भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है

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डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है. यह हिंदू शासकों के लिए भी उतना ही सही है, जितना कि मुस्ल‍िम शासकों के लिए. अतीत के लिए भी, आज के लिए भी.

ग़ौरी, गज़नवी, चंगीज़, तैमूर, दुर्रानी, अब्दाली जैसे मुस्ल‍िम आक्रांता लूटखसोट की फ़िराक़ में थे. हिंदुस्तान पर राज करने की उनकी नीयत ना थी.

ख़ास तौर पर 1739 में पहले नादिर शाह और फिर 1761 में अहमद शाह ने तो हिंदुस्तान की केंद्रीय सल्तनत को उसके घुटनों पर झुका दिया था.

अनेक इतिहासकारों को अचरज होता है कि नादिर शाह महज़ “तख़्तेताऊस” की लूट से ही ख़ुश था, जबकि चाहता तो हिंदुस्तान की बादशाहत उसके नाम होती!

चंगीज़ो तैमूर के वंशज बाबर ने अपने लश्कर का रुख़ हिंदुस्तान की ओर इसलिए मोड़ा था, क्योंकि समरकन्द को जीतने में वो लगातार नाकाम रहा था. लेकिन चंगीज़ो तैमूर के उलट उसने हिंदुस्तान में खूंटा गाड़ दिया, जैसे उससे पहले गाड़ा था मामलूक़ों, तुग़लकों, खिलजियों और लोदियों ने.

लेकिन अवाम?

इतिहासकार इस समूची परिघटना को “कॉन्क्वेस्ट” के तर्क के साथ याद रखते हैं और निहायत ग़ैरसहानुभूतिपूर्ण तरीक़े से अवाम के अंतर्तम पर बात करने से इनकार करते हैं.

जिसकी तलवार, उसका ज़ोर!
जिसकी लाठी, उसकी भैंस!

तब सदियों तक चले “हिंदू जेनोसाइड” की तो बात ही क्या करें, जब कश्मीर में पंडितों के जेनोसाइड को ही रद्द करने के लिए महाकविगण कमर कसे हों!

ये तमाम सिलसिला जैसे भुला देने लायक़ हो और “प्रतिशोध के काव्य-न्याय” का, “सामूहिक अवचेतन की तुष्टि” का यहाँ कोई महत्व ही ना हो, जिसे कि “सामाजिक न्याय” की व्यवस्था की धुरी माना गया!

हुक़ूमत और अवाम के रिश्तों को लेकर लोहिया की बात सही है और “ग्रेट मुग़ल्स” के राज में भी हिंदुस्तान में “ह्यूमन राइट्स इंडेक्स” बहुत ऊपर चला गया हो, वैसा नहीं था.

अकबर के राज में बहुत अमन था, कलाओं का बहुत विस्तार था, गंगा जमुनी का स्वर्णकाल था, ऐसा कहते हैं, लेकिन हिंदू बहुसंख्य समाज यवनों के राज में मनोवैज्ञानिक रूप से मुतमईन कैसे रह सकता था? हमारा इतिहास इस मनोवैज्ञानिक बेचैनी का अध्ययन करने के बजाय उस पर संगीन चुप्पी साध लेता है.

आज अगर अरब देशों पर कोई हिंदू या यहूदी राजा अधिकार कर ले और बेहतर सुशासन स्थापित कर दे, तो क्या वहां के मुसलमान इस पर राज़ी ख़ुशी से रहेंगे?

आज़ादी की लड़ाई में “गंगा जमुनी” का “पर्सपेक्टिव” बदल गया था और अब वे दोनों मिलकर एक “साझा दुश्मन” से लड़ रहे थे. तो क्या उस साझा दुश्मन का वजूद ही उस भाईचारे का परिप्रेक्ष्य था? और अगर, वह शत्रु परिदृश्य से हट जाए तो?

आज़ादी के समय हिंदू मुसलमान दोनों ही समान रूप से ग़रीब और पसमंदा इसलिए भी थे कि अधिकतर मुसलमान तो “कनवर्टेड” थे. वे वही थे, जो उनसे पहले हिंदू हुआ करते थे, और हुक़ूमत के मेवे उन तक नहीं पहुँचे थे.

आज अकसर भारतीय मुसलमान कहते हैं कि हम तो “कनवर्टेड” हैं, इसलिए हम तो इसी देश के मूल निवासी हैं. लेकिन यह बात 1947 में उनको याद क्यों नहीं आई थी, जब उन्होंने अपना अलग मुल्क मांगा था?

मुझे बार बार लगता है हिंदुस्तान का इतिहास एक नए “नॉन सेकुलर” और “मोर एनालायटिकल पर्सपेक्टिव” के साथ लिखे जाने की ज़रूरत है.

हमें एक भ्रामक इतिहास पढ़ाया जाता रहा है.

“अ पोलिटिकली मोटिवेटेड एंड अपोलोजेटिक रीडिंग ऑफ़ हिस्ट्री”. इसको दुरुस्त करना ज़रूरी है!

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सुशोभित सक्तावत

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फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है…पढ़िए पूरा मामला

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फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है। इलाहाबाद में एसएससी की तैयारी करता है। अपना खर्चा निकालने के लिए लक्ष्मी टाकीज के पास चिकन रोस्ट की दुकान लगाता है। दुकान की आमदनी से अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ घर वालों को भी पैसे भेजता है। घर वालों को इस बारे में कुछ नहीं पता है। पहली बार जब उसने पैसे बचाकर १५ हज़ार रुपए में ठेला लिया था तो वो दूसरे दिन ही चोरी हो गया था। पहले दिन की कमाई मात्र तीस रुपए थी। लेकिन लड़के ने हार नहीं मानी। उसने तय किया कि अब वो ये जरूर कर के रहेगा। कुछ महीने बाद उसने किराए के ठेले पर फिर से दुकान शुरू की। अब महीने में अच्छी खासी कमाई कर लेता है।

अनुभव पूछने पर बता रहा था कि शुरू में ये सब करने में शर्म आती थी। बाद में उसे यह एहसास हुआ कि मेहनत करना और आत्मनिर्भर होना शर्म की बात नहीं है।

उसके प्रेरणाश्रोत उसके गुरु है जिससे उसने यह काम सीखा है। वह दिल्ली में यही काम करते थे। आज वह सेंट्रल गवर्मेंट में अच्छी खासी नौकरी करते हैं। नौकरी के साथ पुराना काम भी देखते हैं। दिल्ली में उनकी तीन शटर की दुकान है जहां हर तरह के नानवेज आईटम मिलते हैं। दुकान से महीने में लगभग ५ लाख रुपए की कमाई होती है। कर्मचारियों की सैलरी देने के बाद ४ लाख बचते हैं। कर्मचारी के रूप में ऐसे लड़के रखे और प्रशिक्षित किए जाते हैं – जो जरूरतमंद और पढ़ने लिखने वाले होते हैं ।

यह देखकर अच्छा लगा कि भारत में इस तरह का बिजनेस और स्टडी कल्चर धीरे-धीरे डेवलप हो रहा है। यह यहां के युवाओं के लिए अच्छा संकेत है। अपनी पढ़ाई के लिए स्किल्ड और आत्मनिर्भर होना कोई बुरी बात नहीं है। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। दुनिया में वही इंसान असल मायने में सफल है जो अपने पैरो पर खड़ा होकर आगे बढ़ता है। चरम बेरोजगारी के दौर में इस कल्चर को अपनाने और प्रोत्साहित किए जाने की सख्त जरूरत है ।

इनको और इनके गुरु को सलाम !

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प्रद्युम्न यादव

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बड़ा महत्व है – रमा सिंह

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कार्यालय में क्लर्क का, व्यवसाय में संपर्क का

जीवन में वर्क का, रेखाओं में कर्क का बड़ा ही महत्व है

 

इलेक्शन में वोट का, गिरने में चोट का

ड्रेस में कोट का, पॉकेट में नोट का बड़ा ही महत्व है

 

कवियों में बिहारी का, कथा में तिवारी का

सभा में दरबारी का, भोजन में तरकारी का बड़ा ही महत्व है

 

रत्नों में मोती का, लिबास में धोती का

अंधकार में ज्योति का, पंडितों में पोथी का बड़ा ही महत्व है

 

अवतारों में राम का, ऋषियों में परशुराम का

फलों में आम का, महफ़िल में ज़ाम का बड़ा ही महत्व है

रमा सिंह

जौनपुर, उत्तरप्रदेश

(यह रचना लिटरेचर इन इंडिया की ‘नव लेखन प्रोत्साहन योजना’ के तहत प्रकाशित की गयी है)

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कृष्णवट : सुशोभित सक्तावत

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“गीता” में श्रीकृष्ण ने स्वयं को “अश्वत्थ वृक्ष” कहा है। “समस्त वृक्षों में मैं “अश्वत्थ” हूं।” “अश्वत्थ” यानी पीपल का पेड़।

किंतु श्रीकृष्ण केवल अश्वत्थ ही नहीं हैं, वे स्वयं में एक “महावन” हैं!

ब्रज में एक नहीं दो नहीं सोलह वन हैं!

और वनखंडियां तो अगणित!

मैं उसी ब्रज की भूमि में “वंशीवट” की तरह स्वयं को रोप देना चाहता हूं!

इन सोलह वनों में सबसे कृष्णमय है “वृन्दावन”। “वृन्दा” यानी तुलसी। “वृन्दावन” यानी तुलसी का वन।

यह वही तुलसी हैं, जो “शालिग्राम” से ब्याही हैं। “कौस्तुभ” मणि के मुकुट वाले शालिग्राम। यह भी स्मरण रहे कि “राधारानी” के सोलह नामों में से एक “वृन्दा” भी है। उसी “वृन्दा” का वह वन है, ब्रज का “आनंदघन”!

“वृन्दावनधाम” के “रमणरेती” में जो “बांकेबिहारी” का विग्रह है, उसकी “त्र‍िभंग” छवि को मैं नतशिर होकर निहारना चाहता हूं!

ब्रज में ही “मधुवन” है, जहां श्रीकृष्ण “राधिके! ललिते! विशाखे!” की टेर लगाते थे।

उनकी वह टेर “भांडीरवन” तक गूंजती थी। “निधिवन” में जहां “ललिता सखी” के आराधक हरिदासजी की पर्णकुटी थी, वहां तक भी। सुखमा, कामा, कुमुदा, प्रमदा गोपियां जहां श्रीकृष्ण निकुंज लीलाओं की साक्षी थीं, उस “महावन” तक भी। “भद्रवन” से “तालवन” तक वृक्षों की पंक्त‍ियां श्रीकृष्ण की उस डाक में डूबी रहतीं!

“राधिके! ललिते! विशाखे!”

ब्रज में सोलह वन और तीन वट हैं : “कृष्णवट”, “वंशीवट”, “श्रीदामवट”।

“श्रीहितहरिवंश” के चौरासी पदों में जिन “त्रिवटों” का वर्णन है, मैं प्रलय तक उन्हीं “न्यग्रोधवृक्ष” का करना चाहता हूं अनुगायन!

और ब्रज में “कदम्ब” है।

श्रीकृष्णरूप से उज्जवल सभी वृक्ष एक तरफ़ और “कदम्ब” का पेड़ दूसरी तरफ़।

श्रीरूपगोस्वामी के “विदग्धमाधव” का यदुनन्दन दास ठाकुर ने पद्यानुवाद किया तो उसका नाम रखा :

“राधाकृष्णलीलारसकदम्ब”!

यूं ही कदम्ब को “सुरद्रुम” नहीं कहा है। “सुरद्रुम” यानी “देवतरु”। देवताओं का वृक्ष!

ब्रज में ही “कुमुदवन” भी है, जिसमें कदम्बों के पूरे के पूरे कुंज : “कदम्बखंडियां।”

मुझे ऐसी ही किसी “कदम्बखंडी” में चैत्र का समीरण बनकर तैरना है!

“कदम्ब” भी तीन होते हैं : “राजकदम्ब”, “धूलिकदम्ब” और “कदम्ब‍िका”।

यह वृक्ष श्रीकृष्णलीलास्वरूप का प्रतीक बन गया है। यहां तक कि “महानिर्वाणतंत्र” में भी ललिता सखी को “कदम्बवनसंचारा” और “कदम्बवनवासिनी” कहकर इंगित किया गया है।

“भागवत” और “पद्मपुराण” ने कदम्ब को श्रीकृष्णलीला का अविच्छेद्य रूप माना है। और कौन जाने, महाकवि बाणभट्ट ने अपनी नायिका को जब “कदम्ब” के नाम पर “कादम्बरी” कहकर पुकारा था तो उनके मन में कौन-सी लीला रही होगी!

श्रीकृष्ण भले ही स्वयं को “अश्वत्थ” वृक्ष कहें, मथुराजी के जनवृन्द भले ही बरगदों को “कृष्णवट” की संज्ञा से अभिहित करें, मैं तो श्रीकृष्ण को “कदम्ब” का पेड़ कहकर ही पुकारूंगा।

श्रीटीकारीरानी की “ठाकुरबाड़ी” का नतग्रीव कदम्ब!

मैं उसी कदम्ब का उपासक बनना चाहता हूं, “शतभिषा” नक्षत्र का जातक जो ठहरा!

“जौ खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन” — इस देवतरु की संज्ञा में ही वह भाव है, जो मुझे बना देता है रसखान!

“महाभारत” में अनेक वृक्षों का वर्णन है, जिनकी पहचान अब खो रही। जैसे “अरिष्ट”, “मेषश्रंग”, “प्लक्ष” वृक्ष और “श्लेषमातकी”। केवल गूलर, कुटज, बिल्व, करील को पहचान पाता हूं। और पहचानता हूं वृन्दा को, कदम्ब को, मलयज को।

मैं “श्रीकृष्णविग्रह” के ललाट पर लिपा “गोपी-चन्दन” का वृत्त बनना चाहता हूं, ब्रज के मलयजवन का गंधवाह चन्दन!

एक ऐसा भी वृक्ष है, जिसे स्वयं एक “वन” कहकर पुकारा गया है। वह है “छितवन”। “सप्तपर्ण” वृक्ष।

सागौन नहीं, शीशम नहीं, मैं “छितवन” की छांह में देखना चाहता हूं स्वप्न, यदि श्रीकृष्ण स्वयं को कहकर पुकारें “सप्तपर्ण”। मैं उस सप्तपर्ण की छाल बनना चाहता हूं!

वृक्षों की वंदना देवताओं की तरह बहुत कर ली, अब मैं देवताओं की उपासना वृक्षों की भांति करना चाहता हूं!

मैं “श्रीकृष्णस्वरूप” को “व्यक्ति” नहीं, “विग्रह” नहीं, एक “वृक्ष” की तरह देखना चाहता हूं।

कल्पद्रुम-सा “कृष्णवट”!

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Sushobhit Singh Saktawat

 

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क्या “अयोध्या”, क्या “अमरनाथ”

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अमरनाथ यात्रा के प्रति कश्मीरियों का द्वेष अयोध्या के प्रति मुस्ल‍िमों के द्वेष से कम नहीं है, ऐसी धारणा अगर बन गई है, तो यह निर्मूल नहीं है। अमरनाथ इधर पिछले नौ सालों से कश्मीर का “अयोध्या” जो बन गया है।

और यही कारण है कि अमरनाथ यात्र‍ियों पर हमला करने के अनेक मायने होते हैं। आतंकी कहीं भी हमला कर सकते थे, लेकिन अमरनाथ यात्र‍ियों को मारने का अपना एक कुत्सित सुख और संतोष होता है।

हम बहुत जल्दी अपने निकट-अतीत को भूल जाते हैं और तात्कालिक संदर्भों में ही चीज़ों को देखने की कोशिश करते हैं, जबकि मेरा अनुभव यह रहा है कि इतिहास अपनी निरंतरता और पर्यवेक्षण के अपने परिप्रेक्ष्य के कारण हमें किन्हीं नीयतों के बारे में हमेशा ज़रूरी सबक़ देता है। अस्तु।

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नौ साल पुरानी बात है! वर्ष 2008 के ये ही दिन थे, जब अमरनाथ यात्रा विवाद ने जम्मू-कश्मीर में एक सरकार गिरवा दी थी, संघर्षों में 38 लोगों की मौत हो गई थी और 1989 के उग्रवाद के बाद का सबसे बड़ा वैमनस्य कश्मीर घाटी में देखा गया था।

कल ही मैं बता रहा था कि कश्मीर किस तरह से शैवों की धरती रही है। द्रविड़ों के शैववादी कश्मीर तक आकर अद्वैतवादी हो जाते हैं, वह तो ख़ैर एक अधिभौतिक प्रवर्तन है, किंतु अमरनाथ में बर्फानी बाबा का पिंड जमते ही आषाढ़ पूर्णिमा से रक्षाबंधन तक श्रद्धालुओं का जत्था एक दूसरी ही भावना के वशीभूत होकर दर्शन करने चला आता है। भारत-देश में होने वाले अनेक मेलों-खेलों, जत्रा-जत्थों का वह भी एक हिस्सा सदियों से रहा है।

लेकिन 26 मई 2008 को जम्मू कश्मीर सरकार ने “श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड” को तीर्थयात्रियों के लिए अस्थायी आवास के निर्माण के लिए कोई सौ एकड़ ज़मीन देने का निर्णय लिया, और तब शुरू हुआ तमाशा।

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सबसे पहले पर्यावरणविद् आए, जिन्होंने इससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंचने की बात कही, जबकि उसी दौरान पुंछ से शोपियान तक जो सड़क बनाई जा रही थी, उससे सैकड़ों एकड़ वनभूमि के सर्वसम्मति से नाश पर किसी को ऐतराज़ ना था।

फिर आए “हुर्रियत” के लीडरान। सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज़ फ़ारूक़ ने बलताल से अमरनाथ तक “प्रोटेस्ट मार्च” निकालने का ऐलान किया और यासिन मलिक ने धौंस दी कि वह तब तक कोई निवाला हलक़ के नीचे नहीं उतारेगा, जब तक कि यह सौ एकड़ ज़मीन अमरनाथ यात्रियों को देने का निर्णय वापस नहीं ले लिया जाता। यासिन मलिक ने कहा : “आप लोग तो पूरी कश्मीर घाटी को ही एक हिंदू तीर्थस्थल बनाने पर आमादा हैं!”

