मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें

Image result for buddh
मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
यूं पेड़ों की औट में छुपकर सोते हुए
जागती आंखों से ताकते मानुष
और छदम भूख् में उजड़े उदास चेहरों पर उभरी विभत्स झुर्रियों से डरकर,मैनें देखा है बुद्ध तुम्हें
यूं नदियों में डूबते हुए जलमग्न
कांपते हुए थर्राते हुए,
दिव्यस्वप्न की आस्था लिए मज़बूर गुर्राते
परातें लिए इमारतों से गिरते
सड़क किनारे परांठे सेकते
चाय की चुस्कियों संगे बतियाते
घूंघट पर्दों दीवारों की ओट में खिसियाते
निरंकुश राजा की जूतियों में पैबंद जड़ते
इंसान के रंग को पसीने में घुलते देख नहीं सके तुम,
कोषों दूर विलाप था
विलासिता थी
हठधर्म था
तुम बेबस लाचार हो कूद गए समंदर में
जरा, मरण, दुखों से मुक्ति की आस लिए
दिव्य ज्ञान खोजते भटकते रहे रातों रातों
चिपक गए पहाड़ों से
लिपट गए पेड़ों , चट्टानों से बुत बनकर ।

मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
त्यागते यशोधरा का प्रेम
तजते पुत्र , मातृ , पित्र मोह का धर्म

मैंने देखा तुम्हें
प्रबुद्ध साम्राज्य अधिपति होकर जोगी होते हुए
जोगी से कुशीनगर का पुनर्जन्म
पुनर्जन्म से गौतम होकर सिद्धार्थ होते हुए
सिद्धार्थ से होकर मगध की यात्रा करते
मगध से लुम्बिनी में लीन होते हुए
मेने देखा है बुद्ध तुम्हें
शांत अविचिलत होकर
बौद्धि व्रक्ष में समाते हुए
आसन लगाते हुए

मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
आंसू पोंछते हुए मगर आंसू बहाते हुए
अनन्त से अंतर्ध्यान की और लौटते हुए
अंतर्ध्यान से अनन्त की और जाते हुए
मैनें देखा है तुम्हें ।।

Shaktoi_Baraith
शक्ति बारैठ पेशे से डिजिटल मार्केटिंग एक्सपर्ट हैं. थिएटर और लेखन इनके जीवन की नब्ज़ हैं। इतिहास में चारण कलम ने हमेशा डंका बजाया है और उसी क्रम में एक और कलम शक्ति बरेठ की। स्क्रिप्ट से लेकर लीरिक्स तक और हिंदी कविता से लेकर उर्दू ग़ज़ल तक इनकी स्याही ने वाह वाही बटोरी है. हाल के दिनों में स्लम एरिया, कच्ची बस्ती के बच्चों और एक शहर से दूर वृद्धाश्रम में रंगमंच के माध्यम से मुस्कान बिखेर रहे हैं |

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

Advertisements

हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…

Image result for love images

हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…
हर विकट-प्रसंग में,
एक-दूसरे के आसंग में,
संग-संग में,
दुनिया की पासंग में,
संगम सा हम साथ बहेंगे…

हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…
मुझे पता था,
लोग मुझे भंडर कहेंगे
मुझे दुःख नहीं इस बात का
क्योंकि आस थी मुझे,
कि आप मुझे अपना कहेंगे…

हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…
एक मंजुल पे,
एक वंजुल के,
छाँव में,
उस छाया की तरह
परिरंभण रूप दिखेंगे…
हमने सोचा था,
हम साथ-साथ
एक आसनी पे
अपनी जीवनी लिखेंगे…

Himanshu Singh Vairagi.jpg
हिमांशु सिंह ‘वैरागी’

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

 

कली – अशोक सिंह

Image result for कली

एक कली मुरझाई सी जैसे विपदा से घिरी हुई।
हिलना डुलना सब छोड़ दिया बस डाल सहारे पड़ी हुई‍।

मैं देख चकित रह गया इसे यह भी तो एक नादानी है।
क्यों जीवन लीला छोड़ कर ये मरने के लिए ही ठानी है।

मैं रह न सका और पूछ दिया आखिर क्या तुझे परशानी है।
क्यूं तेरे जैसी प्यारी कली जीवन से हार यूँ मानी है।

वो सहमी सी पर बोल उठी मैं प्यास के मारे मरती हूँ।
दो बूँद मुझे पिलादे तू मैं तुझसे निवेदन करती हूँ।

यह सुन कर मैं स्तब्ध-सा था क्या ऐसा जमाना होता है।
कोई जल का यूं अपमान करे कोई प्यास के मारे रोता है।

देख दशा इस प्यारी कली की आखों से अश्रु प्रवाह हुआ।
न जाने इस अंधे समाज मे मेरा क्यूं अवतार हुआ।

मेरे असुओं की पीङा ने उस रूठी कली को खिला दिया।
वह कली ही मेरी दोस्त बनी बाकी को मैनें भुला दिया॥

 

Ashok_Singh_Azamgarh

अशोक सिंह
आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

कुंजड़-कसाई : अनवर सुहैल

Image result for कसाई

‘कुंजड़-कसाइयों को तमीज कहाँ… तमीज का ठेका तो तुम्हारे सैयदों ने जो ले रक्खा है?’ मुहम्मद लतीफ कुरैशी उर्फ एम एल कुरैशी बहुत कम बोला करते। कभी बोलते भी तो कफन फाड़कर बोलते। ऐसे कि सामने वाला खून के घूँट पीकर रह जाए।

जुलेखा ने घूर कर उन्हें देखा। हर कड़वी बात उगलने से पहले उसके शौहर लतीफ साहब का चेहरा तन जाता है। कष्ट या आनंद का कोई भाव नजर नहीं आता। आँखें फैल जाती हैं और जुलेखा अपने लिए ढाल तलाशने लग जाती है। वह जान जाती कि मियाँ की जली-कटी बातों के तीर छूटने वाले हैं।

मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब का चेहरा अब शांत था। इसका सीधा मतलब ये था कि तीर चलाकर, प्रतिद्वंद्वी को घायल करके वह मुतमइन हो गए हैं।

जुलेखा बीवी चिढ़ गर्इं – ‘सैयदों को काहे बीच में घसीट रहे हैं, हमारे यहाँ जात-बिरादरी पर यकीन नहीं किया जाता।’

लतीफ कुरैशी ने अगला तीर निशाने पर फेंका – ‘जब जात-पात पर यकीन नहीं तो तुम्हारे अब्बू-अम्मी अपने इकलौते बेटे के लिए बहू खोजने के लिए अपनी बिरादरी में बिहार क्यों भागे फिर रहे हैं? क्या इधर की लड़कियाँ बेशऊर होती हैं या इधर की लड़कियों का हड्डी-खून-तहजीब बदल गया है?’

जुलेखा सफाई देने लगी – ‘वो बिहार से बहू काहे लाएँगे, जब पता ही है आपको, तो काहे ताना मारते हैं। अरे… मम्मा, नन्ना और चच्चा लोगों का दबाव भी तो है कि बहू बिहार से ले जाना है।’

‘वाह भई वाह, खूब कही। लड़का ब्याहना है तो मम्मा, चच्चा का दबाव पड़ रहा है, शादी खानदान में करनी है। अगर लड़की की शादी निपटानी हो तो नौकरी वाला लड़का खोजो। जात चाहे जुलहा हो या कुंजड़-कसाई। जो हो सब चलेगा। वाह भई वाह… मान गए सैयदों का लोहा!’

जुलेखा निःशस्त्र हो गई। स्त्री-सुलभ ब्रह्मास्त्र उसके पास प्रचुर मात्रा में है, जिसे ‘अश्रु-शास्त्र’ भी कहा जाता है। मर्द इन आँसुओं से घबरा जाते हैं। लतीफ कुरैशी भी अपवाद न थे। जुलेखा के इस ब्रह्मास्त्र से वह घबराए। सोचा प्रहार कुछ ज्यादा ही सख्त हुआ लगता है। मामला रफा-दफा करने के लिहाज से उन्होंने कुछ सूत्र वाक्य बुदबुदाए -‘बात तुम्हीं छेड़ती हो और हार कर रोने लग जाती हो। तुम्हें यह क्या कहने की जरूरत थी कि इधर एमपी-छत्तीसगढ़ की लड़कियाँ, बेच-खाने वाली होती हैं। कंगाल बना देती हैं। तुम्हारा भाई कंगाल हो जाएगा। माना कि तुम्हारे ननिहाल-ददिहाल का दबाव है, जिसके तहत तुम लोगों को यह शादी अपने ही खानदान में करनी पड़ रही है। बड़ी मामूली बात ठहरी। चलो चाय बना लाओ जल्दी से…!’

जुलेखा ने आँसू पीकर हथियार डाल दिए – ‘हर माँ-बाप के मन में ख्वाहिश रहती है कि उनकी लड़की जहाँ जाए, राज करे। इसके लिए कैसा भी समझौता हो करना ही पड़ता है।’

‘समझौता!’ लतीफ एक-एक लफ्ज चबा कर बोले।

बात पुनः तन गई।

‘वही तो… वही तो मैं कह रहा हूँ कि समझौता करना पड़ता है। और जानती हो, समझौता मजबूरी में किया जाता है। जब इनसान अपनी कु़व्वत-ताकत से मजबूर होता है तो समझौता करता है। जैसे…!’

जुलेखा समझ गई। कड़ुआहट की आग अभी और भड़केगी।

‘हमारा रिश्ता भी इसी नामुराद ‘समझौते’ की नींव पर टिका है। एक तरफ बैंक में सर्विस करता कमाऊ कुंजड़-कसाई बिरादरी का दामाद, दूसरी तरफ खानदान और हड्डी-खू़न-नाक का सवाल। मामला लड़की का था, पराए धन का था इसलिए कमाऊ दामाद के लिए तुम्हारे घर वालों ने खानदान के नाम की कुर्बानी दे ही दी।’

जुलेखा रो पड़ी और किचन की तरफ चली गई। मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब बेंत की आराम कुर्सी पर निढाल पसर गए। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे जंग जीत कर आए हों और थकावट दूर कर रहे हों। सैयद वंशीय पत्नी जुलेखा को दुख पहुँचा कर इसी तरह का ‘रिलेक्स’ अनुभव किया करते हैं वो। इकलौते साले साहब की शादी की खबर पाकर इतना ‘ड्रामा’ खेलना उन्हें मुनासिब लगा था।

जुलेखा के छोटे भाई जावेद के लिए उनके अपने रिश्तेदारों ने भी मंसूबे बांधे थे। इकलौता लड़का, लाखों की जमीन-जायदाद। जावेद के लिए लतीफ के चाचा ने प्रयास किया था। लतीफ के चाचा, शहडोल में सब-इंस्पेक्टर हैं तथा वहीं गाँव में काफी जगह-जमीन बना चुके हैं। एक लड़की और एक लड़का। कुल दो संतान। चाचा चाहते थे कि लड़की की शादी यथासंभव अच्छी जगह करें। लड़की भी उनकी गुणी ठहरी। बीएससी तक तालीम। नेक सीरत, भली सूरत, फने-खानादारी, सौमो-सलात की पाबंद, लंबी, छरहरी, पाकीजा और ब्यूटीशियन का कोर्स की हुई लड़की के लिए चाचा ने की चक्कर जुलेखा के अब्बू सैयद अब्दुल सत्तार के घर काट चुके थे। हर बार यही जवाब मिलता कि लड़के का अभी शादी का कोई इरादा नहीं है।

एक बार मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब, जब अपनी ससुराल में थे तब अपने कानों से उन्होंने सुना था – ‘ये साले कुंजड़-कसाई क्या समझ बैठे हैं हमें? लड़की क्या दी, इज्जत भी दे दी क्या?’ उँगली पकड़ाई तो लगे पहुँचा पकड़ने। भला इन दलिद्दरों की लड़की हमारी बहू बनेगी? हद हो गई भई।’

ये बात जुलेखा के मामा कह रहे थे। लतीफ साहब उस वक्त बेडरूम में लेटे थे। लोगों ने समझा कि सो गए हैं वो, इसलिए ऊँची आवाज में बहस कर रहे थे। जुलेखा के अब्बू ने मामा को डाँट कर चुप कराया था।

लतीफ अपमान का घूँट पीकर रह गए।

तभी तो उस बात का बदला वह उस खानदान की बेटी, यानी उनकी पत्नी जुलेखा से लेना चाह रहे थे। ले-देकर आज तवा गरमाया तो कर बैठे प्रहार! जुलेखा को दुख पहुँचाकर, भारतीय इस्लामी समाज में व्याप्त ऊँच-नीच की बुराई पर कुठाराघात करने का उनका यह प्रयास कितना ओछा, कितना शर्मनाक था, इससे क्या मतलब? उनका उद्देश्य था कि जैसे उनका दिल दुखा, वैसे ही किसी और का दुखे। दूसरे का दुख उनके अपने दुख के लिए मलहम बन गया था।

जुलेखा की सिसकियाँ किचन के पर्दे को चीरकर बाहर निकल रही थीं। बेटा-बेटी शॉपिंग के लिए सुपर-मार्केट गए हुए थे। घर में शांति बिखरी हुई थी। इसी शांति को भंग करती सिसकियाँ लतीफ साहब के थके जिस्म के लिए लोरी बनी जा रही थीं।

मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब को यूँ महसूस हो रहा था, जैसे सैयदों, शेखों की तमाम गर्दन अकड़ू जातियाँ रो रही हों, पश्चाताप कर रही हों।

अरे! उन्हें भी किशोरवय तक कहीं पता चल पाया था कि वे कसाइयों के खानदान से ताल्लुक रखते हैं। वे तो बस इतना जानते थे कि ‘एक ही सफ में खड़े महमूदो-अयाज’ वाला दुनिया का एकमात्र मजहब है इस्लाम। एक नई सामाजिक व्यवस्था है इस्लाम। जहाँ ऊँच-नीच, गोरा-काला, स्त्री-पुरूष, छोटा-बड़ा, जात-पात का कोई झमेला नहीं है। कहाँ महमूद जैसा बादशाहे-वक्त, और कहाँ अयाज जैसा मामूली सिपाही, किंतु नमाज के समय एक ही सफ में खड़ा किया तो सिर्फ इस्लाम ही ने दोनों को।

उनके खानदान में कोई भी कसाइयों का धंधा नहीं करता। सभी सरकारी मुलाजमत में हैं। सरगुजा के अलावा बाहरी रिश्तेदारी से लतीफ के वालिद साहब ने कोई संबंध नहीं रखा था। लतीफ के वालिद का एक ही ध्येय था, तालीम हासिल करो। किसी भी तरह इल्म हासिल करो। सो लतीफ इल्म हासिल करते-करते बैंक में अधिकारी बन गए। उनके वालिद साहब भी सरकारी मुलाजिम थे, रिटायरमेंट के बाद भी वे अपने खानदानी रिश्तेदारों से कटे ही रहे।

लतीफ, क्लास के अन्य कुरैशी लड़कों से कोई संबंध नहीं बना पाए थे। ये कुरैशी लड़के पिछली बेंच में बैठने वाले बच्चे थे, जिनके दुकानों से गोश्त खरीदने कभी-कभी वह भी जाया करते थे। लगभग सभी कुरैशी सहपाठी मिडिल स्कूल की पढ़ाई के बाद आगे न पढ़ पाए।

तब उन्हें कहाँ पता था कि कुरैशी एक जातिसूचक पुछल्ला है, जो उनके नाम के साथ उनकी सामाजिक हैसियत को जाहिर करता है। वे तो वाज-मीलाद वगैरा में बैठते तो यही सुनते कि पैगंबर साहब का ताल्लुक अरब के कुरैश कबीले से था। उनका बालमन यही गणित लगाया करता था कि वही कुरैशी खानदान के लोग कालांतर में जब हिंदुस्तान आए होंगे तो उन्हें कुरैशी कहा जाता होगा। ठीक उसी तरह जैसे पड़ोस के हिंदू घरों की बहुओं को उनके नाम से नहीं बल्कि उनके गृहनगर के नाम से संबोधित किया जाता है। जैसे कि बिलासपुरहिन, रायपुरहिन, सरगुजहिन, कोतमावाली, पेंडरावाली, कटनहिन आदि।

कुछ बड़े व्यवसायिक मुस्लिम घरानों के लोग नाम के साथ इराकी शब्द जोड़ते, जिसका अर्थ लतीफ ने यह लगाया कि हो न हो इन मुसलमानों का संबंध इराक के मुसलमानों से हों कुछ मुसलमान खान, अन्सारी, छीपा, रजा इत्यादि उपनाम से अपना नाम सजाया करते। बचपन में अपने नाम के साथ लगे कुरैशी उपनाम को सुनकर वह प्रसन्न हुआ करते। उन्हें अच्छा लगता कि उनका नाम भी उनके जिस्म की तरह पूर्ण है। कहीं कोई ऐब नहीं। कितना अधूरा लगता यदि उनका नाम सिर्फ मुहम्मद लतीफ होता। जैसे बिना दुम का कुत्ता, जैसे बिना टाँग का आदमी, जैसे बिना सूँड़ का हाथी।

बचपन में जब भी कोई उनसे उनका नाम पूछता तो वह इतराकर बताया करते -‘जी मेरा नाम मुहम्मद लतीफ कुरैशी है।’

