पुर्जा – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग

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अनुवाद – विजय शर्मा

सामान की आखिरी खेप जा चुकी थी। किराएदार, क्रेपबैंड हैटवाला जवान आदमी, खाली कमरों में अंतिम बार पक्का करने के लिए घूमता है कि कहीं पीछे कुछ छूट तो नहीं गया। कुछ नहीं भूला, कुछ भी नहीं। वह बाहर सामने हॉल में गया। पक्का निश्चय करते हुए कि इन कमरों में जो कुछ भी उसके साथ हुआ वह उसे कभी याद नहीं करेगा। और अचानक उसकी नजर कागज के अधपन्ने पर पड़ी, जो पता नहीं कैसे दीवाल और टेलीफोन के बीच फ़ँसा रह गया था। कागज पर लिखावट थी। जाहिर है एक से ज्यादा लोगों की। कुछ प्रविष्टियाँ पेन और स्याही से बड़ी स्पष्ट थीं, जबकि बाकी दूसरी लेड पेंसिल से घसीटी हुई। यहाँ-वहाँ लाल पेंसिल का भी प्रयोग हुआ था। दो साल में उसके साथ इस घर में जो कुछ भी हुआ था, यह उन सबका रिकॉर्ड था। सारी चीजें, जिन्हें भूल जाने का उसने मन बनाया था, लिखी हुई थीं। कागज के एक पुर्जे पर यह एक मनुष्य के जीवन का एक कतरा था।

उसने उस पेपर को निकाला; यह स्क्रिबलिंग पेपर का एक टुकड़ा था। पीला और सूरज की तरह चमकता हुआ। उसने उसे ड्राइंग रूम के कार्निश पर रख दिया और उस पर आँखें गड़ा दीं। लिस्ट के शीर्ष पर एक औरत का नाम था : ‘एलिस’। संसार में सबसे सुंदर नाम, जैसा उसे तब लगा था। क्योंकि यह उसकी मँगेतर का नाम था। नाम के बाद एक नंबर था : ‘1511’। लगता है यह बाइबिल के एक स्त्रोत का नंबर था, स्त्रोत बोर्ड पर। उसके नीचे लिखा था, ‘बैंक’। जहाँ उसका काम था, उसका पवित्र काम – जिसके द्वारा ही उसका मकान, उसकी रोटी और पत्नी, सब – उसके जीवन का आधार। परंतु शब्द पेन से कटा था। क्योंकि बैंक फेल हो गया था। हालाँकि उसने बाद में दूसरा काम पा लिया था। परंतु दुश्चिंता और बेचैनी के एक छोटे-से अंतराल के बाद।

अगली प्रविष्टि थी: ‘फूलों की दुकान और घोड़ों आदि का खर्च’। ये उसकी सगाई से संबंधित थे। जब उसकी जेबों में भरपूर पैसे थे।

तब आया, ‘फर्नीचर डीलर और पेपर हैंगर’। उसका घर सजाया जा रहा था। ‘फॉरवर्डिंग एजेंट’ – वे प्रवेश कर रहे थे। ‘ऑपेरा-हाउस का बॉक्स-ऑफ़िस, नंबर 50-50’ – उनकी नई-नई शादी हुई थी। इतवार की शामों को वे ऑपेरा जाते। उनके जीवन के खूब खुशी के दिन। जब वे शांत चुपचाप बैठते। उनकी आत्मा परी देश के सौंदर्य और लय में परदे के पीछे मिलती।

उसके पश्चात एक आदमी का नाम था, काटा हुआ। वह एक दोस्त हुआ करता था। उसकी जवानी का। एक आदमी जो सामाजिक तराजू पर बहुत ऊँचा चढ़ा, लेकिन गिरा। सफलता के मद में, सफलता से बिगड़ कर, गहन गर्त में। और फिर उसे देश छोड़ना पड़ा।

सौभाग्य इतना अस्थिर था!

अब, पति-पत्नी के जीवन में कुछ नया आया। अगली प्रविष्टि एक स्त्री की लिखावट में थी : नर्स। कौन-सी नर्स? हाँ, वही बड़े लबादे और सहानुभूतिपूर्ण चेहरेवाली। जो कभी ड्राइंग रूम से हो कर नहीं जाती बल्कि दालान से सीधे बेड रूम में जाती।

उसके नीचे लिखा था, डॉ. एल।

और अब, लिस्ट पर पहली बार कोई रिश्तेदार आया : ‘ममा’। यह उसकी सास थी। जो उनकी नई-नवेली खुशी को भंग न करने के लिए अब तक जानबूझ कर दूर थी। लेकिन अब उसकी जरूरत थी। वह आ कर खुश थी।

बहुत सारी प्रविष्टियाँ लाल और नीली पेंसिल से थीं: ‘नौकर रजिस्ट्री ऑफिस’ – नौकरानी छोड़ गई थी और एक नई को लगाना है। ‘केमिस्ट’ – हा! जीवन में कालिमा आ गई थी। डेयरी मिल्क का ऑर्डर दिया गया – ‘स्टेरेलाइज्ड दूध’!

‘कस्साई, किराना आदि।’ घर के काम टेलीफोन से हो रहे थे; मतलब मालकिन अपनी पोस्ट पर नहीं थी। नहीं, वह नहीं थी। वह लेटी हुई थी।

आगे क्या लिखा था वह पढ़ नहीं पाया। क्योंकि उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया; वह नमकीन पानी में से देखता हुआ एक डूबता हुआ आदमी था। फिर भी, वहाँ लिखा था, बहुत साफ़ : ‘अंडरटेकर – एक बड़ा ताबूत और एक छोटा ताबूत।’ और ‘धूल’ शब्द पद कोष्ठक में जुड़ा हुआ था।

पूरे रेकॉर्ड का यह अंतिम शब्द था ‘धूल’। धूल के साथ वह समाप्त हुआ! और ठीक-ठीक यही होता है जिंदगी में।

उसने पीला कागज लिया, उसे चूमा। कायदे से तहाया और अपनी पॉकेट में रख लिया।

दो मिनट में वह अपनी जिंदगी के दो वर्ष फिर से जी गया।

परंतु जब उसने घर छोड़ा वह हारा हुआ नहीं था। इसके विपरीत, एक प्रसन्न और गर्वित आदमी की तरह वह अपना सिर ऊँचा किए हुए था। क्योंकि वह जानता था कि जीवन की सर्वोत्तम चीजें उसे मिली थीं और उसे उन सब पर दया आई जिन्हें वे नहीं मिली थीं।

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धनिया की साड़ी – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग

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लड़ाई का ज़माना था, माघ की एक साँझ। ठेलिया की बल्लियों के अगले सिरों को जोडऩे वाली रस्सी से कमर लगाये रमुआ काली सडक़ पर खाली ठेलिया को खडख़ड़ाता बढ़ा जा रहा था। उसका अधनंगा शरीर ठण्डक में भी पसीने से तर था। अभी-अभी एक बाबू का सामान पहुँचाकर वह डेरे को वापस जा रहा था। सामान बहुत ज़्यादा था। उसके लिए अकेले खींचना मुश्किल था, फिर भी, लाख कहने पर भी, बाबू ने जब नहीं माना, तो उसे पहुँचाना ही पड़ा। सारी राह कलेजे का ज़ोर लगा, हुमक-हुमककर खींचने के कारण उसकी गरदन और कनपटियों की रगें मोटी हो-हो उभरकर लाल हो उठी थीं, आँखें उबल आयी थीं और इस-सबके बदले मिले थे उसे केवल दस आने पैसे!