सुलगने के लिए हमेशा तत्पर रहने वाली वादी फिर कहां पीछे रहने वाली थी? जल्द ही कश्मीर घाटी में प्रदर्शन शुरू हुए। एक-एक रैली में पांच-पांच लाख लोग उमड़े।

तालीम, तरक़्क़ी, रोज़गार के लिए यह क़ौम कभी सड़कों पर उतरकर आई हो, किसी को याद आता है? भ्रष्टाचार या बलात्कार के विरोध में कभी वैसा हुआ हो? इस्लामिक हिंसा की किसी घटना, जो कि दुनिया के किसी ना किसी कोने में रोज़ ही होती है, के विरोध में “नॉट इन माय नेम” जैसा कोई शगूफ़ा लेकर ये सड़कों पर उतरे हों? याद करके बताइए। और फिर इसके सामने यह याद कीजिए कि जहां जहां ये सड़कों पर जत्था बनाकर हुजूम में उतरेंगे, वहां या तो पथराव करेंगे, या दंगा करेंगे, या किसी आतंकवादी की लाश को सलाम ठोंकेंगे, वैसे कितने वाक़ये अभी आपको फ़ौरन याद आ रहे हैं?

समाज की संरचनाओं में नीयत का बड़ा महत्व होता है। नेकनीयत अलग तरह से काम करती है और बदनीयत अलग तरह से काम करती है। और मेरा ऐसा मानना है कि हिंदुस्तान के लोगों का अंतहीन डर, अविश्वास, घृणा और अंदेशा जीतने के लिए आपको बदनीयती का एक बड़ा-सा पहाड़ खड़ा करना होता है। उस पहाड़ को अनेक सालों के उद्यम से बहुत मेहनत से खड़ा किया गया है।

यह कोई फ़िरकापरस्त अफ़वाह नहीं, यह ज़मीनी हक़ीक़त है!

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अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने तीर्थयात्रियों को सौ एकड़ ज़मीन दी, उसमें इतने बवाल का क्या मतलब था? किंतु दुर्भावना! किंतु बदनीयत! अयोध्या में जैसी बदनीयत दिखाई गई, वैसा ही मन का मैल!

तब कश्मीर घाटी से आवाज़ गूंजी : “यह हमारी स्वायत्तता पर हमला है!”

“स्वायत्तता”, हम्म्म। यानी “ऑटोनमी”। ये “ऑटोनमी” बहुत मज़ेदार लफ़्ज़ है, जो आपकी इंसानी फ़ितरत के बारे में बहुत तफ़सीलों से जानकारियां देता है।

मसलन, हमें अपने लिए एक “ऑटोनमस” पाकिस्तान चाहिए, हमें अपने लिए एक “ऑटोनमस” बांग्लादेश चाहिए। कश्मीर इंडिया में रहेगा, लेकिन इंडिया में रहकर भी वह “ऑटोनमस” रहेगा। धारा 370 इस अलगाव का क़ायदा होगा। अलग निशान, अलग विधान, अलग प्रधान होगा। देश के नियम उस पर लागू नहीं होंगे और “जीएसटी” को जम्मू-कश्मीर में कैसे लागू किया जाए, उस पर कुछ इस अंदाज़ में फ़िक्रमंदियों के साथ मगजपच्ची की जाएगी, मानो ये जम्मू-कश्मीर कोई पड़ोसी मुल्क़ हो!

ये जो अपनी थाली, अपना लोटा, अपना चौका अलग लेकर भाईचारे का मुज़ाहिरा करने की दोमुंही फ़ितरत है, उससे केवल भोले-भाले सेकुलरान को ही भुलावा दिया जा सकता है, पूरी दुनिया को नहीं।

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2008 के विवादों ने तब कांग्रेस-पीडीपी की ग़ुलाम नबी आज़ाद सरकार गिरवा दी थी, राज्यपाल बदल गए थे और गवर्नर रूल लागू हो गया था, “हिंदू बहुल जम्मू” और “मुस्ल‍िम बहुल कश्मीर” का द्वैत अपने सबसे वीभत्स रूप में सामने आ गया था, और मौक़ा देखकर पाकिस्तान की “सीनेट” ने भी सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित करवा दिया था कि कश्मीर में मुसलमानों की संपत्त‍ियों पर जो ग़ैरजायज़ क़ब्ज़ा हिंदुओं के द्वारा किया जा रहा है, उसकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भर्त्सना की जाए!

“मुसलमानों की संपत्त‍ियों पर हिंदुओं का ग़ैरजायज़ क़ब्ज़ा”, आर यू किडिंग मी! श्राइन बोर्ड को सौ एकड़ ज़मीन देना संपत्त‍ियों का अनैतिक अधिग्रहण हो गया, जैसे कश्मीर के जंगलों का एक-एक पत्ता मुसलमानों की जायदाद हो, जबकि सच तो ये है कि हज़ारों सालों से वहां हिंदुओं का आना-जाना रहा, दाना-पानी रहा, नाते-रिश्ते रहे, और पहाड़ों पर हमेशा उनके देवता विराजित रहे!

दुर्भावनाओं की भला कितनी मिसालें गिनाई जाएं?

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यह सच नहीं है कि अमरनाथ यात्री कश्मीरियों की आंखों में खटकते हैं, अब यह संदेश देने का ज़िम्मा कश्मीरियों का ही है।

कल से सुन रहा हूं कि मुसलमानों ने अमरनाथ गुफा खोजी, मुसलमान यात्रियों की सेवा करते हैं, इतना भाईचारा है, कितना सौहार्द है। लेकिन मुझे ये कल्पनाएं और प्रवंचनाएं नहीं, दिन की रौशनी की तरह साफ़ सच्चाइयां चाहिए।

जिस कश्मीर घाटी में लाखों लोग दहशतगर्दों के मजमों में उमड़ते हैं, उतने ही लोग मुझे अमरनाथ यात्रियों के समर्थन में भी सड़कों पर चाहिए। आप कहते हैं कि अमन है और भाईचारा है! चलिए मान लेते हैं। अब आप दिखाइए कि कहां पर है! और अगर आप नहीं दिखा सकते, तो जिस दुर्भावना के तर्क हम निरंतर दे रहे हैं, उस पर सहमति में सिर हिलाइए, क्योंकि ख़ामख़यालियों और ख़ुशफ़हमियों से हक़ीक़तें नहीं बदल जाती हैं।

अमरनाथ यात्रियों पर आक्रमण करके आतंकवाद ने अपनी नीयत का परिचय दिया है और सद्भावना की ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। कमबख़्त, “गंगा-जमुनी” में भी एक “युग्म” है, वह कोई एकल अवधारणा नहीं है। इतिहास ने एक और मौक़ा तथाकथित सौहार्द की पुष्ट‍ि का दिया है, सरकारी बयानों जैसी निंदा से काम नहीं चलने वाला है। अपनी बेदाग़ नीयत का बेधड़क परिचय दीजिए! आइए, हम देख रहे हैं!

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क्योंकि आतंकवाद का भले ही हो, लाशों का कोई मज़हब नहीं होता है।

लाशें केवल लाशें होती हैं, अधखुली आंखों से शून्य में ताकती हुईं।

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सुशोभित सक्तावत

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

Image result for amarnath attack 2017जिस कश्मीर में मानवाधिकार के नाम पर ज्यूडिशियली खुद संज्ञान ले कर एक पत्थरबाज आतंकी को दस लाख का मुआवजा देने की सरकार को सिफ़ारिश करती हो उस कश्मीर में अगर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में गल्फ फंडिंग और क्रिश्चियन मिशनरी फंडिंग पर पल रहे एन जी ओ बात बेबात देश को गृह युद्ध में धकेलने को लगातार युद्धरत हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

जिस देश में लेखक और पत्रकार अपना जमीर बेच कर विचारधारा के नाम पर कश्मीरी पंडितों के विस्थापित होने पर बरसों से चुप्पी साध कर सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के पालन – पोषण में दिलोजान से लगे हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश के राजनीतिज्ञ सिर्फ़ वोट बैंक के लिए देश और समाज बांटने के लिए हर क्षण तैयार खड़े मिलते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

जिस देश में किसी भ्रष्ट राजनीतिज्ञ को सेक्यूलरिज्म के नाम पर तमाम सारे लोग सेफगार्ड बन कर , दीवार बन कर रक्षा में खड़े हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में लोग सिर्फ़ हिंदू मुसलमान , आरक्षण की राजनीति को ही प्रोग्रसिव होना मान लेते हों तो तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

जिस देश में कुछ लोग गाय का मांस खाने के लिए ही पैदा होते हों , जान दे कर भी गाय का मांस खाने का ज़ज्बा रखते हों , गाय बचाने के नाम पर इंसान की जान ले लेना ही धर्म समझते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में केरल , बंगाल हों , बशीर हाट और मालदा की सांप्रदायिकता पर फैशन और पैशन की हद तक ख़ामोशी हो तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । कश्मीर के पत्थरबाज आतंकियों को जो लोग नादान बच्चा कह कर सीना फुला कर बैठते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

आश्चर्य हो भी भला क्यों । अब तो इन घटनाओं पर मुझे दुःख भी नहीं होता । संवेदनहीनता की नाव में बैठ गया हूं मैं । आप क्या कर लेंगे मेरा ?

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दयानंद पाण्डेय

लिबरल कम्‍युनिस्‍ट व्‍यावहारिक होते हैं

 

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“लिबरल कम्‍युनिस्‍ट व्‍यावहारिक होते हैं। उन्‍हें सैद्धांतिकी वाले तरीके से नफ़रत होती है। उनके लिहाज से आज कोई एकल शोषित वर्ग नहीं है। केवल कुछ ठोस समस्‍याएं हैं जिन्‍हें हल किया जाना है- अफ्रीका में भुखमरी, मुस्लिम औरतों की बदहाली, धार्मिक कट्टरपंथी हिंसा। जब कभी अफ्रीका में मानवीय संकट होता है- और लिबरल कम्‍युनिस्‍ट मानवीय संकटों से वाकई मोहब्‍बत करते हैं, जो उनके भीतर के सर्वश्रेष्‍ठ को बाहर निकाल लाता है!- तो उनके हिसाब से पुराने किस्‍म के साम्राज्‍यवाद विरोधी जुमले में फंसने का कोई अर्थ नहीं होता। इसके बजाय हम सभी को केवल उस चीज़ पर ध्‍यान एकाग्र करना चाहिए जो समस्‍या को सुलझाने में कारगर हो: लोगों को, सरकारों को और कारोबारों को एक उद्यम में जोड़ा जाए; राजकीय मदद पर भरोसा किए बगैर चीज़ों को हरकत में लाया जाए; संकट को सृजनात्‍मक और अपारंपरिक तरीके से देखा जाए और झंडे पर बहस न की जाए…।

लिबरल कम्‍युनिस्‍टों को ”दक्षिण अफ्रीका में नस्‍लभेद” जैसे उदाहरण पसंद आते हैं। उन्‍हें छात्रों का विद्रोह भी प्‍यारा लगता है- क्‍या ग़ज़ब की युवा ऊर्जा का विस्‍फोट है! आखिर, वे भी तो कभी जवान थे और सड़कों पर हुआ करते थे पुलिस वालों से लड़ते-भिड़ते हुए…। आज अगर वे बदल गए हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि उन्‍होंने हकीकत से समझौता कर लिया है बल्कि इसलिए कि दुनिया को वास्‍तव में बदलने के लिए उन्‍हें बदलने की ज़रूरत थी, अपनी जिंदगी में वास्‍तविक क्रांतिकारी बदलाव लाने की ज़रूरत थी। मार्क्‍स ने भी तो आखिर पूछा था- भाप के इंजन के आविष्‍कार के मुकाबले राजनीति उभारों की क्‍या हैसियत? हमारी जिंदगी को बदलने में तमाम इंकलाबों ने जितनी भूमिका निभायी, क्‍या उन सब के मुकाबले अकेले कहीं ज्‍यादा भूमिका इसने नहीं निभायी? मार्क्‍स अगर आज होते तो क्‍या यह नहीं पूछते- आखिर वैश्विक पूंजीवाद के खिलाफ़ तमाम विरोध प्रदर्शनों की इंटरनेट के आविष्‍कार के सामने हैसियत ही क्‍या है?

सबसे बड़ी बात ये है कि लिबरल कम्‍युनिस्‍ट सही मायने में विश्‍व नागरिक होते हैं। वे भले लोग होते हैं जिन्‍हें चीज़ों की चिंता होती है। वे लोकरंजक कट्टरपंथियों और गैर-जिम्‍मेदार, लोभी पूंजीवादी निगमों की चिंता करते हैं। वे आज की समस्‍याओं के पीछे ‘गहरे कारण’ देखते हैं: दरअसल व्‍यापक गरीबी और नाउम्‍मीदी ही है जो कट्टरपंथी हिंसा का पोषण करती है। इसीलिए उनका लक्ष्‍य पैसे कमाना नहीं, दुनिया को बदलना होता है। अब इस प्रक्रिया के फलस्‍वरूप कुछ पैसे अगर हाथ आ ही गए तो शिकायत क्‍या करनी!”

(वायलेंस, स्‍लावोज जि़ज़ेक, नोट: लिबरल कम्‍युनिस्‍ट से लेखक का आशय लिबरल लोगों से है)

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(अभिषेक श्रीवास्तव जी के फेसबुक पृष्ठ से साभार)

जीएसटी से भारतीय लेखकों को नुकसान

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जी एस टी के चक्कर में मेरी कई किताबें फ्लिप्कार्ट पर आने से रह गई हैं । कुछ समय पहले बड़ी मुश्किल से प्रकाशक को समझा-बुझा कर किताबों को आन लाईन करवाया था । प्रकाशक ने आज बताया कि हो सकता है जो कुछ किताबें फ्लिप्कार्ट पर हैं , वह भी कुछ दिन में हट जाएं । इस लिए कि फ्लिप्कार्ट वाले सभी प्रकाशकों से जी एस टी नंबर मांग रहे हैं । लेकिन किसी प्रकाशक के पास जी एस टी नंबर नहीं है । न कोई प्रकाशक जी एस टी नंबर लेना चाहता है । इस लिए भी कि किताबें जी एस टी के फ्रेम में कहीं हैं ही नहीं अभी तक । लेकिन फ्लिप्कार्ट की अपनी बाध्यताएं होंगी। जो हो नुकसान लेखकों-पाठकों का है ।

इस लिए कि सरकारी खरीद के गुलाम बन कर प्रकाशक पहले ही किताबों की दुकानों से कुट्टी कर चुके हैं । किताबें दुकान पर नहीं रखते । अब आन लाईन का तार भी कट जाएगा तो कौन किस किताब को कहां पाएगा और क्यों पढ़ेगा । वैसे भी प्रकाशकों की रूचि आन लाईन किताब बेचने में कभी नहीं रही । क्यों कि यह फुटकर खरीद है । और प्रकाशक फुटकर खरीद में नहीं बल्क परचेजिंग में दिलचस्पी रखते हैं । जहां मोटी रिश्वत दे कर , मोटी कमाई होती है । एक साथ हज़ारों किताबों का आर्डर मिलता है । जब कि फ्लिप्कार्ट पर तीस परसेंट छूट दे कर , फ्लिप्कार्ट को कमीशन दे कर कोरियर खर्च , पैकेजिंग आदि का खर्च भी उठाना पड़ता है । प्रकाशक कहता है कि हमारे पास फिर बचता क्या है । काहे बेचें एक-एक , दो-दो किताब फुटकर में हम।

यह हिंदी के प्रकाशक हैं । न लेखक को रायल्टी देते हैं , न किताब का प्रचार करते हैं , न समीक्षा के लिए कहीं किताब भेजते हैं , न किताब किसी दुकान में रखते हैं । और चाहते हैं कि अंगरेजी की तरह लाखों किताबें चुटकी बजाते ही बिक जाएं । अभी तो वह रिश्वत दे कर सरकारी खरीद में किताब बेच कर सरकारी लाइब्रेरियों में कैद करना जानते हैं । भाड़ में जाएं लेखक , भाड़ में जाएं पाठक । उन का क्या , उन की कमाई तो जारी है । लाखों , करोड़ों में । सभी सरकारें भी चाहती हैं कि कोई कुछ पढ़े नहीं । जब कोई कुछ पढ़ेगा तो सोचेगा । सोचेगा तो सिस्टम के खिलाफ सोचेगा । सो हर साल करोड़ो – अरबो रुपए की किताबें खरीद कर लाइब्रेरियों में सड़ा देते हैं । आप भी नकली सिनेमा देखिए , टी वी देखिए , चाहे फर्जी सीरियल हो , चाहे फर्जी न्यूज और डिस्कशन के नाम पर चीख चिल्लाहट या फिर अश्लील कामेडी शो , यह शो , वह शो आदि-इत्यादि । दिल-दिमाग भ्रष्ट कर , दरिद्र बन कर सो जाईए । सरकार और सिस्टम को यही रास आता है । आप को भी ।

दयानंद पाण्डेय

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(लेखक वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार हैं)

किसान आंदोलन और गांधी-टैगोर डिबेट

gandhi and tagore debate

किसान आंदोलन चल रहा है। आंदोलन महाराष्ट्र से शुरू हुआ था और अब इसने मध्यप्रदेश को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। आंदोलनकारियों की अनेक मांगें हैं, जिनमें कर्जमाफ़ी जैसी अनैतिक मांग भी शामिल है।

आंदोलनकारी किसानों ने आपूर्ति तंत्र को अपहृत कर लिया है। दूध, फल और सब्ज़ियों के उत्पादन और वितरण के “मैकेनिज़्म” में ये किसान बीच की अहम कड़ी की भूमिका निभाते हैं और अब उन्होंने यह भूमिका निभाने से इनकार कर दिया है। परिणाम यह है कि इससे प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया। यह वह जनजीवन है, जो किसानों की समस्याओं के लिए मूलत: दोषी नहीं था। जो किसान इस आंदोलन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं थे और दूध और सब्ज़ियां बेचने निकले थे, उनके सामान को बलपूर्वक नष्ट कर दिया गया। यहां तक कि सहकारी संस्थाओं के दूध के टैंकरों को भी सड़कों पर उलट दिया गया।

जब मैंने आंदोलनकारियों की तस्वीरें देखीं तो दो चीज़ें मेरे दिमाग़ में आईं। एक तो आंदोलनकारियों की देहभाषा, जिसमें कहीं भी क्षोभ, हताशा या पीड़ा नहीं थी, उल्टे विनाश का “परपीड़क” सुख ही उसमें झलक रहा था। वे दूध और सब्ज़ियां नष्ट करते हुए हंसते-खिलखिलाते नज़र आ रहे थे। दूसरे, मैंने सामान्य लोगों को जीवनयापन के लिए आवश्यक वस्तुओं के लिए संघर्ष करते देखा। मैं समझ नहीं पाया कि सड़कों पर नष्ट कर दी गई आवश्यक वस्तुओं और उन्हें प्राप्त करने के लिए किए जा रहे संघर्ष के बीच के टूटे हुए “तारतम्य” को कैसे परिभाषित करूं। वह कौन-सी कड़ी थी, जिसने मांग और आपूर्ति के तंत्र को इस विडंबनामय तरीक़े से गड़बड़ा दिया था कि उनके बीच की सरणि‍यां विश्रंखल हो गई थीं। आप कह सकते हैं, किसानों के स्तर पर हठ और विवेकशून्यता और प्रशासन के स्तर पर दूरदृष्ट‍ि और संकल्पशक्त‍ि का अभाव। लेकिन मुझे इन प्रवृत्त‍ियों के भीतर ऐतिहासिक विचारधारागत भूलें दिखाई दे रही हैं।

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भारतीयों को “सत्याग्रह” और “असहयोग” की दीक्षा गांधी ने दी थी। विरोध की भंगिमा के रूप में विदेशी सामग्र‍ियों का बहिष्कार किया जाए, यह शिक्षा भी भारतीयों को गांधी ने ही दी। गांधी ने कहा था कि “विदेशी कपड़ों की ऐसी होली जलाई जाए, जो लंदन तक दिखाई दे।” अलबत्ता मज़े की बात यह है कि धुर दक्षिणपंथी भी यह दावा करने का प्रयास करते हैं कि विदेशी कपड़ों की होली जलाने के मूल में वस्तुत: सावरकर की प्रेरणा थी। आश्चर्य यह है कि जो गांधी केवल इसी कारण से आजीवन एक धोती पहनते रहे कि उनके देशवासियों के पास पहनने के लिए पूरे कपड़े भी नहीं हैं, वे कपड़ों की होली जलाने का अनैतिक आह्वान कर सकते थे, फिर चाहे उसका प्रतीकात्मक महत्व कुछ भी रहा हो।

इसके पीछे “गांधी-टैगोर मतभेदों” का एक सुचिंतित विमर्श रहा है। गांधी और टैगोर दोनों ही राष्ट्रवादी थे, लेकिन टैगोर का राष्ट्रवाद अपनी अवधारणाओं में कहीं व्यापक था। टैगोर सही मायनों में विश्व-नागरिक थे। और गांधी की आंधी के उस दौर में भले ही टैगोर को बंगाल के बाहर उतना महत्व ना दिया गया हो, सच्चाई यही है कि टैगोर के भीतर गांधी से गहरी अंतर्दृष्टि थी। लेकिन गांधी के पास जनसमर्थन था। और अपार जनसमर्थन हमेशा वैचारिक वैधता के प्रति संशय को ही जन्म देगा।

टैगोर इस बात के बिलकुल पक्ष में नहीं थे कि स्वदेशी आंदोलन के चलते बहिष्कार के एक उपकरण के रूप में विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाए। भारत में स्वदेशी आंदोलन वर्ष 1905 में “बंग-भंग” के बाद से प्रारंभ हो चुका था, अलबत्ता दादाभाई नौरोजी 1850 से ही इस दिशा में प्रवृत्त हो चुके थे। लेकिन इसे गति मिली वर्ष 1915 में गांधी की भारत वापसी से, जो दक्षिण अफ्रीका में “सत्याग्रह” के अपने प्रयोगों की पूंजी साथ लेकर आए थे। गांधी ने भारत लौटते ही अपने पूर्वग्रहों को सामने रखा। किंतु टैगोर ने गांधी की विचार-श्रंखला में निहित दुर्बलताओं को तुरंत भांप लिया था।

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1916 में टैगोर का उपन्यास “घरे-बाइरे” प्रकाशित हुआ था, जिसे भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन की “गांधी प्रणीत धारा” और “टैगोर प्रणीत पूर्वग्रह” के मूल में माना जाता है। टैगोर ने वह उपन्यास तब लिखा था, जब अभी तो “चंपारण सत्याग्रह” भी नहीं हुआ था और “असहयोग आंदोलन” भविष्य के गर्भ में था। टैगोर के उपन्यास में संदीप नामक पात्र है। संदीप राष्ट्रवादी है और “स्वराज” के लिए संघर्ष कर रहा है। वह विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील करता है और जो उसके आह्वान को स्वीकार नहीं करते, उनकी वस्तुओं को बलात् नष्ट कर देता है (आज के किसान आंदोलनकारियों की तरह।) उपन्यास का नायक निखिल इस तौर-तरीक़ों से सहमत नहीं है। अनेक समालोचक गांधी को संदीप और टैगोर को निखिल के प्रतिनिधि के रूप में देखते रहे हैं। संदीप का संकीर्ण राष्ट्रवाद उग्र विरोध का हामी था, जबकि निखिल का मत था कि वस्तुओं को बलात् नष्ट करने से स्थानीय लोग और मुश्क‍िल में आ जाएंगे।

वस्तु अगर विदेशी हो तो भी अगर उसका एक “लोकल मर्केंडाइल” है तो वह स्थानीय बाज़ार में पूंजी का संचार करती है और रोज़गार के अवसरों का निर्माण करती है, यह अर्थशास्त्र की मूल धारणा है। और आप जब उत्कृष्ट उत्पादन को नष्ट करते हैं, तो यह ना केवल उपभोक्ता, जो कि अपनी प्रवृत्त‍ि में हमेशा “भूमंडलीकृत” होता है “स्थानीय” नहीं, के निजी अधिकारों का हनन होता है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के निर्माण की संभावनाओं को भी समाप्त करता है। गांधी के व्यक्त‍ित्व में भीषण हठधर्मिता थी, और उनके “असहयोग” के आह्वान में भी एक सूक्ष्म हिंसा थी, दबाव की रणनीति थी, जो कि “साधन-शुचिता” के उनके स्वयं के आग्रहों के विपरीत थी। “सत्याग्रह” में भी एक “आग्रह” है और आग्रह की अति एक “दुराग्रह” है, गांधी की बुद्धि‍ इसको समझने के लिए तैयार नहीं थी।

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1921 में जोड़ासांको की “ठाकुरबाड़ी” में गांधी और टैगोर की भेंट हुई। टैगोर ने गांधी के मुंह पर कहा कि स्वदेशी आंदोलन के नाम पर “टेक्सटाइल इंडस्ट्री” को समाप्त कर देना किसी लिहाज़ से विवेकपूर्ण नहीं है। इसके मूल में विनाश, नकारात्मकता और असहिष्णुता है। गांधी ने अपने सुपरिचित अंदाज़ में जवाब दिया, “डूबता हुआ आदमी औरों की परवाह नहीं करता!”

बंगाल में “गांधी-टैगोर डिबेट” पर बहुत विमर्श हुआ है और अमर्त्य सेन से लेकर आशीष नंदी तक ने इसकी बारीक़ पड़ताल की है। टैगोर के मानसपुत्र सत्यजित राय ने तो “घरे-बाइरे” पर एक फ़िल्म ही बनाई है, जिसमें राष्ट्रवादी संदीप स्पष्टतया एक खलचरित्र है। अलबत्ता सनद रहे कि वर्ष 1916 में टैगोर के उस विवेकशील हस्तक्षेप को बहुतों के द्वारा “विलायत-परस्ती” की संज्ञा दी गई थी! टैगोर को तीन साल पहले ही नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

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आज किसान आंदोलन के मूल में प्रतिहिंसा, नाश, असहयोग और हठधर्मिता की जो वृत्त‍ियां आपको नज़र आ रही हैं, वह भारत के जनमानस को गांधी की स्थायी देन है। मेरी मांगें मानो, अन्यथा मैं भूख हड़ताल कर दूंगा, असहयोग कर दूंगा, उत्पाद को नष्ट कर दूंगा, इस हिंसक और हठपूर्ण आग्रह को गांधी के “आभामंडल” ने एक नैतिक मान्यता प्रदान कर दी है। आपको शायद यह जानकर अच्छा ना लगे किंतु गुर्जरों द्वारा पटरियां उखाड़ देना, जाटों द्वारा सामूहिक बलात्कार करना, पटेलों द्वारा नगर-व्यवस्था को अपहृत कर लेना और किसानों द्वारा आपूर्ति-तंत्र को पंगु बना देने की प्रवृत्त‍ियों के पीछे जाने-अनजाने गांधी की ही प्रेरणा काम कर रही है।

गांधी को लगता था कि वे अपने अनुयायियों को “असहयोग” सिखा रहे हैं, जबकि उनके अनुयायी “उद्दंडता” सीख रहे थे।

गांधी को लगता था कि वे अपने अनुयायियों को “सत्याग्रह” सिखा रहे हैं, जबकि उनके अनुयायी “हठधर्मिता” सीख रहे थे।

एक “चौरी-चौरा” हमेशा गांधी की नियति में बंधा रहता है।

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मैंने किसानों की कर्जमाफ़ी की मांग को पहले ही अनुचित क़रार दे दिया है, क्योंकि जहां करोड़ों लोग नियमपूर्वक ऋण चुका रहे हों, तब कोई भी व्यवस्था “कर्जमाफ़ी” के तर्क पर नहीं चल सकती। मैं आगे जाकर यह भी कहूंगा कि किसानों के आंदोलन में निहित विनाश का व्याकरण घोर अनैतिक और आपराधिक है। उपज को नष्ट करने वाला कभी किसान नहीं हो सकता। अनाज की अवमानना करने वाला कभी “अन्नदाता” नहीं हो सकता। दूधमुंहे बच्चे एक-एक बूंद दूध के लिए तरसते रहें और गैलनों दूध को सड़कों पर नष्ट कर दिया जाए, यह कृत्य करने वाला आंदोलन कभी भी “वैध” नहीं हो सकता। और बल, आग्रह, हठ और हिंसा की जो प्रवृत्त‍ियां इस तरह के आंदोलनों के मूल में निहित होती हैं, वे कभी भी “साधन-शुचिता” की श्रेणी में नहीं रखी जा सकतीं।

और यही कारण है कि अब समय आ गया है कि भारत के भूमंडलीकृत विश्व-नागरिक गांधी और टैगोर में से किसी एक चुनाव करें और गांधी के छद्म आभामंडल से मुक्त हो जाएं।

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(ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं )

मांसभक्षियों के कुतर्क : 3

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“पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।”

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यह मांसभक्षियों का सबसे प्रिय तर्क है। और मज़े की बात यह है कि मांसभक्षियों को यह भी नहीं पता कि यह एक “आत्मघाती” तर्क है, यानी यह तर्क स्वयं की ही काट करता है। ज़ाहिर है, मांसभक्षण से “प्रोटीन” मिले या ना मिले, “तर्कक्षमता” तो अवश्य ही नहीं मिलती है।

वो इसलिए कि जब मांसभक्षियों से कहा जाता है कि वे अपने भोजन के लिए पशुओं की हत्या क्यों करते हैं, तिस पर जब वे प्रत्युत्तर देते हैं कि पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है, तो वे वास्तव में अपने पर लगाए आरोप को पहले ही स्वीकार कर लेते हैं, और अब केवल “प्रतिरक्षा” के तर्क दे रहे होते हैं!

तो अगर मांसभक्षियों पर लगाए गए आरोप के दो चरण हैं, पहला यह कि “क्या वे भोजन के लिए प्राणियों की हत्या करके अनैतिक कृत्य करते हैं” और दूसरा यह कि “प्राणी और हत्या जैसी श्रेणियों की सीमाएं और अतियां क्या हैं”, तो वे दूसरे चरण की क़ीमत पर पहले चरण को स्वयं ही स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद दूसरे चरण की विवेचना भर शेष रह जाता है। दरअसल, मांसभक्षी पहले ही जानते हैं कि वे एक घोर अनैतिक कृत्य कर रहे होते हैं, और वे भीतर तक ग्लानि से भरे होते हैं।

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आप एक ऐसे अपराधी की कल्पना कीजिए, जिसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। उससे कहा जाता है कि “तुमने चोरी की है।” ऐसे में वह अपने बचाव में यह नहीं कहता कि “यह झूठ है, मैंने चोरी नहीं की है।” वह “आत्मप्रवंचना” से भरा तर्क गढ़ते हुए कहता है कि “जज साहब, आप भी तो अपने अर्दली को उसकी योग्यता से कम तनख़्वाह देते हैं। यह भी मेरी नज़र में एक चोरी है।”

इसमें पेंच यह है कि चोर एक “तथ्य” के रूप में अपने अपराध को पहले ही स्वीकार कर चुका होता है, लेकिन अब उसकी रुचि दूसरों को भी चोर सिद्ध करने में होती है, जो कि चोरी नहीं चोरी की एक “हाइपोथीसिस” है। इससे न्यायाधीश का काम बहुत आसान हो जाता है। अब उसे यही सिद्ध करना है कि वह अपने अर्दली को जितनी और जैसी तनख़्वाह दे रहा है, वह चाहे जो हो, उसे चोरी की श्रेणी में तो क़तई नहीं रखा जा सकता।

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तो स्थापना यह है कि : मनुष्यों में जीवन होता है। पशुओं में जीवन होता है। पेड़-पौधों में भी जीवन होता है।

इस आधार पर : अगर मनुष्य की हत्या अपराध है, अगर पशु की हत्या अपराध है, तो पेड़-पौधों की हत्या को भी अपराध माना जाना चाहिए।

यही ना, मांसभक्षी महोदय! आप यही सिद्ध करना चाहते हैं ना?