यही कुरैशी लफ्ज का पुछल्ला उनके विवाह का सबसे बड़ा शत्रु साबित हुआ। जब उनकी बैंक में नौकरी लगी तो कसाई-चिकवा घरानों से धड़ाधड़ रिश्ते आने लगे। अच्छे पैसे वाले, शान-शौकत वाले, हज कर आए कुरैशी खानदानों से रिश्ते ही रिश्ते। लतीफ के अब्बू उन लोगों में अपना लड़का देना नहीं चाहते थे क्योंकि तमाम धन-लोलुप, धनाढ्य कुरैशी लोग, संस्कार, शिक्षा के मामले में शून्य थे। पैसे से मारुति आ सकती है सलीका नहीं।

इस बीच शहडोल के एक उजाड़ सैयदवंशीय मुस्लिम परिवार से लतीफ साहब के लिए पैगाम आया। उजाड़ इन अर्थों में कि यूपी-बिहार से आकर मध्यप्रदेश के इस बघेलखंड में आ बसे जुलेखा के पिता किसी जमाने में अच्छे खाते-पीते ठेकेदार हुआ करते थे। आजादी से पूर्व और उसके बाद की एक-दो पंचवर्षीय योजनाओं तक जुलेखा के पिता और दादा वगैरा की जंगल की ठेकेदारी हुआ करती थी। जंगल में पेड़ काटने की प्रतिस्पर्धा चलती। सरकारी मुलाजिम और ठेकेदारी मजदूरों में होड़ मची रहती। कौन कितने पेड़ काट गिराता है। ट्रकों लकड़ियाँ अंतर्राज्यीय स्मगलिंग के जरिए इधर-उधर की जातीं। खूब चटकी थी उन दिनों। उसी कमाई से शहडोल के हृदय-स्थल पर पहली तीन मंजिली इमारत खड़ी हुई जिसका नामकरण हुआ था ‘सैयदाना’। ये इमारत जुलेखा के दादा की थी। आज तो कइी गगनचुंबी इमारतें हैं किंतु उस जमाने में जुलेखा का पैतृक मकान प्रसिद्ध हुआ करता था। आस-पास के लोग उस इमारत ‘सैयदाना’ का इस्तेमाल अपने घर के पते के साथ किया करते थे। स्थानीय और प्रादेशिक स्तर की राजनीति में भी सक्रियता थी इस भवन की। फिर यहाँ मारवाड़ी आए, सिक्ख आए, प्रतिस्पर्धा बढ़ी। मुनाफा कई हाथों में बँटा। जुलेखा के खानदान वालों की मोनोपोली समाप्त हुई। कुकुरमुत्तों की तरह नगर में भव्य इमारतें तनने लगीं।

जुलेखा के अब्बू यानी सैयद अब्दुल सत्तार या यूँ कहें कि हाजी सैयद अब्दुल सत्तार साहब की प्रगति का ग्राफ अचानक भरभराकर नीचे गिरने लगा। जंगलात के ठेकेदारी में माफिया आ गया। धन-बल और बाहुबल दोनों की जोर-आजमाइश हुर्इ। हाजी साहब लकवाग्रस्त हुए। चाचाओं और चचेरे भाइयों में दादा की संपत्ति को लेकर विवाद हुए। झूठी शान को बरकरार रखने में हाजी अब्दुल सत्तार साहब का जमा धन खर्च होने लगा। देह दुर्बल हुई। बोलते तो स्वर लड़खड़ा जाता। व्यापार की नई तकनीक आ जाने से, पुरानी व्यापारिक पद्धति वाले व्यवसाइयों का अमूमन जो हश्र होता है, वही हाजी साहब का हुआ।

डूबती कश्ती में अब जुलेखा थी, उसकी एक छोटी बहिन थी और एक किशोरवय भाई। बड़ी बहन का विवाह हुआ तो सैयदों में ही लेकिन पार्टी मालदार न थी। दामाद थोक कपड़े का व्यवसायी था और विधुर था। जुलेखा की बड़ी बहन वहाँ काफी खुश थी। जुलेखा जब राजनीतिशास्त्र में एम.ए. कर चुकी तो पिता हाजी साहब चिंतित हुए। खानदान में ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की की उतनी डिमांड न थी। लड़के ज्यादातर व्यवसायी थे। जुलेखा को ब्याहना निहायत जरूरी था, क्योंकि छोटी लड़की कमरून भी तैयार हुई जा रही थी। तैयार क्या वह तो जुलेखा से भी ज्यादा भरे बदन की थी। दो साल का अंतर मात्र था उनकी उम्र में। दो-दो जवान लड़कियों का बोझ हाजी साहब की लकवाग्रस्त देह बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।

उनके एक मित्र हुआ करते थे अगरवाल साहब। जो कि फॉरेस्ट विभाग के मुलाजिम थे। हाजी साहब के स्याह-सफेद के राजदार! उन्हीं अगरवाल साहब ने सुदूर सरगुजा में एक बेहतरीन रिश्ता सुझाया। हाजी साहब उन पर बिगड़े। जमीन पर थूकते हुए कहा – ‘लानत है आप पर, अगरवाल साहेब कुंजड़-कसाइयों को लड़की थोड़े ही दूँगा। घास खा कर जी लूँगा। लेकिन खुदा ऐसा दिन दिखाने से पहले उठा ले तो बेहतर…’

कुछ रुककर कहा था उन्होंने – ‘अरे भाई, सैयदों में क्या लड़कों की महामारी हो गई है?’

अगरवाल साहब बात सँभालने लगे – ‘मैं ये कब कह रहा हूँ कि आप अपनी लड़की की शादी वहीं करिए। हाँ, थोड़ा ठंडे दिमाग से सोचिए। मैं उन लोगों को अच्छी तरह जानता हूँ। पढ़ा-लिखा, संस्कारित घराना है। लड़का बैंक में अधिकारी है। कल को आला-अफसर बनेगा। महानगरों में रहेगा।’

अगरवाल साहब टेप-रिकार्डर की तरह विवरण उगलने लगे। उन्हें हाजी साहब नामक इमारत की जर्जर दीवार, छतों और हिलती नींव का हाल मालूम था। वह अच्छी तरह जानते थे कि विवाह योग्य बेटियों के विवाह की चिंता में हाजी साहब अनिद्रा के रोगी भी हुए जा रहे हैं। एकांतप्रिय एवं आर्थिक मार ने उन्हें इस समय वृद्ध कर दिया था। उनका इलाज चल रहा था। एलोपैथी, होमियोपैथी, झाड़-फूँक, गंडा-तावीज, पीर-फकीरी और हज-जियारत जैसे नुस्खे आजमाए जा चुके थे। मर्ज अपनी जगह और मरीज अपनी जगह। घट रहा था तो सिर्फ जमा किया धन और बढ़ रही थीं चिंताएँ।

एक दो रोज के बाद अगरवाल साहब की बात पर हाजी साहब गौरो-फिक्र करने लगे। हाजी साहब की चंद शर्तें थीं, जो रस्सी के जल जाने के बाद बची ऐंठन की तरह थीं।

इन शर्तों में अव्वल तो यह कि शादी के निमंत्रण-पत्रों में वर-वधू पक्ष का उपनाम लिखाही न जाए। न तो हाजी सैयद अब्दुल सत्तार अपने नाम के आगे सैयद लगाएँ और न ही लड़के वाले अपना ‘कुरैशी’ टाइटिल जमाने के आगे जाहिर करें। शादी ‘शरई’ रिवाज से हो। कोई ताम-झाम, बैंड-बाजा नही। दस-बारह बराती आएँ। दिन में विवाह हो, दोपहर में खाना और शाम होते तक रुखसती।

एक और खास शर्त यह थी कि निकाह के अवसर पर कितना ही लोग पूछें, किसी से भी कुरैशी होने की बात न बताई जाए।

लतीफ और उसके पिता को ये तमाम शर्तें अपमानजनक लगीं लेकिन आला दर्जे के खानदान की तालीमयाफ्ता नेक-सीरत लड़की के लिए उन लोगों ने अंततः ये अपमानजनक समझौता स्वीकार कर लिया। अगरवाल साहब के बहनोई सरगुजा में थे और लतीफ के पिता से उनका घनिष्ठ संबंध था। उनका भी दबाव उन्हें मजबूर कर रहा था।

हुआ वही जो जुलेखा के वालिद साहब की पसंद था। लड़के वाले, लड़की वालों की तरह ब्याहने आए। इस तरह सैयदों की लड़की, कुंजड़-कसाइयों के घर ब्याही गई।

एक दिन जुलेखा के एक रिश्तेदार बैंक में किसी काम से आए। लतीफ साहब को पहचाना उन्होंने। केबिन के बाहर उनके नाम की तख्ती पर साफ-साफ लिखा था – ‘एम. एल. कुरैशी, शाखा प्रबंधक’

लतीफ साहब ने आगंतुक रिश्तेदार को बैठने का इशारा किया। घंटी मार कर चपरासी को चाय लाने का हुक्म दिया।

आगंतुक निस्संदेह धनी मानी व्यक्ति थे तथा फायनेंस के सिलसिले में बैंक आए थे।

लतीफ साहब ने सवालिया नजरों से उन्हें देखा।

वे हड़बड़ाए। गला खँखारकर पूछा – ‘आप हाजी सैयद अब्दुल सत्तार साहब के दामाद हुए न?’

‘हाँ, कहिए।’ लतीफ साहब का माथा ठनका।

सैयद शब्द के अतिरिक्त जोर दिए जाने को भली-भाँति समझ रहे थे वह।

‘हाँ, मैं उनका रिश्तेदार हूँ। पहले गुजरात में सेटल था, आजकर इधर ही किस्मत आजमाना चाह रहा हूँ। आपको निकाह के वक्त देखा था। नेम-प्लेट देख कर घबराया, किंतु आपके बड़े बाबू तिवारी ने बताया कि आपकी शादी शहडोल के हाजी साहब के यहाँ हुई तो मुतमइन हुआ।’ आगंतुक सफाई दे रहा था।

फिर दाँत निपोरते हुए आगंतुक ने कहा – ‘आप तो अपने ही हुए!’

आगंतुक के स्वर में आदर, आत्मीयता और नाटकीयता का समावेश था।

मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब का सारा वजूद रुई की तरह जलने लगा। पलक झपकते ही राख का ढेर बन जाते कि इससे पूर्व स्वयं को सँभाला और आगंतुक का काम आसान कर दिया।

एम.एल. लतीफ साहब को अच्छी तरह पता था कि मुहम्मद लतीफ कुरैशी के बदन को दफनाया तो जा सकता है किंतु उनके नाम के साथ लगे ‘कुरैशी’ को वह कतई नहीं दफना सकते हैं।

Anwar Suhail

जन्म : 9 अक्टूबर 1964, जांजगीर (छत्तीसगढ़)

उपन्यास : पहचान
कहानी संग्रह : कुंजड़-कसाई, ग्यारह सितंबर के बाद, चहल्लुम, गहरी जड़ें
कविता : और थोड़ी-सी शर्म दे मौला, संतो काहे की बेचैनी
संपादन : संकेत (कविता केंद्रित लघु पत्रिका)

4/3, ऑफिसर्स कॉलोनी, पोस्ट-बिजुरी, जिला-अनूपपुर, पिन – 484440 (मध्य प्रदेश)

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

 

उधार – अज्ञेय

Image result for birds in summer season

सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।

मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार
चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी?
मैनें घास की पत्ती से पूछा: तनिक हरियाली दोगी—
तिनके की नोक-भर?
शंखपुष्पी से पूछा: उजास दोगी—
किरण की ओक-भर?
मैने हवा से मांगा: थोड़ा खुलापन—बस एक प्रश्वास,
लहर से: एक रोम की सिहरन-भर उल्लास।
मैने आकाश से मांगी
आँख की झपकी-भर असीमता—उधार।

सब से उधार मांगा, सब ने दिया ।
यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन—
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का:
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।

रात के अकेले अन्धकार में
सामने से जागा जिस में
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझ से पूछा था: “क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के
इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे—उधार—जिसे मैं
सौ-गुने सूद के साथ लौटाऊँगा—
और वह भी सौ-सौ बार गिन के—
जब-जब मैं आऊँगा?”
मैने कहा: प्यार? उधार?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार ।
उस अनदेखे अरूप ने कहा: “हाँ,
क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं—
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त अनुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह व्यथा,
यह अन्धकार में जाग कर सहसा पहचानना
कि जो मेरा है वही ममेतर है
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो—उधार—इस एक बार—
मुझे जो चरम आवश्यकता है।

उस ने यह कहा,
पर रात के घुप अंधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूँ:
अनदेखे अरूप को
उधार देते मैं डरता हूँ:
क्या जाने
यह याचक कौन है?

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है

Image result for akbar darbaar

डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है. यह हिंदू शासकों के लिए भी उतना ही सही है, जितना कि मुस्ल‍िम शासकों के लिए. अतीत के लिए भी, आज के लिए भी.

ग़ौरी, गज़नवी, चंगीज़, तैमूर, दुर्रानी, अब्दाली जैसे मुस्ल‍िम आक्रांता लूटखसोट की फ़िराक़ में थे. हिंदुस्तान पर राज करने की उनकी नीयत ना थी.

ख़ास तौर पर 1739 में पहले नादिर शाह और फिर 1761 में अहमद शाह ने तो हिंदुस्तान की केंद्रीय सल्तनत को उसके घुटनों पर झुका दिया था.

अनेक इतिहासकारों को अचरज होता है कि नादिर शाह महज़ “तख़्तेताऊस” की लूट से ही ख़ुश था, जबकि चाहता तो हिंदुस्तान की बादशाहत उसके नाम होती!

चंगीज़ो तैमूर के वंशज बाबर ने अपने लश्कर का रुख़ हिंदुस्तान की ओर इसलिए मोड़ा था, क्योंकि समरकन्द को जीतने में वो लगातार नाकाम रहा था. लेकिन चंगीज़ो तैमूर के उलट उसने हिंदुस्तान में खूंटा गाड़ दिया, जैसे उससे पहले गाड़ा था मामलूक़ों, तुग़लकों, खिलजियों और लोदियों ने.

लेकिन अवाम?

इतिहासकार इस समूची परिघटना को “कॉन्क्वेस्ट” के तर्क के साथ याद रखते हैं और निहायत ग़ैरसहानुभूतिपूर्ण तरीक़े से अवाम के अंतर्तम पर बात करने से इनकार करते हैं.

जिसकी तलवार, उसका ज़ोर!
जिसकी लाठी, उसकी भैंस!

तब सदियों तक चले “हिंदू जेनोसाइड” की तो बात ही क्या करें, जब कश्मीर में पंडितों के जेनोसाइड को ही रद्द करने के लिए महाकविगण कमर कसे हों!

ये तमाम सिलसिला जैसे भुला देने लायक़ हो और “प्रतिशोध के काव्य-न्याय” का, “सामूहिक अवचेतन की तुष्टि” का यहाँ कोई महत्व ही ना हो, जिसे कि “सामाजिक न्याय” की व्यवस्था की धुरी माना गया!

हुक़ूमत और अवाम के रिश्तों को लेकर लोहिया की बात सही है और “ग्रेट मुग़ल्स” के राज में भी हिंदुस्तान में “ह्यूमन राइट्स इंडेक्स” बहुत ऊपर चला गया हो, वैसा नहीं था.

अकबर के राज में बहुत अमन था, कलाओं का बहुत विस्तार था, गंगा जमुनी का स्वर्णकाल था, ऐसा कहते हैं, लेकिन हिंदू बहुसंख्य समाज यवनों के राज में मनोवैज्ञानिक रूप से मुतमईन कैसे रह सकता था? हमारा इतिहास इस मनोवैज्ञानिक बेचैनी का अध्ययन करने के बजाय उस पर संगीन चुप्पी साध लेता है.

आज अगर अरब देशों पर कोई हिंदू या यहूदी राजा अधिकार कर ले और बेहतर सुशासन स्थापित कर दे, तो क्या वहां के मुसलमान इस पर राज़ी ख़ुशी से रहेंगे?

आज़ादी की लड़ाई में “गंगा जमुनी” का “पर्सपेक्टिव” बदल गया था और अब वे दोनों मिलकर एक “साझा दुश्मन” से लड़ रहे थे. तो क्या उस साझा दुश्मन का वजूद ही उस भाईचारे का परिप्रेक्ष्य था? और अगर, वह शत्रु परिदृश्य से हट जाए तो?

आज़ादी के समय हिंदू मुसलमान दोनों ही समान रूप से ग़रीब और पसमंदा इसलिए भी थे कि अधिकतर मुसलमान तो “कनवर्टेड” थे. वे वही थे, जो उनसे पहले हिंदू हुआ करते थे, और हुक़ूमत के मेवे उन तक नहीं पहुँचे थे.

आज अकसर भारतीय मुसलमान कहते हैं कि हम तो “कनवर्टेड” हैं, इसलिए हम तो इसी देश के मूल निवासी हैं. लेकिन यह बात 1947 में उनको याद क्यों नहीं आई थी, जब उन्होंने अपना अलग मुल्क मांगा था?

मुझे बार बार लगता है हिंदुस्तान का इतिहास एक नए “नॉन सेकुलर” और “मोर एनालायटिकल पर्सपेक्टिव” के साथ लिखे जाने की ज़रूरत है.

हमें एक भ्रामक इतिहास पढ़ाया जाता रहा है.

“अ पोलिटिकली मोटिवेटेड एंड अपोलोजेटिक रीडिंग ऑफ़ हिस्ट्री”. इसको दुरुस्त करना ज़रूरी है!

