हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

रेडिकल होना जूझना है वस्तुस्थिति के विपरीत पेंडुलम होना भी है आधुनिकता और परम्परा के बीच। न तो पूर्णतः सम्मानित और न ही नकारने योग्य हम रेडिकल संतानें दुनियां से लड़ते-लड़ते खुद ही हो जाते हैं संक्रमित क्योंकि हमारे वाद को न कोई पचा पाता है न ही ठुकरा पाता है। हमारे तर्कपूर्ण विचार सामने … पढ़ना जारी रखें हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

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देखो तो शब्दों में – मीनाक्षी वशिष्ठ

Dekho to Shabdo me| Literature in India

देखो तो शब्दों में कितना जादू है! मेरे शब्द मुझे उस लोक में ले आये हैं   जहाँ सब सुन्दर हैं! यहाँ हर और बिखरते रुप, रंग, रस, राग के झरने यहाँ हर पल उत्सव है दुख की तो परछाई भी नहीं जीवन फूट-फूट पड़ता है । देखो तो शब्दों में कितना जादू है! मैं … पढ़ना जारी रखें देखो तो शब्दों में – मीनाक्षी वशिष्ठ

संकल्प – मुकेश नेगी

Sankalp Poem- Mukesh Negi

कर पूर्ण उन्हें संकल्प जो तेरा तेरे पग न रुके हो घोर अंधेरा अब दरी नही मंज़िल है सामने ख़त्म हुआ अब वक्त़ ये तेरा। इन राहों में हजार हो उलझन साँस थमे तेरी तेज हो धड़कन न घबराना देख इन्हें तू अभी है आगे और भी दलदल।   रुकने न दे अपने ये कदम … पढ़ना जारी रखें संकल्प – मुकेश नेगी

दरवाजे और खिड़कियाँ – मीनाक्षी वशिष्ठ

Darwaje aur Khidkiyan - Minakshi Vashisth

बागों के पहरेदार से होते दरवाजे और कलियों सी नाजुक होतीं खिड़कियाँ कितना भी मन को बहलाएँ कितना भी सुख-दुःख बांटे दरवाजों सी समझदार कभी बन नही पातीं खिड़कियाँ ! हर मौसम में अविचल रहते दरवाजे इक झोके से सिहर उठती खिड़कियाँ ये खुल जाती हैं मौसम में चुपके-चुपके पुरवाई में महक उठती  खिड़कियाँ! बंधन … पढ़ना जारी रखें दरवाजे और खिड़कियाँ – मीनाक्षी वशिष्ठ

पेड़ की आत्‍मा – जगदीश शर्मा सहज

पेड़ की आत्‍मा - Jagdish Sharma Sahaj

मैं नश्वर था पर तुम्हारे हाथों मृत्यु का अधिकारी नहीं मैं बूढ़ा अवश्य था पर जनजीवन का अपकारी नहीं   मैं जब बच्चा था तुम पैदा ही नहीं हुए थे धरती पर न यह भीड़भाड़ थी, न शोर था, जीवन था प्रगति पर     मैं मौन रहकर तुम्हें देखता था निस्तब्ध सा खड़ा था … पढ़ना जारी रखें पेड़ की आत्‍मा – जगदीश शर्मा सहज

उम्मीद – अरुण कमल

आज तक मैं यह समझ नहीं पाया  कि हर साल बाढ़ में पड़ने के बाद भी  लोग दियारा छोड़कर कोई दूसरी जगह क्यों नहीं जाते ? 

मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…

पलकों के पालने में सजा है एक सपना, जब मैं जागती तो वो भी जागता, जब मैं सोती तो भी वो जागता ।     एक दिन पूछा मैंने उसको - नींद नहीं आती तुमको ? तो कहा सपने ने मुस्कुराते हुए ,  कौन आता है रोज़ तुम्हे उठाने के लिए ! तू जब भी है सोती … पढ़ना जारी रखें मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…