कुंजड़-कसाई : अनवर सुहैल

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‘कुंजड़-कसाइयों को तमीज कहाँ… तमीज का ठेका तो तुम्हारे सैयदों ने जो ले रक्खा है?’ मुहम्मद लतीफ कुरैशी उर्फ एम एल कुरैशी बहुत कम बोला करते। कभी बोलते भी तो कफन फाड़कर बोलते। ऐसे कि सामने वाला खून के घूँट पीकर रह जाए।

जुलेखा ने घूर कर उन्हें देखा। हर कड़वी बात उगलने से पहले उसके शौहर लतीफ साहब का चेहरा तन जाता है। कष्ट या आनंद का कोई भाव नजर नहीं आता। आँखें फैल जाती हैं और जुलेखा अपने लिए ढाल तलाशने लग जाती है। वह जान जाती कि मियाँ की जली-कटी बातों के तीर छूटने वाले हैं।

मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब का चेहरा अब शांत था। इसका सीधा मतलब ये था कि तीर चलाकर, प्रतिद्वंद्वी को घायल करके वह मुतमइन हो गए हैं।

जुलेखा बीवी चिढ़ गर्इं – ‘सैयदों को काहे बीच में घसीट रहे हैं, हमारे यहाँ जात-बिरादरी पर यकीन नहीं किया जाता।’

लतीफ कुरैशी ने अगला तीर निशाने पर फेंका – ‘जब जात-पात पर यकीन नहीं तो तुम्हारे अब्बू-अम्मी अपने इकलौते बेटे के लिए बहू खोजने के लिए अपनी बिरादरी में बिहार क्यों भागे फिर रहे हैं? क्या इधर की लड़कियाँ बेशऊर होती हैं या इधर की लड़कियों का हड्डी-खून-तहजीब बदल गया है?’

जुलेखा सफाई देने लगी – ‘वो बिहार से बहू काहे लाएँगे, जब पता ही है आपको, तो काहे ताना मारते हैं। अरे… मम्मा, नन्ना और चच्चा लोगों का दबाव भी तो है कि बहू बिहार से ले जाना है।’

‘वाह भई वाह, खूब कही। लड़का ब्याहना है तो मम्मा, चच्चा का दबाव पड़ रहा है, शादी खानदान में करनी है। अगर लड़की की शादी निपटानी हो तो नौकरी वाला लड़का खोजो। जात चाहे जुलहा हो या कुंजड़-कसाई। जो हो सब चलेगा। वाह भई वाह… मान गए सैयदों का लोहा!’

जुलेखा निःशस्त्र हो गई। स्त्री-सुलभ ब्रह्मास्त्र उसके पास प्रचुर मात्रा में है, जिसे ‘अश्रु-शास्त्र’ भी कहा जाता है। मर्द इन आँसुओं से घबरा जाते हैं। लतीफ कुरैशी भी अपवाद न थे। जुलेखा के इस ब्रह्मास्त्र से वह घबराए। सोचा प्रहार कुछ ज्यादा ही सख्त हुआ लगता है। मामला रफा-दफा करने के लिहाज से उन्होंने कुछ सूत्र वाक्य बुदबुदाए -‘बात तुम्हीं छेड़ती हो और हार कर रोने लग जाती हो। तुम्हें यह क्या कहने की जरूरत थी कि इधर एमपी-छत्तीसगढ़ की लड़कियाँ, बेच-खाने वाली होती हैं। कंगाल बना देती हैं। तुम्हारा भाई कंगाल हो जाएगा। माना कि तुम्हारे ननिहाल-ददिहाल का दबाव है, जिसके तहत तुम लोगों को यह शादी अपने ही खानदान में करनी पड़ रही है। बड़ी मामूली बात ठहरी। चलो चाय बना लाओ जल्दी से…!’

जुलेखा ने आँसू पीकर हथियार डाल दिए – ‘हर माँ-बाप के मन में ख्वाहिश रहती है कि उनकी लड़की जहाँ जाए, राज करे। इसके लिए कैसा भी समझौता हो करना ही पड़ता है।’

‘समझौता!’ लतीफ एक-एक लफ्ज चबा कर बोले।

बात पुनः तन गई।

‘वही तो… वही तो मैं कह रहा हूँ कि समझौता करना पड़ता है। और जानती हो, समझौता मजबूरी में किया जाता है। जब इनसान अपनी कु़व्वत-ताकत से मजबूर होता है तो समझौता करता है। जैसे…!’

जुलेखा समझ गई। कड़ुआहट की आग अभी और भड़केगी।

‘हमारा रिश्ता भी इसी नामुराद ‘समझौते’ की नींव पर टिका है। एक तरफ बैंक में सर्विस करता कमाऊ कुंजड़-कसाई बिरादरी का दामाद, दूसरी तरफ खानदान और हड्डी-खू़न-नाक का सवाल। मामला लड़की का था, पराए धन का था इसलिए कमाऊ दामाद के लिए तुम्हारे घर वालों ने खानदान के नाम की कुर्बानी दे ही दी।’

जुलेखा रो पड़ी और किचन की तरफ चली गई। मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब बेंत की आराम कुर्सी पर निढाल पसर गए। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे जंग जीत कर आए हों और थकावट दूर कर रहे हों। सैयद वंशीय पत्नी जुलेखा को दुख पहुँचा कर इसी तरह का ‘रिलेक्स’ अनुभव किया करते हैं वो। इकलौते साले साहब की शादी की खबर पाकर इतना ‘ड्रामा’ खेलना उन्हें मुनासिब लगा था।

जुलेखा के छोटे भाई जावेद के लिए उनके अपने रिश्तेदारों ने भी मंसूबे बांधे थे। इकलौता लड़का, लाखों की जमीन-जायदाद। जावेद के लिए लतीफ के चाचा ने प्रयास किया था। लतीफ के चाचा, शहडोल में सब-इंस्पेक्टर हैं तथा वहीं गाँव में काफी जगह-जमीन बना चुके हैं। एक लड़की और एक लड़का। कुल दो संतान। चाचा चाहते थे कि लड़की की शादी यथासंभव अच्छी जगह करें। लड़की भी उनकी गुणी ठहरी। बीएससी तक तालीम। नेक सीरत, भली सूरत, फने-खानादारी, सौमो-सलात की पाबंद, लंबी, छरहरी, पाकीजा और ब्यूटीशियन का कोर्स की हुई लड़की के लिए चाचा ने की चक्कर जुलेखा के अब्बू सैयद अब्दुल सत्तार के घर काट चुके थे। हर बार यही जवाब मिलता कि लड़के का अभी शादी का कोई इरादा नहीं है।

एक बार मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब, जब अपनी ससुराल में थे तब अपने कानों से उन्होंने सुना था – ‘ये साले कुंजड़-कसाई क्या समझ बैठे हैं हमें? लड़की क्या दी, इज्जत भी दे दी क्या?’ उँगली पकड़ाई तो लगे पहुँचा पकड़ने। भला इन दलिद्दरों की लड़की हमारी बहू बनेगी? हद हो गई भई।’

ये बात जुलेखा के मामा कह रहे थे। लतीफ साहब उस वक्त बेडरूम में लेटे थे। लोगों ने समझा कि सो गए हैं वो, इसलिए ऊँची आवाज में बहस कर रहे थे। जुलेखा के अब्बू ने मामा को डाँट कर चुप कराया था।

लतीफ अपमान का घूँट पीकर रह गए।

तभी तो उस बात का बदला वह उस खानदान की बेटी, यानी उनकी पत्नी जुलेखा से लेना चाह रहे थे। ले-देकर आज तवा गरमाया तो कर बैठे प्रहार! जुलेखा को दुख पहुँचाकर, भारतीय इस्लामी समाज में व्याप्त ऊँच-नीच की बुराई पर कुठाराघात करने का उनका यह प्रयास कितना ओछा, कितना शर्मनाक था, इससे क्या मतलब? उनका उद्देश्य था कि जैसे उनका दिल दुखा, वैसे ही किसी और का दुखे। दूसरे का दुख उनके अपने दुख के लिए मलहम बन गया था।

जुलेखा की सिसकियाँ किचन के पर्दे को चीरकर बाहर निकल रही थीं। बेटा-बेटी शॉपिंग के लिए सुपर-मार्केट गए हुए थे। घर में शांति बिखरी हुई थी। इसी शांति को भंग करती सिसकियाँ लतीफ साहब के थके जिस्म के लिए लोरी बनी जा रही थीं।

मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब को यूँ महसूस हो रहा था, जैसे सैयदों, शेखों की तमाम गर्दन अकड़ू जातियाँ रो रही हों, पश्चाताप कर रही हों।

अरे! उन्हें भी किशोरवय तक कहीं पता चल पाया था कि वे कसाइयों के खानदान से ताल्लुक रखते हैं। वे तो बस इतना जानते थे कि ‘एक ही सफ में खड़े महमूदो-अयाज’ वाला दुनिया का एकमात्र मजहब है इस्लाम। एक नई सामाजिक व्यवस्था है इस्लाम। जहाँ ऊँच-नीच, गोरा-काला, स्त्री-पुरूष, छोटा-बड़ा, जात-पात का कोई झमेला नहीं है। कहाँ महमूद जैसा बादशाहे-वक्त, और कहाँ अयाज जैसा मामूली सिपाही, किंतु नमाज के समय एक ही सफ में खड़ा किया तो सिर्फ इस्लाम ही ने दोनों को।

उनके खानदान में कोई भी कसाइयों का धंधा नहीं करता। सभी सरकारी मुलाजमत में हैं। सरगुजा के अलावा बाहरी रिश्तेदारी से लतीफ के वालिद साहब ने कोई संबंध नहीं रखा था। लतीफ के वालिद का एक ही ध्येय था, तालीम हासिल करो। किसी भी तरह इल्म हासिल करो। सो लतीफ इल्म हासिल करते-करते बैंक में अधिकारी बन गए। उनके वालिद साहब भी सरकारी मुलाजिम थे, रिटायरमेंट के बाद भी वे अपने खानदानी रिश्तेदारों से कटे ही रहे।

लतीफ, क्लास के अन्य कुरैशी लड़कों से कोई संबंध नहीं बना पाए थे। ये कुरैशी लड़के पिछली बेंच में बैठने वाले बच्चे थे, जिनके दुकानों से गोश्त खरीदने कभी-कभी वह भी जाया करते थे। लगभग सभी कुरैशी सहपाठी मिडिल स्कूल की पढ़ाई के बाद आगे न पढ़ पाए।

तब उन्हें कहाँ पता था कि कुरैशी एक जातिसूचक पुछल्ला है, जो उनके नाम के साथ उनकी सामाजिक हैसियत को जाहिर करता है। वे तो वाज-मीलाद वगैरा में बैठते तो यही सुनते कि पैगंबर साहब का ताल्लुक अरब के कुरैश कबीले से था। उनका बालमन यही गणित लगाया करता था कि वही कुरैशी खानदान के लोग कालांतर में जब हिंदुस्तान आए होंगे तो उन्हें कुरैशी कहा जाता होगा। ठीक उसी तरह जैसे पड़ोस के हिंदू घरों की बहुओं को उनके नाम से नहीं बल्कि उनके गृहनगर के नाम से संबोधित किया जाता है। जैसे कि बिलासपुरहिन, रायपुरहिन, सरगुजहिन, कोतमावाली, पेंडरावाली, कटनहिन आदि।

कुछ बड़े व्यवसायिक मुस्लिम घरानों के लोग नाम के साथ इराकी शब्द जोड़ते, जिसका अर्थ लतीफ ने यह लगाया कि हो न हो इन मुसलमानों का संबंध इराक के मुसलमानों से हों कुछ मुसलमान खान, अन्सारी, छीपा, रजा इत्यादि उपनाम से अपना नाम सजाया करते। बचपन में अपने नाम के साथ लगे कुरैशी उपनाम को सुनकर वह प्रसन्न हुआ करते। उन्हें अच्छा लगता कि उनका नाम भी उनके जिस्म की तरह पूर्ण है। कहीं कोई ऐब नहीं। कितना अधूरा लगता यदि उनका नाम सिर्फ मुहम्मद लतीफ होता। जैसे बिना दुम का कुत्ता, जैसे बिना टाँग का आदमी, जैसे बिना सूँड़ का हाथी।

बचपन में जब भी कोई उनसे उनका नाम पूछता तो वह इतराकर बताया करते -‘जी मेरा नाम मुहम्मद लतीफ कुरैशी है।’

यही कुरैशी लफ्ज का पुछल्ला उनके विवाह का सबसे बड़ा शत्रु साबित हुआ। जब उनकी बैंक में नौकरी लगी तो कसाई-चिकवा घरानों से धड़ाधड़ रिश्ते आने लगे। अच्छे पैसे वाले, शान-शौकत वाले, हज कर आए कुरैशी खानदानों से रिश्ते ही रिश्ते। लतीफ के अब्बू उन लोगों में अपना लड़का देना नहीं चाहते थे क्योंकि तमाम धन-लोलुप, धनाढ्य कुरैशी लोग, संस्कार, शिक्षा के मामले में शून्य थे। पैसे से मारुति आ सकती है सलीका नहीं।

इस बीच शहडोल के एक उजाड़ सैयदवंशीय मुस्लिम परिवार से लतीफ साहब के लिए पैगाम आया। उजाड़ इन अर्थों में कि यूपी-बिहार से आकर मध्यप्रदेश के इस बघेलखंड में आ बसे जुलेखा के पिता किसी जमाने में अच्छे खाते-पीते ठेकेदार हुआ करते थे। आजादी से पूर्व और उसके बाद की एक-दो पंचवर्षीय योजनाओं तक जुलेखा के पिता और दादा वगैरा की जंगल की ठेकेदारी हुआ करती थी। जंगल में पेड़ काटने की प्रतिस्पर्धा चलती। सरकारी मुलाजिम और ठेकेदारी मजदूरों में होड़ मची रहती। कौन कितने पेड़ काट गिराता है। ट्रकों लकड़ियाँ अंतर्राज्यीय स्मगलिंग के जरिए इधर-उधर की जातीं। खूब चटकी थी उन दिनों। उसी कमाई से शहडोल के हृदय-स्थल पर पहली तीन मंजिली इमारत खड़ी हुई जिसका नामकरण हुआ था ‘सैयदाना’। ये इमारत जुलेखा के दादा की थी। आज तो कइी गगनचुंबी इमारतें हैं किंतु उस जमाने में जुलेखा का पैतृक मकान प्रसिद्ध हुआ करता था। आस-पास के लोग उस इमारत ‘सैयदाना’ का इस्तेमाल अपने घर के पते के साथ किया करते थे। स्थानीय और प्रादेशिक स्तर की राजनीति में भी सक्रियता थी इस भवन की। फिर यहाँ मारवाड़ी आए, सिक्ख आए, प्रतिस्पर्धा बढ़ी। मुनाफा कई हाथों में बँटा। जुलेखा के खानदान वालों की मोनोपोली समाप्त हुई। कुकुरमुत्तों की तरह नगर में भव्य इमारतें तनने लगीं।

जुलेखा के अब्बू यानी सैयद अब्दुल सत्तार या यूँ कहें कि हाजी सैयद अब्दुल सत्तार साहब की प्रगति का ग्राफ अचानक भरभराकर नीचे गिरने लगा। जंगलात के ठेकेदारी में माफिया आ गया। धन-बल और बाहुबल दोनों की जोर-आजमाइश हुर्इ। हाजी साहब लकवाग्रस्त हुए। चाचाओं और चचेरे भाइयों में दादा की संपत्ति को लेकर विवाद हुए। झूठी शान को बरकरार रखने में हाजी अब्दुल सत्तार साहब का जमा धन खर्च होने लगा। देह दुर्बल हुई। बोलते तो स्वर लड़खड़ा जाता। व्यापार की नई तकनीक आ जाने से, पुरानी व्यापारिक पद्धति वाले व्यवसाइयों का अमूमन जो हश्र होता है, वही हाजी साहब का हुआ।

डूबती कश्ती में अब जुलेखा थी, उसकी एक छोटी बहिन थी और एक किशोरवय भाई। बड़ी बहन का विवाह हुआ तो सैयदों में ही लेकिन पार्टी मालदार न थी। दामाद थोक कपड़े का व्यवसायी था और विधुर था। जुलेखा की बड़ी बहन वहाँ काफी खुश थी। जुलेखा जब राजनीतिशास्त्र में एम.ए. कर चुकी तो पिता हाजी साहब चिंतित हुए। खानदान में ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की की उतनी डिमांड न थी। लड़के ज्यादातर व्यवसायी थे। जुलेखा को ब्याहना निहायत जरूरी था, क्योंकि छोटी लड़की कमरून भी तैयार हुई जा रही थी। तैयार क्या वह तो जुलेखा से भी ज्यादा भरे बदन की थी। दो साल का अंतर मात्र था उनकी उम्र में। दो-दो जवान लड़कियों का बोझ हाजी साहब की लकवाग्रस्त देह बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।

उनके एक मित्र हुआ करते थे अगरवाल साहब। जो कि फॉरेस्ट विभाग के मुलाजिम थे। हाजी साहब के स्याह-सफेद के राजदार! उन्हीं अगरवाल साहब ने सुदूर सरगुजा में एक बेहतरीन रिश्ता सुझाया। हाजी साहब उन पर बिगड़े। जमीन पर थूकते हुए कहा – ‘लानत है आप पर, अगरवाल साहेब कुंजड़-कसाइयों को लड़की थोड़े ही दूँगा। घास खा कर जी लूँगा। लेकिन खुदा ऐसा दिन दिखाने से पहले उठा ले तो बेहतर…’

कुछ रुककर कहा था उन्होंने – ‘अरे भाई, सैयदों में क्या लड़कों की महामारी हो गई है?’

अगरवाल साहब बात सँभालने लगे – ‘मैं ये कब कह रहा हूँ कि आप अपनी लड़की की शादी वहीं करिए। हाँ, थोड़ा ठंडे दिमाग से सोचिए। मैं उन लोगों को अच्छी तरह जानता हूँ। पढ़ा-लिखा, संस्कारित घराना है। लड़का बैंक में अधिकारी है। कल को आला-अफसर बनेगा। महानगरों में रहेगा।’

अगरवाल साहब टेप-रिकार्डर की तरह विवरण उगलने लगे। उन्हें हाजी साहब नामक इमारत की जर्जर दीवार, छतों और हिलती नींव का हाल मालूम था। वह अच्छी तरह जानते थे कि विवाह योग्य बेटियों के विवाह की चिंता में हाजी साहब अनिद्रा के रोगी भी हुए जा रहे हैं। एकांतप्रिय एवं आर्थिक मार ने उन्हें इस समय वृद्ध कर दिया था। उनका इलाज चल रहा था। एलोपैथी, होमियोपैथी, झाड़-फूँक, गंडा-तावीज, पीर-फकीरी और हज-जियारत जैसे नुस्खे आजमाए जा चुके थे। मर्ज अपनी जगह और मरीज अपनी जगह। घट रहा था तो सिर्फ जमा किया धन और बढ़ रही थीं चिंताएँ।

एक दो रोज के बाद अगरवाल साहब की बात पर हाजी साहब गौरो-फिक्र करने लगे। हाजी साहब की चंद शर्तें थीं, जो रस्सी के जल जाने के बाद बची ऐंठन की तरह थीं।

इन शर्तों में अव्वल तो यह कि शादी के निमंत्रण-पत्रों में वर-वधू पक्ष का उपनाम लिखाही न जाए। न तो हाजी सैयद अब्दुल सत्तार अपने नाम के आगे सैयद लगाएँ और न ही लड़के वाले अपना ‘कुरैशी’ टाइटिल जमाने के आगे जाहिर करें। शादी ‘शरई’ रिवाज से हो। कोई ताम-झाम, बैंड-बाजा नही। दस-बारह बराती आएँ। दिन में विवाह हो, दोपहर में खाना और शाम होते तक रुखसती।

एक और खास शर्त यह थी कि निकाह के अवसर पर कितना ही लोग पूछें, किसी से भी कुरैशी होने की बात न बताई जाए।

लतीफ और उसके पिता को ये तमाम शर्तें अपमानजनक लगीं लेकिन आला दर्जे के खानदान की तालीमयाफ्ता नेक-सीरत लड़की के लिए उन लोगों ने अंततः ये अपमानजनक समझौता स्वीकार कर लिया। अगरवाल साहब के बहनोई सरगुजा में थे और लतीफ के पिता से उनका घनिष्ठ संबंध था। उनका भी दबाव उन्हें मजबूर कर रहा था।

हुआ वही जो जुलेखा के वालिद साहब की पसंद था। लड़के वाले, लड़की वालों की तरह ब्याहने आए। इस तरह सैयदों की लड़की, कुंजड़-कसाइयों के घर ब्याही गई।

एक दिन जुलेखा के एक रिश्तेदार बैंक में किसी काम से आए। लतीफ साहब को पहचाना उन्होंने। केबिन के बाहर उनके नाम की तख्ती पर साफ-साफ लिखा था – ‘एम. एल. कुरैशी, शाखा प्रबंधक’

लतीफ साहब ने आगंतुक रिश्तेदार को बैठने का इशारा किया। घंटी मार कर चपरासी को चाय लाने का हुक्म दिया।

आगंतुक निस्संदेह धनी मानी व्यक्ति थे तथा फायनेंस के सिलसिले में बैंक आए थे।

लतीफ साहब ने सवालिया नजरों से उन्हें देखा।

वे हड़बड़ाए। गला खँखारकर पूछा – ‘आप हाजी सैयद अब्दुल सत्तार साहब के दामाद हुए न?’

‘हाँ, कहिए।’ लतीफ साहब का माथा ठनका।

सैयद शब्द के अतिरिक्त जोर दिए जाने को भली-भाँति समझ रहे थे वह।

‘हाँ, मैं उनका रिश्तेदार हूँ। पहले गुजरात में सेटल था, आजकर इधर ही किस्मत आजमाना चाह रहा हूँ। आपको निकाह के वक्त देखा था। नेम-प्लेट देख कर घबराया, किंतु आपके बड़े बाबू तिवारी ने बताया कि आपकी शादी शहडोल के हाजी साहब के यहाँ हुई तो मुतमइन हुआ।’ आगंतुक सफाई दे रहा था।

फिर दाँत निपोरते हुए आगंतुक ने कहा – ‘आप तो अपने ही हुए!’