Sushobhit Singh Saktawat's profile photo

सुशोभित सक्तावत

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

 

फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है…पढ़िए पूरा मामला

Ranchi_boy_Street_Shop_for_Education

फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है। इलाहाबाद में एसएससी की तैयारी करता है। अपना खर्चा निकालने के लिए लक्ष्मी टाकीज के पास चिकन रोस्ट की दुकान लगाता है। दुकान की आमदनी से अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ घर वालों को भी पैसे भेजता है। घर वालों को इस बारे में कुछ नहीं पता है। पहली बार जब उसने पैसे बचाकर १५ हज़ार रुपए में ठेला लिया था तो वो दूसरे दिन ही चोरी हो गया था। पहले दिन की कमाई मात्र तीस रुपए थी। लेकिन लड़के ने हार नहीं मानी। उसने तय किया कि अब वो ये जरूर कर के रहेगा। कुछ महीने बाद उसने किराए के ठेले पर फिर से दुकान शुरू की। अब महीने में अच्छी खासी कमाई कर लेता है।

अनुभव पूछने पर बता रहा था कि शुरू में ये सब करने में शर्म आती थी। बाद में उसे यह एहसास हुआ कि मेहनत करना और आत्मनिर्भर होना शर्म की बात नहीं है।

उसके प्रेरणाश्रोत उसके गुरु है जिससे उसने यह काम सीखा है। वह दिल्ली में यही काम करते थे। आज वह सेंट्रल गवर्मेंट में अच्छी खासी नौकरी करते हैं। नौकरी के साथ पुराना काम भी देखते हैं। दिल्ली में उनकी तीन शटर की दुकान है जहां हर तरह के नानवेज आईटम मिलते हैं। दुकान से महीने में लगभग ५ लाख रुपए की कमाई होती है। कर्मचारियों की सैलरी देने के बाद ४ लाख बचते हैं। कर्मचारी के रूप में ऐसे लड़के रखे और प्रशिक्षित किए जाते हैं – जो जरूरतमंद और पढ़ने लिखने वाले होते हैं ।

यह देखकर अच्छा लगा कि भारत में इस तरह का बिजनेस और स्टडी कल्चर धीरे-धीरे डेवलप हो रहा है। यह यहां के युवाओं के लिए अच्छा संकेत है। अपनी पढ़ाई के लिए स्किल्ड और आत्मनिर्भर होना कोई बुरी बात नहीं है। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। दुनिया में वही इंसान असल मायने में सफल है जो अपने पैरो पर खड़ा होकर आगे बढ़ता है। चरम बेरोजगारी के दौर में इस कल्चर को अपनाने और प्रोत्साहित किए जाने की सख्त जरूरत है ।

इनको और इनके गुरु को सलाम !

Pradyumna Yadav's profile photo, Image may contain: 1 person, standing, outdoor and water

प्रद्युम्न यादव

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

ब्रह्म मुहूर्त : स्वस्ति वाचन – अज्ञेय

Image result for brahma muhurta

जियो उस प्यार में
जो मैंने तुम्हें दिया है
उस दुख में नहीं जिसे
बेझिझक मैंने पिया है।
उस गान में जियो
जो मैंने तुम्हें सुनाया है
उस आह में नहीं जिसे
मै ने तुम से छिपाया है।
उस द्वार से गुज़रो
जो मैं ने तुम्हारे लिये खोला है
उस अंधकार के लिये नहीं
जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की
भावना से टटोला है।
वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ बुनूँगा
वे कांटे गोखरू तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ चुनूँगा।
वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे लिये बनाता हूँ बनाता रहूँगा
मैं जो रोड़ा हूँ उसे हथौड़े से तोड़ तोड़
मैं जो कारीगर हूँ करीने से
सँवारता सजाता हूँ सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुंचाने का
उदार उद्यम ही मेरा हो
फिर वहां जो लहर हो तारा हो
सोन तरी हो अरुण सवेरा हो
वह सब ओ मेरे वर्य!
तुम्हारा हो तुम्हारा हो तुम्हारा हो।

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

चाँदनी जी लो – अज्ञेय

Image result for chandni raat

शरद चाँदनी
बरसी
अंजुरी भर कर पी लो

ऊँघ रहे हैं तारे
सिहरी सिरसी
ओ प्रिय कुमुद ताकते
अनझिप
क्षण में
तुम भी जी लो!

सींच रही है ओस
हमारे गाने
घने कुहासे में
झिपते
चेहरे पहचाने

खम्भों पर बत्तियाँ
खड़ी हैं सीठी
ठिठक गये हैं मानो
पल-छिन
आने-जाने
उठी ललक
हिय उमगा
अनकही
अलसानी
जगी लालसा
मीठी,
खड़े रहो ढिंग
गहो हाथ
पाहुन मम भाने,
ओ प्रिय रहो साथ
भर भर कर अंजुरी
पी लो

बरसी
शरद चाँदनी
मेरा
अंत:स्पन्दन
तुम भी क्षण क्षण जी लो!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

प्राण तुम्हारी पदरज फूली – अज्ञेय

Image result for प्राण तुम्हारी पदरज फूली

प्राण तुम्हारी पदरज फूली
मुझको कंचन हुई तुम्हारे चरणों की
यह धूली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

आई थी तो जाना भी था –
फिर भी आओगी, दुःख किसका?
एक बार जब दृष्टिकरों के पद चिह्नों की
रेखा छू ली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी,
गीत शब्द का कब अभिलाषी?
अंतर में पराग-सी छाई है स्मृतियों की
आशा धूली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

उड़ चल हारिल – अज्ञेय

Image result for हारिल

उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में
यही अकेला ओछा तिनका।
उषा जाग उठी प्राची में –
कैसी बाट, भरोसा किन का!

शक्ति रहे तेरे हाथों में –
छूट न जाय यह चाह सृजन की,
शक्ति रहे तेरे हाथों में –
स्र्क न जाय यह गति जीवन की!

ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर
बढ़ा चीर चल दिग्मंडल
अनथक पंखों की चोटों से
नभ में एक मचा दे हलचल!

तिनका? तेरे हाथों में है
अमर एक रचना का साधन-
तिनका? तेरे पंजे में है
विधना के प्राणों का स्पंदन!

काँप न यद्यपि दसों दिशा में
तुझे शून्य नभ घेर रहा है,
स्र्क न यदपि उपहास जगत का
तुझको पथ से हेर रहा है

तू मिट्टी था, किन्तु आज
मिट्टी को तूने बाँध लिया है
तू था सृष्टि किन्तु सृष्टा का
गुर तूने पहचान लिया है !

मिट्टी निश्चय है यथार्थ, पर
क्या जीवन केवल मिट्टी है?
तू मिट्टी, पर मिट्टी से
उठने की इच्छा किसने दी है?

आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का
तू है दुर्निवार हरकारा
दृढ़ ध्वज दण्ड बना यह तिनका
सूने पथ का एक सहारा!

मिट्टी से जो छीन लिया है
वह तज देना धर्म नहीं है,
जीवन साधन की अवहेला
कर्मवीर का कर्म नहीं है!

तिनका पथ की धूल स्वयं तू
है अनंत की पावन धूली-
किन्तु आज तूने नभ पथ में
क्षण में बद्ध अमरता छू ली!

उषा जाग उठी प्राची में –
आवाहन यह नूतन दिन का
उड़ चल हरियल लिये हाथ में
एक अकेला पावन तिनका!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

गाँव – धीरज राणा भायला

Image result for गाँव

वो पगडंडी
तालाब किनारे की
वे शाम धुँधल की
गाँव चौबारे की।

जहाँ शर्म हया
पर्दे की शोभा थी
अब याद कहाँ
दीवारें
वे मिट्टी और गारे की।

रोटी थी
और मक्खन था
और छाछ का लोटा था।

नहीं भेदभाव था
धन-दौलत का
न प्रेम का टोटा था।

जल और हवा
और मिट्टी भी
तब आवाज़
पुकारे थी।

वो पगडंडी
तालाब किनारे की।

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

भुलाना न आसान होगा

Image result for love

दी खुशियां तूने जो मुझको, भुलाना न आसान होगा,


मेरी हर कामयाबी पे, तेरा ही नाम होगा।

रखूँगा तेरे हर तर्ज़ को, खुद में समां कर इस तरह,

भूल कर भी खुद को, भुलाना न आसान होगा ।

खुदा भी तुझे मेरा कर, यह सोचता होगा,


बेमिसाल इस प्यार को, भुलाना न आसान होगा।

तेरी रफ़ाक़त से निकल कर, देख ली दुनिया,

तेरी शख्शियत को, भूलना न आसान होगा।

अपना कर तूने मुझे, बड़ा एहसान कर दिया।

तेरे हर सुख़न को, भुलाना न आसान होगा ।

तारीफ क्या करूँ अब तेरी “माज़, तू तो एक फूल है,

तेरी खुशबू को, भुलाना न आसान होगा।

B612_20170902_103901

माज़ अंसारी
 युवा शायर
(गौसगंज जिला हरदोई उत्तर प्रदेश)

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

अगस्त हो या सितम्बर, बच्चे तो मरते ही हैं

UP-Government-Hospital

गोरखपुर की त्रासदी को अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, घाव अभी भी हरा है, सांस अभी भी फूली है, दर्द अभी भी बेशुमार है; और साथ ही साथ यह भी याद है कि कैसे उपचार में हुई लापरवाही और कमिशनखोरी पर लगाम कसने में नाकाम सरकार की वजह से सैकड़ों बच्चे मार दिए गये| जी हाँ, वो बच्चे मरे नहीं, मारे गए…लेकिन योगी जी के मंत्री जी बोलते हैं कि अगस्त में बच्चे तो मरते ही हैं| खुद योगी जी कहते हैं कि अब बच्चे भी क्या सरकार पाले?

योगी जी आप बच्चे नहीं पाल सकते, बचा तो सकते है? कानून आपका, सरकार आपकी, विभाग आपका, मंत्री आपके, डॉक्टर आपके और मरीज़…बस मरीज़ आपके नहीं है…मरते हुए…सांसों में अकड़न और दर्द लिए तड़पते हुए बच्चे आपके नहीं है| होंगे भी कैसे? आपने तो पहले ही घोषणा कर दी कि बच्चे भला हम क्यों पाले!

मुझे कोई सवाल-जवाब नहीं करना है, योगी जी…मैं यूपी का निवासी हूँ…कलम का सिपाही हूँ तो लिखूंगा और हक़ से लिखूंगा| तब तक लिखूंगा, जब तक आप यह न समझ जाय कि बच्चे भले नहीं आप पाल सकते लेकिन इन कमिशनखोरों को पाल रखा है…उनपर कानून का डंडा चलाना सरकार का काम है, पुलिस का काम है|

रोटी-कपड़ा-मकान तो दूर की बात है, आपकी सरकार कृपया यह स्पष्ट कर दे कि जीने का हक़ भी है कि नहीं? या फिर जीने के लिए, उपचार के लिए भी अगस्त बीतने का इंतजार किया जाय| या फिर आप घोषणा कर दो कि अगस्त में पैदा हुए बच्चे देशद्रोही है…मर जाए तो ठीक है वर्ना आपकी पुलिस है न…वो किस दिन काम आयेगी?

तो सुनिए योगी जी| आपकी घोषणाओं की तरह आपके मंत्री जी भी गच्चा खा गए| यहाँ बच्चे सितम्बर में भी मर रहे हैं| आपके सरकारी अस्पताल लाश का गटर बन चूके हैं और आपके सरकारी डॉक्टर कमिशनखोर| आपकी पुलिस संज्ञासुन्न हो चुकी है और आपकी अगस्त क्रांति ज़ारी है| सितम्बर, शायद अक्टूबर तक…शायद गांधी जयंती तक या लाशों का अंबार लगने तक आपकी अगस्त क्रांति जारी रहेगी|

आपके मंत्री जांच करने जाते हैं तो पकवान देखकर यह भूल जाते हैं कि वो आये किस लिए थे| ‘जांच’ और ‘कार्यवाही की जाएगी’ वो दो जुमले है जो शायद आपकी सरकार की अगस्त क्रांति के लिए रामबाण हैं| आप तो अगस्त क्रांति सफ़ल बनाइये, हमारा क्या है? हम तो लिखते थे और लिखते रहेंगे|

अबकी आपकी क्रांति में उज्जवल ध्वज़ फहराने वाला विभाग है आज़मगढ़ का सरकारी महिला चिकित्सालय| जहाँ एक बच्चे के जान की कीमत है मात्र तीन हज़ार रूपये| मोदी जी से पूछकर ही बता दीजिये कि बच्चा पैदा होने से पहले खुद ही मारने की एक स्कीम लागू कर दी जाए? ख़ासकर उन ग़रीबो के लिए यह स्कीम लागू हो जिनके पास तीन हज़ार रूपये न हो…वो…जो सरकारी अस्पताल में सरकार द्वारा मदद और उपचार की आश में मुंह उठा कर चले आये हो|

भला उन्हें भी पता नहीं क्या लगा है…योगी जी खुदे कह रहे हैं कि बच्चा हम क्यों पाले तो बड़े आये बच्चे का सपना देखने| अरे मर गया तो ठीक वर्ना डॉक्टर किस लिए है? सरकार न सही, सरकारी डॉक्टर खुदे मार डालेंगे| अरे गरीब! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई योगी जी की सरकार में बच्चा पैदा करने की? वो भी अगस्त महीने में|

योगी जी कभी आइये आजमगढ़ के महिला अस्पताल में निरीक्षण करने| अभी कुछ दिन पहले उपमुख्यमंत्री केशव जी आये थे…खूब हांके मीडिया के सामने| लोगों ने जब वसूली की शिकायत की तो ऐसे आँख तरेरे कि मानो उसी दिन कमीशनखोरी का पिंडदान कर देंगे| पर डॉक्टर ने जब आपकी अगस्त क्रांति वाली बात सुनी तो लहलहा गए, मन हरिया गया उनका| उनका तो कहना है कि अगस्त ही क्यों? यह क्रांति तो सितम्बर तक चलेगी| तभी तो तीन हज़ार रूपये के लिए जाने कितने बच्चे मार डाले| परिजनों ने शिकायत की तो चले गए हड़ताल पर| सरकार-वरकार नहीं मानते यहाँ के डॉक्टर लेकिन आपकी बातों पर अमल बहुत जी-जान से कर रहे हैं|

img_59b4ea5b74d8d.jpg

अमर उजाला, पत्रिका, हिंदुस्तान…कहाँ नहीं छपी कमीशनखोरी वाली ख़बर| बच्चों को मारने वाली ख़बर| बस एक आपकी पुलिस ही है जो शायद अखबार नहीं पढ़ती..अरे हाँ…आजकल तो डिजिटल का ज़माना हैं| अगर एसपी साहब अखबार पढ़ लेंगे तो आईजी साहब बुरा नहीं मान जायेंगे! भला इस ज़माने में अखबार भी कोई पढने वाली चीज़ है?

ख़बर १  ख़बर २ ख़बर ३ ख़बर ४

सूचना देने पर आपकी पुलिस कहती है कि तहरीर मिलने पर कार्यवाही होगी| परिजन जो तहरीर देते है, वो या तो रॉकेट बना कर उड़ा देती है आपकी थाना पुलिस या फिर किलो के भाव से…यही कुछ…दस-बीस रूपये तो मिल ही जाते होंगे? वैसे भी क्या करना है? तहरीर का क्या है…रोज़ आती रहती है? आईजी साहब, आजमगढ़ पुलिस के थानों में तहरीर की हरियाली ही हरियाली है| जब जवाब न हो तो ‘जांच की जा रही है’ वाला स्वर्णिम वाक्य तो है ही? नहीं भी है तो क्या हुआ? जब मंत्री जी खुदे बोले है अगस्त में तो बच्चे मरते ही है…थोड़ा और सरक कर सितम्बर तक पहुँच गया तो क्या हुआ? प्रधानमंत्री मतलब कुच्छु नहीं होता, क्रांति जारी रहनी चाहिए|

ठाकुर दीपक सिंह कवि

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

 

ताली तो छूट गई – अज्ञेय

Image result for key broken

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप शहर घूम-घामकर घर लौटे हों और तब आपको याद आया हो कि चाबियों का गुच्छा तो आप कहीं और छोड़ आये हैं? सवाल प्रतीकात्मक ही है, क्योंकि उसका रूप यह भी हो सकता है कि घर केवल एक कमरा रहा हो और चाबियों का गुच्छा केवल एक ताली, और कहीं और छोड़ आने की बजाय आपने उसे कमरे के भीतर ही छोड़ दिया हो क्योंकि कमरे का ताला उस जाति का है जिसे बन्द करने के लिए ताली की जरूरत नहीं पड़ती, वह दबा देने से ही बन्द हो जाता है।

सवाल यों भी सांकेतिक है कि वास्तव में आपसे पूछ ही नहीं रहा हूँ, वास्तव में तो स्वीकार ही कर रहा हूँ क्योंकि मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ है। और तथ्य को स्वीकार करने के साथ-साथ यह भी संकेत कर रहा हूँ कि अपने से जुड़े तथ्य को मैं किसी व्यापकतर सन्दर्भ के साथ जोड़ देना चाह रहा हूँ। क्या तालों के साथ कुंजियों का जो सम्बन्ध है, उसका एक पक्ष यह भी है कि कुंजियाँ जब-तब खो जाया करें और हम तालों के समक्ष असहाय खड़े रह जाया करें? अब देखिए न, प्रश्न को इस रूप में रखते ही उसके कितने प्रतीकात्मक विस्तारों की गूँज सुनाई देने लगी! क्या हम किसी स्थूल वास्तविक ताले-चाबी की बात कर रहे हैं, या उन सभी बौद्धिक प्रश्नों की जिज्ञासाओं की जिनके आगे हम अक्सर निरुत्तर रह जाया करते हैं? या उन मानसिक ग्रान्थियों-गुत्थियों की जिनको सुलझाने में हम अपने को अमसर्थ पाते हैं।

बल्कि अब ग्रन्थियों-गुत्थियों की बात करते ही प्रश्न का एक और विस्तार सामने आ गया : मनोविश्लेषणवादियों के लिए तो ताले और चाबी के सम्बन्ध के आयाम दूसरे ही हैं। उनको तो इसमें बड़ा गहरा अर्थ दीखता है कि आपसे चाबी अक्सर खो जाती है और आप ताले के सामने अपने को असहाय पाते हैं। बल्कि वे तो यथार्थ की बात से छलाँग लगाकर तुरन्त स्वप्न-लोक में पहुँच जाएँगे-अपने स्वप्न-लोक में नहीं, आपके स्वप्न-लोक में! क्या आपको ताले-चाबी के भी स्वप्न दीखते हैं? क्या स्वप्न में ऐसा भी होता है कि आप अँधेरे में टटोल रहे हैं और आपको ताले का सूराख नहीं मिलता? या कि जो चाबी आपने निकाली है वह उस ताले में फिट नहीं बैठती! और ऐसे स्वप्न के साथ आपको क्या घबड़ाहट का भी बोध होता है? …ताले-चाबी की बात करते-करते मनोविश्लेषणवादी चाबी से लगी जंजीर के सहारे आपको खींचते-खींचते व्यंजनाओं के किस दलदल में ले जाएँगे-कुछ पूछिए मत!

