कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं

शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………

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असलियत मैं भी जानती हूँ…… और तुम भी

उदास रात रात का हर पहर ढल गया चाँद खिड़की से आगे निकल गया ख्वाबों का माला बिखर गया और मनका नैनों से फिसल गया।। नसीब की चादर क्यों झीनी है मेहनत की सुगंध भीनी-भीनी है कोई रफ्फू का हुनर सिखा दे हमें मुकद्दर की झोली सीनी है।। औरों के जख्मों को मरहम दिया हमने... Continue Reading →

एक ऐसा चेहरा

हल्की सी शर्म, हल्की सी नज़ाकत हो एक अजब सा एहसास, एक गज़ब सी चाहत हो थोड़ी सी नरमी, थोड़ी सी गर्माहट हो हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें खो जाने की राहत हो ज़रा सी बेचैनी, ज़रा सी घबराहट हो न कोई साज़िश, न कोई बनावट हो ज़रा सी हंसी, ज़रा सी मुस्कराहट हो हो... Continue Reading →

ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

एक बार में जरा सा काम करना और धप्प्प से बैठ जाना फिर उठना और थोडा और काम करना फिर बैठ लेना लम्बी लम्बी सांस पसीने से तर ब्लाउज का आखिरी हूक खोलना और कहना जैसे चल नही रही सांस कि और सांस लेने को नही बची ताकत माटी हो गई देह को गरियाना कि... Continue Reading →

जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

वह औरत जो सुहागिन बनी रहने के लिए करती है लाख जतन टोना-टोटका से मन्दिर में पूजा तक अपने पति से कह रही है -- तुम कारगिल में काम आए होते तो पन्द्रह लाख मिलते अब मैं तुम्हारा क्या करूँ जीते जी तुम मकान नहीं बना सकते । कह रहे हैं हमदर्द साठ साल के... Continue Reading →

बापू – रामधारी सिंह दिनकर

संसार पूजता जिन्हें तिलक, रोली, फूलों के हारों से, मैं उन्हें पूजता आया हूँ बापू ! अब तक अंगारों से। अंगार, विभूषण यह उनका विद्युत पीकर जो आते हैं, ऊँघती शिखाओं की लौ में चेतना नयी भर जाते हैं। उनका किरीट, जो कुहा-भंग करके प्रचण्ड हुंकारों से, रोशनी छिटकती है जग में जिनके शोणित की... Continue Reading →

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने प्रति अति निर्मम, उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

प्रेत का बयान – नागार्जुन

"ओ रे प्रेत -" कडककर बोले नरक के मालिक यमराज -"सच - सच बतला ! कैसे मरा तू ? भूख से , अकाल से ? बुखार कालाजार से ? पेचिस बदहजमी , प्लेग महामारी से ? कैसे मरा तू , सच -सच बतला !" खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़ काँपा कुछ हाड़ों का मानवीय ढाँचा नचाकर लंबे चमचों - सा पंचगुरा हाथ रूखी - पतली किट - किट आवाज़ में प्रेत ने जवाब दिया -

दोनों ओर प्रेम पलता है – मैथिलीशरण गुप्त

दोनों ओर प्रेम पलता है। सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है! सीस हिलाकर दीपक कहता-- ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’ पर पतंग पड़ कर ही रहता कितनी विह्वलता है! दोनों ओर प्रेम पलता है।

क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

खतरे में सम्मान देश का। क्या होगा भगवान देश का! देश में ऐसी हवा चली है, बदल गया ईमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! आए दिन घपला-घोटाला दाल में है काला ही काला। झुग्गी-झोपड़ियों के अंदर, सिसक रहा अरमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! बदल गयी भावों की भाषा। बदली मूल्यों... Continue Reading →

आस से आसरा -कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कुछ जीवन बचा ले जाते हैं ये शांत दृढ़ मुँडेर, जो आस जगाये रखते जीवित होने का।। एक छह फीटा दरवाजा जो खुलता है, उसकी तरफ, आधी ढ़की छत के साथ, धूप बारिश से बचाने को।। बाँह फैलाये कुछ मन रोज सैर कर आते हैं, नाप आते है अनंत को ,सुनाने को रोज नई कहाँनिया।।... Continue Reading →

बेटी की विदाई

बेटी की विदाई आती है बड़ी किस्मत से ये घड़ियाँ विदाई की खुशनसीबों को मिलती है ये लड़ियाँ विदाई की बाबुल के अंगना की बुलबुल जायेगी परदेश कैसे देख पाएंगी अखियाँ ये रतियाँ विदाई की किसने बनाई ये रीत रिवायतें ह्रदयविदारक सी कैसे समेट पायेगी बिटिया ये कलियां विदाई की खुशियों का मेला लग रहा... Continue Reading →