आगंतुक के स्वर में आदर, आत्मीयता और नाटकीयता का समावेश था।

मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब का सारा वजूद रुई की तरह जलने लगा। पलक झपकते ही राख का ढेर बन जाते कि इससे पूर्व स्वयं को सँभाला और आगंतुक का काम आसान कर दिया।

एम.एल. लतीफ साहब को अच्छी तरह पता था कि मुहम्मद लतीफ कुरैशी के बदन को दफनाया तो जा सकता है किंतु उनके नाम के साथ लगे ‘कुरैशी’ को वह कतई नहीं दफना सकते हैं।

Anwar Suhail

जन्म : 9 अक्टूबर 1964, जांजगीर (छत्तीसगढ़)

उपन्यास : पहचान
कहानी संग्रह : कुंजड़-कसाई, ग्यारह सितंबर के बाद, चहल्लुम, गहरी जड़ें
कविता : और थोड़ी-सी शर्म दे मौला, संतो काहे की बेचैनी
संपादन : संकेत (कविता केंद्रित लघु पत्रिका)

4/3, ऑफिसर्स कॉलोनी, पोस्ट-बिजुरी, जिला-अनूपपुर, पिन – 484440 (मध्य प्रदेश)

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जयदोल – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

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लेफ्टिनेंट सागर ने अपना कीचड़ से सना चमड़े का दस्ताना उतार कर, ट्रक के दरवाजे पर पटकते हुए कहा,”गुरूंग, तुम गाड़ी के साथ ठहरो, हम कुछ बन्दोबस्त करेगा।”
गुरूंग सड़ाक से जूतों की एड़ियाँ चटका कर बोला,”ठीक ए सा’ब -”

साँझ हो रही थी। तीन दिन मूसलाधार बारिश के कारण नवगाँव में रुके रहने के बाद, दोपहर को थोड़ी देर के लिए आकाश खुला तो लेफ्टिनेंट सागर ने और देर करना ठीक न समझा। ठीक क्या न समझा, आगे जाने के लिए वह इतना उतावला हो रहा था कि उसने लोगों की चेतावनी को अनावश्यक सावधानी माना और यह सोच कर कि वह कम से कम शिवसागर तो जा ही रहेगा रात तक, वह चल पड़ा था।
जोरहाट पहुँचने तक ही शाम हो गई थी, पर उसे शिवसागर के मन्दिर देखने का इतना चाव था कि वह रुका नहीं, जल्दी से चाय पी कर आगे चल पड़ा। रात जोरहाट में रहे तो सबेरे चल कर सीधे डिबरूगढ़ जाना होगा, रात शिवसागर में रह कर सबेरे वह मन्दिर और ताल को देख सकेगा। शिवसागर, रूद्रसागर, जयसागर – कैसे सुन्दर नाम है। सागर कहलाते हैं तो बड़े-बड़े ताल होंगे — और प्रत्येक के किनारे पर बना हुआ मन्दिर कितना सुन्दर दीखता होगा असमिया लोग हैं भी बड़े साफ-सुथरे, उनके गाँव इतने स्वच्छ होते हैं तो मन्दिरों का क्या कहना

शिव-दोल, रूद्र-दोल, जय-दोल — सागर-तट के मन्दिर को दोल कहना कैसी सुन्दर कवि – कल्पना है। सचमुच जब ताल के जल में, मन्द-मन्द हवा से सिहरती चाँदनी में, मन्दिर की कुहासे-सी परछाई डोलती होगी, तब मन्दिर सचमुच सुन्दर हिंडोले-सा दीखता होगा इसी उत्साह को लिए वह बढ़ता जा रहा था — तीस-पैंतीस मील का क्या है — घण्टेभर की बात है।

लेकिन सात-एक मील बाकी थे कि गाड़ी कच्ची सड़क के कीचड़ में फँस गई। पहले तो स्टीयरिंग ऐसा मक्खन-सा नरम चला मानो गाड़ी नहीं, नाव की पतवार हो और नाव बड़े से भँवर में हचकोले खाती झूम रही हो; फिर लेफ्टिनेंट के सँभालते-सँभालते गाड़ी धीमी हो कर रूक गई, यद्यपि पहियों के घूमते रह कर कीचड़ उछालने की आवाज आती रही।

इसके लिए साधारणत: तैयार होकर ही ट्रक चलते थे। तुरन्त बेलचा निकाला गया, कीचड़ साफ करने की कोशिश हुई लेकिन कीचड़ गहरा और पतला था, बेलचे का नहीं, पम्प का काम था। फिर टायरों पर लोहे की जंजीरें चढ़ाई गईं। पहिये घूमने पर कहीं पकड़ने को कुछ मिले तो गाड़ी आगे ठिले — मगर चलने की कोशिश पर लीक गहरी कटती गई और ट्रक धँसता गया, यहाँ तक कि नीचे का गीयर-बक्स भी कीचड़ में डूबने को हो गया मानों इतना काफी न हो; तभी इंजन ने दो-चार बार फट्-फट्-फट् का शब्द किया और चुप हो गया — फिर स्टार्ट ही न हुआ।

अँधेरे में गुरूंग का मुँह दीखता था और लेफ्टिनेंट ने मन-ही-मन सन्तोष किया कि गुरूंग को उसका मुँह भी नहीं दीखता होगा गुरूंग गोरखा था और फौजी गोरखों की भाषा कम-से-कम भावना की दृष्टि से गूँगी होती है मगर आँखें या चेहरे की झुर्रियाँ सब समय गूँगी नहीं होतीं और इस समय अगर उनमें लेफ्टिनेंट सा’ब की भावुक उतावली पर विनोद का आभास भी दीख गया, तो दोनों में मूक वैमनस्य की एक दीवार खड़ी हो जाएगी।

तभी सागर ने दस्तानें फेंक कर कहा, ”हम कुछ बन्दोबस्त करेगा” और फिच्च-फिच्च कीचड़ में जमा-जमा कर बूट रखता हुआ आगे चढ़ चला।”
कहने को तो उसने कह दिया, पर बन्दोबस्त वह क्या करेगा रात में? बादल फिर घिरने लगे; शिवसागर सात मील है तो दूसरे सागर भी तीन-चार मील तो होंगे और क्या जाने कोई बस्ती भी होगी कि नहीं; और जयसागर तो बड़े बीहड़ मैदान के बीच में हैं उसने पढ़ा था कि उस मैदान के बीच में ही रानी जयमती को यन्त्रणा दी गई थी कि वह अपने पति का पता बता दे। पाँच लाख आदमी उसे देखने इकठ्ठे हुए थे और कई दिनों तक रानी को सारी जनता के सामने सताया तथा अपमानित किया गया था।

एक बात हो सकती है कि पैदाल ही शिवसागर चला जाए। पर उस कीचड़ में फिच्च-फिच्च सात मील – उसी में भोर हो जायेगा, फिर तुरंत गाड़ी के लिए वापस जाना पड़ेगा फिर नहीं, वह बेकार है। दूसरी सूरत रात गाड़ी में ही सोया जा सकता है। पर गुरूंग? वह भूखा ही होगा कच्ची रसद तो होगी पर बनाएगा कैसे? सागर ने तो गहरा नाश्ता किया था, उसके पास बिस्कुट वगैरह भी है पर अफसरी का बड़ा कायदा है कि अपने मातहत को कम-से-कम खाना तो ठीक खिलाये शायद आस-पास कोई गाँव हो —

कीचड़ में कुछ पता न लगता था कि सड़क कितनी है और अगल-बगल का मैदान कितना। पहले तो दो-चार पेड़ भी किनारे-किनारे थे, पर अब वह भी नहीं, दोनों ओर सपाट सूना मैदान था और दूर के पेड़ भी ऐसे धुँधले हो गए थे कि भ्रम हो, कहीं चश्मे पर नमी की ही करामात तो नहीं है अब रास्ता जानने का एक ही तरीका था, जहाँ कीचड़ कम गहरा हो वही सड़क; इधर-उधर हटते ही पिंडलियाँ तक पानी में डूब जाती थीं और तब वह फिर धीरे-धीरे पैर से टटोल कर मध्य में आ जाता था।

यह क्या है? हाँ, पुल-सा है — यह रेलिंग हैं। मगर दो पुल है समकोण बनाते हुए क़्या दो रास्ते है? कौन-सा पकड़ें?

एक कुछ ऊँची जमीन की ओर जाता जान पड़ता था। ऊँचे पर कीचड़ कम होगा, इस बात का ही आकर्षण काफी था; फिर ऊँचाई पर से शायद कुछ दीख भी जाए। सागर उधर ही को चल पड़ा। पुल के पार ही सड़क एक ऊँची उठी हुई पटरी-सी बन गई, तनिक आगे इसमें कई मोड़ से आये, फिर जैसे धन-खेत में कहीं-कहीं कई-एक छोटे-छोटे खेत एक-साथ पड़ने पर उनकी मेड़ मानो एक-साथ ही कई ओर जाती जान पड़ती है, इसी तरह वह पटरी भी कई ओर को जाती-सी जान पड़ी। सागर मानो एक बिन्दु पर खड़ा है, जहाँ से कई रास्ते हैं, प्रत्येक के दोनों ओर जल मानो अथाह समुद्र में पटरियाँ बिछा दी गईं हों।

सागर ने एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। शून्य। उसने फिर आँखों की कोरें कस कर झाँक कर देखा, बादलों की रेखा में एक कुछ अधिक घनी-सी रेखा उसे दीखी बादल ऐसा समकोण नहीं हो सकता। नहीं, यह इमारत है सागर उसी ओर को बढ़ने लगा। रोशनी नहीं दीखती, पर शायद भीतर कोई हो —

पर ज्यों-ज्यों वह निकट आता गया उसकी आशा धुँधली पड़ती गई। वह असमिया घर नहीं हो सकता — इतने बड़े घर अब कहाँ हैं — फिर यहाँ, जहाँ बाँस और फूस के बासे ही हो सकते हैं, इंट के घर नहीं– अरे, यह तो कोई बड़ी इमारत है — क्या हो सकती है?

मानो उसके प्रश्न के उत्तर में ही सहसा आकाश में बादल कुछ फीका पड़ा और सहसा धुँधला-सा चाँद भी झलक गया। उसके अधूरे प्रकाश में सागर ने देखा — एक बड़ी-सी, ऊपर से चपटी-सी इमारत — मानो दुमंजिली बारादरी बरामदे से, जिसमें कई-एक महराबें; एक के बीच से मानो आकाश झाँक दिया…

सागर ठिठक कर क्षण-भर उसे देखता रहा। सहसा उसके भीतर कुछ जागा जिसने इमारत को पहचान लिया — यह तो अहोम राजाओं का क्रीड़ा भवन है — क्या नाम है? — रंग-महल, नहीं, हवा-महल — नहीं, ठीक याद नहीं आता, पर यह उस बड़े पठार के किनारे पर है जिसमें जयमती —

एकाएक हवा सनसना उठी। आस-पास के पानी में जहाँ-तहाँ नरसल के झोंप थे, झुक कर फुसफुसा उठे जैसे राजा के आने पर भृत्योंसेवकों में एक सिहरन दौड़ जाए एकाएक यह लक्ष्य कर के कि चाँद फिर छिपा जा रहा है, सागर ने घूमकर चीन्ह लेना चाहा कि ट्रक किधर कितनी दूर है, पर वह अभी यह भी तय नहीं कर सका था कि कहाँ क्षितिज है जिसके नीचे पठार है और ऊपर आकाश या मेघाली कि चाँद छिप गया और अगर उसने खूब अच्छी तरह आकार पहचान न रखा होता तो रंग-महल या हवा-महल भी खो जाता।

महल में छत होगी। वहाँ सूखा होगा। वहाँ आग भी जल सकती है। शायद बिस्तर लाकर सोया भी जा सकता है। ट्रक से तो यही अच्छा रहेगा — गाड़ी को तो कोई खतरा नहीं —
सागर जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगा।
रंग-महल बहुत बड़ा हो गया था। उसकी कुरसी ही इतनी ऊँची थी कि असमिया घर उसकी ओट छिप जाए। पक्के फर्श पर पैर पड़ते ही सागर ने अनुमान किया, तीस-पैंतीस सीढ़ियाँ होंगी सीढ़ियाँ चढ़ कर वह असली ड्योढ़ी तक पहुँचेगा।

ऊपर चढ़ते-चढ़ते हवा चीख उठी। कई मेहराबों से मानो उसने गुर्रा कर कहा, ”कौन हो तुम, इतनी रात गए मेरा एकान्त भंग करनेवाले?” विरोध के फूत्कार का यह थपेड़ा इतना सच्चा था कि सागर मानो फुसफुसा ही उठा, ”मैं — सागर, आसरा ढूँढ़ता हूँ — रैनबसेरा –”
पोपले मुँह का बूढ़ा जैसे खिसिया कर हँसे; वैसे ही हवा हँस उठी।
”ही –ही — ही — खी — खी –खी: – यह हवा-महल है, हवा-महल — अहोम राजा का लीलागार — अहोम राजा का — व्यसनी, विलासी, छहों इन्द्रियों से जीवन की लिसड़ी बोटी से छहों रसों को चूस कर उसे झँझोड़ कर फेंक देने वाले नृशंस लीलापिशाचों का — यहाँ आसरा — यहाँ बसेरा ही –ही — ही — खी — खी –खी:।”

सीढ़ियों की चोटी से मेहराबों के तले खड़े सागर ने नीचे और बाहर की ओर देखा। शून्य, महाशून्य; बादलों में बसी नमी और ज्वाला से प्लवन, वज्र और बिजली से भरा हुआ शून्य। क्या उसी की गुर्राहट हवा में हैं, या कि नीचे फैले नंगे पठार की, जिसके चूतड़ों पर दिन-भर सड़ पानी के कोड़ों की बौछार पड़ती रही है? उसी पठार का आक्रोश, सिसकन, रिरियाहट?

इसी जगह, इसी मेहराब के नीचे खड़े कभी अधनंगे अहोम राज ने अपने गठीले शरीर को दर्प से अकड़ा कर, सितार की खूँटी की तरह उमेठ कर, बाँयें हाथ के अँगूठे को कमरबन्द में अटका कर, सीढ़ियों पर खड़े क्षत-शरीर राजकुमारों को देखा होगा, जैसे कोई साँड़ खसिया बैलों के झुण्ड को देखे, फिर दाहिने हाथ की तर्जनी को उठा कर दाहिने भ्रू को तनिक-सा कुंचित करके, संकेत से आदेश किया होगा कि यन्त्रणा को और कड़ी होने दो।

लेफ्टिनेण्ट सागर की टाँगें मानो शिथिल हो गयीं। वह सीढ़ी पर बैठ गया, पैर उसने नीचे को लटका दिये, पीठ मेहराब के निचले हिस्से से टेक दी। उसका शरीर थक गया था दिन-भर स्टीयरिंग पर बैठे-बैठे और पौने दो सौ मील तक कीचड़ की सड़क में बनी लीकों पर आँखें जमाये रहने से आँखें भी ऐसे चुनचुना रही थीं मानो उनमें बहुत बारीक पिसी हुई रेत डाल दी गई हो — आँखें बन्द भी वह करना चाहे और बन्द करने में क्लेश भी हो — वह आँख खुली रखकर ही किसी तरह दीठ को समेट ले, या बन्द करके देखता रह सके, तो

अहोम राजा चूलिक-फा राजा में ईश्वर का अंश होता है, ऐसे अन्धविश्वास पालनेवाली अहोम जाति के लिए यह मानना स्वाभाविक ही था कि राजकुल का अक्षत-शरीर व्यक्ति ही राजा हो सकता है, जिसके शरीर में कोई क्षत है, उसमें देवत्व का अंश कैसे रह सकता है?

देवत्व — और क्षुण्ण? नहीं। ईश्वरत्व अक्षुण्ण ही होता है और राजा शरीर अक्षत

अहोम परम्परा के अनुसार कुल-घात के सेतु से पार होकर चूलिक-फा भी राजसिंहासन पर पहुँचा। लेकिन वह सेतु सदा के लिए खुला रहे, इसके लिए उसने एक अत्यन्त नृशंस उपाय सोचा। अक्षत-शरीर राजकुमार ही राजा हो सकते हैं, अत: सारे अक्षत-शरीर राजकुमार उसके प्रतिस्पर्धी और सम्भाव्य घातक हो सकते हैं। उनके निराकरण का उपाय यह है कि सब का एक-एक कान या छिगुनी कटवा ली जाए — हत्या भी न करनी पड़े, मार्ग के रोड़े भी हट जायें। लाठी न टूटे, साँप भी मरे नहीं पर उसके विषदन्त उखड़ जाएँ। क्षत-शरीर, कनकटे या छिगुनी-कटे राजकुमार राजा हो ही नहीं सकेंगे, तब उन्हें राज-घात का लोभ भी न सताएगा –

चूलिक-फा ने सेनापति को बुला कर गुप्त आज्ञा दी कि रात में चुपचाप राज-कुल के प्रत्येक व्यक्ति के कान (या छिगुनी) काट कर प्रात:काल दरबार में राज-चरणों में अर्पित किए जाएँ।

और प्रात:काल वहीं रंगमहल की सीढ़ियों पर, उसके चरणों में यह वीभत्स उपहार चढ़ाया गया होगा — और उसने उसी दर्प-भरी अवज्ञा में, होठों की तार-सी तनी पतली रेखा को तनिक मोड़-सी देकर, शब्द किया होगा, ‘हूँ’ और रक्त-सने थाल को पैर से तनिक-सा ठुकरा दिया होगा –
चूलिक-फा — निष्कंटक राजा – लेकिन नहीं यह तीर-सा कैसा साल गया? एक राजकुमार भाग गया –अक्षत –
लेफ्टिनेंट सागर मानो चूलिका-फा के चीत्कार को स्पष्ट सुन सका। अक्षत – भाग गया?

वहाँ सामने — लेफ्टिनेंट ने फिर आँखों को कस कर बादलों की दरार को भेदने की कोशिश की — वहाँ सामने कहीं नगा पर्वत श्रेणी है। वनवासी वीर नगा जातियों से अहोम राजाओं की कभी नहीं बनी –वे अपने पर्वतों के नंगे राजा थे, ये अपनी समतल भूमि के कौशेय पहन कर भी अधनंगे रहने वाले महाराजा, पीढ़ियों के युद्ध के बाद दोनों ने अपनी-अपनी सीमाएँ बाँध ली थीं और कोई किसी से छेड़-छाड़ नहीं करता था — केवल सीमा-प्रदेश पर पड़ने वाली नमक की झीलों के लिए युद्ध होता था क्योंकि नमक दोनों को चाहिए था। पर अहोम राजद्रोही नगा जातियों के सरदार के पास आश्रय पाए — असह्य है – असह्य –

हवा ने साँय-साँय कर के दाद दी असह्य। मानो चूलिक-फा के विवश क्रोध की लम्बी साँस सागर की देह को छू गई- यहीं खड़े होकर उसने वह सांस खींची होगी — उस मेहराब ही की इँट-इँट में तो उसके सुलगते वायु-कण बसे होंगे?

लेकिन जाएगा कहाँ – उसकी वधू तो है? वह जानेगी उसका पति कहाँ है, उसे जानना होगा – जयमती अहोम राज्य की अद्वितीय सुन्दरी — जनता की लाडली — होने दो – चूलिक-फा राजा है, वह शत्रुविहीन निष्कण्टक राज्य करना चाहता है – जयमती को पति का पता देना होगा — उसे पकड़वाना होगा — चूलिक-फा उसका प्राण नहीं चाहता, केवल एक कान चाहता है, या एक छिगुनी — चाहें बायें हाथ की भी छिगुनी – क्यों नहीं बतायेगी जयमती? वह प्रजा है; प्रजा की हड्डी-बोटी पर भी राजा का अधिकार है –

बहुत ही छोटे एक क्षण के लिए चाँद झलक गया। सागर ने देखा, सामने खुला, आकारहीन, दिशाहीन, मानातीत निरा विस्तार; जिसमें नरसलों की सायँ-सायँ, हवा का असंख्य कराहटों के साथ रोना, उसे घेरे हुए मेहराबों की क्रुद्ध साँपों की-सी फुँफकार चाँद फिर छिप गया और पानी की नयी बौछार के साथ सागर ने आँखें बन्द कर लीं असंख्य सहमी हुई कराहें और पानी की मार ऐसे जैसे नंगे चूतड़ों पर स-दिया प्रान्त के लचीले बेतों की सड़ाक-सड़ाक। स-दिया अर्थात शव-दिया? कब किसका शव वहाँ मिलता था याद नहीं आता, पर था शव जरूर — किसका शव नहीं, जयमती का नहीं। वह तो — वह तो उन पाँच लाख बेबस देखने वालों के सामने एक लकड़ी के मंचपर खड़ी है, अपनी ही अस्पृश्य लज्जा में, अभेद्य मौन में, अटूट संकल्प और दुर्दमनीय स्पर्द्धा में लिपटी हुई; सात दिन की भूखी-प्यासी, घाम और रक्त की कीच से लथपथ, लेकिन शेषनाग के माथे में ठुकी हुई कोली की भाँति अडिग, आकाश को छूने वाली प्रात:शिखा-सी निष्कम्प लेकिन यह क्या? सागर तिलमिला कर उठ बैठा। मानों अँधेरे में भुतही-सी दीख पड़नेवाली वह लाखों की भीड़ भी काँप कर फिर जड़ हो गई — जयमती के गले से एक बड़ी तीखी करूण चीख निकल कर भारी वायु-मण्डल को भेद गई — जैसे किसी थुलथुल कछुए के पेट को मछेरे की बर्छी सागर ने बड़े जोर से मुठि्ठयाँ भींच ली क्या जयमती टूट गई? नहीं, यह नहीं हो सकता, नरसलों की तरह बिना रीढ़ के गिरती-पड़ती इस लाख जनता के बीच वही तो देवदारू-सी तनी खड़ी है, मानवता की ज्योति:शलाका सहसा उसके पीछे से एक दृप्त, रूखी, अवज्ञा-भरी हँसी से पीतल की तरह झनझनाते स्वर ने कहा, ”मैं राजा हूँ -”

सागर ने चौक कर मुड़ कर देखा –सुनहला, रेशमी वस्त्र, रेशमी उत्तरीय, सोने की कंठी और बड़े-बड़े अनगढ़ पन्नों की माला पहने भी अधनंगा एक व्यक्ति उसकी और ऐसी दया-भरी अवज्ञा से देख रहा था, जैसे कोई राह किनारे के कृमि-कीट को देखे। उसका सुगठित शरीर, छेनी से तराशी हुई चिकनी मांस-पेशियाँ, दर्प-स्फीत नासाएँ, तेल से चमक रही थीं, आँखों की कोर में लाली थी जो अपनी अलग अलग बात कहती थी — मैं मद भी हो सकती हूँ, गर्व भी, विलास-लोलुपता भी और निरी नृशंस नर-रक्त-पिपासा भी सागर टुकुर-टुकुत देखता रह गया। न उड़ सका, न हिल सका। वह व्यक्ति फिर बोला, ”जयमती? हुँ: , जयमती – अँगूठे और तर्जनी की चुटकी बना कर उसने झटक दी, मानो हाथ का मैल कोई मसल कर फेंक दे। बिना क्रिया के भी वाक्य सार्थक होता है, कम-से-कम राजा का वाक्य सागर ने कहना चाहा, ”नृशंस- राक्षस- ” लेकिन उसकी आँखों की लाली में एक बाध्य करनेवाली प्रेरणा थी, सागर ने उसकी दृष्टि का अनुसरण करते हुए देखा, जयमती सचमुच लड़खड़ा गई थी। चीखने के बाद उसका शरीर ढीला होकर लटक गया था, कोड़ों की मार रुक गई थी, जनता साँस रोके सुन रही थी सागर ने भी साँस रोक ली। तब मानो स्तब्धता में उसे अधिक स्पष्ट दीखने लगा, जयमती के सामने एक नगा बाँका खड़ा था, सिर पर कलगी, गले में लकड़ी के मुँड़ों की माला, मुँह पर रंग की व्याघ्रोपम रेखाएँ, कमर के घास की चटाई की कौपीन, हाथ में बर्छी। और वह जयमती से कुछ कह रहा था।

सागर के पीछे एक दर्प-स्फीत स्वर फिर बोला, ”चूलिक-फा के विधान में हस्तक्षेप करनेवाला यह ढीठ नगा कौन है? पर सहसा उस नंगे व्यक्ति का स्वर सुनाई पड़ने लगा और सब चुप हो गए।
”जयमती, तुम्हारा साहस धन्य है। जनता तुम्हें देवी मानती है। पर और अपमान क्यों सहो? राजा का बल अपार है — कुमार का पता बता दो और मुक्ति पाओ -”
अब की बार रानी चीखी नहीं। शिथिल-शरीर, फिर एक बार कराह कर रह गई।