उमर ख़ैयाम तो एक तरह से बड़े भाग्यवान थे कि उनका जन्म (जन्म ही नहीं, उनकी मृत्यु भी!) फ्रायड से बहुत पहले हो गयी-इतनी पहले कि बीच में फिट्जैराल्ड को ख़ैयाम की रुबाइयों का एक स्वतन्त्र और कल्पनाशील अनुवाद कर डालने का भी समय मिल गया। अनुवाद तो और भी बहुत से हुए-लेकिन ये सारे अनुवाद ख़ैयाम की रुबाइयात के नहीं, फिट्जैराल्ड के अँग्रेज़ी ‘रुबाइयात-ए-उमर ख़ैयाम’ के रहे। हिन्दी में ही तीन-तीन महाकवियों ने अँग्रेज़ी रुबाइयात के अनुवाद कर डाले और दो-तीन पंडितों ने भी-और हमने तो सुना है कि दो-एक संस्कृत पंडितों ने भी उसके संस्कृत अनुवाद कर डाले हैं! ये सारे अनुवाद यों तो फ्रायड की प्रसिद्धि के बाद ही हुए, लेकिन अनुवाद होने के नाते किसी अनुवादक को इस बात को लेकिन चिन्ता नहीं हुई कि ताले और चाबी की बात से बढ़ते-बढ़ते क्या-क्या अनुमान लगाये जा सकते हैं, क्या-क्या ध्वनित किया जा सकता है! अनुमान जो होंगे ख़ैयाम के बारे में होंगे, अनुवादकों के बारे में क्यों होने लगे? वे तो एक दिन हुए पाठ को लेकर ही चल रहे हैं।

ख़ैयाम ने तो सहज भाव से लिख दिया : ‘एक द्वार था जिसकी कोई चाबी मुझे नहीं मिली, एक द्वार था जिसके पार मुझे कुछ नहीं दीखा।’ लेकिन जहाँ तक द्वार का सवाल है, हिन्दी के कवि को तो ‘आँगन के पार द्वार मिले द्वार के पार आँगन’ और उस प्रकार वह भवन की चिन्ता करने से ही मुक्त हो गया। यों भी अपने ओर-छोरों के बीच भवन तो कहीं खो ही गया था और उसमें सीधे जाकर द्वार के प्रतिहारी को ‘बार-बार पालागन’ कहकर अपनी सुरक्षा की व्यवस्था कर ली। अब कह लीजिए कि अपनी सुरक्षा की व्यवस्था कर लेना हिन्दी कवि बल्कि हिन्दी समाज के स्वभाव में ही है और इसके लिए वह सबकी पा-लगी को ही स्वस्थ उपाय मानता है। द्वारपाल से धोक देना शुरू किया तो हर देहरी पर धोक देता हुआ सीधे भीतर के भी भीतरतम तक पहुँच गया। मन्दिर हो तो गर्भगृह में विराजमान देवता तक और राजमहल हो तो अन्त:पुर में विराजमान राज-व्यष्टि तक- वह व्यक्ति राजा हो तो या रानी हो तो, उसे कोई फर्क पडनेवाला नहीं है-वह तो अब सुरक्षा की परिधि में आ गया है और एक बार फिर कार्निश करके एक तरफ़ खड़ा हो जाएगा। हिन्दी समाज का यह स्वभाव न होता तो क्या आज हिन्दी प्रदेश की राजनीति का वह रूप हमें देखने को मिलता तो आज प्रत्यक्ष है?

धत् तेरे की! यह भी हिन्दी समाज का स्वभाव है कि बात चाहे कहीं से शुरू हो, आकर टिकती है राजनीति पर ! राजनीति वह चाबी है जो हर ताले में फिट हो जाती है। लेकिन नहीं, हम राजनीति की बात नहीं करेंगे। हमारा प्रयोजन उस चाबी से नहीं है जो हर ताले में फिट बैठ जाए (भले ही ताले को खोले नहीं, फिट बैठकर इत्मीनान से बेरोकटोक उसके अन्दर घूमती रहे), हमारा प्रयोजन तो उस ताले से है जिसमें कोई चाबी फिट नहीं बैठती।

देयर वाज़ ए डोर टु व्हिच आइ फाउंड नो की (एक दरवाजा था जिसकी कोई चाभी मुझे नहीं मिली)- हमें लगता है कि ख़ैयाम ठीक रास्ते पर था। ख़ैयाम राजनीतिक नहीं था (मनोविश्लेषक भी नहीं था), ख़ैयाम कवि था। और कवि ही उस ताले का सामना कर सकता है जिसकी चाबी उसके पास नहीं है और अनातंकित भाव से उस ताले के पीछे बन्द द्वार को और उस द्वार के पीछे के बन्द संसार को अपनी कल्पना के आगे मूर्त कर सकता है, कल्पना के भेदक प्रकाश से उजागर करके देख सकता है।

और यह उस अनातंकित भाव से ही होता है कि ताले भी केवल परिस्थिति का एक तथ्य-भर रह जाते हैं, वास्तविक अवरोध नहीं-वे कवि की गति में बाधा नहीं डाल सकते। ताले भी हैं, दीवार भी हैं, परकोटे भी हैं-पर कवि की गति इनसे अवरुद्ध नहीं होती क्योंकि कवि तो पहले ही इन सबके पार भीतर के उस गुहा-प्रदेश में है जिसे ‘देवानां पुरयोध्या’ कहा गया है-द्रष्टा कवि के द्वारा ही कहा गया है, क्योंकि वही तो उसे बाहर से स्पष्ट देखता हुआ उसके भीतर भी पहुँचा रहता है। ताले-कुंजी की बात उसके लिए महत्त्व की नहीं रहती, बल्कि दीवारों की भी नहीं रहती! असल में तो वह भीतर-बाहर के इस भेद की कृत्रिमता को ही उघाड़ देता है। वही दिखाता है कि कोई वास्तविक भेद नहीं है, हम परिभाषा की ही एक दीवार खड़ी कर देते हैं और वह इसी से और भी दृढ़ हो जाती है कि वह अदृश्य होती है। भाषा यों तो मानव की मुक्ति का श्रेष्ठ उपकरण है, पर वही दीवारें खड़ी करने का अद्वितीय सामर्थ्य भी रखती है जो इससे और भी बढ़ जाता है कि ये दीवारें अदृश्य होती हैं। अदृश्य होती हैं लेकिन पारदर्शी नहीं होतीं, दृष्टि को काटतीं नहीं मानो वापस मोड़ देती हैं। इसी में तो उनकी शक्ति होती है, हमारी दीठ अवरुद्ध नहीं होती, हम देखते तो रहते हैं पर दीवार के पार नहीं देखते, लौटकर फिर अपनी ही ओर देखते रह जाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे कभी-कभी अनजाने मुकुर में झाँकने से हो जाता हे, जब हमें पता नहीं होता कि वहाँ मुकुर है। भाषा भी तब दीवार बनती है जब वह अदृश्य मुकुर की तरह हो जाती है।

और कवि को हम ‘वाक्सिद्ध’ अथवा स्रष्टा तभी कहते हैं जब वह मुकुर में दीखते हुए प्रतिबिम्बों को नकारे बिना हठात् हमें उसके पार का समूचा परिदृश्य भी दिखा देता है। तब कुंजियाँ अनावश्यक हो गयी होती हैं क्योंकि ताले भी सत्त्वरहित हो चुके होते हैं।

भीतर और बाहर। बिना सोचे-समझे हमने मान लिया होता है कि भीतर अर्थात् छोटा, सूक्ष्म, और बाहर अर्थात् बड़ा, विराट। यह भी उस अदृश्य भाषा-मुकुर का ही चमत्कार होता है। नहीं तो हमें भीतर झाँककर ही तो विराट दीखता है। क्या यही बात परम भागवत कवि ने हमें नहीं बतायी थी जब उसने मिट्टी खाने वाले बालगोपाल के छोटे-से गोल मुँह में माता यशोदा को एकाएक विराट विश्वरूप के दर्शन करा दिए थे! वह बाल-मुख इसीलिए तो भगवान का मुख है कि वह प्रतिबिम्ब-दर्शन मुकुर नहीं है, स्वयं साक्षात सच्चिन्मय बिम्ब है-स्वयंसिद्ध और स्वत:प्रकाश सत्ता? और उसी प्रकार हम बाहर देखते हैं, तो बाहर के नाम पर मिलता है ब्यौरा, और भी महीन ब्यौरा… क्या यह बात कुछ अर्थ नहीं रखती कि आज का चित्रकार जो लगातार बड़े-से-बड़ा चित्र बनाने में लगा है, उसमें ब्यौरा कुछ भी नहीं देता-देना नहीं चाहता या दे नहीं पाता? आकार बड़े-से-बड़ा, पर ब्यौरा कम-से-कम, आकृतियाँ कम, रेखाएँ कम, सीमा-सन्दर्भ कम… और उधर पुराना चित्रकार जो बहुत छोटे पैमाने पर काम करता था उसी में अधिक-से-अधिक ब्यौरा दे देता था- पेड़ हो तो एक-एक पत्ती, पत्ती का एक-एक रेशा, शबीह हो तो चेहरे की एक-एक झाँई, एक-एक सलवट, लट का एक-एक बाल, दुपट्टे-घघरे की गोट के एक-एक तारक-फूल की एक-एक पंखुरी… एक तरफ गागर में सागर भरता है, दूसरी तरफ़ सागर में गागर को ऊब-डूब करने की जगह नहीं है : क्या चित्रकार भी अपने ढँग से उसी बात को संकेतित नहीं कर रहा जिसे कवि इतने विशद ढँग से कहता है-कि भीतर की अपनी नि:सीमता है, बाहर की अपनी संवलितता : कि ये नाम केवल बात करने की सुविधा के लिए हैं, उनकी आत्यन्तिक सत्ता नहीं है…

‘बात करने की सुविधा’-अर्थात् ताले की कुंजी। पर वही कुंजी जिसके साथ ताला खुले ही, ऐसा कोई दावा नहीं है, ताला अपनी जगह रह जाए, पर हम कमरे से बाहर छूट गये होने के असमंजस से छुटकारा पा जाएँ। अब सोचिए-’छुटकारा पाना’ तो ताले का खुलना है : पर ‘छूट गये होने से छुटकारा’-वह क्या होता है? ताले से बाहर रह गये होने की कैद से मुक्ति?

तार्किक एक युक्ति पर हमें हँसा देता है , कवि वहीं पर हमें टोक देता है कि जिस बात पर हम हँस दिये हैं वह तो एक गहरी सचाई है। युक्ति तो केवल भाषायी सौष्ठव का एक अंग है, एक वेश है, सचाई तो उसके भीतर वेष्टित है। कवि तो हमेशा सोचता है कि उसका घर ताले-कुंजी से ही क्यों, द्वार-दीवार की झंझट से भी मुक्त होगा-तभी तो वह घर होगा-

बे-दरो-दीवार-सा इक घर बनाना चाहिये

अब अगर दरो-दीवार के बगैर भी घर हो सकता है-और होता है, यह हमारे कवि हमें सनातन काल से बताते आये हैं-तो प्रश्न उठता है कि जब दरो-दीवार, ताले-कुंजी सब होते हैं तब घर क्यों उनके भीतर कैद होता है? क्योंकि अगर दरो-दीवार ही घर हैं तब तो इनके बिना घर बचता ही नहीं : और अगर फिर भी बचता है तो ये उसे रचते नहीं, केवल रूपायित कर देते हैं, सीमा द्वारा परिभाषित कर देते हैं-परिसमित कर देते हैं। और दरो-दीवार हटा देने पर भी जो घर बच रहता है, उसके सन्दर्भ में बाहर और भीतर का कोई भेद रहता ही नहीं-वह बाहर भी है और भीतर भी, बाहर के भीतर है और भीतर के बाहर भी… बिहारी के बरवै की भोली नायिका जब कहती है :

लै के सुघर खुरपिया पिय के साथ
छइबै एक छतरिया बरसत पाथ

तब जिस छतरिया की बात वह कह रही है, खुरपिया के सहारे उसे केवल ढँक लेने की बात ही वह सोच रही है, छतरिया गढ़ने की नहीं। छतरिया तो पहले से है, और क्योंकि पहले से है इसीलिए ‘बरसत पाथ’ से उसे बचाने के लिए उसे छवाने की जरूरत है-छतरिया को बचाने के लिए, उसमें सुरक्षित ‘पिय के साथ’ को भी बचाये रखने के लिए। और क्या यह बातने की कोई आवश्यकता है कि पिय का यह साथ एकान्त निजी भी है, निभृत भी, सूक्ष्म भी-और विराट विश्वव्यापी भी?

शायद यही बात मूर्तिकार रोदैं ने पत्थर की लीक पर लिख देनी चाही थी जब उसने दो हाथ-एक पुरुष का, एक नारी का-ऐसे गढ़े थे मानो किसी रहस्यमय प्रकाश को-और प्यार के प्रत्यय से बड़ा रहस्य और कौन-सा होगा जो एक साथ ही गोपनतम भी होता है, प्रकाश-दीप्त भी?-ओट दे रहे हों, और इस रचना को नाम दिया था ‘कैथिड्रल’! सचमुच दो प्रेममय हाथों के बीच का वह सुरक्षित सूक्ष्म अन्तराल ही तो वह बे-दरो-दीवार घर है जो देव-मन्दिर है। (रोदें ने ऐसे ही दो हाथों की एक और अनगढ़ प्रतिमा गढ़ी जिसे उसने नाम दिया ‘दि सीक्रेट’-रहस्य। हाँ, यही तो और यहीं तो रहस्य है!) और यही तो उसका ताला है कि उसका न द्वार है, न दीवार, न भीतर, न बाहर-और यही उस ताले की कुंजी है। क्योंकि असल में तो वहाँ ताले-कुंजी का भी कोई सरोकार नहीं है। सुरक्षा अथवा असुरक्षा, दुराव अथवा प्रतीति का बोझ जहाँ से मिलता है वह तो अधिकरण ही दूसरा है। उस बोझ की आधार-भित्ति तो प्रेम है-प्रेम जो प्रीतम का घर है, ‘खाला का घर नाँहि।’ और उस घर में जिसे जाना है, वह ताले-कुंजी को तो घर में छोड़ता ही है, घर फूँक देता है और बीच-बजार कबिरा के साथ हो लेता है।

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

जयदोल – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

Image result for army man in ladakh

लेफ्टिनेंट सागर ने अपना कीचड़ से सना चमड़े का दस्ताना उतार कर, ट्रक के दरवाजे पर पटकते हुए कहा,”गुरूंग, तुम गाड़ी के साथ ठहरो, हम कुछ बन्दोबस्त करेगा।”
गुरूंग सड़ाक से जूतों की एड़ियाँ चटका कर बोला,”ठीक ए सा’ब -”

साँझ हो रही थी। तीन दिन मूसलाधार बारिश के कारण नवगाँव में रुके रहने के बाद, दोपहर को थोड़ी देर के लिए आकाश खुला तो लेफ्टिनेंट सागर ने और देर करना ठीक न समझा। ठीक क्या न समझा, आगे जाने के लिए वह इतना उतावला हो रहा था कि उसने लोगों की चेतावनी को अनावश्यक सावधानी माना और यह सोच कर कि वह कम से कम शिवसागर तो जा ही रहेगा रात तक, वह चल पड़ा था।
जोरहाट पहुँचने तक ही शाम हो गई थी, पर उसे शिवसागर के मन्दिर देखने का इतना चाव था कि वह रुका नहीं, जल्दी से चाय पी कर आगे चल पड़ा। रात जोरहाट में रहे तो सबेरे चल कर सीधे डिबरूगढ़ जाना होगा, रात शिवसागर में रह कर सबेरे वह मन्दिर और ताल को देख सकेगा। शिवसागर, रूद्रसागर, जयसागर – कैसे सुन्दर नाम है। सागर कहलाते हैं तो बड़े-बड़े ताल होंगे — और प्रत्येक के किनारे पर बना हुआ मन्दिर कितना सुन्दर दीखता होगा असमिया लोग हैं भी बड़े साफ-सुथरे, उनके गाँव इतने स्वच्छ होते हैं तो मन्दिरों का क्या कहना