ऋतु फागुन नियरानी हो

ऋतु फागुन नियरानी हो, कोई पिया से मिलावे । सोई सुदंर जाकों पिया को ध्यान है, सोई पिया की मनमानी, खेलत फाग अगं नहिं मोड़े, सतगुरु से लिपटानी । इक इक सखियाँ खेल घर पहुँची, इक इक कुल अरुझानी । इक इक नाम बिना बहकानी, हो रही ऐंचातानी ।। पिय को रूप कहाँ लगि बरनौं,... Continue Reading →

दहेज की बारात – काका हाथरसी

जा दिन एक बारात को मिल्यौ निमंत्रण-पत्र फूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्र यत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटी बा दिन अच्छी नाहिं लगी अपने घर रोटी कहँ 'काका' कविराय, लार म्हौंड़े सों टपके कर लड़ुअन की याद, जीभ स्याँपन सी लपके मारग में जब है गई अपनी मोटर फ़ेल दौरे स्टेशन, लई तीन बजे की रेल तीन बजे की... Continue Reading →

अश्लील है तुम्हारा पौरुष – ऋषभ देव शर्मा

पहले वे लंबे चोगों पर सफ़ेद गोल टोपी पहनकर आए थे और मेरे चेहरे पर तेजाब फेंककर मुझे बुरके में बाँधकर चले गए थे। आज वे फिर आए हैं संस्कृति के रखवाले बनकर एक हाथ में लोहे की सलाखें और दूसरे हाथ में हंटर लेकर। उन्हें शिकायत है मुझसे! औरत होकर मैं प्यार कैसे कर... Continue Reading →

बनारस की सुबह वाले – उमाशंकर तिवारी

शाम की रंगीनियाँ किस काम की किसलिए कहवाघरों के चोंचले? आचमन करते उषा की ज्योति से हम बनारस की सुबह वाले भले। मन्दिरों के साथ सोते - जागते हम जुड़े हैं सीढियों से, घाट से एक चादर है जुलाहे की जिसे ओढ़कर लगते किसी सम्राट से हम हवा के पालने के झूलते हम खुले आकाश... Continue Reading →

मैं चलता – उदयशंकर भट्ट

'मैं चलता मेरे साथ नया सावन चलता है, मैं चलता मेरे साथ नया जीवन चलता है। उत्थान पतन-कंदुक पर मैं गिरता और उछलता, सांसों की दीपशिखा में लौ सा यह जीवन जलता, धूमायित अगुरु सुरभि-सा मैं छीज रहा पल-पल, मेरी वाणी के स्वर में सागर भरता निज सम्बल, मैं चलता मेरे साथ 'अहं गर्जन चलता... Continue Reading →

बूढ़े हुए कबीर – अजय पाठक

बूढ़े हुए कबीर आजकल ऊँचा सुनते हैं। आंखो से है साफ झलकती भीतर की बेचैनी हुए अकारथ साखी-दोहे बिरथा गई रमैनी। खांस-खांस कर समरसता की चादर बुनते हैं। रह जाते हैं कोलाहल में शब्द सभी खोए दुखिया दास कबीर अहर्निश जागे औ´ रोए आडंबर के लेकिन जब-तब रेशे धुनते हैं। मगहर का माहौल सियासी पहले... Continue Reading →

बूँद-बूँद पानी – आशीष जोग

श्रावण की कृष्ण-वर्णी, पलकों में, अलकों में, छलक-छलक जाता है, बूँद-बूँद पानी! तूलिका के मृदुस्पर्शी, रेशों में, केशों में, झलक-झलक जाती है, अनकही कहानी! मरुथल की अनबुझी, तृष्णा- वितृष्णा की, तुष्टि-संतुष्टि का, समाधान पानी! सृष्टि के, समष्टि के, मूल पंच तत्वों का, प्राणधन चंचल मन, कितना अभिमानी! श्रावण की कृष्ण-वर्णी, पलकों में, अलकों में, छलक-छलक... Continue Reading →

सुखद अंत के लिए – अरविन्द श्रीवास्तव

महत्त्वपूर्ण बातें अंत में लिखी जाती हैं महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ भी अंत में की जाती हैं और महत्त्वपूर्ण व्यक्ति भी अंत में आता है हम बहुत कुछ शुरूआत भी अंत में करते हैं अंत से हमारा रिश्ता आरम्भ से ही होता है जैसे कोई परिणाम या पका फल हमें अंत में मिलता है प्रेम में भी... Continue Reading →

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