नगा वीर फिर बोला, ”चुलिक-फा केवल अपनी रक्षा चाहता है, कुमार के प्राण नहीं। एक कान दे देने में क्या है? या छिगुनी? उतना तो भी खेल में या मल्ल-युद्ध में भी जा सकता है।”
रानी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
”चूलिक-फा डरपोक है, डर नृशंस होता है। पर तुम कुमार का पता बता कर अपनी मान-रक्षा और पति की प्राण-रक्षा कर सकती हो।”
सागर ने पीछे सुना, ”हुँ:,” और मुड़ कर देखा, उस व्यक्ति के चेहरे पर एक क्रूर कुटिल मुसकान खेल रही है।
सागर ने उद्धत होकर कहा, ”हुँ: क्या?”
वह व्यक्ति तन कर खड़ा हो गया, थोड़ी देर सागर की ओर देखता रहा, मानो सोच रहा हो, इसे क्या वह उत्तर दे? फिर और भी कुटिल ओठों के बीच से बोला, ”मैं चूलिक-फा, डरपोक! अभी जानेगा। पर अभी तो मेरे काम की कह रहा है –”
नगा वीर जयमती के और निकट जाकर धीरे-धीरे कुछ कहने लगा।
चूलिक फा ने भौं सिकोड़ कर कहा क्या फुसफुसा रहा है?
सागर ने आगे झुक कर सुन लिया।
”जयमती, कुमार तो अपने मित्र नगा सरदार के पास सुरक्षित है। चूलिक तो उसे तो उसे पकड़ ही नहीं सकता, तुम पता बता कर अपनी रक्षा क्यों न करो? देखो, तुम्हारी कोमल देह –”

आवेश में सागर खड़ा हो गया, क्योंकि उस कोमल देह में एक बिजली-सी दौड़ गई और उसने तन कर, सहसा नगा वीर की ओर उन्मुख होकर कहा, ”कायर, नपुंसक तुम नगा कैसे हुए? कुमार तो अमर है, कीड़ा चूलिक-फा उन्हें कैसे छुएगा? मगर क्या लोग कहेंगे, कुमार की रानी जयमती ने देह की यन्त्रणा से घबड़ा कर उसका पता बता दिया? हट जाओ, अपना कलंकी मुँह मेरे सामने से दूर करो – ”

जनता में तीव्र सिहरन दौड़ गई। नरसल बड़ी जोर से काँप गए; गँदले पानी में एक हलचल उठी जिसके लहराते गोल वृत्त फैले कि फैलते ही गए; हवा फँुककार उठी, बड़े जोर की गड़गड़ाहट हुई। मेघ और काले हो गए — यह निरी रात है कि महानिशा, कि यन्त्रणा की रात — सातवीं रात, कि नवीं रात? और जयमती क्या अब बोल भी सकती है, क्या यह उसके दृढ़ संकल्प का मौन है, कि अशक्तता का? और यह वही भीड़ है कि नयी भीड़, वही नगा वीर, कि दूसरा कोई, कि भीड़ में कई नगे बिखरे है

चूलिक-फा ने कटु स्वर में कहा, ”फिर आया वह नंगा?”
नगा वीर ने पुकार कर कहा, ”जयमती – रानी जयमती – ”
रानी हिली-डुली नहीं।
वीर फिर बोला, ”रानी – मैं उसी नगा सरदार का दूत हूँ, जिसके यहाँ कुमार ने शरण ली है। मेरी बात सुनो।”
रानी का शरीर काँप गया। वह एक टक आँखों से उसे देखने लगी, कुछ बोली नहीं। सकी नहीं।
”तुम कुमार का पता दे दो। सरदार उसकी रक्षा करेंगे। वह सुरक्षित है।”
रानी की आँखों में कुछ घना हो आया। बड़े कष्ट से उसने कहा, ”नीच – ”एक बार उसने ओठों पर जीभ फेरी, कुछ और बोलना चाहा, पर सकी नहीं।
चूलिक-फा ने वहीं से आदेश दिया, ”पानी दो इसे — बोलने दो – ”

किसी ने रानी के ओठों की ओर पानी बढ़ाया। वह थोड़ी देर मिट्टी के कसोरे की ओर वितृष्ण दृष्टि से देखती रही, फिर उसने आँख भर कर नगा युवक की ओर देखा, फिर एक घूँट पी लिया। तभी चूलिक-फा ने कहा, ”बस, एक-एक घूँट, अधिक नहीं – ”
रानी ने एक बार दृष्टि चारों ओर लाख-लाख जनता की ओर दौड़ाई। फिर आँखें नगा युवक पर गड़ा कर बोली, ”कुमार सुरक्षित है। और कुमार की यह लाख-लाख प्रजा — जो उनके लिए आँखें बिछाये है — एक नेता के लिए, जिसके पीछे चल कर आततायी का राज्य उलट दे — जो एक आदर्श माँगती है — मैं उसकी आशा तोड़ दूँ — उसे हरा दूँ — कुमार को हरा दूँ?”
वह लक्षण भर चुप हुई। चूलिक-फा ने एक बार आँख दौड़ा कर सारी भीड़ को देख लिया। उसकी आँख कहीं टिकी नहीं मानो उस भीड़ में उसे टिकने लायक कुछ नहीं मिला, जैसे रेंगते कीड़ों पर दीठ नहीं जमती।

नगा ने कहा, ”प्रजा तो राजा चूलिक-फा की है न?”
रानी ने फिर उसे स्थिर दृष्टि से देखा। फिर धीरे-धीरे कहा, ”चूलिक-” और फिर कुछ ऐसे भाव से अधूरा छोड़ दिया कि उसके उच्चारण से मुँह दूषित हो जाएगा। फिर कहा, ”यह प्रजा कुमार की है — जा कर नगा सरदार से कहना कि कुमार — वह फिर रुक गई। पर तू — तू नगा नहीं, तू तो उस — उस गिद्ध की प्रजा है — जा उसके गन्दे पंजे को चाट –

रानी की आँखें चूलिक-फा की ओर मुड़ी पर उसकी दीठ ने उसे छुआ नहीं, जैसे किसी गिलगिली चीज की और आँखें चढ़ाने में भी घिन आती है नगा ने मुसकरा कर कहा, ”कहाँ है मेरा राजा – ” चूलिक-फा ने वहीं से पुकार कर कहा, ”मैं यह हूँ — अहोम राज्य का एकछत्र शासक – ” नगा युवक सहसा उसके पास चला आया।

सागर ने देखा, भीड़ का रंग बदल गया है। वैसा ही अन्धकार, वैसा ही अथाह प्रसार, पर उसमें जैसे कहीं व्यवस्था, भीड़ में जगह-जगह नगा दर्शक बिखरे, पर बिखरेपन में भी एक माप नगा ने पास से कहा, ”मेरे राजा – ”

एकाएक बड़े जोर की गड़गड़ाहट हुई। सागर खड़ा हो गया उसने आँखें फाड़ कर देखा, नगा युवक सहसा बर्छी के सहारे कई-एक सीढ़ियाँ फाँद कर चूलिक-फा के पास पहुँच गया है, बर्छी सीढ़ी की इँटों की दरार में फँसी रह गई है, पर नगा चूलिक-फा को धक्के से गिरा कर उसकी छाती पर चढ़ गया है; उधर जनता में एक बिजली कड़क गई है, ”कुमार की जय – ”किसीने फाँद कर मंच पर चढ़ कर कोड़ा लिए जल्लादों को गिरा दिया है, किसीने अपना-अंग-वस्त्र जयमती पर डाला है और कोई उसके बन्धन की रस्सी टटोल रहा है।

पर चूलिक-फा और नगा सागर मन्त्र-मुग्ध-सा खड़ा था; उसकी दीठ चूलिक-फा पर जमी थी सहसा उसने देखा, नगा तो निहत्था है, पर नीचे पड़े चूलिक-फा के हाथ में एक चन्द्रकार डाओ है जो वह नगा के कान के पीछे साध रहा है — नगा को ध्यान नहीं है; मगर चूलिक-फा की आँखों में पहचान है कि नगा और कोई नहीं, स्वयं कुमार है; और वह डाओ साध रहा है कुमार छाती पर है, पर मर जाएगा या क्षत भी हो गया तो चूलिक-फा ही मर गया तो भी अगर कुमार क्षत हो गया तो — सागर उछला। वह चूलिक-फा का हाथ पकड़ लेगा — डाओ छीन लेगा।

पर वह असावधानी से उछला था, उसका कीचड़-सना बूट सीढ़ी पर फिसल गया और वह लुढ़कता-पुढ़कता नीचे जा गिरा।
अब? चूलिक-फा का हाथ सध गया है, डाओ पर उसकी पकड़ कड़ी हो गई है, अब —

लेफ्टिनेन्ट सागर ने वहीं पड़े-पड़े कमर से रिवाल्वर खींचा और शिस्त लेकर दाग दिया धाँय –
धुआँ हो गया। हटेगा तो दीखेगा – पर धुआँ हटता क्यों नहीं? आग लग गई — रंग-महल जल रहा है, लपटें इधर-उधर दौड़ रही है। क्या चूलिक-फा जल गया? — और कुमार — क्या यह कुमार की जयध्वनि है? कि जयमती की यह अद्भुत, रोमांचकारी गँूज, जिसमें मानो वह डूबा जा रहा है, डूबा जा रहा है — नहीं, उसे सँभलना होगा।

लेफ्टिनेन्ट सागर सहसा जाग कर उठ बैठा। एक बार हक्का-बक्का होकर चारों ओर देखा, फिर उसकी बिखरी चेतना केन्द्रित हो गई। दूर से दो ट्रकों की दो जोड़ी बत्तियाँ पूरे प्रकाश से जगमगा रही थीं, और एक से सर्च-लाइट इधर-उधर भटकती हुई रंग-महल की सीढ़ियों को क्षण-क्षण ऐसे चमका देती थी मानो बादलों से पृथ्वी तक किसी वज्रदेवता के उतारने का मार्ग खुल जाता है। दोनों ट्रकों के हार्न पूरे जोर से बजाये जा रहे थे।

बौछार से भीगा हुआ बदन झाड़ कर लेफ्टिनेन्ट सागर उठ खड़ा हुआ। क्या वह रंग-महल की सीढ़ियों पर सो गया था? एक बार आँखें दौड़ा कर उसने मेहराब को देखा, चाँद निकल आया था, मेहराब की इँटें दीख रही थीं। फिर धीरे-धीरे उतरने लगा।
नीचे से आवाज आई, ”सा’ब, दूसरा गाड़ी आ गया, टो कर के ले जाएगा – ”

सागर ने मुँह उठा कर सामने देखा, और देखता रह गया। दूर चौरस ताल चमक रहा था, जिसके किनारे पर मन्दिर भागते बादलों के बीच में काँपता हुआ, मानो शुभ्र चाँदनी से ढका हुआ हिंडोला — क्या एक रानी के अभिमान का प्रतीक, जिसने राजा को बचाया, या एक नारी के साहस का, जिसने पुरूष का पथ-प्रदर्शन किया; या कि मानव मात्र की अदम्य स्वातंत्र प्रेरणा का अभीत, अज्ञेय, जय-दोल?

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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आज शाम है बहुत उदास

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लोहामंडी… कृषि कुंज… इंदरपुरी… टोडापुर… ठक ठक ठक… खटारा ब्लू लाइन के कंडक्टर ने खिड़की से एक हाथ बाहर निकाल बस के टीन को पीटते हुए जोर से गला फाड़कर आवाज लगाई, मानो सवारियों के घर-दफ्तरों तक से उन्हें खींच लाने का मंसूबा हो। उस ठक-ठक में आस्था अक्सर टीन का रुदन सुना करती थी, उस दिन भी सुना। जिस बेरहमी से उसे पीटा जाता था, आस्था को उसका रुदन एक वाजिब हरकत जान पड़ती थी। इस तरह बस की बॉडी को पीटने से डिस्टर्ब हुए एक यात्री ने एक भद्दी-सी गली खिड़की से बाहर फेकी और फिर से ऊँघने का प्रयत्न करने लगा और कुछ मिनट के बाद बस चल पड़ी। 853 नंबर रूट की यह बस इस समय पायल सिनेमा से लोहामंडी की ओर बढ़ रही थी। यह वह दौर था जब दिल्ली में मेट्रो की आहट तो छोड़िए, किसी के ख्वाब-ख्वाब में भी भविष्य में इसकी आमद का कोई विचार जन्म तक नहीं ले पाया था। दिल्ली में सड़कों पर दौड़ती बसें, कारें, ऑटो और उनमें भरी बेतहाशा भीड़ रेड-लाइट आते ही सहम जाती थी। रेड लाइट पर ये अंतहीन जाम तब भी जीवन का हिस्सा था पर उससे कोई निजात दूर-दूर तक नजर नहीं आती थी और न ही कामकाजी लड़कियों के लिए मेट्रो जैसा संकटमोचक उस जाम से बचकर वक्त पर घर पहुँच जाने का सपना दिखाता था। फ्लाई ओवरों का यह जाल अपने शुरुआती दौर में नन्हें शिशु की भाँति सबमें उम्मीद जरूर जगा रहा था पर उस उम्मीद को पंख लगना अभी बाकी था।

उत्तम नगर से शुरू होकर चलने वाली बस ठसाठस भरी हुई थी क्योंकि यह ऑफिस टाइम था। उस भीड़ से भी ड्राईवर और कंडक्टर की टीम को संतोष नहीं था। टीम इसलिए कि बस में कंडक्टर के साथ 1-2 सहायक भी थे जो आगे पीछे बिखरे हुए थे। 17 से 25 साल तक के इन सब लड़कों की टीम का एक ही अजेंडा था किसी तरह पीछे आ रही एक अन्य इसी नंबर और रूट की बस के आने से पहले ज्यादा से ज्यादा सवारियाँ बस में भर लेना। इस पूरी कवायद में वे सफल भी रहे क्योंकि बस की स्थिति उस तकिए जैसी हो गई थी जिसमें जरूरत से ज्यादा रूई भर दी गई हो। बस पिछले कई सालों में इतना चल चुकी थी उसमें तेज हॉर्न की आवाज के साथ-साथ लगभग हर हिस्से से आवाज आती थी। बॉडी में यहाँ-वहाँ से उखड़ी टीन की परतें उसे और भी कुरूप बना रहे थे। वैसे बस मालिकों के लिए ऐसी पुरानी बसें उस दुधारू गाय की तरह होती थी जो बुढ़ापे में भी लगातार दुहे जाने को अभिशप्त थी जब तक उसमें दूध की एक बूँद भी बाकी हो। सच तो यह था कि जब मन चाहे, अड़ियल घोड़े-सी अड़कर, आगे जाने से इनकार कर देने वाली इन बसों में बैठना जोखिम का काम था पर डेली सवारियों के आगे और कोई चारा भी तो नहीं था। शाम के उस धुंधलके के घिरते ही घर वह जन्नत हो जाता है कि दिन भर की थकान से झुके कंधों का बोझ ढोते लोग, उसके आगोश में छुप जाने की तमन्ना में चुंबक की तरह चले जाते हैं, तब ऐसे में खटारा, दम-तोड़ती ‘किलर’ बसें भी बेहद अपनी सी लगा करती थी।

यह नवंबर 1994 की एक गहराती शाम थी। पूरे दिन अपनी रोशनी और गर्माहट से धरती को नवाजता सूरज अब थककर डूबने का मंसूबा बाँध चुका था और धीरे-धीरे क्षितिज पर लाली फैल कर दिवस के अवसान की घोषणा कर रही थी। पिछले कई दिनों से दिवाली की आपाधापी के कारण रोज देर हो जाती थी। फैक्टरी के कामगारों की सैलरी, दिवाली का बोनस और एडवांस सब एक साथ निपटाने में पूरा स्टाफ बिजी था। ऑफिस में सब कुछ अभी हाल ही में कंप्यूटराइज्ड होने का खामियाजा आस्था को भुगतना पड़ रहा था। तकनीक का जन्म मनुष्य का जीवन आसान करने के लिए हुआ वही तकनीक का दामन थामना कभी-कभी मुसीबत का सबब बन जाता है। यूँ भी उन दिनों उसके ऑफिस में कंप्यूटर एक अजूबा था और पूरे ऑफिस में वह अकेली कंप्यूटर ऑपरेट करने में सक्षम थी तो लिहाजा उसके पास काम जैसे द्रौपदी का अक्षय-पात्र बन गया था, कभी खत्म ही नहीं होता था। कई दिन से लेट हो रही थी तो जल्दी घर पहुँचने के लिए ऑटो लेना पड़ता था। घड़ी में समय देखा, बमुश्किल आज समय पर ऑफिस से निकल पाई थी। हैरत थी कि पार करते समय सड़क भी खाली मिली और उसकी नजरें उस पार से आने वाली बसों पर जमी थी और कोई एक मिनट बाद वह बस स्टैंड पर थी।

बस में चढ़ते ही रोज की तरह उसने खाली सीट तलाशनी चाही पर कही कोई सीट खाली नहीं थी। वह बस की नियमित सवारी थी और यह कंडक्टर लड़का उसे सीट दिलाने के लिए कुछ ज्यादा ही इच्छुक रहा करता था। उस रोज भी वह उसे देखकर खड़ा हो गया और अनकहे ही अपनी सीट उसने आस्था के लिए छोड़ दी। वह रोज इसी बस में आती थी और जानती थी कि अब पीछे आ रही बस को सँभालने के लिए उस लड़के ने कमर कस ली है, तो उसे सीट की जरूरत नहीं है, ऐसे में आस्था पर सीट कुर्बान करने का मौका वह नहीं छोड़ने वाला था।

उस दिल घबरा देने वाली भीड़ और ठसाठस भरी बस में चढ़ते ही सीट मिलना सुखद लगा। मन ही मन कंडक्टर लड़के को धन्यवाद देते और उस पर एक आभार भरी मुस्कान फेंकने के बाद उसने जल्दी से सीट पर काबिज होना उचित समझा, क्योंकि एक अनार और सौ बीमार वाली कहावत यहाँ इतनी सटीक बैठती थी कि उसे डर था कि कोई अगल-बगल से निकलकर सीट पर कब्जा कर उसे उस भीड़ में धक्के खाने के लिए न छोड़ दे।

बस चलने के साथ ही ठंडी हवा के एक झोंके ने उसे छुआ और अनायास ही उसे अनिकेत की याद आ गई। एक हल्की सी मुस्कान चोरी-छुपे उसके होंठों पर तैर गई, जिसे उसने आस-पास देखते हुए बड़ी आसानी से चेहरे पर झूल गई एक लट को ठीक करते हुए छिपा लिया। इन मेहनतकश, बोर रूटीन वाले दिनों और इस भीड़भरी बस में अनिकेत के ख्याल ने उसे ताजादम कर दिया था।

“उफ्फ ये भीड़, यू नो अनिकेत, तुम्हारी बाहें दुनिया की सबसे महफूज जगह है, इनमें छुपकर खो जाने को जी चाहता है…” वह धीमे से उसके कान में फुसफुसाती।

“एंड यू डोंट नो आस्था, तुम्हारी आँखें सबसे खतरनाक, इनमें डूबकर जीने नहीं मर जाने को दिल चाहता है…।”

वह उसे छेड़ते हुए उसकी ओर झुकता…

“हाहाहा, यू नॉटी… स्टॉप देयर”

और वह उसे रोककर, झूठ-मूठ गुस्सा होते हुए, लोगों की ओर इशारा करती, ऑखें दिखाती।

अनिकेत उसका मंगेतर था। उन दोनों का विवाह तय हो चुका था और इसके लिए उन्होंने लंबी प्रतीक्षा की थी। प्रेम के विवाह में बदलने की प्रतीक्षा के पलों को काटने के लिए वे अक्सर मिला करते थे। हफ्ते में दो-तीन बार अनिकेत को उसके ऑफिस के समीप ही ऑडिटिंग के लिए आना होता था। कई बार अनिकेत उसे वही बस-स्टॉप पर इंतजार करता मिलता और दोनों साथ-साथ घर लौटते, वहाँ तक जहाँ से दोनों के रास्ते अलग हो जाते, वे लम्हा-लम्हा एक दूसरे से अपने दिन भर के अनुभव बाँटकर एक-दूसरे के सान्निध्य को महसूसते। लेकिन आस्था की व्यस्तता के कारण पिछले दस दिनों से उनकी मुलाकात नहीं हुई थी। मौसम में हल्की सी सर्दी घुलने लगी थी और अनिकेत के ख्याल ने उसे एक गर्माहट भरे एहसास के साथ अपने आगोश में ले लिया। वह बड़ी शिद्दत से उसके साथ को मिस कर रही थी। जाने क्यों उसे लगा कि एक मुकाम, एक मंजिल तय हो जाने के बाद प्रतीक्षा जानलेवा हो जाती है। कही पढ़ा हुआ याद आने लगा कि समय उनके लिए सबसे धीमी गति से चलता है जो इंतजार में होते हैं। उफ्फ, ये इंतजार, अनिकेत यहाँ होता तो उससे कहती, मेरी ऑखें नहीं इंतजार में होना, दुनिया में सबसे खतरनाक है। प्रतीक्षा का एक नया दौर शुरू हो चुका था, अब वह सर को धीमे से झटकते हुए इस ख्याल से दूर जाने का इंतजार करने लगी।

बैठने के बाद उसने पाया कि साथवाली सीट पर खिड़की के पास एक कद्दावर बुजुर्ग सरदारजी पहले से बैठे हुए थे। अक्सर उस लंबे सफर में वह अपने बैग में कुछ किताबें या पत्रिकाएँ साथ रखा करती थी। अगर वह संभव न हो तो चुपचाप खिड़की से बाहर पीछे की छूटते पेड़ों, इमारतों और बस स्टॉप पर खड़े लोगों को देखने में अपना वक्त खर्च किया करती थी। उस दिन ऐसी कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि वह खिड़की के पास नहीं बैठी थी। सिखों को लेकर मन के किसी कोने में एक विचित्र-से अपनेपन का अहसास, एक सॉफ्ट कोर्नर आस्था हमेशा से महसूस करती आई थी, इसका राज उसकी परवरिश और परिवेश से जुड़ी माजी की यादों में कैद था। अचानक ‘राजी’ की याद धीमे-धीमे हवा की नमी में घुलते हुए उसे सहलाने लगी। राजी यानि रंजीत कौर, उसके बचपन की सबसे प्यारी दोस्त, अब उससे दूर, कही बहुत दूर थी। राजी की याद अकेले नहीं आती थी, जब आती थी तो अपने साथ जाने कितनी खटटी-मीठी यादों को भी लाती थी। कही कुछ था उनसे यादों से जुड़ा कि आस्था एकाएक असहज हो जाती और यादें धीरे-धीरे एक भयावह अतीत के एक काले एपिसोड में बदल जाती। स्मृतियों के पुल का दूसरा सिरा खो चुका था और उस होकर गुजरने वाले लम्हे बेमकसद यूँ ही हवा में लहराते एक भयावह कोलाज बना रहे थे। दंगाई… किरपाण… चीखें… जलते टायर… बिखरी हुई चीजें, जली हुई लाशें और कई जागती रातें। वे रातें जो राजी को उससे हमेशा के लिए जुदा कर अपने साथ ले गई, कभी न लौटने देने के लिए। उस सुहाने मौसम में भी एकाएक कनपटियों पर पसीने की कुछ बूँदे चू आई। एक सिहरन उसकी रीढ़ की हड्डी से उतरती हुई उसके पूरे वजूद को हिला गई। अजीब सी बेचैनी महसूस हुई तो उसने बैग से अपना रूमाल निकाला और यूँ ही बेमकसद सामने की सीट की ओर देखने लगी।

