कहा। इस पर मलिक बोले… “अब हमारी उम्र तो जिम जाने की नहीं रही?” कहकर मलिक हँसे तो गंधा को भी साथ में हँसना पड़ा।

अब मैदान में खेलने वाले बच्चों के चेहरे जहाँ खिले-खिले दिखाई देने लगे, वहीं सैर करने वालों के चेहरों पर चिड़चिड़ाहट चस्पाँ हो गई। गंधा घूमते-घूमते अक्सर कह उठते, “शिट्… कोई जगह ही नहीं बची हमारे लिए।” कहकर मुँह बना लेते।

एक दिन घूमते हुए उन्होंने शशिकांत सिंह से कहा, “मंत्री जी के यहाँ तो आपका आना-जाना है न शशिकांत जी?”

शशिकांत सिंह ने कहा, “हाँ… पर क्यों पूछ रहे हैं?” वह भी टहल रहे थे।

“तो ऐसा कीजिए, उनसे कहिए कि इन लड़कों का यहाँ खेलना बंद करवाए ताकि हम साफ-सुथरी हवा में साँस ले सकें। और भई, ऐसे भी, उनके आलीशान बंगले के पास ऐसा हुजूम क्या अच्छा लगता है?”

शशिकांत सिंह न जाने क्या सोचते हुए कुछ पलों तक चुप रहा, फिर बोला, “ठीक है। एक बार मैं यह बात उनके कान पर डाल दूँगा। फिर उनकी समझ में जैसा आएगा, वे करेंगे।”

गंधा ने एकदम से घिघियाकर कहा, “हाँ, भाई! आप इतना कह देना तो काम हो जाएगा। ये मैदान साफ हो जाएगा और हमारा माहौल भी बिगड़ने से बच जाएगा। आखिर हमारे भी बच्चे हैं…।”

मंत्रीजी को भी सुबह-सुबह टहलने की आदत थी और वे भी उसी मैदान में टहलते थे अपने लाव-लश्कर के साथ। कई लोग उनके आगे-पीछे रहते। उसी समय बहुत सारी इधर-उधर की बातें होतीं। वे भी इस बात को देख रहे थे कि उनके बंगले के पास ये फटेहाल बच्चे भाग-दौड़ करते रहते हैं। पर यह तो साक्षात जनता थी। इसके विरुद्ध जाना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा था। सोच रहे थे कि कोई बहाना मिले तो कुछ करें।

एक दिन वे टहल रहे थे – आगे-आगे मंत्री जी, उनके अगल-बगल दो बंदूकधारी और साथ में उन्हीं के साथ कदम से कदम मिलाते हुए कई लोग। एक भीड़ ही चल रही थी। शशिकांत ने दूर से ही हाथ जोड़कर पूरी विनम्रता के साथ झुककर अभिवादन किया और उनकी मंडली में चलने लगा। वे किसी से कुछ कह रहे थे। जब चुप हुए तो शशिकांत ने कहा, “सर जी! आजकल इस मैदान में दिन-भर हल्ला-गुल्ला होता रहता है और गंदगी बिखरी रहती है।”

“हाँ, सो तो है।”

“वे कामगार बस्ती के लड़के चले आते हैं और लगते हैं क्रिकेट खेलने। मैंने उन्हें कितनी बार मना किया। मैंने कहा कि देखो, मंत्री जी के बंगले के सामने मत हल्ला करो। पर वे मानें तब न?”

“अच्छा? आपने उन्हें मना किया था?”

“हाँ, सर जी!”

मंत्री जी भीतर से प्रफुल्लित हुए कि बच्चों को हटाने का उपाय खुद ही निकल आया।

शशिकांत ने फिर कहा, “सर जी! इस मैदान को एक खूबसूरत पार्क बनवा दीजिए। इससे पूरी शांति हो जाएगी और पर्यावरण भी साफ-सुथरा हो जाएगा सो अलग।”

यह सुनकर मंत्री जी बोले, “शशिकांत जी! आपने ठीक कहा। मैं भी यही सोच रहा था। मैं इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाता हूँ। पर्यावरण को शुद्ध रखना बहुत जरूरी है।”

इसके बाद मुश्किल से एक महीना बीता होगा कि एक दिन उस मैदान में कई लोग आ गए। वहाँ खेलते हुए बच्चों को वहाँ से हटने के लिए कहा गया। बच्चे मायूस होकर एक ओर खड़े हो गए और सहमे-सहमे देखने लगे कि अब यहाँ क्या होने जा रहा है? काम शुरू हो गया। कुछ लोग सफाई करने लगे। चारो ओर फेंसिंग की जाने लगी। फिर कुछ दिनों बाद एक हेड माली अपने साथ लुभावनी तस्वीरों वाली बागवानी की अँग्रेजी किताब लेकर आया। उसी के निर्देशन में कई लोग क्यारियाँ बनाने लगे।

बच्चे अभी भी आते और गुमसुम होकर देखते। किसी की हिम्मत नहीं होती थी कुछ पूछने की। उनका प्यारा मैदान एक पार्क बनने की प्रक्रिया में था।

वे रोज आते और देखकर चले जाते। पुरानी घास हटाकर विदेशी घास रोपी गई। क्यारियाँ बन गई तो उनमें फूलों के नन्हें-नन्हें पौधे लगा दिए गए। उसके बाद रोज कई-कई माली फूलों को सींचते और गोड़ते हुए दिखाई देते। फिर एक दिन एक बैनर भी लगा दिया गया – नंदन पार्क।

