है नमन उनको, कि जो यश-काय को अमरत्व देकर – कुमार विश्वास

है नमन उनको कि जो देह को अमरत्व देकर इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं  है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय  जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये हैं  पिता जिनके रक्त ने उज्जवल किया कुलवंश माथा  मां वही जो दूध से इस देश की रज तौल आई  बहन जिसने सावनों में हर लिया पतझर स्वयं ही  … पढ़ना जारी रखें है नमन उनको, कि जो यश-काय को अमरत्व देकर – कुमार विश्वास

देह की अनन्त यात्रा

ये जो काले रंग का कुर्ता है उसे कभी फेंकती नहीं मैं न तो किसी को देती हूँ। ये भी एक माध्यम है मेरी देह की अनन्त यात्रा को मापने के लिए। जो कभी शंकु हुआ करता था ये कुर्ता सी समय से आधार है, तय करने को मेरी देह रचना जो अब शंकु से दीर्घाकार हो चली है। देह अपनी रचना बदलती है। मन … पढ़ना जारी रखें देह की अनन्त यात्रा

karwa chauth kaise karen_literature in india

करवाचौथ विशेष : शिकायत चाँद से

कहाँ गया है चाँद हमारा आज प्रिये की पूजा है । कब तक ऐसे छुपा रहेगा बिना तेरे न दूजा है । भूख प्यास से व्याकुल है वो कुछ तो उसका ख्याल करो । जल्दी से आ जाओ प्यारे उसको न बेहाल करो । मांग भरे वो कब से बैठी बस तेरा इंतजार करे । क्यों इतना तरसाता इनको तुझको इतना प्यार करे । थाल … पढ़ना जारी रखें करवाचौथ विशेष : शिकायत चाँद से

Khilaune wala_Subhadra Kumari Chauhan_Literature in India

खिलौनेवाला – सुभद्रा कुमारी चौहान

वह देखो माँ आज खिलौनेवाला फिर से आया है। कई तरह के सुंदर-सुंदर नए खिलौने लाया है। हरा-हरा तोता पिंजड़े में गेंद एक पैसे वाली छोटी सी मोटर गाड़ी है सर-सर-सर चलने वाली। सीटी भी है कई तरह की कई तरह के सुंदर खेल चाभी भर देने से भक-भक करती चलने वाली रेल। गुड़िया भी है बहुत भली-सी पहने कानों में बाली छोटा-सा \\\’टी सेट\\\’ … पढ़ना जारी रखें खिलौनेवाला – सुभद्रा कुमारी चौहान

Rakshabandhan_The_colors_of_the_literature_in_India_जीवन चंद्र परगाॅई सितारगंज (उधम सिंह नगर)

आज राखी के महापर्व-त्यौहार

है दिन आज राखी के महापर्व-त्यौहार का । यह पर्व नहीं महाउत्सव है भाई-बहन के प्यार का ।। तुम आज ना मांगो मुझसे कोई रक्षा का वचन । तुम्हारी हर खुशी के लिए समर्पित है मेरा तन मन ।। लेकिन तुम कोई अबला नारी नहीं इस युग में । तुमसे ही तो क्रांति के दीप जले हर इक युग में ।। जो आज मैं तुमको … पढ़ना जारी रखें आज राखी के महापर्व-त्यौहार

उठो प्रतिभावान स्वर उठो

सुलग रहे अदम्य मन का ज्वाला है घुल रहे असंख्य प्रवीणता का हवाला है बिना घिसे चमक क्या आई है चमकहीन  सभ्यता हमने लाई है प्रेरणा नहीं उनमें, मैं प्रतिशतता भरते जाऊ बिना जले बाती में, मै प्रकाश कहाँ से लाऊ विरले बिना स्वृण के, चमके होगें संकेतन दीप जगत में, जहाँ दमके होगें भूले सार तन खंगाल उठो विकट संकट सवाल उठो सममूल्यता उर … पढ़ना जारी रखें उठो प्रतिभावान स्वर उठो