तर्जनी अँगुली से माथे का पसीना पोंछ, हाथ झटककर उसने जब फिर बल्ली पर रखा, तो जैसे अपनी कड़ी मेहनत की उसे फिर याद आ गयी।

तभी सहसा पों-पों की आवाज़ पास ही सुन उसने सर उठाया, तो प्रकाश की तीव्रता में उसकी आँखें चौंधिया गयीं। वह एक ओर मुड़े-मुड़े कि एक कार सर्र से उसकी बग़ल से बदबूदार धुआँ छोड़ती हुई निकल गयी। उसका कलेजा धक-से रह गया। उसने सर घुमाकर पीछे की ओर देखा, धुएँ के पर्दे से झाँकती हुई कार के पीछे लगी लाल बत्ती उसे ऐसी लगी, जैसे वह मौत की एक आँख हो, जो उसे गुस्से में घूर रही हो। ‘हे भगवान्!’ सहसा उसके मुँह से निकल गया, ‘कहीं उसके नीचे आ गया होता, तो?’ और उसकी आँखों के सामने कुचलकर मरे हुए उस कुत्ते की तस्वीर नाच उठी, जिसका पेट फट गया था, अँतड़ियाँ बाहर निकल आयी थीं, और जिसे मेहतर ने घसीटकर मोरी के हवाले कर दिया था। तो क्या उसकी भी वही गत बनती? और जि़न्दा रहकर, दर-दर की ठोकरें खानेवाला और बात-बात पर डाँट-डपट और भद्दी-भद्दी गालियों से तिरस्कृत किये जाने वाला इन्सान भी अपने शव की दुर्गति की बात सोच काँप उठा, ‘ओफ़! यहाँ की मौत तो जि़न्दगी से भी ज्यादा जलील होगी!’ उसने मन-ही मन कहा और यह बात खयाल में आते ही उसे अपने दूर के छोटे-से गाँव की याद आ गयी। वहाँ की जि़न्दगी और मौत के नक्शे उसकी आँखों में खिंच गये। जि़न्दगी वहाँ की चाहे जैसी भी हो, पर मौत के बाद वहाँ के ज़लीलतरीन इन्सान के शव को भी लोग इज़्ज़त से मरघट तक पहुँचाना अपना फ़जऱ् समझते हैं! ओह, वह क्यों गाँव छोडक़र शहर में आ गया? लेकिन गाँव में …

”ओ ठेलेवाले!” एक फ़िटन-कोचवान ने हवा में चाबुक लहराते हुए कडक़कर कहा, ”बायें से नहीं चलता? बीच सडक़ पर मरने के लिए चला आ रहा है? बायें चल, बायें!” और हवा में लहराता हुआ उसका चाबुक बिलकुल रमुआ के कान के पास से सन सनाहट की एक लकीर-सा खींचता निकल गया।

विचार-सागर में डूबे रमुआ को होश आया। उसने शीघ्रता से ठेलिया को बायीं ओर मोड़ा।

लेकिन रमुआ की विचार-धारा फिर अपने गाँव की राह पर आ लगी। वहाँ ऐसी जि़न्दगी का आदी न था। जोतता, बोता, पैदा करता और खाता था। फिर उसे वे सब बातें याद हो आयीं, जिनके कारण उसे अपना गाँव छोडक़र शहर में आना पड़ा। लड़ाई के कारण ग़ल्ले की क़ीमत अठगुनी-दसगुनी हो गयी। गाँव में जैसे खेतों का अकाल पड़ गया। ज़मींदार ने अपने खेत ज़बरदस्ती निकाल लिये। कितना रोया-गिड़गिड़ाया था वह! पर जमींदार क्यों सुनने लगा कुछ? कल का किसान आज मज़दूर बनने को विवश हो गया। पड़ोस के धेनुका के साथ वह गाँव में अपनी स्त्री धनिया और बच्चे को छोड़, शहर में आ गया। यहाँ धेनुका ने अपने सेठ से कह-सुनकर उसे यह ठेलिया दिलवा दी। वह दिन-भर बाबू लोगों का सामान इधर-उधर ले जाता है। ठेलिया का किराया बारह आने रोज़ उसे देना पड़ता है। लाख मशक़्कत करने पर भी ठेलिया का किराया चुकाने के बाद डेढ़-दो रुपये से अधिक उसके पल्ले नहीं पड़ता। उसमें से बहुत किफ़ायत करने पर भी दस-बारह आने रोज़ वह खा जाता है। वह कोई ज़्यादा रक़म नहीं होती। पता नहीं, ग़रीब धनिया इस महँगी के ज़माने में कैसे अपना खर्च पूरा कर पाती है।

और धनिया, उसके सुख-दुख की साथिन! उसकी याद आते ही रमुआ की आँखें भर आयीं। कलेजे में एक हूक-सी उठ आयी। उसकी चाल धीमी हो गयी। उसे याद हो आयी बिछुडऩ की वह घड़ी, किस तरह धनिया उससे लिपटकर, बिलख-बिलखकर रोयी थी, किस तरह उसने बार-बार मोह और प्रेम से भरी ताक़ीद की थी कि अपनी देह का ख़ याल रखना, खाने-पीने की किसी तरह की कमी न करना। और रमुआ की निगाह अपने-ही-आप अपने बाज़ुओं से होकर छाती से गुज़रती हुई रानों पर जाकर टिक गयी, जिनकी माँस-पेशियाँ घुल गयी थीं और चमड़ा ऐसे ढीला होकर लटक गया था, जैसे उसका माँस और हड्डियों से कोई सम्बन्ध ही न रह गया हो। ओह, शरीर की यह हालत जब धनिया देखेगी, तो उसका क्या हाल होगा! पर वह करे क्या? रूखा-सूखा खाकर, इतनी मशक्कत करनी पड़ती है। हुमक-हुमककर दिन-भर ठेलिया खींचने से माँस जैसे घुल जाता है और खून जैसे सूख जाता है। और शाम को जो रूखा-सूखा मिलता है, उससे पेट भी नहीं भरता। फिर गयी ताक़त लौटे कैसे? जब धनिया उससे पूछेगी, सोने की देह माटी में कैसे मिल गयी, तो वह उसका क्या जवाब देगा? कैसे उसे समझाएगा? जब-जब उसकी चिट्ठी आती है, वह हमेशा ताक़ीद करती है कि अपनी देह का ख़ याल रखना। कैसे वह अपनी देह का ख़ याल रखे? इतना कतर-ब्योंतकर चलने पर तो यह हाल है। आज करीब नौ महीने हुए उसे आये। धनिया के शरीर पर वह एक साड़ी और एक झूला छोडक़र आया था। वह बार-बार चिठ्ठी में एक साड़ी भेजने की बात लिखवाती है। उसकी साड़ी तार-तार हो गयी होगी। झूला कब का फट गया होगा। पर वह करे क्या? कई बार कुछ रुपया जमा हो जाने पर एक साड़ी खरीदने की गरज़ से वह बाज़ार में भी जा चुका है। पर वहाँ मामूली जुलहटी साड़ियों की कीमत जब बारह-चौदह रुपये सुनता है, तो उसकी आँखें ललाट पर चढ़ जाती हैं। मन मारकर लौट आता है। वह क्या करे? कैसे साड़ी भेजे धनिया को? साड़ी खरीदकर भेजे, तो उसके खर्चे के लिए रुपये कैसे भेज सकेगा? पर ऐसे कब तक चलेगा? कब तक धनिया सी-टाँककर गुज़ारा करेगी? उसे लगता है कि यह एक ऐसी समस्या है, जिसका उसके पास कोई हल नहीं है। तो क्या धनिया … और उसका माथा झन्ना उठता है। लगता है कि वह पागल हो उठेगा। नहीं, नहीं, वह धनिया की लाज …

उसकी गली का मोड़ आ गया। इस गली में ईंटें बिछी हैं। उन पर ठेलिया और ज़ोर से खडख़ड़ा उठी। उसकी खडख़ड़ाहट उस समय रमुआ को ऐसी लगी, जैसे उसके थके, परेशान दिमाग़ पर कोई हथौड़े की चोट कर रहा हो। उसके शरीर की अवस्था इस समय ऐसी थी, जैसे उसकी सारी संजीवनी-शक्ति नष्ट हो गयी हो। और उसके पैर ऐसे पड़ रहे थे, जैसे वे अपनी शक्ति से नहीं उठ रहे हों, बल्कि ठेलिया ही उनको आगे को लुढक़ाती चल रही हो।

उस दिन से रमुआ ने और अधिक मेहनत करना शुरू कर दिया। पहले भी वह कम मेहनत नहीं करता था, पर थक जाने पर कुछ आराम करना ज़रूरी समझता था। किन्तु अब थके रहने पर भी अगर कोई उसे सामान ढोने को बुलाता, तो वह ना-नुकर न करता। खुराक में भी जहाँ तक मुमकिन था, कमी कर दी। यह सब सिर्फ़ इसलिए कर रहा था कि धनिया के लिए वह एक साड़ी खरीद सके।