तो जब आप स्वयं ही यह मान रहे होते हैं कि पशु की हत्या मनुष्य की हत्या जितना बड़ा अपराध है, तब बहुत संभव है कि तर्कों के जंजाल में उलझने के बाद आपको यह जानकर अच्छा ना लगे कि पेड़-पौधों से फल और सब्ज़ी लेना पेड़-पौधों की हत्या करना उसी तरह से नहीं है, जिस तरह से गाय से दूध और भेड़ से ऊन लेना गाय और भेड़ की हत्या कर देने जैसा नहीं है। हां, यह उनका दोहन और शोषण अवश्य है। और शाकाहारी भी प्रकृति का शोषण करता है। किंतु मांसाहारी तो नृशंसता के साथ अपने पर्यावास की हत्या करता है।

मैं पेड़ से फल लेता हूं। पेड़ पर फिर फल उग आता है। मैं गाय की गर्दन काट देता हूं। गाय का जीवन समाप्त हो जाता है। कोई मूर्ख ही इन दोनों को समान बता सकता है। हां, आप यह अवश्य कह सकते हैं कि पेड़ को काट देना उसी तरह से अपराध है, जैसे पशुओं की हत्या कर देना। और मांसभक्षियों को यह जानकर ख़ुशी होना चाहिए कि लगभग सभी शाकाहारी ना केवल पेड़ काटने के विरोधी होते हैं, बल्क‍ि वे तो चाहते हैं कि पृथ्वी पर “वेजीटेशन” को ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में बढ़ाया जाए।

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पेड़-पौधों का अध्ययन “वनस्पति शास्त्र” के तहत किया जाता है। जीव-जंतुओं का अध्ययन “जीव विज्ञान” के तहत किया जाता है। ये दोनों विज्ञान ही अलग है। प्राणियों में “स्नायु तंत्र” होता है, पेड़-पौधों में नहीं होता। प्राणी “चर” होते हैं, पेड़-पौधे “अचर” होते हैं। प्राणि‍यों में रक्त-मांस-मज्जा की एक संपूर्ण संरचना होती है, पेड़-पौधों में यह कुछ नहीं होता। आपको संभवत: यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिन अंशों में पेड़-पौधों में जीवन होता है, उससे न्यून अंशों में पत्थरों में भी जीवन होता है। हिमालय पर्वत भी अंतत: एक जीवित संरचना है और वह प्रतिवर्ष 6 सेंटीमीटर की गति से बढ़ रहा है। मेरे प्रिय मांसभक्षियो, क्या आप पर्वतों में सुरंग बनाने के लिए किए जाने वाले विस्फोटों की तुलना भीड़भरे बाज़ारों में आतंकवादियों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों से करना चाहते हैं, यह कहकर कि जीवन तो पत्थरों में भी होता है! आप चाहें तो कह लीजिए। आपकी मूर्खताओं का उपहास करने का अधिकार तब अवश्य हमारे पास सुरक्ष‍ित रहेगा।

इसी बात पर मुझे एक चुटकुला याद आया। आइए, फिर से न्यायालय परिसर में चलते हैं। एक व्यक्त‍ि ने सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी। उसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। उस पर सैकड़ों हत्याओं का आरोप लगाया गया। हत्यारे ने अपने बचाव में तर्क किया कि न्यायाधीश महोदय, आपको पता है जीवाणुओं में भी जीवन होता है। आप आज सुबह घर से न्यायालय तक चलकर आए, उसमें करोड़ों जीवाणुओं की मृत्यु हो गई। मैंने अगर सैकड़ों मनुष्यों को मारा है तो आप भी करोड़ों जीवाणुओं के हत्यारे हैं। न्यायाधीश ने दयनीय दृष्ट‍ि से उसकी ओर देखा और उसे उचित सज़ा सुना दी।

मेरे प्रिय मांसभक्षियो, यह चुटकुला आप हैं। आप एक भद्दा मज़ाक़ हैं।

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प्रसंगवश, यह भी याद आया कि बहुधा मांसभक्षी कहते हैं कि एक गाय की हत्या के ऐवज़ में एक मनुष्य की हत्या कर देना कहां तक उचित है। क्या तब उन्हें उन्हीं का यह तर्क नहीं दिया जाना चाहिए कि जीवन तो गाय में भी होता है? और तब अगर वे कहेंगे कि गाय में जो जीवन था और मनुष्य में जो जीवन है, उन दोनों में चेतना के अंशों का बड़ा अंतर है, तो क्या यही बात पेड़-पौधों, पत्थरों, पर्वतों की चेतना के अंशों के बारे में भी नहीं कही जा सकती?

जब शहर में प्लेग फैल जाता है तो लाखों की संख्या में चूहों की हत्या की जाती है। जब कोई बाघ आदमख़ोर हो जाता है तो उसे बंदूक़ की गोली से मार गिराया जाता है। जब आप पैदल चलते हैं तो आपके जाने-अनजाने ही कितने ही कीट-पतंगे कुचलकर मारे जाते हैं। इनमें से किसी की भी तुलना “फ़ैक्टरी फ़ॉर्मिंग” के तहत पशुओं को अमानवीय रूप से पालकर, क़त्लख़ानों में भयावह मशीनों से उनकी हत्या कर आपकी तश्तरी में भोजन की तरह प्रस्तुत किए जाने से नहीं की जा सकती, जबकि जीवन तो चूहों में भी था, आदमख़ोर बाघ में भी था, कीट-पतंगों में भी था और पेड़-पौधों में तो था ही। हत्या की मंशा, हत्या का प्रकार, ये सभी “न्यायशास्त्र” के अध्ययन का विषय होते हैं, जबकि मांसभक्षियों के तर्कों की तो पूरी बुनियाद ही अन्याय की लंपट लालसा के आधार पर टिकी होती है।

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किसी बुद्धिमान व्यक्त‍ि ने एक बार कहा था कि आप किसी अबोध बच्चे को एक सेब और एक ख़रग़ोश दीजिए। अगर वह सेब के साथ खेलने लगे और ख़रग़ोश को मारकर खाने लगे तो मैं मान लूंगा कि मांसाहार स्वाभाविक है।

इसी पर मैं आगे यह भी जोड़ना चाहूंगा कि अगर पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, जैसे पशुओं में होता है तो आप जिस तरह से अपने बच्चों को आम के बाग़ में ले जाते हैं, उसी तरह से उन्हें कभी क़त्लख़ानों में क्यों नहीं लेकर जाते?

मांसभक्षियों के कुतर्क : 2

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[ मेरी मंशा है कि शृंखलाबद्ध रूप से मांसभक्षियों के कुतर्कों का एक-एक कर उच्छेदन किया जाए। उसी कड़ी में यह ]

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कुतर्क :

“मनुष्य की हत्या की तुलना पशु की हत्या से नहीं की जा सकती, क्योंकि मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है।”

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यह मांसभक्षियों का प्रिय तर्क है। आश्चर्य होता है कि इतने अनैतिक, जघन्य, अन्यायपूर्ण और लचर तर्क के आधार पर वे अपने अपराधों पर परदा डालने का प्रयास करते हैं।

अव्वल तो यही कि अगर इस तर्क को ही मान लिया जाए तो दुनिया से न्याय-व्यवस्था का अंत हो जाएगा। जो श्रेष्ठ है, उसे निकृष्ट को मार देना चाहिए। जो बलशाली है, उसे दुर्बल को समाप्त कर देना चाहिए। जो अगड़ा है, उसे पिछड़े को कुचल देना चाहिए। मांसभक्षि‍यों का यह कुतर्क न्याय और विवेक के अंत का जयघोष है। और इस तर्क के बाद, वास्तव में, हत्या, बलात्कार, शोषण, उत्पीड़न, दमन उसी तरह मान्य हो जाते हैं, जैसे भोजन के लिए पशुओं की हत्या।

और यह स्थि‍ति तब है, जब कुतर्क भीषण तर्कदोष से भरा हुआ है।

वह कैसे?

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वह ऐसे, कि जब हम कहते हैं कि मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है, तो हम उस श्रेष्ठता के स्वरूप का वर्णन नहीं कर रहे होते हैं। यानी तब हम यह सिद्ध नहीं कर रहे होते हैं कि मनुष्य सर्वांगीण रूप से पशुओं से श्रेष्ठ है। वास्तव में मनुष्य केवल बौद्धिक रूप से पशुओं से श्रेष्ठ है। किंतु बुद्धि‍ का उपकरण विमर्श है, हत्या नहीं। अगर मनुष्य बौद्धिक रूप से पशुओं से श्रेष्ठ है तो वह बौद्धि‍क विमर्श में पशुओं को परास्त कर सकता है, किंतु वह इसके आधार पर पशुओं की हत्या नहीं कर सकता।

क्यों?

वह इसलिए, कि बहुत से ऐसे तल हैं, जहां पर मनुष्य और पशु समान हैं। “शौच”, “शयन”, “मैथुन”, “मरण”, “रोग”, “शोक”, “भय”। अवचेतन के अनेक ऐसे आदिम स्तर हैं, जहां मनुष्य पशुवत है, जहां वह ठीक उसी जगह पर है, जहां पशु होते हैं।

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इसे ऐसे समझें :

एक “हॉरिज़ॉन्टल लैंडस्केप” है। उस पर कई इमारतें खड़ी हैं। इनमें से कोई दस फ़ीट ऊंची है, कोई पचास फ़ीट ऊंची है, कोई हज़ार फ़ीट ऊंची है। यानी “वर्टिकल” ऊंचाइयों की जो सतह है, “आल्ट‍िट्यूड” की जो “ट्रैजेक्टरी” है, वह “ज़िग-ज़ैग” है, कोई ऊपर है कोई नीचे है। किंतु जो “तल” है, जो “ग्राउंड फ़्लोर” है, वहां सभी समान हैं। सबसे ऊंची इमारत भी अपने तल पर वहीं होती है, जहां सबसे नीची इमारत होती है। अंबानी का राजमहल भी उसी धरती पर खड़ा है, जिस पर किसी निर्धन की कुटिया।

मनुष्य प्राणियों में श्रेष्ठ है : किंतु बौद्ध‍िक धरातल पर, संवेदना के धरातल पर, नैतिक स्तर पर। लेकिन “शौच”, “शयन”, “मैथुन”, “मरण”, “रोग”, “शोक”, “भय”, इन तलों पर वह पशुओं से श्रेष्ठ नहीं है। वह वहां पर उनके “समकक्ष” है।

एक स्तर की श्रेष्ठता को दूसरे स्तर की श्रेष्ठता पर आरोपित करना, यह कुत्सित मांसभक्षियों का सबसे बड़ा कुतर्क है।

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सनद रहे : मरण के क्षण में मनुष्य ऐन वहीं पर होता है, जहां पशु होता है। मनुष्य की “बुद्धि‍”, “विवेक”, “मेधा”, इन सब श्रेष्ठ गुणों का उस क्षण में लोप हो जाता है। “जीवेषणा” उस पर हावी हो जाती है। हत्या के क्षण में एक मनुष्य उसी तरह से जीवन के लिए छटपटाता है, जैसे कोई पशु। और कोई पशु कभी इसलिए सहर्ष मरण को अंगीकार नहीं करता, कि एक कथित श्रेष्ठ प्राणी द्वारा उसकी बलि चढ़ाई जा रही है।

मैं फिर दोहराता हूं : “जीवेषणा” इस सृष्ट‍ि का सबसे पुराना, सबसे अटल नियम है। और जीवेषणा के स्तर पर सभी प्राणी समान हैं। और सभी को समान रूप से जीवन का अधिकार है।

और इसीलिए, एक पशु की हत्या एक मनुष्य की हत्या जितना ही घृणित, जघन्य और अनैतिक है। भोजन के लिए वैसा करना तो और वीभत्स।

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अगली किस्त में मांसभक्षियों के इस प्रिय कुतर्क का उच्छेदन कि “पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।”

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सुशोभित सक्तावत

मांसभक्षियों का तर्क

Beef Party and illogic arguments by non vegetarians.jpg

“सरकार यह कैसे तय करेगी कि हम क्या खाएं और क्या नहीं.”

अत्यंत वीभत्स, धूर्ततापूर्ण तर्क!

यह ठीक वैसे ही है, जैसे हत्यारों द्वारा यह कहना कि सरकार कैसे तय करेगी कि हम किसको मारें और किसको नहीं. या बलात्कारियों द्वारा यह कहना कि यह सरकार कैसे तय करेगी कि हम किसके साथ बलात् यौनाचार करें और किसके साथ नहीं!

सर, बहुत पुराना समाचार यह है कि, यह सरकार ही तय करेगी!

यह सरकार का ही काम है कि नियम क़ानून बनाए. और यह आपका काम है कि नियम का पालन करें.

“सरकार यह कैसे तय करेगी कि हम क्या खाएं और क्या नहीं”, महोदय, इस कथन में कितने पक्ष हैं?

सरकार और अवाम!

और, जिन्हें मारकर खाया जाना है वे? नहीं, उनका क्या पक्ष हो सकता है?

लोकतंत्र लोक के लिए है.

लंपट लोक की लालसा और लोभ की पूर्ति के लिए लोक के ही द्वारा रचा गया छल छद्म! नदी, पहाड़, जंगल, पशु, पक्षी, इस अधिकार-चेतना से विलग हैं. उनका कैसा अधिकार!

मनुष्य को लगता है कि वो इस संसार का ईश्वर है, इसका अधिष्ठाता! धूर्त, निर्लज्ज मनुष्य!

यह आप तय करेंगे कि किसको खाएं. किंतु किसे जीवित रहना है किसे नहीं, यह तय करने का अधिकार कहां से पाया, प्रिय मनुष्य? संविधान से? और संविधान किसने रचा?

सुना है, चोरों ने मिलकर कुछ क़ानून बनाए हैं! हास्यास्पद!

पशुवध पर पूर्ण और प्रभावी प्रतिबंध. इससे कम कुछ नहीं. क्या गाय, क्या सुअर, क्या धर्म, क्या अधर्म! सभी पशुओं को मनुष्यों के अनैतिक, जघन्य अत्याचारों से मुक्ति मिले!

और जो राक्षस नहीं जी सकते मांसभक्षण के बिना, वे पशुओं की स्वाभाविक मृत्यु की प्रतीक्षा करें, गिद्धों की तरह! मनुष्यों के बीच निकृष्ट तो वे ख़ैर तब भी कहलाएंगे!

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सुशोभित सक्तावत

और भी पढ़ें:

मांसभक्षियों के कुतर्क : 2

मांसभक्षियों के कुतर्क : 3

 

इलाहाबाद के बारे में कुछ भी लिखना जैसे जलते हुए तवे पर उंगलियों से अपनी ही कहानी लिखना है

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इलाहाबाद के बारे में कुछ भी लिखना जैसे जलते हुए तवे पर उंगलियों से अपनी ही कहानी लिखना है। दो हज़ार से लेकर चार हज़ार रुपये तक के सिंगल से कमरे में सैकड़ों ख्वाब, हज़ारों किताबें और अनगिनत तमाम हो चुके रजिस्टरों के जोड़-तोड़ में कैसे जिंदगी बीतती है, ये यहाँ रहने वाला ही बता सकता है। यहाँ जब घर से भेजे गए पैसे पर इलाहाबाद भारी पड़ने लगता है तो किसी पार्टनर की तलाश की जाती है। अगर एक वाक्य में इलाहाबाद के बारे में कहना हो तो, हम कह सकते हैं कि जिंदगी जहाँ पार्टनरशिप में गुजरती है उस जगह का नाम है इलाहाबाद। हजारों बर्बाद हो चुकी ख्वाहिशात के बीच भी जो एक छोटी सी उम्मीद बची रहती है कि चलो यूपीपीएससी ना सही एसएससी ही सही इसी को इलाहाबाद कहते हैं। और इस सूत्र वचन को समझाने वाला जीव ही पार्टनर होता है। मतलब हर चीज यहाँ पार्टनरशिप पर ही टिकी हुई है।

दो साथ में रहने वाले लड़के बस रुम पार्टनर या बेड पार्टनर ही नहीं होते बल्कि वो सब्जी के थैले से लेकर छोटके खाली सिलेंडर को भी दोनों ओर से पार्टनरशिप में पकड़े हुए ही चलते हैं। भले ही सामने से आ रही कोई आंटी जी बीच में पड़ कर टकरा जाएँ लेकिन सिलेंडर वाली यह पार्टनरशिप टूटती नहीं।

समय के साथ-साथ इस पार्टनरशिप की गहराई, लड़कों की लंबाई और घर वालों के उम्मीदों का आयतन बढ़ता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब रोते हुए छपरा के मुकेश को आजमगढ़ का सोनू चुप कराते हुए कहता है कि – भाई चुप हो जाओ, देख लेना वो कभी खुश नहीं रहेगी…। हालांकि है तो यह बद्दुआ ही। लेकिन जो सूकून मुकेश को इस बात का असर होते हुए सोचकर मिलता है, वह सूकून तो कभी प्रतिभवा भी उसे न दे सकी थी। उधर सोनू का कलेजा भी कुछ दिनों तक शंकर पान भंडार वाले के यहाँ बजते हुए गाने – इक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था को सुन कर आहें भरने लगता है जैसे प्रतिभवा से मुहब्बत में भी उसकी पार्टनरशिप रही हो। लेकिन कुछ पार्टनरशिप की उम्र यूपीपीएससी की तैयारी कर रहे लड़कों की जवानी जैसी होती है। कम्बख्त कब ख़त्म हो जाए पता ही नहीं चलता। साथ- साथ खाने वाले, साथ-साथ सोने वाले, दो पार्टनर में से एक कब अल्लापुर से निकल कर छोटा बघाड़ा में किसी और का पार्टनर बन जाता है, यह भी पता नहीं चलता। फिर किसी दिन अचानक अल्लापुर के राजू बुक डिपो पर कोई समसामयिकी खरीदने में दोनों टकराते हैं। साथ बिताई हुई रातों की करवटें और साथ-साथ ढोए गए खाली सिलेंडर की बची हुई थोड़ी सी गैस, एक छोटी सी मुस्कान में तब्दील हो कर होठों पर फैल जाती है। जिसका मतलब होता है कि – का हो ससुर मजा आवत हौ न अब अकेले बर्तन मांजते हुए…। दूसरी तरफ का लड़का भी उसी अदा से एक रहस्यमयी मुस्कान उछालता है जिसका मतलब है कि – हाँ ससुर तुम्हारे इहाँ से अच्छे हाल में ही हूँ।

इस तरह दो बिछुड़े हुए पार्टनर जिंदगी के किसी मोड़ पर दुबारा मिल कर नैनन ही सों बात कर लेते हैं। इलाहाबाद की संस्कृति में अकेले इलाहाबाद नहीं, इसमें बलिया बनारस छपरा आजमगढ़ समेत अनेक जिलों और प्रांतों की बोलियाँ, रूप और ख्वाब ठीक वैसे ही मिले रहते हैं जैसे चावल में कंकड़। जो लाख बीन कर निकालने के बाद भी किसी न किसी दाँत के नीचे आकर बता ही देता है कि- बेटा इलाहाबादी चावल और यूपीपीएससी को थोड़ा ध्यान से… बूझे कि नहीं। इलाहाबाद में लडकों की आर्थिक स्थिति के बारे में पूछा नहीं जाता।

बस उनकी रहने वाली जगहों से अपने आप पता चल जाता है और सीनियर्स इसी आधार पर जूनियर को सलाह भी देते हैं। जैसे एक जगह एक लड़के से सवाल हुआ – कहाँ रहते हो? जवाब मिलता है अल्लापुर में। तुरंत धमकी मिलती है – मेहनत करो बेटा ये जो कप में चाय लिए स्टाइल मार रहे हो न, इसकी कीमत घरवाले जानते होंगे तुम नहीं।

दूसरी जगह दूसरे लड़के से वही सवाल – कहाँ रहते हो?
जवाब मिलता है- सलोरी में। धमकी की जगह तुरंत सलाह आ जाती है – चाय के साथ-साथ पढ़ना भी जरूरी है दोस्त। तीसरी जगह तीसरे लड़के से वही सवाल – कहाँ रहते हो? जवाब मिलता है – कटरा में। सलाह तुरंत फीकी हँसी में बदल जाती है और कहा जाता है कि भाई आप अरबपति लोग न भी पढ़ो तो क्या फर्क पड़ता है। है कि नहीं…। इस तरह बिना बताए ही पता चल जाता है कि कौन गरीबी रेखा से नीचे वाला है और कौन मध्यमवर्गीय तथा कौन अमीर परिवार का। रुम कहे जाने वाले बारह बाई चौदह साइज़ के कैदखाने की आठ वाॅट के सीएफएल की दूधिया रोशनी से निकलकर इस कोचिंग से उस कोचिंग तक ही दिन कब बीत जाता है, कुछ पता ही नहीं चलता। हाँ! रात होने से पहले शाम को एक बार मोबाइल के एफ एम पर एक प्यारी सी नज़्म उभरती है, निदा फाज़ली की। जिसे सुनकर अल्लापुर के किसी रुम में बैठे मुकेश-सोनू या प्रयाग में सब्जी काट रहे दीनानाथ शुकुल ही नहीं, एलनगंज के आसपास किसी गर्ल्स हाॅस्टल के कमरे में अधलेटी प्रतिभवा भी और आधा इलाहाबाद भी उदास हो उठता है ।

आज ज़रा फुरसत पायी थी, आज उसे फिर याद किया,
बंद गली के आखिरी घर को खोल के फिर आबाद किया.।
बात बाहुत मामूली सी थी, उलझ गयी तकरारों में,
एक ज़रा सी ज़िद ने आखिर दोनों को बर्बाद किया.।।

समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस – हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है !

