मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें

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मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
यूं पेड़ों की औट में छुपकर सोते हुए
जागती आंखों से ताकते मानुष
और छदम भूख् में उजड़े उदास चेहरों पर उभरी विभत्स झुर्रियों से डरकर,मैनें देखा है बुद्ध तुम्हें
यूं नदियों में डूबते हुए जलमग्न
कांपते हुए थर्राते हुए,
दिव्यस्वप्न की आस्था लिए मज़बूर गुर्राते
परातें लिए इमारतों से गिरते
सड़क किनारे परांठे सेकते
चाय की चुस्कियों संगे बतियाते
घूंघट पर्दों दीवारों की ओट में खिसियाते
निरंकुश राजा की जूतियों में पैबंद जड़ते
इंसान के रंग को पसीने में घुलते देख नहीं सके तुम,
कोषों दूर विलाप था
विलासिता थी
हठधर्म था
तुम बेबस लाचार हो कूद गए समंदर में
जरा, मरण, दुखों से मुक्ति की आस लिए
दिव्य ज्ञान खोजते भटकते रहे रातों रातों
चिपक गए पहाड़ों से
लिपट गए पेड़ों , चट्टानों से बुत बनकर ।

मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
त्यागते यशोधरा का प्रेम
तजते पुत्र , मातृ , पित्र मोह का धर्म

मैंने देखा तुम्हें
प्रबुद्ध साम्राज्य अधिपति होकर जोगी होते हुए
जोगी से कुशीनगर का पुनर्जन्म
पुनर्जन्म से गौतम होकर सिद्धार्थ होते हुए
सिद्धार्थ से होकर मगध की यात्रा करते
मगध से लुम्बिनी में लीन होते हुए
मेने देखा है बुद्ध तुम्हें
शांत अविचिलत होकर
बौद्धि व्रक्ष में समाते हुए
आसन लगाते हुए

मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
आंसू पोंछते हुए मगर आंसू बहाते हुए
अनन्त से अंतर्ध्यान की और लौटते हुए
अंतर्ध्यान से अनन्त की और जाते हुए
मैनें देखा है तुम्हें ।।

Shaktoi_Baraith
शक्ति बारैठ पेशे से डिजिटल मार्केटिंग एक्सपर्ट हैं. थिएटर और लेखन इनके जीवन की नब्ज़ हैं। इतिहास में चारण कलम ने हमेशा डंका बजाया है और उसी क्रम में एक और कलम शक्ति बरेठ की। स्क्रिप्ट से लेकर लीरिक्स तक और हिंदी कविता से लेकर उर्दू ग़ज़ल तक इनकी स्याही ने वाह वाही बटोरी है. हाल के दिनों में स्लम एरिया, कच्ची बस्ती के बच्चों और एक शहर से दूर वृद्धाश्रम में रंगमंच के माध्यम से मुस्कान बिखेर रहे हैं |

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हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…

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हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…
हर विकट-प्रसंग में,
एक-दूसरे के आसंग में,
संग-संग में,
दुनिया की पासंग में,
संगम सा हम साथ बहेंगे…

हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…
मुझे पता था,
लोग मुझे भंडर कहेंगे
मुझे दुःख नहीं इस बात का
क्योंकि आस थी मुझे,
कि आप मुझे अपना कहेंगे…

हमने सोचा था, हम साथ रहेंगे…
एक मंजुल पे,
एक वंजुल के,
छाँव में,
उस छाया की तरह
परिरंभण रूप दिखेंगे…
हमने सोचा था,
हम साथ-साथ
एक आसनी पे
अपनी जीवनी लिखेंगे…

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हिमांशु सिंह ‘वैरागी’

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कली – अशोक सिंह

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एक कली मुरझाई सी जैसे विपदा से घिरी हुई।
हिलना डुलना सब छोड़ दिया बस डाल सहारे पड़ी हुई‍।

मैं देख चकित रह गया इसे यह भी तो एक नादानी है।
क्यों जीवन लीला छोड़ कर ये मरने के लिए ही ठानी है।

मैं रह न सका और पूछ दिया आखिर क्या तुझे परशानी है।
क्यूं तेरे जैसी प्यारी कली जीवन से हार यूँ मानी है।

वो सहमी सी पर बोल उठी मैं प्यास के मारे मरती हूँ।
दो बूँद मुझे पिलादे तू मैं तुझसे निवेदन करती हूँ।

यह सुन कर मैं स्तब्ध-सा था क्या ऐसा जमाना होता है।
कोई जल का यूं अपमान करे कोई प्यास के मारे रोता है।

देख दशा इस प्यारी कली की आखों से अश्रु प्रवाह हुआ।
न जाने इस अंधे समाज मे मेरा क्यूं अवतार हुआ।

मेरे असुओं की पीङा ने उस रूठी कली को खिला दिया।
वह कली ही मेरी दोस्त बनी बाकी को मैनें भुला दिया॥

 

Ashok_Singh_Azamgarh

अशोक सिंह
आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

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उधार – अज्ञेय

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सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।

मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार
चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी?
मैनें घास की पत्ती से पूछा: तनिक हरियाली दोगी—
तिनके की नोक-भर?
शंखपुष्पी से पूछा: उजास दोगी—
किरण की ओक-भर?
मैने हवा से मांगा: थोड़ा खुलापन—बस एक प्रश्वास,
लहर से: एक रोम की सिहरन-भर उल्लास।
मैने आकाश से मांगी
आँख की झपकी-भर असीमता—उधार।

सब से उधार मांगा, सब ने दिया ।
यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन—
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का:
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।

रात के अकेले अन्धकार में
सामने से जागा जिस में
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझ से पूछा था: “क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के
इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे—उधार—जिसे मैं
सौ-गुने सूद के साथ लौटाऊँगा—
और वह भी सौ-सौ बार गिन के—
जब-जब मैं आऊँगा?”
मैने कहा: प्यार? उधार?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार ।
उस अनदेखे अरूप ने कहा: “हाँ,
क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं—
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त अनुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह व्यथा,
यह अन्धकार में जाग कर सहसा पहचानना
कि जो मेरा है वही ममेतर है
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो—उधार—इस एक बार—
मुझे जो चरम आवश्यकता है।

उस ने यह कहा,
पर रात के घुप अंधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूँ:
अनदेखे अरूप को
उधार देते मैं डरता हूँ:
क्या जाने
यह याचक कौन है?

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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ब्रह्म मुहूर्त : स्वस्ति वाचन – अज्ञेय

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जियो उस प्यार में
जो मैंने तुम्हें दिया है
उस दुख में नहीं जिसे
बेझिझक मैंने पिया है।
उस गान में जियो
जो मैंने तुम्हें सुनाया है
उस आह में नहीं जिसे
मै ने तुम से छिपाया है।
उस द्वार से गुज़रो
जो मैं ने तुम्हारे लिये खोला है
उस अंधकार के लिये नहीं
जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की
भावना से टटोला है।
वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ बुनूँगा
वे कांटे गोखरू तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ चुनूँगा।
वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे लिये बनाता हूँ बनाता रहूँगा
मैं जो रोड़ा हूँ उसे हथौड़े से तोड़ तोड़
मैं जो कारीगर हूँ करीने से
सँवारता सजाता हूँ सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुंचाने का
उदार उद्यम ही मेरा हो
फिर वहां जो लहर हो तारा हो
सोन तरी हो अरुण सवेरा हो
वह सब ओ मेरे वर्य!
तुम्हारा हो तुम्हारा हो तुम्हारा हो।

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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चाँदनी जी लो – अज्ञेय

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शरद चाँदनी
बरसी
अंजुरी भर कर पी लो

ऊँघ रहे हैं तारे
सिहरी सिरसी
ओ प्रिय कुमुद ताकते
अनझिप
क्षण में
तुम भी जी लो!