महीना ख़ त्म हुआ, तो उसने देखा कि इतनी तरूद्दद और परेशानी के बाद भी वह अपनी पहले की आय में सिर्फ़ चार रुपये अधिक जोड़ सका है। यह देख उसे आश्चर्य के साथ घोर निराशा हुई। इस तरह वह पूरे तीन-चार महीनों मेहनत करे, तब कहीं एक साड़ी का दाम जमा कर पाएगा। पर इस महीने के जी-तोड़ परिश्रम का उसे जो अनुभव हुआ था, उससे यह बात तय थी कि वह ऐसी मेहनत अधिक दिनों तक लगातार करेगा, तो एक दिन खून उगलकर मर जायगा। उसने तो सोचा था कि एक महीने की बात है, जितना मुमकिन होगा, वह मशक्कत करके कमा लेगा और साड़ी खरीदकर धनिया को भेज देगा। पर इसका जो नतीजा हुआ, उसे देखकर उसकी हालत वही हुई, जो रेगिस्तान के उस प्यासे मुसाफ़िर की होती है, जो पानी की तरह किसी चमकती हुई चीज़ को देखकर थके हुए पैरों को घसीटता हुआ, और आगे चलने की शक्ति न रहते भी सिर्फ़ इस आशा से प्राणों का ज़ोर लगाकर बढ़ता है कि बस, वहाँ तक पहुँचने में चाहे जो दुर्गति हो जाय, पर वहाँ पहुँच जाने पर जब उसे पानी मिल जायगा, तो सारी मेहनत-मशक्कत सुफल हो जायगी। किन्तु जब वहाँ किसी तरह पहुँच जाता है, तो देखता है कि अरे, वह चीज़ तो अभी उतनी ही दूर है। निदान, रमुआ की चिन्ता बहुत बढ़ गयी। वह अब क्या करे, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। कई महीने से वह धनिया को बहलाता आ रहा था कि अब साड़ी भेजेगा, तब साड़ी भेजेगा, पर अब उसे लग रहा है कि वह धनिया को कभी भी साड़ी न भेज सकेगा। उसे अपनी दुरावस्था और बेबसी पर बड़ा दुख हुआ। साथ ही अपनी जि़न्दगी उसे वैसे ही बेकार लगने लगी, जैसे घोर निराशा में पडक़र किसी आत्महत्या करनेवाले को लगती है। फिर भी जब धनिया को रुपये भेजने लगा, तो अपनी आत्मा तक को धोखा दे उसने फिर लिखवाया कि अगले महीने वह ज़रूर साड़ी भेजेगा। थोड़े दिनों तक वह और किसी तरह गुज़ारा कर ले।

उस सुबह रमुआ अपनी ठेलिया के पास खड़ा जँभाई ले रहा था कि सेठ के दरबान ने आकर कहा, ”ठेलिया लेकर चलो। सेठजी बुला रहे हैं।”

बेगार की बात सोच रमुआ ने दरबान की ओर देखा। दरबान ने कहा, ”इस तरह क्या देख रहे हो! सेठजी की भैंस मर गयी है। उसे गंगाजी में बहाने ले जाना है। चलो, जल्दी करो!”

वैसे निषिद्घ काम की बात सोच उसे कुछ क्षोभ हुआ। गाँव में मरे हुए जानवरों को चमार उठाकर ले जाते हैं। वह चमार नहीं है। वह यह काम नहीं करेगा। पर दूसरे ही क्षण उसके दिमाग़ में यह बात भी आयी कि वह सेठ का ताबेदार है। उसकी बात वह टाल देगा, तो वह अपनी ठेलिया उससे ले लेगा। फिर क्या रहेगा उसकी जि़न्दगी का सहारा? मरता क्या न करता? वह ठेलिया को ले दरबान के पीछे चल पड़ा।

कोठी के पास पहुँचकर रमुआ ने देखा कि कोठी की बग़ल में टीन के छप्पर के नीचे मरी हुई भैंस पड़ी है और उसे घेरकर सेठ, उसके लडक़े, मुनीम और नौकर-चाकर खड़े हैं, जैसे उनका कोई अज़ीज़ मर गया हो। ठेलिया खड़ी कर, वह खिन्न मन लिये खड़ा हो गया।

उसे आया देख , मुनीम ने सेठ की ओर मुडक़र कहा, ”सेठजी, ठेलिया आ गयी। अब इसे जल-प्रवाह के लिए उठवाकर ठेलिया पर रखवा देना चाहिए।”

”हाँ, मुनीमजी तो इसके कफ़न बगैरा का इन्तज़ाम करा दें। मेरे यहाँ इसने जीवन-भर सुख किया। अब मरने के बाद इसे नंगी ही क्या जल-प्रवाह के लिए भेजा जाय। मेरे विचार से बिछाने के लिए एक नयी दरी और ओढ़ाने के लिए आठ गज़ मलमल काफ़ी होगी। जल्द दुकान से मँगा भेजें।”

देखते-ही देखते उसकी ठेलिया पर नयी दरी बिछा दी गयी। उसे देखकर रमुआ की धँसी आँखों में जाने कितने दिनों की एक पामाल हसरत उभर आयी। सहज ही उसके मन में उठा, ‘काश, वह उस पर सो सकता!’ पर दूसरे ही क्षण इस अपवित्र खयाल के भय से जैसे वह काँप उठा। उसने आँखें दूसरी ओर मोड़ लीं।

कई नौकरों ने मिलकर भैंस की लाश उठा दरी पर रख दी। फिर उसे मलमल से अच्छी तरह ढँक दिया गया। इतने में एक खैरख़्वाह नौकर सेठजी की बगिया से कुछ फूल तोड़ लाया। उनका एक हार बना भैंस के गले में डाल दिया गया और कुछ इधर-उधर उसके शरीर पर बिखेर दिये गये।

यह सब-कुछ हो जाने पर सेठ के बड़े लडक़े ने रमुआ की ओर मुडक़र कहा, ”देखो, इसे तेज़ धारा में ले जाकर छोडऩा और जब तक यह धारा में बह न जाय, तब तक न हटना, नहीं तो कोई इसके क़फ़न पर हाथ साफ़ कर देगा।”

उसकी बात सुनकर नमकहलाल मुनीम ने रद्दा जमाया, ”हाँ, बे रमुआ, बाबू की बात का ख़ याल रखना!”

रमुआ को लगा, जैसे वह बातें उसे ही लक्ष्य करके कही गयी हों। कभी-कभी ऐसा होता है कि जो बात आदमी के मन में कभी स्वप्न में भी नहीं आती, वही किसी के कह देने पर ऐसे मन में उठ जाती है, जैसे सचमुच वह बात पहले ही से उसके मन में थी। रमुआ के ख़ याल में भी यह बात नहीं थी कि वह कफ़न पर हाथ लगाएगा, पर मुनीम की बात सुन सचमुच उसके मन में यह बात कौंध गयी कि क्या वह भी ऐसा कर सकता है?

वह इन्हीं विचारों में खोया हुआ ठेलिया उठा आगे बढ़ा। अभी थोड़ी ही दूर सडक़ पर चल पाया था कि किसी ने पूछा, ”क्यों भाई, यह किसकी भैंस थीं?”

रमुआ ने आगे बढ़ते हुए कहा, ”सेठ गुलजारी लाल की!”

उस आदमी ने कहा, ”तभी तो! भाई, बड़ी भागवान थी यह भैंस! नहीं तो आजकल किसे नसीब होता है मलमल का कफ़न!”

रमुआ के मन में उसकी बात सुनकर उठा कि क्या सचमुच मलमल का कफ़न इतना अच्छा है? उसने अभी तक उसकी ओर निगाह नहीं उठायी थी, यही सोचकर कि कहीं उसे देखते देखकर सेठ का लडक़ा और मुनीम यह न सोचें कि वह ललचायी आँखों से कफ़न की ओर देख रहा है। उसकी नीयत ख़ राब मालूम होती है। पर वह अब अपने को न रोक सका। चलते हुए ही उसने एक बार अगल बग़ल देखा, फिर पीछे मुडक़र भैंस पर पड़े कफ़न को उड़ती हुई नज़र से ऐसे देखा, जैसे वह कोई चोरी कर रहा हो।

काली भैंस पर पड़ी सफ़ेद मलमल, जैसे काली दूब के एक चप्पे पर उज्ज्वल चाँदनी फैली हुई हो। ‘सचमुच यह तो बड़ा उम्दा कपड़ा मालूम देता है’ उसने मन में ही कहा।

कई बार यह बात उसके मन में उठी, तो सहज ही उसे उन झिलँगी साड़ियों की याद आ गयी, जिन्हें वह बाज़ार में देख चुका था और जिनकी क़ीमत बारह-चौदह से कम न थी। उसने उन साड़ियों का मुक़ाबला मलमल के उस कपड़े से जब किया, तो उसे वह मलमल बेशक़ीमती जान पड़ा। उसने फिर मन में ही कहा, ‘इस मलमल की साड़ी तो बहुत ही अच्छी होगी।’ और उसे धनिया के लिए साड़ी की याद आ गयी। फिर जैसे इस कल्पना से ही वह काँप उठा। ओह, कैसी बात सोच रहा है वह! जीते-जी ही धनिया को कफ़न की साड़ी पहनाएगा? नहीं-नहीं, वह ऐसा सोचेगा भी नहीं! ऐसा सोचना भी अपशकुन है। और इस ख़ याल से छुटकारा पाने के लिए वह अब और ज़ोर से ठेलिया खींचने लगा।

अब आबादी पीछे छूट गयी थी। सूनी सडक़ पर कहीं कोई नज़र नहीं आ रहा था। अब जाकर उसने शान्ति की साँस ली। जैसे अब उसे किसी की अपनी ओर घूरती आँखों का डर न रह गया हो। ठेलिया कमर से लगाये ही वह सुस्ताने लगा। तेज़ चलने में जो ख़ याल पीछे छूट गये थे, जैसे वे फिर उसके खड़े होते ही उसके मस्तिष्क में पहुँच गये। उसने बहुत चाहा कि वे खयाल न आएँ। पर ख़ यालों का यह स्वभाव होता है कि जितना ही आप उनसे छुटकारा पाने का प्रयत्न करेंगे, वे उतनी ही तीव्रता से आपके मस्तिष्क पर छाते जायँगे। रमुआ ने अन्य कितनी ही बातों में अपने को बहलाने की कोशिश की, पर फिर-फिर उन्हीं ख़ यालों से उसका सामना हो जाता। रह-रहकर वही बातें पानी में तेल की तरह उसकी विचार-धारा पर तैर जातीं। लाचार वह फिर चल पड़ा। धीरे-धीरे रफ़्तार तेज़ कर दी। पर अब ख़ यालों की रफ़्तार जैसे उसकी रफ़्तार से भी तेज़ हो गयी थी। तेज़ रफ़्तार से लगातार चलते-चलते उसके शरीर से पसीने की धाराएँ छूट रही थीं, छाती फूल रही थी, चेहरा सुर्ख हो गया था, आँखें उबल रही थीं और गर्दन और कनपटियों की रगें फूल-फूलकर उभर आयी थीं। पर उसे उन-सब का जैसे कुछ ख़ याल ही नहीं था। वह भागा जा रहा था कि जल्द-से-जल्द नदी पहुँच जाय और भैंस की लाश धारा में छोड़ दे। तभी उसे उस अपवित्र विचार से, उस धर्म-संकट से मुक्ति मिलेगी।

अब सडक़ नदी के किनारे-किनारे चल रही थी। उसने सोचा, क्यों न कगार पर से ही लाश नदी की धारा में लुढक़ा दे। पर दूसरे ही क्षण उसके अन्दर से कोई बोल उठा, अब जल्दी क्या है? नदी आ गयी। थोड़ी दूर और चलो। वहाँ कगार से उतरकर बीच धारा में छोडऩा। वह आगे बढ़ा। पर बीच धारा में छोडऩे की बात क्यों उसके मन में उठ रही है? क्यों नहीं वह उसे यहीं छोडक़र अपने को कफ़न के लोभ से, उस अपवित्र ख़ याल से मुक्त कर लेता? शायद इसलिए कि सेठ के लडक़े ने ऐसा ही करने को कहा था। पर सेठ का लडक़ा यहाँ खड़ा-खड़ा देख तो नहीं रहा है- फिर ? तो क्या उसे अब उसी वस्तु से, जिससे जल्दी-से-जल्दी छुटकारा पाने के लिए वह भागता हुआ आया है, अब मोह हो गया है? नहीं, नहीं, वह तो …वह तो …

अब वह श्मशान से होकर गुज़र रहा था। अपनी झोपड़ी से झाँककर डोमिन ने देखा, तो वह उसकी ओर दौड़ पड़ी। पास आकर बोली ”भैया यहीं छोड़ दे न!”

रमुआ का दिल धक-से कर गया, तो क्या यह बात डोमिन को मालूम है कि वह लाश को इसलिए लिये जा रहा है कि … नहीं, नहीं! तो?

”भैया, यहाँ धारा तेज़ है, छोड़ दो न यहीं!” डोमिन ने फिर विनती की।

हाँ, हाँ, छोड़ दे न! यह मौक़ा अच्छा है। डोमिन के सामने ही, उसे गवाह बनाकर छोड़ दे। और साबित कर दे कि तेरे दिल में वैसी कोई बात नहीं है। रमुआ के दिल ने ललकारा। पर वह योंही डोमिन से पूछ बैठा, ”क्यों, यही क्यों छोड़ दूँ?”

”तुम्हें तो कहीं-न-कहीं छोडऩा ही है। यहाँ छोड़ दोगे, तो तुम भी दूर ले जाने की मेहनत से छुटकारा पा जाओगे और मुझे …” कहकर वह कफ़न की ओर ललचायी दृष्टि से देखने लगी।

”तुम्हें क्या?” रमुआ ने पूछा।

”मुझे यह कफ़न मिल जायगा,” उसने कफ़न की ओर अँगुली से इशारा करके कहा।

”कफ़न?” रमुआ के मुँह से यों ही निकल गया।

”हाँ-हाँ! कहीं इधर-उधर छोड़ दोगे, तो बेकार में सड़-गल जायगा। मुझे मिल जायगा, तो मैं उसे पहनूँगी। देखते हो न मेरे कपड़े? कहकर उसने अपने लहँगे को हाथ से उठाकर उसे दिखा दिया।”

”तुम पहनोगी कफ़न?” रमुआ ने ऐसे कहा, जैसे उसे उसकी बात पर विश्वास ही न हो रहा हो।

”हाँ-हाँ, हम तो हमेशा कफ़न ही पहनते हैं। मालूम होता है, तुम शहर के रहने वाले नहीं हो। क्या तुम्हारे यहाँ …”

”हाँ, हमारे यहाँ तो कोई छूता तक नहीं। कफ़न पहनने से तुम्हें कुछ होता नहीं?” रमुआ की किसी शंका ने जैसे अपना समाधान चाहा, पर वह ऐसे स्वर में बोला, जैसे यों ही जानना चाहता हो।

”गरीबों को कुछ नहीं होता, भैया! आजकल तो जमाने में ऐसी आग लगी है कि लोग लाशें नंगी ही लुढक़ा जाते हैं। नहीं तो पहले इतने कफ़न मिलते थे कि हम बाजार में बेच आते थे।”

”बाजार में बेच आते थे?” रमुआ ने ऐसे पूछा, जैसे उसके आश्चर्य का ठिकाना न हो, ”कौन खरीदता था उन्हें?”

”हमसे कबाड़ी खरीदते थे और उनसे गरीब और मजदूर,” उसने कहा।

”गरीब और मजदूर?” रमुआ ने कहा।

”हाँ-हाँ , बहुत सस्ता बिकता था न! शहर के गरीब और मजदूर जियादातर वही कपड़े पहनते थे।”

रमुआ उसकी बात सुन जैसे किसी सोच में पड़ गया।

उसे चुप देख डोमिन फिर बोली, ”तो भैया, छोड़ दो न यहीं। आज न जाने कितने दिन बाद ऐसा कफ़न दिखाई पड़ा है। किसी बहुत बड़े आदमी की भैंस मालूम पड़ती है। तभी तो ऐसा कफ़न मिला है इसे। छोड़ दे, भैया, मुझ गरीब के तन पर चढ़ जायगा। तुम्हें दुआएँ दूँगी!” कहते-कहते वह गिड़गिड़ाने लगी।

रमुआ के मन का संघर्ष और तीव्र हो उठा। उसने एक नजर डोमिन पर उठायी, तो सहसा उसे लगा, जैसे उसकी धनिया चिथड़ों में लिपटी डोमिन की बग़ल में आ खड़ी हुई है, और कह रही है, ”नहीं-नहीं, इसे न देना! मैं भी तो नंगी हो रही हूँ! मुझे! मुझे …” और उसने ठेलिया आगे बढ़ा दी।

”क्यों, भैया, तो नहीं छोड़ोगे यहाँ?” डोमिन निराश हो बोली।

रमुआ सकपका गया। क्या जवाब दे वह उसे? मन का चीर जैसे उसे पानी-पानी कर रहा था। फिर भी ज़ोर लगाकर मन की बात दबा उसने कहा, ”सेठ का हुकुम है कि इसका कफ़न कोई छूने न पाये।” और ठेलिया को इतने ज़ोर से आगे बढ़ाया, जैसे वह इस ख़ याल से डर गया हो कि कहीं डोमिन कह न उठे, हूँ-हूँ! यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हारी नीयत खुद खराब है!

काफ़ी दूर बढक़र, यह सोचकर कि कहीं डोमिन कफ़न के लोभ से उसका पीछा तो नहीं कर रही है, उसने मुडक़र चोर की तरह पीछे की ओर देखा। डोमिन एक लडक़े से उसी की ओर हाथ उठाकर कुछ कहती-सी लगी। फिर उसने देखा कि वह लडक़ा उसी की ओर आ रहा है। वह घबरा उठा, तो क्या वह लडक़ा उसका पीछा करेगा?