शिव-दोल, रूद्र-दोल, जय-दोल — सागर-तट के मन्दिर को दोल कहना कैसी सुन्दर कवि – कल्पना है। सचमुच जब ताल के जल में, मन्द-मन्द हवा से सिहरती चाँदनी में, मन्दिर की कुहासे-सी परछाई डोलती होगी, तब मन्दिर सचमुच सुन्दर हिंडोले-सा दीखता होगा इसी उत्साह को लिए वह बढ़ता जा रहा था — तीस-पैंतीस मील का क्या है — घण्टेभर की बात है।

लेकिन सात-एक मील बाकी थे कि गाड़ी कच्ची सड़क के कीचड़ में फँस गई। पहले तो स्टीयरिंग ऐसा मक्खन-सा नरम चला मानो गाड़ी नहीं, नाव की पतवार हो और नाव बड़े से भँवर में हचकोले खाती झूम रही हो; फिर लेफ्टिनेंट के सँभालते-सँभालते गाड़ी धीमी हो कर रूक गई, यद्यपि पहियों के घूमते रह कर कीचड़ उछालने की आवाज आती रही।

इसके लिए साधारणत: तैयार होकर ही ट्रक चलते थे। तुरन्त बेलचा निकाला गया, कीचड़ साफ करने की कोशिश हुई लेकिन कीचड़ गहरा और पतला था, बेलचे का नहीं, पम्प का काम था। फिर टायरों पर लोहे की जंजीरें चढ़ाई गईं। पहिये घूमने पर कहीं पकड़ने को कुछ मिले तो गाड़ी आगे ठिले — मगर चलने की कोशिश पर लीक गहरी कटती गई और ट्रक धँसता गया, यहाँ तक कि नीचे का गीयर-बक्स भी कीचड़ में डूबने को हो गया मानों इतना काफी न हो; तभी इंजन ने दो-चार बार फट्-फट्-फट् का शब्द किया और चुप हो गया — फिर स्टार्ट ही न हुआ।

अँधेरे में गुरूंग का मुँह दीखता था और लेफ्टिनेंट ने मन-ही-मन सन्तोष किया कि गुरूंग को उसका मुँह भी नहीं दीखता होगा गुरूंग गोरखा था और फौजी गोरखों की भाषा कम-से-कम भावना की दृष्टि से गूँगी होती है मगर आँखें या चेहरे की झुर्रियाँ सब समय गूँगी नहीं होतीं और इस समय अगर उनमें लेफ्टिनेंट सा’ब की भावुक उतावली पर विनोद का आभास भी दीख गया, तो दोनों में मूक वैमनस्य की एक दीवार खड़ी हो जाएगी।

तभी सागर ने दस्तानें फेंक कर कहा, ”हम कुछ बन्दोबस्त करेगा” और फिच्च-फिच्च कीचड़ में जमा-जमा कर बूट रखता हुआ आगे चढ़ चला।”
कहने को तो उसने कह दिया, पर बन्दोबस्त वह क्या करेगा रात में? बादल फिर घिरने लगे; शिवसागर सात मील है तो दूसरे सागर भी तीन-चार मील तो होंगे और क्या जाने कोई बस्ती भी होगी कि नहीं; और जयसागर तो बड़े बीहड़ मैदान के बीच में हैं उसने पढ़ा था कि उस मैदान के बीच में ही रानी जयमती को यन्त्रणा दी गई थी कि वह अपने पति का पता बता दे। पाँच लाख आदमी उसे देखने इकठ्ठे हुए थे और कई दिनों तक रानी को सारी जनता के सामने सताया तथा अपमानित किया गया था।

एक बात हो सकती है कि पैदाल ही शिवसागर चला जाए। पर उस कीचड़ में फिच्च-फिच्च सात मील – उसी में भोर हो जायेगा, फिर तुरंत गाड़ी के लिए वापस जाना पड़ेगा फिर नहीं, वह बेकार है। दूसरी सूरत रात गाड़ी में ही सोया जा सकता है। पर गुरूंग? वह भूखा ही होगा कच्ची रसद तो होगी पर बनाएगा कैसे? सागर ने तो गहरा नाश्ता किया था, उसके पास बिस्कुट वगैरह भी है पर अफसरी का बड़ा कायदा है कि अपने मातहत को कम-से-कम खाना तो ठीक खिलाये शायद आस-पास कोई गाँव हो —

कीचड़ में कुछ पता न लगता था कि सड़क कितनी है और अगल-बगल का मैदान कितना। पहले तो दो-चार पेड़ भी किनारे-किनारे थे, पर अब वह भी नहीं, दोनों ओर सपाट सूना मैदान था और दूर के पेड़ भी ऐसे धुँधले हो गए थे कि भ्रम हो, कहीं चश्मे पर नमी की ही करामात तो नहीं है अब रास्ता जानने का एक ही तरीका था, जहाँ कीचड़ कम गहरा हो वही सड़क; इधर-उधर हटते ही पिंडलियाँ तक पानी में डूब जाती थीं और तब वह फिर धीरे-धीरे पैर से टटोल कर मध्य में आ जाता था।

यह क्या है? हाँ, पुल-सा है — यह रेलिंग हैं। मगर दो पुल है समकोण बनाते हुए क़्या दो रास्ते है? कौन-सा पकड़ें?

एक कुछ ऊँची जमीन की ओर जाता जान पड़ता था। ऊँचे पर कीचड़ कम होगा, इस बात का ही आकर्षण काफी था; फिर ऊँचाई पर से शायद कुछ दीख भी जाए। सागर उधर ही को चल पड़ा। पुल के पार ही सड़क एक ऊँची उठी हुई पटरी-सी बन गई, तनिक आगे इसमें कई मोड़ से आये, फिर जैसे धन-खेत में कहीं-कहीं कई-एक छोटे-छोटे खेत एक-साथ पड़ने पर उनकी मेड़ मानो एक-साथ ही कई ओर जाती जान पड़ती है, इसी तरह वह पटरी भी कई ओर को जाती-सी जान पड़ी। सागर मानो एक बिन्दु पर खड़ा है, जहाँ से कई रास्ते हैं, प्रत्येक के दोनों ओर जल मानो अथाह समुद्र में पटरियाँ बिछा दी गईं हों।

सागर ने एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। शून्य। उसने फिर आँखों की कोरें कस कर झाँक कर देखा, बादलों की रेखा में एक कुछ अधिक घनी-सी रेखा उसे दीखी बादल ऐसा समकोण नहीं हो सकता। नहीं, यह इमारत है सागर उसी ओर को बढ़ने लगा। रोशनी नहीं दीखती, पर शायद भीतर कोई हो —

पर ज्यों-ज्यों वह निकट आता गया उसकी आशा धुँधली पड़ती गई। वह असमिया घर नहीं हो सकता — इतने बड़े घर अब कहाँ हैं — फिर यहाँ, जहाँ बाँस और फूस के बासे ही हो सकते हैं, इंट के घर नहीं– अरे, यह तो कोई बड़ी इमारत है — क्या हो सकती है?

मानो उसके प्रश्न के उत्तर में ही सहसा आकाश में बादल कुछ फीका पड़ा और सहसा धुँधला-सा चाँद भी झलक गया। उसके अधूरे प्रकाश में सागर ने देखा — एक बड़ी-सी, ऊपर से चपटी-सी इमारत — मानो दुमंजिली बारादरी बरामदे से, जिसमें कई-एक महराबें; एक के बीच से मानो आकाश झाँक दिया…

सागर ठिठक कर क्षण-भर उसे देखता रहा। सहसा उसके भीतर कुछ जागा जिसने इमारत को पहचान लिया — यह तो अहोम राजाओं का क्रीड़ा भवन है — क्या नाम है? — रंग-महल, नहीं, हवा-महल — नहीं, ठीक याद नहीं आता, पर यह उस बड़े पठार के किनारे पर है जिसमें जयमती —

एकाएक हवा सनसना उठी। आस-पास के पानी में जहाँ-तहाँ नरसल के झोंप थे, झुक कर फुसफुसा उठे जैसे राजा के आने पर भृत्योंसेवकों में एक सिहरन दौड़ जाए एकाएक यह लक्ष्य कर के कि चाँद फिर छिपा जा रहा है, सागर ने घूमकर चीन्ह लेना चाहा कि ट्रक किधर कितनी दूर है, पर वह अभी यह भी तय नहीं कर सका था कि कहाँ क्षितिज है जिसके नीचे पठार है और ऊपर आकाश या मेघाली कि चाँद छिप गया और अगर उसने खूब अच्छी तरह आकार पहचान न रखा होता तो रंग-महल या हवा-महल भी खो जाता।

महल में छत होगी। वहाँ सूखा होगा। वहाँ आग भी जल सकती है। शायद बिस्तर लाकर सोया भी जा सकता है। ट्रक से तो यही अच्छा रहेगा — गाड़ी को तो कोई खतरा नहीं —
सागर जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगा।
रंग-महल बहुत बड़ा हो गया था। उसकी कुरसी ही इतनी ऊँची थी कि असमिया घर उसकी ओट छिप जाए। पक्के फर्श पर पैर पड़ते ही सागर ने अनुमान किया, तीस-पैंतीस सीढ़ियाँ होंगी सीढ़ियाँ चढ़ कर वह असली ड्योढ़ी तक पहुँचेगा।

ऊपर चढ़ते-चढ़ते हवा चीख उठी। कई मेहराबों से मानो उसने गुर्रा कर कहा, ”कौन हो तुम, इतनी रात गए मेरा एकान्त भंग करनेवाले?” विरोध के फूत्कार का यह थपेड़ा इतना सच्चा था कि सागर मानो फुसफुसा ही उठा, ”मैं — सागर, आसरा ढूँढ़ता हूँ — रैनबसेरा –”
पोपले मुँह का बूढ़ा जैसे खिसिया कर हँसे; वैसे ही हवा हँस उठी।
”ही –ही — ही — खी — खी –खी: – यह हवा-महल है, हवा-महल — अहोम राजा का लीलागार — अहोम राजा का — व्यसनी, विलासी, छहों इन्द्रियों से जीवन की लिसड़ी बोटी से छहों रसों को चूस कर उसे झँझोड़ कर फेंक देने वाले नृशंस लीलापिशाचों का — यहाँ आसरा — यहाँ बसेरा ही –ही — ही — खी — खी –खी:।”

सीढ़ियों की चोटी से मेहराबों के तले खड़े सागर ने नीचे और बाहर की ओर देखा। शून्य, महाशून्य; बादलों में बसी नमी और ज्वाला से प्लवन, वज्र और बिजली से भरा हुआ शून्य। क्या उसी की गुर्राहट हवा में हैं, या कि नीचे फैले नंगे पठार की, जिसके चूतड़ों पर दिन-भर सड़ पानी के कोड़ों की बौछार पड़ती रही है? उसी पठार का आक्रोश, सिसकन, रिरियाहट?

इसी जगह, इसी मेहराब के नीचे खड़े कभी अधनंगे अहोम राज ने अपने गठीले शरीर को दर्प से अकड़ा कर, सितार की खूँटी की तरह उमेठ कर, बाँयें हाथ के अँगूठे को कमरबन्द में अटका कर, सीढ़ियों पर खड़े क्षत-शरीर राजकुमारों को देखा होगा, जैसे कोई साँड़ खसिया बैलों के झुण्ड को देखे, फिर दाहिने हाथ की तर्जनी को उठा कर दाहिने भ्रू को तनिक-सा कुंचित करके, संकेत से आदेश किया होगा कि यन्त्रणा को और कड़ी होने दो।

लेफ्टिनेण्ट सागर की टाँगें मानो शिथिल हो गयीं। वह सीढ़ी पर बैठ गया, पैर उसने नीचे को लटका दिये, पीठ मेहराब के निचले हिस्से से टेक दी। उसका शरीर थक गया था दिन-भर स्टीयरिंग पर बैठे-बैठे और पौने दो सौ मील तक कीचड़ की सड़क में बनी लीकों पर आँखें जमाये रहने से आँखें भी ऐसे चुनचुना रही थीं मानो उनमें बहुत बारीक पिसी हुई रेत डाल दी गई हो — आँखें बन्द भी वह करना चाहे और बन्द करने में क्लेश भी हो — वह आँख खुली रखकर ही किसी तरह दीठ को समेट ले, या बन्द करके देखता रह सके, तो

अहोम राजा चूलिक-फा राजा में ईश्वर का अंश होता है, ऐसे अन्धविश्वास पालनेवाली अहोम जाति के लिए यह मानना स्वाभाविक ही था कि राजकुल का अक्षत-शरीर व्यक्ति ही राजा हो सकता है, जिसके शरीर में कोई क्षत है, उसमें देवत्व का अंश कैसे रह सकता है?

देवत्व — और क्षुण्ण? नहीं। ईश्वरत्व अक्षुण्ण ही होता है और राजा शरीर अक्षत

अहोम परम्परा के अनुसार कुल-घात के सेतु से पार होकर चूलिक-फा भी राजसिंहासन पर पहुँचा। लेकिन वह सेतु सदा के लिए खुला रहे, इसके लिए उसने एक अत्यन्त नृशंस उपाय सोचा। अक्षत-शरीर राजकुमार ही राजा हो सकते हैं, अत: सारे अक्षत-शरीर राजकुमार उसके प्रतिस्पर्धी और सम्भाव्य घातक हो सकते हैं। उनके निराकरण का उपाय यह है कि सब का एक-एक कान या छिगुनी कटवा ली जाए — हत्या भी न करनी पड़े, मार्ग के रोड़े भी हट जायें। लाठी न टूटे, साँप भी मरे नहीं पर उसके विषदन्त उखड़ जाएँ। क्षत-शरीर, कनकटे या छिगुनी-कटे राजकुमार राजा हो ही नहीं सकेंगे, तब उन्हें राज-घात का लोभ भी न सताएगा –

चूलिक-फा ने सेनापति को बुला कर गुप्त आज्ञा दी कि रात में चुपचाप राज-कुल के प्रत्येक व्यक्ति के कान (या छिगुनी) काट कर प्रात:काल दरबार में राज-चरणों में अर्पित किए जाएँ।

और प्रात:काल वहीं रंगमहल की सीढ़ियों पर, उसके चरणों में यह वीभत्स उपहार चढ़ाया गया होगा — और उसने उसी दर्प-भरी अवज्ञा में, होठों की तार-सी तनी पतली रेखा को तनिक मोड़-सी देकर, शब्द किया होगा, ‘हूँ’ और रक्त-सने थाल को पैर से तनिक-सा ठुकरा दिया होगा –
चूलिक-फा — निष्कंटक राजा – लेकिन नहीं यह तीर-सा कैसा साल गया? एक राजकुमार भाग गया –अक्षत –
लेफ्टिनेंट सागर मानो चूलिका-फा के चीत्कार को स्पष्ट सुन सका। अक्षत – भाग गया?

वहाँ सामने — लेफ्टिनेंट ने फिर आँखों को कस कर बादलों की दरार को भेदने की कोशिश की — वहाँ सामने कहीं नगा पर्वत श्रेणी है। वनवासी वीर नगा जातियों से अहोम राजाओं की कभी नहीं बनी –वे अपने पर्वतों के नंगे राजा थे, ये अपनी समतल भूमि के कौशेय पहन कर भी अधनंगे रहने वाले महाराजा, पीढ़ियों के युद्ध के बाद दोनों ने अपनी-अपनी सीमाएँ बाँध ली थीं और कोई किसी से छेड़-छाड़ नहीं करता था — केवल सीमा-प्रदेश पर पड़ने वाली नमक की झीलों के लिए युद्ध होता था क्योंकि नमक दोनों को चाहिए था। पर अहोम राजद्रोही नगा जातियों के सरदार के पास आश्रय पाए — असह्य है – असह्य –

हवा ने साँय-साँय कर के दाद दी असह्य। मानो चूलिक-फा के विवश क्रोध की लम्बी साँस सागर की देह को छू गई- यहीं खड़े होकर उसने वह सांस खींची होगी — उस मेहराब ही की इँट-इँट में तो उसके सुलगते वायु-कण बसे होंगे?

