आलोचक अज्ञेय की उपस्थिति – कृष्णदत्त पालीवाल

अज्ञेय के आलोचना कर्म की गहराई और व्यापकता पर एकाग्रता से मन को केंद्रित करने की आवश्यकता है, जबकि उनके इस पक्ष की हिंदी आलोचना में घोर उपेक्षा की गई है। प्रायः उनके चिंतन को पश्चिम की घटिया नकल कहकर खारिज कर दिया जाता रहा है। मार्क्सवादी आलोचना - अंधा अधिनायकवादी चक्र अज्ञेय को अमेरिकी... Continue Reading →

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शमशेर : कौतुक से अधिक – शंभुनाथ

एक समय आधुनिक बुद्धिजीवी होने का अर्थ था मार्मिक हीरो होना, जो बुद्धि का रथ पूरी ताकत से गंतव्य की ओर ले जाने की कोशिश करते हुए भी अंतत: विफल होता है। शमशेर आधुनिकता की ट्रेजेडी के शिकार एक ऐसे ही हीरो थे, 'मैं स्पष्ट देख सकने की स्थिति में हूँ कि वह हीरो मैं... Continue Reading →

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