उसके ठीक सामने वाली सीट पर एक महिला अपनी बेटी के साथ बैठी थी। बार-बार सीट पर गिरते उस शराबी शोहदे से बचाकर बेटी को तो खिड़की के पास बैठा दिया था, जो गाड़ी में चलते एक चलताऊ गाने पर झूम रहा था और खुद सिमटते हुए, बार-बार बेचैनी से पहलू बदल रही थी। अपने पौरुषीय प्रतीक को बार-बार उसके कंधे पर चस्पा करते उस इनसान रूपी जानवर को देखकर, आस्था दिल चाहा जोर से झापड़ रसीद कर उसे बस से नीचे धकेल दे कि तभी कुछ लोग सरक कर बीच में आकर खड़े हो गए और उसका खौलता खून भी आदतन शांत होने लगा। यूँ भी ऐसे दृश्य बस में आम थे, बसों में भीड़ के साथ ऐसे लोगों को भी झेलना महिलाओं का नसीब था। बस तेजी से मंतव्य की ओर दौड़ रही थी। यह कंडक्टर के लिए रिजर्व सीट थी और बस में सबसे आगे थी। इसके ठीक बाद उतरने का दरवाजा था और उसे बाद एक खुला केबिन जिसमें ड्राईवर के साथ बैठे लोग जोर से कहकहे लगा रहे थे, ‘चक्कर अच्छा गया था’ और साथ वाली बस काफी पीछे छूट चुकी थी। अमूमन इस दौर में सड़कों पर खासकर इस रूट पर ब्लू लाइन और रेड लाइन बसों का राज था। हालाँकि कुछ डीटीसी की बसें भी खानापूर्ति करती नजर आ जाया करती थी। उत्तमनगर से बनकर चली यह बस और इस रूट की तमाम बसें मायापुरी और नारायणा जैसे इंडस्ट्रियल एरिया से गुजरते हुए उन तमाम कामगारों के लिए वरदान साबित होती थी जो साइकिल से एक कदम आगे बढ़कर बस की सवारी अफोर्ड कर सकते थे। वही इंदरपुरी से लेकर पूसा, रजिंदर प्लेस से लेकर देव नगर (खालसा कॉलेज) तक यह ऑफिस में काम करने वाली सवारियों का भी बड़ा सहारा थी जो अपने कपड़ों की क्रीज सँभालते हुए रोजी-रोटी कमाने इस विशालकाय मानवीय समुद्र में खो जाने के लिए रोज घर से निकलते थे।

बस इस समय लोहा मंडी से आगे कृषि-कुंज पहुँचने ही वाली थी कि अचानक जोर से ब्रेक लगा और बस में चीखपुकार मच गई। वह ऐसे ‘झटकों’ की अभ्यस्त थी और खुद को सँभाल गई पर सरदार जी के साथ कही कुछ हुआ था जिस पर उसका ध्यान ही नहीं गया। हुआ यूँ कि ड्राईवर, कंडक्टर टीम की सारी आशंकाओं को सच साबित करते हुए पीछे आ रही इसी नंबर की दूसरी ‘ब्लू लाइन’ एकाएक इसे ओवर टेक करते हुए स्टैंड पर इसके ठीक आगे खड़ी हो गई, लिहाजा उसके इस अप्रत्याशित कदम से इस बस के ड्राईवर को एकाएक ब्रेक लगाने पड़े। नतीजन बस को तेज झटका लगा और कितनी ही सवारियाँ आगे की ओर गिर पड़ीं। हालाँकि यह पहली सीट थी पर आस्था जैसी नियमित सवारियों के लिए यह बेहद मामूली बात थी तो वे सँभल भी गए। झटके से सँभलकर उसने देखा, साथ बैठे सरदार जी के सिर से खून बह रहा है। असल में जब बस जोर से रुकी तो वे खुद को सँभाल नहीं पाए और उनका सिर आगे डंडे से जा टकराया। उस खटारा बस में जगह से बस की बॉडी में निकले हुए लोहे के किसी पतरे से उनके सिर के टकराने पर माथे पर ‘कट’ पड़ा और खून बह निकला। उसने जोर से कंडक्टर को पुकारा और ‘फर्स्ट एड बॉक्स’ लाने को कहा। और कुछ पास न होने पर उसने अपने रूमाल को उनके माथे से लगा दिया।

शायद सिर टकराने से उन्हें हल्की मूर्छा भी आ गई थी। यह सब बस कुछ सेकंडों में ही घटित हुआ और धीरे-धीरे वे होश में आने लगे। आस्था खड़ी हो गई थी और एक हाथ उनके कंधे पर रखे हुए, दूसरे से उनके सिर पर रूमाल लगाए हुए थी। उनकी आँखें खुली कुछ ही क्षणों में वे सारा माजरा समझ गए थे। अनुभव बिना पूछे ही सिलसिलेवार रहस्य की सारी परते खोल देता है। सारी सवारियाँ अपनी-अपनी राय देने लगी और कंडक्टर फर्स्ट एड बॉक्स ढूँढ़ने का अभिनय कर रहा था। हालाँकि वह जानती थी कही कोई फर्स्ट एड बॉक्स होता तो उसके हाथ में सौंप दिया जाता। उसने एक हाथ से जल्दी से अपने बैग से छोटी पानी की बोतल निकाली और बेहद तेजी से उस रूमाल को खिड़की से बाहर धोकर, गीला कर उसे पलट कर फिर से उनके माथे पर लगा दिया। खून अब शायद रुक गया था और अचानक उस तक एक एंटी सेप्टिक क्रीम पहुँचाई गई जो पता नहीं कंडक्टर ने दी थी या किसी सवारी के बैग से निकली थी। थोड़ी क्रीम सरदार जी के माथे से लगाते हुए उसने चैन की साँस ली। खून सचमुच बंद हो गया था। सरदार जी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखते हुए बैठने का इशारा किया। उनके भारी-भरकम हाथ ने अनायास उसे घर से कुछ दूर खड़े विशाल, बूढ़े बरगद की याद दिला दी थी, जिसके साए में खेलते हुए वह हमेशा खुद को महफूज महसूस करती थी। एक अजीब से अहसास ने उसे घेर लिया था। जीवन में पिता का मौजूद होना शायद ऐसे ही बरगद की छाँव में होने जैसा सुख देता होगा, वह सोच रही थी। उनके इस इशारे का तात्पर्य था कि वे ठीक महसूस कर रहे थे और अब वह वापस अपनी सीट पर बैठ सकती थी।

उसने एक भरपूर नजर सरदार जी पर डाली तो पाया करीब वे 70-75 साल की आयु के मजबूत कदकाठी के बुजुर्ग थे। ठीक उसके दादा जी के उम्र के, करीब छ्ह फुट का कद, जो शायद अपने समय में बहुत शानदार लगता होगा। चौड़े कंधे, जो अब कुछ झुके हुए प्रतीत होते थे और बड़ी-बड़ी लाल आँखें थी। वृक्ष के वलयों से यदि उसकी आयु का पता चलता है तो चेहरे पर पड़ी हर झुर्री भी उम्र और अनुभव के सारे राज आपके सामने रख देती है। हल्के क्रीम कलर का पठानी सूट और हल्के पीले रंग की पगड़ी पहने हुए वे बहुत आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक नजर आते थे। उनका चेहरा खुशमिजाज था और चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान थी किंतु बड़ी-बड़ी उदास ऑखें एक अजीब सा खालीपन लिए विरोधाभास उत्पन्न करती थी, यह विरोधाभास हौले से उसे कचोट गया।

बस अब राजेंद्र प्लेस पहुँचने वाली थी। तभी उसे अपनी बगल की सीट से एक रोबदार आवाज सुनाई दी –

“तै कित्थे जाणा, कुड़े…? पंजाब में लड़की को कुड़ी या कुड़े कहा जाता है। ठेठ पंजाब में बोली जाने वाली पंजाबी में वे पूछ रहे थे, उसे कहाँ जाना है।

वह थोड़ी पंजाबी जानती थी, उसने जवाब दिया, “जी, मैं ते एत्थे ही थोड़ा अग्गे, देव नगर उतरना ए।”

इससे पहले वह बात करते हुए हिचकिचा रही पर देर से कुछ शब्द उसके जेहन को मथ रहे थे और बाहर आने को बेकाबू थे। जाने क्यों उनके सवाल ने उसे हौंसला दिया और किसी संबोधन की तलाश में खोने से पहले ही वह कह बैठी, “त्वानू टिटनेस दा इंजेक्शन लवाना जरूरी है। तुसी एस उमर विच कल्ले आया-जाया न करो।”

सरदार जी ने उसकी ओर देखा, कुछ पल वे यूँ ही देखते हुए कुछ कहने का प्रयास करते रहे। एकाएक उनकी उदास लाल आँखें डबडबा आई और रुँधे गले से बमुश्किल कुछ शब्द रेंगकर आस्था तक पहुँच पाए, “पुत्तरजी, कोई नई है नाल आन-जाण वाला। चौरासी विच… बेटे… पोते… सब…” इसके बाद उन्होंने आँसुओं से भरा चेहरा खिड़की की ओर घुमा दिया और उसकी आँखें भी कुछ क्षण कुछ देखने में असमर्थ हो गई। वह जानती थी उन डबडबाई आँखों में यादों के कितने ही मंजर एक-एक डूब रहे होंगे। अपने आँसू पूछते हुए उसने उनके कंधे पर अपना हाथ रख दिया। इसके बाद के कुछ पलों में वे दोनों कुछ कहने-सुनने की स्थिति में नहीं थे और मन ही मन अपने-अपने घावों को सहलाते रहे। उन्हें अपनी गिरफ्त में लिए हुए, दर्द का एक लावा सा बहता रहा और कुछ देर वे उसमें बहते रहने के अतिरिक्त कुछ न कर सके।

ओह, चौरासी यानि साल चौरासी यानि उन्नीस सौ चौरासी मानो ऐसी ट्रेन बन गया था जो आज फिर, सालों बाद उसकी स्मृतियों में से होकर धड़ाधड़ पटरी बनाते हुए गुजरने लगा और इस अंतहीन यात्रा में वह एक ऐसा मुसाफिर थी जिसे हाथ-पाँव बाँध कर उस ट्रेन में बैठने को अभिशप्त किया गया था। जिसके पहिए भी उसकी ही अंतरात्मा को रौंदते हुए उसके चिथड़े उड़ाते हुए लगातार चले जा रहे थे। अब वह ही सवार, वह ही पटरी और वह ही सफर थी, एक दर्दीला सफर जिसके रास्ते में आने वाले स्टेशन भी असहाय से बस बुत बने उसे चलते हुए देखने को विवश थे। उसके कल में छुपी थी अतीत की तमाम कड़वी यादें जिनसे छुटकारा पाने के प्रयास विफल रहे थे।

आज चौरासी का खौफनाक प्रेत, वक्त की बोतल से निकल कर एक बार फिर उसकी सोच पर वेताल की तरह सवार हो गया था। नहीं जानती थी, जाने अब कितने घंटे, कितने दिन और कितने साल और उसे इसे ढोते रहना था। देव नगर आने वाला था, बस अब काफी खाली हो गई थी। उसने सरदार जी की ओर देखा, सांत्वना का एक लम्हा, सफर कर इन आँखों से उन आँखों तक पहुँचा। उन लाल आँखों ने उसे आश्वस्त करने वाली एक नजर से देखा और अनबोले ही उसने उनसे विदा ले ली। बस रुकने पर चुपचाप रेड लाइट पर नीचे-उतर कर अगली बस पकड़ने के लिए बस स्टैंड की ओर पैदल चल पड़ी। एक अनजाने, अदृश्य बोझ से उसके कदम बोझिल हो चुके थे, मानो एक-एक पैर कई मन का हो गया था और अचानक उसे लगने लगा, जैसे वह खुद को ढोते हुए चल रही है। लगभग घिसटते हुए वह सड़क पर भीड़ के एक रेले में समा गई थी हालाँकि वह जानती थी दो लाल आँखें और एक उदास शाम अब भी उसका पीछा कर रही थी। भगवतीचरण वर्मा की पंक्तियाँ अब किताब से निकलकर उसके जेहन पर काबिज हो रही थी।

‘जीवन रेंग रहा है लेकर
सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
और डूबती हुई अमा में
आज शाम है बहुत उदास।’

अंजू शर्मा

अंजू शर्मा 

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आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

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हिमावृत चोटियों की श्रेणी, अनन्त आकाश के नीचे क्षुब्ध समुद्र! उपत्यका की कन्दरा में, प्राकृतिक उद्यान में खड़े हुए युवक ने युवती से कहा-”प्रिये!”

”प्रियतम! क्या होने वाला है?”

”देखो क्या होता है, कुछ चिन्ता नहीं-आसव तो है न?”

”क्यों प्रिय! इतना बड़ा खेल क्या यों ही नष्ट हो जायेगा?”

”यदि नष्ट न हो, खेल ज्यों-का-त्यों बना रहे तब तो वह बेकार हो जायेगा।”

”तब हृदय में अमर होने की कल्पना क्यों थी?”

”सुख-भोग-प्रलोभन के कारण।”

”क्या सृष्टि की चेष्टा मिथ्या थी?”

”मिथ्या थी या सत्य, नहीं कहा जा सकता- पर सर्ग प्रलय के लिए होता है, यह निस्सन्देह कहा जायगा, क्योंकि प्रलय भी एक सृष्टि है।”

”अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए बड़ा उद्योग था”-युवती ने निश्वास लेकर कहा।

”यह तो मैं भी मानूँगा कि अपने अस्तित्व के लिए स्वयं आपको व्यय कर दिया।”-युवक ने व्यंग्य से कहा।

युवती करुणाद्र्र हो गयी। युवक ने मन बदलने के लिए कहा-”प्रिये! आसव ले आओ।”

युवती स्फटिक-पात्र में आसव ले आयी। युवक पीने लगा।

”सदा रक्षा करने पर भी यह उत्पात?” युवती ने दीन होकर जिज्ञासा की।

”तुम्हारे उपासकों ने भी कम अपव्यय नहीं किया।” युवक ने सस्मित कहा।

”ओह, प्रियतम! अब कहाँ चलें?” युवती ने मान करके कहा।

कठोर होकर युवक ने कहा-”अब कहाँ, यहीं से यह लीला देखेंगे।”

सूर्य का अलात-चक्र के समान शून्य में भ्रमण, और उसके विस्तार का अग्नि-स्फुलिंग-वर्षा करते हुए आश्चर्य-संकोच! हिम-टीलों का नवीन महानदों के रूप में पलटना, भयानक ताप से शेष प्राणियों का पलटना! महाकापालिक के चिताग्नि-साधन का वीभत्स दृश्य! प्रचण्ड आलोक का अन्धकार!!!

युवक मणि-पीठ पर सुखासीन होकर आसव पान कर रहा है। युवती त्रस्त नेत्रों से इस भीषण व्यापार को देखते हुए भी नहीं देख रही है। जवाकुसुम सदृश और जगत् का तत्काल तरल पारद-समान रंग बदलना, भयानक होने पर भी युवक को स्पृहणीय था। वह सस्मित बोला-”प्रिये! कैसा दृश्य है।”

”इसी का ध्यान करके कुछ लोगों ने आध्यात्मिकता का प्रचार किया था।” युवती ने कहा।

”बड़ी बुद्धिमत्ता थी!” हँस कर युवक ने कहा। वह हँसी ग्रहगण की टक्कर के शब्द से भी कुछ ऊँची थी।

”क्यों?”

”मरण के कठोर सत्य से बचने का बहाना या आड़।”

”प्रिय! ऐसा न कहो।”

”मोह के आकस्मिक अवलम्ब ऐसे ही होते हैं।” युवक ने पात्र भरते हुए कहा।

”इसे मैं नहीं मानूँगी।” दृढ़ होकर युवती बोली।

सामने की जल-राशि आलोड़ित होने लगी। असंख्य जलस्तम्भ शून्य नापने को ऊँचे चढऩे लगे। कण-जाल से कुहासा फैला। भयानक ताप पर शीतलता हाथ फेरने लगी। युवती ने और भी साहस से कहा-”क्या आध्यात्मिकता मोह है?”

”चैतनिक पदार्थों का ज्वार-भाटा है। परमाणुओं से ग्रथित प्राकृत नियन्त्रण-शैली का एक बिन्दु! अपना अस्तित्व बचाये रखने की आशा में मनोहर कल्पना कर लेता है। विदेह होकर विश्वात्मभाव की प्रत्याशा, इसी क्षुद्र अवयव में अन्तर्निहित अन्त:करण यन्त्र का चमत्कार साहस है, जो स्वयं नश्वर उपादनों को साधन बनाकर अविनाशी होने का स्वप्न देखता है। देखो, इसी सारे जगत् के लय की लीला में तुम्हें इतना मोह हो गया?”

प्रभञ्जन का प्रबल आक्रमण आरम्भ हुआ। महार्णव की आकाशमापक स्तम्भ लहरियाँ भग्न होकर भीषण गर्जन करने लगीं। कन्दरा के उद्यान का अक्षयवट लहरा उठा। प्रकाण्ड शाल-वृक्ष तृण की तरह उस भयंकर फूत्कार से शून्य में उड़ने लगे। दौड़ते हुए वारिद-वृन्द के समान विशाल शैल-शृंग आवर्त में पड़कर चक्र-भ्रमण करने लगे। उद्गीर्ण ज्वालामुखियों के लावे जल-राशि को जलाने लगे। मेघाच्छादित, निस्तेज, स्पृश्य, चन्द्रबिम्ब के समान सूर्यमण्डल महाकापालिक के पिये हुए पान-पात्र की तरह लुढक़ने लगा। भयंकर कम्प और घोर वृष्टि में ज्वालामुखी बिजली के समान विलीन होने लगे।

युवक ने अट्टहास करते हुए कहा-”ऐसी बरसात काहे को मिलेगी! एक पात्र और।”

युवती सहमकर पात्र भरती हुई बोली-”मुझे अपने गले से लगा लो, बड़ा भय लगता है।”

युवक ने कहा-”तुम्हारा त्रस्त करुण अर्ध कटाक्ष विश्व-भर की मनोहर छोटी-सी आख्यायिका का सुख दे रहा है। हाँ एक …..”

”जाओ, तुम बड़े कठोर हो …..।”

”हमारी प्राचीनता और विश्व की रमणीयता ने तुम्हें सर्ग और प्रलय की अनादि लीला देखने के लिए उत्साहित किया था। अब उसका ताण्डव नृत्य देखो। तुम्हें भी अपनी कोमल कठोरता का बड़ा अभिमान था …..।”

”अभिमान ही होता, तो प्रयास करके तुमसे क्यों मिलती? जाने दो, तुम मेरे सर्वस्व हो। तुमसे अब यह माँगती हूँ कि अब कुछ न माँगूँ, चाहे इसके बदले मेरी समस्त कामना ले लो।” युवती ने गले में हाथ डालकर कहा।

— —

भयानक शीत, दूसरे क्षण असह्य ताप, वायु के प्रचण्ड झोंकों में एक के बाद दूसरे की अद्‌भुत परम्परा, घोर गर्जन, ऊपर कुहासा और वृष्टि, नीचे महार्णव के रूप में अनन्त द्रवराशि, पवन उन्चासों गतियों से समग्र पञ्चमहाभूतों को आलोड़ित कर उन्हें तरल परमाणुओं के रूप में परिवर्तित करने के लिए तुला हुआ है। अनन्त परमाणुमय शून्य में एक वट-वृक्ष केवल एक नुकीले शृंग के सहारे स्थित है। प्रभञ्जन के प्रचण्ड आघातों से सब अदृश्य है। एक डाल पर वही युवक और युवती! युवक के मुख-मण्डल के प्रकाश से ही आलोक है। युवती मूर्च्छितप्राय है। वदन-मण्डल मात्र अस्पष्ट दिखाई दे रहा है। युवती सचेत होकर बोली-

”प्रियतम!”

”क्या प्रिये?”

”नाथ! अब मैं तुमको पाऊँगी।”

”क्या अभी तक नहीं पाया था?”

”मैं अभी तक तुम्हें पहचान भी नहीं सकी थी। तुम क्या हो, आज बता दोगे?”

”क्या अपने को जान लिया था; तुम्हारा क्या उद्देश्य था?”

”अब कुछ-कुछ जान रही हूँ; जैसे मेरा अस्तित्व स्वप्न था; आध्यात्मिकता का मोह था; जो तुमसे भिन्न, स्वतन्त्र स्वरूप की कल्पना कर ली थी, वह अस्तित्व नहीं, विकृति थी। उद्देश्य की तो प्राप्ति हुआ ही चाहती है।”

युवती का मुख-मण्डल अस्पष्ट प्रतिबिम्ब मात्र रह गया था-युवक एक रमणीय तेज-पुंज था।

”तब और जानने की आवश्यकता नहीं, अब मिलना चाहती हो?”

”हूँ” अस्फुट शब्द का अन्तिम भाग प्रणव के समान गूँजने लगा!

”आओ, यह प्रलय-रूपी तुम्हारा मिलन आनन्दमय हो। आओ।”

अखण्ड शान्ति! आलोक!! आनन्द!!!

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जयशंकर प्रसाद

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हॉर्स रेस

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शिखर बहुराष्ट्रीय कंपनी के वातानुकूलित कमरे में बैठा हुआ था। उम्र होगी यही कोई पैंतीस के आस-पास। चेहरे पर थकान ने अपना बसेरा बना लिया था, फिर भी गाल और ललाट आत्मविश्वास से दमक रहे थे। अभी वह थोड़ा रिलैक्सड महसूस कर रहा था, क्योंकि कंपनी के टारगेट पूरे हो चुके थे। जो बाकी थे उनके भी पूरे होने की पक्की उम्मीद थी।

तभी उसके ऑफिस का एक बंदा सौरभ घबराया हुआ उसके पास आया। बोला, “सर, माय वाइफ इज सफरिंग फ्रॉम हेवी फीवर। आइ विल हैव टू गो… राइट नाउ… सर।”

दो पलों के लिए शिखर भी घबराकर उसकी बातें सुनता रहा। फिर बोला, श्योर-श्योर’। प्लीज गो…। सौरभ! तुम फौरन उन्हें अस्पताल लेकर जाओ और डॉक्टर से मिलने के बाद मुझे फोन करना। किसी चीज की जरूरत हो तो हेजिटेड मत करना… और पैसे की चिंता मत करना।”

“यस सर…।”

“हाँ, अभी कोई है उनके साथ?”