लेकिन जाएगा कहाँ – उसकी वधू तो है? वह जानेगी उसका पति कहाँ है, उसे जानना होगा – जयमती अहोम राज्य की अद्वितीय सुन्दरी — जनता की लाडली — होने दो – चूलिक-फा राजा है, वह शत्रुविहीन निष्कण्टक राज्य करना चाहता है – जयमती को पति का पता देना होगा — उसे पकड़वाना होगा — चूलिक-फा उसका प्राण नहीं चाहता, केवल एक कान चाहता है, या एक छिगुनी — चाहें बायें हाथ की भी छिगुनी – क्यों नहीं बतायेगी जयमती? वह प्रजा है; प्रजा की हड्डी-बोटी पर भी राजा का अधिकार है –

बहुत ही छोटे एक क्षण के लिए चाँद झलक गया। सागर ने देखा, सामने खुला, आकारहीन, दिशाहीन, मानातीत निरा विस्तार; जिसमें नरसलों की सायँ-सायँ, हवा का असंख्य कराहटों के साथ रोना, उसे घेरे हुए मेहराबों की क्रुद्ध साँपों की-सी फुँफकार चाँद फिर छिप गया और पानी की नयी बौछार के साथ सागर ने आँखें बन्द कर लीं असंख्य सहमी हुई कराहें और पानी की मार ऐसे जैसे नंगे चूतड़ों पर स-दिया प्रान्त के लचीले बेतों की सड़ाक-सड़ाक। स-दिया अर्थात शव-दिया? कब किसका शव वहाँ मिलता था याद नहीं आता, पर था शव जरूर — किसका शव नहीं, जयमती का नहीं। वह तो — वह तो उन पाँच लाख बेबस देखने वालों के सामने एक लकड़ी के मंचपर खड़ी है, अपनी ही अस्पृश्य लज्जा में, अभेद्य मौन में, अटूट संकल्प और दुर्दमनीय स्पर्द्धा में लिपटी हुई; सात दिन की भूखी-प्यासी, घाम और रक्त की कीच से लथपथ, लेकिन शेषनाग के माथे में ठुकी हुई कोली की भाँति अडिग, आकाश को छूने वाली प्रात:शिखा-सी निष्कम्प लेकिन यह क्या? सागर तिलमिला कर उठ बैठा। मानों अँधेरे में भुतही-सी दीख पड़नेवाली वह लाखों की भीड़ भी काँप कर फिर जड़ हो गई — जयमती के गले से एक बड़ी तीखी करूण चीख निकल कर भारी वायु-मण्डल को भेद गई — जैसे किसी थुलथुल कछुए के पेट को मछेरे की बर्छी सागर ने बड़े जोर से मुठि्ठयाँ भींच ली क्या जयमती टूट गई? नहीं, यह नहीं हो सकता, नरसलों की तरह बिना रीढ़ के गिरती-पड़ती इस लाख जनता के बीच वही तो देवदारू-सी तनी खड़ी है, मानवता की ज्योति:शलाका सहसा उसके पीछे से एक दृप्त, रूखी, अवज्ञा-भरी हँसी से पीतल की तरह झनझनाते स्वर ने कहा, ”मैं राजा हूँ -”

सागर ने चौक कर मुड़ कर देखा –सुनहला, रेशमी वस्त्र, रेशमी उत्तरीय, सोने की कंठी और बड़े-बड़े अनगढ़ पन्नों की माला पहने भी अधनंगा एक व्यक्ति उसकी और ऐसी दया-भरी अवज्ञा से देख रहा था, जैसे कोई राह किनारे के कृमि-कीट को देखे। उसका सुगठित शरीर, छेनी से तराशी हुई चिकनी मांस-पेशियाँ, दर्प-स्फीत नासाएँ, तेल से चमक रही थीं, आँखों की कोर में लाली थी जो अपनी अलग अलग बात कहती थी — मैं मद भी हो सकती हूँ, गर्व भी, विलास-लोलुपता भी और निरी नृशंस नर-रक्त-पिपासा भी सागर टुकुर-टुकुत देखता रह गया। न उड़ सका, न हिल सका। वह व्यक्ति फिर बोला, ”जयमती? हुँ: , जयमती – अँगूठे और तर्जनी की चुटकी बना कर उसने झटक दी, मानो हाथ का मैल कोई मसल कर फेंक दे। बिना क्रिया के भी वाक्य सार्थक होता है, कम-से-कम राजा का वाक्य सागर ने कहना चाहा, ”नृशंस- राक्षस- ” लेकिन उसकी आँखों की लाली में एक बाध्य करनेवाली प्रेरणा थी, सागर ने उसकी दृष्टि का अनुसरण करते हुए देखा, जयमती सचमुच लड़खड़ा गई थी। चीखने के बाद उसका शरीर ढीला होकर लटक गया था, कोड़ों की मार रुक गई थी, जनता साँस रोके सुन रही थी सागर ने भी साँस रोक ली। तब मानो स्तब्धता में उसे अधिक स्पष्ट दीखने लगा, जयमती के सामने एक नगा बाँका खड़ा था, सिर पर कलगी, गले में लकड़ी के मुँड़ों की माला, मुँह पर रंग की व्याघ्रोपम रेखाएँ, कमर के घास की चटाई की कौपीन, हाथ में बर्छी। और वह जयमती से कुछ कह रहा था।

सागर के पीछे एक दर्प-स्फीत स्वर फिर बोला, ”चूलिक-फा के विधान में हस्तक्षेप करनेवाला यह ढीठ नगा कौन है? पर सहसा उस नंगे व्यक्ति का स्वर सुनाई पड़ने लगा और सब चुप हो गए।
”जयमती, तुम्हारा साहस धन्य है। जनता तुम्हें देवी मानती है। पर और अपमान क्यों सहो? राजा का बल अपार है — कुमार का पता बता दो और मुक्ति पाओ -”
अब की बार रानी चीखी नहीं। शिथिल-शरीर, फिर एक बार कराह कर रह गई।

नगा वीर फिर बोला, ”चुलिक-फा केवल अपनी रक्षा चाहता है, कुमार के प्राण नहीं। एक कान दे देने में क्या है? या छिगुनी? उतना तो भी खेल में या मल्ल-युद्ध में भी जा सकता है।”
रानी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
”चूलिक-फा डरपोक है, डर नृशंस होता है। पर तुम कुमार का पता बता कर अपनी मान-रक्षा और पति की प्राण-रक्षा कर सकती हो।”
सागर ने पीछे सुना, ”हुँ:,” और मुड़ कर देखा, उस व्यक्ति के चेहरे पर एक क्रूर कुटिल मुसकान खेल रही है।
सागर ने उद्धत होकर कहा, ”हुँ: क्या?”
वह व्यक्ति तन कर खड़ा हो गया, थोड़ी देर सागर की ओर देखता रहा, मानो सोच रहा हो, इसे क्या वह उत्तर दे? फिर और भी कुटिल ओठों के बीच से बोला, ”मैं चूलिक-फा, डरपोक! अभी जानेगा। पर अभी तो मेरे काम की कह रहा है –”
नगा वीर जयमती के और निकट जाकर धीरे-धीरे कुछ कहने लगा।
चूलिक फा ने भौं सिकोड़ कर कहा क्या फुसफुसा रहा है?
सागर ने आगे झुक कर सुन लिया।
”जयमती, कुमार तो अपने मित्र नगा सरदार के पास सुरक्षित है। चूलिक तो उसे तो उसे पकड़ ही नहीं सकता, तुम पता बता कर अपनी रक्षा क्यों न करो? देखो, तुम्हारी कोमल देह –”

आवेश में सागर खड़ा हो गया, क्योंकि उस कोमल देह में एक बिजली-सी दौड़ गई और उसने तन कर, सहसा नगा वीर की ओर उन्मुख होकर कहा, ”कायर, नपुंसक तुम नगा कैसे हुए? कुमार तो अमर है, कीड़ा चूलिक-फा उन्हें कैसे छुएगा? मगर क्या लोग कहेंगे, कुमार की रानी जयमती ने देह की यन्त्रणा से घबड़ा कर उसका पता बता दिया? हट जाओ, अपना कलंकी मुँह मेरे सामने से दूर करो – ”

जनता में तीव्र सिहरन दौड़ गई। नरसल बड़ी जोर से काँप गए; गँदले पानी में एक हलचल उठी जिसके लहराते गोल वृत्त फैले कि फैलते ही गए; हवा फँुककार उठी, बड़े जोर की गड़गड़ाहट हुई। मेघ और काले हो गए — यह निरी रात है कि महानिशा, कि यन्त्रणा की रात — सातवीं रात, कि नवीं रात? और जयमती क्या अब बोल भी सकती है, क्या यह उसके दृढ़ संकल्प का मौन है, कि अशक्तता का? और यह वही भीड़ है कि नयी भीड़, वही नगा वीर, कि दूसरा कोई, कि भीड़ में कई नगे बिखरे है

चूलिक-फा ने कटु स्वर में कहा, ”फिर आया वह नंगा?”
नगा वीर ने पुकार कर कहा, ”जयमती – रानी जयमती – ”
रानी हिली-डुली नहीं।
वीर फिर बोला, ”रानी – मैं उसी नगा सरदार का दूत हूँ, जिसके यहाँ कुमार ने शरण ली है। मेरी बात सुनो।”
रानी का शरीर काँप गया। वह एक टक आँखों से उसे देखने लगी, कुछ बोली नहीं। सकी नहीं।
”तुम कुमार का पता दे दो। सरदार उसकी रक्षा करेंगे। वह सुरक्षित है।”
रानी की आँखों में कुछ घना हो आया। बड़े कष्ट से उसने कहा, ”नीच – ”एक बार उसने ओठों पर जीभ फेरी, कुछ और बोलना चाहा, पर सकी नहीं।
चूलिक-फा ने वहीं से आदेश दिया, ”पानी दो इसे — बोलने दो – ”

किसी ने रानी के ओठों की ओर पानी बढ़ाया। वह थोड़ी देर मिट्टी के कसोरे की ओर वितृष्ण दृष्टि से देखती रही, फिर उसने आँख भर कर नगा युवक की ओर देखा, फिर एक घूँट पी लिया। तभी चूलिक-फा ने कहा, ”बस, एक-एक घूँट, अधिक नहीं – ”
रानी ने एक बार दृष्टि चारों ओर लाख-लाख जनता की ओर दौड़ाई। फिर आँखें नगा युवक पर गड़ा कर बोली, ”कुमार सुरक्षित है। और कुमार की यह लाख-लाख प्रजा — जो उनके लिए आँखें बिछाये है — एक नेता के लिए, जिसके पीछे चल कर आततायी का राज्य उलट दे — जो एक आदर्श माँगती है — मैं उसकी आशा तोड़ दूँ — उसे हरा दूँ — कुमार को हरा दूँ?”
वह लक्षण भर चुप हुई। चूलिक-फा ने एक बार आँख दौड़ा कर सारी भीड़ को देख लिया। उसकी आँख कहीं टिकी नहीं मानो उस भीड़ में उसे टिकने लायक कुछ नहीं मिला, जैसे रेंगते कीड़ों पर दीठ नहीं जमती।

नगा ने कहा, ”प्रजा तो राजा चूलिक-फा की है न?”
रानी ने फिर उसे स्थिर दृष्टि से देखा। फिर धीरे-धीरे कहा, ”चूलिक-” और फिर कुछ ऐसे भाव से अधूरा छोड़ दिया कि उसके उच्चारण से मुँह दूषित हो जाएगा। फिर कहा, ”यह प्रजा कुमार की है — जा कर नगा सरदार से कहना कि कुमार — वह फिर रुक गई। पर तू — तू नगा नहीं, तू तो उस — उस गिद्ध की प्रजा है — जा उसके गन्दे पंजे को चाट –

रानी की आँखें चूलिक-फा की ओर मुड़ी पर उसकी दीठ ने उसे छुआ नहीं, जैसे किसी गिलगिली चीज की और आँखें चढ़ाने में भी घिन आती है नगा ने मुसकरा कर कहा, ”कहाँ है मेरा राजा – ” चूलिक-फा ने वहीं से पुकार कर कहा, ”मैं यह हूँ — अहोम राज्य का एकछत्र शासक – ” नगा युवक सहसा उसके पास चला आया।

सागर ने देखा, भीड़ का रंग बदल गया है। वैसा ही अन्धकार, वैसा ही अथाह प्रसार, पर उसमें जैसे कहीं व्यवस्था, भीड़ में जगह-जगह नगा दर्शक बिखरे, पर बिखरेपन में भी एक माप नगा ने पास से कहा, ”मेरे राजा – ”

एकाएक बड़े जोर की गड़गड़ाहट हुई। सागर खड़ा हो गया उसने आँखें फाड़ कर देखा, नगा युवक सहसा बर्छी के सहारे कई-एक सीढ़ियाँ फाँद कर चूलिक-फा के पास पहुँच गया है, बर्छी सीढ़ी की इँटों की दरार में फँसी रह गई है, पर नगा चूलिक-फा को धक्के से गिरा कर उसकी छाती पर चढ़ गया है; उधर जनता में एक बिजली कड़क गई है, ”कुमार की जय – ”किसीने फाँद कर मंच पर चढ़ कर कोड़ा लिए जल्लादों को गिरा दिया है, किसीने अपना-अंग-वस्त्र जयमती पर डाला है और कोई उसके बन्धन की रस्सी टटोल रहा है।

पर चूलिक-फा और नगा सागर मन्त्र-मुग्ध-सा खड़ा था; उसकी दीठ चूलिक-फा पर जमी थी सहसा उसने देखा, नगा तो निहत्था है, पर नीचे पड़े चूलिक-फा के हाथ में एक चन्द्रकार डाओ है जो वह नगा के कान के पीछे साध रहा है — नगा को ध्यान नहीं है; मगर चूलिक-फा की आँखों में पहचान है कि नगा और कोई नहीं, स्वयं कुमार है; और वह डाओ साध रहा है कुमार छाती पर है, पर मर जाएगा या क्षत भी हो गया तो चूलिक-फा ही मर गया तो भी अगर कुमार क्षत हो गया तो — सागर उछला। वह चूलिक-फा का हाथ पकड़ लेगा — डाओ छीन लेगा।

पर वह असावधानी से उछला था, उसका कीचड़-सना बूट सीढ़ी पर फिसल गया और वह लुढ़कता-पुढ़कता नीचे जा गिरा।
अब? चूलिक-फा का हाथ सध गया है, डाओ पर उसकी पकड़ कड़ी हो गई है, अब —

लेफ्टिनेन्ट सागर ने वहीं पड़े-पड़े कमर से रिवाल्वर खींचा और शिस्त लेकर दाग दिया धाँय –
धुआँ हो गया। हटेगा तो दीखेगा – पर धुआँ हटता क्यों नहीं? आग लग गई — रंग-महल जल रहा है, लपटें इधर-उधर दौड़ रही है। क्या चूलिक-फा जल गया? — और कुमार — क्या यह कुमार की जयध्वनि है? कि जयमती की यह अद्भुत, रोमांचकारी गँूज, जिसमें मानो वह डूबा जा रहा है, डूबा जा रहा है — नहीं, उसे सँभलना होगा।

लेफ्टिनेन्ट सागर सहसा जाग कर उठ बैठा। एक बार हक्का-बक्का होकर चारों ओर देखा, फिर उसकी बिखरी चेतना केन्द्रित हो गई। दूर से दो ट्रकों की दो जोड़ी बत्तियाँ पूरे प्रकाश से जगमगा रही थीं, और एक से सर्च-लाइट इधर-उधर भटकती हुई रंग-महल की सीढ़ियों को क्षण-क्षण ऐसे चमका देती थी मानो बादलों से पृथ्वी तक किसी वज्रदेवता के उतारने का मार्ग खुल जाता है। दोनों ट्रकों के हार्न पूरे जोर से बजाये जा रहे थे।

बौछार से भीगा हुआ बदन झाड़ कर लेफ्टिनेन्ट सागर उठ खड़ा हुआ। क्या वह रंग-महल की सीढ़ियों पर सो गया था? एक बार आँखें दौड़ा कर उसने मेहराब को देखा, चाँद निकल आया था, मेहराब की इँटें दीख रही थीं। फिर धीरे-धीरे उतरने लगा।
नीचे से आवाज आई, ”सा’ब, दूसरा गाड़ी आ गया, टो कर के ले जाएगा – ”

सागर ने मुँह उठा कर सामने देखा, और देखता रह गया। दूर चौरस ताल चमक रहा था, जिसके किनारे पर मन्दिर भागते बादलों के बीच में काँपता हुआ, मानो शुभ्र चाँदनी से ढका हुआ हिंडोला — क्या एक रानी के अभिमान का प्रतीक, जिसने राजा को बचाया, या एक नारी के साहस का, जिसने पुरूष का पथ-प्रदर्शन किया; या कि मानव मात्र की अदम्य स्वातंत्र प्रेरणा का अभीत, अज्ञेय, जय-दोल?

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

कृष्णवट : सुशोभित सक्तावत

Related image

“गीता” में श्रीकृष्ण ने स्वयं को “अश्वत्थ वृक्ष” कहा है। “समस्त वृक्षों में मैं “अश्वत्थ” हूं।” “अश्वत्थ” यानी पीपल का पेड़।

किंतु श्रीकृष्ण केवल अश्वत्थ ही नहीं हैं, वे स्वयं में एक “महावन” हैं!

ब्रज में एक नहीं दो नहीं सोलह वन हैं!

और वनखंडियां तो अगणित!

मैं उसी ब्रज की भूमि में “वंशीवट” की तरह स्वयं को रोप देना चाहता हूं!

इन सोलह वनों में सबसे कृष्णमय है “वृन्दावन”। “वृन्दा” यानी तुलसी। “वृन्दावन” यानी तुलसी का वन।

यह वही तुलसी हैं, जो “शालिग्राम” से ब्याही हैं। “कौस्तुभ” मणि के मुकुट वाले शालिग्राम। यह भी स्मरण रहे कि “राधारानी” के सोलह नामों में से एक “वृन्दा” भी है। उसी “वृन्दा” का वह वन है, ब्रज का “आनंदघन”!

“वृन्दावनधाम” के “रमणरेती” में जो “बांकेबिहारी” का विग्रह है, उसकी “त्र‍िभंग” छवि को मैं नतशिर होकर निहारना चाहता हूं!

ब्रज में ही “मधुवन” है, जहां श्रीकृष्ण “राधिके! ललिते! विशाखे!” की टेर लगाते थे।

उनकी वह टेर “भांडीरवन” तक गूंजती थी। “निधिवन” में जहां “ललिता सखी” के आराधक हरिदासजी की पर्णकुटी थी, वहां तक भी। सुखमा, कामा, कुमुदा, प्रमदा गोपियां जहां श्रीकृष्ण निकुंज लीलाओं की साक्षी थीं, उस “महावन” तक भी। “भद्रवन” से “तालवन” तक वृक्षों की पंक्त‍ियां श्रीकृष्ण की उस डाक में डूबी रहतीं!