स्वतंत्रता – अजय वर्मा

अलगाव के बहुत अहसास है धर्म की आड़ है पंथों के दर्शन है मान्यताओं के भेद है वादों के सिद्धांत हैं अलगाव के बहुत अहसास है उम्र के बंधन है रिश्तो के नाम है साधनों के जश्न हैं अभावों के दर्द हैं अलगाव के बहुत अहसास है आस पाने की है डर खोने का है हकों की मांग है हितों का सवाल है अलगाव के … पढ़ना जारी रखें स्वतंत्रता – अजय वर्मा

क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

  क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? आज नहीं क्या हो सकता जो कल होता, सच्चा प्रयत्न  नहीं   कभी   विफल होता, क्या एकता में ही केवल बल होता? क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? बौने बामन ने अकेले राजा बलि को बांधा था, तीन पग में नभ, महि और स्वर्ग तक को लांघा था। एक अकेले विप्र ने क्षत्रिय हीन जग था किया, हाथ में … पढ़ना जारी रखें क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

रेडिकल होना जूझना है वस्तुस्थिति के विपरीत पेंडुलम होना भी है आधुनिकता और परम्परा के बीच। न तो पूर्णतः सम्मानित और न ही नकारने योग्य हम रेडिकल संतानें दुनियां से लड़ते-लड़ते खुद ही हो जाते हैं संक्रमित क्योंकि हमारे वाद को न कोई पचा पाता है न ही ठुकरा पाता है। हमारे तर्कपूर्ण विचार सामने वाले को करता है निरुत्तर तब स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर … पढ़ना जारी रखें हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

Dekho to Shabdo me| Literature in India

देखो तो शब्दों में – मीनाक्षी वशिष्ठ

देखो तो शब्दों में कितना जादू है! मेरे शब्द मुझे उस लोक में ले आये हैं   जहाँ सब सुन्दर हैं! यहाँ हर और बिखरते रुप, रंग, रस, राग के झरने यहाँ हर पल उत्सव है दुख की तो परछाई भी नहीं जीवन फूट-फूट पड़ता है । देखो तो शब्दों में कितना जादू है! मैं जब लिखती हूं ‘प्रेम’ रोम-रोम पुलकित हो उठता है मैं … पढ़ना जारी रखें देखो तो शब्दों में – मीनाक्षी वशिष्ठ

Sankalp Poem- Mukesh Negi

संकल्प – मुकेश नेगी

कर पूर्ण उन्हें संकल्प जो तेरा तेरे पग न रुके हो घोर अंधेरा अब दरी नही मंज़िल है सामने ख़त्म हुआ अब वक्त़ ये तेरा। इन राहों में हजार हो उलझन साँस थमे तेरी तेज हो धड़कन न घबराना देख इन्हें तू अभी है आगे और भी दलदल।   रुकने न दे अपने ये कदम लगाले जितना तुझमें है दम कर साकार वो सपना जिसमें … पढ़ना जारी रखें संकल्प – मुकेश नेगी

Darwaje aur Khidkiyan - Minakshi Vashisth

दरवाजे और खिड़कियाँ – मीनाक्षी वशिष्ठ

बागों के पहरेदार से होते दरवाजे और कलियों सी नाजुक होतीं खिड़कियाँ कितना भी मन को बहलाएँ कितना भी सुख-दुःख बांटे दरवाजों सी समझदार कभी बन नही पातीं खिड़कियाँ ! हर मौसम में अविचल रहते दरवाजे इक झोके से सिहर उठती खिड़कियाँ ये खुल जाती हैं मौसम में चुपके-चुपके पुरवाई में महक उठती  खिड़कियाँ! बंधन में जकड़े रहते जब दरवाजे किरणों के स्वागत में खुलती … पढ़ना जारी रखें दरवाजे और खिड़कियाँ – मीनाक्षी वशिष्ठ

