अंजाम-ए-नजीर

bloody rioting between Hindus and Muslims 2 Calcutta (Kolkata) 1946

बटवारे के बाद जब फ़िर्का-वाराना फ़सादात शिद्दत इख़्तियार कर गए और जगह जगह हिंदूओं और मुस्लमानों के ख़ून से ज़मीन रंगी जाने लगी तो नसीम अख़तर जो दिल्ली की नौ-ख़ेज़ तवाइफ़ थी अपनी बूढ़ी माँ से कहा “चलो माँ यहां से चलें”

बूढ़ी बाइका ने अपने पोपले मुँह में पानदान से छालिया के बारीक बारीक टुकड़े डालते हुए उस से पूछा “कहाँ जाऐंगे बेटा ”

“पाकिस्तान।” ये कह कर वो अपने उस्ताद ख़ानसाहब अच्छन ख़ान से मुख़ातब हूई।

“ख़ानसाहब आप का क्या ख़याल है यहां रहना अब ख़तरे से ख़ाली नहीं।”

ख़ानसाहब ने नसीम अख़तर की हाँ में हाँ मिलाई। “तुम कहती हो मगर बाई जी को मना लो तो सब चलेंगे।”

नसीम अख़तर ने अपनी माँ से बहुतर कहा। “कि चलो अब यहां हिंदूओं का राज होगा। कोई मुस्लमान बाक़ी नहीं छोड़ेंगे।”

बुढ़िया ने कहा “तो क्या हुआ। हमारा धंदा तो हिंदूओं की बदौलत ही चलता है और तुम्हारे चाहने वाले भी सब के सब हिंदू ही हैं मुस्लमानों में रख्खा ही क्या है”

“ऐसा न कहो। उन का मज़हब और हमारा मज़हब एक है। क़ैद-ए-आज़म ने इतनी मेहनत से मुस्लमानों के लिए पाकिस्तान बनाया है हमें अब वहीं रहना चाहिए।”

मांडू मीरासी ने अफ़ीम के नशा में अपना सर हिलाया और ग़नूदगी भरी आवाज़ में कहा।

“छोटी बाई। अल्लाह सलामत रख्खे तुम्हें क्या बात कही है। मैं तो अभी चलने के लिए तैय्यार हूँ मेरी क़ब्र भी बनाओ तो रूह ख़ुश रहेगी।”

दूसरे मीरासी थे वो भी तैय्यार होगए लेकिन बड़ी बाई दिल्ली छोड़ना नहीं चाहती थी बाला-ख़ाने पर उसी का हुक्म चलता था। इस लिए सब ख़ामोश हो गए।

बड़ी बाई ने सेठ गोबिंद प्रकाश की कोठी पर आदमी भेजा और उस को बुला कर कहा:

“मेरी बच्ची आजकल बहुत डरी हुई है। पाकिस्तान जाना चाहती थी। मगर मैंने समझाया। वहां किया धरा है। यहां आप ऐसे मेहरबान सेठ लोग मौजूद हैं वहां जा कर हम उपले थापेंगे आप एक करम कीजिए।”

सेठ बड़ी बाई की बातें सुन रहा था मगर उस का दिमाग़ कुछ और ही सोच रहा था। एक दम चौंक कर उस ने बड़ी बाई से पूछा।

“तू क्या चाहती है”

“हमारे कोठे के नीचे दो तीन हिंदूओं वाले सिपाहियों का पहरा खड़ा कर दीजिए ताकि बच्ची का सहम दूर हो।”

सेठ गोबिंद प्रकाश ने कहा। “ये कोई मुश्किल नहीं। मैं अभी जा कर सुपरिंटेंडेंट पुलिस से मिलता हूँ शाम से पहले पहले सिपाही मौजूद होंगे।”

नसीम अख़तर की माँ ने सेठ को बहुत दुआएँ दीं। जब वो जाने लगा तो उस ने कहा हम आप अपनी बाई का मुजरा सुनने आयेंगे।

बुढ़िया ने उठ कर ताज़ीमन कहा। “हाय जम जम आईए आप का अपना घर है बच्ची को आप अपनी क़मीस समझीए खाना यहीं खाईएगा।”

“नहीं मैं आज-कल परहेज़ी खाना खा रहा हूँ ” ये कह कर वो अपनी तोंद पर हाथ फेरता चला गया।

शाम को नसीम की माँ ने चाँदनियां बदलवाईं, गाव तकियों पर नए ग़िलाफ़ चढ़ाए, ज़्यादा रोशनी के बल्ब लगवाए आला क़िस्म के सिगरेटों का डिब्बा मंगवाने भेजा।

थोड़ी ही देर के बाद नौकर हवास-बाख़्ता हाँपता काँपता वापस आ गया। उस के मुँह से एक बात ना निकलती थी। आख़िर जब वो कुछ देर के बाद सँभला तो उस ने बताया कि “चौक में पाँच छः सिख्खों ने एक मुस्लमान ख़वांचा-फ़रोश को किरपाणों से उस की आँखों के सामने टुकड़े टुकड़े कर डाला है” जब उस ने ये देखा तो सर पर पांव रख कर भागा और यहां आन के दम लिया।

नसीम अख़तर ये ख़बर सुन कर बेहोश होगई। बड़ी मुश्किलों से ख़ानसाहब अच्छन ख़ान उसे होश में लाए मगर वो बहुत देर तक निढाल रही और ख़ामोश ख़ला में देखती रही। आख़िर उस की माँ ने कहा “खूनखराबे होते ही रहते हैं क्या इस से पहले क़तल नहीं होते थे।”

दम दिलासा देने के बाद नसीम अख़तर सँभल गई तो उस की माँ ने इस से बड़े दुलारावर प्यार से कहा।

“उठो मेरी बच्ची जाओ पिशवाज़ पहनो सेठ आते ही होंगे।”

नसीम ने बादल-ए-नख़्वास्ता पिशवाज़ पहनी सोला सिंघार किए और मस्नद पर बैठ गई उस का जी भारी भारी था। उस को ऐसा महसूस होता था। कि उस मक़्तूल ख़वांचा-फ़रोश का सारा ख़ून उस के दिल-ओ-दिमाग़ में जम गया है उस का दिल अभी तक धड़क रहा था वो चाहती थी कि ज़र्क़-बर्क़ पिशवाज़ की बजाय सादा शलवार क़मीस पहन ले और अपनी माँ से हाथ जोड़ कर बल्कि इस के पांव पड़ कर कहे कि “ख़ुदा के लिए मेरी बात सुनो और भाग चलो यहां से मेरा दिल गवाही देता है कि हम पर कोई न कोई आफ़त आने वाली है।”

बुढ़िया ने झुँझला कर कहा। “हम पर क्यों आफ़त आने लगी हम ने किसी का क्या बिगाड़ा है ”

नसीम ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया “उस ग़रीब ख़ुवांचा-फ़रोश ने किसी का क्या बिगाड़ा था जो ज़ालिमों ने उस के टुकड़े टुकड़े कर डाले। बिगाड़ने वाले बच जाते हैं। मारे जाते हैं जिन्हों ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा होता ”

“तुम्हारा दिमाग़ ख़राब होगया है।”

“ऐसे हालात में किस का दिमाग़ दुरुस्त रह सकता है। चारों तरफ़ ख़ून की नदियां बह रही हैं” ये कह कर वो उठी। बालकोनी में खड़ी होगई और नीचे बाज़ार में देखने लगी। उसे बिजली के खंबे के पास चार आदमी खड़े दिखाई दिए। जिन के पास बंदूक़ें थीं उस ने ख़ान अच्छन को बताया और वो आदमी दिखाए ऐसा लगता था कि वही सिपाही हैं जिन को सेठ ने भेजा होगा।

ख़ानसाहब ने ग़ौर से देखा।

“नहीं ये सिपाही नहीं। सिपाहियों की तो वर्दी होती है मुझे तो ये गुंडे मालूम होते हैं।”

नसीम अख़तर का कलेजा धक से रह गया गुंडे

“अल्लाह बेहतर जानता है। कुछ कहा नहीं जा सकता लो ये तुम्हारे कोठे की तरफ़ आ रहे हैं। देख नसीम किसी बहाने से ऊपर कोठे पर चली जाओ मैं तुम्हारे पीछे आता हूँ। मुझे दाल में काला नज़र आता है।”

नसीम अख़तर चुपके से बाहर निकली और अपनी माँ से नज़र बचा कर ऊपर की मंज़िल पर चली गई। थोड़ी देर के बाद ख़ानसाहब अच्छन ख़ान अपनी चिंधी आँखें झपकाता ऊपर आया और जल्दी से दरवाज़ा बंद कर के कुंडी चढ़ा दी।

नसीम अख़तर जिस का दिल जैसे डूब रहा था। ख़ानसाहब से पूछा।

“क्या बात है”

वही जो मैंने समझा था। “तुम्हारे मुतअल्लिक़ पूछ रहे थे कहते थे सेठ गोबिंद प्रकाश ने कार भेजी है और बुलवाया है।”

“तुम्हारी माँ बड़ी ख़ुश हुई बड़ी मेहरबानी है उन की। मैं देखती हूँ कहाँ है शायद ग़ुसलख़ाने में हो। इतनी देर में मैं तैय्यार हो जाऊं”

उन गुंडों में से एक ने कहा “तुम्हें क्या शहद लगा कर चाटेंगे बैठी रहो जहां बैठी हो ख़बरदार जो तुम वहां से हिलीं हम ख़ुद तुम्हारी बेटियों को ढूंढ निकालेंगे”

“मैंने जब ये बातें सुनीं और उन गुंडों के बिगड़े हुए तीवर देखे तो खिसकता खिसकता यहां पहुंच गया हूँ ”

नसीम अख़तर हवास बाख़्ता थी। “अब क्या किया जाये।?”

ख़ान ने अपना सर खुजाया और जवाब दिया “देखो मैं कोई तरकीब सोचता हूँ बस यहां से निकल भागना चाहिए।”

“और माँ ”

“इस के मुतअल्लिक़ मैं कुछ नहीं कह सकता उस को अल्लाह के हवाले कर के ख़ुद बाहर निकलना चाहिए ऊपर चारपाई पर दो चादरें पड़ी हुई थीं ख़ानसाहब ने उन को गांठ दे कर रस्सा सा बनाया और मज़बूती से एक कुंडे के साथ बांध कर दूसरी तरफ़ लटकाया नीचे लांड्री की छत थी वहां अगर वो पहुंच जाएं तो रास्ता आगे साफ़ है लांड्री की छत की सीढ़ियां दूसरी तरफ़ थीं उस के ज़रिये से वो तवीले में पहुंच जाते और वहां साईं से जो मुस्लमान था ताँगा लेते और स्टेशन का रुख़ करते।

नसीम अख़तर ने बड़ी बहादुरी दिखाई। आराम आराम से नीचे उतर कर लांड्री की छत तक पहुंच गई। ख़ानसाहब अच्छन ख़ान भी बहिफ़ाज़त तमाम उतर गए। अब वो तवीले में थे साईं इत्तिफ़ाक़ से तांगे में घोड़ा जोत रहा था दोनों इस में बैठे और स्टेशन का रुख़ किया मगर रास्ते में उन को मिल्ट्री का ट्रक मिल गया उस में मुसल्लह फ़ौजी मुस्लमान थे जो हिन्दुओं के ख़तरनाक महलों से मुस्लमानों को निकाल निकाल कर महफ़ूज़ मुक़ामात पर पहुंचा रहे थे जो पाकिस्तान जाना चाहते उन को स्पैशल ट्रेनों में जगह दिलवा देते।

ताँगा से उतर कर नसीम अख़तर और इस का उस्ताद ट्रक में बैठे और चंद ही मिनटों में स्टेशन पर पहुंच गए स्पैशल ट्रेन इत्तिफ़ाक़ से तैय्यार थी इस में उन को अच्छी जगह मिल गई और वो बख़ैरीयत लाहौर पहुंच गए यहां वो क़रीब क़रीब एक महीने तक वालटन कैंप में रहे। निहायत कसमपुर्सी की हालत में इस के बाद वो शहर चले आए नसीम अख़तर के पास काफ़ी ज़ेवर था जो उस ने उस रात पहना हुआ था जब सेठ गोबिंद प्रकाश इस का मुजरा सुनने आरहा था ये उस ने उतार कर ख़ानसाहब अच्छन ख़ान के हवाले कर दिया था इन ज़ेवरों में से कुछ बेच कर उन्हों ने होस्टल में रहना शुरू कर दिया लेकिन मकान की तलाश जारी रही आख़िर बदिक़्क़त-ए-तमाम हीरा मंडी में एक मकान मिल गया जो अच्छा ख़ासा था अब ख़ानसाहब अच्छन ख़ान ने नसीम अख़तर से कहा “गद्दे और चांदनियाँ वग़ैरा ख़रीद लें और तुम बिसमिल्लाह कर के मुजरा शुरू कर दो।”

नसीम ने कहा। “नहीं ख़ानसाहब मेरा जी उकता गया है मैं तो उस मकान में भी रहना पसंद नहीं करती किसी शरीफ़ मुहल्ले में कोई छोटा सा मकान तलाश कीजिए। कि मैं वहां उठ जाऊं मैं अब ख़ामोश ज़िंदगी बसर करना चाहती हूँ।”

ख़ानसाहब को ये सुन कर बड़ी हैरत हुई। “क्या होगया है तुम्हें”

“बस जी उचाट हो गया है मैं इस ज़िंदगी से किनारा-कशी इख़्तियार करना चाहती हूँ दुआ कीजिए ख़ुदा मुझे साबित क़दम रख्खे” ये कहते हुए नसीम की आँखों में आँसू आगए।

ख़ानसाहब ने उस को बहुत तरग़ीब दी पर वो टस से मस न हुई एक दिन उस ने अपने उस्ताद से साफ़ कह दिया कि वो “शादी कर लेना चाहती है अगर किसी ने उसे क़बूल न किया तो वो कुंवारी रहेगी।”

ख़ानसाहब बहुत हैरान था। कि नसीम में ये तबदीली कैसे आई फ़सादात तो इस का बाइस नहीं हो सकते फिर क्या वजह थी कि वो पेशा तर्क करने पर तुली हुई है।

जब वो उसे समझा समझा कर थक गया तो उसे एक मुहल्ले में जहां शुरफ़ा रहते थे एक छोटा सा मकान ले दिया और ख़ुद हीरा मंडी की एक मालदार तवाइफ़ को तालीम देने लगा। नसीम ने थोड़े से बर्तन ख़रीदे एक चारपाई और बिस्तर वग़ैरा भी एक छोटा लड़का नौकर रख लिया और सुकून की ज़िंदगी बसर करने लगी पांचों नमाज़ें पढ़ती।

रोज़े आए तो उस ने सारे के सारे रख्खे एक दिन वो ग़ुसलख़ाने में नहा रही थी कि सब कुछ भूल कर अपनी सुरीली आवाज़ में गाने लगी उस के हाँ एक और औरत का आना जाना था नसीम अख़तर को मालूम नहीं था कि ये औरत शरीफ़ों के मुहल्ले की बहुत बड़ी फफा कटनी है शरीफ़ों के मुहल्ले में कई घर तबाह-ओ-बर्बाद कर चुकी है कई लड़कियों की इस्मत औने पौने दामों बिकवा चुकी है कई नौ-जवानों को ग़लत रास्ते पर लगा कर अपना उल्लू सीधा करती रहती है जब उस औरत ने जिस का नाम जन्नते है नसीम की सुरीली और मँझी हुई आवाज़ सुनी तो उस को फ़ौरन ख़याल आया कि उस लड़की का आग़ा है ना पीछा

बड़ी मार्के की तवाइफ़ बन सकती है चुनांचे उस ने उस पर डोरे डालने शुरू कर दिए उस को उस ने कई सबज़ बाग़ दिखाए मगर वो उस के क़ाबू में न आई आख़िर उस ने एक रोज़ उस को गले लगाया और चट चट उस की बलाऐं लेना शुरू कर दीं। “जीती रहो बेटा। मैं तुम्हारा इम्तिहान ले रही थी तुम इस में सोला आने पूरी उतरी हो।” नसीम अख़तर उस के फ़रेब में आगई एक दिन उस को यहां तक बता दिया कि “वो शादी करना चाहती है क्योंकि एक यतीम कुंवारी लड़की का अकेले रहना ख़तरे से ख़ाली नहीं होता।”

जन्नते को मौक़ा हाथ आया। उस ने नसीम से कहा। “बेटा ये क्या मुश्किल है मैंने यहां शादियां कराई हैं सब की सब कामयाब रही हैं अल्लाह ने चाहा तो तुम्हारे हस्ब-ए-मंशा मियां मिल जाएगा जो तुम्हारे पांव धो धो कर पिएगा।”

जन्नते कई फ़र्ज़ी रिश्ते लाई मगर उस ने उन की कोई ज़्यादा तारीफ़ न की आख़िर में वो एक रिश्ता लाई जो उस के कहने के मुताबिक़ फ़िरिश्ता सीरत और साहिब-ए-जायदाद था नसीम मान गई तारीख़ मुक़र्रर की गई और उस की शादी अंजाम पा गई।

नसीम अख़तर ख़ुश थी कि उस का मियां बहुत अच्छा है उस की हर आसाइश का ख़याल रखता है लेकिन उस दिन उस के होश-ओ-हवास गुम होगए जब उस को दूसरे कमरे से औरतों की आवाज़ें सुनाई दीं दरवाज़े में से झांक कर उस ने देखा कि उस का शौहर दो बूढ़ी तवाइफ़ों से उस के मुतअल्लिक़ बातें कर रहा है जन्नते भी पास बैठी थी। सब मिल कर उस का सौदा तय कर रहे थे उस की समझ में न आया क्या करे और क्या न करे बहुत देर रोती सोचती रही आख़िर उठी और अपनी पिशवाज़ निकाल कर पहनी और बाहर निकल कर सीधी अपने उस्ताद अच्छन ख़ान के पास पहुंची और मुजरे के साथ साथ पेशा भी शुरू कर दिया एक इंतिक़ामी क़िस्म के जज़्बे के तहत वो खेलने लगी।

सआदत हसन मंटो

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1919 की एक बात

मंटो

ये 1919-ई- की बात है भाई जान जब रौलट ऐक्ट के ख़िलाफ़ सारे पंजाब में एजीटेशन हो रही थी। मैं अमृतसर की बात कररहा हूँ। सर माईकल ओडवायर ने डीफ़ैंस आफ़ इंडिया रूल्ज़ के मातहत गांधी जी का दाख़िला पंजाब में बंद कर दिया था। वो इधर आरहे थे कि पलवाल के मुक़ाम पर उन को रोक लिया गया और गिरफ़्तार करके वापस बमबई भेज दिया गया। जहां तक में समझता हूँ भाई जान अगर अंग्रेज़ ये ग़लती न करता तो जलीयाँ वाला बाग़ का हादिसा उस की हुक्मरानी की स्याह तारीख़ में ऐसे ख़ूनीं वर्क़ का इज़ाफ़ा कभी न करता।

क्या मुस्लमान, किया हिंदू, क्या सिख, सब के दिल में गांधी जी की बेहद इज़्ज़त थी। सब उन्हें महात्मा मानते थे। जब उन की गिरफ़्तारी की ख़बर लाहौर पहुंची तो सारा कारोबार एक दम बंद होगया। यहां से अमृतसर वालों को मालूम हुआ, चुनांचे यूं चुटकियों में मुकम्मल हड़ताल होगई।

कहते हैं कि नौ अप्रैल की शाम को डाक्टर सत्य पाल और डाक्टर किचलू की जिला वतनी के अहकाम डिप्टी कमिशनर को मिल गए थे। वो उन की तामील के लिए तैय्यार नहीं था। इस लिए कि उस के ख़्याल के मुताबिक़ अमृतसर में किसी हैजान-ख़ेज बात का ख़तरा नहीं था। लोग पुरअम्न तरीक़े पर एहितजाजी जल्से वग़ैरा करते थे। जिन से तशद्दुद का सवाल ही पैदा नहीं होता था। मैं अपनी आँखों देखा हाल बयान करता हूँ। नौ को रामनवमी था। जलूस निकला मगर मजाल है जो किसी ने हुक्काम की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक क़दम उठाया हो, लेकिन भाई जान सर माईकल अजब औंधी खोपरी का इंसान था। उस ने डिप्टी कमिशनर की एक ना सुनी। इस पर बस यही ख़ौफ़ सवार था कि ये लीडर महात्मा गांधी के इशारे पर सामराज का तख़्ता उल्टने के दर पे हैं, और जो हड़तालें होरही हैं और जल्से मुनअक़िद होते हैं उन के पस-ए-पर्दा यही साज़िश काम कर रही है।

डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्य पाल की जिला वतनी की ख़बर आनन फ़ानन शहर में आग की तरह फैल गई। दिल हर शख़्स का मुकद्दर था। हर वक़्त धड़का सा लगा रहता था कि कोई बहुत बड़ा हादिसा बरपा होने वाला है, लेकिन भाई जान जोश बहुत ज़्यादा था। कारोबार बंद थे। शहर क़ब्रिस्तान बना हुआ था, पर इस क़ब्रिस्तान की ख़ामोशी में भी एक शोर था। जब डॉ किचलू और सत्य पाल की गिरफ़्तारी की ख़बर आई तो लोग हज़ारों की तादाद में इकट्ठे हुए कि मिल कर डिप्टी कमिशनर बहादुर के पास जाएं और अपने महबूब लीडरों की जिला वतनी के अहकाम मंसूख़ कराने की दरख़ास्त करें। मगर वो ज़माना भाई जान दरख़ास्तें सुनने का नहीं था। सर माईकल जैसा फ़िरऔन हाकिम-ए-आला था। उस ने दरख़ास्त सुनना तो कुजा लोगों के इस इजतिमा ही को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया।

अमृतसर…….वो अमृतसर जो कभी आज़ादी की तहरीक का सब से बड़ा मर्कज़ था। जिस के सीने पर जलीयाँ वाला बाग़ जैसा क़ाबिल-ए-फ़ख़्र ज़ख़्म था। आज किस हालत में है?…….लेकिन छोड़ीए इस क़िस्से को। दिल को बहुत दुख होता है। लोग कहते हैं कि इस मुक़द्दस शहर में जो कुछ आज से पाँच बरस पहले हुआ उस के ज़िम्मेदार भी अंग्रेज़ हैं। होगा भाई जान, पर सच्च पूछिए तो इस लहू में जो वहां बहा है हमारे अपने ही हाथ रंगे हुए नज़र आते हैं। ख़ैर!…….

डिप्टी कमिशनर साहब का बंगला सिविल लाईन्ज़ में था। हर बड़ा अफ़्सर और हर बड़ा टोडी शहर के इस अलग थलग हिस्से में रहता था……. आप ने अमृतसर देखा है तो आप को मालूम होगा कि शहर और सिविल लाईन्ज़ को मिलाने वाला एक पुल है जिस पर से गुज़र कर आदमी ठंडी सड़क पर पहुंचता है। जहां हाकिमों ने अपने लिए ये अर्ज़ी जन्नत बनाई हुई थी।

हुजूम जब हाल दरवाज़े के क़रीब पहुंचा तो मालूम हुआ कि पुल पर घोड़ सवार गोरों का पहरा है। हुजूम बिलकुल न रूका और बढ़ता गया। भाई जान मैं इस में शामिल था। जोश कितना था, मैं बयान नहीं कर सकता, लेकिन सब निहत्ते थे। किसी के पास एक मामूली छड़ी तक भी नहीं थी। असल में वो तो सिर्फ़ इस ग़रज़ से निकले थे कि इजतिमाई तौर पर अपनी आवाज़ हाकिम-ए-शहर तक पहुंचाएं और उस से दरख़ास्त करें कि डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्य पाल को ग़ैरमशरूत तौर पर रहा करदे। हुजूम पुल की तरफ़ बढ़ता रहा। लोग क़रीब पहुंचे तो गोरों ने फ़ायर शुरू करदिए। इस से भगदड़ मच गई। वो गिनती में सिर्फ़ बीस पच्चीस थे और हुजूम सैंकड़ों पर मुश्तमिल था, लेकिन भाई गोली की दहश्त बहुत होती है। ऐसी अफ़रातफ़री फैली कि अलामां। कुछ गोलीयों से घायल हुए और कुछ भगदड़ में ज़ख़मी हूए।

दाएं हाथ को गंदा नाला था। धक्का लगा तो मैं इस में गिर पड़ा। गोलीयां चलनी बंद हुईं तो मैंने उठ कर देखा। हुजूम तित्र बित्तर हो चुका था। ज़ख़मी सड़क पर पड़े थे और पुल पर गोरे खड़े हंस रहे थे। भाई जान मुझे क़तअन याद नहीं कि उस वक़्त मेरी दिमाग़ी हालत किस क़िस्म की थी। मेरा ख़्याल है कि मेरे होश-ओ-हवास पूरी तरह सलामत नहीं थे। गंदे नाले में गिरते वक़्त तो क़तअन मुझे होश नहीं था। जब बाहर निकला तो जो हादिसा वक़ूअ पज़ीर हुआ था, उस के ख़द्द-ओ-ख़ाल आहिस्ता आहिस्ता दिमाग़ में उभरने शुरू हुए।

दूर शोर की आवाज़ सुनाई दे रही थी जैसे बहुत से लोग ग़ुस्से में चीख़ चिल्ला रहे हैं। मैं गंदा नाला उबूर कर के ज़ाहिरा पीर के तकीए से होता हुआ हाल दरवाज़े के पास पहुंचा तो देखा कि तीस चालीस नौजवान जोश में भरे पत्थर उठा उठा कर दरवाज़े के घड़ियाल पर मार रहे हैं। इस का शीशा टूट कर सड़क पर गिरा तो एक लड़के ने बाक़ीयों से कहा। “चलो……. मलिका का बुत तोड़ें!”

दूसरे ने कहा। “नहीं यार…….कोतवाली को आग लगाऐं!”

तीसरे ने कहा। “और सारे बैंकों को भी!”

चौथे ने उन को रोका। “ठहरो……. इस से किया फ़ायदा…….चलो पुल पर उन लोगों को मारें।”

मैंने उस को पहचान लिया। ये थैला कंजर था……. नाम मोहम्मद तुफ़ैल था मगर थैला कंजर के नाम से मशहूर था। इस लिए कि एक तवाइफ़ के बतन से था। बड़ा आवारागर्द था। छोटी उम्र ही में उस को जोय और शराबनोशी की लत पड़ गई थी। इस की दो बहनें शमशाद और अलमास अपने वक़्त की हसीन-तरीन तवाइफ़ें थीं। शमशाद का गला बहुत अच्छा था। उस का मुजरा सुनने के लिए रईस बड़ी बड़ी दूर से आते थे। दोनों अपने भाई के करतूतों से बहुत नालां थीं। शहर में मशहूर था कि उन्हों ने एक क़िस्म का उस को आक़ कर रखा है। फिर भी वो किसी न किसी हीले अपनी ज़रूरीयात के लिए उन से कुछ न कुछ वसूल कर ही लेता था। वैसे वो बहुत ख़ुशपोश रहता था। अच्छा खाता था, अच्छा पीता था। बड़ा नफ़ासतपसंद था। बज़्लासंजी और लतीफ़ा गोई मिज़ाज में कोट कोट के भरी थी। मीरासियों और भांडों के सोक़याना पन से बहुत दूर रहता था। लंबा क़द, भरे भरे हाथ पांव, मज़बूत कसरती बदन। नाक नक़्शे का भी ख़ासा था।

पुरजोश लड़कों ने उस की बात न सुनी और मलिका के बुत की तरफ़ चलने लगे। उस ने फिर उन से कहा। “मैंने कहा मत ज़ाए करो अपना जोश। इधर आओ मेरे साथ……. चलो उन को मारें जिन्हों ने हमारे बेक़सूर आदमीयों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है……. ख़ुदा की क़सम हम सब मिल कर उन की गर्दन मरोड़ सकते हैं…….चलो!”

कुछ रवाना हो चुके थे। बाक़ी रुक गए। थैला पुल की तरफ़ बढ़ा तो उस के पीछे चलने लगे। मैंने सोचा कि माओं के ये लाल बेकार मौत के मुँह में जा रहे हैं। फव्वारे के पास दुबका खड़ा था। वहीं मैंने थैले को आवाज़ दी और कहा। “मत जाओ यार…….क्यों अपनी और उन की जान के पीछे पड़े हो।”

थैले ने ये सुन कर एक अजीब सा क़हक़हा बुलंद किया और मुझ से कहा। “थैला सिर्फ़ ये बताने चला है कि वो गोलीयों से डरने वाला नहीं।” फिर वो अपने साथीयों से मुख़ातब हुआ। “तुम डरते हो तो वापस जा सकते हो।”

ऐसे मौक़ों पर बढ़े हुए क़दम उल्टे कैसे हो सकते हैं। और फिर वो भी उस वक़्त जब लीडर अपनी जान हथेली पर रख कर आगे आगे जा रहा हो। थैले ने क़दम तेज़ किए तो इस के साथीयों को भी करने पड़े।

हाल दरवाज़े से पुल का फ़ासिला कुछ ज़्यादा नहीं……. होगा कोई साठ सत्तर गज़ के क़रीब…….थैला सब से आगे आगे था। जहां से पुल का दोरौया मुतवाज़ी जंगला शुरू होता है, वहां से पंद्रह बीस क़दम के फ़ासले पर दो घुड़सवार गोरे खड़े थे। थैला नारे लगाता जब बंगले के आग़ाज़ के पास पहुंचा तो फ़ायर हुआ, मैं समझा कि वो गिर पड़ा है…….लेकिन देखा कि वो उसी तरह…….ज़िंदा आगे बढ़ रहा है। उस के बाक़ी साथी डर के भाग उठे हैं। मुड़ कर उस ने पीछे देखा और चिल्लाया। “भागो नहीं…….आओ!”

उस का मुँह मेरी तरफ़ था कि एक और फ़ायर हुआ। पलट कर उस ने गोरों की तरफ़ देखा और पीठ पर हाथ फेरा……. भाई जान नज़र तो मुझे कुछ नहीं आना चाहिए था, मगर मैंने देखा कि उस की सफ़ैद बोसकी की क़मीज़ पर लाल लाल धब्बे थे……. वो और तेज़ी से बढ़ा, जैसे ज़ख़्मी शेर……. एक और फ़ायर हुआ। वो लड़खड़ा या मगर एक दम क़दम मज़बूत करके वो घर सवार गोरे पर लपका और चशमज़दन में जाने क्या हुआ……. घोड़े की पीठ ख़ाली थी। गोरा ज़मीन था और थैला इस के ऊपर……. दूसरे गोरे ने जो क़रीब था और पहले बौखला गया था, बिदकते हुए घोड़े को रोका और धड़ा धड़ फ़ायर शुरू करदिए……. इस के बाद जो कुछ हुआ मुझे मालूम नहीं। मैं वहां फव्वारे के पास बेहोश हो कर गिर पड़ा।

भाई जान जब मुझे होश आया तो में अपने घर में था। चंद पहचान के आदमी मुझे वहां से उठा लाए थे। उन की ज़बानी मालूम हुआ कि पुल पर से गोलीयां खा कर हुजूम मुश्तइल होगया था। नतीजा इस इश्तिआल का ये हुआ कि मलिका के बुत को तोड़ने की कोशिश की गई। टाउन हाल और तीन बैंकों को आग लगी और पाँच या छः यूरोपीयन मारे गए। ख़ूब लूट मची।

लूट खसूट का अंग्रेज़ अफ़िसरों को इतना ख़्याल नहीं था। पाँच या छः यूरोपीयन हलाक हुए थे इस का बदला लेने के लिए चुनांचे जलीयाँ वाला बाग़ का ख़ूनीं हादिसा रौनुमा हुआ। डिप्टी कमिशनर बहादुर ने शहर की बाग दौड़ जनरल डावर के सपुर्द करदी। चुनांचे जनरल साहिब ने बारह अप्रैल को फ़ौजीयों के साथ शहर के मुख़्तलिफ़ बाज़ारों में मार्च किया और दर्जनों बेगुनाह आदमी गिरफ़्तार किए। तेराह को जलीयाँ वाला बाग़ में जलसा हुआ। क़रीब क़रीब पच्चीस हज़ार का मजमा था। शाम के क़रीब जनरल डावर मुसल्लह गोरों और सिखों के साथ वहां पहुंचा और निहत्ते आदमीयों पर गोलीयों की बारिश शुरू करदी।

उस वक़्त तो किसी को नुक़्सान जान का ठीक अंदाज़ा नहीं था। बाद में जब तहक़ीक़ हुई तो पता चला कि एक हज़ार हलाक हुए हैं और तीन या चार हज़ार के क़रीब ज़ख़मी…….लेकिन मैं थैले की बात कररहा था……. भाई जान आँखों देखी आप को बता चुका हूँ……. बे-ऐब ज़ात ख़ुदा की है। मरहूम में चारों ऐब शरई थे। एक पेशा तवाइफ़ के बतन से था मगर जियाला था……. मैं अब यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस मलऊन गोरे की पहली गोली भी उस के लगी थी। आवाज़ सुन कर उस ने जब पलट कर अपने साथीयों की तरफ़ देखा था, और उन्हें हौसला दिलाया था जोश की हालत में उस को मालूम नहीं हुआ था कि उसकी छाती में गर्मगर्म सीसा उतर चुका है। दूसरी गोली उस की पीठ में लगी। तीसरी फिर सीने में…….मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो इस के दोनों हाथ उस की गर्दन में इस बरी तरह पैवस्त थे कि अलाहिदा नहीं होते थे……. गोरा जहन्नुम वासिल हो चुका था…….

दूसरे रोज़ जब थैले की लाश कफ़न दफ़न के लिए उस के घर वालों के सपुर्द की गई तो उस का बदन गोलीयों से छलनी होरहा था…….दूसरे गोरे ने तो अपना पूरा पिस्तौल उस पर ख़ाली कर दिया था……. मेरा ख़्याल है उस वक़्त मरहूम की रूह क़फ़स-ए-उंसुरी से परवाज़ कर चुकी थी। इस शैतान के बच्चे ने सिर्फ़ उस के मुर्दा जिस्म पर चांद मारी की थी।

कहते हैं जब थैले की लाश मुहल्ले में पहुंची तो कुहराम मच गया। अपनी बिरादरी में वो इतना मक़बूल नहीं था, लेकिन उस की क़ीमा क़ीमा लाश देख कर सब धाड़ें मार मार कर रोने लगे। उस की बहनें शमशाद और अलमास तो बेहोश होगईं। जब जनाज़ा उठा तो इन दोनों ने ऐसे बीन किए कि सुनने वाले लहू के आँसू रोते रहे।

भाई जान, मैंने कहीं पढ़ा था कि फ़्रांस के इन्क़िलाब में पहली गोली वहां की एक टखयाई के लगी थी। मरहूम मुहम्मद तुफ़ैल एक तवाइफ़ का लड़का था। इन्क़िलाब की इस जद्द-ओ-जहद में इस को जो पहली गोली लगी थी दसवीं थी या पचासवें। इस के मुताल्लिक़ किसी ने भी तहक़ीक़ नहीं की। शायद इस लिए कि सोसाइटी में इस ग़रीब का कोई रुतबा नहीं था। मैं तो समझता हूँ पंजाब के इस ख़ूनीं ग़ुसल में नहाने वालों की फ़हरिस्त में थैले कंजर का नाम-ओ-निशान तक भी नहीं होगा……. और ये भी कोई पता नहीं कि ऐसी कोई फ़हरिस्त तैय्यार भी हुई थी।

सख़्त हंगामी दिन थे। फ़ौजी हुकूमत का दौर दौरा था। वो देव जिसे मार्शल ला कहते हैं। शहर के गली गली कूचे कूचे में डकारता फिरता था। बहुत अफ़रातफ़री के आलम में उस ग़रीब को जल्दी जल्दी यूं दफ़न किया गया जैसे उस की मौत उस के सोगवार अज़ीज़ों का एक संगीन जुर्म थी जिस के निशानात वो मिटा देना चाहते थे।

बस भाई जान थैला मर गया। थैला दफ़ना दिया गया और…….और ये कह कर मेरा हमसफ़र पहली मर्तबा कुछ कहते कहते रुका और ख़ामोश होगया। ट्रेन दनदनाती हुई जा रही थी। पटड़ियों की खटाखट ने ये कहना शुरू कर दिया। थैला मर गया…….थैला दफ़ना दिया गया…….थैला मर गया…….थैला दफ़ना दिया गया। इस मरने और दफ़नाने के दरमयान कोई फ़ासिला नहीं था, जैसे वो इधर मरा और उधर दफ़ना दिया गया। और खट खट के साथ इन अलफ़ाज़ की हम-आहंगी कुछ इस क़दर जज़्बात से आरी थी कि मुझे अपने दिमाग़ से इन दोनों को जुदा करना पड़ा। चुनांचे मैंने अपने हम-सफ़र से कहा। “आप कुछ और भी सुनाने वाले थे?”

चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा। “जी हाँ……. इस दास्तान का एक अफ़सोसनाक हिस्सा बाक़ी है।”

मैंने पूछा। “क्या?”

उस ने कहना शुरू किया। “मैं आप से अर्ज़ कर चुका हूँ कि थैले की दो बहनें थीं। शमशाद और अलमास। बहुत ख़ूबसूरत थीं। शमशाद लंबी थी। पतले पतले नक़्श। ग़लाफ़ी आँखें। ठुमरी बहुत ख़ूब गाती थी। सुना है ख़ां साहब फ़तह अली ख़ां से तालीम लेती रही थी। दूसरी अलमास थी। उस के गले में सुर नहीं था, लेकिन बतावे में अपना सानी नहीं रखती थी। मुजरा करती थी तो ऐसा लगता था कि इस का अंग अंग बोल रहा है। हर भाव में एक घात होती थी……. आँखों में वो जादू था जो हर एक के सर पर चढ़ के बोलता था।”

मेरे हम-सफ़र ने तारीफ़-ओ-तौसीफ में कुछ ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लिया। मगर मैंने टोकना मुनासिब न समझा। थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद इस लंबे चक्कर से निकला और दास्तान के अफ़सोनाक हिस्से की तरफ़ आया। “क़िस्सा ये है भाई जान कि इन आफ़त की परकाला दो बहनों के हुस्न-ओ-जमाल का ज़िक्र किसी ख़ुशामदी ने फ़ौजी अफ़िसरों से कर दिया……. बल्वे में एक मेम…….क्या नाम था उस चुड़ैल का?

…….मिस…….मिस शरवड मारी गई थी…….तय ये हुआ कि उन को बुलवाया जाये और……. और……. जी भर के इंतिक़ाम लिया जाये……. आप समझ गए ना भाई जान?”

मैंने कहा। “जी हाँ!”