Chal Kahi Door Chale Jaye - Neelima Chauhan

#चलकहींदूरनिकलजाएँ

समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस – हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है !

जैसे मायके से बुलावा आने पर तंग करने वाले ससुरालियों को छोड़कर नवेली बहू भागती है वैसे ही दो दिन की भी छुट्टियां आ जाने पर हम दिल्ली छोड़ पहाड़ों की ओर भाग खडे़ होते थे ! ना कोई डर ना कोई आशंका ना कोई योजना …सिर्फ स्पिरिट के बल पर..

अल्लसुबह 4 बजे ही गली मुहल्ले को टाटा बाय बाय बाय कर देने की योजना बनती …नक्शे पर सबसे दूर के निर्जन पहाड़ी इलाके का लक्ष्य बनाया जाता ……जल्दबाजी में घर में ही एकआध बैग छूट जाता तो दिल को ये भरोसा देकर चुप कराते चलो बच्चे तो गिनके चारों गाड़ी में हैं ना वो नहीं छूटने चाहिए थे !

रास्ते में वहम होता भाई रसोई में गैस तो शायद जलती रह गई है ..
.सौ किलोमीटर दूर आके ऐसा वहम ..
उधर हमें वादियां और पहाड़ बुला रहे होते …
तब सोचते परिसर के प्लंबर को फोन करते हैं वह लकड़ी की सीढियों को छ्ज्जों पर टिकाकर ऊपर चढ़ लेगा और रसोई की खिड़की में से झांककर सही हालात का पता दे देगा अगर जल रही होगी तो खिड़की से लंबा डंडा डालकर गैस बुझा देगा ..
तीसरे ही माले का तो घर है उन्हें तो कई कई मालों पर चढ़ने का काम होता है !

एक बार तो निकलते हुए जल्दबाजी में हमारी हथेली कट गई थी खून काफी बह रहा था उधर बहन के पेट में तेज दर्द रात से ही उठ रहा था …..पर क्या करते पहाड़ों की हसीन वादियों की याद चुंबक बनी हमें खींच रही थी और दिल्ली से दो दिन की कुट्टा कर ही चुके थे ! सो मैं आधा लीटर खून लुटाकर और बहन कराह रूपी ट्रॉल को इग्नोर करते मंजिल पर पहुंच ही गए !

……दस साल पुरानी सेकेंड हैंड मारूति ऐट हंड्रड , चिलचिलाती धूप के थपेड़े, कम बजट ,दो दो चार चार साल के बच्चॉं की तंग गाड़ी में होती आपसी लडाइयां जिनकी गंभीरता भारत पाक सीमा विवाद से कतई कम लैवल की ना होती…….

…..एक बार हम चौपटा -तुंगनाथ की चोटी पर बैठे थे और घर में पानी की लाइन फटने से दरवाजे की गौमुखी से गंगा और जमुना की तेज धारा बह रही थी

फोन का संपर्क पहाडों पर कम ही हो पाता है सो दो दिन बाद पता चला अब क्या करें …हम तो 6 दिन की यात्रा पर आए थे दो दिन में कैसे लौट जाते …सो दिमाग के धोडे गधे सब दौडा डाले ..हल निकला कि मित्र जाकर घर का ताला तोडें, प्लंबर से लाइन जुड्वाकर नया ताला लगवा दें और दोस्ती का फर्ज निभाएं ……..

..हाय क्यों और कहां चली गई वो अल्हडता और बेफिक्री ..वो तंगहाली…वो नासमझी ….! आज अपनी ही उस कैफियत की खुद ही मुरीद हूं ! पर कुछ भी कर लूं नहीं लौट्ते वे दिन !

जैसे नर्सरी एडमीशन से पहले मां बाप बच्चे को केजी तक का स्लेबस रटा के ही दम लेते हैं कहीं कोई अच्छा स्कूल ना हाथ से निकल जाए .. वैसे ही महीने दो महीने पहले सफर की योजनाएं बनने लगती हैं…

साफ सुथरा चकाचक होटल सर्च करके ऑनलाइन बुक कराकर, पावती हाथ में लेकर, हेल्थ कार्ड लेकर ,इलाके की पूरी जानकारी पहले ही हासिल करके कहीं निकलते हैं कि कहीं कोई अच्छा टूरिस्ट प्वाइंट ना छूट जाए रास्ते में कोई संकट ना पड जाए पूरी तैयारी होनी चाहिए….!!

क्या करें दिमाग दिल से ज्यादा चालू हो गया है क्लास के सबसे मेधावी व हाजिर जवाब बच्चे की तरह ! क्लास पर उसी का कंट्रोल है …बाकी सब भावनाएं घर से पढकर ना आने वाले बच्चों जैसी बैक बेंचर बनीं रह जाती हैं ……

आह नहीं चाहिए ऐसी समझदारी और पैसा !
कोई लौटा दे मुझे मेरी नासमझी और बेफिक्री के दिन !!

कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा मानवाधिकार की राजनीति हो रही है

Major Gogoi Awarded

शाबाश, मेजर गोगोई !

भारतीय सेना के अधिकारी मेजर गोगोई द्वारा कश्मीर में एक पत्थरबाज को मानव ढाल के तौर पर इस्तेमाल के मुद्दे पर देश के कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा मानवाधिकार की जो राजनीति हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण और सेना का मनोबल तोड़ने की सुनियोजित साज़िश है। उपरी तौर पर सेना की यह कारवाई अमानवीय ज़रूर लगती है, लेकिन घटना की परिस्थितियों पर गौर किया जाय तो व्यापक हित में सेना का यह बेहद व्यवहारिक और मानवीय क़दम था। घटना के दिन बडगाम जिले के उटलीगाम के एक मतदान केंद्र में सुरक्षाकर्मियों के एक छोटे से समूह को हज़ार से ज्यादा हिंसक पत्थरबाजों ने घेर लिया था। पत्थरबाजों की उग्र भीड़ में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे जो मतदान केंद्र को आग के हवाले करने की धमकी दे रहे थे।

परिस्थितियां ऐसी थी कि फायरिंग कर दस-बीस लोगों की जान लिए बगैर मतदानकर्मियों और सुरक्षाकर्मियों को वहां से सुरक्षित निकाल ले जाना असंभव था। मेजर गोगोई ने दूरदर्शिता का परिचय देते हर पत्थरबाजों की अगली पंक्ति में खड़े एक व्यक्ति फारूक अहमद डार को पकड़ कर जीप के बोनट से बांधा और कवच के तौर पर उसका इस्तेमाल कर न सिर्फ सभी कर्मियों को सुरक्षित निकाल ले गए, बल्कि रक्तपात को भी टालने में सफल हुए। हमारी पुलिस भी अक्सर उग्र और हिंसक भीड़ में से ही कुछ लोगों को पकड़ कर और ढाल के तौर पर उनका इस्तेमाल कर बड़े रक्तपात को टालने की कोशिश करती रही है। व्यापक हितों के लिए कभी-कभी व्यक्तिगत मानवाधिकारों की कुर्बानी भी देनी होती है। घटना की परिस्थितियों को समझे बगैर ज़रा शाबाशी देने के बजाय सेना पर अमानवीयता का आरोप लगाकर उसे लांछित करने का चौतरफ़ा प्रयास निंदनीय है।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हमारी सेना कुछ गलत नहीं कर सकती। सेना में भी हमारी और आपकी तरह के लोग होते हैं। व्यक्तिगत हैसियत से कुछ सैनिकों ने कश्मीर में ज्यादतियां भी की होगी, लेकिन पिछले कुछ सालों में घाटी से सेना को हटाने की मुहिम में असफल होने के बाद पाकिस्तान में बैठे आतंकियों और कश्मीर में बैठे अलगाववादियों की शह पर सेना को कलंकित करने के लिए उस पर आरोपों की जैसी बौछार की जाती रही है, उससे सावधान रहने की ज़रुरत है। दुर्भाग्य से सेना के खिलाफ़ इस सुनियोजित दुष्प्रचार के सबसे मासूम शिकार हमारे देश के मानवाधिकारवादी और कथित बुद्धिजीवी ही हो रहे हैं।

ध्रुव गुप्त

गैंगरेप का गैंग शर्माता क्यों नहीं, माहवारी में तो शर्म आज भी है !

Himanshu Atmiy
उसका हल्का सा टॉप खिसक गया था, ब्रा की स्ट्रैप दिखाई देने लगी। कई लड़कों की निगाहें हवा से भी तेज रफ्तार के साथ उस काली स्ट्रिप को झांकने लगीं। निगाहें सिर्फ स्ट्रिप पर नहीं सीमित थीं। तभी शायद लड़की की मां ने देख लिया…इशारे में कहा जल्दी से संभालो। लड़के देख रहे हैं। स्ट्रिप संभालते हुए बस में चढ़ गई। अचानक से एक अधेड़ उम्र का शख्स लड़की से जोर से टकराता है। कांधे को घूर-घूरकर देखता है। बस की सीट को पकड़ते पकड़ते लड़की के हाथ को जोर से मसल देता है।
जी हां ये है यूपी। और ऐसी तमाम घटनाएं रोज होती हैं। ऑटो की बैक सीट में जब तीन लोगों के बजाए चार लोग बैठाए जाएं। और उसमें से तीन लड़के और एक लड़की हो। तो गौर कीजिएगा युवकों का यौवन चार लोगों से भी ज्यादा जगह घेरने लगता है। पैर टकराते हैं, हाथ गलती गलती में कांधे को छू जाते हैं।
सशक्तिकरण के झूठे फंदे में झूल रही लड़की व्यवस्थाओं को गौर से देखती है….उन व्यवस्थाओं के पीछे छिपे शोषण को देखती है। 1090 से लेकर डायल 100 तक सबको बारी बारी से अपने जहन में उतार लाती है। और उनके परिणाम समेत दुष्परिणाम दोनों को आंकती है। एक बार यह भी सोचती है कि जो मां माहवारी को छिपाने के लिए बचपन से इतनी कहानियां बनाती आई है। गंदा खून बताती आई है। वो खून जो हर महीने उसे निचोड़ देता है, तोड़ देता है। ब्रा को हमेशा तौलिये के नीचे टांगने की नसीहत देती आई है, पैंटी को कपड़ों के बीच में दबाने छिपाने के तरीके समझाती आई है।
India Gang Rape
आखिर वो कैसे इस बात को स्वीकार कर सकती है। ये तमाम सवाल अपाहिज व्यवस्थाओं को और लाचार बनाते रहे हैं। जब जब ये व्यवस्थाएं मजबूत होने की कोशिश करतीं तो इन्हें पैसे की हवस के चलते एक दफे फिर से तोड़ दिया जाता। दरअसल ये उदाहरण सूबे की ध्वस्त व्यवस्थाओं के पीछे की कहानी है। 1090 समेत तमाम दावे जो सशक्तिकरण कि दिशा में चलते हैं उनके असफल होने का वास्तविक कारण भी। निर्भया को तैयार करने वालों के पीछे की कहानी भी कहीं न कहीं इसी के इर्द गिर्द है। माह भर की बच्ची में भी ये समाज आज काम वासना तलाश लेता है और 90 साल की वृद्ध महिला में भी। भीख मांगती उस मासूम बच्ची जिसके पैर कीचड़ से सने हुए हैं…उसके गंदे पैरों से भी सेक्स तलाश लिया जाता है।
ब्रा, पैंटी से सेक्स तलाशा जाता है। लेकिन आज भी सेनेटरी पैड में लगा माहवारी का खून अपवित्र है। मंदिर में नहीं जा सकतीं, घर में रखी अलमारी को उस दौरान नहीं छुआ जा सकता।
वैश्यायें इन घटनाओं को देखकर आज भी कहती होंगी कि क्यों किसी मजलूम को शिकार बनाते हैं…जब हम मात्र 200 रुपये में मर्दानगी के कीड़े शांत करने का पर्याप्त बंदोबस्त करते हैं। लेकिन घटनाएं नहीं रुकतीं…वर्ष 2016 में बुलंदशहर में एनएच 91 में गैंगरेप की वारदात, 4 मई 2017 को जालौन में पति के सामने पत्नी के साथ गैंगरेप की वारदात, 25 मई 2017 को ग्रेटर नोएडा में गैंगरेप की कोशिश, अखबारो में छपी हेडलाइन कि मासूम के साथ बलात्कार और उसमें लोकेशन की जगह यूपी के अलग अलग जिलों के छोटे छोटे कस्बों का जिक्र…दरअसल ये तमाम मामले रुढ़िवादी सोच के बाद के दुष्परिणाम ही तो हैं।
उत्तर प्रदेश राज्य अपराध ब्यूरो की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में उप्र में दुष्कर्म की 3,467 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2015 में ये बढ़कर 9,075 हो गईं।
ये घटनाएं महज कानून व्यवस्था की मुस्तैदी भर से क्या रुक सकते हैं। शायद नहीं। निर्भया के गुनहगारों को फांसी की सजा मिली…क्या अपराध रुक गए। हालांकि सजा पर्याप्त है…माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लोगों ने जमकर प्रशंसा की। लेकिन असल में आवश्यकता है सजा के तरीकों को बदलने की। साथ ही घर से लेकर समाज के बीच में एक बेहतर सोच विकसित करने की कि स्ट्रिप दिख जाए तो गुनाह नहीं। अगर गुनाह है तो गैंगरेप, रेप। और उसकी सजा जो दिमाग के घोड़े छोड़ने के साथ साथ विकल्प के तौर पर एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई रखे।

प्रश्न किसी एक कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के मध्य उत्पन्न तनाव का नहीं है।


प्रश्न किसी एक कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के मध्य उत्पन्न तनाव का नहीं है। प्रश्न इस विराट लोकतंत्र के वैभवशाली इतिहास में सन्निहित विचारवान मस्तिष्कों के सम्मान की परंपरा के खण्डित होने का है। साहित्य और अध्यात्म का यद्यपि शासन-प्रशासन से प्रत्यक्ष संबंध गोचर नहीं होता है किंतु आदियुग से राजदरबारों में ऋषि वशिष्ठ, कृपाचार्य, विष्णुगुप्त चाणक्य, बिनोवा भावे, अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना, ज़ौक़, कालिदास, रामप्रसाद बिस्मिल, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, शिवमंगल सिंह सुमन, गोपालदास नीरज और बालकवि बैरागी जैसे अनेक उदाहरण सक्रिय राजनीति के अंग रहे हैं।
प्रत्येक कुशल शासक ने स्वयं को चाटुकारों और अहंकार से बचाए रखने के लिए इस वर्ग को अपने सलाहकारों में इसलिए रखा ताकि उसके राजवैभव को प्रशंसा के दीमक से अक्षुण्ण रखा जा सके। सृजन और अध्यात्म से जुड़ा व्यक्ति भीतर ऐसी फकीरी जीता है कि निजी लाभ-हानि के गणित को दरकिनार कर राजा को वस्तुस्थिति से अवगत कराने में उसकी जिव्हा न लड़खड़ाए।

कांग्रेस की टिकट पर राज्यसभा सांसद रहे दिनकर ने पदत्याग स्वीकार कर लिया किन्तु “सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है” जैसे उद्घोष को उच्चारते समय स्वर में किसी प्रकार की दुर्बलता उन्हें स्वीकार न थी। राजभवन के वैभव को त्याग कर वनवासी का जीवन जीना स्वीकार कर जब चाणक्य चंद्रगुप्त के दरबार से चल दिये थे तभी यह नियत हो गया था कि सियासत को “वैचारिक” संपदा का उपभोग करना हो तो सत्य के पुष्पहारों में बिंधे शूलों की चुभन सहन करनी ही होगी।