सींच रही है ओस
हमारे गाने
घने कुहासे में
झिपते
चेहरे पहचाने

खम्भों पर बत्तियाँ
खड़ी हैं सीठी
ठिठक गये हैं मानो
पल-छिन
आने-जाने
उठी ललक
हिय उमगा
अनकही
अलसानी
जगी लालसा
मीठी,
खड़े रहो ढिंग
गहो हाथ
पाहुन मम भाने,
ओ प्रिय रहो साथ
भर भर कर अंजुरी
पी लो

बरसी
शरद चाँदनी
मेरा
अंत:स्पन्दन
तुम भी क्षण क्षण जी लो!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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गाँव – धीरज राणा भायला

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वो पगडंडी
तालाब किनारे की
वे शाम धुँधल की
गाँव चौबारे की।

जहाँ शर्म हया
पर्दे की शोभा थी
अब याद कहाँ
दीवारें
वे मिट्टी और गारे की।

रोटी थी
और मक्खन था
और छाछ का लोटा था।

नहीं भेदभाव था
धन-दौलत का
न प्रेम का टोटा था।

जल और हवा
और मिट्टी भी
तब आवाज़
पुकारे थी।

वो पगडंडी
तालाब किनारे की।

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कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं

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उसकी देह का श्रृंगार लिखूँ या अपनी हथेली का अंगार लिखूँ मैं
साँसों का थमना लिखूँ या धड़कन की रफ़्तार लिखूँ मैं
जिस्मों का मिलना लिखूँ या रूहों की पुकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं…………….

उसके अधरों का चुंबन लिखूँ या अपने होठों का कंपन लिखूँ मैं
जुदाई का आलम लिखूँ या मदहोशी में तन मन लिखूँ मैं
बेताबी, बेचैनी, बेकरारी, बेखुदी, बेहोशी, ख़ामोशी…………
कैसे चंद लफ़्ज़ों में इस दिल की सारी तड़पन लिखूँ मैं

इज़हार लिखूँ, इकरार लिखूँ, एतबार लिखूँ, इनकार लिखूँ मैं
कुछ नए अर्थों में पीर पुरानी हर बार लिखूँ मैं
इस दिल का उस दिल पर, उस दिल का किस दिल पर
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं…….

Dinesh Gupta ‘Din’

असलियत मैं भी जानती हूँ…… और तुम भी

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उदास रात

रात का हर पहर ढल गया
चाँद खिड़की से आगे निकल गया
ख्वाबों का माला बिखर गया
और मनका नैनों से फिसल गया।।
नसीब की चादर क्यों झीनी है
मेहनत की सुगंध भीनी-भीनी है
कोई रफ्फू का हुनर सिखा दे
हमें मुकद्दर की झोली सीनी है।।
औरों के जख्मों को मरहम दिया हमने
बेपनाह हमदर्दी और खैरमकदम किया हमने
हमारा ही ज़ख्म नासूर बन गया तो क्या
हर दफ़ा ही तो उसे नज़र अंदाज किया हमने।।
इंसानियत के मुल्क में बाजार ऐसा हो
आह सबकी बिके मुस्कान पैसा हो
चोरियां दिल की हों हर रोज जहाँ
खैरियत फिर भी पहरा दे हर शाम ऐसा हो।।
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उस पार की असलियत

मर्यादाएं मैं भी जानती हूँ और तुम भी…………
अधिकार मैं भी जानती हूँ और तुम भी।।
हया का एक झीना सा पर्दा है बीच में……….
वरना उस पार की असलियत मैं भी जानती हूँ…… और तुम भी।।
क्या खूब साझेदारी है हमारी।
तुम्हारे लिए पूरा घर खुशियों का बिछौना मेरे दर्द के लिए कमरे का कोना
तुम्हारी फरमाइशें पापा की ख्वाहिशें
मेरी जरूरतें हिदायत भरी सूरतें
कुछ खोखले रिवाजों को बो दिया था फलक में किसी ने बाअदब निभाये जा रही हूँ……..
ये मैं भी जानती हूँ……. और तुम भी।।
दीक्षा धनक
दीक्षा धनक
पिता का नाम- अनिल कुमार केशरवानी
माता का नाम- सीता देवी
रूचि- हिंदी लेख, कवितायेँ, गजल, कहानियां आदि।
शिक्षा- ग्रेजुएशन (महामाया राजकीय महाविद्यालय कौशाम्बी सम्बद्ध- कानपुर विश्वविद्यालय)

