क्या “अयोध्या”, क्या “अमरनाथ”

अमरनाथ यात्रा के प्रति कश्मीरियों का द्वेष अयोध्या के प्रति मुस्ल‍िमों के द्वेष से कम नहीं है, ऐसी धारणा अगर बन गई है, तो यह निर्मूल नहीं है। अमरनाथ इधर पिछले नौ सालों से कश्मीर का "अयोध्या" जो बन गया है। और यही कारण है कि अमरनाथ यात्र‍ियों पर हमला करने के अनेक मायने होते... Continue Reading →

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अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

जिस कश्मीर में मानवाधिकार के नाम पर ज्यूडिशियली खुद संज्ञान ले कर एक पत्थरबाज आतंकी को दस लाख का मुआवजा देने की सरकार को सिफ़ारिश करती हो उस कश्मीर में अगर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में... Continue Reading →

लिबरल कम्‍युनिस्‍ट व्‍यावहारिक होते हैं

  "लिबरल कम्‍युनिस्‍ट व्‍यावहारिक होते हैं। उन्‍हें सैद्धांतिकी वाले तरीके से नफ़रत होती है। उनके लिहाज से आज कोई एकल शोषित वर्ग नहीं है। केवल कुछ ठोस समस्‍याएं हैं जिन्‍हें हल किया जाना है- अफ्रीका में भुखमरी, मुस्लिम औरतों की बदहाली, धार्मिक कट्टरपंथी हिंसा। जब कभी अफ्रीका में मानवीय संकट होता है- और लिबरल कम्‍युनिस्‍ट... Continue Reading →

जीएसटी से भारतीय लेखकों को नुकसान

जी एस टी के चक्कर में मेरी कई किताबें फ्लिप्कार्ट पर आने से रह गई हैं । कुछ समय पहले बड़ी मुश्किल से प्रकाशक को समझा-बुझा कर किताबों को आन लाईन करवाया था । प्रकाशक ने आज बताया कि हो सकता है जो कुछ किताबें फ्लिप्कार्ट पर हैं , वह भी कुछ दिन में हट... Continue Reading →

किसान आंदोलन और गांधी-टैगोर डिबेट

किसान आंदोलन चल रहा है। आंदोलन महाराष्ट्र से शुरू हुआ था और अब इसने मध्यप्रदेश को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। आंदोलनकारियों की अनेक मांगें हैं, जिनमें कर्जमाफ़ी जैसी अनैतिक मांग भी शामिल है। आंदोलनकारी किसानों ने आपूर्ति तंत्र को अपहृत कर लिया है। दूध, फल और सब्ज़ियों के उत्पादन और वितरण के "मैकेनिज़्म"... Continue Reading →

मांसभक्षियों के कुतर्क : 3

"पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।" ## यह मांसभक्षियों का सबसे प्रिय तर्क है। और मज़े की बात यह है कि मांसभक्षियों को यह भी नहीं पता कि यह एक "आत्मघाती" तर्क है, यानी यह तर्क स्वयं की ही काट करता है। ज़ाहिर है, मांसभक्षण से "प्रोटीन" मिले या ना मिले, "तर्कक्षमता" तो अवश्य... Continue Reading →

मांसभक्षियों के कुतर्क : 2

_______________________________________________ [ मेरी मंशा है कि शृंखलाबद्ध रूप से मांसभक्षियों के कुतर्कों का एक-एक कर उच्छेदन किया जाए। उसी कड़ी में यह ] *** कुतर्क : "मनुष्य की हत्या की तुलना पशु की हत्या से नहीं की जा सकती, क्योंकि मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है।" ## यह मांसभक्षियों का प्रिय तर्क है। आश्चर्य होता है... Continue Reading →

मांसभक्षियों का तर्क

"सरकार यह कैसे तय करेगी कि हम क्या खाएं और क्या नहीं." अत्यंत वीभत्स, धूर्ततापूर्ण तर्क! यह ठीक वैसे ही है, जैसे हत्यारों द्वारा यह कहना कि सरकार कैसे तय करेगी कि हम किसको मारें और किसको नहीं. या बलात्कारियों द्वारा यह कहना कि यह सरकार कैसे तय करेगी कि हम किसके साथ बलात् यौनाचार... Continue Reading →