“हाँ, मेरी माँ है। माँ का ही फोन आया था।”

“ओके! प्लीज गो… फास्ट। टेक केयर।”

“थैंक यू सर… थैंक यू…।”

यह कहता हुआ और मन ही मन अपने बॉस को दुआएँ देता हुआ सौरभ जिस तरह घबराया हुआ आया था, उसी तरह घबराया हुआ निकल गया। शिखर का चेहरा थोड़ा गंभीर हुआ जैसे वह कुछ सोच रहा हो। सौरभ की पत्नी अस्पताल में भर्ती हो गई। शेखर ने फोन करके उसका हालचाल पूछा और अस्पताल जाकर सौरभ की पत्नी को देख आया। उसके चले जाने के बाद सौरभ की माँ उसके व्यवहार की इतनी तारीफ करती रहीं और दुआएँ देती रहीं। सौरभ तो रात-दिन अपने बॉस की तारीफ करने लगा था। पर वह समझ नहीं पा रहा था कि इतने ऊँचे पद पर पहुँचकर भी शिखर को क्यों अभिमान छू तक नहीं गया है? अपने एम्प्लॉयों के प्रति इतना प्यार? यह कम ही देखने में आता है।

उसके बाद से सौरभ के दिल में शिखर के लिए बड़ी इज्जत हो गई। अक्सर उसके मुँह से शिखर के लिए तारीफ-भरे शब्द निकल ही जाते। पर ऑफिस में सिर्फ वही अकेला नहीं था तारीफ करने वाला, सभी उसकी तारीफ करते थे। शिखर अपने एम्प्लॉइज के बीच अपने रुतबे नहीं, बल्कि अपने सौम्य व्यवहार के कारण कद्र पा रहा था।

एक दिन ऑफिस की ओर से पार्टी थी। सौरभ अपने दोस्तों विवेक और अयाज के साथ ड्रिंक ले रहा था। तभी शिखर भी अपना ग्लास हाथ में थामे आया और उनके बीच बैठ गया।

शिखर ने सौरभ से पूछा, “सौरभ! बताओ कैसी है तुम्हारी वाइफ?”

“बिल्कुल ठीक सर! और आपने तो सुनते ही मुझे छुट्टी दे दी।”

“अरे कैसे नहीं देता? …मैं भी समझता हूँ फैमिली की अहयिमत…।”

यह कहने के बाद उसने आँखें बड़ी-बड़ी कर सौरभ को देखा। फिर अपने ग्लास से चुस्की ली। थोड़ी देर तक एक मौन छा गया। सौरभ और अयाज गौर से शिखर को देखते हुए सोचने लगे कि इन शब्दों के पीछे आखिर कुछ तो है।

तभी शिखर बोला, “एक बार मेरी भी वाइफ बीमार पड़ी थी, पर उस समय मेरी ही बेरुखी ने कोमल को मुझसे दूर कर दिया… कोमल… मेरी वाइफ। वह समय ऐसा था… ऐसा कि मैं कुछ समझता ही न था… आज सोचता हूँ तो बस सोचकर रह जाता हूँ। जो बीत गया उसके लिए क्या कर सकता हूँ?”

फिर वह कुछ देर के लिए चुप हो गया और उसने एक ही बार में अपना ग्लास खाली कर दिया। फिर कहना शुरू किया। आँखें कहीं अदृश्य में खो गई थीं।

वह बोलने लगा, “तब मेरी नई-नई शादी हुई थी। मैं उसे लेकर अपनी नौकरी पर आया था। एक दिन कोमल बीमार थी और बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। मैं ऑफिस के लिए जब निकलने लगा तो उसने कहा, कि आज मत जाओ। मेरी तबीयत ठीक नहीं है। पता नहीं मैं आज टायलेट तक भी कैसे जाऊँगी। शायद गिर जाऊँगी…। उसकी आवाज में कमजोरी साफ घुली हुई थी और वह रुक-रुककर बोल रही थी। आँखें पूरी तरह खुल भी नहीं रही थीं। इस पर मैंने कहा, “कोमल डार्लिंग! आज जाना बहुत जरूरी है। नहीं गया तो डील चौपट हो जाएगी…। कोई बात होगी तो तुम मुझे फोन कर देना।”

फिर कोमल कुछ बोली नहीं, वैसे ही चुपचाप आँखें बंद कर पड़ी रही। और मैं ऑफिस निकल गया। उसी रात जब मैं ऑफिस से लौटा तो देखा बुखार से उसका बदन तप रहा था और वह बेहोश थी – न जाने कब से। मैंने फिर एंबुलेंस बुलाई। इस घटना के बाद बहुत दिनों तक मैं अफसोस करता रहा कि यदि रुक ही जाता तो क्या होता?

मैं अब यह समझता हूँ कि जितना समय मुझे अपनी न्यूली वेड पत्नी को देना चाहिए था, उतना मैं नहीं दे पाता था। दफ्तर जाने के बाद अपने निपट अकेलेपन को कोमल कैसे काटती थी वह देख तो नहीं पाता था, परंतु अनुमान न लगा पाता हो ऐसा भी नहीं था। लेकिन मैं इस अकेलेपन की कल्पना करने से भी डरता था जबकि वह उसे झेल रही थी।

कोमल उस एक कमरे के फ्लैट में बिल्कुल बेचैन हो जाती। यह मैं जानता हूँ कि सन्नाटा अनाकौंडा की तरह मुँह फाड़े उसे निगलने की कोशिश में लगा रहता होगा। किसी-किसी तरह वह दिन काटती होगी। सवेरे की चाय वह नौ बजे पीती थी हाथ में कप लिए अपने माहौल से खीझी हुई। उसे लगता था कि वह कैद होकर रह गई है।

कभी-कभी हम बात करते तो वह यह सब बताती। कभी ही कभी… ऐसे बात भी कहाँ हो पाती थी? दो बातें करने के लिए फोन मिलाती तो मेरा फोन बिजी आता। कभी मैं बात करता तो कभी यह कहकर फोन बंद भी कर देता, अच्छा… अभी तुमसे बात करता हूँ। बस, थोड़ी ही देर में।

और वह थोड़ी देर बाद का समय कभी न आता। वह रात तक इंतजार करती रह जाती।

शायद वह अपने खाने के लिए कुछ नहीं बनाती थी। रात का बचा खा लेती थी और कभी-कभी तो सारे दिन बिस्तर में ही पड़ी रह जाती थी। किसी-किसी तरह उसका दिन कटता तो शाम होती और फिर शाम रात में बदल जाती। टीवी देखते-देखते आँखें थक जातीं, तो जाकर सो जाती थी रात को मैं आता तो मेरे साथ ही खाती। अक्सर ऐसा होता कि मैं अपनी डुप्लीकेट चाभी से लॉक खोकर घर में प्रवेश करता।

मेरी आहट सुनते ही वह जग पाती। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर जाती और वह चहकती हुई आवाज में पूछती, “आ गए?”

“हूँ… आज ऑफिस में इतना काम था।” मैं बोलता।

“छोड़ो… यह ऑफिस गाथा। पेट में खलबली हुई मची है। खाना गरम करती हूँ।”

“पर मैं तो…।” मुझे कहना ही पड़ता, क्योंकि ऐसा हो जाता था मुझसे।

“क्या मैं तो?” वह बोलती।

“मैं तो मीटिंग से खाकर आया हूँ।” एक अपराध भाव लिए मैं बोलता।

“तो तुमने मुझे बता क्यूँ नहीं दिया? एक कॉल तो कर देते?”

अरे, इस कदर बिजी था कि भूल गया। अच्छा, अब से ख्याल रखूँगा। सॉरी…।”

और मैं उसे मनाने की पूरी कोशिश करने लगता। जब ऐसा एक बार नहीं कितनी बार हुआ तब अंत में कोमल ने खाने पर मेरा इंतजार करना छोड़ दिया था।

शुरू-शुरू में मेरे देर से आने पर कोमल इंतजार करते-करते थककर सो जाया करती थी। बाद में यह इंतजार भी खत्म हो गया था। मैं कब जाकर सो जाता था, उसे मालूम नहीं होता। रोज की यही कहानी हो चली थी।

और मैं उसे मनाने की पूरी कोशिश करता। पर मैं पूरी तरह जान नहीं पाता था कि उसके दिल पर क्या बीतती होगी? वैसे औरतें अधिक भावुक होती हैं। वह नहीं थी ऐसी बात नहीं है। वह भी थी। ज्यादा तो नहीं कहूँगा, क्योंकि ज्यादती मेरी ओर से उसके प्रति हो रही थी। उसे सिर्फ सहना पड़ रहा था।

उसका रात का खाना मेरी ही वजह से अनियमित हो गया। अकेलेपन के कारण वह खाने के प्रति अपनी रुचि ही खो बैठी थी। शायद उसे गहरी उदासी घेरने लगी थी। वह भीतर-ही-भीतर बीमार रहने लगी थी… शायद! शायद वह डिप्रेशन की शिकार हो गई थी। और मैं भी उसकी ओर ध्यान नहीं दे पा रहा था। मुझे चाहिए था कि मैं उसे कहीं घुमाने ले जाता। आध-एक घंटे भी अंतरंगता के साथ उससे बातें करता। उसे भीतर से समझने की कोशिश करता कि वह क्या चाहती है? उसे क्या अच्छा लगता है? एक बड़ी कॉमन-सी बात है कि अपने पति के साथ घूमना, सैर-सपाटा, रेस्तराँ में खाना और यदि पैसे न भी हो तो कम से कम साथ में हँस-बोलकर समय बिता लेना सभी औरतों को अच्छा लगता है। पर मैं उसके साथ समय भी तो नहीं दे पा रहा था?

मैं उसके साथ अपराध कर रहा था… अन्याय… सौरभ! पर तब मेरे पास इतनी चेतना ही न थी कि मैं अपने किए का विश्लेषण करता। जिंदगी जैसे एक हॉर्स रेस थी और मैं उसका घुड़सवार। अपनी महत्वाकांक्षा के घोड़े को बेतहाशा दौड़ा रहा था… दौड़… दौड़… दौड़। मेरी आँखें फिनिश लाइन पर फिक्सड थीं। मुझे किसी तरह यह दौड़ जीतनी थी… बस। वही मेरा गोल था। इधर-उधर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था मुझे।

जानते हो सौरभ? अब जब तुमसे कह रहा हूँ तो कह ही दूँ। आज तुमसे सब कह देना चाहता हूँ। क्यों रखूँ दिल में? क्यों? मुझे दिल पर इसे झेलना बहुत भारी लगता है।

वह चाहती थी कि हमारे बच्चे हों और हमारे बीच का खालीपन भरे। उसका अकेलापन दूर हो। पर मैं टाल देता था। उसकी यह माँग नाजायज थी क्या? कतई नहीं। वह प्यारे-प्यारे बच्चों के सपने देखने लगी थी। एक दिन अपने सपने मुझे सुनाने लगी तो मैं बोला, नहीं कोमल, अभी नहीं। देखो, अभी हमारे पास क्या है? न अपना मकान है, न अपनी गाड़ी है। वह इस दुनिया में आएगा तो हम क्या दे सकेंगे उसे? न अच्छे खिलौने, न महँगे स्कूलों में एडमिशन – कुछ भी तो नहीं हो सकेगा। यही अगर वह कुछ साल बाद हमारी गोद में आए तो कितना कुछ मिलेगा उसे?” …और जानते हो यह सुनकर उसकी आँखों में आँसू आ गए थे। उसने अपनी बड़ी-बड़ी सजल आँखों से देखते हुए कहा था, “शिखर! तुम नहीं जानते कि बच्चे अपने माता-पिता से यदि सच में कुछ चाहते हैं तो वो है प्यार-दुलार, उनकी ममता-भरी निगाहें। बाकी चीजें तो दिखावे की होती हैं। और फिर जब तक वह यह सब समझने लायक होगा तब तक तो हमारे पास सब कुछ हो जाएगा न? फिर चिंता क्यों करते हो? फिर देर क्यूँ?”

“तुम नहीं समझती” मैं कहता, “उसे समय भी तो देना होगा। कहाँ है हमारे पास समय?”

“तुम्हारे पास नहीं है, मेरे पास तो है न?”

“क्या अकेले कर लोगी सब? क्या मेरी थोड़ी भी जरूरत नहीं पड़ेगी?” तब वह चुप हो जाती।

वह सब समझती थी, पर मैं ही नहीं समझता था। मैं नहीं समझ पाया था उसकी भावनाओं को और मैं कितना कठोर बना रहा, वह कितनी बेबस कि मुझसे एक बच्चा भी न पा सकी।”

यह कहने के बाद शिखर की आँखें भर आई। कुछ सोचकर उसने फिर कहना शुरू किया,

“मुझसे वह अक्सर शिकायत करती थी कि मैं उसे घुमाने नहीं ले जाता हूँ। वह ठीक ही तो कहती थी कि “अगर तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं है तो तुमने शादी ही क्यूँ की?”

मैं कहता, “माँ-बाप का दबाव था कि शादी कर लो, इसीलिए की।”

तो वह कहती, “तो आज भुगत तो मैं रही हूँ न? तुम तो चले जाते हो बाहर… ऑफिस… होटल… पार्टी… हँसना-बोलना। और मैं?”

तो मैं कहता, “तुम्हें किसी ने मना किया है? तुम भी बाहर जाओ। बाजार में घूमो… कपड़े खरीदो।”

हाँ-हाँ… मैं अकेली घूमती रहूँ बाजार में? कपड़े खरीदूँ और पहनूँ… किसलिए?” वह कहती।

वह ठीक ही तो कहती थी, कि तुम हफ्ता में एक दिन भी मेरे लिए नहीं निकाल सकते, एक दिन भी मुझे नहीं दे सकते शिखर! …सैटरडे को भी निकल जाते हो।”

सच, मैं तो अपने कामों की धुन में शनिवार को भी व्यस्त हो जाता था। फिर उसके दूसरे दिन रविवार को भी उससे बात करने की फुर्सत नहीं होती, क्योंकि उस दिन मुझे अपने कपड़े साफ करने की जरूरत पड़ती और उन्हें प्रेस करने की। सप्ताह-भर की प्लानिंग करता। घर पर भी रहकर लैपटॉप पर व्यस्त रहता। सोचो सौरभ… वह किस टेंशन से गुजर रही होगी?

मुझे याद है वह हमारे बीच का अंतिम वाकया था। उस दिन शनिवार था और शनिवार के दिन भी मैं तैयार होने लगा तो कोमल ने कहा था, “शिखर! याद है आज क्या दिन है?”

“हाँ, शनिवार है। तुम यही न कहोगी कि आज मैं क्यूँ काम के लिए निकल रहा हूँ?”

“नहीं शिखर! आज कुछ और भी है। जरा याद तो करो?”

“क्या है कोमल? लेट हो रही है। पहेलियाँ मत बुझाओ। बहुत बड़ी डील है। मैं इसे ले सका तो मालूम है मेरी सैलेरी में कितना हाइक हो जाएगा और मैं कहाँ पहुँच जाऊँगा?”

“क्या तुम्हारी जिंदगी में डील और सैलरी हाइक के अलावे किसी और चीज के लिए कोई जगह नहीं?”

“है क्यों नहीं? पर सब कुछ तो उसके बाद ही है न?”

“उसके बाद?” उसने दोहराया था।

“हाँ! ऑबवियसली!” मैंने भी अपनी बात पर जोर दिया।

वह मुझे घूरने लगी। जब मैं उसकी आँखों को बर्दाश्त नहीं कर पाया तो बोला, “किसके लिए कर रहा हूँ यह सब? अपने लिए क्या?”

“मुझे नहीं चाहिए यह सब। बस मुझे अपना थोड़ा-सा समय दे दो।” उसकी आँखों में अब एक सच्ची याचना थी।

“तब मैंने कहा, “कोमल! प्लीज… इमोशनल बातें बंद करो। बताओ आज क्या है?”

“आज हमारी शादी की तीसरी एनीवर्सरी है।” वह बोली।

उसे लगा कि यह सुनकर मैं चौंक जाऊँगा, खुश हो जाऊँगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टे मैं सुनकर भी उदासीन बना रहा।

मैं काम के बोझ से, जो कि मेरा ही अपना ओढ़ा हुआ था – आसमान छूने की मेरी अपनी ही जिद का परिणाम था, इस तरह दबा हुआ था कि उसकी आँखों में प्यार न देख पाया। ऊपर के मन से बोला “हाँ, ओह! मैं तो भूल ही गया। आज शाम को जल्दी लौटता हूँ। तुम तैयार रहना। हम टॉप रेस्तराँ में डिनर लेने चलेंगे।”

यह कहकर मैंने उसे चूम लिया और ओके… बाय कहता हुआ निकल गया। मैंने महसूस किया कि मैं नाटक कर रहा हूँ।

फिर उसके बाद तो… कौन मुझे बताता कि उसने क्या किया? पर जब ऑफिस से लौटा तो देखा।

मैंने रात के आठ बजे का समय उसे दिया था और ठीक आठ बजे उसका फोन आया, “कब आ रहे हो?”

“तुम तैयार होओ, मैं निकलूँगा आधे घंटे में।”

फिर उसका फोन नहीं आया। मैं इधर क्लायंट के चक्कर में फँस गया था। क्लायंट बोला कि वह एक मीटिंग से निकलकर मुझसे मिलेगा। 6 बजे की मीटिंग 7.30 बजे शुरू हुई। वह घंटे-भर चली। फिर क्लाइंट ने कहा कि मैं मैंनेजिंग डायरेक्टर शमशाद से मिल लूँ। फिर उनके आने में देर हुई। जब वे आए तो नौ बज चुके थे। वे आधे घंटे तक मेरा दिमाग चाटते रहे। इस बीच मैं सोच रहा था कि कोमल का फोन क्यों नहीं आ रहा? तभी आधे-अधूरे दिमाग से सुनता हूँ कि वे मुझसे हाथ मिलाते हुए कह रहे हैं “सो कोंग्रेचुलेशन! दिस डील गोज टू यू शिखर!”

डील तो मुझे मिल गई, पर तब तक साढ़े नौ बज चुके थे और मुझे घर पहुँचते-पहुँचते कम-से-कम साढ़े दस या ग्यारह बज ही जाना था। मुझे डील मिलने की कोई खुशी नहीं थी।

कोमल से मैं बहुत ही प्यार करता था और उसे दुख देकर मुझे भी दुख होता था, सौरभ! पर मैंने जान-बूझकर यह सब नहीं किया। पर क्या होता जा रहा था? …मुझे? वक्त को? लगता था कि अपना कोई जोर नहीं, बस मैं भागा जा रहा हूँ। भागा जा रहा हूँ। कभी मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ था कि घर पहुँचने के पहले घबराहट हो। पर उस दिन लिफ्ट में कदम रखते ही दिल धक-धक करने लगा था। पर उस दिन शायद मेरे दिल को पूर्वानुमान हो गया था – मेरा दिल शायद जान रहा था कि बहुत अजीब घटेगा मेरे साथ।

मैं अंदर गया और सीधे बेडरूम में चला गया यह सोचते हुए कि वह गुस्सा कर सो गई होगी। रूठी होगी तो उसे मना लूँगा। पर देख रहा हूँ कि बिछावन पर एक खूबसूरत सलवार सूट निकालकर रखा हुआ है। उसी के साथ उसी रंग की चूड़ियाँ, खुले डब्बे से बाहर झाँकती नई सुनहली सैंडिलें!

यह सब देखकर अचानक सारा माजरा समझ में आ गया। लगा मुझे बिजली का झटका लगा है। और मैं समझ गया कि वह चली गई है, क्योंकि वहीं पर डब्बे से दबाकर रखा गया एक कागज था जिस पर लिखा था… “मैं जा रही हूँ। मैं समझ गई तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है।” हाँ, वह चली गई थी। मैंने उसे बहुत बुलाया पर वह नहीं आई।

सौरभ! डील तो मुझे मिली… मैं अपने मकाम पर तो पहुँचा, पर मैंने अपनी वाइफ खो दी, वाइफ क्या अपनी लाइफ ही खो दी। व्हाट आइ पेड फॉर इट… नो बडी विल पे…। मैं जानता हूँ कि इसको पाने के लिए मैंने क्या खोया है। मेरी तरह कोई न खोए।”

शिखर का चेहरा अजीब हो गया था… रुआँसा और पराजित। सौरभ ने अपने बॉस का ऐसा चेहरा कभी नहीं देखा था।

अंजना वर्मा

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उस दिन शाम को पाँच बजे ही संजीव ऑफिस से वापस आ गया था। लिफ्ट से ऊपर जाकर उसने अपार्टमेंट की घंटी बजाई तो रोज की तरह दरवाजा नहीं खुला। वह बाहर खड़ा इंतजार करता रहा। फिर दूसरी और तीसरी बार भी बजाई तो दरवाजा वैसे ही बंद रहा। तब उसे लगा कि उसके पापा कहीं चले गए हैं। यदि वे भीतर होते तो फौरन दरवाजा खोलते। लेकिन उन्हें मालूम भी तो नहीं था कि इस समय वह आ जाएगा, वर्ना वे बाहर नहीं जाते।

उसने अपने पिता रवींद्र बाबू को कॉल किया, “हलो पापा, कहाँ हैं आप?” रवींद्र बाबू नुक्कड़ वाली स्नैक्स की दुकान में खड़े समोसे खा रहे थे। उन्होंने सोचा कि संजीव ऑफिस से फोन कर रहा है। इसलिए इत्मीनान से बोले, “संजीव? कहो किसलिए फोन किया?”

यदि वे जानते कि संजीव बाहर खड़ा है तो इस तरह शांति से बात न करते। उनकी आवाज में घबराहट घुली होती… घर पहुँचने के लिए बेताब हो जाते।

संजीव ने कहा, “आप कहाँ हैं?”

“मैं इस गली की स्नैक्स वाली दुकान में समोसे खा रहा हूँ। मैं तुम दोनों के लिए भी लेता आऊँगा।” उनकी आवाज में वही शांति बरकरार थी।

संजीव ने कहा, “अच्छा, लेते आइएगा। पर अभी आइए। मैं घर के बाहर खड़ा हूँ।”

यह सुनते ही वे बेचैन हो गए। बोले, “ओ! आ गए क्या? अच्छा, मैं आ रहा हूँ तुरंत।”

उनकी आवाज में एक खुशी घुल गई थी। संजीव ऑफिस से आ गया है यह सुनकर उन्हें बड़ा अच्छा लगा था। बच्चों का घर लौटना उन्हें अपरिमित खुशी दे जाता था, क्योंकि उनके आसपास पसरा हुआ सन्नाटा दूर हो जाता था। जल्दी-जल्दी मुँह चलाकर वे मुँह में भरे समोसे को निगलने लगे। समोसे खाते हुए दुकानदार से बोले, “अच्छा, चार समोसे और पैक कर दो।”

यह कहकर वे एक हाथ से पेपर प्लेट थामे हुए दूसरे हाथ से अपनी जेब में बटुआ टटोलने लगे। पर बटुआ तो लेकर चले ही नहीं थे तो मिलता कैसे? टटोलते-टटोलते यह महसूस हुआ। तब तक हाथों में कुछ खुदरे नोट आ गए थे। उन्हें उँगलियों में थामकर दुकानदार की ओर बढ़ाते हुए बोले, “लो भाई, पैसे ले लो। मैं बटुआ तो घर पर ही भूल गया।”

दुकानदार ने नोट थामते हुए कहा, “कोई बात नहीं थी। पैसे फिर मिल जाते।” रवींद्र बाबू लगभग हर रोज इसी स्नैक्स की दुकान पर आते और कुछ-कुछ खाते। इसी से दुकानदार उन्हें पहचानता था। शाम के चार बजते कि खाने से अधिक बाहर निकलने की इच्छा जोर मारती। बाहर आकर लोगों को चलते-फिरते, आते-जाते देखते तो उन्हें लगता कि उनकी नसों में भी खून दौड़ रहा हैं। तब अपने हिस्से के अकेलेपन में निष्क्रिय हुआ दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो उठता, तरह-तरह के ख्याल दिल की धड़कनों के साथ गुँथ जाते और वे पूरी जिजीविषा से भर उठते।

रवींद्र बाबू ने पेपर प्लेट डस्टबिन के हवाले किया। पेपर नैपकिन से हाथ पोंछते हुए समोसों का पैकेट उठाया और चल दिए। चार कदम चले होंगे तो मुँह में बसे स्वाद ने याद दिलाया कि वे पानी पीना तो भूल ही गए। सोचा कि चलो, कोई बात नहीं, घर जाकर ही पी लेंगे। अभी बेचारा संजीव घर के बाहर खड़ा होगा थका-माँदा। यह स्थिति बड़ी खराब होती है कि घर पहुँचो और घर में ताला बंद। पास में चाभी नहीं।

संजीव ने एक चाभी सुरुचि को दे रखी थी और दूसरी वह खुद रखता था। सुरुचि ऑफिस से उसके पहले ही घर पहुँच जाती थी। अतः चाभी उसके पास रहनी चाहिए थी कि उसे इंतजार न करना पड़े। अभी पापा के आने पर उसने अपने वाली चाभी पापा को दे दी।

रवींद्र बाबू वहाँ पहुँचे तो देखा कि संजीव बैग लिए खड़ा है। उन्होंने अपनी जेब टटोलकर चाभी निकाली। संजीव ने चाभी उनके हाथ से ले ली, क्योंकि वह जानता था कि उन्हें चाभी की होल में घुमाने में समय लगेगा। उन्हें डबल लॉक वाले डोर खोलने की आदत नहीं थी। दरवाजा खोलकर संजीव ने अपना बैग सोफे पर डाला और बैठ गया। रवींद्र बाबू ममता-भरी आँखों से उसे देखते हुए सोच रहे थे कि बेचारे बच्चे बारह-बारह घंटे बहुराष्ट्रीय कंपनियों में खटते हैं, तब जाकर एक मोटी पगार घर में आती है। इन्हीं रुपयों से सब कुछ होता है, नहीं तो शहर में एक कोठरी भी न हो पाए।

उन्होंने पूछा, “चाय पियोगे? बना दूँ?”