एक ऐसा चेहरा

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हल्की सी शर्म, हल्की सी नज़ाकत हो

एक अजब सा एहसास, एक गज़ब सी चाहत हो

थोड़ी सी नरमी, थोड़ी सी गर्माहट हो

हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें खो जाने की राहत हो

ज़रा सी बेचैनी, ज़रा सी घबराहट हो

न कोई साज़िश, न कोई बनावट हो

ज़रा सी हंसी, ज़रा सी मुस्कराहट हो

हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें छा जाने की ताक़त हो

हो वो नज़र जिसमें, झुक जाने की आदत हो

हो वो दो होंठ, जिसमें सरसराहट हो

हो वो दो दिल, जिसमें धड़कने की ख्वाहिश हो

हो एक ऐसा चेहरा, जिसमे बस जाने की चाहत हो

शिल्पी सेंगर

(यह कविता लिटरेचर इन इंडिया के नव रचनाकार प्रोत्साहन कार्यक्रम के अंतर्गत प्रकाशित की गयी है)

ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

Ye jo Mar Mar ke -Shailja Pathak.jpg

एक बार में जरा सा काम करना और धप्प्प से बैठ जाना
फिर उठना और थोडा और काम करना
फिर बैठ लेना लम्बी लम्बी सांस
पसीने से तर ब्लाउज का आखिरी हूक खोलना और कहना
जैसे चल नही रही सांस
कि और सांस लेने को नही बची ताकत
माटी हो गई देह को गरियाना

कि यही हाथ से कैसे दस किलो आलू का पापड़ बना देती थी ठीक दुपहरिया में
जब सो रहे होते थे सब
शाम चूल्हा जलने से पहले अपनी पांच मीटर साडी का पापड़ मजे से तहाती रख देती थी कोने के स्टूल पर
पापड़ अचार बड़ी के काम को कभी काम में नही किया गया दर्ज
कि ये तो शगल है दोपहर काटने का

बाद दिनों खाना पकाना के मध्य किया गया सारा ही काम शगल में शामिल हुआ
स्वेटर सिलाई बुनाई
जब तमाम बीमारिया घात लगा रही हैं
ये हैं की काम के पीछे मरी जा रही हैं
फरमाइशी चटनी पर घिसटती सी तोड़ने लगती हैं धनिया
अपराध बोध से भरी बताती है
नहीं बना पाई कुछ ज्यादा
आज खा लो ऐसे ही कुछ सादा

हम इनके थकने पर सवाल नही करते
इनकी तेज फूलती सांस का मलाल नही करते
पखुरा से उतर कर दर्द पीठ पर फ़ैल गया है इनके
ये बताती कम छुपाती ज्यादा हैं
ये डरती हैं कि ये बीमार हो रही हैं
इन्हें घर में काम के लिए होना था
ये जो रुक रुक के काम कर रही हैं
ये जो झुक झुक के बुहार रही है आँगन
ये जो तीन सीढ़ी चढ़ लेती हैं लम्बी लम्बी सांस

घर की औरतें थक कर बीमार हो रही हैं
इन्हें चाहिए वाजिब इलाज
इन्हें चाहिए प्यार भरी आवाज
ये रंगीन साडी पर सूखे पापड़ सी चरमरा जाएँगी
बाद हरी चटनी का जिक्र सुनते
ये कमबख्त
खुद के ही दर्द को सील पर पीस लाएंगी
ये काम पर लगाई गई हैं
काम छोड़ कहीं नही जाएँगी

एक बार में नही कर सकती क्या पूरा काम क्या बिच बिच में पसर जाती हो कमाल की औरत हो
एक जरा से घर का काम करने में इतना वक्त्त लगाती हो

सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

Chirag Jain Poem - Suraj aya Do Pal Batiyane

दिन भर आग बबूला होकर
अहंकार का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से
शीतलता पाने

मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया किस्मत की देहरी
दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने

भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया
जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने

चंदा डूबा दूर हो गया
मैं अम्बर का नूर हो गया
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हो गया
ढलते की सुधि छोड़ चले सब
उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने

 चिराग़ जैन

Jab se guzra hoon un raaton se

जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

Jab se Guzra Hoon un raaton se

वह औरत जो सुहागिन
बनी रहने के लिए
करती है लाख जतन
टोना-टोटका से मन्दिर में पूजा तक
अपने पति से कह रही है —
तुम कारगिल में काम आए होते तो
पन्द्रह लाख मिलते
अब मैं तुम्हारा क्या करूँ
जीते जी तुम
मकान नहीं बना सकते ।

कह रहे हैं हमदर्द
साठ साल के पिता की बीमारी के बाद
वे चले गए होते तो
अच्छा होता, उनकी जगह
उनका बेटा लग जाता ।

बैरागी का वह हुनरवान लड़का
जो चारों में अव्वल है
बाप से लड़ रहा है
मैं तुम्हारे यहाँ क्यों पैदा हुआ ।

कालेज में एडमीशन के समय
कैटेगरी पूछे जाने पर
एक लड़की दे रही है जवाब
मैं उस जाति से हूँ
जिसे अब कोई नहीं पूछता ।

मित्रों जब से गुज़रा हूँ इन बातों से
तब से लगता है मेरी कनपटी पर
एक कील गड़ी है
आपको भी गड़े इसके पहले
कोई उपाय सुझाइए
जल्दी कीजिए
दर्द बेतहाशा बढ़ता जा रहा है ।

Anil Tripathi

अनिल त्रिपाठी

Mahatma Gandhi

बापू – रामधारी सिंह दिनकर

Mahatma Gandhi

संसार पूजता जिन्हें तिलक,
रोली, फूलों के हारों से,
मैं उन्हें पूजता आया हूँ
बापू ! अब तक अंगारों से।

अंगार, विभूषण यह उनका
विद्युत पीकर जो आते हैं,
ऊँघती शिखाओं की लौ में
चेतना नयी भर जाते हैं।

उनका किरीट, जो कुहा-भंग
करके प्रचण्ड हुंकारों से,
रोशनी छिटकती है जग में
जिनके शोणित की धारों से।

झेलते वह्नि के वारों को
जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर,
सहते ही नहीं, दिया करते
विष का प्रचण्ड विष से उत्तर।

अंगार हार उनका, जिनकी
सुन हाँक समय रुक जाता है,
आदेश जिधर का देते हैं,
इतिहास उधर झुक जाता है।

Ramdhari Singh Dinkar

रामधारी सिंह दिनकर

Sad

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

Alone

सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

Harivansh Roy Bachchan

Harivansh Roy Bachchan

Yamraj

प्रेत का बयान – नागार्जुन

Pret ka Bayan - Yamraj

“ओ रे प्रेत -”
कडककर बोले नरक के मालिक यमराज
-“सच – सच बतला !
कैसे मरा तू ?
भूख से , अकाल से ?
बुखार कालाजार से ?
पेचिस बदहजमी , प्लेग महामारी से ?
कैसे मरा तू , सच -सच बतला !”
खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़
काँपा कुछ हाड़ों का मानवीय ढाँचा
नचाकर लंबे चमचों – सा पंचगुरा हाथ
रूखी – पतली किट – किट आवाज़ में
प्रेत ने जवाब दिया –

” महाराज !
सच – सच कहूँगा
झूठ नहीं बोलूँगा
नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के
पूर्णिया जिला है , सूबा बिहार के सिवान पर
थाना धमदाहा ,बस्ती रुपउली
जाति का कायस्थ
उमर कुछ अधिक पचपन साल की
पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था
-“किन्तु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका
ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको
सावधान महाराज ,
नाम नहीं लीजिएगा
हमारे समक्ष फिर कभी भूख का !!”