“राधिके! ललिते! विशाखे!”

ब्रज में सोलह वन और तीन वट हैं : “कृष्णवट”, “वंशीवट”, “श्रीदामवट”।

“श्रीहितहरिवंश” के चौरासी पदों में जिन “त्रिवटों” का वर्णन है, मैं प्रलय तक उन्हीं “न्यग्रोधवृक्ष” का करना चाहता हूं अनुगायन!

और ब्रज में “कदम्ब” है।

श्रीकृष्णरूप से उज्जवल सभी वृक्ष एक तरफ़ और “कदम्ब” का पेड़ दूसरी तरफ़।

श्रीरूपगोस्वामी के “विदग्धमाधव” का यदुनन्दन दास ठाकुर ने पद्यानुवाद किया तो उसका नाम रखा :

“राधाकृष्णलीलारसकदम्ब”!

यूं ही कदम्ब को “सुरद्रुम” नहीं कहा है। “सुरद्रुम” यानी “देवतरु”। देवताओं का वृक्ष!

ब्रज में ही “कुमुदवन” भी है, जिसमें कदम्बों के पूरे के पूरे कुंज : “कदम्बखंडियां।”

मुझे ऐसी ही किसी “कदम्बखंडी” में चैत्र का समीरण बनकर तैरना है!

“कदम्ब” भी तीन होते हैं : “राजकदम्ब”, “धूलिकदम्ब” और “कदम्ब‍िका”।

यह वृक्ष श्रीकृष्णलीलास्वरूप का प्रतीक बन गया है। यहां तक कि “महानिर्वाणतंत्र” में भी ललिता सखी को “कदम्बवनसंचारा” और “कदम्बवनवासिनी” कहकर इंगित किया गया है।

“भागवत” और “पद्मपुराण” ने कदम्ब को श्रीकृष्णलीला का अविच्छेद्य रूप माना है। और कौन जाने, महाकवि बाणभट्ट ने अपनी नायिका को जब “कदम्ब” के नाम पर “कादम्बरी” कहकर पुकारा था तो उनके मन में कौन-सी लीला रही होगी!

श्रीकृष्ण भले ही स्वयं को “अश्वत्थ” वृक्ष कहें, मथुराजी के जनवृन्द भले ही बरगदों को “कृष्णवट” की संज्ञा से अभिहित करें, मैं तो श्रीकृष्ण को “कदम्ब” का पेड़ कहकर ही पुकारूंगा।

श्रीटीकारीरानी की “ठाकुरबाड़ी” का नतग्रीव कदम्ब!

मैं उसी कदम्ब का उपासक बनना चाहता हूं, “शतभिषा” नक्षत्र का जातक जो ठहरा!

“जौ खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन” — इस देवतरु की संज्ञा में ही वह भाव है, जो मुझे बना देता है रसखान!

“महाभारत” में अनेक वृक्षों का वर्णन है, जिनकी पहचान अब खो रही। जैसे “अरिष्ट”, “मेषश्रंग”, “प्लक्ष” वृक्ष और “श्लेषमातकी”। केवल गूलर, कुटज, बिल्व, करील को पहचान पाता हूं। और पहचानता हूं वृन्दा को, कदम्ब को, मलयज को।

मैं “श्रीकृष्णविग्रह” के ललाट पर लिपा “गोपी-चन्दन” का वृत्त बनना चाहता हूं, ब्रज के मलयजवन का गंधवाह चन्दन!

एक ऐसा भी वृक्ष है, जिसे स्वयं एक “वन” कहकर पुकारा गया है। वह है “छितवन”। “सप्तपर्ण” वृक्ष।

सागौन नहीं, शीशम नहीं, मैं “छितवन” की छांह में देखना चाहता हूं स्वप्न, यदि श्रीकृष्ण स्वयं को कहकर पुकारें “सप्तपर्ण”। मैं उस सप्तपर्ण की छाल बनना चाहता हूं!

वृक्षों की वंदना देवताओं की तरह बहुत कर ली, अब मैं देवताओं की उपासना वृक्षों की भांति करना चाहता हूं!

मैं “श्रीकृष्णस्वरूप” को “व्यक्ति” नहीं, “विग्रह” नहीं, एक “वृक्ष” की तरह देखना चाहता हूं।

कल्पद्रुम-सा “कृष्णवट”!

Sushobhit Saktawat's profile photo

Sushobhit Singh Saktawat

 

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

दुष्यंत कुमार की स्मृति में : साधारण जन-जीवन की असाधारण शायरी

Image result for dushyant kumar

आज दुष्यंत कुमार की जयंती है, लेकिन उनकी गजलों की दिलचस्प दुनिया की तरह उनकी जन्म तिथि और उसे लेकर खुद उनकी प्रतिक्रिया बड़ी मजेदार थी. हकीकत में, दुष्यंत कुमार का जन्म 27 सितंबर 1931 को बिजनौर जिले के एक गांव राजपुर नवादा में हुआ था. किन्हीं कारणों से सरकारी अभिलेखों में उनकी जन्म तिथि 1 सितंबर 1933 दर्ज करा दी गई. दुष्यंत कुमार की रचनावली के संपादक विजय बहादुर सिंह ने रचनावाली के पहले खंड में इस वाकये को दर्ज किया है. दुष्यंत कुमार इस बात को यार दोस्तों के बीच बड़े ही मजेदार लहजे में बयां करते थे. कहते कि ” महीने की 27 वीं तारीख तक तो जेब खाली हो जाती है. इसलिए जन्म दिन की खुशियां तो पहली तारीख को मिले हुए वेतन पर ही मनाई जा सकती हैं.”

भले ही दुष्यंत कुमार यह बात मजाक के लहजे में कहते रहे हों, दुष्यंत की गजलों और कविताओं में भारतीय समाज की अभाव-वेदना और दुर्बल वर्गों की निरुपायता के इतने ‘मंजर’ भरे पड़े हैं कि लगता है कि खुद दुष्यंत कुमार ने अपने दौर को उन्हीं की नजरों से जिया था. यही कारण है कि सरल हिंदी में कलमबद्ध उनकी गजलें हर उस व्यक्ति और समूह के लिए नारों में तब्दील हो गईं जो परिवर्तनकामी था. अपने परिवेश की बुनियाद को हिलाने की आरजू लिए था.

 कैसे मंजर सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

ये कौन लोग थे जो दुष्यंत कुमार की गजलों में ‘गाते गाते’ चिल्लाने लगे थे? उनके गजल संग्रह ‘साये में धूप’ ने हिंदी की गजलकारी में एक ऐसी लकीर खींच दी कि गजल की विधा को लेकर पूरा साहित्य दुष्यंत-पूर्व और दुष्यंत के बाद के खांचे में खुद ब खुद ढल गया. इसका कारण उनकी गजलों की कोई सचेत काव्यगत नक्काशी नहीं थी. वह बड़े सरल शब्दों से कुछ ऐसा कह जाते कि उनकी जुबान एक आम आदमी की व्यथा-वाहक बन जाती. एक भरे पूरे कटाक्ष के साथ, उनकी गजलों का आदमी यकायक सामर्थ्यवान हो उठता है और सीधे-सीधे उन सत्ताओं से सवाल करने लगता है जिन्होंने उनसे यह वादा किया था कि ‘कहां तो तय था चिरांगा हरेक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए’. वह उस ‘आवाज’ में ‘असर’ के लिए बेकरार थे जिसे लेकर दूसरे मुतमइन थे कि पत्थर का पिघलना मुमकिन नहीं था.

दुष्यंत के गीत-गजलें दरअसल ‘पत्थर’ को पिघलाने की इसी बेकरारी की बजह से कालजयी रचनाओं में परिणित हो गईं. समाज में मानवीय परिवर्तन की कामना करने वाले हर शख्श के लिए जरूरी हो गईं .’साये में धूप’ संग्रह की पहली ही गजल में एक कटाक्ष है –

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहितयात जरूरी है इस बहर के लिए

तो उसी गजल में एक और शेर उन ‘लोगों’ की हालत-बयानी है जो वश-बेवश इस सफर के लिए मुनासिब मान लिए गए हैं. कटाक्ष और करुणा का यह अपूर्व संगम दुष्यंत कुमार की गजलों में हर ओर बिखरा हुआ है.

न हो कमीज़ तो पांवों से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफर के लिए.

सामान्यतः दुष्यंत कुमार को उनकी गजलों के परिप्रेक्ष्य में ही याद किया जाता है. यह सही भी है. हिंदी में गजल को उन्होंने जिस स्थान पर पहुंचाया वहां पहुंचकर यह धारणा खंडित हो गई कि हिंदी एक भाषा के तौर पर गजल के परंपरा-मान्य कोमल भावों को वहन नहीं कर सकती. लेकिन दुष्यंत का कवि-रूप भी कमतर नहीं ठहरता. उनके गीतों में पैठा हुआ अकुंठ और निर्मल ऐंद्रिक बोध उनके गीतों और कविताओं में हर ओर मिल जाता है. उनकी रचनावली के संपादक विजय बहादुर सिंह ने उनके काव्य संग्रह ‘सूर्य का स्वागत’ की एक कविता को उद्घृत करते हुए लिखा है कि ‘सूर्य का स्वागत की इन्हीं कविताओं ने एक समानांतर नया वातावरण रचा, जिसमें जीवन के अभावों और मुश्किलों से मुंह छिपाने या अकेले में बैठ रोने के बदले हकीकतों का सामना करने का अनूठा दम-खम और अंदाज़ था. यह एक प्रकार से कुंठा की विदाई का प्रस्थान-गीत था-

प्रसव-काल है !
सघन वेदना !
मन की चट्टानो कुछ खिसको
राह बना लूं,

….ओ स्वर-निर्झर बहो कि तुम में
गर्भवती अपनी कुंठा का कर्ण बहा लूं,
मुझको इससे मोह नहीं है
इसे विदा दूं !’

दुष्यंत कुमार की मूल्य-चेतना के निर्माण में उनकी ‘तटस्थ- दया’ से घृणा का बड़ा हाथ था. वह ऐसे लोगों पर बरसते थे जो आहतों के लिए ‘आह बेचारे’ कहकर आगे बढ़ जाते थे. वह इस सुविधावादी मध्यमवर्गीय संवेदना के धुर आलोचक थे. ‘आवाजों के घेरे’ संग्रह की एक कविता में वह इस स्कूल के विचारकों की खबर लेते हैं-

‘इस समर को दूर से देखने वालो,
यह सरल है
आहतों पर दया दिखलाओ
‘आह बेचारे!’ कहो..

किन्तु जो सैनिक पराहत
भूमि पर लुंठित पड़े हैं
तुम्हारा साहित्य उन तक जाता
यह तटस्थ दया तुम्हारी
और संवेदना उनको बींधती है .

इस समर को दूर से देखने वालो
ये उदास उदास आंखें मांगती हैं
दया मत दो
इन्हें उत्तर दो’
(प्रश्न-दृष्टियाँ: आवाजों के घेरे)

दुष्यंत कुमार की इसी जीवन-दृष्टि का परिणाम थीं उनकी गजलें और उनकी कविताएं. बेलौस और बिना लाग-लपेट.. सच बोल देने का बेखौफ अंदाज.

“मैं हूं… मैं दुष्यंत कुमार
मेरी कार अगर देशी शराब की दुकान पर खड़ी है
तो मेरी जेब को चरित्र की कसौटी पर मत कसो
अगर हंसना जरूरी है तो
मेरी रुचि पर नहीं, मेरी मजबूरी पर हंसो
धन्यवाद और साभार की मुद्रा में
खड़े हुए लोगो !
मैं तुम पर नहीं
अपने जूतों पर नजर डालता हुआ चल रहा हूं
यह सोचता हुआ कि हद हो गई है
कि वह मुकाम भी जहां मैं उंगली रख सकता था
होठों से छूने पड़े.”

अपने ‘जूतों पर नज़र डालकर ‘चलते चलते भी उनकी नजरों से कोई नहीं बचा. न सजदे में जिस्म झुकाए, बोझ से दुहरा हुआ इंसान और न वो शरीफ लोग जो ‘लहूलुहान नजारों’ का ‘जिक्र आने पे उठे, दूर जाके बैठ गए.’ न वो गड़रिये जिनके लिए उन्होंने ‘जलते हुए वन के वसंत ‘ में कहा था कि ‘गड़रिए कितने सुखी हैं! स्वेच्छा से जिधर चाहते हैं ,उधर भेड़ों को हांके लिए जाते हैं.’ उनकी नज़र से कोई नहीं बचा, न गूंगे बहरे लोग और न ऐसे लोगों से बसे हुए शहर जहां  बारात और  वारदात दोनों ने प्रतिक्रिया का एक सा स्तर पा लिया है..

‘इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

दुष्यंत कुमार की गजलों और कविताओं में ‘जनता’ के लिए एक डर है. एक जायज डर जो हर लोकप्रेमी सृजनकार के हृदय में रहकर उसे बेचैन रखता है. उनकी यह चिंता उनकी मानवता में अपार आस्था से निसृत होती है. वह लोगों को बांसों की तरह इस्तेमाल होते हुए नहीं देखना चाहते थे. उनकी कविता आदमी को इस्तेमाल किए जाने के विरोध में सृजित होती है; वह साधारण आदमी जिसने

‘बाजार से रसोई तक
जरा सी चढ़ाई पार करने में
आयु को खपा दिया.
रोज बीस कदम रखे
एक पग बढ़ा
मेरे आस पास शाम ढल आई!
मेरी सांस फूलने लगी
मुझे उस भविष्य तक पहुंचने से पहले ही
रुकना पड़ा.
लगा, मुझे केवल आदर्शों ने मारा
सिर्फ सत्य ने छला
मुझे पता नहीं चला.’

(जलते हुए वन का वसंत)

बाजार से रसोई के बीच दौड़ते हुए साधारण जन के लिए रचे गए काव्य ने दुष्यंत कुमार को अमर कर दिया है. उनकी गजलें इसी साधारण जन-जीवन की असाधारण शायरी है. उनकी शायरी में यह साधारण मनुष्य ही उनका नायक है. यही साधारण मनुष्य उनके काव्य का प्रतिमान है.

धर्मेंद्र सिंह भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं…

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति लिटरेचर इन इंडिया समूह उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार लिटरेचर इन इंडिया समूह के नहीं हैं, तथा लिटरेचर इन इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

धर्मेंद्र सिंह

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

क्या बच्चों का सही तरीके से इलाज नहीं होता है? : रवीश कुमार

Image result for gorakhpur tragedy

गोरखपुर के बीआरडी अस्तपाल में बच्चों के मरने की घटना से एक बात साबित हो गई. 12 अगस्त को 48 घंटे में 30 बच्चों की मौत के बाद हम सबने ख़ूब बहस की, चर्चा की, मुख्यमंत्री से लेकर सरकार को घेरा, फिर चुटकुले बनाए और उसके बाद सब नॉर्मल हो गया. सिस्टम भी समझ गया कि ये लोग पहले गुस्सा करेंगे फिर चुटकुला बनाकर नॉर्मल हो जाएंगे. आजकल हम और आप सिस्टम के बदलने पर नॉर्मल नहीं होते, बल्कि सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने के बाद नॉर्मल हो जाते हैं. नॉर्मल हो गए तभी तो गोरखपुर के उसी अस्पताल से बच्चों के मरने की खबर आ रही है, अब तो कई और अस्पतालों से ऐसी खबरें आने लगी हैं. एक असर अच्छा हुआ है कि कुछ दिन के लिए ही सही अखबारों के पत्रकारों ने अस्पतालों में बच्चों की मौत पर ध्यान देना शुरू किया है. थोड़े दिन में वे भी नार्मल हो जाएंगे क्योंकि बदलेगा तो कुछ भी नहीं.

राजस्थान के बांसवाड़ा में 90 बच्चों की मौत
राजस्थान के बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में जुलाई-अगस्त के महीने में 90 बच्चों की मौत हो गई है. इनमें से 43 की दम घुटने से मौत हुई है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने ज़िला कलेक्टर को जांच के आदेश दिए हैं. जुलाई महीने में 50 बच्चों की मौत हुई है. अगस्त में 40 बच्चों की मौत हुई है. बच्चों की मौत sick newborn care unit में हुई है, ये एक तरह का बच्चों का आईसीयू होता है. अप्रैल में भी 20 और मई में 18 बच्चों की मौत हो गई है. कितनी आसानी से मैं भी संख्या गिन रहा हूं जैसे दो का पहाड़ा हो. जिनके घरों में मौत हुई होगी, कितनी उदासी होगी. उन्हें क्या ऐसा भी लगता होगा कि सिस्टम ने उन्हें फेल किया. उनके बच्चों की जान बच सकती थी. इन बच्चों और इनकी माओं में कुपोषण कारण बताया गया है. राजस्थान के जनजातीय महिलाओं के लिए पुकार कार्यक्रम चलता है. दावा किया जाता है कि इसके तहत बहुत से बच्चों की जान बचाई भी गई है.

जमशेदपुर में तीन महीने में 164 बच्चों ने गंवाई जान

जमशेदपुर के कोल्हान झेत्र में एक अस्पताल है महात्मा गांधी मेमोरियल अस्पताल में मई जून जुलाई अगस्त में 164 बच्चों की मौत हुई है. अस्पताल की रिपोर्ट कहती है कि जून महीने में 60 बच्चों की मौत हो गई थी. जांच तो मई और जून में हुई मौत के बाद ही होनी चाहिए थी, लेकिन जब खबर आई की 30 दिनों में 64 की मौत हुई है तो हड़कंप मच गया. जांच के लिए चार सदस्यों की कमेटी भी बन गई. हमें बताया गया कि कुपोषण के कारण ज्यादातर बच्चों की मौत हो रही है. ये सभी ग्रामीण क्षेत्र के हैं.