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा

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कौन तार से बीनी चदरिया

खामोश हवा अचानक गीत पर मृदंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, ”जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग”

सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई थी कि यह आवाज किसकी है? कौन आया होगा अभी? या कौन आ सकता है इन दिनों? देखा तो वे ही दोनों थीं खूब सजी-सँवरी और हाथों से तालियाँ बजा-बजाकर गा रही थीं। चेहरे पर पूरा श्रृंगार काजल से भरी आँखें और ललाट पर बड़ी-सी बिंदी, नाक में लौंग, कानों में लटकते हुए झुमके, गले में मोतियों की माला, माँग में सिंदूर और खूब चमक-दमक वाली सितारों जड़ी साड़ी। एक तो वही थी सुंदरी, जो कई बार शादी-ब्याह के मौके पर आकर नाच चुकी थी। बला की सुंदर थी और नाम भी था सुंदरी, लेकिन उसे बनाने वाला उस पर नर या नारी का लेबल चिपकाना भूल गया था। दूसरी साँवली नाक-नक्श की, पर साज-सज्जा वही। दोनों गाए जा रही थीं। आवाज बिना माइक के चारों ओर फैल रही थी। एक मृदंगिया उनके पास ही खड़ा मृदंग ठनका रहा था। उनका गीत कुछ देर तक चलता रहा। किरण सोच रही थी कि वह बाहर जाए न जाए ।

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बाहर तो निकलना ही था, पर कैसे? ”इतना नहीं, इतना लेंगी” वाले आक्रमण से निपटने की हिम्मत जुटा रही थी वह। खिड़की के पीछे चोर-सी छिपी हुई वह यही सोच रही थी कि उनका गाना बंद हो गया। कुछ समय के लिए फिजाँ खामोश हो गई। मियाँ-बीवी दोनों ने एक-दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए देखा। तभी सुनाई पड़ा कड़ी आवाज में दोनों में से कोई एक बोली, ”ये रानी जी! अरे बाहर तो जाओ। हम सबको पता चल गया है कि खुशियाली हुई है। चलो, नेग-निछावर निकालो। पोता खेलाए रही हो। जीए, जुग-जुग जीए।”

गाने-नाचने की आवाज सुनकर किरण की बहू भी आ गई थी अपने बच्चे को गोद में लेकर और साथ में बेटा भी। दोनों के चेहरों पर हँसी थी। मनोरंजन के इस अनोखे सान से उनकी देखा-देखी कभी ही कभी हो पाती थी। उन दोनों ने भी खिड़की से झाँका। अपनी बहू से किरण ने कहा, ”बच्चा लेकर न जाना बाहर। बच्चा ले लेंगी अपनी गोद में तो एक न सुनेंगी। अपनी माँग मनवाकर ही रहेंगी। और बच्चा जल्दी देंगी नहीं।” बहू की हँसती हुई मुख-मुद्रा अचानक गंभीर बन गई।

फिर सुनाई पड़ा, ”ये बहू जी!”

किरण ने झाँका सुंदरी बोल रही थी। बोलने के बाद थोड़ी देर तक इंतजार करती रही कि कोई निकले। जब कोई न निकला किरण और न सुशील ही, तो वह बोली, ”अरी कुसुम! चल गा।”

और फिर दोनों शुरू हो गई थीं। सतर्क मृदंगिया के सधे हाथ मृदंग पर फिर चलने लगे थे सुर-लहरी की छाया की तरह। उन दोनों की आवाज फिर गूँजने लगी थी, ”अँगने में जसोमति ठाढ़ि हैं गोदी में कन्हैया लिहले, गोदी में कन्हैया लिहले ना / ये चंदा आव ना अँगनवाँ के बीच हो कन्हैया मोरा रोयेले ना ।”

थोड़ी देर तक सुर-ताल में गाते रहने के बाद गाना बंद हो गया था। पुकार आने लगी थी, ”अरी ओ बहूजी! बाहर आओ न, काहे लुकाय रही हो? अगर नय आओगी तो हम ही आते हैं। ओ बाबूजी! बाहर आओ।”

यह सुनते ही सुशील घबरा गए कि कहीं दोनों भीतर न आ जाएँ। उन्होंने सुन रखा था कि वे पुरुषों से नहीं डरती उनकी देह से लिपट जाती हैं। इसी डर से भले लोग तुरंत पैसे निकालकर दे देते हैं। सुशील बोले, ”चलो, बाहर निकलो अब, नहीं तो वे भीतर आ जाएँगी।”

उनके बाहर आते ही एक अजीब समाँ गया। वे दोनों पूरे उल्लास के साथ फिर गाने लगी थीं। स्वरों में एक ऊर्जा घुल गई थी ”हमें पीर उठति है बालम हो-बालम हो बालम हो।”

अजीब भंगिमा के साथ सुंदरी साड़ी फहरा-फहराकर नाचने लगी थी। दूसरी न देखने में सुंदर थी, न नाचने में ही अच्छी, फिर भी अलसाई-सी इधर-उधर हाथ फेंककर नाच रही थी, जैसे नाचने का कोई उत्साह उसके पास न बचा हो। गीत खत्म कर दोनों उस दंपति के पास आ गई थीं, ”अरे! जरा बबुअवा को लाओ न! हम भी तो देखें! खेलाएँगे हम बबुआ को, आसीरबाद देंगे।”

ताली बजाकर साँवली वाली ने कहा था, ”अरे रानी! जीए तेरा लल्ला, जीए-लाख बरीस जीए।”