निकल गया भाप आवेग का
तदनंतर शांत – स्तंभित स्वर में प्रेत बोला –
“जहाँ तक मेरा अपना सम्बन्ध है
सुनिए महाराज ,
तनिक भी पीर नहीं
दुःख नहीं , दुविधा नहीं
सरलतापूर्वक निकले थे प्राण
सह न सकी आँत जब पेचिश का हमला ..”

सुनकर दहाड़
स्वाधीन भारतीय प्राइमरी स्कूल के
भुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षक प्रेत की
रह गए निरूत्तर
महामहिम नर्केश्वर |

Nagarjun

Nagarjun

Love Poem

दोनों ओर प्रेम पलता है – मैथिलीशरण गुप्त

Love Couple

दोनों ओर प्रेम पलता है।
सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है!

सीस हिलाकर दीपक कहता–
’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’
पर पतंग पड़ कर ही रहता
कितनी विह्वलता है!
दोनों ओर प्रेम पलता है।
बचकर हाय! पतंग मरे क्या?
प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?
जले नही तो मरा करे क्या?
क्या यह असफलता है!
दोनों ओर प्रेम पलता है।
कहता है पतंग मन मारे–
’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,
क्या न मरण भी हाथ हमारे?
शरण किसे छलता है?’
दोनों ओर प्रेम पलता है।
दीपक के जलने में आली,
फिर भी है जीवन की लाली।
किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,
किसका वश चलता है?
दोनों ओर प्रेम पलता है।
जगती वणिग्वृत्ति है रखती,
उसे चाहती जिससे चखती;
काम नहीं, परिणाम निरखती।
मुझको ही खलता है।
दोनों ओर प्रेम पलता है।

Maithili Sharan Gupt

Maithili Sharan Gupt

 

Acharya Balwant

क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

Acharya Balwant

खतरे में सम्मान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!
देश में ऐसी हवा चली है,
बदल गया ईमान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!

आए दिन घपला-घोटाला
दाल में है काला ही काला।
झुग्गी-झोपड़ियों के अंदर,
सिसक रहा अरमान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!

बदल गयी भावों की भाषा।
बदली मूल्यों की परिभाषा।
नाम, पता और परिचय बदला,
बदल गया परिधान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!

स्वार्थ की ऐसी आँधी आयी।
अपनी पीड़ा हुई परायी।
सबको अपनी-अपनी धुन है,
नहीं किसी को ध्यान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!

मन में कोमल आशा लेकर।
अधरों पर अभिलाषा लेकर।
कब तक अपनी देह छिपाये,
चिथड़ों में ईमान देश का?
क्या होगा भगवान देश का!

Acharya Balwant

Acharya Balwant

आचार्य बलवंत

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

आस से आसरा -कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कुछ जीवन बचा ले जाते हैं ये शांत दृढ़ मुँडेर,
जो आस जगाये रखते जीवित होने का।।

एक छह फीटा दरवाजा जो खुलता है,
उसकी तरफ, आधी ढ़की छत के साथ,
धूप बारिश से बचाने को।।

बाँह फैलाये कुछ मन रोज सैर कर आते हैं,
नाप आते है अनंत को ,सुनाने को रोज नई कहाँनिया।।

कुछ मन आकाश को ताकते हुये,
पतंग की भाँति डोर में बँध उड़ना चाहते है,
खोज में या बेपरवाह,अठखेलियाँ करने को।।

मुँडेर से टकीं कुछ आँखे,
कबूतर के पंखों में बाँध देती हैं, स्वयं के दिवास्वप्न,
सीलन से भरी, खारी कोठरियों के, ढह जाने को।।

कुछ इच्छायें मुँडेर पर चढ़ ऐलान करती है,
विद्रोह का खुली हवा में साँस लेने के अधिकार का।।