संजीव ने कहा, “नहीं, कॉफी पीकर आया हूँ ऑफिस से। और आपसे मैं चाय बनवाकर पियूँगा?” फिर थोड़ी देर बाद बोला, “सुरुचि अब आती ही होगी, वह तो बनाएगी ही।”

करीब घंटे-भर बाद सुरुचि आई। वह भी संजीव की तरह ही थकी हुई थी। आते ही अपने कमरे से लगे वाश-रूम में हाथ-मुँह धोने वाली चली गई। फिर चाय बनाकर एक-एक कप संजीव और रवींद्र बाबू के सामने रख दी और अपना कप हाथ में लेकर टीवी धीमी आवाज में खोलकर बैठ गई। संजीव लैपटॉप पर व्यस्त हो गया।

रवींद्र बाबू ने टोका, “अब तुम्हें ऑफिस में कम काम था कि यहाँ आकर भी लैपटॉप में सिर खपाने लगे?”

संजीव ने कहा, “पापा! आप नहीं समझिएगा। इससे कितनी सारे बातें हल हो जाती हैं। सारा काम ही हो जाता है इससे।”

यह सुनकर रवींद्र बाबू कुछ प्रशंसा और अचरज-भरी दृष्टि से उसे देखने लगे। सुरुचि को शायद टीवी के प्रोग्राम अच्छे नहीं लग रहे थे। वह अपने कमरे में उठकर चली गई।

यही दृश्य हर शाम का हुआ करता था और सवेरे का बिल्कुल इससे उल्टा। नौ बजते-बजते संजीव और सुरुचि दोनों ही ऑफिस के लिए निकल जाते थे। तब घर में वे ही अकेले बच जाते। पिंजरे में बंद मैना की तरह छटपटाने लगते। कभी पेपर पढ़ते, कभी कोई पत्रिका उलटते तो कभी टीवी ऑन करते। इन सबसे जब ऊबते तो सो जाते। यहाँ किसी से उनकी जान-पहचान न थी, न अपना कोई दोस्त ही था कि उसके यहाँ बैठकर कुछ वक्त गुजार लेते।

उन्हें अपने बेटे के पास आए हुए एक महीना हो गया था। एक नई दिनचर्या से उन्हें गुजरना पड़ रहा था। ऐसा न था कि वे कभी अपना घर-शहर छोड़कर बाहर नहीं रहे। जब तक नौकरी में रहे, कई जगहों पर गए, कितने तरह के लोगों और उनकी संस्कृतियों से मिलना-जुलना हुआ। पर तब की बात और थी। एक पूरा परिवार था – पत्नी, छोटे-छोटे बच्चे। दफ्तर से आते तो अपने को सबसे घिरा हुआ पाते। चारों ओर चहल-पहल का माहौल। अब वह बात न थी। अब उनकी पत्नी गुजर चुकी थी और साथ-साथ एक लंबा वक्त भी। सदा बदलती रहने वाली दुनिया ने इतना बदल दिया था उनकी जिंदगी को!

पहली बार जब वे इस महानगर में आए थे उन्हें अजीब लगा था कि यहाँ तो सारे दिन दरवाजा बंद रहता है। कई-कई घंटे एकांत में बताते हुए वे एक इनसान का चेहरा देखने को तरस जाते। जिस रात को वे आए उसके सवेरे आपस में कुछ बातचीत भी न हुई और बेटा-बहू दफ्तर चले गए तो वे बेचैन होने लगे कि तभी दरवाजे की घंटी बजी। वे खुश हुए कि चलो कोई आया। शायद पड़ोसी हो। पर पड़ोसी क्या दूसरे लोक में रहते थे? उनके फ्लैट भी दिन-दिन भर बंद रहते। शाम को मियाँ-बीवी थके-माँदे लौटते तो बंद घर खुलता। उन्हें यह सब नहीं मालूम था। तभी सोच बैठे कि पड़ोसी आया होगा। खुश होकर दरवाजा खोला था उन्होंने। सामने खड़ा था नेपाली रसोइया। उन्हें याद आया कि जाते-जाते सुरुचि बोल गई थी, “पापाजी, नेपाली खाना बनाने आएगा। जो मर्जी हो बनवा लीजिएगा। वह चाय-कॉफी भी बना देगा।”

नेपाली को देखकर वे मुस्कुरा उठे। बोले, “तो तुम प्रीतम हो?”

“हाँ साब।” उसने कहा था।

“ठीक है, आओ। मुझे सुरुचि ने तुम्हारे बारे में बताया था।”

“आप भैया के पापा हो न?”

“हाँ।”

“मुझे मालूम है। भाभी जी बोला था कि आप आएगा।”

वह पूरे अधिकार के साथ भीतर चला आया। उनकी ओर घूमकर बोला, “क्या खाओगे आप?”

“जो रोज बनाते हो, वही बना दो।” रवींद्र बाबू बोले।

इतना सुनते ही वह अपने काम में मशगूल हो गया। वे पास ही सोफे पर बैठे हुए सिंक से पानी निकलने की आवाज, कढ़ाई में सब्जी छौंके जाने की छनक, प्रेशर कुकर की सीटी, कढ़ाई और छलनी की आपसी ठनर-मनर सुनते रहे। मुश्किल से बीस मिनट बीते होंगे कि नेपाली ने सारा खाना तैयार करके टेबुल पर लगा दिया। उसके बाद बाहर जाते हुए बोला, “दरवाजा बंद कर लो साब।”

रवींद्र बाबू उसके काम की तेजी को देखकर अवाक हो गए थे। भला इतनी जल्दी खाना कैसे बन गया? वे जितना चकराए उतना ही उदास भी हुए उसे बाहर निकलते देखकर। वह सिटकिनी खोलकर चला गया था और वे पीछे उसकी पीठ निहारते रह गए थे। वाह! आया भी और चला भी गया। क्या बनाया होगा उसने? डायनिंग टेबल पर लगे कैसरोल्स को उन्होंने खोल-खोलकर देखा था। पूरा उत्तर भारतीय खाना था। एक भी आइटम कम नहीं। चावल, दाल, सब्जी के साथ सलाद और चटनी तक बनाकर रख दी थी उसने! रसोइया को आया देखकर उनके मन में एक छिपी आशा जगी थी कि उन दोनों के बीच थोड़ी बातचीत होगी। कुछ वह पूछेगा, कुछ ये पूछेंगे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, धत…!

धीरे-धीरे उस महानगर में रहते हुए रवींद्र बाबू ने सीख लिया था कि कैसे समय बिताया जाए। वे अपने मित्रों को कॉल करते और देर तक मोबाइल पर बातें करते रहते। जब तक बातें होती रहतीं, उन्हें लगता कि वे एक चलती-फिरती, जीती-जागती दुनिया से जुड़े हुए हैं, वरना इस शहर के अनजाने चेहरों के समुद्र में एक भी पहचाना चेहरा उन्हें नजर नहीं आता था। तब उनकी मनःस्थिति एक भटके हुए जहाज की हो जाती। कहाँ जाएँ… क्या करें… सब कुछ अपरिचित… अटूट एकाकीपन।

अकेले रेल या बस में सफर करना उन्हें कभी बुरा नहीं लगा था, बल्कि कभी-कभी तो उन्होंने इसे एन्जॉय भी किया था। एकदम भीड़-भाड़ से मुक्त। परंतु अपना विधुर जीवन जीते हुए उन्हें लगता था कि जिंदगी का एकाकी सफर रेल या बस का सफर नहीं है जो इसका लुत्फ उठा लिया जाए। इसे जो जीता है वही समझता है। जीवन संगिनी को गुजरे एक अरसा हो गया था। पत्नी की जरूरत जितनी पहले थी, उससे कम आज नहीं थी। बल्कि उन्हें लगता था कि अभी उसका होना अधिक जरूरी था। अब उनकी जिंदगी क्या थी? एक सूखे पत्ते की तरह उड़कर वे यहाँ से वहाँ चले जाते थे – जिधर हवा ले गई, उधर ही उड़ गए। अपना कोई वजूद ही नहीं रह गया था।

वे यहाँ पर अपने परिचित बनाने की कोशिश करने लगे थे। शुरू-शुरू में सिक्योरिटी गार्ड, दुकानदार और सब्जीवालों से ही कुछ जरूरत से अधिक बातें करने लगे थे ताकि वे इन्हें पहचानें। जाते-जाते दोस्ताना नजरों से उन्हें देखते। धीरे-धीरे आस-पास के लोग इन्हें जानने लगे थे। इन्हें अच्छा लगता था जब कोई आँखों में पहचान लिए इनकी ओर देखता और इनका हाल-चाल पूछ लेता। घर में सब्जी लाने का काम इन्होंने अपने जिम्मे ले लिया था कि इसी बहाने लोगों से कुछ बात भी हो जाएगी। बातचीत करके थोड़ा प्रफुल्लित महसूस करते थे।

फिर भी पूरे दिन की लंबाई में पसरा हुआ समय नहीं कटता था। खाना बन जाता था, कपड़े धुल जाते थे। काम खत्म है। खाना लगा हुआ है, वे खाएँ या न खाएँ। निपट अकेले रहते हुए खाने की इच्छा भी दब जाती थी। कुछ-कुछ करके समय को टुकड़ों-टुकड़ों में काटने की कोशिश जी-जान से जारी रहती। फ्लैट के पूरब में आंजनेय का मंदिर था। कभी-कभी उधर निकल जाते। उत्तर की ओर बड़ा सुंदर गणेश मंदिर था। शाम को टहलते हुए किसी दिन उधर भी निकल जाते। दर्शन करके बाहर आते तो वहीं प्रांगण में बेंच पर शांति के साथ बैठकर समय बिताते। इतना करने के बाद भी समय बिताना मुश्किल था खासकर दिन का। तो उन्होंने सोचा कि ठीक है, अब वे ही बाल्कनी में रखे गमलों में पानी डाल दिया करेंगे। कुछ समय इसमें भी कटेगा।

यही सोचकर उन्होंने सुरुचि से एक दिन कहा था, “बेटा, इन गमलों को मैं ही सींच दिया करूँगा। जब तक मैं हूँ तब तक तुम बाई को मना कर दो।”

सुरुचि बोली थी, “पापा जी! आप सींचेंगे तो बाई की आदत खराब हो जाएगी। गमले सींचना उसका काम है।”

यह सुनकर रवींद्र बाबू चुप हो गए थे। ठीक ही तो कह रही थी वह। अब दो दिनों के लिए बाई की आदत क्यों खराब कर जाएँ?

उस दिन बेटा-बहू के दफ्तर जाने के बाद उन्होंने अखबार उठा लिया था। अखबार की एक-एक खबर पर नजर दौड़ाने लगे। रोज की वे ही सारी बातें। राजनीतिक उथल-पुथल, अपराध – उसमें भी बलात्कार। मन चिड़चिड़ा गया। एक भी खबर ऐसी नहीं थी कि मन खुश हो। उन्होंने अखबार एक ओर रख दिया था। पत्रिकाएँ तो पहले ही पढ़ी जा चुकी थीं। अकेले बैठकर सोचने लगे कि क्या किया जाए?

तभी कमरे के बाहर लगे गमलों की ओर उनका ध्यान गया। उनमें रोपे गए पौधों को देखकर वे सोचने लगे कि इन्हें देखकर तो पता ही नहीं चलता कि क्या मौसम है? सभी मौसमों में एक-सा ही रहते हैं। क्या जाड़ा, क्या गरमी और क्या बरसात? वे उठकर फूलों को निहारने लगे थे। तभी वे चौंके। नहीं, उनका सोचना सही नहीं था। अभी वसंत है और कुछ पौधों में सुआपंखी कोंपलें फूट रही हैं। यह देखकर अपने अकेलेपन में भी वे मुस्कुराने लगे। गौर से देखने के लिए अपना चश्मा ठीक कर वे पौधों पर झुक गए। वाह! कुदरत का करिश्मा! फूलों को सब पता है। उन्हें मालूम है कि वसंत आ रहा है। इस महानगर को मालूम हो न हो काम और जाम को फर्क पड़े या न पड़े! ये अपनी मौन आवाज में कह रहे हैं कुछ। इनकी सुनता भी कौन है? वे उन पौधों से बात करने लगे।

बोले, “तुम बोल रहे हो, मैं सुन रहा हूँ। मुझे भी मालूम है मेरे दोस्त कि वसंत आ गया है।”

अचानक उन्हें लगा जैसे कितने सारे नन्हें-मुन्नों से घिरे हुए हैं वे! उनके इर्द-गिर्द कितने सारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। उनकी बाँहें हैं… बाँहें नहीं – पंख हैं… हरे-हरे पंख। वे सब ढूँढ़ रहे हैं आकाश, हवा और उजाला। वे अपने को तितली-जैसा हल्का महसूस करने लगे। कितनी हल्की हो गई थी उनकी साँसें? उन्होंने चारों ओर नजर घुमाई। हवा और आकाश को काटती हुई ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें थीं, पर इस बाल्कनी में थोड़ा आकाश था, उसका खुलापन था, थोड़ा जीवन था… थोड़ी ताजगी… थोड़ी संजीवनी! हाँ, अब यही बैठेंगे वे, हवा और आकाश से बातें करते हुए। यहीं से दुनिया भी दिखती हैं, लोग भी दिखते हैं। अब रोज उनके बैठने की प्रिय जगह वही बाल्कनी हो गई थी। वे रोज ध्यान से एक-एक पौधे को देखते। पौधों में निकले अँखुए हर दिन थोड़ा बढ़े हुए लगते। एक सरसों के बराबर उगा अँकुर छोटी-छोटी पत्तियों में खुलने लगा था। देखते-ही-देखते कितनी ही धानी पत्तियाँ निकल आई थीं। पौधे झबरीले हो उठे थे।

उस दिन वे शाम को सब्जी लेकर लौटे तो मन न होते हुए भी टीवी खेाल दी। अचानक उन्हें अपने जबड़ों में दर्द महसूस हुआ। फिर यह टीसता चला गया और इतना बढ़ा कि दवा की जरूरत महसूस होने लगी। फोन करके संजीव को कहना चाहा कि लौटते हुए वह दवा लेता आए, पर उसे आने में अभी देर थी। दाँत का दर्द इस तरह बर्दाश्त से बाहर हो चला कि संजीव के आने तक वे इंतजार नहीं कर सकते थे। इस स्थिति में भी उन्हें ही दवा के लिए निकलना पड़ेगा। किसको कहते? घर में था कौन?

अतः वे दवा लाने चल दिए। दवा की दुकान नजदीक ही थी। शाम की स्याही घिरने लगी थी। सड़क पर वाहनों की आवा-जाही बनी हुई थी। किनारे चलने वाले पदयात्रियों की भी कमी नहीं थी। इसी भीड़ में रवींद्र बाबू खीझे हुए चल रहे थे। कभी-कभी उनका हाथ अपने दुखते हुए जबड़े पर चला जाता। दर्द और भीड़ ने उन्हें इस तरह जकड़ लिया था कि उन्हें लगने लगा कि न जाने किस दुनिया में वे आ गए हैं। गाड़ियों की हेडलाइट से आँखें चौंधिया जा रही थीं। वे सड़क पार करने के लिए एक ओर खड़े थे। तभी एक स्कूटर उन्हें मारती हुई निकल गई। इसके बाद की बात उन्हें नहीं मालूम।

आँखें खुलीं तो वे अस्पताल के बेड पर थे। बगल में खड़ी नर्स इंजेक्शन देने की तैयारी कर रही थी और संजीव पास में था। उन्हें होश में आया देख उसने पूछा, “कैसे हैं पापा?”

“पैरों में बहुत दर्द है और दाँत में भी। क्या हुआ है मुझे?” उन्होंने कराहते हुए कहा।

संजीव बोला, “आपको स्कूटर से धक्का लग गया था।”

“हाँ… अभी याद आ रहा है। मैं दवा लाने निकला था, क्योंकि दाँत में बहुत दर्द हो रहा था। एक स्कूटर मुझे मारते हुए निकल गई थी। …फिर पता नहीं क्या हुआ। मैं गिर गया था।”

“आप स्कूटर के धक्के से गिरकर बेहोश हो गए थे। यह तो अच्छा हुआ कि वहाँ कुछ लोगों ने आपको पहचान लिया और आकर सिक्युरिटी गार्ड से कहा। उसी ने मुझे खबर की।”

रवींद्र बाबू सुनकर चुप रहे। उन्हें अब वह दुर्घटना याद आने लगी थी।

संजीव ने कहा, “पापा! आपने दवा के लिए मुझे फोन कर दिया होता। आप स्वयं क्यों निकल गए?”

रवींद्र बाबू ने कराहते हुए कहा, “दर्द इतना था कि मैं तुम्हारे आने तक इंतजार नहीं कर सकता था।”

संजीव बोला, “खुशकिस्मती से आप बच गए पापा! आपको कुछ हो जाता तो?”

अभी रवींद्र बाबू भी यही सोच रहे थे कि वे भाग्य से बच गए। उनके पैरों की हड्डियाँ भी सही-सलामत थीं। वे डर गए यह सोचकर कि अपाहिज भी हो जा सकते थे। तब उन्हें कौन देखता?

अस्पताल से आने के बाद उन्होंने संजीव के यहाँ कुछ दिन और बिताए। अब वे सवेरे सैर के लिए उस समय जाते जब सड़क पर वाहन नहीं रहते थे। दुर्घटना के डर से बाहर न निकलते, यह भी संभव न था। इसीलिए वाहनों से बचते हुए वे फ्लैट से निकलकर स्नैक्स वाली दुकान से होते हुए अगले दोराहे तक जाते। फिर उस मुख्य सड़क को पकड़ते जिस पर बहुत कम गाड़ियाँ चलती थीं, साथ ही वह चौड़ी भी थी। वे सड़क की दोनों ओर लगे पेड़ों को पहचानते हुए जाते – यह शिरीष है, यह गुलमोहर, यह अमलताश, यह लैगनटेशिया और यह न जाने क्या? इस तरह वे एक अजीब आनंद से भर जाते। वे सोचने लगते कि यदि ये पेड़ न होते तो न जाने दुनिया कैसी लगती? धरती कैसी दिखती? शायद केशरहित स्त्री की तरह कुरुप।

एक दिन कुछ झिझकते हुए संजीव से बोले, “बेटा! अब मैं वापस जाना चाहता हूँ। काफी दिन हो गए यहाँ पर रहते हुए।”

संजीव ने कहा, “क्यों? कुछ समय और रहिए न हमारे साथ? क्या तकलीफ है आपको यहाँ पर?”

“तकलीफ तो कुछ भी नहीं, तुम लोग इतना ध्यान रखते हो मेरा! फिर भी…। बहुत दिन हो गए बाहर निकले हुए। अब जाऊँगा। ठीक है, अगले सप्ताह के लिए टिकट करा दो।”

हवाई अड्डे पर रवींद्र बाबू अपनी ट्रॉली लुढ़काते हुए निकल रहे थे तो एक परिचित चेहरा सामने की भीड़ में खड़ा इनका इंतजार कर रहा था। ड्राइवर असलम ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर इनके हाथ से ट्रॉली ले ली। कार पर बैठते ही उन्होंने अपने सर को पिछली सीट से टिका दिया था। कार पूरी रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर बढ़ी जा रही थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। कार शहर से गुजरती हुई अपने गंतव्य की ओर मुड़ गई जो ढाई घंटे की दूरी पर स्थित था। सड़क के दाएँ-बाएँ धूल में नहाए पेड़-पौधे खड़े थे। महुआ की महक समेटे हुए खुली हवा आई और प्राणों में उतर गई। घर के कमरे में दाखिल होते ही सन्नाटे ने उनके लिए बाँहें फैला दीं। उन्होंने सन्नाटे को आलिंगन में भर लिया। आगोश से छूटकर सन्नाटे ने कहा, “मैंने तुम्हें बहुत मिस किया, रवींद्र!”