सुंदरी बोली, ”तो लाओ, दो हमें। पाँच हजार से कम न लेंगी।”

बड़ी देर से उनका नाचना-गाना देखकर अवाक बनी हुई किरण बोली, ”अच्छा-अच्छा, ठहरो! मैं लाती हूँ।”

मोल-भाव का हिसाब बैठाते हुए उसने घर के भीतर से लाकर एक हजार का नोट पकड़ाया तो बात न बनी। सुंदरी ने या कुसुम ने लेने के लिए हाथ भी नहीं उठाया।

सुंदरी बोली, ”अरे-अरे! ये क्या देइ रही हो?” कहकर आँखें नचाई।

कुसुम ने कहा, ”इतने से हम नहीं मानेंगी।”

सुंदरी बोली, ”तुम्हारे यहाँ खुशियाली है। चलो रानी, निकालो! हम रोज-रोज किसी के यहाँ नहीं जातीं। जब उपरवाला ऐसा दिन देता है तभी हम जाती हैं।”

कुसुम बोली, ”हम सबको तो तुम्हारा ही आसरा है। आजकल हम सबको कोई पूछता भी नहीं।” उसकी आवाज में दीनता घुली हुई थी।

किरण ने अपने ब्लाउज में छुपाया हुआ एक वैसा ही नोट बढ़ाया। दोनों नोटों को थामते हुए सुंदरी ने कहा, ”कम-से-कम एक पत्ता तो और दो।” उसका स्वर इस बार मुलायम था।

उसके कहने के साथ ही कुसुम बोली, ”हमारे अपने तो तुम्हीं सब हो, नाहीं त कौन है हमें देखने अउर पूछने वाला दीदी? देखो, तुम्हारे बगल में भी एक बच्चा हुआ है। उन सबने हमें केतना साड़ी-कपड़ा दिया है! पइसा भी दिया।”

यह कहने के बाद वह अपनी टोकरी पर पड़ा हुआ कपड़ा हटाकर दिखाने लगी थी जिसमें नई साड़ियाँ और कपड़े रखे हुए थे। किरण थोड़ा शरमा गई भीतर-ही-भीतर। बगल वाले ने इतना दिया तो उसे भी उससे कम तो नहीं देना चाहिए।

फिर कुछ खीझकर हजार का एक और नोट निकाला यह सोचते हुए कि ये जब तक मन-भर नहीं लेंगी, यहाँ से जाएँगी नहीं और तमाशा करती रहेंगी।

सुंदरी ने लपककर नोट पकड़ लिया। किरण की ठुड्डी पकड़कर बोली, ”जीयो दीदी, जीयो। बने रहें तुम्हरे पूत बना रहे तुम्हरा लल्ला। बाबू लखिया होए। भगवान दिन देवें अइसा कि हम बार-बार नाचें-गाए तुम्हारे दुआरे।”

इस तरह असीसती हुई दोनों चली गई। मृदंगिया भी मृदंग लिए उनके पीछे-पीछे चला गया। रास्ते में एक जगह रुककर सुंदरी ने मृदंगिया को पैसे पकड़ाए तो उसने अपनी अलग राह पकड़ ली।

पैदल चलते-चलते सुंदरी के चेहरे पर पसीने की बूँदें स्फटिक के दानों की तरह छलछला आई। वह रुक गई और कुसुम से बोली, ”का कहती हो? ऑटो ले लेवें?”

कुसुम बोली, ”काहे? अब थोड़ी दूर पर तो हइए है। अब निगचाने पर पइसा काहे को जियान करें? सुस्ताय लो तनका देर।”

दोनों एक पेड़ की छाया में बैठ गई। सुंदरी और कुसुम शहर के सीमांत पर रहती थीं। वहीं पर इनके जैसी कुछ और भी थीं जो नाच-गाकर अपना जीवन चलाती थीं। इनका न कोई लिंग था, न कोई जाति थी। सबका जीवन एक-सा था। एक-सी समस्या, एक ही जीवन-शैली।

सुंदरी बोली, ”कल जाना है माई से भेंट करने। कल सवेरे ही निकलेंगे। तुम भी चलिहो हमरा साथे।”

कुसुम कुछ नहीं बोली। चुप रहने का मतलब था ‘हाँ। कुसुम और सुंदरी की आपस में अच्छी पटती थी। दोनों दो सहेलियों की तरह, सहोदर बहनों की तरह रहती थीं। रिश्ते में रिश्ता यही एक था। थोड़ा सुस्ताने के बाद दोनों उठकर चल दी अपने बसेरे की ओर।

”सुना है तुम्हारे बहिन ‘पुत’ की शादी हो गई?” कुसुम ने सुंदरी से कहा।

”हाँ। बहिन अपनी नई-नवेली बहू को लेकर माई से मिलने आई है। उसके यहाँ शादी में माई जा नहीं सकी थी। सो उसे देखाने ले आई है। उससे मिलूँगी? पता नहीं। सोचा है शिवाला पर मिलूँ। लेकिन माई किसके साथ आएगी शिवाला पर? रेणु उसके साथ आवेगी तब तो भेंट होइए जाएगा। केकरो मालूम नए होना चाहिए कि हमारा माय है।” फिर ठहरकर बोली, ”बहिन तो शायद ना आ सकेगी मिलने। घर में पतोहू है। कोनो कुछो कह दिया कि तुम्हारी सास की एक खोजवा बहिन है तब? ना-ना। दूर ही से भेंट करौंगी, कहीं गाँव के बाहर। माई शिवाला में आएगी जो गाँव से तनिका दूर पर है। पर आएगी किसके साथ?”