कुछ मुँडेर तोड़कर बना दिये जाते हैं,
चेहरे से भी छोटे झरोखे,पर फिर भी टँक जाती हैं,
कुछ आँखे भोर की पहली लालिमा चुनने को।।

कुछ माचिस के डिब्बे आग मुँह पर लपेटे,
खोल देते है, खिड़कियाँ मद्धम बयार आने को,

वो खिड़कियाँ जो हिमालय की ऊचाईं से,
झाँकती हैं गली की तरफ कोहनियाँ निकाले,
गिनती हैं धड़कने पलपल, पकड़कर रखती है नब्ज,
अलसाई सी धूप का अंधेरा होने तक।।

रोज कूद पड़ती हैं धम्म से, दो जोड़ी आँखों से मिलकर,
अकड़े घुटने के कटोरी फूटने से बेखबर।।

ये मुँडेर,ये झरोखा,ये खिड़की,
जीवन का विश्वास हैं,जो आस जगाये रखते जीवित होने का।

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

बेटी की विदाई

बेटी की विदाई

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आती है बड़ी किस्मत से ये घड़ियाँ विदाई की
खुशनसीबों को मिलती है ये लड़ियाँ विदाई की

बाबुल के अंगना की बुलबुल जायेगी परदेश
कैसे देख पाएंगी अखियाँ ये रतियाँ विदाई की

किसने बनाई ये रीत रिवायतें ह्रदयविदारक सी
कैसे समेट पायेगी बिटिया ये कलियां विदाई की

खुशियों का मेला लग रहा है हरसू  आँगन में
माँ कैसे संभाले अश्को की बगिया विदाई की

महकती रहे बिटिया बाबुल की दुआ है हर लम्हा
उपहार में फूलों से सजायेंगे गलियाँ विदाई की

छलक उठेंगे सब नैना जब डोली उठेगी तेरी
तू भी रोक नहीं पाएगी खुद को गुड़िया विदाई की

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आजमाइश

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दुआओं में हदों तक ‘मुस्कान’ जा बैठे
खुदा से ऐ खुदगर्ज एहतराम पा बैठे ……

अब भी ना समझा तो बेनूर है ज़माना
तू क्या जाने कैसे-कैसे इल्जाम पा बैठे……

आजमाइशों का दौर था नाम था तेरा
खूँनाब पीकर जाँ , बदनाम नाम पा बैठे …….

आराइश की तूने महफ़िल में जज्बातों की
तुझे क्या खबर क्या अन्जाम पा बैठे……

मिट गई है हस्ती तेरे जश्ने -चिरागों से
वजूदे जाँ से एक नाम नाकाम पा बैठे …..

डूबती ख्वाहिश को एक बार पिला दे मय
के तेरी नजरों से जिंदगी का जाम पा बैठे…..

तिश्नगी है लबों पर तेरी छुअन की अभी
हसीं मुरादों की बरबस ही शाम पा बैठे…..

खूँनाब _खून के आंसू
आराइश _सजावट
एहतराम_सम्मान

रचनाकार का परिचय

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निर्मला बरवड़ “मुस्कान”

सूर्यनगर , सीकर, राजस्थान
(वर्तमान में सीकर जिले के सरकारी स्कूल में अध्यापिका पद पर कार्यरत)

ऋतु फागुन नियरानी हो

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ऋतु फागुन नियरानी हो,
कोई पिया से मिलावे ।
सोई सुदंर जाकों पिया को ध्यान है,
सोई पिया की मनमानी,
खेलत फाग अगं नहिं मोड़े,
सतगुरु से लिपटानी ।
इक इक सखियाँ खेल घर पहुँची,
इक इक कुल अरुझानी ।
इक इक नाम बिना बहकानी,
हो रही ऐंचातानी ।।
पिय को रूप कहाँ लगि बरनौं,
रूपहि माहिं समानी ।
जौ रँगे रँगे सकल छवि छाके,
तन- मन सबहि भुलानी।
यों मत जाने यहि रे फाग है,
यह कछु अकथ- कहानी ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो,
यह गति विरलै जानी ।।
– कबीर