रांची के रिम्स में भी 133 बच्चों की मौत

यही नहीं रांची के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में भी 28 दिन के भीतर 133 बच्चे मर गए. एक अखबार ने लिखा है कि आठ महीने में 739 बच्चों की मौत हो गई है. मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार से छह हफ्तों के भीतर जवाब देने के लिए कहा है. अखबार में छपे बयानों में रिम्स के निदेशक ने कहा है कि हम 88 प्रतिशत बच्चों को बचा लेते हैं. 13 प्रतिशत बच्चों की मौत हो जाती है. क्या यह सामान्य आंकड़ा है. राज्य के मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन जांच नाम की सक्रियता कहीं गोरखपुर की घटना के बाद तो नहीं बढ़ी है. अस्पताल के निदेशक ने कहा है कि ज़्यादातर बच्चे बिना ऑक्सीजन और बिना किसी नर्सिंग के लाए जाते हैं, इसलिए भी दम तोड़ देते हैं. यह तो और पोल खुल गई हमारे सिस्टम की.

पैमाने पर फेल नजर आएंगे राज्य

सवाल है कि क्या हम भी सरकार से स्वास्थ्य को लेकर सवाल करते हैं और क्या सरकार आपके सामने इस बारे में कोई दावे करती है. अगर आप ठीक से खरोंच कर देखेंगे तो देश के तमाम राज्य इस पैमाने पर फेल नज़र आएंगे. इसलिए सरकार बनाम सरकार का खेल खेलने से कोई लाभ नहीं होने वाला है. गोरखपुर को लेकर जब हंगामा शांत हो गया तब हमारे सहयोगी कमाल ख़ान ने एक और रिपोर्ट की. यह बात बिल्कुल सही है कि तीस सालों से गोरखपुर में एक्सिफ्लाइटिस की समस्या है. टीकाकरण की योजना है मगर इसके बाद भी इस बीमारी से होने वाली मौत कम नहीं की जा सकी है.

बच्चों के वार्ड में गूंजती है दर्दनाक चीख

ये कमाल खान के ही शब्द हैं कि बच्चों के वार्ड में हर थोड़ी देर बाद किसी मां की दर्दनाक चीख गूंजती है, जो वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर देती है. एक मां वो रोती है जिसके बच्चे की मौत हो गई है और बाकी माएं इस अंदेशे से चीखती हैं कि कहीं उनका बच्चा भी न मर जाए. मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल कहते हैं कि बच्चे गंभीर हालत में आते हैं इसलिए मर जाते हैं. मरने वाले बच्चों को सिर्फ एन्सिफ्लाइटिस नहीं होती है और भी बीमारियां होती हैं. अकेले इस मेडिकल कालेज में इस साल 1346 बच्चों की मौत हो गई है. एक महीने में तो 386 बच्चे मर गए. अस्पताल के प्रिसिंपल का कहना है कि सभी ज़िम्मेदारी के साथ ड्‌यूटी कर रहे हैं. इस समय मरीज़ों की संख्या भी बहुत है.

2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत हुई 

हमने स्वास्थ्य सेवाओं पर सीएजी की रिपोर्ट का प्राइम टाइम में कई बार ज़िक्र किया है. एक बार और सही. गांवों में स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत हुई थी, ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. आपको जान कर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि सरकारों को भी यह जानकर कोई फर्क नहीं पड़ा कि 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में खर्च न होने वाली राशि 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. 6 राज्य ऐसे हैं जहां 36.31 करोड़ की राशि किसी और योजना में लगा दी गई. जब से बच्चों की मौत की रिपोर्टिंग बढ़ी है सरकार अपनी तैयारी नहीं बताती है. जांच कमेटी बन जाती है दो चार तबादले और निलंबन से हम लोग खुश हो जाते हैं. हम जानना चाहेंगे कि किस तरह से फंड में कमी की गई, उसका क्या असर पड़ा.

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

बाढ़ से निपटना तो हमें सीखना ही होगा

Image result for bihar me badh

पूरब में असम, पश्चिम में गुजरात और दक्षिण में कर्नाटक तक बाढ़ का प्रकोप जारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से वर्षा की कुल मात्रा पूर्ववत रहेगी पर बारिश के पैटर्न में बदलाव आएगा। गर्म हवा में पानी धारण करने की शक्ति अधिक होती है। गर्म बादल बरसते है तो ताबड़तोड़ ज्यादा पानी गिरता है, लेकिन फिर सूखा पड़ जाता है। जैसे 120 दिन के मॉनसून में तीन दिन भारी वर्षा हो और शेष 117 दिन सूखा रहे। वर्षा के पैटर्न में इस बदलाव का हमारी खेती पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

धान की फसल को लगातार 120 दिन पानी की जरूरत होती है। उतना ही पानी तीन दिन में बरस जाए तो फसल मारी जाएगी। वर्षा के पैटर्न में बदलाव का दूसरा प्रभाव बाढ़ पर पड़ेगा। पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमिगत ऐक्वीफरों (भूजल भंडार) में समा जाता है जैसे वर्षा का आधा पानी ऐक्वीफर में रिस गया और आधा नालों-नदियों में बहा। ताबड़तोड़ बरसने पर वह ऐक्वीफरों में नहीं रिस पाता है। पूरा पानी नालों और नदियों की ओर बहने लगता है जिससे बाढ़ आ जाती है।

सरकारी रणनीति

इस कठिन परिस्थिति का सामना करने की सरकारी रणनीति यही है कि भाखड़ा और टिहरी जैसे नए बांध बनाए जाएं, जैसे कि लखवार व्यासी तथा पंचेश्वर में प्रस्तावित हैं। पहाड़ में होने वाली वर्षा के पानी को इन डैमों में जमा कर लिया जाए। वर्षा धीरे-धीरे हो या ताबड़तोड़, इससे डैम की भंडारण क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

बाद में इस पानी का उपयोग खेती के लिए किया जा सकता है। साथ-साथ बाढ़ वाली नदियों के दोनों तटों पर तटबंध बना दिए जाएं जिससे नदी का पानी नहर की तरह अपने रास्ते चले और बाढ़ का रूप न ले। इस नीति का फेल होना तय है क्योंकि डैम में केवल पहाड़ी वर्षा का पानी रोका जा सकता है। मैदानों की ताबड़तोड़ वर्षा का पानी तो बह ही जाएगा। गंगा के कैचमेंट में पहाड़ी हिस्सा 239 हजार वर्ग किलोमीटर का है जबकि मैदानी हिस्सा इससे तीन गुना 852 हजार वर्ग किलोमीटर का है। मैदानी वर्षा के पानी का नुकसान तो होगा ही।

दूसरी समस्या है कि स्टोरेज डैमों की आयु सीमित होती है। टिहरी हाइड्रोपावर कार्पोरेशन द्वारा कराए गए दो अध्ययनों के अनुसार टिहरी झील 140 से 170 वर्षों में पूरी तरह गाद से भर जाएगी। तब इसमें पहाड़ी वर्षा के पानी का भंडारण नहीं हो सकेगा। नदी के दोनों तटों पर बनाए गए तटबंधों में भी गाद की समस्या है। नदी द्वारा तटबंधों के बीच गाद जमा कर दी जाती है। शीघ्र ही नदी का पाट ऊंचा हो जाता है। तब तटबंधों को और ऊंचा किया जाता है। कुछ समय बाद नदी अगल-बगल की जमीन से ऊपर बहने लगती है जैसे मेट्रो ट्रेन का ट्रैक जमीन से ऊपर चलता है। लेकिन तटबंधों को ऊंचा करते रहने की सीमा है। ये टूटेंगे जरूर और तब नदी का पानी झरने जैसा गिरता और फैलता है। बाढ़ और भयावह हो जाती है।

डैमों और तटबंधों से सिंचाई भी प्रभावित होती है। डैम में पानी रोक लेने से बाढ़ कम फैलती है। जब तक तटबंध टूटते नहीं, तब तक ये बाढ़ के पानी को फैलने नहीं देते हैं। बाढ़ के पानी न फैलने से भूमिगत ऐक्वीफरों में पानी नहीं रिसता है और बाद में यह सिंचाई के लिए नहीं उपलब्ध होता। चार-पांच बाढ़ झेल लेने के बाद तटबंधों के टूटने पर पानी का पुनर्भरण अवश्य होता है पर तब तक ऐक्वीफर सूख चुके होते हैं।

सिंचाई में जितनी वृद्धि डैम में पानी के भंडारण से होती है, उससे ज्यादा हानि पानी के कम पुनर्भरण से होती है। अंतिम परिणाम नकारात्मक होता है। लेकिन यह दुष्परिणाम वर्तमान में नहीं दिख रहा है, क्योंकि हम अतीत में संचित भूमिगत जल भंडारों से पानी का अति दोहन कर रहे हैं। जैसे दुकान घाटे में चल रही हो पर पुराने स्टॉक को बेच कर दुकानदार जश्न मना रहा हो, ऐसे ही हमारी सरकार बांध और तटबंध बनाकर जश्न मना रही है।

सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा अन्यथा हम सूखे और बाढ़ की दोहरी मार में डूब जाएंगे। मैदानों में ताबड़तोड़ बरसते पानी का उपयोग भूमिगत ऐक्वीफर के पुनर्भरण के लिए करना होगा। किसानों को प्रोत्साहन देकर खेतों के चारों तरफ ऊंची मेड़ बनानी होगी जिससे वर्षा का पानी खेत में टिके और भूमि में रिसे। साथ-साथ नालों में विशेष प्रकार के ‘रीचार्ज’ कुएं बनाने होंगे जिनसे पानी जमीन में डाला जाता है।

गांवों और शहरों के तालाबों को साफ करना होगा जिससे इनमें पानी इकट्टा हो और भूमि में रिसे। दूसरे, बड़े बांधों को हटाना होगा। इन बांधों की क्षमता सूई की नोक के बराबर है। जैसे टिहरी बांध मे 2.6 अरब घन मीटर पानी का भंडारण करने की क्षमता है। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश के भूमिगत ऐक्वीफरों की क्षमता 76 अरब घन मीटर, यानी लगभग 30 गुना है। टिहरी को हटा दें और बाढ़ को फैलने दें तो टिहरी से ज्यादा पानी भूमिगत ऐक्वीफरों में समा सकता है। यूं भी टिहरी जैसे बांधों की आयु सीमित है। तीसरे, नदियों के किनारे बनाए गए सभी तटबंधों को हटा देना चाहिए।

बदले रहन-सहन

बाढ़ लाना नदी का स्वभाव है। मनुष्य बाढ़ को आत्मसात करे। उसके साथ समायोजन विकसित करे। कुछ वर्ष पहले गोरखपुर में बाढ़ का अध्ययन करने का अवसर मिला था। लोगों ने बताया कि पहले बाढ़ का पानी फैल कर पतली चादर जैसा बहता था। गांव ऊंचे स्थानों पर बसाए जाते थे और सुरक्षित रहते थे। खेतों में धान की ऐसी प्रजातियां लगाई जाती थीं जो बाढ़ में भी अच्छी उपज देती थीं। हमें बाढ़ के साथ जीने की पुरानी कला को अंगीकार करना होगा अन्यथा हम भीषण बाढ़ में डूब जाएंगे और भीषण सूखे में भूखे मरेंगे।

लेखक: भरत झुनझुनवाला।।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें

वक़्त के साथ बदलते बाबाओं के अवतार

Image result for ram rahim

 

आज एक बाबा ने कहर ढा रखा है। रेप के आरोप में दोषी पाए गए हैं और उनके भक्त दो राज्यों में आपातकाल जैसे हालात लाने पर उतारू हैं। 25 से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं और जगह-जगह आगजनी की खबरें सामने आ रही हैं। हर कोई सोच रहा है कि बाबा में ऐसा क्या है जो लोग जान लेने-देने पर उतारू हैं। दरअसल यह बाबा बाकियों से अलग हैं, नाम है बाबा गुरमीत राम रहीम जी इंसां.. हर धर्म से कुछ न कुछ उधार ले लिया है और राम, रहीम से पहले इंसान होने का दावा करते हैं। यह कूल टाइप बाबा हैं, रॉकस्टार हैं और मल्टी-टैलंटेड भी। अब जब रेप के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं तो पंजाब और हरियाणा को जलने के लिए छोड़ दिया है।

समझना जरूरी है कि एक के बाद एक बाबा और उनके अलग-अलग अवतार आते कहां से हैं। दरअसल बाबाओं से पहले संत महात्मा और भगवान का कॉन्सेप्ट आया। भगवान की परिकल्पना ही इसलिए की गई थी जिससे लोगों का जब खुद पर भरोसा टूटने लगे तो किसी तीसरी शक्ति पर भरोसा करके काम पूरा करने की हिम्मत करें। पहले यह शक्ति तकलीफ के वक़्त याद की जाती थी, फिर इसका नाम लेकर डराया जाने लगा। बात तो तब बिगड़ी जब भगवान को धरती पर उतारने का दावा करके अलग-अलग तरह के सेंटर खोल दिए गए। यहां लोगों को तकलीफ के वक़्त खुशी मिलने उम्मीद में और तकलीफ न होने पर डराकर बुलाया जाने लगा।

अगला कदम भगवान के सेंटरों में काम करने वालों ने उठाया और भगवान से सीधा कनेक्शन होने का दावा करने लगे। जिन लोगों का अट्रैक्शन पहले भगवान और फिर उनके सेंटरों तक ही था, अब भगवान के दूतों से अट्रैक्ट होने लगे। ये दूत संत और बाबा बनकर लोगों की मदद करने लगे। कुछ सच में दूसरों की मदद करना चाहते थे और कुछ अपनी। रोज़ सैकड़ों लोग उनके सामने सिर झुकाने लगे और उन्हें लगने लगा कि वह खुद ही भगवान हैं। भक्तों को भी इस बात पर यकीन करने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

पहले ऋषि, महात्मा और सन्यासी होते थे जो सब कुछ छोड़कर सत्य की तलाश में जंगल और पर्वतों पर निकल जाते थे। वह हमेशा सत्य और ईश्वर की तलाश में लगे रहे लेकिन उतना सुख-शांति न पा सके, जितना नए जमाने के बाबाओं को बिना जंगल गए ही मिल गया। जंगल जाने में कोई फायदा नहीं मिलता इसलिए अब बाबा जंगल और पर्वतों के बजाय लोगों के बीच में रहने लगे हैं। लोगों की डिमांड और अपनी जरूरतों के हिसाब से बाबा ने अपना नाम रखना, मेकअप करना और प्रसाद देना शुरू कर दिया है। अब नए अवतार हैं राधे मां, गोल्डन बाबा, निर्मल बाबा, बिजनस बाबा, फ्रॉड बाबा और राम रहीम सिंह इंसां…

यह बाबा भगवान की नहीं अपनी भक्ति करवाते हैं। ये बाबाओं के अपडेटेड और लेटेस्ट वर्जन हैं। मॉल में शॉपिंग करने वालों और फाइव स्टार होटल में रहने वालों को पेड़ के नीचे या फूस की झोपड़ी में बैठे बाबा रास नहीं आने इसलिए नए बाबा आसमान से उड़कर या लाइट्स से सजे रंगबिरंगे स्टेज से निकलकर आते हैं। प्रसाद बताशों का नहीं, चॉकलेट और पेस्ट्री का होता है। भक्तों की अपने भगवान से बात करने की चाह ये बाबा पूरी कर रहे हैं। भक्त अपने नए भगवान के साथ अठखेलियां कर सकते हैं, उनके हाथ से प्रसाद खा सकते हैं। चंद दान-दक्षिणा के बदले राधे मां अपने भक्तों की गोदी में बैठकर उन्हें दुलार सकती हैं, आई लव यू कह सकती हैं… कहां मिलेगा ऐसा भगवान! बाबा राम रहीम को ‘पापा जी’ कहने वाले उनके रॉक म्यूजिक पर ठुमके लगाते हैं और खुद को भगवान का रूप कहने वाले अपने पसंदीदा कैरक्टर के साथ सच्चा सुख उठाते हैं।

बाबा बदलते गए लेकिन भक्त नहीं बदले। भक्त कल भी अपने भगवान के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते थे, आज भी नहीं सुनेंगे। भक्त कल भी अपने भगवान के लिए जान लेने-देने की हिम्मत रखते थे, आज भी रखते हैं। चुनौती बहुत बड़ी है क्योंकि चुनौती है नए भगवान पैदा न होने देने की… जो बदलते माहौल में लगभग नामुमकिन हो चुका है। पुराने भगवान तस्वीरों और मूर्तियों में हैं जिन्हें अपडेट नहीं किया जा सकता और नए भगवान हर जगह तैयार हो रहे हैं… जिनसे सवाल नहीं किए जा सकते।

(उपरोक्त विचार लेखक के अपने हैं| इससे लिटरेचर इन इंडिया समूह का कोई सम्बन्ध नहीं है|)

अगर आप भी लिखते है तो हमें ज़रूर भेजे, हमारा पता है:

साहित्य: editor_team@literatureinindia.com

समाचार: news@literatureinindia.com

जानकारी/सुझाव: adteam@literatureinindia.com

हमारे प्रयास में अपना सहयोग अवश्य दें, फेसबुक पर अथवा ट्विटर पर हमसे जुड़ें