इतना कहकर वह चुप हो गई जैसे कुछ सोचने लगी हो। फिर बोली, ”और क्या करना कुसुम बेसी हिलि-मिलि के? ओ सबके दुनिया अलग है, अउर हमर सबके दुनिया अलग। हाथ-पैर, मुँह-कान मानुस के समान होके भी हम मानुस में नहीं गिनाते हैं। ऐसे अच्छा होता कि हम कोनौ जनावरै जाति में जनम लेते चाहे मरद होते, चाहे मउगी। अभी हम क्या हैं? बताओ तो?”

यह कहने के बाद सुंदरी ने आँखों में पानी भरकर कुसुम की ओर देखा। उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें भादो के उमड़े तालों की तरह लग रही थीं, जिनका पानी काँपता रहता है। कुसुम उसी तरह निर्विकार थी, चुप। कोई उत्तर उसने नहीं दिया था। एक सूखा मौन पसरा था उसके चेहरे पर वैशाख का ताप।

फिर सुंदरी बोली, ”ये कुसुम! हमार ई शरीर कोनो काम का है क्या? चइला जैसा है देह! चढ़ जाएगा अगिन पर। कुसुम! तुम पहली बार जाओगी हमरे साथ हमरे गाँव। देखना मेरा घर कइसा है। जिसके भाग में जेतना लिखा रहता है न, ओतने मिलता है। मेरे भाग में क्या लिखा था? यही दुआरे-दुआरे नाचना। सो नाच रहे हैं। जिसके भाग में कोठा-अटारी रही, उसकै मिली। हमें तो कोई जानता भी नहीं कि हम किसकी कोख से जनमे? हमारे भीतर किस स्त्री-पुरुष का खून दौड़ रहा है? हमारे महतारी-बाप कौन हैं? पर कोई तो हैं? नाहीं तो यह देह नए होती। कौन जानना चाहता है? कोई चाहेगा तो भी ओके मालूम नहीं होने देंगे सब। आउर क्या करना? क्यों बताना? हम भी थोड़े कहेंगे? अपने महतारी-बाप का नाम नए हँसवाएँगे। कहना हमारा काम भी नहीं। अब तो जो हैं, जहाँ हैं वही सब कुछ। वही रास्ता हमारा। हमारा रास्ता अलग है सभी से। जाए रहे हैं माय को देखने। एगो ओही से माया-ममता है।” यह कहते हुए उसने आँखें पोंछी।

यह सुनकर कुसुम की आँखों से भी एक बूँद लुढ़की और गाल पर अटक गई। फिर सुंदरी बोली, ”और जानती हो? अब तो मन भी नहीं होता भेंट करने का? क्या करना है मिलके? हमैं सब त्याग दिए, भूल गए। एक बहिन है और एक भाई। मेरे बाद पहिले बहन रेनु हुई। ओकरा बाद गोपी। दोनों मेरे घर से निकल जाने के बाद हुए। उनको बचपन में, फिर एक बार जवान होने पर देखा था। फिर अबकी बार कहीं। फिर अब। नहीं – अब शायद देखना न हो पाएगा – इसके बाद। उ, अपना घर-दुआर में मगन है। दुलहा, बाल-बच्चा, खेत-पथार। हमको याद रखी होगी एक खिस्सा की तरह…। उसको बहुतै बाद में, होसमंद होने पर पता चला था कि एक उसकी बहिन है जो खोजवा है।”

कुसुम बोली, ”ये सुंदरी! तुमको तो उहो मालूम कि तुम्हारा जनमभूमि कहाँ है? मतारी-बाप कौन है? हमें तो ओहू नय पता। हम तो जानते ही नहीं कि कौन हमरा माय-बाप है? हम कौन हैं?”

फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद कुसुम बोली,”जाने दे सुंदर की। हम सबको उ, सब नहीं सोचना चाहिए। हमको भी तो उसी ने बनाया जिसने मरद-मानुस बनाया, जनी-जात बनाया। काहे सोच करैं हम? पेड़ में भी देख तो सब पेड़ों में फूल-बीज कहाँ होत है? हम भी हैं उसी तरह। लेकिन हैं तो उसी के हाथ के बनाए। वही रामजी हमें भी बनाए हैं।” कुसुम कभी-कभी उसको सुंदर की बोल देती थी।

”हाँ, पर कोन सोचता है अइसे? फिर हमें सबसे अलग क्यों रखा गया जैसे अछूत हैं हम? हमें कौन गुदानता है? रास्ते चलते सब देखिकै हँस देते हैं? का हम हँसने की चीज हैं?” सुंदरी बोली।

”नहीं मानेगा तो क्या हुआ? सच्चाई तो इहे है न कि हम भी भगवान के बनाए हुए हैं।”

”अपना को संतोष दे ले कुसुमी! बाकी सोच के देख कि पिलुआ-पतारी में भी एक ठो मरद होत है त एगो मउगी।” दुख से उसका चेहरा तमतमा उठा।

इसके बाद दोनों ही चुप हो गई। कोई शब्द न फूटा किसी के मुँह से।

दूसरे दिन सवेरे-सवेरे दोनों निकल पड़ीं। उन्होंने सुबह वाली रेल पकड़ ली थी कि रेल में गाते हुए जाएँगी। रास्ते में कुछ कमाई भी हो जाएगी। एक डब्बे में सुंदरी चढ़ी। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। दरवाजे से भीतर घुसकर जब बर्थ के पास पहुँचीं तो दोनों खड़ी हो गई। उन्हें देखकर कुछ लोग मुस्कुराने लगे। औरतें शरमा गई उनके चेहरे पर पसरी पुरुष की छाया देख। पुरुषों को उनके चेहरे में औरतों के चेहरे की मूर्ति दिख रही थी। इन दोनों अर्धनारीश्वरों को देखकर पूरा डब्बा कौतुक के मूड में आ गया था। एक छिपी-छिपी मुस्कुराहट सबके चेहरे पर तैरने लगी थी। सुंदरी ने आहत होकर कुसुम की ओर देखा जैसे कहती हो, ”देख – ये लोग कैसे मुस्कुरा रहे हैं!”

