सनातन नदी : अनाम धीवर

भगवान् बुद्ध जब तरुण थे, जब उनकी तरुण प्रज्ञा काम, क्रोध, मोह के प्रति निरन्तर खड्गहस्त थी, तो उन्होंने उरुवेला में शिष्यों को पावक-दीप्त उपदेश दिया था, 'भिक्षुओ, आँखें जल रही हैं, यह सारा दृश्यमान जगत जल रहा है, देवलोक जल रहा है, यह जन्मान्तर प्रवाह जल रहा है। भिक्षुओ, यह कौन-सी सर्वभक्षी आग है... Continue Reading →

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सच बोलना ही कविता है !

प्रिय पुतुल, एक लंबे अंतराल के बाद तुम्‍हें पत्र लिखने चला हूँ। तुमने विगत पत्र में गांधीजी की साहित्‍य-दृष्टि के संबंध में कुछ लिखने को कहा था। देख पुतुल, गांधी जी कर्मयोगी थे। उन्‍होंने इस विषय पर अलग से कभी भी माथा-पच्‍ची नहीं की। परंतु जीवन-भर वे इस विषय के संदर्भ में यत्र-तत्र कहते रहे... Continue Reading →

भाषा बहता नीर

'भाषा बहता नीर'। भाषा एक प्रवाहमान नदी। भाषा बहता हुआ जल। बात बावन तोले पाव रत्ती सही। कबीर की कही हुई है तो सही होनी ही चाहिए। कबीर थे बड़े दबंग और उनका दिल बड़ा साफ था। अतः इस बात के पीछे उनके दिल की सफाई और सहजता झाँकती है, इससे किसी को भी एतराज... Continue Reading →

निषाद बाँसुरी

सप्तमी का चाँद कब का डूब चुका है। आधी रात हेल गयी है। सारा वातावरण ऐसा निरंग-निर्जन पड़ गया है गोया यह शुक्ला सप्तमी न होकर शुद्ध नष्ट-चंद्र निशा हो। अभी-अभी हमारी नाव 'झिझिरी' अर्थात् नौका-विहार खेलकर लौटी है। नाव को तट से बाँधकर चंदर भाई फिर 'गलई' अर्थात इसके अग्रभाग पर आ विराजते हैं... Continue Reading →

कुब्जा-सुंदरी

हमारे दरवाज़े की बगल में त्रिभंग-मुद्रा में एक टेढ़ी नीम खड़ी है, जिसे राह चलते एक वैष्णव बाबा जी ने नाम दे दिया था, 'कुब्जा-सुंदरी'। बाबा जी ने तो मौज में आकर इसे एक नाम दे दिया था, रात भर हमारे अतिथि रहे, फिर 'रमता योगी बहता पानी'! बाद में कभी भेंट नहीं हुई। परन्तु... Continue Reading →

उत्तराफाल्गुनी के आसपास

वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है उत्तराफाल्गुनी। हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन-मनभावन है, बड़ी मौज रहती है, परंतु सत्ताइसवें के आते-आते घनघोर भाद्रपद के अशनि-संकेत मिलने लगते हैं और तीसी के वर्षों में हम विद्युन्मय भाद्रपद के काम, क्रोध और मोह का तमिस्त्र सुख भोगते हैं। इसी काल में अपने-अपने स्वभाव के अनुसार हमारी सिसृक्षा... Continue Reading →

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