कुमार विश्वास की भाषा और उक्तियों का राजनैतिक अन्वेषण करते समय यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि वे मूलतः एक कवि हैं। सृजन का स्वाभिमान राजहठ की अट्टालिकाओं को लांघ न सकेगा तो अपना मार्ग अवश्य बदल लेगा। अश्वमेध का अश्व पकड़ते समय लव-कुश यदि अवध के वैभव से प्रभावित हो गए होते तो उत्तर रामायण के अनेक प्रश्न अनुत्तरित राह जाते।

राजा की शान में कसीदे पढ़ने वाले चाटुकारों ने बड़ी-बड़ी सत्ता को धराशायी कर दिया है और दशरथ के पुत्रमोह को कटु वचनों से लताड़ने वाले ऋषियों ने राम के व्यक्तित्व को निखार दिया है।

माननीय अटल जी और आडवाणी जी सत्ता के शीर्ष पर पहुँच कर भी नानाजी देशमुख जैसे चिंतकों से संसर्ग करते थे। इंदिरा जी अपने समय के साहित्य और कला के प्रति जागरूक रहती थीं। रचनाकार केवल अपने युग के प्रति उत्तरदायी होता है। एक मनुष्य होने के कारण यदि सम्मान और पद आदि का लोभ उसमें कभी जाग भी जाए तो वह लोभ तभी तक अस्तित्व में राह पाता है जब तक उसकी लेखनी की धार भौंथरी न होने लगे।

दिल्ली की सत्ता के सिरमौर राजनीतिज्ञों को कुमार विश्वास के क्रियाकलापों पर कोई भी निर्णय लेने से पूर्व यह निश्चित करना होगा कि फकीरी किसी दरबार में प्रविष्ट होकर भी फ़क़ीरी ही रहती है। सियासत की श्वासों में सत्यवक्ताओं की वायु प्रविष्ट होती रहे तो सत्ता की धमनियों में बहने वाला शोणित निरंकुशता के कर्करोग से अछूता रह पाता है।

© चिराग़ जैन

सुंदर लड़कियों वाला शहर

City of Beautiful Girls

बरसों बाद वह इस अपने पुराने शहर आया था। पुरानी यादों में डूबता उतराता। साथ में अपने एक ख़ास दोस्त को भी लाया था। लाया क्या था वह खुद नत्थी हो कर आ गया था। नत्थी हो कर आया था और अब नकेल बन कर सारे शहर को धांग लेना चाहता था। ऐसे जैसे वह कोई शहर न हो किसी औरत की देह हो और एक-एक पोर, एक-एक अंग, एक ही सांस में भोग लेना चाहता था। उस ने कहा भी कि, यह औरत नहीं शहर है ! वह शहर जो कभी उस का सपना था। इस सपने की शिफत में बड़ी शिद्दत और तफसील में वह उसे घुमाना चाहता था, उसी मन, उसी तड़पन के साथ जो कभी बीते बरसों में उस ने शेयर किया था।

कैमरा कंधे पर लटकाए वह भी साथ घूम रहा था लेकिन एक हड़बड़ी की तख़्ती टांगे हुए। उस की यह हड़बड़ी ही उस के सपनों के इस शहर में पैबंद बन रही थी। एक जगह चाट का ठेला लगा देखा तो वह बोला, ‘शरद, चाट खिलाओगे अपने शहर की ?’

‘बिलकुल, क्यों नहीं !’ शरद ने जोड़ा, ‘मेरे शहर की चाट में जो असीर है वह तुम्हें किसी और शहर में मिलेगी भी नहीं।’

चाट खा कर चलते हुए वह बोला, ‘हां भई, तुम्हारी चाट सचमुच बड़ी उम्दा थी।’ उस ने जोड़ा, ‘तुम्हारे शहर की चाट !’

‘और खाओगे ?’

‘नहीं अब कल फिर खा लेंगे ?’ वह रुका और छह-सात के झुंड में वहां से गुजरती हुई लड़कियों को भर आंख देखने लगा। पूरी बेहयाई से। शरद का मन हुआ कि उसे इस तरह देखने से टोके। पर जाने क्यों झिझक गया। टोका नहीं चुपचाप खुद भी खड़ा लड़कियों को देखता रहा। पर संजीदगी से। उस की तरह बेहयाई से नहीं। उन लड़कियों का ग्रुप अभी पूरी तरह से आंख से ओझल भी नहीं हुआ था कि लड़कियों के दो ग्रुप और सामने आ गये। शरद समझ गया कि यह सिलसिला यूं ही थमने वाला नहीं। लड़कियों के हिप्स की मूवमेंट, उस की दलदल में आंखों को धंसाते हुए शरद ने एक रिक्शा रोक लिया और बोला, ‘चल प्रमोद तू भी बैठ!’ प्रमोद रिक्शे पर बैठ गया तो शरद बोला, ‘चलो, तुम्हें वह नर्सरी स्कूल दिखाऊं जहां मैं पढ़ता था।’ वह बोला, ‘यहीं पास में ही है।’ फिर रिक्शे वाले को स्कूल का नाम बताया। रिक्शा चलने लगा तो दूसरे रिक्शों पर या पैदल चलती लड़कियों, औरतों को भी प्रमोद घूरता चला। अचानक बोला, ‘शरद एक बात है, तुम्हारे शहर की चाट ही नहीं, तुम्हारे शहर की लड़कियां भी सुंदर हैं। बहुत सुंदर हैं।’ उस ने जोड़ा, ‘सुंदर और सीधी।’

‘अच्छा !’

‘हां, शांत, गंभीर। सीधी, सुंदर और भोली। किसी तालाब में सोए हुए कमल के फूल की तरह।’ वह बोला, ‘छोटे शहर की लड़कियों की तुलना महानगरीय लड़कियों से करना बेमानी है।’

‘ये तो है !’

‘अब समझ में आती है पुरानी फिल्मों के गानों की तासीर। तब के शायर छोटे-छोटे शहरों और गांवों से गए थे मुंबई। तो उन के गानों में इन्हीं सुंदर और भोली लड़कियों के अक्स आए और वह गाने अमर हो गए। अब तो फिष्ल्मों में गाने वैसे भी अमूमन शायर लोग नहीं लिखते। कोई भी ‘लिरिक’ लिख देता है। लिख देता है महानगरीय लड़कियों के नाज-नखरे और मशीनी चेहरा देख कर। और गाने पिट जाते हैं।’

‘लड़कियों पर क्या रिसर्च कर रहे हो इन दिनों के गानों पर ?’

‘बात को तोड़ो नहीं।’ प्रमोद बोला, ‘पुराने गानों की तासीर यूं ही नहीं है।’ वह तफसील में आ गया, ‘अभी कुछ बरस ही हुए एक फिष्ल्म आई थी, ‘राजा हिंदुस्तानी।’

‘हां आई तो थी ! चली भी थी ठीक-ठाक !’

‘उस में एक गाना था, ‘परदेसी, परदेसी जाना नहीं।’ वह बोला, ‘यह गाना भी ख़ूब बजा था लेकिन अब कहीं जल्दी सुनाई नहीं देता। चला गया जाने कहां। तब जब कि गाने के बोल ही थे, ‘परदेसी जाना नहीं, मुझे छोड़ के।’ प्रमोद कहने लगा, ‘लेकिन कोई तीन दशक पहले एक फिल्म आई थी ‘जब-जब फूल खिले।’ उस में भी एक गाना था, ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना, परदेसियों को है एक दिन जाना। जिसे लता और रफी ने अलग-अलग एक ही धुन पर गाया था। यह गाना तो आज भी बजता है अपनी पूरी मिठास, अपनी पूरी मेलोडी के साथ। यह गाना नहीं गया। जानते हो क्यों ?’ वह बोला, ‘क्यों कि यह गाना जरूर ऐसे ही किसी छोटे शहर की किसी भोली और सुंदर लड़की को नजर कर के उसकी ही आंच में लिखा गया रहा होगा। जब कि ‘परेदसी जाना नहीं, जाना नहीं मुझे छोड़ के’ निश्चित ही किसी महानगरीय लड़की के ताप में लिखा गया होगा। इस लिए यह गरमी जल्दी उतर गई। पर वह ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना’ की आंच आज भी बाकी है।

‘किसी लड़की की आंच लग गई हो इस शहर में तुम्हें भी, तो बताओ ?’ शरद चुहुल करता हुआ बोला, ‘कि तुम भी कोई गाना ही लिख के बताओगे, बांचोगे इस आंच को ?’

‘नहीं भई, तुम संजीदगी को तोड़ो नहीं।’ वह रिक्शे पर बैठे-बैठे कैमरे के थैले को बाएं कंधे से उतार कर दाएं कंधे पर लटकाते हुए बोला, ‘मुझे तो कई बार अलीगढ़ जैसे शहर पर रश्क हो आता है। जानते हो क्यों ?’

‘क्यों ?’

‘क्यों कि वहां एक से बढ़ कर एक उम्दा गीतकार हुए। जां निसार अख़्तर ने कितने संजीदा, कितने भावुक और रोमांटिक गाने लिखे हैं और उन का वह ख़ून ही दौड़ा जावेद अख़्तर की देह में तो जावेद ने भी एक से एक लाजवाब गीत लिखे। मसलन ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा !’ और तो और नीरज के गीतों में ख़ास कर उनके फिल्मी गीतों में जो मांसलता, जो सौंदर्य इस सलीके से छलकता है तो क्या समझते हो इस में सिर्फ नीरज की काबिलियत है ?’ वह बोला, ‘हरगिज नहीं! इस में अलीगढ़ की उन सुंदर लड़कियों का भी बहुत बड़ा शेयर है। आगरा और कानपुर की लड़कियों का भी। तब उन्हों ने लिखा, ‘शोखि़यों में घोला जाए थोड़ा-सा शबाब, उस में फिर मिलाई जाए थोड़ी-सी शराब, होगा नशा जो तैयार, वो प्यार है, प्यार है ! वो प्यार !’

‘क्या बात है !’

‘और वो शहरयार भी तो अलीगढ़ के हैं। अलीगढ़ की ही किसी लड़की की आंखों पर ही तो उन्हों ने लिखा होगा, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं!’

‘ऐसे तो फिर मजरुह सुलतानपुरी ने भी सुलतानपुर या लखनऊ की लड़कियों को अपने गानों में गूंथा होगा। कैफी आजमी ने भी आजमगढ़ या लखनऊ की लड़कियों पर रीझ कर अपने गाने लिखे होंगे। फिर ऐसे ही शैलेंद्र, साहिर, शकील, गुलजार, वगैरह हर किसी के साथ उन के छोटे-छोटे शहरों या गांवों की लड़कियां भोली-भोली, सुंदर-सुंदर लड़कियां, उन के गानों में सोती मिल जाएंगी। तुम किस- किस को जगाते चलोगे ?’ शरद बोला, ‘और जो कोई लड़की बुरा मान जाए, जागने से इंकार कर दे तो ?’

‘तो क्या एक फोटो खीचूंगा और भाग चलूंगा !’ कह कर वह खिलखिला कर हंसा और बोला, ‘सच में झूठ नहीं बोल रहा, तुम्हारे शहर की लड़कियां सचमुच बहुत सुंदर हैं !’

‘पर क्या करोगे, यह अलीगढ़ नहीं है !’ शरद ने तंज भरा जवाब दे कर उसे टोका।

‘पर इस शहर की सारी लड़कियां तुम्हारी बहन भी नहीं हैं !’ शरद के तंज का जवाब प्रमोद ने भी ताने में डुबो कर दिया।

‘बेवकूफी की बात मत करो !’ रिक्शे से उतरते हुए शरद बोला।

‘सॉरी यार तुम तो बुरा मान गए !’ वह फिर से बोला, ‘सॉरी, वेरी सॉरी !’

स्कूल आ गया था। रिक्शे वाले को पैसे दे कर दोनों स्कूल के आहाते में घुस आए। बच्चों की छुट्टी हो चुकी थी पर स्कूल अभी खुला था। स्कूल का बड़ा-सा मैदान वैसा ही था जैसे शरद के बचपन के दिनों में था। वह यह देख कर खुश हुआ। लेकिन हरी घास नहीं थी, पहले की तरह। यह देख कर थोड़ी आंखों को तकलीफ हुई। मैदान के चारों ओर लगे पेड़ों का घनापन भी गायब था। पेड़ थे, लेकिन कुछ-कुछ। आम, लीची और यूकलिप्टस के पेड़। एक पेड़ के नीचे वह दुकान भी नहीं थी जहां से कभी कभार टिफिन टाइम में वह चूरन, चर्खी, पपड़ी और लेमनचूस ख़रीदता था। कभी पैसे दे कर तो कभी रफ कापियों की रद्दी बेंच कर। उस ने यह सब डिटेल्स प्रमोद को दिए तो प्रमोद ने कैमरा निकालते हुए मुसकुरा कर कहा, ‘तुम्हारे बचपन की दो चार फोटो ले सकता हूं ?’

‘अब मेरा बचपन कहां है ?’ शरद बोला, ‘अब तो बचपन की याद है बस।’

‘तो उसी याद की !’ कैमरे की लेंस ठीक करते हुए प्रमोद बोला, ‘और क्या?’

इधर-उधर शरद को खड़ा कर प्रमोद फोटो खींचने लगा और शरद उसे बचपन की बातों का बेबात विस्तार देते हुए। छिटपुट शैतानियों का, टीचर्स और बचपन के दोस्तों की यादों का कोलाज परोसने लगा। छोटी-छोटी बातों का बेबात विस्तार देते हुए। कि, ‘बरसात में यहां पानी भर जाता था तो वह मेढक पकड़ता था, उधर गुल्ली-डंडा खेलता था, इधर कबड्डी और उन पेड़ों के झुरमुटों के बीच आइस-पाइस और यहां क्लास की लड़कियों के साथ एक्खट-दुक्खट !’

‘मतलब लड़कियां तुम्हारी जिंदगी में बचपन से ही शुमार रही हैं ?’

‘क्या बेवकूफी की बात करते हो ?’ शरद बोला, ‘बचपन था तब। नर्सरी स्कूल है यह, डिग्री कालेज या यूनिवर्सिटी नहीं।’

‘हां, पर इतना बड़ा कैंपस तो अब के डिग्री कालेजों को भी मयस्सर नहीं !’ वह बात को रंग देता हुआ बोला, ‘जितना बड़ा कैंपस तुम नर्सरी स्कूल में ही देख गए हो !’

‘ये बात तो है !’

‘पर ये स्कूल है कि थिएटर !’ लाल रंग की उस बिल्डिंग का मुआयना करते हुए वह बोला, ‘आओ इधर खड़े हो जाओ, एक फोटो तुम्हारी यहां भी खींच दूं।’ फोटो खींचने के बाद अपनी दाढ़ी खुजाते हुए उस ने सवाल फिर दुहराया, ‘ये स्कूल है कि थिएटर !’

‘है तो असल में थिएटर ही !’

‘क्या ?’

‘हां !’ शरद बोला, ‘कभी अंगरेज बहादुर यहां थिएटर और डांस ही देखते थे। ब्रिटिश पीरिएड की बिल्डिंग है यह।’

‘वो तो दिख ही रही है।’

‘हां, पर अब भी थिएटर होता है यहां कभी-कभार !’

‘अच्छा ?’ प्रमोद हैरत में पड़ता हुआ बोला, ‘तो पढ़ाई कब होती है ?’

‘पढ़ाई दिन में, थिएटर रात में।’

‘क्यों तुम्हारे शहर में कोई दूसरा थिएटर नहीं है ?’

‘नहीं, प्रोफेशनल थिएटर और इस तरह का तो नहीं।’ शरद बोला, ‘हां, बनने की बात हो गई है। दो बरस पहले सुना था शिलान्यास भी हो चुका है।’

‘अच्छा ?’ प्रमोद पास की रेलवे पटरी को उचक कर देखते हुए वह बोला, ‘अच्छा तो जब ट्रेन यहां से गुजरती है तो क्या नाटक में खलल नहीं पड़ता ?’’

‘बिलकुल नहीं।’ शरद बोला, ‘दो एक मिनट में ट्रेन गुजर जाती है और जब ट्रेन गुजरती है तो जो कलाकार जहां होता है, वहीं फ्रिज हो जाता है। ट्रेन गुजर जाती है तो वह जस का तस शुरू हो जाता है।’

‘तुम ने भी यहां नाटक देखे हैं ?’

‘बहुत !’ शरद बोला, ‘नाट्य प्रतियोगिताएं भी।’ वह बोला, ‘कई स्टेट लेबिल ड्रामा फेस्टिवल हुए हैं यहां।’

‘गजब !’
‘असित सेन की याद है तुम्हें ?’

‘वही कॉमेडियन असित सेन ?’

‘हां।’

‘पर उस का तो निधन हो चुका है।’

‘हां, पर सुनता हूं कि एक समय असित सेन भी यहां थिएटर कर चुके हैं।’

‘तो क्या असित सेन इसी शहर के थे ?’

‘तो ?’

‘नहीं मैं समझ रहा था, बंगाली आदमी कलकत्ते वगैरह का होगा !’

‘तुम असित सेन को सिर्फ कॉमेडियन के तौर पर ही जानते हो ?’

‘हां, वह भी बोगस कॉमेडियन ! हमेशा एक ही स्टाइल। वही बों बों कर के बोलना !’

‘तुम ने राजेश खन्ना, वहीदा रहमान वाली ‘ख़ामोशी’ या अशोक कुमार, सुचित्रा सेन वाली ‘ममता’ फिल्में देखी हैं ?’

‘देखी हैं।’ प्रमोद बोला, ‘क्यों क्या हुआ ?’

‘कैसी लगी ?’

‘गजब ! फैंटास्टिक !’ वह बोला, ‘रेयर और सीरियस फिल्में हैं यह और इन के गाने भी !’

‘जानते हो इन का डायरेक्टर कौन था ?’

‘पता नहीं, याद नहीं आ रहा !’

‘तो सुनोगे तो चौंकोगे !’

‘कौन था ?’

‘यही असित सेन ! जिन्हें तुम अभी बोगस कॉमेडियन बोल रहे थे।’

‘वो बों-बों करने वाला !’

‘हां, वही !’ शरद बोला, ‘दिक्कत यही है कि असित सेन कॉमेडियन को तो लोग जानते हैं पर उन के डायरेक्टर रूप को बहुत कम लोग जानते हैं। जब कि वह गजब के डायरेक्टर थे ! राजेश खन्ना की और भी कई हिट फिल्में असित सेन ने डायरेक्ट की हैं।’ वह बोला, ‘एक समय में विमल रॉय जिन्हों ने दिलीप कुमार वाली देवदास बनाई थी, उन विमल रॉय के भी असिस्टेंट रहे थे असित सेन !

‘रहे होंगे यह तुम्हारे असित सेन विमल रॉय के असिस्टेंट और कॉमेडियन भी।’ प्रमोद बोला, ‘पर ख़ामोशी और ‘ममता’ फिल्मों के डायरेक्टर जो असित सेन थे वह दूसरे असित सेन तो बंगला फिल्मों के भी मशहूर डायरेक्टर रहे हैं। अभी कुछ समय पहले ही उनका भी निधन हुआ है। जबकि तुम्हारे इस असित सेन को गुजरे कुछ साल हो गए।’

‘अच्छा !’ शरद अचकचाते हुए बोला।

‘उदास मत हो।’ प्रमोद बोला, ‘फिर भी इस तुम्हारे स्कूल और असित सेन के थिएटर को अंदर से भी देखना चाहिए !’

‘चलो देखते हैं !’ कह कर शरद प्रमोद को ले कर स्कूल बिल्डिंग कम थिएटर में दाखि़ल होने लगा तो एक चपरासी ने टोकते हुए रोका। शरद ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ कर बताया कि ‘वह यहां का पुराना स्टूडेंट है, पुरानी याद ताजी करना चाहता है !’ तो वह चपरासी मुसकुराते हुए मान गया।

इस थिएटर का आर्किटेक्ट देख प्रमोद विस्मित हुआ। फिर शरद ने बताया कि यहां स्टेज पर भी उस ने पढ़ाई की है। तब शायद वह थर्ड या फोर्थ में था। यहां स्टेज पर तब दो क्लासें लगती थीं। एक घटना भी उसे याद आई। एक लड़की ने उस की स्याही की दावात चुरा ली थी। नाम था उस का सविता। सुंदर-सी थी। भोली-सी। बहुत कम बोलती थी। बहुत झगड़ा हुआ था उस से उसका। तीन-चार दिन तक चला था झगड़ा। उस ने उसके बाल पकड़ कर एक दिन खींचा तो उस ने शरद की पीठ पर जोर से काट लिया। इस का बदला शरद ने एक दिन आइस पाइस खेलते हुए लिया। एक पेड़ के पीछे दोनों छुपे थे। दो और लड़के थे। पर शरद ने मौका पाते ही सविता को काटने की कोशिश की। वह जोर से चिल्ला पड़ी। सो शरद ठीक से काट नहीं पाया। वह डर गया। तो सविता हंसने लगी। बाकी लड़के भी। फिर सविता से उस की दोस्ती हो गई।’ वह याद करते हुए बोला, ‘फिर तो क्लास में किसी भी से झगड़ा होता तो सविता और शरद दोनों मिल कर लड़ते।’

‘मतलब मामला जम गया !’

‘नहीं, तब ऐसा कुछ ध्यान में भी नहीं था। फिर भी जैसा कि फ्रायड मानता है, बचपन के सेक्स पर उस की जो मान्यता है, वह कहीं सही भी है। मैं ने और सविता ने भी एक पेड़ के पीछे इसी स्कूल में खेल-खेल में सही, सेक्स-सेक्स भी खेला। ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ वाले खेल में’ शरद भावुक होता हुआ बोला, ‘तब सच में वह सेक्स नहीं था, एक जिज्ञासा भर थी, देखने, छूने और महसूस करने की। वह जिज्ञासा जो मुझ में थी, वह जिज्ञासा सविता में भी थी शायद। वह भी यह ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेली। पर बाद में बोली, ‘गंदी बात ! छि !’ फिर कई दिनों तक वह उस से बोली नहीं। और फिर एक दिन अचानक वह स्याही वाली दावात देती हुई बोली, ‘अपनी दावात ले लो, लेकिन अब कुट्टी।’ फिर उस ने एक अंगुली से अपने गाल, ठुड्डी और माथा छूती हुई बोली, ‘दाल, भात, रोटी, सब्जी कुट्टी।’ उस ने जोड़ा, ‘पक्की कुट्टी !’ और ठुड्डी पर हाथ मार कर दांत से दांत ‘कट्ट’ करा दिए। वह उठने लगी तो जल्दबाजी में दावात की स्याही उस के स्कर्ट पर गिर गई। वह झटके से बोली, ‘कल स्याही भी ला कर दे दूंगी।’

‘वह दूसरे दिन स्याही लाई ?’

‘हां भाई।’ शरद बोला, ‘पर पहले मैं ने ली नहीं। कहा कि कुट्टी है तो स्याही क्यों लूं ? दोस्ती करो तभी लूंगा स्याही। नहीं, नहीं लूंगा।’

‘फिर ?’

‘फिर उस ने दाल, भात, रोटी, सब्जी कह कर चेहरे पर उंगलियां घुमाई और कुट्टी कैंसिल कर मुच्ची कर ली। दोस्ती कर ली तो मैं ने स्याही ले ली। हम लोग फिर से ‘आइस-पाइस’ और ‘एक्खट-दुक्खट’ खेलने लगे।’

‘अब कहां है वह ?’

‘कौन ?’

‘वही तुम्हारी सविता ?’

‘पता नहीं।’ शरद एक गहरी सांस ले कर बोला, ‘है तो पर स्मृतियों में !’

‘क्यों ? सिर्फ स्मृतियों में क्यों ?’

‘क्यों कि उस का घर, उस का मुहल्ला, उसके पिता का नाम मैं न तब जानता था, न अब जानता हूं। तब भी सिर्फ नाम जानता था, अब भी सिर्फ नाम जानता हूं।’

‘कभी पता करने की कोशिश नहीं की ?’

‘बिलकुल मूर्ख हो क्या ?’ शरद बोला, ‘वह उम्र लड़कियों का पता मालूम करने की होती है क्या ? तब इतनी समझ होती है क्या ?’

‘हां, तब तो सिर्फ ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेलने की समझ होती है !’ कह कर प्रमोद जोर से हंसा। बोला, ‘कोई और ऐसी याद ! जो तुम्हारी स्मृतियों में हो !’

‘हां एक लड़का सम मुखर्जी था। हम लोग जब मेढक पकड़ते तो वह उन छोटे-छोटे मेढकों को मक्खी की तरह मार कर खा जाता। बल्कि निगल जाता ! ऐसी बहुतेरी यादें हैं। टीचरों की, प्रिंसिपल की, दोस्तों की, बार-बार हुए झगड़ों की। अब तो उन झगड़ों की भी बस मीठी-मीठी याद है। जाने कौन टीचर, कौन साथी कहां-कहां होंगे ? किसी के बारे में कोई नहीं जानता !’ वह बोला, ‘पर हो सकता है सब की स्मृतियों में वह सब कुछ ऐसे ही बसा हो। हमें तो लगता है जैसे कल ही की बात हो। अभी घंटी बजेगी, प्रार्थना होगी, राष्ट्रगान होगा, क्लास शुरू होगी, टिफिन होगी, खेलेंगे, खाएंगे, झगड़ेंगे, फिर घंटी बजेगी, क्लास लगेगी, छुट्टी होगी और लड़ते झगड़ते घर जाएंगे। पीठ पर बैग लादे।’

‘चलो मैं ने भी कैमरा अब कंधे पर लाद लिया है।’ प्रमोद बोला, ‘घंटी बजवाओ कि बाहर कहीं और चलें।’

स्कूल की स्मृतियां सहेजे शरद प्रमोद को लिए स्कूल से बाहर आने लगा तो यूकलिप्टस के पेड़ के नीचे से वह फिरंगियां बीनने लगा जो कि तब के दिनों में बीनता था और नचाता था। उस ने दो तीन फिरंगियां सड़क पर उंकड़ई बैठ के नचाईं भी और प्रमोद को दिखाया। बताया कि, ‘यह खेल भी था बचपन में।’

प्रमोद ने भी कोशिश की यूकलिप्टस वाली फिरंगियां नचाने की। पर नचा नहीं पाया।

‘तुम कैमरा ही नचाओ, वही बहुत है !’

‘ये तो है।’

दोनों स्कूल से बाहर आ गये। सड़क पर कुछ लड़कियों को देख कर प्रमोद फिर बोला, ‘‘सचमुच तुम्हारे शहर की लड़कियां बहुत सुंदर हैं। बहुत भोली !’

‘पर कहा न तुम से कि यह अलीगढ़ नहीं है। लेकिन लड़कियां सुंदर है, क्लिक करती हैं ये मैं मानता हूं।’ शरद बोला, ‘जानते हो जब मैं बी॰ ए॰ में पढ़ता था तो मार्निंग क्लास में एडमिशन लिया था। दिन के ग्यारह बजे तक छुट्टी हो जाती थी और मुहल्ले की ज्यादातर क्या हर जगह लड़कियों के स्कूलों की छुट्टी तकरीबन शाम को ही होती। अब इन्हें कैसे देखूं ? तो शाम को किसी न किसी बहाने लड़कियों के स्कूल के रास्ते साइकिल ले कर निकल पड़ता। वह सब भागी-भागी, पैदल-पैदल घर आती होतीं और इधर से मैं साइकिल से जाता होता। धीरे-धीरे।’ वह बोला, ‘लड़कियां भी समझती थीं रोज-रोज मैं क्या करता हूं। और बिन बोले बात हो जाती।’ उस ने जोड़ा, ‘और आंखों को यूरिया मिल जाती। मन को स्फूर्ति !’

‘गजब !’ प्रमोद बोला, ‘अभी कहीं लड़कियों के किसी स्कूल की तुरंत-तुरंत छुट्टी हुई हो तो चलें ?’

‘छुट्टी हुए तो बहुत देर हो गई होगी।’ वह बोला, ‘अब किसी भी रास्ते पर जाना बेकार है !’

‘ख़ैर छोड़ो !’ प्रमोद ने कहा, ‘कुछ और भी दिखाओगे ?’

‘बिलकुल।’ शरद बोला, ‘तो कम से कम चार छः रोज तो रुको ही। एक दो रोज में क्या देख पाओगे। फिर चलो तुम्हें गांव की स्मृतियों से भी रूबरू कराऊं !’

‘गांव वगैरह तो रहने दो अभी।’ वह रुका फिर बोला, ‘यह बताओ तुम्हारे गांव में बाग है ?’

‘है ! क्यों ?’

‘कुछ नहीं।’ वह बोला, ‘जब तुम्हारे गांव चलेंगे तब बाग में रुकेंगे। वहीं बाग में मटन, चिकन कुछ बनाएंगे, दारू पिएंगे और मजा लेंगे !’

‘ठीक ! तो इसी बार चलो।’

‘नहीं अगली बार कभी।’

‘चलो तुम्हें कुछ और चीजें दिखाता हूं।’

‘मसलन !’

‘एक बड़ा मंदिर है यहां। ख़ूब मशहूर !’

‘मंदिर वगैरह भी रहने दो !’

‘इस मंदिर की ख़ासियत यह है कि मनौती तो सब की यहां पूरी होती ही है, मेला भी लगता है हर साल। बड़ा भारी कैंपस है।’ उस ने जोड़ा, ‘इस शहर के सारे जोड़े भी यहीं मिलते हैं। कई लोगों की शादियां भी यहीं तय होती हैं। लड़कियां भी लोग यहीं देखते हैं। और जाने क्या-क्या तो होता है यहां !’

‘इंटरेस्टिंग !’ वह बोला, ‘यह बताओ कोई लड़की मेरी शादी के लिए मुझे अभी दिखा सकते हो ?’

‘तुम्हें शादी करनी भी है ?’

‘मैं सीरियस हूं।’ वह बोला, ‘तुम्हारे शहर की लड़कियों को देख कर !’

‘कितनी बार इस तरह तुम सीरियस हो चुके हो ?’

‘इस बार सचमुच सिरीयसली सिरियस हूं !’

‘सच !’

‘हां, भाई !’

‘तो अगली बार कभी फिर आना तो देखा जाएगा !’

‘अगली बार क्यों ? इसी बार क्यों नहीं ?’

‘कुछ ढंग के कपड़े भी तो पहने होते तुम !’

‘क्यों यह सिल्क का कुर्ता ढंग का नहीं है ? और ये पैंट भी ठीक है।’ वह बोला, ‘हां दाढ़ी थोड़ी करीने से नहीं है !’

‘तो ?’

‘तो क्या वहां यह बताने की जरूरत भी क्या है कि मैं लड़की देखने आया हूं।’ वह बोला, ‘रुटीन में देख लूंगा। समझ आई तो ठीक। बाद में बात हो जाएगी।’

‘तो चलो !’ कह कर दोनों एक परिचित के घर पहुंचे। जहां एक लड़की थी शादी के इंतजार में। प्रमोद को लड़की पसंद भी आ गई और प्रमोद ने आंखों-आंखों में शरद को संकेत किया कि बात अभी शुरू कर दिया जाए। पर शरद टाल गया।

घर से बाहर निकल कर प्रमोद बड़बड़ाने लगा, ‘बात शुरू करने में हर्ज क्या था?’

‘हर्ज था। तभी तो बात नहीं की।’

‘क्या हर्ज था ?’

‘पहले लड़की की, लड़की के घर वालों की राय भी तो जाननी होगी।’ शरद बोला, ‘चलो तुम तैयार हो पर क्या गारंटी है कि लड़की और लड़की के घर वालों को तुम भी पसंद हो ?’ वह बोला, ‘यह कोई हिंदी फिल्म का सीन तो है नहीं कि देखा और ख़यालों-ख़यालों में शादी हो गई ।’

‘चलो तुम बात कर के बताना !’ प्रमोद बोला, ‘नाराज क्यों होते हो !’ कह कर वह एक जगह रुका और सिगरेट में चरस भरने लगा। चरस भर कर सिगरेट सुलगाते हुए बोला, ‘चलेगी ?’

‘चलेगी। लेकिन प्लेन।’ शरद बोला, ‘यह चरस वाली नहीं।’

‘कोई एकांत जगह है यहां ?’

‘क्यों ?’

‘कोई पार्क ? या कोई और जगह ! जहां बैठ कर सिगरेट पी जा सके। सुकून से बैठ कर गाने गुनगुनाए जा सकें।’

‘हां, है थोड़ी दूर पर।’ वह बोला, ‘आइडिया अच्छा है !’

रिक्शा रोक कर दोनों सिगरेट सुलगाए बैठ गए। एक प्लेन सिगरेट पर था, दूसरा चरस वाली सिगरेट पर। अचानक प्रमोद बोला, ‘यहां कहीं शराब की दुकान होगी ?’

‘क्यों ?’

‘क्वार्टर-अद्धा कुछ ले लेते हैं। थोड़ी-थोड़ी खींच लेंगे।’

‘ठीक है !’ कह कर रिक्शे वाले से उस ने कहा, ‘किसी अंगरेजी शराब की दुकान पर चलो। जो पास में हो !’

एक अद्धा विह्स्की के साथ दो तीन पानी की ठंडी बोतलें, दो गिलास और नमकीन का पैकेट लेकर फिर दोनों चल पड़े। रिक्शा उस पार्क के पास आ गया था पर शरद को पार्क दिखाई नहीं दे रहा था। रिक्शा वाला बोला, ‘यही जगह है !’ तो बड़बड़ाते हुए वह उतर पड़ा। प्रमोद भी उतरा।

‘यहीं कहीं वह पार्क होता था। काफी बड़ा-सा।’

‘पार्क है तो !’ प्रमोद बोला।

‘कहां ?’

‘वो देखो उधर। पर बड़ा नहीं छोटा है।’

‘यह तो बाजार है।’

‘बाजार भी है और पार्क भी !’

‘पर यहां पहले तो बाजार नहीं था। न ही यह पार्क इतना छोटा था। न ही ये बिल्डिंगें थीं, न सामने यह कॉलोनी, न इतनी चमचमाती ट्यूब-लाइटें।’

‘कितने साल बाद तुम अपने इस शहर आए हो ?’

‘यही कोई दस बारह साल हुए होंगे।’

‘तो तुम चाहते हो इतने सालों में तुम्हारा शहर बिलकुल न बदले ?’ प्रमोद बोला, ‘तुम्हारे स्कूल के मैदान में घास गशयब थी तो तुम दुखी हो गए। पेड़ कम देख कर दुखी हो गए।’ वह बोला, ‘अब तुम यहां बाजार, आफिसों की बिल्डिंग और नई कॉलोनी देख कर दुखी हो रहे हो। यह तो कोई बात नहीं हुई ! अरे, मैं कहता हूं कि इस नास्टेल्जिया से छुट्टी लो, छुट्टी ! दुखी होना बंद करो !’