कुसुम को यह सब देखते हुए एक जमाना बीत चुका थाय क्योंकि वह उम्र में सुंदरी से काफी बड़ी थी। वह निर्विकार बनी रही। अभी तो पैसे कमाना जरूरी था। अतः सुंदरी ने एक फिल्मी गीत शुरू कर दिया। वह गाते हुए आगे-आगे चल रही थी। पीछे-पीछे कुसुम हाथ पसारे हुए चल रही थी। कुछ लोगों ने पैसे निकाले, परंतु कुछ कंजूस इन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहे थे और गंभीर बने बैठे थे कि कुछ देना न पड़े। गाते-गाते उनकी यह भाव-भंगिमा देखकर सुंदरी का दिल घृणा से भर गया – संवेदनहीन। ईश्वर ने सब कुछ दिया है। सारे अंग बनाकर भी ईश्वर इन लोगों के भीतर दिल रखना भूल गया। मन तो किया कुसुम से बोले, ”कुसुमी! ये जो मुँह छुपा रहे हैं, इनके आगे तो हाथ पसार मत।” लेकिन मजबूरीवश कुछ कह न पाई। वह देखती रह गई थी, कुसुम का हाथ उन पत्थरों के आगे भी पसरा हुआ था। नोट-सिक्के बटोरते हुए दोनों आगे बढ़ती चली रही थीं। डिब्बे का अंत आ गया तो सुंदरी ने कुसुम से पूछा, ”क्या कहती है? आगे चलें?”

यह कहने के बाद उसने अपने नकली उरोजों पर आँचल डालकर उन्हें इतनी हिफाजत से ढँक लिया था कि वैसे कोई स्त्री भी न करती। ऐसे उसके नारी-रूप की बराबरी करने वाली कोई न थी। कुसुम ने कहा, ”एक डिब्बा अउर देख लें।” यह कहते हुए दोनों अगले डब्बे की ओर चलीं।

कुसुम ने डब्बे में चढ़ते हुए कहा, ”अब हम गाते हैं।”

सुंदरी ने पूछा, ”कौन वाला गाओगी?”

कुसुम बोली, ”झूठी देखी प्रीत जगत की।”

सुंदरी बोली, ”फिर वही गितवा। अपन गीत रख अपने पास। भजन सुनिके इहाँ कोई पइसा न टसकाएगा। इन सालन के चटकदार गीत सुनाव, नैन मटक्का कर, तबही मिली पइसा। तू छोड़ दे। हम ही गाते हैं।”

यह सुनकर सदा शांत रहने वाली कुसुम की भी हँसी छूट गई। बोली, ”ठीक है। तो तू ही गा।”

सुंदरी ने दूसरा फिल्मी गीत शुरू किया। कुसुम के मन में वह भजन गूँजता रह गया जिसे गाने का वह मन बना चुकी थी, ”ऐसी देखी प्रीत जगत की” और जिसे अक्सर वह खुद के लिए गाती थी, खुद ही सुनती थी।

रेल रुकी तो दोनों उतरीं और गाँव जाने वाली बस में सवार हो गई। बस में खलासी और ड्राइवर की आँखें उन्हें वैसे ही घूर रही थीं, जैसे वे गर्म-गर्म जलेबियाँ हों। उन्हें देखकर सुंदरी ने हिकारत से मुँह चमकाकर घुमा लिया।

बस ने उन्हें गाँव के सीमांत पर उतार दिया। यहाँ से मिट्टी वाली सड़क थी जो गाँव तक जाती थी। उसके बाद खेतों की पगडंडी। दोनों चल दीं उस ओर। सुंदरी का मन हरे-भरे खेतों को देखकर हरा हो गया था। दिशाओं के पट खोलकर खुली हवा चली आ रही थी। दोनों के चेहरों पर ताजगी छा गई। सुंदरी का गोरा रंग खिलकर खूब चिकना और गुलाबी हो गया। दोनों ने पान खा लिया था। एक अजब उल्लास से भरी हुई दोनों चली जा रही थीं। खेतों की पगडंडी पर सँभाल-सँभालकर पैर डाल रही थीं। गाँव आने पर कुछ बच्चे, कुछ नौजवान इन्हें मुस्कुराकर देखने लगे थे। सब सोच रहे थे कि क्या बात है कि दोनों खोजवा चली आ रही हैं। किसी पर ध्यान न देते हुए सुंदरी ने कहा, ”चल अपने घर की ओर ले चलती हूँ। देखना। पर इहाँ किसी से मिलना नहीं है। सिर्फ जाना है अनजान बनकर।”

वे एक बड़े घर के बाहर पहुँची। वह घर पूरा संपन्न लग रहा था देखने से। कुसुम हैरत से देखती रह गई थी अपनी ठुड्डी पर ओठों के नीचे उँगली दबाएँ हुए। कुछ गर्व में भरकर सुंदरी ने उसे देखा। वे दोनों कुछ देर रुक गई वहाँ पर।

कुसुम बोल उठी, ”हाँ, बहुते हैं तुम्हारे माई-बाउजी।”

सुंदरी बोली, ‘त ओसे का? हमें क्या मिला उनका? बस, खाली जनम दिए। अउर त कुछो नाहीं। छोड़ – कुसुम।”

”तो माई से भेंट कैसे करोगी?”

”हाँ, शिवाला पर। बाकिर अभी जना तो दें कि हम आ गए हैं।”

वे दोनों अहाते के भीतर चली गई। सुंदरी अपने ही घर के भीतर जाने में ठिठक रही थी। कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे, लग रहा था जैसे किसी अपरिचित के आँगन में जा रही हो। उसने पहले बाहर से ही झाँका। एक औरत दिखाई दी। वह पहचान गई कि यह उसकी बहन रेनु थी जो अब बहुत बदल गई थी। उसकी देह गदरा गई थी और अब वह पूरी तरह से प्रौढ़ा दिखाई दे रही थी।

बहन को देखने के बाद वह आँगन के भीतर गई और नाटक करते हुए बोली, ”इहाँ पर सादी-ब्याह हुआ है? हमको मालूम हुआ।”

स्त्री-पुरुष के बीच की कड़ी आवाज सुनकर रेनु ने उलटकर देखा और उसके पास चली आई। अपनी किन्नर बहन को देखकर उसकी नजर में पहचान उभर आई। उस पहचान को उसने आवाज में घुलने से रोक दिया। पर खुशी की मुस्कुराहट बिखेरे बिना न रह सकी। बोली, ”हाँऽऽ, तुम लोग आ गई? अच्छा, माई से कहती हूँ।”

वह सामने वाली कोठरी में चली गई जहाँ उसकी माँ बैठी हुई थी पलंग पर। उसने कहा, ”माई! माया दीदी आई है।”

माया सुंदरी का वास्तविक नाम था, उसके माता-पिता द्वारा दिया हुआ। जिंदगी में वह क्षण कभी न आया कि वह अपने नाम को अपने माता-पिता द्वारा पुकारे जाते हुए सुनती। यह सुनते ही उसकी माँ बाहर आँगन में आई। पर सुंदरी को सामने खड़ी देखकर भी उसे संबोधित न कर सकी। क्या बोले, समझ नहीं पा रही थी। बस खड़ी देखती रही। आवाज मुँह तक आकर रुक गई थी। आँखों में खुशी के साथ एक बेबसी थी। सुंदरी ने ही कहा, ”सादी-ब्याह हुआ है। बहुरिया को दिखाओ। आसीरवाद दे देवें।”

सुंदरी आँगन में एक ओर खड़ी चारों ओर नजर दौड़ा रही थी कि परिवार का कोई सदस्य दिखाई दे जाए। पिता अब नहीं रहे थे। न भाई दिखाई दे रहा था और न ही बहन का बेटा। बहू तो कोठरी में होगी।

तभी अपनी पायल की झंकार से आँगन को गुँजाती हुई एक ओर से बहू आती दिखाई दी। उसके हाथों में कुछ खाने की सामग्री थी। सुंदरी की माँ का दिल तड़प रहा था कि वह सुंदरी को कलेजे से लगा ले। बुलाकर भीतर बैठाए। परंतु मजबूर थी। अतः खड़ी-खड़ी सारे दृश्य को निहार रही थी चुपचाप। कुछ न कह सकती थी। नौकर-दाई, नाते-रिश्ते सब जैसे छिपे हुए कैमरे थे। कहाँ क्या क्लिक हो जाए? सतर्क थी। दो महरियाँ आँगन में काम कर रही थीं। अभी उनकी नजर भी सुंदरी और कुसुम पर थी कि वे क्या करती हैं? क्या गाती हैं?

बहू सुंदरी के पास आई तो उसने कहा, ”आय-हाय! चाँद जैसी बहू उतार लाई हो। एहवात बना रहे बहू का। दूधे नहाय पूतों फले।”

सुंदरी ने अपना झोला फैलाकर कागज में बाँधी खाद्य-सामग्री ले ली। फिर जैसे उसने एलान किया, ”अब हम जा रही हैं शिवाला की ओर।” यह कहकर अर्थ-भरी आँखों से एक बार माँ को, फिर रेनु को देखा।

उसके बाद अपनी नजरें आँगन में चारो ओर दौड़ाई। बड़ा-सा आँगन। काम करती हुई महरियाँ। भरा-पूरा घर। फिर सूनी नजरों से माँ और बहन को देखते हुए मुँह घुमाकर बाहर निकल गई। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। उन दोनों के जाते ही एक महरी ने कहा, ”ये लो। ये तो बिना नाचे-गाए चली गई।”

”तो आई किसलिए थीं?” दूसरी ने कहा।

”हूँऽऽ देखो न!” दूसरी व्यंग्य से मुस्कुराई।

इस पर सुंदरी की माँ ने तड़पकर कहा,”बिचारियों ने कुछ नेग-निछावर भी तो नहीं लिया। आई, आशीर्वाद देकर चली गईं।”

घर से बाहर निकलकर सुंदरी और कुसुम कच्ची सड़क पर आई तो कुसुम ने पूछा, ”माई से कैसे मिलोगी? अभी तो देखा-देखी भी नए हुई ठीक से?”

”माने-मतलब से सुनाए तो दिया कि जा रहे हैं शिवाला पर। उँहें आएगी सब।”

दोनों एक निर्जन शिवालय पर पहुँच गई थीं जो गाँव के बाहर पड़ता था। वह शिवालय काफी प्राचीन था जिससे सटा हुआ एक विशाल बरगद का पेड़ था। दूर-दूर तक फैली उसकी डालियों से मोटी-मोटी जड़ें लटक-लटककर को छू रही थीं। गाँव के लोग कहते थे कि इस पर शंकर जी का साँप रहता है, जो काटता नहीं है, पर अक्सर आस-पास घूमता हुआ दिखाई दे जाता है। वहीं पास में एक कनेर का पेड़ था। दुनिया-भर के पीले फूल उसके नीचे झर-झर कर गिरे हुए थे।

मंदिर के आस-पास पसरी हुई नीरवता बरगद की घनी पत्तियों में छिपी चिड़ियों की निश्चिंत और निर्भय बतियाहट के स्वरों से टूट रही थी। कभी-कभी दूर से टेरते किसी पंछी का तेज स्वर सुनाई दे जाता। ऐसे तो सन्नाटे की झंकार ही गूँज रही थी।

कुसुम चली उसकी छाया में बैठने तो सुंदरी ने कहा, ”वहीं बैठेगी? शंकर जी के साँप से भेंट करेगी क्या?”

कुसुम डर गई, ”क्याऽऽ? साँप?”

”अरे नहीं कुछ नहीं बैठ, जहाँ मन करता हो। कुछ नए होगा।”

”नहीं-नही, चल मंदिरवा के ओसारे में। वहीं बैठेंगी।”

सुंदरी ने देखा वहाँ एक खूब साफ-सुथरा कुआँ है तो उसका मन कुएँ के गर्भ का पानी पीने के लिए मचल उठा। वह चल दी कुएँ से पानी निकालने। डोल कुएँ में गिराने लगी तो कुसुम भी चली आई। सुंदरी ने पानी का डोल ऊपर खींचा और बोली, ”पहिले तू पी ले पानी।”

कुसुम अपने पैरों पर बैठ गई और ओक से पानी पीने लगी। ऊपर से सुंदरी पानी गिरा रही थी। जब वह पीकर उठी तो उसकी जगह सुंदरी बैठ गई ओक मुँह तक ले जाकर। कुसुम डोल से पानी गिराकर उसे पानी पिलाने लगी। बहुत दिनों बाद शैवाल की महक वाला ठंडा पानी सुंदरी के कंठ से फिसलता हुआ कलेजे तक उतर रहा था। बहुत दिनों बाद पानी में बसे हरेपन के स्वाद से वह तृप्त हो गई। पीकर उसने डकार ली। फिर चल दी आँचल से मुँह पोंछती मंदिर के ओसारे में बैठने। दूर से आती हुई ठंडी हवा से दोनों की आँखें झपकने लगीं तो वहीं चादर बिछाकर दोनों लेट गई।

लेटे-लेटे सुंदरी कुसुम से बोली, ”हाँ तो तुम्हें साँप का खिस्सा नहीं मालूम न?”

”नाहीं।”

”इहाँ ई बरगद की जड़ी में एक जोड़ा नाग-नागिन रहता है कौना जमाना से, कोई नहीं जाने। कोई कहता है कि शंकर जी का साँप है तो कोई कहता है कि शंकरे जी हैं। पर एक बार तो हमहीं देखैं रहें। ठीक हमरा सामने छत्तर काढ़ के खड़ा हो गया। साक्षात भोले बाबा लेखन। बाकिर काटा-उटा नए, जैसे आसीरबाद दे रहा होय”

ऐसा कहते हुए सुंदरी के रोंगटे खड़े हो गए। उसने कहा, ”देख, हमरे रोएँ खड़े हो गए हैं। उ, भोले बाबा रहें और साथ में पारबत्ती जी। एक अउर साँप था।” कुसुम ने आश्चर्य से कहा, ”हूँ? बाप रे! हम तो डरिए जाते।”

”नाहीं, कौनो डर नाहीं – ईहा के कौनो लड़िका-बूढ़-जवान से पूछो। सबकै मालूम है ई बात। सब कहेगा हम ईहा देखा, उहाँ देखा। बाकि साँप आज तक केहुको काटा नए है। बड़ा जगता मंदिर है। भागे से कोई उ, साँप को देख पाता है।”

फिर तरह-तरह की बातें होने लगीं। कहते-सुनते कुछ समय बीता। तब सुंदरी ने सूने रास्ते की ओर देखा जिस पर दो स्त्री चली आ रही थीं।

वह बोली, ”देख, उहे, माय आय रही है। उसके साथ रेनु है। पता नहीं आज गोपी क्यों नहीं दिखाई दिया? बहिन पुत भी नहीं।”

उन दोनों के नजदीक पहुँचते ही वह उठी। पहले माँ से, फिर बहन से गले लगकर मिली।

वृद्धा ने पूछा, ”कैसी है तू माया? मेरी बेटी! तू आँगन में आई, पर मैं किसी से कह न सकी कि मेरा बच्चा आया है। तुझे आँगन में अजनबी की तरह खड़ा रहने दिया। बैठा न सकी। पानी तक के लिए पूछ न सकी तुझे। यही तो मेरा भाग्य है।” यह कहकर वह अपनी आँखों से निकलते हुए आँसुओं को पोंछने लगी।

”अच्छा-अच्छा! अब रोय मत। अभी थोड़ा देर हमरे साथ बोल-बतिया ले। रो नहीं। हमैं अच्छी तो हूँ। देखिए रही है।” सुंदरी अपनी माँ को मंदिर के ओसारे में बैठाते हुए बोली। उसे बैठाने के बाद उसके बगल में बैठ गई। रेनु भी वहीं बैठी हुई थी। थोड़ी दूर पर कुसुम थी। शायद यह दूरी उसने स्वयं बना ली थी कि उनकी आपसी बातों में उसके कारण कोई खलल न पहुँचे। सब खुलकर अपना दुख-सुख कह-सुन सकें। ”अच्छा, तू अपनै बारे में बता। तू एतना दुब्बर काहे होए गई है? हड्डी-हड्डी तो निकल आई है।” सुंदरी बोली।

”मुझे छोड़ दे। अब क्या करना है मुझे? उठ जाऊँ संसार से, अब तो यही चाहती हूँ। जीकर क्या करना है? अब सारी पिछली बातें याद आने लगी है।” वृद्धा बोली।

”क्या?”

”तुम्हें इतना रूप दिया भगवान ने, पर उसका माथा खराब हो गया था कि तुझे ऐसा बना दिया। फिर भी, जैसी भी थी रहती मेरे आँगन में। पर सब उठा ले गए मुझसे छल करके। मैं सो रही थी। हमेशा इसी डर से दरवाजा बंद करके सोती थी। उस दिन तुझे लेकर सोई तो आँख लग गई। किवाड़ खुले हुए थे। तभी सब उठा ले गए दे दिया तुम्हें खोजवा को अहँ… हँ… हँ…।” कहकर वह अपनी छाती पीटने लगी थी।

सुंदरी ने कहा, ”माई! भूल जा उ सब बात। जो हमरे किस्मत में था, सोई हुआ। किस्मत का लिखा ना मिटत है, माई। तू काहे रोती अउर छाती पीटती है? एमे तोहार दोस ना है।”

वृद्धा ने उसकी ठुड्डी पकड़ ली और कहा, ”अब तो जाने कब मिलना होगा। मैं रहूँ… न रहूँ।”

”नहीं-नहीं, ई सब मत बोल। हम फिर आएँगे भेंट करने।”

सुंदरी अपने झोले में से मिठाई का डब्बा निकाल लाई। माँ को देते हुए बोली, ”लो माई, बड़का दोकान से खरीदा है। खाना।”

बहन की ओर देखते हुए बोली, ”तुझे अब देख रही हूँ जब तुम्हारे बेटा का बियाह होय गया। चलो, देखकर संतोष तो हुआ। माई को देखना। गोपी तो है ही। पर तू भी देखना। हम तो रमता जोगी। संसार के माया-मोह से तो अभिए छूटि गए हैं… गोपी कइसा है? दिखाई नए दिया।”

”ठीक है। वह शहर गया है। सवेरे ही निकल गया।” रेनु बोली।

और ”राजू?”

‘वह भी साथ में गया है।”

”हमरा भागे खराब है। उसकी दुलहिन को तो देखे, बाकिर उसको नए देख सके। अब पता नहीं कब देख भी पाएँगे, कि नाहीं।” सुंदरी कुछ उदास होती हुई बोली।

”नहीं दिदिया, ऐसे क्यों कहती हो? देखोगी क्यों नहीं?”

”हाँ सायद कहीं देख पाए! पर कोय उम्मेद नाहीं।”

मंदिर के ओसारे पर ये तीन औरतें पास-पास बैठी रहीं। बातें जितनी हुर्इं, उससे अधिक स्नेह-भरी दृष्टि का लेन-देन हुआ। जितना कुछ कहा गया, उससे अधिक अनकहे को सुना और महसूसा गया। झिर-झिर हवा चल रही थी और एक अजीब शांति से नहाया हुआ था सब कुछ मंदिर, प्रांगण, बरगद, कनेर का पेड़, कुआँ और सामने कुछ दूर तक फैला हुआ मैदान।

अचानक सुंदरी उठी। अपना आँचल सँभालते हुए बोली, ”अच्छा माई! अब साँझ होय रही है। हमें बस पकड़ना है। तुझे भी घर जाना है। तू भी चलते-चलते थक जाएगी। धीरे-धीरे जाना। फिर मिलेंगे। कोनो बात का चिंता मत करना।”

उसकी माँ भी उठी। स्नेहकातर होकर अपने कमजोर हाथों से सुंदरी का गाल छूती हुई उसकी ठुड्डी पकड़कर उसे कई पलों तक देखती रही। कुछ बोल न सकी। सुंदरी ने माँ को पकड़ लिया और उसके गाल से अपना सटा लिया। माँ के गाल की गोरी कोमल त्वचा बुढ़ा के और भी कोमल लग रही थी सटने पर। सीने से चिपकी उसकी सूती साड़ी का मुलायम एहसास वह अपने कलेजे में सँजोती रही। अलग हुई तो देखा माँ रो रही थी। सुंदरी ने उसकी बुढ़ाई झुर्रीदार पलकों को उँगलियों से पोंछ दिया।

सुंदरी की माँ डगमगाते कदमों से सीढ़ियाँ उतरने लगी। उसके पैरों की डगमगाहट बुढ़ापे की कम और भावविह्वलता अधिक थी। रेनु ने उसे सँभाल रखा था। वह उसे पकड़कर ले जा रही थी। जब वे दोनों कुछ दूर निकल गई तो सुंदरी और कुसुम भी चल दीं अपनी राह पर।

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा

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