इलाहाबाद के बारे में कुछ भी लिखना जैसे जलते हुए तवे पर उंगलियों से अपनी ही कहानी लिखना है

इलाहाबाद के बारे में कुछ भी लिखना जैसे जलते हुए तवे पर उंगलियों से अपनी ही कहानी लिखना है। दो हज़ार से लेकर चार हज़ार रुपये तक के सिंगल से कमरे में सैकड़ों ख्वाब, हज़ारों किताबें और अनगिनत तमाम हो चुके रजिस्टरों के जोड़-तोड़ में कैसे जिंदगी बीतती है, ये यहाँ रहने वाला ही बता... Continue Reading →

समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस – हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है !

#चलकहींदूरनिकलजाएँ समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस - हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है ! जैसे मायके से बुलावा आने पर तंग करने वाले ससुरालियों को छोड़कर नवेली बहू भागती है वैसे ही दो दिन की भी छुट्टियां आ जाने पर हम दिल्ली... Continue Reading →

कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा मानवाधिकार की राजनीति हो रही है

भारतीय सेना के अधिकारी मेजर गोगोई द्वारा कश्मीर में एक पत्थरबाज को मानव ढाल के तौर पर इस्तेमाल के मुद्दे पर देश के कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा मानवाधिकार की जो राजनीति हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण और सेना का मनोबल तोड़ने की सुनियोजित साज़िश है। उपरी तौर पर सेना की यह कारवाई अमानवीय ज़रूर लगती है, लेकिन घटना की परिस्थितियों पर गौर किया जाय तो व्यापक हित में सेना का यह बेहद व्यवहारिक और मानवीय क़दम था।

गैंगरेप का गैंग शर्माता क्यों नहीं, माहवारी में तो शर्म आज भी है !

उसका हल्का सा टॉप खिसक गया था, ब्रा की स्ट्रैप दिखाई देने लगी। कई लड़कों की निगाहें हवा से भी तेज रफ्तार के साथ उस काली स्ट्रिप को झांकने लगीं। निगाहें सिर्फ स्ट्रिप पर नहीं सीमित थीं। तभी शायद लड़की की मां ने देख लिया...इशारे में कहा जल्दी से संभालो। लड़के देख रहे हैं। स्ट्रिप... Continue Reading →

प्रश्न किसी एक कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के मध्य उत्पन्न तनाव का नहीं है।

प्रश्न किसी एक कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के मध्य उत्पन्न तनाव का नहीं है। प्रश्न इस विराट लोकतंत्र के वैभवशाली इतिहास में सन्निहित विचारवान मस्तिष्कों के सम्मान की परंपरा के खण्डित होने का है। साहित्य और अध्यात्म का यद्यपि शासन-प्रशासन से प्रत्यक्ष संबंध गोचर नहीं होता है किंतु आदियुग से राजदरबारों में ऋषि वशिष्ठ,... Continue Reading →

सुंदर लड़कियों वाला शहर

बरसों बाद वह इस अपने पुराने शहर आया था। पुरानी यादों में डूबता उतराता। साथ में अपने एक ख़ास दोस्त को भी लाया था। लाया क्या था वह खुद नत्थी हो कर आ गया था। नत्थी हो कर आया था और अब नकेल बन कर सारे शहर को धांग लेना चाहता था। ऐसे जैसे वह कोई शहर न हो किसी औरत की देह हो और एक-एक पोर, एक-एक अंग, एक ही सांस में भोग लेना चाहता था। उस ने कहा भी कि, यह औरत नहीं शहर है ! वह शहर जो कभी उस का सपना था। इस सपने की शिफत में बड़ी शिद्दत और तफसील में वह उसे घुमाना चाहता था, उसी मन, उसी तड़पन के साथ जो कभी बीते बरसों में उस ने शेयर किया था।

मेरी गैस की सब्सिडी बंद हो गई

मेरी गैस की सब्सिडी बंद हो गई। हमेशा की तरह हड़काने पर एजेंसी वाला नहीं हड़का, बल्कि इस बार उसने लिख कर और मुहर मार कर दे दिया कि बिना आधार के सब बेकार है। मेरा इकलौता निजी बैंक खाता बंद होने के कगार पर आ गया है। एक संभावनाशील संयुक्‍त खाते की केवाइसी के... Continue Reading →

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