‘मैं दुखी नहीं हो रहा।’ शरद बोला, ‘मै तो सिर्फ एक बात कह रहा हूं। कह रहा हूं कि यहां ऐसा नहीं था।’

‘हां, ये बात और है।’

‘जानते हो इस को हम लोग पार्क के नाते नहीं स्कूल के नाते जानते थे। एक छोटा-सा हिस्सा पार्क के तौर पर भी था। बस ! बड़ा-सा मैदान था इतना कि जिश्ला स्तर पर स्कूलों के खेल यहीं होते थे। तुम्हें पता है यहीं मैं एक पेड़ के पीछे एक लड़की से जब-तब मिलता था जो तब मेरे साथ पढ़ती थी।’

‘अब तुम कहोगे कि वह पेड़ दिखाई नहीं दे रहा !’

‘हां, बिलकुल।’ शरद बोला, ‘वह बड़ा-सा इमली का पेड़ था। था तो इमली का पेड़ पर काया उस की बरगद के पेड़-सी विशाल थी।’ वह पुरानी यादों में खोता हुआ बोला, ‘जानते हो इमली जब फली होती तो वह जब-तब बड़े मनुहार से कहती, ‘मेरे लिए इमली नहीं तोड़ोगे ?’ ख़ास कर कच्ची इमली तोड़ने पर वह ज्यादा जशेर देती और जब मैं कहता कि, ‘नहीं, नहीं तोड़ पाऊंगा।’ तो वह कहती, ‘लोग अपनी माशूकाओं के लिए चांद तारे तोड़ लाते हैं और तुम थोड़ी सी कच्ची इमली नहीं तोड़ सकते ?’ वह धिक्कारती, ‘तुम मेरे लिए कुछ करना ही नहीं चाहते !’

‘क्यों नहीं तोड़ देते थे तुम इमली ?’ प्रमोद सिगरेट पीता हुआ बोला, ‘क्यों उस का दिल तोड़ते थे ?’

‘इस लिए कि मैं अपने हाथ पांव नहीं तोड़ना चाहता था।’ शरद बोला, ‘उस पेड़ पर चढ़ना आसान नहीं था, कोई बड़ा डंडा पास नहीं होता था। हां, फिर भी मैं उसे इमली खिलाता था।’ वह बोला,

‘खरीद कर लाया होता था। कभी कच्ची, खट्टी इमली, कभी मीठी-खट्टी और पकी इमली। और वह ज्यों इसरार करती, इमली का पैकेट उसे थमा देता ! उस का इसरार फिर भी इमली तोड़ने पर रहता तो उसे जगजीत सिंह की गाई एक गजल गुनगुना कर सुना देता था, ‘तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है। तेरे आगे चांद पुराना लगाता है।’ इस गजल में कहीं यह भी बात आती थी कि तुझ से मिल कर खट्टी इमली भी मीठी लगती है और न मिलने पर शहद भी खारा लगता है। कुछ-कुछ ऐसा ही। पर वह मिसरे अभी ठीक-ठीक याद नहीं आ रहे।’ वह बोला, ‘यह सुनते ही वह खुश हो जाती और फिर उस के खट्टेपन की सिसकारी भरने लगती। बेपरवाह हो जाती। इसी बीच कभी-कभी मैं उसे कस के पकड़ कर चूम लेता। तो कभी वह खिस्स से हंसती हुई शरमा जाती तो कभी नाराज होती हुई उठ कर खड़ी हो जाती। अपनी साइकिल उठाती और लाख रोकने पर भी चली जाती। उस का मूड ही कुछ और था। अजीब मूडी थी।’

‘कहां है इन दिनों यह तुम्हारी मूडी इमली वाली गर्ल फ्रेंड ?’ प्रमोद तंज करता हुआ बोला, ‘या कि नर्सरी स्कूल वाली सविता की तरह इस का भी अता पता मालूम करने की उम्र तब नहीं थी ? कि तब भी नादान थे ?’

‘नहीं तब ऐसी उम्र थी।’ शरद बोला, ‘पता भी है कि कहां है ?’

‘कहां है ?’

‘जाने भी दो, शादी-वादी हो गई है उस की।’

‘अच्छा ?’ प्रमोद बोला, ‘शादी के बाद भी कभी भेंट हुई इस इमली वाली से तुम्हारी ?’

‘हां, दो तीन बार। लेकिन यूं ही रुटीन !’

‘अब तो बच्चे भी हो गए होंगे ?’

‘हां, दो बच्चे हैं।’

‘अच्छा इस इमली वाली के साथ भी कभी, डॉक्टर-डॉक्टर खेला तुम ने ?’

‘क्या बेवकूफी की बात करते हो ?’

‘इस में बेवकूफी क्या है ?’

‘इस उम्र में डॉक्टर-डॉक्टर खेला जाता है भला ?’

‘तो ?’

‘तो क्या ?’

‘मतलब कुछ हुआ ही नहीं ?’ प्रमोद बोला, ‘ऐसा तो हो नहीं सकता तुम्हारे साथ कि ‘मैं ने तुम को छुआ और कुछ नहीं हुआ।’ वह बोला, ‘कुछ तो हुआ ही होगा इमली वाली के साथ !’

‘हां, सिनेमा देखा !’ शरद बोला, ‘उसी में जो उसे टटोल पाया टटोला, चूमा! बस। वह भी बड़ी मुश्किल से !’

‘मतलब बात ‘आइस-पाइस’ तक रह गई। डॉक्टर-डॉक्टर नहीं खेल पाए। क्यों ?’ उस ने पूछा, ‘क्या इमली वाली तैयार नहीं हुई ?’

‘वह तो तैयार थी !’

‘तो ?’

‘जगह ही नहीं मिली।’ शरद बोला, ‘तब हम संकोची बहुत थे। यह छोटा शहर हमारे संकोच को और बड़ा कर देता। तब इतना खुलापन भी नहीं था। हमारे घर भी दूर-दूर थे।’ वह बोला, ‘चाह कर भी संभव नहीं हुआ !’

‘शादी क्यों नहीं की तुम ने इमली वाली से ?’

‘संकोच !’ शरद बोला, ‘यह कहने की सोचता ही रह गया और उस की शादी तय हो गई।’

‘शादी में गए थे तुम ?’

‘गया था !’

‘बुरा नहीं लगा ?’

‘‘बुरा-भला सब संकोच के पत्थर में दब-दबा गया था !’

‘चलो यह भी एक ट्रेजिडी है। मिडिल क्लास ट्रेजिडी !’ प्रमोद बोला, ‘ऐसा बहुतों के साथ होता है ! प्यार करते-करते भइया बन जाते हैं।’ वह रुका और बोला, ‘तुम तो भइया नहीं बन गए ?’ उस ने जोड़ा, ‘इमली वाली के भइया !’

‘नहीं।’ शरद बोला, ‘इतनी दुर्गति नहीं हुई।’

‘चलो फिर लकी हो !’

‘क्यों ?’

‘अब मेरा ही लो।’ शराब देह में ढकेलता हुआ प्रमोद बोला, ‘तीन चार बार भइया बन चुका हूं।’

‘अच्छा ?’

‘तो और क्या ?’

‘छोड़ो भी कुछ और बात करते हैं।’ शराब ख़त्म करते हुए प्रमोद ने बोतल नीचे फेंक दी। बोला, ‘तुम्हारे इस शहर में रेड-लाइट-एरिया है कहीं ?’

‘होता तो था पहले।’ शरद बोला, ‘पता नहीं अब क्या हालत होगी ?’

‘हां, हो सकता है उस का भी नक्शा बदल गया हो !’

‘हो सकता है !’

‘तुम कभी गए हो इस शहर के रेड-लाइट-एरिया में ?’

‘हां, जब पढ़ता था यहां तो दो चार दफा गया हूं।’ शरद बोला, ‘हस्त मैथुन से आजिज आ कर !’

‘अच्छा, यहां जाते संकोच नहीं लगा ?’

‘लगा ! पर छुपते-छुपाते चोरों की तरह गए।’ शरद बोला, ‘पर यहां की औरतों के साथ संभोग करना, न करना बराबर ही है।’

‘क्यों ?’

‘इन बाजारू औरतों का ध्यान तो सिर्फ पैसे पर होता है। एक ग्राहक निपटा कर, दूसरा पटाने पर ध्यान रहता है। तो संभोग का सुख ऐसे में तो मिलता नहीं। तिस पर ‘ऐसे करो, यह मत छुओ, यहां मत करो’, ‘जो करना है जल्दी करो’ जैसे काशन मन ख़राब कर देते।’ शरद बोला, ‘वो तो कहो कि तब लौंडे थे, कबड्डी-कबड्डी वाला जमाना था, जाते ही डिस्चार्ज हो जाना था, तो दो चार बार चल गया। लेकिन हस्त मैथुन से भी ज्यादा आजिज हो गया। तो फिर नहीं गया।’ वह बोला, ‘तब तो दो चार बार चला भी गया, अब तो बिलकुल संभव नहीं है। कम से कम मेरे लिए।’ शरद थोड़ा और तफसील में गया, ‘संभोग जैसी चीज सुकून और सलीके से होनी चाहिए तब उस का सुख मिलता है। कहीं तन के साथ मन भी इनवाल्व हो तब सेक्स का सुख मिलता है। जो इन बाजारू और गंदी औरतों के साथ संभव नहीं। कम से कम मैं तो उन के साथ संभोग नहीं कर सकता। बिलकुल नहीं।’

‘तो तुम वहां चल कर भी कुछ नहीं करोगे ?’

‘बिलकुल नहीं।’ शरद बोला, ‘बल्कि मेरी राय है कि तुम्हें भी नहीं जाना चाहिए।’ वह बोला, ‘वैसे भी पचासियों यौन बीमारियां सुनता हूं लोग वहां से ले कर लौटते हैं !’

‘अब भाषण झाड़ कर मेरा मूड मत ख़राब करो। चुपचाप चले चलो।’ वह बोला, ‘कंडोम का कवच किस लिए है ?’

‘पर हजूर हम अंदर नहीं जाएंगे।’ रिक्शा वाला बोला, ‘बाहर सड़क पर उतार देंगे। आप लोग चले जाइएगा।’ उस ने जोड़ा, ‘वैसे भी अब वहां कुछ रह नहीं गया है!’

‘कुछ तो है ?’ प्रमोद बलबलाता हुआ बोला।

‘अब जा कर के खुद देख लीजिए !’

अपने कहे के मुताबिक रिक्शा वाला सड़क पर ही उतार कर चलता बना।

आंख चुराते हुए शरद प्रमोद को लिए उस बदनाम गली में दाखिल हुआ। जा कर वहां की उस चाय की गंदी दुकान पर आंख झुका कर बैठा। इधर-उधर ताक झांक की। लेकिन कोई भी औरत इधर-उधर भटकती या इशारा करती नहीं दिखी। दो एक औरतें दिखीं भी तो बूढ़ी, लाचार और बेख़बर !

कोई भड़वा भी पास नहीं आया कुछ पूछने। प्रमोद बैठे-बैठे उकता रहा था। शरद ने उस से पूछा, ‘चाय पियोगे ?’

‘नशा उतारना है क्या ?’ वह उकताया हुआ बोला।

‘अच्छा चलो, दो एक दूसरी जगह चलते हैं।’

‘चलो !’ कह कर उस ने कैमरा कंधे पर टांग लिया। प्रमोद के साथ शरद इस गली, उस गली जल्दी-जल्दी भागता फिरा। फिर भी कोई औरत बुलाती, संकेत करती या उस स्टाइल की नहीं दिखी। मकान भी शरद ने गौर किया, कई बदल गए थे। कई कच्चे खपरैल के मकानों की जगह पक्के दुमंजिले मकान थे। फिर भी कुछ खपरैल वाले कच्चे मकान अभी छिटपुट बाकी थे।
‘क्या यहां भी सब कुछ बदल गया ?’ प्रमोद उतावली में बड़बड़ाया।

‘हां, काफी कुछ !’

‘यह रेड-लाइट-एरिया है भी ?’

‘है तो !’

‘मुझे तो लगता नहीं।’

‘लेकिन है यह वही जगह।’ कह कर शरद ने प्रमोद के साथ तीन चार घरों के दरवाजे भी बारी-बारी खटखटाए। पर कोई रिस्पांस नहीं मिला। उलटे दो जगह तो लोग ‘समझ’ गए और भिंड़ गए। बोले, ‘यह शरीफों का मुहल्ला है !’

शरद ने प्रमोद से हाथ जोड़ा। पर प्रमोद मानने वाला नहीं था। एक आदमी को पकड़ लिया। उस से पूछ ताछ की तो उस आदमी ने बताया कि, ‘है तो साहब रेड लाइट एरिया ही यह। पर इधर पुलिस की सख़्ती ज्यादा बढ़ गई है।’ वह बोला, ‘अभी कल ही बारह लड़कियां पकड़ी गई हैं, सो आज सन्नाटा है !’

‘मुझे तो स्टेशन छोड़ दो !’ प्रमोद बिगड़ता हुआ बोला।

‘क्यों ?’ शरद ने पूछा, ‘क्या शादी में नहीं चलोगे ?’

‘मैं अब फेड-अप हो गया हूं।’ वह बोला, ‘किसी शादी वादी में नहीं जाना। बस तुम मुझे स्टेशन छोड़ दो।’

‘तुम पर इस समय शराब सवार है कि चरस ?’ शरद ने पूछा, ‘यह औरत की तलब तो है नहीं ?’

‘आई डोंट नो।’ प्रमोद अंगरेजी पर उतर आया, ‘यू डोंट आर्गू !’

‘लेकिन ?’ शरद ने कुछ कहना चाहा।

‘नो फरदर डिसकसन !’ प्रमोद आजिज हो कर बोला।

शरद भी तब कुछ नहीं बोला। प्रमोद को रिक्शे से स्टेशन छोड़ कर शादी अटेंड करने चला गया। उन्हीं लस्त पस्त कपड़ों में। क्यों कि यह उस का अपना ही शहर था। सुंदर लड़कियों वाला शहर ! कोई अलीगढ़ नहीं था !


मेरी गैस की सब्सिडी बंद हो गई

Subsidised Gas on Aadhar Card

मेरी गैस की सब्सिडी बंद हो गई। हमेशा की तरह हड़काने पर एजेंसी वाला नहीं हड़का, बल्कि इस बार उसने लिख कर और मुहर मार कर दे दिया कि बिना आधार के सब बेकार है। मेरा इकलौता निजी बैंक खाता बंद होने के कगार पर आ गया है। एक संभावनाशील संयुक्‍त खाते की केवाइसी के अभाव में भ्रूण हत्‍या हो गई है। दूसरे संयुक्‍त खाते से मेरा नाम कट गया है। सीए ने कहा है कि 1 जुलाई से मेरा पैन कार्ड भी बंद हो जाएगा। ड्राइविंग लाइसेंस बरसों पहले गल चुका है। चौतरफा दबाव में मैं यूआइडी की साइट पर पहुंचा और पाया कि ईश्‍वर सामने वाली गली में है- ”बालाजी पैन एंड आधार एजेंसी”।

सैद्धांतिक संकल्‍प की बलि चढ़ाने के उत्‍साह में उछलते हुए मैं बालाजी के दरवाज़े पहुंचा। दो लौंडे बैठे थे। मैंने पूछा- भाई साब, आधार बन जाएगा? वे बोले- हां जी, क्‍या लाए हैं? मैंने पैन कार्ड दिखाया तो उन्‍होंने एड्रेस प्रूफ मांगा। वो मेरे पास था नहीं। मैंने अपनी पत्‍नी का आधार दिखाया जिस पर उनके मायके का पता दर्ज था। एक लौंडे ने दूसरे से कहा- कर दे यार! दूसरे ने अहसान जताया- ‘वैसे हम लोग पति के पते पर पत्‍नी का आधार बनाते हैं, लेकिन चलिए, आपका कर देते हैं।’ फॉर्म पर प्रूफ की जगह उसने रेंट अग्रीमेंट पर सही का निशान लगा दिया। मैंने पूछा ये चलेगा? ‘आप टैंसन न लो सरजी’, जवाब मिला। अपराधी की तरह दस उंगलियां छापकर और आंख की पुतली नपवा कर मैं आश्‍वस्‍त हो गया।

पान दबाते हुए मैंने ऐंवेई पूछा- आप तो ऑथराइज्‍़ड सेंटर हैं न? पहले लौंडे ने कहा- ‘नहीं, प्राइवेट’। मैंने उसे यूआइडी की वेबसाइट पर प्रकाशित सेंटर लिस्‍ट दिखाई जिसमें उसका नाम-पता दर्ज था। थोड़ा गंभीर मुद्रा बनाते हुए लड़के ने कहानी सुनाई जो कुछ यूं है: ”ऐसा है कि मोहनजी के नाम पर एजेंसी रजिस्‍टर हुई थी इसी नाम से… बालाजी। यहीं पर। उन्‍हें सरकार ने इक्विपमेंट नहीं दिया, तो उन्‍होंने हमें ये एजेंसी दे दी। हमारे पास इक्विपमेंट अपना है तो काम चल रहा है। जिस दिन हमारा रजिस्‍ट्रेशन हो जाएगा, उस दिन नाम भी बदल जाएगा। अभी तो हम 200 रुपया ले रहे हैं। कंपनी को कमीशन भी तो देना होता है।” कौन सी कंपनी? क्‍या ये डेटा सरकार के पास नहीं जाएगा? उसने बताया, ”हम भेजते तो यूआइडी में ही हैं लेकिन काम प्राइवेट कंपनी के लिए करते हैं।”

अभिषेक श्रीवास्तव