अब वह धीरे-धीरे, रह-रहकर पीछे मुड़-मुडक़र लडक़े की गति-विधि को ताड़ता चलने लगा। थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा, तो लडक़ा दिखाई नहीं दिया। फिर जो उसकी दृष्टि झाऊँ के झुरमुटों पर पड़ी, तो शक हुआ कि वह छिपकर तो उसका पीछा नहीं कर रहा है। पर कई बार आगे बढ़ते-बढ़ते देखने पर भी जब उसे लडक़े का कोई चिन्ह दिखाई न दिया, तो वह उस ओर से निश्चिन्त हो गया। फिर भी चौकन्नी नज़रों से इधर-उधर देखता ही बढ़ रहा था।

काफ़ी दूर एक निर्जन स्थान पर उसने नदी के पास ठेलिया रोकी। फिर चारों ओर शंका की दृष्टि से एक बार देखकर उसने कमर से ठेलिया छुड़ा ज़मीन पर रख दी।

अब उसके दिल में कोई दुविधा न थी। फिर भी जब उसने कफ़न की ओर हाथ बढ़ाया, तो उसकी आत्मा की नींव तक हिल उठी। उसके काँपते हाथों को जैसे किसी शक्ति ने पीछे खींच लिया। दिल धड़-धड़ करने लगा। आँखें वीभत्सता की सीमा तक फैल गयीं। उसे लगा, जैसे सामने हवा में हज़ारों फैली हुई आँखें उसकी ओर घूर रही हैं। वह किसी दहशत में काँपता बैठ गया। नहीं, नहीं, उससे यह नहीं होगा! फिर जैसे किसी आवेश में उठ, उसने ठेलिया को उठाया कि लाश को नदी में उलट दे कि सहसा उसे लगा कि जैसे फिर धनिया उसके सामने आ खड़ी हुई है, जिसकी साड़ी जगह-जगह बुरी तरह फट जाने से उसके अंगों के हिस्से दिखाई दे रहे हैं। वह उन अंगों को सिमट-सिकुडक़र छिपाती जैसे बोल उठी, देखो, अबकी अगर साड़ी न भेजी, तो मेरी दशा …

”नहीं, नहीं!” रमुआ हथेलियों से आँखों को ढँकता हुआ बोल उठा और ठेलिया ज़मीन पर छोड़ दी। फिर एक बार उसने चारों ओर शीघ्रता से देखा और जैसे एक क्षण को उसके दिल की धडक़न बन्द हो गयी, उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया, उसका ज्ञान जैसे लुप्त हो गया और उसी हालत में, उसी क्षण उसके हाथों ने बिजली की तेज़ी से कफ़न खींचा, समेटकर एक ओर रखा और ठेलिया उठाकर लाश को नदी में उलटा दिया। तब जाकर जैसे होश हुआ। उसने जल्दी से कफ़न ठेलिया पर रख उसे माथे के मैले गमछे से अच्छी तरह ढँक दिया और ठेलिया उठा तेज़ी से दूसरी राह से चल दिया।

कुछ दूर तक इधर-उधर देखे बिना वह सीधे तेज़ी से चलता रहा। जैसे वह डर रहा था कि इधर-उधर देखने पर कहीं कोई दिखाई न पड़ जाय। पर कुछ दूर और आगे बढ़ जाने पर वह वैसे ही निडर हो गया, जैसे चोर सेंध से दूर भाग जाने पर। अब उसकी चाल में धीरे-धीरे ऐसी लापरवाही आ गयी, जैसे कोई विशेष बात ही न हुई हो, जैसे वह रोज़ की तरह आज भी किसी बाबू का सामान पहुँचाकर खाली ठेलिया को धीरे-धीरे खींचता, अपने में रमा हुआ, डेरे पर वापस जा रहा हो। अपनी चाल में वह वही स्वाभाविकता लाने की भरसक चेष्टा कर रहा था, पर उसे लगता था कि कहीं से वह बेहद अस्वाभाविक हो उठा है और कदाचित उसकी चाल की लापरवाही का यही कारण था कि वह रात होने के पहले शहर में दाख़िल नहीं होना चाहता था।

काफ़ी दूर निकल जाने पर न जाने उसके जी में क्या आया कि उसने पलटकर उस स्थान की ओर एक बार फिर देखा, जहाँ उसने भैंस की लाश गिरायी थी। कोई लडक़ा कोई काली चीज़ पानी में से खींच रहा था। वह फिर बेतहाशा ठेलिया को सडक़ पर खडख़ड़ाता भाग खड़ा हुआ।

उस दिन गाँव में हल्दी में रंगी मलमल की साड़ी पहने धनिया अपने बच्चे को एक हाथ की अँगुली पकड़ाये और दूसरे हाथ में छाक-भरा लोटा कन्धे तक उठाये, जब काली माई की पूजा करने चली, तो उसके पैर असीम प्रसन्नता के कारण सीधे नहीं पड़ रहे थे। उसकी आँखों से जैसे उल्लाल छलका पड़ता था।

रास्ते में न जाने कितनी औरतों और मर्दों ने उसे टोककर पूछा, ”क्यों, धनिया, यह साड़ी रमुआ ने भेजी है?”

और उसने हर बार शरमायी आँखों को नीचेकर, होंठों पर उमड़ती हुई मुस्कान को बरबस दबाकर, सर हिला जताया, हाँ!

ठंड से जमा प्रदेश – इओसिफ ब्रोद्स्‍की

अनुवाद – वरयाम सिंह


इओसिफ ब्रोद्स्‍की  Iosif Aleksandrovich Brodsky

(ये. पे . के लिए)

ठंड से जम गया है यह समृद्ध प्रदेश।
प्रतिबिंब के दूध में छिप गया है शहर।
घंटियाँ बजने लगी हैं।
लैंपशेड सहित एक कमरा। हुल्‍लड़ मचा रहे हैं देवदूत
ठीक जैसे रसोई से निकलते बेयरे।

मैं तुम्‍हें यह पृथ्‍वी के दूसरे छोर से लिख रहा हूँ
ईसा मसीह के जन्‍मदिवस पर। बाहर बर्फ का ढेर
निष्‍ठापूर्वक कहता है – ‘ऐ लोगो !’
उजाला बढ़ रहा है”’ शीघ्र ईसा
दो हजार वर्ष के हो जायेंगे। बचे हैं केवल चौदह वर्ष।
आज बुधवार है। कल-वीर। इस जयंती पर,
डर है, हम कुछ जुगाड़ नहीं कर पायेंगे संभावित झुर्रियों को।
आम भाषा में कहें तो, उसके गाल से।
और तभी हम मिलेंगे जैसे तारा मिलता है गाँव वालों से
एक दीवार पार कर, एक उँगुली से जगाया गया पिआनों
कष्‍ट पहुँचा रहा है कानों को जैसे कोई
वर्णमाला सीख रहा हो।
या खगोल विद्या कुछ होती ही नहीं जब देखते हैं
व्‍यक्तिवाचक संज्ञाओं को वहाँ अंकित, जहाँ हम हों ही न।
जहाँ योगफल निर्भर करता हो घटाने की प्रक्रिया पर।

तलविंदर सिंह की पंजाबी कहानी ‘फासला’ हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

वह मेरे सामने बैठी थी- शॉल लपेटे, गुमसुम-सी, चुपचाप। या शायद मुझे ही ऐसा लग रहा था। उसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा था और यही बात मेरे अन्दर एक तल्खी पैदा कर रही थी। उसकी बगल में दाहिनी ओर सोफे पर गुरुद्वारे के तीन नुमांइदे आये बैठे थे। उनके साथ भी दुआ-सलाम से अधिक कोई बात नहीं हुई थी। थोड़ा-सा संकोच मुझे खुद भी हो रहा था, क्योंकि दिनभर की थकावट को उतारने की नीयत से मैंने अभी-अभी व्हिस्की का एक पैग लगाया था। गुरुद्वारे से आये नुमांइदों की समस्या के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी थी मुझे। अरबन एस्टेट के साथ वाली लेबर कालोनी के कुछेक पढ़ाकू लड़कों ने गुरुद्वारे में आकर इस बात पर तकरार की थी कि परीक्षाओं के दिन हैं, इसलिये स्पीकर की आवाज कम की जाएे या इसका मुँह दूसरी तरफ किया जाएे। तभी से, अफसरनुमा कर्ताधर्ता इधर-उधर घूम रहे थे। अब भी वे इसीलिये आये थे।

प्रधान प्रदुमन सिंह ने हल्का-सा खाँसते हुए बात शुरू की, ”सरदार साहिब, आप तो मामला जानते ही हैं। यह तो सरासर गुरु-घर का अपमान है। मसला और ज्यादा बिगड़ जाने का चांसेज है… आप…।”

अजीब फितरत है मेरी भी। दिमाग में कोई गांठ लग गयी तो तब तक चैन नहीं मिलता, जब तक वह खुलती नहीं। बात इतनी अहम नहीं, यह मैं जानता हूँ। इसका नाम अमृत, अमन, अमरजीत… नहीं, नहीं, बात रुक नहीं रही दिमाग में। वैसे मुझे पता है कि इसका नाम ‘अ’ से ही शुरू होता है और है भी चार अक्षर का। शॉल में लिपटा उसका चेहरा मासूम लग रहा है, या मुझे ही ऐसा प्रतीत हो रहा है।

”आप तो शायद बाद में आये यहाँ। इकहत्तर में बनाया हमने यह गुरुद्वारा। तन, मन, धन से। इस लेबर कालोनी में से किसी ने फूटी कौड़ी नहीं दी। हमने कहा, कोई बात नहीं, वो जानें। आप तो जानते ही हो, गुरुद्वारे की अपनी रवायतें हैं। यहाँ पाठ भी होना है और कीर्तन भी। कोई उठकर कहने लगे कि गुरुद्वारे को झुका लें… लड़के तो हमारे भी मूंछों को ताव देते घूम रहे हैं, पर हमने कहा, नहीं। ऐसी कोई बात नहीं करेंगे जो सिक्ख उसूलों के खिलाफ हो।”

अचानक, मुझे लगा मानो मेरा सिर घूमने लगा हो। यूँ लगा, जैसे अन्दर धुआँ-सा जमा होने लगा हो। क्या फैसला दूँ मैं? क्या भूमिका निभाऊँ ? इधर एक छोटा-सा कांटा फँसा पड़ा था दिमाग में। पता नहीं, मुझे वह इतनी सहज क्यों लग रही थी। गुरुद्वारे के मसले में मेरी रत्ती भर दिलचस्पी नहीं थी। मैं इधर-उधर देखकर बहादुर को खोजने लगा, जो रसोई की चौखट के साथ पीठ टिकाये खड़ा था। मैंने उसे इशारा किया, ”जरा इधर आओ।”

”जी साहिब!” वह करीब आकर बोला।

”पहले पानी ला, फिर चाय।” अपने छुटकारे के लिए मानो यही राह मुझे आसान लगी थी।

”नहीं, नहीं, चाय की कोई ज़रूरत नहीं सरदार साहिब…। आप हमें थोड़ा गाइड करो।” प्रधान साहिब बोले।

मैं असमंजस में था कि क्या बोलूँ ? लेबर कालोनी के बच्चों की पढ़ाई ज़रूरी है या ‘शबद-कीर्तन’ का कानफोड़ू शोर। प्रधान प्रदुमन सिंह की दर्शनीय दाढ़ी उनके कंधे पर पड़ी सफेद लोई के साथ खूब मैच कर रही है। सचिव सुखदयाल सिंह की मूंछों के कुंडल उनकी ऊँची शख्सीयत का दम भर रहे हैं। ये तीसरे शख्स गुरुद्वारे के खजांची हैं। उनसे मेरा ज्यादा परिचय नहीं। ये जाने-माने व्यक्ति हैं। गुरुद्वारे का मामला वाकई संगीन है। मुझे बोलने के लिए कोई राह नहीं सूझ रही थी। नशे के हल्के-से सुरूर के कारण मेरी नज़र भी डोल रही थी। दिमाग का एक हिस्सा लड़की के नाम की तलाश में मुझे लगातार बेचैन कर रहा है। अजीब स्थिति है। गुरुद्वारे वाला मसला तो अब किसी भी सूरत में हल होने वाला नहीं। वैसे भी मन के किसी कोने में से आवाज आ रही है कि यह मसला मेरे स्तर पर हल होने वाला है ही नहीं। इस बात को शायद ये लोग भी समझते हैं। मेरी सलाह लेना इनकी कोई मजबूरी भी हो सकती है। एक दिन तड़के पौ फटे सैर करते समय अपने से आगे जा रहे दो व्यक्तियों की बातचीत मैंने सुनी थी- ‘यह शडयूल्ड कास्ट अफसर हमारे हक में नहीं खड़ा होगा।’ मैंने तभी चाल धीमी कर ली थी। बातें करने वाले वो व्यक्ति ये थे या कोई और, पता नहीं, पर थे वे इन जैसे ही। अपने स्वभाव के अनुसार मुझे इनके मसले में बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं। अच्छा हुआ, बहादुर पानी के गिलासों वाली ट्रे लेकर आ गया। उससे पानी का गिलास लेकर मैंने खुद भी पिया। फिर, उन सज्जनों की ओर मुखातिब हुआ, ”मेरे विचार में जल्दबाजी ठीक नहीं। एक मीटिंग रख लो। मुझे खबर कर देना, मैं आ जाऊँगा, इस वक्त तो ज़रा…।”

वे भी शायद मेरी स्थिति से परिचित हो चुके थे। उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखकर उठने का मन बना लिया।

मैंने कहा, ”बैठो, चाय पीकर जाना।”

”नहीं, नहीं, चाय नहीं सरदार साहब, फिर कभी सही।” सचिव साहिब बोले, ”पर आप इस मसले का हल निकालें।”

प्रधान साहिब भी उठ खड़े हुए, ”गुरुद्वारे के लिए तो सिंहों ने जानें अर्पण कर दीं।”

अर्णण! खुल गयी गांठ ! उसने भी एक बार सिर उठाकर उनकी ओर देखा। एकदम मैंने स्वयं को सुर्खरू महसूस किया। अर्पण था नाम उसका।

”हम इसका गंभीरता के साथ हल निकालेंगे। आप बस अमन-चैन बनाये रखो।” मैं भी उठकर उनके साथ चल दिया। वह वहीं बैठी रही। ड्राइंग-रूम में से निकलकर उन्होंने हाथ जोड़ फतह बुलायी और चल गये। मैं दरवाजा भेड़ कर फिर से अपनी पहली वाली जगह पर आ बैठा। बहादुर ने पास आकर पूछा, ”चाय साहब?”

उसे उत्तर देने के बदले मैंने अर्पण से पूछा, ”आप चाय लोगे न?”

”नहीं, नहीं, कोई ज़रूरत नहीं इस वक्त।” वह बोली।

”देखो संकोच करने की कोई बात नहीं। कोई फारमैल्टी नहीं। आपका अपना घर है…।” मुझे लगा, बात मैं थोड़ा बड़ी कर गया था। एकदम इतनी छूट ठीक नहीं। आखिर, मेरा भी कोई स्टेट्स है। पूरी तहसील का मालिक हूँ।

”मुझे लगता है, आपने मुझे पहचाना नहीं सर।” मेरी बात पर शायद उसने राहत महसूस की।

बदन पर लपेटे शॉल को उसने ढीला किया और थोड़ा और सहज हो गयी। नशे की हल्की-सी तार मेरी आँखों में लरजी। उसका चेहरा पहले से कमजोर था। नयन-नक्श मिच्योर हो गये थे। ढीले हुए शॉल में से मैंने उसकी छातियों का जायजा लेने की कोशिश की, पर सफल न हो सका। पहले वाली बात तो अब मेरी भी नहीं रही थी। रसूलपुर की ठठ्ठी के सीलन भरे कोठे में से निकलकर, निचली जात का लड़का तेजू अर्बन एस्टेट की इस शानदार कोठी में रह रहा था, आलीशान घराने की कालेज-लेक्चरर पत्नी और कान्वेंट स्कूल में पढ़ते दो होनहार बच्चों के साथ।

मैंने तेजू के मुँह पर से पर्दा खिसकाया। छठी कक्षा में दाखिला लेने के लिए जब हाई-स्कूल में गया था, तो मास्टर दर्शन सिंह ने टिप्पणी की थी, ”आ रे सुरैणे मज्हबी के पढ़ाकू ! बता अफसर बनना है कि लफटैण?” मैं नज़रें झुकाये खड़ा रहा था। वे शब्द मेरे लिए बेअसर थे। मैं चुपचाप क्लास में बैठ गया था। फिर, वह दूसरे मास्टरों के साथ अपना दु:ख साझा कर रहा था, ”देखो तो दुहाई रब की। फीसें माफ, किताबें मुफ्त। तुम देखना, जट्टों के लड़के भेड़ें चराया करेंगे और अफसर बनेंगे ये लोग। कोटे, रिजर्वेशन्स…दुर लाहनत।”

”क्यों कुढ़ रहे हो, मास्टर जी ? गुरु साहिब का खंडे-बाटे का अमृत क्यों भूलते हो ?” मास्टर संतोख सिंह ने कहा था। ”मानस की जात बराबर समझने के लिए कहा है गुरुओं ने। फिर आप तो अमृतधारी…।”

”कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली।” उसकी बात का उत्तर देने के बजाय वह बुदबुदाया था। बाद में, मास्टर संतोख सिंह ने मुझे राज की एक बात बतायी, ”पढ़ाई से अधिक कोई शॉर्ट कट नहीं। इन बातों की परवाह न कर और डटकर पढ़। मैं जानता हूँ, तेरे अन्दर पढ़ने की लगन है। तू देखना, ये सारे तेरा पानी भरेंगे।”

मुझे लगता था, जैसे मैं इन बातों के बारे में पहले से ही जानता था। पता था कि मेरी जाति के खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश है। कुछ टीचरों की आँख में मैं सबसे अधिक चुभता था। कुछ लड़के मुझसे तीखी खार खाते थे। उन्होंने मेरा एक बिगड़ा हुआ नाम रखा हुआ था। इन सब विरोधों के बीच मैं अपने आप को बचाकर चलता रहा।

अब गेट पर नेमप्लेट लगी है- तेजवंत सिंह, सब डिवीजन मैजिस्ट्रेट। बाहर नई चमचमाती सरकारी जिप्सी खड़ी है। तत्पर, ड्राइवर सहित।

अर्पण कुछ बोली थी शायद। उसने ‘सर’ कहकर सम्बोधित किया था। शायद, कह रही थी, ”आपने मुझे पहचाना नहीं ?”

मेरी नज़र सहज ही उसके ढीले हुए शॉल के अन्दर चली गयी। उसने मेरी इस हरकत को ताड़ लिया। वह हल्के-से फुसफुसाई, ”गरमी महसूस हो रही है।” और शॉल उतार कर तह करने लगी। मुझे लगा, मेरी सुविधा के लिए ही उसने ऐसा किया है। मुझे अपनी जल्दबाजी पर अफसोस हुआ।

मैंने बहादुर को पुकारा, ”बहादुर !”

रसोई में से निकल बहादुर मेरे पास आ खड़ा हुआ, ”जी साहिब।”

”क्या कर रहे हो ?” मैंने पूछा।

”चाय ला रहा हूँ।” वह बोला।

”चाय सिर्फ इनके लिए लाओ एक कप, मेरे लिए नहीं। ठीक।”

”जी साहिब।” कहकर वह चला गया।

अर्पण ने शॉल तह लगाकर सोफे की बाजू पर रख लिया। कह रही थी, मुझे पहचाना नहीं? अपने गाँव के नम्बरदार सरदार तारा सिंह की अंहकारी बेटी अर्पण को कैसे नहीं पहचानता? उसका नाम भूल जाने वाली बात तो अचानक हो गयी, उसकी आवाज तो मैंने फट पहचान ली थी। मेरा बाप तो इनकी बेगारी करते-करते कुबड़ा हो गया था। शिखर दोपहरी में मैं इनकी गेहूं काटा करता था और जान निकाल लेने वाले चौमासों में धान की पौध लगाया करता था। मुझे वे सिल्वर के टेढ़े-मेढ़े बर्तन कैसे भूल सकते हैं, जो मेरे और मेरे बापू के लिए एक आले में अलग ही पड़े होते थे। उन बर्तनों में जब मैं दाल-रोटी डलवाने के लिए चौके की तरफ जाता था, तो अर्पण मेरी ओर कभी देखती तक नहीं थी। वैसे, मेरी क्लास-मेट थी वह, लेकिन कभी कोई बात मैंने उसके साथ साझी नहीं की थी। ना ही कभी ऐसी कोई इच्छा जागी थी। किसी भी लड़की में मेरी कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही थी। बस्ती की एक दो लड़कियाँ, जो मेरे से निचली कक्षा में पढ़ती थीं, कभी-कभार सवाल पूछने आ जाती थीं। उनके साथ भी मेरी बात सवाल समझाने तक ही सीमित रहती। अर्पण तो खड़ी ही दूसरे छोर पर थी। बल्ब की मरियल-सी रोशनी में देर रात तक पढ़ते रहना मेरा नियम था। आठवीं कक्षा में मैरिट में आया तो मेरा स्कॉलरशिप लग गया। उस वक्त बापू ने मुझे दिहाड़ी पर जाने से बिलकुल रोक दिया था। काम का सारा बोझ बापू के सिर पर पड़ता देख मैं उस वक्त अन्दर-ही-अन्दर दुखी हुआ था। घर की डावांडोल हालत को सुधारने का सामर्थ्य मुझमें नहीं था। लेकिन, पढ़ाई का शॉर्ट कट मुझे हौसला देता, अपनी मंजिल मुझे करीब दिखाई देती।

अर्पण नए लेडी साइकिल पर स्कूल आती थी। मेरा यह सफ़र पैदल ही तय होता। वह लड़कियों के संग करीब से गुजरती तो कोई ताना मार जाती। मैं अनसुनी करके चुपचाप अपनी राह चलता रहता। मैंने हॉकी की टीम में शामिल होने की कोशिश की, पर मास्टर दर्शन सिंह ने बड़ी चुस्ती के साथ मुझे टीम के पास नहीं फटकने दिया। सबकुछ जानते-समझते मैंने बात को मन पर नहीं लगाया था। मास्टर संतोख सिंह ने मेरी पीठ थपथपाई थी। मुझे पता था, अकेले वही मेरी ओर है, बाकी सब दूसरी ओर।

अर्पण दूसरे धड़े का आखिरी सिरा थी। मुझे देखकर नफ़रत में थूकती थी। मुझे इस बात का कभी रंज नहीं हुआ था। वह लड़कियों को उत्साहित होकर बताती थी, तेजू हमारा कामगार है, नौकर है। वह मेरी बड़ी बहन सीतो के बारे में भी ऊल-जुलूल बोलती थी। मैंने अर्पण को साइंस-रूम में मास्टर सेवा सिंह के साथ देखा था, अकेले और बिलकुल साथ सटे हुए। उस वक्त अर्पण ने शर्मिन्दगी महसूस करने के बदले मुझे धमकी दी थी, ”खबरदार, अगर किसी से कुछ कहा तो। बहुत बुरा करुँगी।”

यह कैसे हो सकता है कि मैं अर्पण को पहचान न सका होऊँ ? यह तो यूँ ही सोच का बहाव बहाकर ले गया मुझे। जीवन के रास्ते कहाँ इतने लम्बे होते हैं कि आदमी बेपहचान हो जाएे। यह तो सहज ही जख्म छिल गया। अर्पण भी उस जख्म की जिम्मेदार है। अब वह मेरे सम्मुख सहज और सीधी बनी बैठी है। वह किधर से आयी थी, यह मैं अभी तक नहीं जान सका था।

मेरी मनचली नज़र अर्पण के खुले गले में झांकने का प्रयास कर रही है। अर्पण के बैठने का अंदाज ऐसा है मानो वह मूक स्वीकृति दे रही हो। दिनभर की थकावट के बावजूद, मैं किसी संभावी मुकाबले के लिए खुद को तैयार करने लगा। उस ज़ख्म पर कोई फाहा रखने की खातिर।

बहादुर उसके सामने चाय का कप रख गया। मेरे चेहरे पर तनी कशमकश को देख वह बोली, ”शायद मेरा आना आपको अच्छा नहीं लगा।”

”नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।” मैंने कहा।

”फिर आप इतना चुप…।” वह बोली।

”आपको पता ही है शुरू से मेरी आदत। अभी भी वैसा ही हूँ। आप रीलेक्स होकर बैठो। असल में, व्यस्तता बहुत है। आपने देखा न, वो लोग आये थे, उनका भी कोई मसला था। उनके साथ भी संक्षेप में बातचीत हुई। आप चाय लो, ठंडी हो रही है।”

इस गुरुद्वारे वाले मसले ने भी अन्दर का ज़ख्म छील कर रख दिया था। मैंने स्वयं एक बार गुरुद्वारे में जाकर ऐसी ही विनती की थी, परीक्षा का हवाला देते हुए स्पीकर की आवाज कम रखने का अनुरोध किया था। लेकिन, प्रबंधकों ने दुत्कार दिया था, ”तेरी पढ़ाई ऊँची है कि गुरबाणी?” प्रबंधकों में सबसे आगे अर्पण का बाप ही था। धर्म की इतनी बड़ी दीवार से टक्कर लेना मेरे वश में नहीं था। मैं चुप हो गया था। मुझे लेबर कालोनी के लड़कों पर तरस आया। पर सही धड़े के साथ खड़ा होना इस समय मेरे लिए दुविधा वाला मसला बना हुआ था।

दूसरे धड़े के साथ खड़ी होने वाली अर्पण आज इतनी सहज क्यों है? क्यों इतनी नरम है? कौन-सी ज़रूरत इसे मेरे पास ले आयी है? बाहर अंधेरा पसर रहा है, रात उतर रही है। क्यों आयी है वह?