रवींद्र बाबू ने कहा, “मैंने भी तुम्हें बहुत मिस किया।”

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा

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पेड़ का तबादला

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सुदूर कहीं निर्जन में एक अनाम पेड़ था जिसे वहाँ के लोग अब तक पहचान नहीं सके थे। धरती की गहराई से एक जीवन निकला था – हरे रंग का जीवन, एक बिरवा। कोमल-कोमल दो चार पत्तियों को लेकर इठलाता हुआ। उसके भीतर पूरी जिजीविषा भरी हुई थी। वह अपने चारों ओर फैले निसर्ग को बड़े कौतूहल के साथ देखता, पहचानता और स्वीकार करता। उसे यह दुनिया बहुत प्यारी लगती थी और घटित होने वाली एक-एक बात उसे जीने के लिए प्रेरित करती थी। बच्चे की तरह वह अपने परिवेश को जानने और समझने की कोशिश करता था और एक-एक रहस्य पर से पर्दा उठाकर देखना चाहता था कि यह हो रहा है तो कैसे? यह क्या है? वह क्या है? इस तरह की जिज्ञासाओं की कमी न थी उसके दिल में। बीतते हुए हर दिन के साथ वह कुछ-न-कुछ नया सीखता था। कई बातें उसने गिरह बाँधकर रख ली थीं वे बातें जिनसे उसकी सुरक्षा जुड़ी हुई थी। ऐसे स्थावर होने के नाते उसकी बहुत सारी मजबूरियाँ थीं, पर उसे तो अपने अस्तित्व की सीमाओं के भीतर ही जीना था। अपने चारों ओर की संवेदनाओं को वह पूरी ऊर्जा के साथ ग्रहण करता था और उसके एहसास बहुत घने होते थे। जब वह सुखी होता तो हँस लेता, दुखी होता तो रो लेता। केवल बोल नहीं सकता था, चल नहीं सकता था। वह बाल-पेड़ बढ़ रहा था और उसे बढ़कर एक वृक्ष बना जाना था।

कालक्रम से वह बढ़ता भी गया। और जैसे-जैसे बढ़ता गया, वैसे-वैसे अपने चारों ओर के वातावरण, अपने साथी-समाज का ज्ञान उसे होता गया। वह धीरे-धीरे बहुत कुछ सोचने-समझने लगा कि दुनिया क्या है? अपने चतुर्दिक खड़े पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं को पहचानने लगा। मौसमों का आना-जाना भी समझने लगा, इस तरह कि ऋतुओं का पूर्वाभास भी उसे होने लगा। कब किस मौसम में उसके चारों ओर का परिवेश क्या रूप ले लेगा, उसे मालूम रहता था।

जब वह एक छोटा झुरमुट था तो छोटी-छोटी चिड़ियाँ आतीं और उसकी डालों पर बैठकर फुदकतीं। चीं-चीं-चीं-चीं बोलतीं और उड़ जातीं। तितलियाँ आतीं और उसकी पत्तियों को छूती हुई निकल जातीं। कई पंछी उसे अपनी रात का बसेरा-बसेरा बनाए हुए थे। कितने कीड़े-मकोड़े उसकी डालियों पर रेंगते या चलते। किशोरावस्था में ये सारी गतिविधियाँ और बढ़ गई और उसे यह सब बड़ा अच्छा लगने लगा, क्योंकि जिंदगी का हर अनुभव उसके लिए अभी नया-नया था। उसे दुनिया की सारी बात नई लगती। इन्हीं अनुभवों में कुछ अनुभव प्रिय होते, कुछ सामान्य, कुछ अप्रिय, कुछ पीड़ादायक। पंछी-प्राणियों का उसके पास आना, उससे मिलना-जुलना उसे बहुत सुख पहुँचाता था। हवाएँ और हल्की धूप भी सुख देती थीं। प्रचंड सूर्य-किरणों से कष्ट तो होता था, परंतु वह उनसे जूझना सीख रहा था। तब वह अपने पैरों से जमीन के कलेजे की सरसता टटोलने लगता और जमीन से ठंडक पाकर सूर्य से लड़ता। हाँ, आँधी से उसे कठिन पीड़ा होती। वह जैसे समूल उखाड़कर उसे नष्ट कर देना चाहती थी। उसकी डालियों को थप्पड़ लगाती, हिलाती-झुकाती, उड़ाने लगती। तब वह बेबस हो जाता। उसे भय लगता था तेज आँधियों से। वर्षा तो उसकी दोस्त थी। बचपन से उसे जीवन-दे रही थी, परंतु कभी-कभी वह भी क्यों दुश्मन बन आँधी का साथ देने लगती थी? यह बात उसकी समझ में नहीं आती थी।

उसके दिन बड़े मजे में गुजर रहे थे। उसके चारों ओर कई अन्य पेड़ थे और पैरों के पास हरी दूबों से भरी धरती थी जिसमें लड़के अपनी गायों और भेड़ों को लेकर चराने चले आते थे। उन चौपायों को वह निर्विकार भाव से निहारता। कोई-कोई गाय उसकी पत्तियाँ चर जाती तो उसे बहुत पीड़ा होती। वह सोचने लगता कि उस चरवाहे के पास दो हाथ हैं जिनसे वह अपनी रक्षा के साथ-साथ बहुत-कुछ कर सकता है यानी जो चाहे वही कर सकता है। उसके दो पैर भी हैं जिनसे वह चलकर कहीं से कहीं चला जा सकता है। उसे आश्चर्य होता कि कैसे इन्हीं दो पैरों पर वे अपने अस्तित्व को उठाए कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं। यह सुख उन जैसे वृक्षों और पौधों को नहीं मिलता। उसके समान जो अन्य पेड़-पौधे हैं वे जमीन में गड़े हुए हैं और गतिशील नहीं हो सकते। उन्हें तो मजबूर होकर अपनी जगह के ही हवा-पानी में रहना है, उसी जमीन पर उसी जगह कीलित रहना है। खैर, यह तो प्रकृति का बना हुआ विधान है। जिसमें कोई इधर से उधर नहीं कर सकता। चलो, यदि उन सबों को जीना है तो इसी तरह जीना है।

वे चरवाहे अक्सर उसकी डालियों पर चढ़ जाते जिनका भार उठाना उसे बुरा नहीं लगता था, क्योंकि उसके पास जितनी शक्ति थी उसकी तुलना में उन बच्चों का, या कभी-कभी सयाने का भी भार क्या था? पर उनसे उसे खीझ होती थी कि बैठेंगे ठंडी छाँह में पर उसके प्रति कृतज्ञ होने के बजाय अपने ढोरों से चरवाएँगे उसकी पत्तियाँ! उफ! ये मनुष्य भी न… सिर्फ अपनी ओर से सोचते हैं। और मनुष्य ही क्यों? सब अपनी ओर से सोचते हैं। मनुष्य हर-हमेशा जीत इसलिए जाता है कि उसके पास कुटिल बुद्धि का अपरिमित खजाना है। यह सोचते ही अनाम पेड़ मुस्कुरा उठा।

पर उसके बाद से उसे मनुष्यों और चरने वाले पशुओं से डर लगने लगा कि न जाने कब मनुष्य उसे काट दे या पशु उसे चर जाएँ। पर वह कर कुछ नहीं सकता था। पैर तो थे नहीं जो जानवरों की तरह भाग सकता। मुँह तो था नहीं जो अपनी हँसी-व्यथा बयान कर सकता था या चिल्लाकर किसी को अपनी सहायता के लिए बुला सकता? सिर्फ सोच और समझ सकता था।

पर यह भी सच था कि उसे अपनी दुनिया बहुत अच्छी लगने लगी थी। एक दिन दो चरवाहे लड़के आए और उसकी छाया में बैठ कर बातें करने लगे। वह उन दोनों की बातें बड़े ध्यान से सुनने लगा।

उनमें से एक ने कहा, “मालूम है? शहर में पेड़ लगाए जा रहे हैं। उसके लिए पेड़ों को उखाड़-उखाड़कर मँगवाया जा रहा है।’

दूसरे ने कहा, “हें… पेड़? पेड़ लगेंगे? कि पौधे लगते हैं?”

“पेड़… पेड़! पेड़ लगाए जा रहे हैं। बड़े-बड़े पेड़।”

“तो इन्हें उखाड़ेगा कौन?”

“मशीन! ये मशीन से उखाड़ लिए जाते हैं और ट्रक पर लादकर ले जाया जाता है उन्हें। फिर रोप दिया जाता है।”

“हाँ… ऐसा क्या?”

“हाँ… ऐसा…! ऐसा होता है।” दूसरे लड़के का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया।

इधर यह सुनते ही अनाम पेड़ की पत्तियाँ हिलने लगीं। पेड़ भय से काँपने लगा। वह सोचने लगा क्या पता उसे भी उखाड़ लिया जाए? ना… ना…ऐसा न हो। ऐसा न हो… वह दिल में मनाने लगा। उसे उन दोनों लड़कों की बातों पर विश्वास हो गया था कि जब वे बोल रहे हैं तो सही ही बोल रहे हैं।

अब वह डर के मारे सहमा-सहमा रहने लगा था। न हवा अच्छी लगती थी, न अपने माहौल की कोई अन्य चीज। बस एक ही चिंता समाई हुई थी कि कहीं उसे उखाड़ न लिया जाए। उस लड़के के शब्द याद आ रहे थे… “हें! पेड़ लगेंगे कि पौधे लगते हैं?”

“पेड़… पेड़! पेड़ लगाए जा रहे हैं।”

“मशीन! ये मशीन से उखाड़ लिए जाते हैं… फिर रोप दिया जाता है।”

उसे दुख हुआ अपने अस्तित्व पर। उसके पास पैर नहीं… नहीं तो वह दौड़कर कहीं भाग जाता और छुप जाता।

और सचमुच वह दिन आ गया। उस दिन कुछ लोग आए और पेड़ों का चुनाव करने लगे। एक ने उसे देखकर कहा “अरे! यह देखो तो? यह कौन-सा पेड़ है?” कैसा खुबसूरत है? यहाँ इसे कौन देख रहा है?”

“हाँ सचमुच! ऐसा पेड़ मैंने नहीं देखा। इसकी पत्तियों का कटाव देखो और इसका हरापन देखो। …आखिर इसका नाम क्या है?”

“पता नहीं क्या है? …क्यों न इसे ही ले चलें?”

“नहीं, कहीं यह विरल जाति का पेड़ है उखड़ने से कही सूख न जाए!”

“नहीं इसे हम ध्यान से रोपेंगे और इसका ख्याल रखेंगे। यह सुनकर पेड़ रोने लगा। उसकी पत्तियाँ हिल-हिल कर छटपटाने लगीं। कुछ दिनों बाद वह ट्रक पर लदा हुआ भागा जा रहा था। बिना पैरों के ही दौड़ रहा था। गति… गति… गति… इतनी तेज गति। सारी पृथ्वी उसे घूमती हुई मालूम पड़ रही थी। उसे चक्कर आ रहे थे। एक जगह पहुँचकर रोपा गया उसे।

उसे दूसरी धरती मिली। बिना वर्षा के ही पानी मिल गया। अब वह खड़ा था एक सड़क के किनारे मनुष्य की गुलामी करता हुआ। उसकी सड़कों को ठंडक पहुँचाता हुआ। हरित महानगर के हरे सपने को पूरा करता हुआ। उसने कभी इस दिन की कल्पना भी न की थी। कहाँ पहले वह जी रहा था अपनी दुनिया में जहाँ उसे जरूरत न थी अन्य कुछ की। सब कुछ था उसके चारों ओर। अद्भुत प्रकृति और प्रकृति का लाड़-प्यार।

और कहाँ यह पंछियों और जीवों से शून्य लोहे और कंकड़-पत्थर की नगरी जहाँ रंग-बिरंगी गाड़ियाँ ही दौड़ रही थीं चारों ओर। उससे नजर उठी तो मनुष्य पर गई। कभी-कभार गायें और कुत्ते भी दिख जाते थे। परंतु सब जैसे अपनी मंजिल से दूर दीन-हीन बने भटक रहे हों। वह कहाँ आ गया था? यह कौन सी दुनिया थी?

वह याद करता पंछियों को, छोटे-छोटे प्राणियों को। पंछी यहाँ भी थे, पर ये दूसरे किस्म के थे। फिर वह हरी-भरी दुनिया, ठंडी बहती हुई हवा, उसकी छाया में सुस्ताते चौपाए, गरीब चरवाहे। उसके भाई-बंधु, आत्मीय पेड़-पौधे सब सपने हो गए। सड़क के किनारे खड़ा, वह प्रतिपल अपने अतीत को याद करता रहता था।

अंजना वर्मा

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नंदन पार्क – अंजना वर्मा

इस बार जोर की ठंड पड़ रही थी और सूरज भी कोहरे की लिहाफ ओढ़ कर सो गया था। कहाँ सब सोच रहे थे कि अब ठंड चली गई। समय भी तो उसके जाने का हो गया था, पर अब जाते-जाते वह अपना असली चेहरा दिखा रही थी। मेहनतकश लोगों में जवान लोग तो ठीक थे, बूढ़े और बच्चों के लिए मुश्किल हो गई थी। कई बुजुर्ग, पेड़ की पीली पत्तियों की तरह चुपचाप खिसक गए तो कई बूढ़े लोगों ने खाट पकड़ ली। इसी ठंड में हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी। लगातार दो दिनों से फूही बरसती रही। एक दिन छूटी भी तो तापमान नहीं बढ़ा। शंकर की माँ भी ठंड के कारण बीमार पड़ गई और उसका खाना-पीना सब छूट गया। जब वह खाँसने लगती तो खाँसते-खाँसते बेदम हो जाती। चौबीसों घंटे खाट के पास बोरसी लेकर बैठी रहती, क्योंकि उसे लगता था कि ठंडा उसकी हड्डियों में समा गया है। बोरसी न रहे तो उसकी जान ही निकल जाए!

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मुहल्ले वालों ने ठंड से निजात पाने के लिए सड़क के किनारे अलाव लगा लिया था। सवेरे-शाम वह धुधुआती हुई जल उठती। लकड़ी न रहती तो टायर, कूड़ा कुछ भी डाल दिया जाता। जो आता वह वहाँ बैठ जाता।

शंकर पेंटर था और यही काम करते हुए अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा था। खर्च की लगाम पकड़े रहता कि वह नियंत्रण से बाहर न हो जाए। हफ्ते-भर से वह घर में बैठा हुआ था। मौसम सही रहता तो वह अपने काम पर होता। पर ऐसे मौसम में जब सूरज के दर्शन न हों, काम कौन करवाता?

इसी ठंड में एक दिन वह पान-गुटखा खरीदने के लिए दुकान तक गया था – दोनों हाथ अपनी बगल में दबाए हुए, टोपी के ऊपर से मफलर बाँधे हुए ठंड से जैसे लड़ता हुआ। दुकान पर उसकी भेंट संजय से हो गई तो संजय ने चुटकी ली, क्यों शंकर? तू बोल रहा था न कि जाड़ा चला गया? यह क्या है? उस दिन जब तू चाची के लिए स्वेटर खरीद रहा था तो मैंने कहा था न कि अपने बच्चों के लिए भी स्वेटर खरीद दे तो तू यही कहकर टाल गया कि ठंड तो अब जा रही है। देख, कैसी ठंड घिर आई है। टीवी में बोल रहा था कि तापमान चार डिग्री तक पहुँच गया हैं। देख, वह दुगुने जोश के साथ लौट आई है।”

यह सुनकर शंकर झेंपते हुए बोला, “आई है तो रहेगी थोड़े ही न? अब कल से ही जाड़ा खत्म होने लगेगा, देखना।”

उसके बोलने का अंदाज ऐसा था कि संजय मुस्कुराने लगा और उसके साथ-साथ दुकानदार भी। गुटखे का आदी शंकर कुछ गुटखे के पैकेट लेकर चलता बना।

पान-गुटखे की दुकान से बाएँ ओर जो सड़क जाती थी, उसमें कामगार लोग रहते थे। उसकी दाएँ ओर की सड़क पर मध्यवर्गीय लोगों के मकान थे। उसी कतार में कुछ अपार संपदा से भरे धनाढ्यों के घर भी थे। बीच में एक पार्क था, जिसे पार्क नहीं मैदान ही कहना चाहिए। वह जमीन पार्क के लिए तो थी, पर अभी तक इस तरह की कोई शुरुआत न होने से कठोर बनी पसरी हुई थी। उस पर उगी हुई दूब शीत की मार झेलती हुई पीली और सूखी दिखाई देने लगी थी। इस पार्क में चहलकदमी करने वालों की कमी नहीं थी। सवेरे-सवेरे सैर या जॉगिंग करने वाले लोग इसका पूरा लाभ उठाते। इसकी खुली हुई हवा में जी-भरकर साँसें लेते, कई लोग आकर शांति से बैठते, तो कई योगाभ्यास, व्यायाम वगैरह करते। इन सबसे अलग कुछ ऐसे लोग भी थे जो इस हरी-भरी जमीन पर कुछ नहीं करते, बल्कि अपनी मेहनत और अपना समय बचाने के लिए अपने कदमों से इसे तिरछा या सीधा नापकर जल्दी-से-जल्दी उस पार पहुँच जाते। ले-देकर यह दो मुहल्लों के बीच का इकलौता दुलारा मैदान था।

इसी मैदान से सटा मंत्री जी का आलीशान बंगला था जिसके अहाते में उनकी कई गाड़ियाँ लगी रहती थीं। द्वार पर सिक्युरिटी तैनात रहते और ऊँचे फाटक के बाहर सड़क के किनारे पैरवीकारों की रंग-बिरंगी गाड़ियाँ मंत्री जी की शान में चार चाँद लगातीं रहतीं।

आज कितने दिनों बाद चमकदार धूप निकली थी और एक वृहत पैरेसॉल की तरह आसमान में छा गई थी। इसके पसरते ही चारों ओर चहल-पहल शुरू हो गई। कई दिनों से कमरे और घरों में दुबके हुए लोग बाहर निकल आए। मेहनतकशों की गली की जवान औरतें कमर में पल्लू खोंसकर अपने बच्चों के कपड़े और पोतड़े धो-धोकर सूखने के लिए अलगनी पर डालने लगीं। सड़कों पर आवा-जाही बढ़ गई। इतने दिनों से शिथिल पड़ा यातायात आज अचानक सक्रिय हो उठा जिससे सड़कों पर वाहनों का जाम लग गया।

शंकर की माँ सूरज की किरणें देखते ही बिछावन से उठकर बाहर छज्जे के नीचे धूप में आकर बैठ गई। सर्दियों में धूप का पीछा करने की उसकी पुरानी आदत थी, इस तरह कि धूप खिसकने के साथ-साथ उसकी चटाई भी खिसकती जाती थी तब तक, जब तक कि सूरज डूब नहीं जाता। इस शहर में वह शंकर के बुलाने से आई थी नहीं तो वह नहीं आती, ऐसे बेस्ट की कोठरी में उसका दम घुटने लगता था।

दस बज रहे थे और शंकर अभी भी बिस्तर में था। कोई और दिन होता तो उसके हाथों में ब्रश होता और वह उदास दीवारों को रंगीन बनाता हुआ उन्हें हँसाने की कोशिश में लगा होता। आज बिस्तर में धूप की छुअन मिल गई थी उसे और वह गरमाया पड़ा हुआ था। इस सर्दी में बहुत दिनों बाद ऐसा सुख मिल रहा था, नहीं तो एक कंबल में करवट बदलते और शरीर को सिकोड़ते हुए रात बीत जाती थी।

उसकी बीवी पूजा ने उसे झिंझोड़कर जगाया, “उठो न? कब तक सोये रहोगे?”

“छोड़, सोने दे मुझे।” पूजा ने छोड़ दिया। सचमुच कितनी मुश्किल से उसे सोने का समय मिलता है। फिर काम शुरू हो जाएगा तो वह न ढंग से सो पाएगा, न खा पाएगा।

शंकर बिस्तर में पड़े-पड़े अपनी बंद पलकों से भी कमरे के भीतर-बाहर फैली रोशनी का जाएजा लेता रहा। आज धूप उसकी कोठरी की मटमैली दीवारों को चमकाने के बाद वहीं पैर पसारकर बैठ गई है – यह एहसास उसके भीतर ऊर्जा भर रहा था।

वह आराम से ग्यारह बजे सोकर उठा जबकि उसकी आँखें स्वतः खुल गई। उसने उठकर गुटखा का एक पाउच मुँह के हवाले किया। स्वेटर पहनकर मफलर बाँधते हुए बाहर जाने लगा तो पूजा ने कहा, “अरे-अरे! उठकर सीधे कहाँ चल दिए?”

“तो क्या यहीं बैठा रहूँ? जरा एक चक्कर लगाकर आता हूँ। कुछ काम-धंधे के बारे में भी पता कर लूँ।”

इसके बाद किसी जवाब की आशा किए बिना वह सीधे बाहर निकल गया। वह जाएगा और अपने दोस्तों-परिचितों से इधर-उधर की बातें करेगा। यह एक चक्कर लगाना व्यर्थ नहीं होता था। इस तरह घूमते-फिरते वह काम की तलाश करता था। कोई संगी-साथी बता ही देता था कि फलाँ जगह एक पेंटर की जरूरत है।

यह मुहल्ला ऐसा था कि लोगों के आधे काम तो सड़कों पर ही होते थे। लकड़ियाँ हैं तो सड़कों पर सूखेंगी। बच्चे हैं तो सड़कों पर खेलेंगे। औरतें बाल झाड़ेंगी तो सड़कों पर बैठकर। बड़ियों और पापड़ की खटिया भी सड़कों के किनारे आधी सड़क घेरती हुई बिछेगी। एक कोठरी में कितना जीवन समा सकता है?

अभी कुछ दूर आगे बढ़ा तो रामबाग वाली चाची दिखाई पड़ीं जो कई दिनों से बीमार चल रही थीं। आज उनकी भी खाट बाहर धूप में बिछी थी जिस पर वह बैठी हुई थीं।

शंकर ने कहा, “पैर लागूँ चाची? अब कैसी हो?”

पप्पू को देखकर चाची ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कुरा न सकीं, नहीं तो वह मुस्कुरातीं और आशीर्वादों की झड़ी लगा देतीं। वह बस इतना बोल सकीं, “ठीक हूँ बेटा। आज ही तो उठकर बैठी हूँ। कई दिनों से बीमार थी। बड़ी सेवा की मेरी बहुओं ने। बेटा तो मुझे दूध-रोटी खिलाए बिना काम पर जाता न था। इन्हीं सबकी सेवा से उठ बैठी हूँ।”

शंकर सुनकर भीतर-ही-भीतर मुस्कुराया। बात-बात में अपने बेटे और बहुओं की तारीफ करना चाची की आदत थी। इतना कहने के बाद वह हाँफने लगीं और चुप हो गई।

शंकर मैदान से होकर गुजरने लगा तो उसने देखा कि आज वहाँ बच्चों का क्रिकेट चल रहा है। मेहनतकश मुहल्ले के सारे बच्चे अपने तन पर पुराना-धुराना, सिर्फ कहने-भर को गरम कपड़ा डाले मैदान में डटे हुए थे। उसके दोनों बच्चे मोहित और रोहित भी थे उसी वेशभूषा में। मोहित ने लकड़ी के एक पट्टे को बल्ला बनाया हुआ था और रोहित समेत सभी बाल खिलाड़ियों ने अपना मोर्चा सँभाल रखा था। जोश और मस्ती में कोई कमी न थी। वह देर तक खड़ा देखता रहा। बड़े अच्छे लग रहे थे ये खेलते हुए बच्चे!

घर पहुँचा तो देखा माँ की चटाई आगे खिसक आई है। वह उस पर बैठी धूप सेंक रही थी। उसने हाथ बढ़ाकर कहा, “चल माँ! तुझे वहाँ मैदान में बैठा दूँ। वहाँ दिन-भर धूप सेंकना। पूरी देह गरमा जाएगी।” उसकी माँ ने कहा, “ना रे बाबा! अभी तो मुझसे एक कदम भी न चला जाएगा। और तू सवेरे-सवेरे उठकर कहाँ चला गया था?”

“वो थोड़ा काम के चक्कर में निकला था, माँ!

यहाँ बित्ते-भर धूप के लिए चक्कर काट रही है माँ… शंकर ने सोचा। गाँव में जब वह था तो पैसे की कमी जरूर थी, पर धूप, हवा, पानी और आसमान इफराद थे। रोशनी, हवा और आसमान का अनंत विस्तार था। तब वह नहीं समझता था कि ये चीजें सिमट भी सकती हैं और अब वह देख रहा था कि इनका सिमटना कैसा होता है?

