भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है

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डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है. यह हिंदू शासकों के लिए भी उतना ही सही है, जितना कि मुस्ल‍िम शासकों के लिए. अतीत के लिए भी, आज के लिए भी.

ग़ौरी, गज़नवी, चंगीज़, तैमूर, दुर्रानी, अब्दाली जैसे मुस्ल‍िम आक्रांता लूटखसोट की फ़िराक़ में थे. हिंदुस्तान पर राज करने की उनकी नीयत ना थी.

ख़ास तौर पर 1739 में पहले नादिर शाह और फिर 1761 में अहमद शाह ने तो हिंदुस्तान की केंद्रीय सल्तनत को उसके घुटनों पर झुका दिया था.

अनेक इतिहासकारों को अचरज होता है कि नादिर शाह महज़ “तख़्तेताऊस” की लूट से ही ख़ुश था, जबकि चाहता तो हिंदुस्तान की बादशाहत उसके नाम होती!

चंगीज़ो तैमूर के वंशज बाबर ने अपने लश्कर का रुख़ हिंदुस्तान की ओर इसलिए मोड़ा था, क्योंकि समरकन्द को जीतने में वो लगातार नाकाम रहा था. लेकिन चंगीज़ो तैमूर के उलट उसने हिंदुस्तान में खूंटा गाड़ दिया, जैसे उससे पहले गाड़ा था मामलूक़ों, तुग़लकों, खिलजियों और लोदियों ने.

लेकिन अवाम?

इतिहासकार इस समूची परिघटना को “कॉन्क्वेस्ट” के तर्क के साथ याद रखते हैं और निहायत ग़ैरसहानुभूतिपूर्ण तरीक़े से अवाम के अंतर्तम पर बात करने से इनकार करते हैं.

जिसकी तलवार, उसका ज़ोर!
जिसकी लाठी, उसकी भैंस!

तब सदियों तक चले “हिंदू जेनोसाइड” की तो बात ही क्या करें, जब कश्मीर में पंडितों के जेनोसाइड को ही रद्द करने के लिए महाकविगण कमर कसे हों!

ये तमाम सिलसिला जैसे भुला देने लायक़ हो और “प्रतिशोध के काव्य-न्याय” का, “सामूहिक अवचेतन की तुष्टि” का यहाँ कोई महत्व ही ना हो, जिसे कि “सामाजिक न्याय” की व्यवस्था की धुरी माना गया!

हुक़ूमत और अवाम के रिश्तों को लेकर लोहिया की बात सही है और “ग्रेट मुग़ल्स” के राज में भी हिंदुस्तान में “ह्यूमन राइट्स इंडेक्स” बहुत ऊपर चला गया हो, वैसा नहीं था.

अकबर के राज में बहुत अमन था, कलाओं का बहुत विस्तार था, गंगा जमुनी का स्वर्णकाल था, ऐसा कहते हैं, लेकिन हिंदू बहुसंख्य समाज यवनों के राज में मनोवैज्ञानिक रूप से मुतमईन कैसे रह सकता था? हमारा इतिहास इस मनोवैज्ञानिक बेचैनी का अध्ययन करने के बजाय उस पर संगीन चुप्पी साध लेता है.

आज अगर अरब देशों पर कोई हिंदू या यहूदी राजा अधिकार कर ले और बेहतर सुशासन स्थापित कर दे, तो क्या वहां के मुसलमान इस पर राज़ी ख़ुशी से रहेंगे?

आज़ादी की लड़ाई में “गंगा जमुनी” का “पर्सपेक्टिव” बदल गया था और अब वे दोनों मिलकर एक “साझा दुश्मन” से लड़ रहे थे. तो क्या उस साझा दुश्मन का वजूद ही उस भाईचारे का परिप्रेक्ष्य था? और अगर, वह शत्रु परिदृश्य से हट जाए तो?

आज़ादी के समय हिंदू मुसलमान दोनों ही समान रूप से ग़रीब और पसमंदा इसलिए भी थे कि अधिकतर मुसलमान तो “कनवर्टेड” थे. वे वही थे, जो उनसे पहले हिंदू हुआ करते थे, और हुक़ूमत के मेवे उन तक नहीं पहुँचे थे.

आज अकसर भारतीय मुसलमान कहते हैं कि हम तो “कनवर्टेड” हैं, इसलिए हम तो इसी देश के मूल निवासी हैं. लेकिन यह बात 1947 में उनको याद क्यों नहीं आई थी, जब उन्होंने अपना अलग मुल्क मांगा था?

मुझे बार बार लगता है हिंदुस्तान का इतिहास एक नए “नॉन सेकुलर” और “मोर एनालायटिकल पर्सपेक्टिव” के साथ लिखे जाने की ज़रूरत है.

हमें एक भ्रामक इतिहास पढ़ाया जाता रहा है.

“अ पोलिटिकली मोटिवेटेड एंड अपोलोजेटिक रीडिंग ऑफ़ हिस्ट्री”. इसको दुरुस्त करना ज़रूरी है!

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सुशोभित सक्तावत

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फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है…पढ़िए पूरा मामला

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फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है। इलाहाबाद में एसएससी की तैयारी करता है। अपना खर्चा निकालने के लिए लक्ष्मी टाकीज के पास चिकन रोस्ट की दुकान लगाता है। दुकान की आमदनी से अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ घर वालों को भी पैसे भेजता है। घर वालों को इस बारे में कुछ नहीं पता है। पहली बार जब उसने पैसे बचाकर १५ हज़ार रुपए में ठेला लिया था तो वो दूसरे दिन ही चोरी हो गया था। पहले दिन की कमाई मात्र तीस रुपए थी। लेकिन लड़के ने हार नहीं मानी। उसने तय किया कि अब वो ये जरूर कर के रहेगा। कुछ महीने बाद उसने किराए के ठेले पर फिर से दुकान शुरू की। अब महीने में अच्छी खासी कमाई कर लेता है।

अनुभव पूछने पर बता रहा था कि शुरू में ये सब करने में शर्म आती थी। बाद में उसे यह एहसास हुआ कि मेहनत करना और आत्मनिर्भर होना शर्म की बात नहीं है।

उसके प्रेरणाश्रोत उसके गुरु है जिससे उसने यह काम सीखा है। वह दिल्ली में यही काम करते थे। आज वह सेंट्रल गवर्मेंट में अच्छी खासी नौकरी करते हैं। नौकरी के साथ पुराना काम भी देखते हैं। दिल्ली में उनकी तीन शटर की दुकान है जहां हर तरह के नानवेज आईटम मिलते हैं। दुकान से महीने में लगभग ५ लाख रुपए की कमाई होती है। कर्मचारियों की सैलरी देने के बाद ४ लाख बचते हैं। कर्मचारी के रूप में ऐसे लड़के रखे और प्रशिक्षित किए जाते हैं – जो जरूरतमंद और पढ़ने लिखने वाले होते हैं ।

यह देखकर अच्छा लगा कि भारत में इस तरह का बिजनेस और स्टडी कल्चर धीरे-धीरे डेवलप हो रहा है। यह यहां के युवाओं के लिए अच्छा संकेत है। अपनी पढ़ाई के लिए स्किल्ड और आत्मनिर्भर होना कोई बुरी बात नहीं है। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। दुनिया में वही इंसान असल मायने में सफल है जो अपने पैरो पर खड़ा होकर आगे बढ़ता है। चरम बेरोजगारी के दौर में इस कल्चर को अपनाने और प्रोत्साहित किए जाने की सख्त जरूरत है ।

इनको और इनके गुरु को सलाम !

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प्रद्युम्न यादव

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वक़्त के साथ बदलते बाबाओं के अवतार

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आज एक बाबा ने कहर ढा रखा है। रेप के आरोप में दोषी पाए गए हैं और उनके भक्त दो राज्यों में आपातकाल जैसे हालात लाने पर उतारू हैं। 25 से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं और जगह-जगह आगजनी की खबरें सामने आ रही हैं। हर कोई सोच रहा है कि बाबा में ऐसा क्या है जो लोग जान लेने-देने पर उतारू हैं। दरअसल यह बाबा बाकियों से अलग हैं, नाम है बाबा गुरमीत राम रहीम जी इंसां.. हर धर्म से कुछ न कुछ उधार ले लिया है और राम, रहीम से पहले इंसान होने का दावा करते हैं। यह कूल टाइप बाबा हैं, रॉकस्टार हैं और मल्टी-टैलंटेड भी। अब जब रेप के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं तो पंजाब और हरियाणा को जलने के लिए छोड़ दिया है।

समझना जरूरी है कि एक के बाद एक बाबा और उनके अलग-अलग अवतार आते कहां से हैं। दरअसल बाबाओं से पहले संत महात्मा और भगवान का कॉन्सेप्ट आया। भगवान की परिकल्पना ही इसलिए की गई थी जिससे लोगों का जब खुद पर भरोसा टूटने लगे तो किसी तीसरी शक्ति पर भरोसा करके काम पूरा करने की हिम्मत करें। पहले यह शक्ति तकलीफ के वक़्त याद की जाती थी, फिर इसका नाम लेकर डराया जाने लगा। बात तो तब बिगड़ी जब भगवान को धरती पर उतारने का दावा करके अलग-अलग तरह के सेंटर खोल दिए गए। यहां लोगों को तकलीफ के वक़्त खुशी मिलने उम्मीद में और तकलीफ न होने पर डराकर बुलाया जाने लगा।

अगला कदम भगवान के सेंटरों में काम करने वालों ने उठाया और भगवान से सीधा कनेक्शन होने का दावा करने लगे। जिन लोगों का अट्रैक्शन पहले भगवान और फिर उनके सेंटरों तक ही था, अब भगवान के दूतों से अट्रैक्ट होने लगे। ये दूत संत और बाबा बनकर लोगों की मदद करने लगे। कुछ सच में दूसरों की मदद करना चाहते थे और कुछ अपनी। रोज़ सैकड़ों लोग उनके सामने सिर झुकाने लगे और उन्हें लगने लगा कि वह खुद ही भगवान हैं। भक्तों को भी इस बात पर यकीन करने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

पहले ऋषि, महात्मा और सन्यासी होते थे जो सब कुछ छोड़कर सत्य की तलाश में जंगल और पर्वतों पर निकल जाते थे। वह हमेशा सत्य और ईश्वर की तलाश में लगे रहे लेकिन उतना सुख-शांति न पा सके, जितना नए जमाने के बाबाओं को बिना जंगल गए ही मिल गया। जंगल जाने में कोई फायदा नहीं मिलता इसलिए अब बाबा जंगल और पर्वतों के बजाय लोगों के बीच में रहने लगे हैं। लोगों की डिमांड और अपनी जरूरतों के हिसाब से बाबा ने अपना नाम रखना, मेकअप करना और प्रसाद देना शुरू कर दिया है। अब नए अवतार हैं राधे मां, गोल्डन बाबा, निर्मल बाबा, बिजनस बाबा, फ्रॉड बाबा और राम रहीम सिंह इंसां…

यह बाबा भगवान की नहीं अपनी भक्ति करवाते हैं। ये बाबाओं के अपडेटेड और लेटेस्ट वर्जन हैं। मॉल में शॉपिंग करने वालों और फाइव स्टार होटल में रहने वालों को पेड़ के नीचे या फूस की झोपड़ी में बैठे बाबा रास नहीं आने इसलिए नए बाबा आसमान से उड़कर या लाइट्स से सजे रंगबिरंगे स्टेज से निकलकर आते हैं। प्रसाद बताशों का नहीं, चॉकलेट और पेस्ट्री का होता है। भक्तों की अपने भगवान से बात करने की चाह ये बाबा पूरी कर रहे हैं। भक्त अपने नए भगवान के साथ अठखेलियां कर सकते हैं, उनके हाथ से प्रसाद खा सकते हैं। चंद दान-दक्षिणा के बदले राधे मां अपने भक्तों की गोदी में बैठकर उन्हें दुलार सकती हैं, आई लव यू कह सकती हैं… कहां मिलेगा ऐसा भगवान! बाबा राम रहीम को ‘पापा जी’ कहने वाले उनके रॉक म्यूजिक पर ठुमके लगाते हैं और खुद को भगवान का रूप कहने वाले अपने पसंदीदा कैरक्टर के साथ सच्चा सुख उठाते हैं।

बाबा बदलते गए लेकिन भक्त नहीं बदले। भक्त कल भी अपने भगवान के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते थे, आज भी नहीं सुनेंगे। भक्त कल भी अपने भगवान के लिए जान लेने-देने की हिम्मत रखते थे, आज भी रखते हैं। चुनौती बहुत बड़ी है क्योंकि चुनौती है नए भगवान पैदा न होने देने की… जो बदलते माहौल में लगभग नामुमकिन हो चुका है। पुराने भगवान तस्वीरों और मूर्तियों में हैं जिन्हें अपडेट नहीं किया जा सकता और नए भगवान हर जगह तैयार हो रहे हैं… जिनसे सवाल नहीं किए जा सकते।

(उपरोक्त विचार लेखक के अपने हैं| इससे लिटरेचर इन इंडिया समूह का कोई सम्बन्ध नहीं है|)

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