मेरे हम-सफ़र ने एक आह भरी “ऐसे नाज़ुक मुआमलों में तवाइफ़ें और कसबीयाँ भी अपनी माएं बहनें होती हैं……. मगर भाई जान ये मुल्क अपनी इज़्ज़त-ओ-नामूस को मेरा ख़्याल है पहचानता ही नहीं। जब ऊपर से इलाक़े के थानेदार को आर्डर मिला तो वो फ़ौरन तैय्यार होगया। चुनांचे वो ख़ुद शमशाद और अलमास के मकान पर गया और कहा कि साहब लोगों ने याद किया है। वो तुम्हारा मुजरा सुनना चाहते हैं…….भाई की क़ब्र की मिट्टी भी अभी तक ख़ुशक नहीं हुई थी। अल्लाह को प्यारा हुए उस ग़रीब को सिर्फ़ दो दिन हुए थे कि ये हाज़िरी का हुक्म सादिर हुआ कि आओ हमारे हुज़ूर नाचो……. अज़िय्यत का इस से बढ़ कर पुर-अज़िय्यत तरीक़ा क्या हो सकता है…….? ……. मुस्तबइद तम्सख़ुर की ऐसी मिसाल मेरा ख़्याल है शायद ही कोई और मिल सके……. क्या हुक्म देने वालों को इतना ख़्याल भी न आया कि तवाइफ़ भी ग़ैरत मंद होती है? …….हो सकती है…….क्यों नहीं हो सकती?” उस ने अपने आप से सवाल किया, लेकिन मुख़ातब वो मुझ से था।

मैंने कहा। “हो सकती है!”

“जी हाँ” …….थैला आख़िर इन का भाई था। उस ने किसी क़िमार ख़ाने की लड़ाई भिड़ाई में अपनी जान नहीं दी थी। वो शराब पी कर दंगा फ़साद करते हुए हलाक नहीं हुआ था। उस ने वतन की राह में बड़े बहादुराना तरीक़े पर शहादत का जाम पिया था। वो एक तवाइफ़ के बतन से था। लेकिन वो तवाइफ़ माँ थी और शमशाद और अलमास उसी की बेटियां थीं और ये थैले की बहनें थीं……. तवाइफ़ें बाद में थीं……. और वो थैले की लाश देख कर बेहोश होगई थीं। जब उस का जनाज़ा उठा था। तो उन्हों ने ऐसे बीन किए थे कि सुन कर आदमी लहू रोता था…….

मैंने पूछा। “वो गईं?”

मेरे हम-सफ़र ने इस का जवाब थोड़े वक़फ़े के बाद अफ़्सुर्दगी से दिया। “जी हाँ……. जी हाँ गईं……. ख़ूब सज बन कर।” एक दम उस की अफ़्सुर्दगी तीखा पन इख़्तियार करगई। “सोला सिंगार करके अपने बुलाने वालों के पास गईं…….कहते हैं कि ख़ूब महफ़िल जमी……. दोनों बहनों ने अपने जौहर दिखाए……. ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ों में मलबूस वो कोह-ए-क़ाफ़ की परियां मालूम होती थीं…….शराब के दौर चलते रहे और वो नाचती गाती रहीं…….ये दोनों दौर चलते रहे …….और कहते हैं कि…….रात के दो बजे एक बड़े अफ़्सर के इशारे पर महफ़िल बरख़ास्त हुई…….” वो उठ खड़ा हूआ और बाहर भागते हुए दरख़्तों को देखने लगा।

पहीयों और पटड़ियों की आहनी गड़गड़ाहट की ताल पर इस के आख़िरी दो लफ़्ज़ नाचने लगे। “बरख़ास्त हुई…….बरख़ास्त हुई।”

मैंने अपने दिमाग़ में उन्हें, आहनी गड़गड़ाहट से नोच कर अलाहिदा करते हुए उस से पूछा। “फिर क्या हुआ?”

भागते हुए दरख़्तों और खंबों से नज़रें हटा कर उस ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा। “उन्हों ने अपनी ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ें नोच डालें और अलिफ़ नंगी होगईं और कहने लगीं…….लो देख लो……. हम थैले की बहनें हैं……. उस शहीद की जिस के ख़ूबसूरत जिस्म को तुम ने सिर्फ़ इस लिए अपनी गोलीयों से छलनी छलनी किया था कि उस में वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी……. हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं…….आओ, अपनी शहवत के गर्मगर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो……. मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुँह पर थूक लेने दो……. ”

ये कह कर वो ख़ामोश होगया। कुछ इस तरह कि और नहीं बोलेगा। मैंने फ़ौरन ही पूछा। “फिर क्या हुआ?”

उस की आँखों में आँसू डबडबा आए। “उन को……. उन को गोली से उड़ा दिया गया।”

मैंने कुछ न कहा। गाड़ी आहिस्ता होकर स्टेशन पर रुकी तो उस ने क़ुली बुला कर अपना अस्बाब उठवाया। जब जाने लगा तो मैं ने उस से कहा। “आप ने जो दास्तान सुनाई, इस का अंजाम मुझे आप का ख़ुद साख़्ता मालूम होता है।”

एक दम चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा। “ये आप ने कैसे जाना?”

मैंने कहा। “आप के लहजे में एक नाक़ाबिल-ए-बयान कर्ब था।”

मेरे हम-सफ़र ने अपने हलक़ की तल्ख़ी थोक के साथ निगलते हुए कहा। “जी हाँ…….उन हराम……. ” वो गाली देते देते रुक गया। “उन्हों ने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया।” ये कह कर वो प्लेटफार्म पर उतर गया।

11-12अक्तूबर1951-ई-

 
सआदत हसन मंटो