पेड़ की आत्‍मा - Jagdish Sharma Sahaj

पेड़ की आत्‍मा – जगदीश शर्मा सहज

मैं नश्वर था पर तुम्हारे हाथों मृत्यु का अधिकारी नहीं मैं बूढ़ा अवश्य था पर जनजीवन का अपकारी नहीं   मैं जब बच्चा था तुम पैदा ही नहीं हुए थे धरती पर न यह भीड़भाड़ थी, न शोर था, जीवन था प्रगति पर     मैं मौन रहकर तुम्हें देखता था निस्तब्ध सा खड़ा था शीतल छाया देने को तुम्हें प्रचंड सूर्य से भी लड़ा … पढ़ना जारी रखें पेड़ की आत्‍मा – जगदीश शर्मा सहज

उम्मीद – अरुण कमल

आज तक मैं यह समझ नहीं पाया 
कि हर साल बाढ़ में पड़ने के बाद भी 
लोग दियारा छोड़कर कोई दूसरी जगह क्यों नहीं जाते ?  पढ़ना जारी रखें उम्मीद – अरुण कमल

मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…

पलकों के पालने में सजा है एक सपना, जब मैं जागती तो वो भी जागता, जब मैं सोती तो भी वो जागता ।     एक दिन पूछा मैंने उसको – नींद नहीं आती तुमको ? तो कहा सपने ने मुस्कुराते हुए ,  कौन आता है रोज़ तुम्हे उठाने के लिए ! तू जब भी है सोती , मेरे ही बीज बोती। और जब जागती , तो … पढ़ना जारी रखें मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की -केदारनाथ सिंह

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की, उड़ने लगी बुझे खेतों से झुर-झुर सरसों की रंगीनी, धूसर धूप हुई मन पर ज्यों — सुधियों की चादर अनबीनी, दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की । साँस रोक कर खड़े हो गए लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन, चिलबिल की नंगी बाँहों में — भरने लगा एक खोयापन, बड़ी हो गई कटु … पढ़ना जारी रखें झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की -केदारनाथ सिंह

जीवनसंगिनी – मनीष कुमार

संग संग चलो मेरी जीवनसंगनी रुको नहीं थको नहीं ओ मेरी हृदयनयनी अपलक नयनों के तार जुड़े हैं तेरे मेरे सांसों को बेजार मत करो मृगनयनी संग संग चलो मेरी जीवनसंगनी आसमान की ऊंचाई से , जीवन की गहराई तक धूपो की अगुवाई से , रात्रि की विदाई तक स्वप्नों की अनुभूति से, हकीकत की सच्चाई तक फूलों की पंखुिड़यों से, काँटों  की चुभन तक … पढ़ना जारी रखें जीवनसंगिनी – मनीष कुमार

मनीष कुमार, रांची, झारखण्ड

सबका साथ

सबका साथ सबका हाथ मिलकर बनाएंगे एक नया इतिहास कोई वर्ग न छूटे कोई धर्म के नाम पर न लूटे जीवन की हर सांस पर क़दमों के हर ताल पर सुनेगे और सुनायेंगे हर बात पर जोर लगाएंगे पीछे मुड़कर न आयेंगे मिलकर माशल जलाएंगे एक अनुपम भारत बनाएंगे जहां प्रगति धारा की होगी प्रवाह हर निश्चल मानस का होगा प्रवास न धर्म होगा न … पढ़ना जारी रखें सबका साथ

प्रदूषण

आँख में चुभ रहा, आज प्रतिक्षण यहाँ जान लेकर रहेगा प्रदूषण यहाँ ! रोज बढ़ता हुआ वाहनों का धुआँ वायु में घुल रहा जहर भीषण यहाँ ! उजड़ते वन यहाँ जानता है ख़ुदा चीड़ का हो रहा रोज खण्डन यहाँ ! परत ओज़ोन का तीव्र अवक्षय यहाँ ऊष्मा लाँघता व्योम घर्षण यहाँ ! कोल की कालिमा उगलती चिमनियाँ नित्य बढ़ता हुआ उत्सर्जन यहाँ ! जानते … पढ़ना जारी रखें प्रदूषण

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा। मेरी ख्वाबों की दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।। भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है। यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।। खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है। इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।। उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई। मेरा खत फाड़कर के वो … पढ़ना जारी रखें किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा