आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

हिमावृत चोटियों की श्रेणी, अनन्त आकाश के नीचे क्षुब्ध समुद्र! उपत्यका की कन्दरा में, प्राकृतिक उद्यान में खड़े हुए युवक ने युवती से कहा-''प्रिये!'' ''प्रियतम! क्या होने वाला है?'' ''देखो क्या होता है, कुछ चिन्ता नहीं-आसव तो है न?'' ''क्यों प्रिय! इतना बड़ा खेल क्या यों ही नष्ट हो जायेगा?'' ''यदि नष्ट न हो, खेल... Continue Reading →

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हॉर्स रेस

शिखर बहुराष्ट्रीय कंपनी के वातानुकूलित कमरे में बैठा हुआ था। उम्र होगी यही कोई पैंतीस के आस-पास। चेहरे पर थकान ने अपना बसेरा बना लिया था, फिर भी गाल और ललाट आत्मविश्वास से दमक रहे थे। अभी वह थोड़ा रिलैक्सड महसूस कर रहा था, क्योंकि कंपनी के टारगेट पूरे हो चुके थे। जो बाकी थे... Continue Reading →

यहाँ-वहाँ हर कहीं

उस दिन शाम को पाँच बजे ही संजीव ऑफिस से वापस आ गया था। लिफ्ट से ऊपर जाकर उसने अपार्टमेंट की घंटी बजाई तो रोज की तरह दरवाजा नहीं खुला। वह बाहर खड़ा इंतजार करता रहा। फिर दूसरी और तीसरी बार भी बजाई तो दरवाजा वैसे ही बंद रहा। तब उसे लगा कि उसके पापा... Continue Reading →

पेड़ का तबादला

सुदूर कहीं निर्जन में एक अनाम पेड़ था जिसे वहाँ के लोग अब तक पहचान नहीं सके थे। धरती की गहराई से एक जीवन निकला था - हरे रंग का जीवन, एक बिरवा। कोमल-कोमल दो चार पत्तियों को लेकर इठलाता हुआ। उसके भीतर पूरी जिजीविषा भरी हुई थी। वह अपने चारों ओर फैले निसर्ग को... Continue Reading →

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे । आँख जो तुझपे उठी तो, हम दुश्मन को मिटा देंगे ।। ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे । वतन हम तेरे दीवाने, तुझपे सबकुछ लूटा देंगे । शाख पे जो आंच आई तो, हम शीश कटा देंगे ।। ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको... Continue Reading →

नंदन पार्क – अंजना वर्मा

इस बार जोर की ठंड पड़ रही थी और सूरज भी कोहरे की लिहाफ ओढ़ कर सो गया था। कहाँ सब सोच रहे थे कि अब ठंड चली गई। समय भी तो उसके जाने का हो गया था, पर अब जाते-जाते वह अपना असली चेहरा दिखा रही थी। मेहनतकश लोगों में जवान लोग तो ठीक... Continue Reading →

कौन तार से बीनी चदरिया

खामोश हवा अचानक गीत पर मृदंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, ''जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग'' सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई... Continue Reading →

सुना है कि सलीम “मुसलमान” है.

मेरे देश के गदगद लिबरल बौद्धिकों ने यह पता लगा लिया है कि अमरनाथ यात्रियों की बस को जो सलीम चला रहा था, वह "मुसलमान" है. इससे पहले वे ये पता लगा चुके थे कि अमरनाथ गुफा की "खोज" एक मुसलमान चरवाहे ने की थी. मैं तो समझता था कि पुरास्थलों की "खोज" पुराविद् करते... Continue Reading →

क्या “अयोध्या”, क्या “अमरनाथ”

अमरनाथ यात्रा के प्रति कश्मीरियों का द्वेष अयोध्या के प्रति मुस्ल‍िमों के द्वेष से कम नहीं है, ऐसी धारणा अगर बन गई है, तो यह निर्मूल नहीं है। अमरनाथ इधर पिछले नौ सालों से कश्मीर का "अयोध्या" जो बन गया है। और यही कारण है कि अमरनाथ यात्र‍ियों पर हमला करने के अनेक मायने होते... Continue Reading →

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

जिस कश्मीर में मानवाधिकार के नाम पर ज्यूडिशियली खुद संज्ञान ले कर एक पत्थरबाज आतंकी को दस लाख का मुआवजा देने की सरकार को सिफ़ारिश करती हो उस कश्मीर में अगर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में... Continue Reading →

कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं

शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………

असलियत मैं भी जानती हूँ…… और तुम भी

उदास रात रात का हर पहर ढल गया चाँद खिड़की से आगे निकल गया ख्वाबों का माला बिखर गया और मनका नैनों से फिसल गया।। नसीब की चादर क्यों झीनी है मेहनत की सुगंध भीनी-भीनी है कोई रफ्फू का हुनर सिखा दे हमें मुकद्दर की झोली सीनी है।। औरों के जख्मों को मरहम दिया हमने... Continue Reading →

एक ऐसा चेहरा

हल्की सी शर्म, हल्की सी नज़ाकत हो एक अजब सा एहसास, एक गज़ब सी चाहत हो थोड़ी सी नरमी, थोड़ी सी गर्माहट हो हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें खो जाने की राहत हो ज़रा सी बेचैनी, ज़रा सी घबराहट हो न कोई साज़िश, न कोई बनावट हो ज़रा सी हंसी, ज़रा सी मुस्कराहट हो हो... Continue Reading →

सात दिन की माँ – नीरू मोहन

यह कथा सत्य घटना पर आधारित है| गोपनीयता बनाए रखने के लिए पात्रों के नाम और स्थान बदल दिए गए हैं| कहते हैं, ईश्वर की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती और ईश्वर जो करता है भले के लिए ही करता है| यह कहानी उस माँ की है जिसे मातृत्व का सुख सिर्फ सात... Continue Reading →

पुर्जा – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग

अनुवाद - विजय शर्मा सामान की आखिरी खेप जा चुकी थी। किराएदार, क्रेपबैंड हैटवाला जवान आदमी, खाली कमरों में अंतिम बार पक्का करने के लिए घूमता है कि कहीं पीछे कुछ छूट तो नहीं गया। कुछ नहीं भूला, कुछ भी नहीं। वह बाहर सामने हॉल में गया। पक्का निश्चय करते हुए कि इन कमरों में जो... Continue Reading →

धनिया की साड़ी – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग

लड़ाई का ज़माना था, माघ की एक साँझ। ठेलिया की बल्लियों के अगले सिरों को जोडऩे वाली रस्सी से कमर लगाये रमुआ काली सडक़ पर खाली ठेलिया को खडख़ड़ाता बढ़ा जा रहा था। उसका अधनंगा शरीर ठण्डक में भी पसीने से तर था। अभी-अभी एक बाबू का सामान पहुँचाकर वह डेरे को वापस जा रहा... Continue Reading →

जातीय आरक्षण की आग से अगर देश को बचाना है तो तमाम चीज़ों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता

जातीय आरक्षण की आग से अगर देश को बचाना है तो तमाम चीज़ों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता शेष रह गया है । वह चाहे रेल हो , रोडवेज हो या बिजली । या कोई और उपक्रम । सरकारी उपक्रमों के निजीकरण से कई फ़ायदे होंगे । एक तो चीजें पटरी पर आ जाएंगी ,... Continue Reading →

नए रोजगार देश में सिर्फ औद्योगिक उत्पादन से आ सकते हैं

विख्यात अर्थशास्त्री एडम स्मिथ लिखते हैं कि एक भिखारी अपने समाज की कृपा पर जीता है. देश के बाकि लोग तो रोजगार करके, श्रम करके , धन अर्जित करते हैं, लेकिन सिर्फ भिखारी ही ऐसा नागरिक है जो दूसरों की उदारता पर जीता है. 18वीं शताब्दी के एडम स्मिथ के ये विचार आज के अर्थशास्त्र... Continue Reading →

हिंदी साहित्य: आदिकाल

आदिकाल सन 1000 से 1325 तक हिंदी साहित्य के इस युग को यह नाम डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे वीर-गाथा काल नाम दिया है। इस काल की समय के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखने वाले मिश्र बंधुओं ने इसका नाम प्रारंभिक काल किया... Continue Reading →

भाषा बहता नीर

'भाषा बहता नीर'। भाषा एक प्रवाहमान नदी। भाषा बहता हुआ जल। बात बावन तोले पाव रत्ती सही। कबीर की कही हुई है तो सही होनी ही चाहिए। कबीर थे बड़े दबंग और उनका दिल बड़ा साफ था। अतः इस बात के पीछे उनके दिल की सफाई और सहजता झाँकती है, इससे किसी को भी एतराज... Continue Reading →

निषाद बाँसुरी

सप्तमी का चाँद कब का डूब चुका है। आधी रात हेल गयी है। सारा वातावरण ऐसा निरंग-निर्जन पड़ गया है गोया यह शुक्ला सप्तमी न होकर शुद्ध नष्ट-चंद्र निशा हो। अभी-अभी हमारी नाव 'झिझिरी' अर्थात् नौका-विहार खेलकर लौटी है। नाव को तट से बाँधकर चंदर भाई फिर 'गलई' अर्थात इसके अग्रभाग पर आ विराजते हैं... Continue Reading →

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