”आपने मन मारकर पढ़ लिया। इतनी मेहनत आप ही कर सकते थे। मेरी ओर देखो, न आगे, न पीछे।” चाय में से उठती भाप पर दृष्टि टिकाये वह बोली।

”ऐसी क्या बात हो गयी ?” मैंने उत्सुकता जाहिर की।

”शायद आपको नहीं मालूम, पिछले कुछ समय से मैं गाँव में ही रह रही हूँ। मैं और मेरी बेटी दोनों।”

”आपके हसबैंड ?”

”उसके साथ अब मेरा कोई रिश्ता नहीं। यह मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी हार है।” उसके चेहरे पर उदासी तन गयी।

”कोई केस वगैरह ?” मुझे उसके साथ हमदर्दी जाग गयी।

”केस तक की तो कोई नौबत ही नहीं पड़ी। वह तो मामला ही ठप्प हो गया।” उसने कहा। फिर, चेहरे पर से उदासी के प्रभाव को हटाकर थोड़ा मुस्कराते हुए बोली, ”आपके पास एक छोटे से काम से आयी हूँ और वह काम आपके हाथ में है।”

”बताओ, बताओ।” मैंने कहा।

”पिछले साल मेरी बेटी ने दसवीं पास की है। मैंने उसे आपके विभाग में असिसटेंट की पोस्ट के लिए अप्लाई करवाया है। यह काम आपने करना है।” कहकर उसने चाय का घूंट भरा।

”बस, इतनी सी बात। उसके पर्टीकुलर्स मुझे दे दो। यह कोई बड़ी बात नहीं।” मैंने उसे सिर से पांव तक निहारा। उसने मुस्करा कर स्वागत किया।

”थैंक्यू सर।” उसने हाथ जोड़े।

”कम से कम आप तो सर न कहो। हम क्लास-फैलो रहे हैं, और फिर एक गाँव के। एक मुद्दत के बाद मिले हैं। शायद पन्द्रह साल बाद।”

”पन्द्रह नहीं, कम से कम बीस साल बाद। अट्ठारह साल की तो मेरी बेटी हो गयी। आपके बच्चे ?”

”मेरे दो बच्चे हैं। बेटी आठवीं में है और बेटा छठी कक्षा में। दो छुट्टियाँ थीं, अपनी मम्मी से कहने लगे- रॉक गार्डन दिखा लाओ। आज ही दिन में गये हैं।” मैंने उसके चेहरे पर नज़र गड़ाई तो वह मुस्करा दी। मेरे अन्दर अजीब-सी हलचल मच गयी। आहिस्ता से उठकर मैं बैड रूम में गया और अल्मारी में रखी बोतल में से एक पैग बनाकर पी गया। नशे की मद्धिम पड़ रही तार फिर से तीखी हो उठी।

वापस आया तो वह बोली, ”बाथरूम किधर है ?”

बहादुर से मैंने कहा, ”मैडम को अन्दर वाला बाथरूम दिखा दे बहादुर।”

वह बहादुर के पीछे-पीछे चली गयी। उसकी कमर देखकर मेरे अन्दर गुदगुदी होने लगी। बाथरूम से लौटकर वह रसोई में जा घुसी और बहादुर से कुछ पूछती रही। रसोई में से बाहर आयी तो उसके चेहरे पर से संकोच-झिझक के भाव गायब हो चुके थे। मैंने बैडरूम में जाकर एक पैग और बना लिया। उसे बुलाने की खातिर पूछा, ”बुरा तो नहीं मानते ?”

”नहीं नहीं, कोई बात नहीं।” वह बोली।

फिर, थोड़ा-सा और खुलकर मैंने कहा, ”आपने स्टे तो अब यहीं करना है, चाहो तो चेंज वगैरह कर लो। मेरी पत्नी का कोई सूट पहन लो। फिर बैठते हैं रीलेक्स होकर।”

”कोई बात नहीं, सोते समय कर लूँगी।” उसने अपना इरादा स्पष्ट कर दिया।

दो पैग और पीने के बाद मेरी नज़र डोलने लगी थी। वह मैगजीन होल्डर में से पत्रिकायें निकाल कर उलटती-पलटती रही। नज़र मिलती तो मुस्करा देती। डायनिंग टेबल पर खाना खाते समय छोटी-मोटी बातें हुईं। रसोई संभाल कर बहादुर अपने कमरे में चला गया। ड्राइवर को मैंने यह कहकर भेज दिया कि सवेरे जल्दी आ जाए। अर्पण ने मेरी पत्नी की मैक्सी पहन ली। मैंने देखा, उसके शरीर में कशिश बरकरार थी। बेकाबू होती सोच का कांटा बदल कर मैंने कहा, ”बेटी के फार्म वगैरह मुझे दे दो आप।”

वह टेबल के नीचे से फाइल उठा लाई। एक बार उसकी छातियों को नज़र से टटोलते हुए मैंने फाइल ले ली।

”अनुरीत कौर…” मैंने उसके चेहरे की ओर देखा, ”मेरी बेटी का नाम भी अनुरीत ही है। इधर देखो…।” मैंने सामने लगी अपनी बेटी की तस्वीर की ओर इशारा किया। स्कूल में कविता-पाठ के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर रही थी वह। अर्पण ने तस्वीर के करीब जाकर देखा और बोली, ”बहुत प्यारी है आपकी बेटी। आपके जैसी इंटेलीजेंट होगी।” वह मुस्कराई। पता नहीं कैसी मुस्कराहट थी यह ? बिलकुल उसी तरह जिस तरह मेरे दफ्तर का स्टाफ ‘जी हुजूर, ठीक है साहब, आपने ठीक फरमाया सर’ कहकर मुस्कराता है। मेरी गलत बात का भी समर्थन कर देता है। दूसरे धड़े के अन्तिम सिरे पर खड़ी अर्पण कुछ इसी तरह ही मेरे इतना करीब आ खड़ी हुई है। मेरी बीवी की मैक्सी पहने, मेरे से इतनी दूर जिसे हम फासला नहीं कहते। मैं अर्पण के चेहरे की ओर देख रहा था। नशे के स्थान पर पीड़ा का एक तीखा अहसास मेरे अन्दर जाग रहा था। अर्पण मेरी बड़ी बहन मीतो का नाम अपने चाचा के साथ जोड़कर मजा लिया करती थी और मुझे ग्लानि के गहरे खड्ड में धकेल दिया करती थी। उस वक्त, कई बार मन करता था कि कोई ऐसा हथियार हो, जिससे मैं चीर कर रख दूँ ऐसे लोगों को।

दूसरी दीवार पर मेरे बेटे विकासबीर की तस्वीर थी। कंधे पर बैट रखे, खिलाड़ियों वाली टोपी पहने। मुझसे कहता है, ‘पापा, मुझे क्रिकटर बनना है।’ मेरे जेहन में मास्टर दर्शन सिंह का चेहरा घूम जाता है। मैं बेटे को उत्साहित करता हूँ, यह जानते हुए भी कि मास्टर दर्शन सिंह जैसे लोग हर जगह मौजूद हैं।

दारू का असर कम होने लगा है। मैंने फाइल बन्द करके अल्मारी में रख दी। सामने दारू की आधी बोतल पड़ी थी। मन हुआ, नीट ही पी जाऊँ और दिल पर पड़ रहे अनचाहे बोझ से मुक्त हो जाऊँ। मैंने हुक्म की प्रतीक्षा में खड़ी अर्पण की ओर देखा। मेरे एक इशारे पर बिलकुल तैयार थी वह। वह जो दूसरे धड़े का आखिरी सिरा था, अचानक टूट कर सामने आ गिरा था।

मैंने उसे कहा, ”आओ, आपको बैडरूम दिखा दूँ।”

सामने वाले कमरे तक छोड़कर मैं वापस आ गया और आते ही बैड पर ढह गया। और दारू पीने का ख्याल छोड़, मैंने स्वयं को पल-पल फैलती जाती सोच के हवाले कर दिया।

अकेलापन, बेगानी औरत, ज़ख्म का अहसास और कई घंटों तक फैली रात…

मेरे से अर्पण तक सिर्फ तीन कदमों का फासला था, बस… दोनों बैडरूम के दरवाजे चौपट खुले थे। मेरी चेतना में फंसा कोई कांटा मुझे बेचैन कर रहा था। तीन कदमों का फासला एकाएक फैलने लगा था। मुझे लग रहा था, यह फासला मुझसे तय नहीं हो सकेगा। और यह रात… यह रात इसी तरह गुजर जाने वाली थी।