जब भी गाँव याद आता गाँव के पेड़ जरूर याद आते। वे लीची के बगीचे और उनमें धमाचौकड़ी! लीची की सबसे ऊँची टहनियों पर चढ़ने वाला वही हुआ करता था और चंद खट्टी इमलियों के लिए इमली के भुतहा कहे जाने वाले पेड़ों पर भी वही चढ़ता था। एक बार तो उसने लीची की डालियों में छुपकर माँ को खूब रुलाया था। माँ ने स्कूल न जाने के लिए उसे पीटा था। बस वह भी गुस्साकर लीची के पेड़ पर चढ़ गया और डालियों में छुपकर बैठा रहा। उधर उसकी माँ उसे घर में और आस-पास न देखकर गाँव में ढूँढ़ने निकली।

गाँव के एक-एक बच्चे और सयाने से घर-घर में झाँक-झाँककर, रास्ते-पैरे में रोक-रोककर पूछती रही। घंटों भटकने के बाद जब वह न मिला और कोई सकारात्मक उत्तर भी नहीं आया तो उसी पेड़ के नीचे बैठकर सुबक-सुबककर रोने लगी आँचल से आँखे पोंछते हुए। तब शंकर से न रहा गया। उसने ऊपर से एक लीची तोड़कर माँ के सामने गिरायी। माँ ने चेहरा उठाकर ऊपर देखा तो वह हँस रहा था। इधर माँ हँसने के बजाय फिर बिगड़ गई और बोली, “तूने कितना हैरान किया मुझे? तुझे समझ में आया कि मुझ पर क्या बीतेगी? शैतान कहीं का।”

फिर दो पलों में ही गुस्सा गायब हो गया और वह कोमल आवाज में बोली, “आ, उतर आ। अब न मारूँगी तुझे… आ जा बेटा!”

वह उतरा तो माँ ने उसे कलेजे से लगा लिया, “ऐसे कहीं रूठते हैं? मेरी तो जान ही निकल गई थी। तू कहीं चला जाएगा तो मैं क्या करूँगी रे?” और वह रोने लगी थी। वह अपने हाथों से माँ के आँसू पोंछने लगा। “अच्छा, चल अब खा ले। अभी तक भूखा है तू!” माँ बोली।

और तब माँ ने जो अपने हाथों से उसे रोटी खिलाई तो वह आज तक नहीं भूला उन प्यार-भरे कौरों का स्वाद! ऐसे तो अक्सर माँ के हाथों से खाते हुए वह यही सोचता था कि कैसा भी खाना हो, माँ के हाथों से इतना स्वादिष्ट क्यों हो जाता है? एक दिन तो वह पूछ भी बैठा था, “क्या माँ, तुम्हारे हाथों से कोई रस निकलकर खाने में मिल जाता है क्या? तुम्हारे हाथ से खाना इतना स्वादिष्ट क्यों हो जाता है?

माँ ने हल्की-सी चपत उसके गाल पर लगाते हुए कहा, “धत पगले! कैसी बातें करता है!” और वह हँसने लगी थी।

गाँव में उसने जितना मौज किया, वह यही सोचता कि आज के जमाने में वह उसके बच्चों को नसीब नहीं होगा। वे जान भी न पाएँगे कि खुली हवा और खुली धरती में स्वच्छंद विचरने का आनंद क्या होता है? उसने अपने भीतर कितनी शुद्ध हवा और कितनी धूप भरी थी! नदी में नहा-नहाकर उसने अपनी त्वचा को कितना सींचा था जल से? धूल-मिट्टी से भी। काम की तलाश में जब वह इस शहर में आया था तो यही बात उसे सबसे अधिक अखरी थी। एक छोटे-से ऐसे बेस्ट के कमरे में रहना और माँ के लिए एक और कमरा लेना। इसी में तो उसकी आय का अधिकांश निकल जाता था। ऊपर से हर मौसम में तबाही।

वह सोचता गाँव में प्रकृति जो दुख देती है तो उसका निदान भी साथ में उपस्थित कर देती है। गर्मी है तो हवा-पानी है, जाड़ा है तो धूप और आग है। शहर की सुख-सुविधाएँ सिर्फ पैसे वालों के लिए है, गरीबों के लिए नहीं। पहले तो मन बिल्कुल उचाट हो जाता था, पर अब तो उसे इसी माँद में जीने की आदत हो गई थी। पर वह नहीं चाहता था कि यह अँधेरा माँद उसके बच्चों को मिले। वह तो पिता के निधन के कारण पूरा पढ़ नहीं पाया। परंतु वह अपने बच्चों को पढ़ाने का संकल्प ले चुका था।

पर कैसे होगा यह सब? उसने सोचा था कि मोहित ओर रोहित को अच्छे स्कूल में पढ़ाएगा। परंतु स्कूल की फीस ही सुनकर पीछे हट गया था। हजारों रुपये महीने के खर्च हो जाएँगे। उस पर से जितना बड़ा स्कूल उतना ज्यादा ढीप-ढाप। एक बोरी किताबें, बढ़िया यूनिफॉर्म और तरह-तरह के ताम-झाम। ऊपर से समय-समय पर अभिभावकों से पैसे निकलवाने के लिए फरमान जारी हो जाएगा। उसका दिल बैठ गया था कि वह नहीं सकेगा। सरकारी स्कूल में पढ़ाए तो उल्टे कुछ पैसे भी मिल जाएँगे, साथ ही दिन का खाना मिलेगा सो अलग। अतः उसे सरकारी स्कूल में अपने बच्चों का नामांकन करवाना पड़ा था। ऐसे भी तो बच्चे पढ़ेंगे ही चाहे जैसा भी पढ़ें!

अब रोज ही मैदान में बच्चों की जमघट लगने-लगी। पर सूरज की किरणों से सुनहरे बने मैदान में इन बच्चों का खेलना-हँसना और चहकना वहाँ सैर करने वालों को जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें लग रहा था कि मैदान की गरिमा कहीं भंग हो गई है।

रोज की तरह ‘गंधा’ मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे। घूमने के दौरान उन्हें मलिक मिल गए। अपने भारी-भरकम छह फुट्टे शरीर से टावर की तरह हिलते हुए वे मलिक के पास पहुँचे और हलो कहकर जाते हुए मलिक को रोका।

“हलो मिस्टर मलिक! इधर इस मैदान को देख रहे हैं न आप?”

“हाँ… क्या? क्या हुआ?”

“क्या आपको नहीं लगता कि ये मैदान अब कुछ डर्टी हो गया? पहले कैसा था और अब कैसा हो गया है?”

“हाँ-हाँ, राइट। ठीक कहते हैं आप। यही तो मैं भी सोच रहा था कि इसकी सूरत अब क्यों बदल गई है? हम…!” कहकर माथे पर बल देते हुए मलिक ने चारों ओर नजरें दौड़ाई।

“आजकल उस गली के लड़के दिन-भर मैदान पर कब्जा जमाए रहते हैं। उसी की वजह से ये गंदगी हो गई है। अपना तो अब इधर आने का मन नहीं करता है। ये यंग लोग ही अच्छे हैं जो सीधे जिम चले जाते हैं।” गंधा ने कहा। इस पर मलिक बोले… “अब हमारी उम्र तो जिम जाने की नहीं रही?” कहकर मलिक हँसे तो गंधा को भी साथ में हँसना पड़ा।

अब मैदान में खेलने वाले बच्चों के चेहरे जहाँ खिले-खिले दिखाई देने लगे, वहीं सैर करने वालों के चेहरों पर चिड़चिड़ाहट चस्पाँ हो गई। गंधा घूमते-घूमते अक्सर कह उठते, “शिट्… कोई जगह ही नहीं बची हमारे लिए।” कहकर मुँह बना लेते।

एक दिन घूमते हुए उन्होंने शशिकांत सिंह से कहा, “मंत्री जी के यहाँ तो आपका आना-जाना है न शशिकांत जी?”

शशिकांत सिंह ने कहा, “हाँ… पर क्यों पूछ रहे हैं?” वह भी टहल रहे थे।

“तो ऐसा कीजिए, उनसे कहिए कि इन लड़कों का यहाँ खेलना बंद करवाए ताकि हम साफ-सुथरी हवा में साँस ले सकें। और भई, ऐसे भी, उनके आलीशान बंगले के पास ऐसा हुजूम क्या अच्छा लगता है?”

शशिकांत सिंह न जाने क्या सोचते हुए कुछ पलों तक चुप रहा, फिर बोला, “ठीक है। एक बार मैं यह बात उनके कान पर डाल दूँगा। फिर उनकी समझ में जैसा आएगा, वे करेंगे।”

गंधा ने एकदम से घिघियाकर कहा, “हाँ, भाई! आप इतना कह देना तो काम हो जाएगा। ये मैदान साफ हो जाएगा और हमारा माहौल भी बिगड़ने से बच जाएगा। आखिर हमारे भी बच्चे हैं…।”

मंत्रीजी को भी सुबह-सुबह टहलने की आदत थी और वे भी उसी मैदान में टहलते थे अपने लाव-लश्कर के साथ। कई लोग उनके आगे-पीछे रहते। उसी समय बहुत सारी इधर-उधर की बातें होतीं। वे भी इस बात को देख रहे थे कि उनके बंगले के पास ये फटेहाल बच्चे भाग-दौड़ करते रहते हैं। पर यह तो साक्षात जनता थी। इसके विरुद्ध जाना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा था। सोच रहे थे कि कोई बहाना मिले तो कुछ करें।

एक दिन वे टहल रहे थे – आगे-आगे मंत्री जी, उनके अगल-बगल दो बंदूकधारी और साथ में उन्हीं के साथ कदम से कदम मिलाते हुए कई लोग। एक भीड़ ही चल रही थी। शशिकांत ने दूर से ही हाथ जोड़कर पूरी विनम्रता के साथ झुककर अभिवादन किया और उनकी मंडली में चलने लगा। वे किसी से कुछ कह रहे थे। जब चुप हुए तो शशिकांत ने कहा, “सर जी! आजकल इस मैदान में दिन-भर हल्ला-गुल्ला होता रहता है और गंदगी बिखरी रहती है।”

“हाँ, सो तो है।”

“वे कामगार बस्ती के लड़के चले आते हैं और लगते हैं क्रिकेट खेलने। मैंने उन्हें कितनी बार मना किया। मैंने कहा कि देखो, मंत्री जी के बंगले के सामने मत हल्ला करो। पर वे मानें तब न?”

“अच्छा? आपने उन्हें मना किया था?”

“हाँ, सर जी!”

मंत्री जी भीतर से प्रफुल्लित हुए कि बच्चों को हटाने का उपाय खुद ही निकल आया।

शशिकांत ने फिर कहा, “सर जी! इस मैदान को एक खूबसूरत पार्क बनवा दीजिए। इससे पूरी शांति हो जाएगी और पर्यावरण भी साफ-सुथरा हो जाएगा सो अलग।”

यह सुनकर मंत्री जी बोले, “शशिकांत जी! आपने ठीक कहा। मैं भी यही सोच रहा था। मैं इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाता हूँ। पर्यावरण को शुद्ध रखना बहुत जरूरी है।”

इसके बाद मुश्किल से एक महीना बीता होगा कि एक दिन उस मैदान में कई लोग आ गए। वहाँ खेलते हुए बच्चों को वहाँ से हटने के लिए कहा गया। बच्चे मायूस होकर एक ओर खड़े हो गए और सहमे-सहमे देखने लगे कि अब यहाँ क्या होने जा रहा है? काम शुरू हो गया। कुछ लोग सफाई करने लगे। चारो ओर फेंसिंग की जाने लगी। फिर कुछ दिनों बाद एक हेड माली अपने साथ लुभावनी तस्वीरों वाली बागवानी की अँग्रेजी किताब लेकर आया। उसी के निर्देशन में कई लोग क्यारियाँ बनाने लगे।

बच्चे अभी भी आते और गुमसुम होकर देखते। किसी की हिम्मत नहीं होती थी कुछ पूछने की। उनका प्यारा मैदान एक पार्क बनने की प्रक्रिया में था।

वे रोज आते और देखकर चले जाते। पुरानी घास हटाकर विदेशी घास रोपी गई। क्यारियाँ बन गई तो उनमें फूलों के नन्हें-नन्हें पौधे लगा दिए गए। उसके बाद रोज कई-कई माली फूलों को सींचते और गोड़ते हुए दिखाई देते। फिर एक दिन एक बैनर भी लगा दिया गया – नंदन पार्क।

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा

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कौन तार से बीनी चदरिया

खामोश हवा अचानक गीत पर मृदंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, ”जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग”

सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई थी कि यह आवाज किसकी है? कौन आया होगा अभी? या कौन आ सकता है इन दिनों? देखा तो वे ही दोनों थीं खूब सजी-सँवरी और हाथों से तालियाँ बजा-बजाकर गा रही थीं। चेहरे पर पूरा श्रृंगार काजल से भरी आँखें और ललाट पर बड़ी-सी बिंदी, नाक में लौंग, कानों में लटकते हुए झुमके, गले में मोतियों की माला, माँग में सिंदूर और खूब चमक-दमक वाली सितारों जड़ी साड़ी। एक तो वही थी सुंदरी, जो कई बार शादी-ब्याह के मौके पर आकर नाच चुकी थी। बला की सुंदर थी और नाम भी था सुंदरी, लेकिन उसे बनाने वाला उस पर नर या नारी का लेबल चिपकाना भूल गया था। दूसरी साँवली नाक-नक्श की, पर साज-सज्जा वही। दोनों गाए जा रही थीं। आवाज बिना माइक के चारों ओर फैल रही थी। एक मृदंगिया उनके पास ही खड़ा मृदंग ठनका रहा था। उनका गीत कुछ देर तक चलता रहा। किरण सोच रही थी कि वह बाहर जाए न जाए ।

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बाहर तो निकलना ही था, पर कैसे? ”इतना नहीं, इतना लेंगी” वाले आक्रमण से निपटने की हिम्मत जुटा रही थी वह। खिड़की के पीछे चोर-सी छिपी हुई वह यही सोच रही थी कि उनका गाना बंद हो गया। कुछ समय के लिए फिजाँ खामोश हो गई। मियाँ-बीवी दोनों ने एक-दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए देखा। तभी सुनाई पड़ा कड़ी आवाज में दोनों में से कोई एक बोली, ”ये रानी जी! अरे बाहर तो जाओ। हम सबको पता चल गया है कि खुशियाली हुई है। चलो, नेग-निछावर निकालो। पोता खेलाए रही हो। जीए, जुग-जुग जीए।”

गाने-नाचने की आवाज सुनकर किरण की बहू भी आ गई थी अपने बच्चे को गोद में लेकर और साथ में बेटा भी। दोनों के चेहरों पर हँसी थी। मनोरंजन के इस अनोखे सान से उनकी देखा-देखी कभी ही कभी हो पाती थी। उन दोनों ने भी खिड़की से झाँका। अपनी बहू से किरण ने कहा, ”बच्चा लेकर न जाना बाहर। बच्चा ले लेंगी अपनी गोद में तो एक न सुनेंगी। अपनी माँग मनवाकर ही रहेंगी। और बच्चा जल्दी देंगी नहीं।” बहू की हँसती हुई मुख-मुद्रा अचानक गंभीर बन गई।

फिर सुनाई पड़ा, ”ये बहू जी!”

किरण ने झाँका सुंदरी बोल रही थी। बोलने के बाद थोड़ी देर तक इंतजार करती रही कि कोई निकले। जब कोई न निकला किरण और न सुशील ही, तो वह बोली, ”अरी कुसुम! चल गा।”

और फिर दोनों शुरू हो गई थीं। सतर्क मृदंगिया के सधे हाथ मृदंग पर फिर चलने लगे थे सुर-लहरी की छाया की तरह। उन दोनों की आवाज फिर गूँजने लगी थी, ”अँगने में जसोमति ठाढ़ि हैं गोदी में कन्हैया लिहले, गोदी में कन्हैया लिहले ना / ये चंदा आव ना अँगनवाँ के बीच हो कन्हैया मोरा रोयेले ना ।”

थोड़ी देर तक सुर-ताल में गाते रहने के बाद गाना बंद हो गया था। पुकार आने लगी थी, ”अरी ओ बहूजी! बाहर आओ न, काहे लुकाय रही हो? अगर नय आओगी तो हम ही आते हैं। ओ बाबूजी! बाहर आओ।”

यह सुनते ही सुशील घबरा गए कि कहीं दोनों भीतर न आ जाएँ। उन्होंने सुन रखा था कि वे पुरुषों से नहीं डरती उनकी देह से लिपट जाती हैं। इसी डर से भले लोग तुरंत पैसे निकालकर दे देते हैं। सुशील बोले, ”चलो, बाहर निकलो अब, नहीं तो वे भीतर आ जाएँगी।”

उनके बाहर आते ही एक अजीब समाँ गया। वे दोनों पूरे उल्लास के साथ फिर गाने लगी थीं। स्वरों में एक ऊर्जा घुल गई थी ”हमें पीर उठति है बालम हो-बालम हो बालम हो।”

अजीब भंगिमा के साथ सुंदरी साड़ी फहरा-फहराकर नाचने लगी थी। दूसरी न देखने में सुंदर थी, न नाचने में ही अच्छी, फिर भी अलसाई-सी इधर-उधर हाथ फेंककर नाच रही थी, जैसे नाचने का कोई उत्साह उसके पास न बचा हो। गीत खत्म कर दोनों उस दंपति के पास आ गई थीं, ”अरे! जरा बबुअवा को लाओ न! हम भी तो देखें! खेलाएँगे हम बबुआ को, आसीरबाद देंगे।”

ताली बजाकर साँवली वाली ने कहा था, ”अरे रानी! जीए तेरा लल्ला, जीए-लाख बरीस जीए।”

सुंदरी बोली, ”तो लाओ, दो हमें। पाँच हजार से कम न लेंगी।”

बड़ी देर से उनका नाचना-गाना देखकर अवाक बनी हुई किरण बोली, ”अच्छा-अच्छा, ठहरो! मैं लाती हूँ।”

मोल-भाव का हिसाब बैठाते हुए उसने घर के भीतर से लाकर एक हजार का नोट पकड़ाया तो बात न बनी। सुंदरी ने या कुसुम ने लेने के लिए हाथ भी नहीं उठाया।

सुंदरी बोली, ”अरे-अरे! ये क्या देइ रही हो?” कहकर आँखें नचाई।

कुसुम ने कहा, ”इतने से हम नहीं मानेंगी।”

सुंदरी बोली, ”तुम्हारे यहाँ खुशियाली है। चलो रानी, निकालो! हम रोज-रोज किसी के यहाँ नहीं जातीं। जब उपरवाला ऐसा दिन देता है तभी हम जाती हैं।”

कुसुम बोली, ”हम सबको तो तुम्हारा ही आसरा है। आजकल हम सबको कोई पूछता भी नहीं।” उसकी आवाज में दीनता घुली हुई थी।

किरण ने अपने ब्लाउज में छुपाया हुआ एक वैसा ही नोट बढ़ाया। दोनों नोटों को थामते हुए सुंदरी ने कहा, ”कम-से-कम एक पत्ता तो और दो।” उसका स्वर इस बार मुलायम था।

उसके कहने के साथ ही कुसुम बोली, ”हमारे अपने तो तुम्हीं सब हो, नाहीं त कौन है हमें देखने अउर पूछने वाला दीदी? देखो, तुम्हारे बगल में भी एक बच्चा हुआ है। उन सबने हमें केतना साड़ी-कपड़ा दिया है! पइसा भी दिया।”

यह कहने के बाद वह अपनी टोकरी पर पड़ा हुआ कपड़ा हटाकर दिखाने लगी थी जिसमें नई साड़ियाँ और कपड़े रखे हुए थे। किरण थोड़ा शरमा गई भीतर-ही-भीतर। बगल वाले ने इतना दिया तो उसे भी उससे कम तो नहीं देना चाहिए।

फिर कुछ खीझकर हजार का एक और नोट निकाला यह सोचते हुए कि ये जब तक मन-भर नहीं लेंगी, यहाँ से जाएँगी नहीं और तमाशा करती रहेंगी।

सुंदरी ने लपककर नोट पकड़ लिया। किरण की ठुड्डी पकड़कर बोली, ”जीयो दीदी, जीयो। बने रहें तुम्हरे पूत बना रहे तुम्हरा लल्ला। बाबू लखिया होए। भगवान दिन देवें अइसा कि हम बार-बार नाचें-गाए तुम्हारे दुआरे।”

इस तरह असीसती हुई दोनों चली गई। मृदंगिया भी मृदंग लिए उनके पीछे-पीछे चला गया। रास्ते में एक जगह रुककर सुंदरी ने मृदंगिया को पैसे पकड़ाए तो उसने अपनी अलग राह पकड़ ली।

पैदल चलते-चलते सुंदरी के चेहरे पर पसीने की बूँदें स्फटिक के दानों की तरह छलछला आई। वह रुक गई और कुसुम से बोली, ”का कहती हो? ऑटो ले लेवें?”

कुसुम बोली, ”काहे? अब थोड़ी दूर पर तो हइए है। अब निगचाने पर पइसा काहे को जियान करें? सुस्ताय लो तनका देर।”

दोनों एक पेड़ की छाया में बैठ गई। सुंदरी और कुसुम शहर के सीमांत पर रहती थीं। वहीं पर इनके जैसी कुछ और भी थीं जो नाच-गाकर अपना जीवन चलाती थीं। इनका न कोई लिंग था, न कोई जाति थी। सबका जीवन एक-सा था। एक-सी समस्या, एक ही जीवन-शैली।

सुंदरी बोली, ”कल जाना है माई से भेंट करने। कल सवेरे ही निकलेंगे। तुम भी चलिहो हमरा साथे।”

कुसुम कुछ नहीं बोली। चुप रहने का मतलब था ‘हाँ। कुसुम और सुंदरी की आपस में अच्छी पटती थी। दोनों दो सहेलियों की तरह, सहोदर बहनों की तरह रहती थीं। रिश्ते में रिश्ता यही एक था। थोड़ा सुस्ताने के बाद दोनों उठकर चल दी अपने बसेरे की ओर।

”सुना है तुम्हारे बहिन ‘पुत’ की शादी हो गई?” कुसुम ने सुंदरी से कहा।

”हाँ। बहिन अपनी नई-नवेली बहू को लेकर माई से मिलने आई है। उसके यहाँ शादी में माई जा नहीं सकी थी। सो उसे देखाने ले आई है। उससे मिलूँगी? पता नहीं। सोचा है शिवाला पर मिलूँ। लेकिन माई किसके साथ आएगी शिवाला पर? रेणु उसके साथ आवेगी तब तो भेंट होइए जाएगा। केकरो मालूम नए होना चाहिए कि हमारा माय है।” फिर ठहरकर बोली, ”बहिन तो शायद ना आ सकेगी मिलने। घर में पतोहू है। कोनो कुछो कह दिया कि तुम्हारी सास की एक खोजवा बहिन है तब? ना-ना। दूर ही से भेंट करौंगी, कहीं गाँव के बाहर। माई शिवाला में आएगी जो गाँव से तनिका दूर पर है। पर आएगी किसके साथ?”

इतना कहकर वह चुप हो गई जैसे कुछ सोचने लगी हो। फिर बोली, ”और क्या करना कुसुम बेसी हिलि-मिलि के? ओ सबके दुनिया अलग है, अउर हमर सबके दुनिया अलग। हाथ-पैर, मुँह-कान मानुस के समान होके भी हम मानुस में नहीं गिनाते हैं। ऐसे अच्छा होता कि हम कोनौ जनावरै जाति में जनम लेते चाहे मरद होते, चाहे मउगी। अभी हम क्या हैं? बताओ तो?”

यह कहने के बाद सुंदरी ने आँखों में पानी भरकर कुसुम की ओर देखा। उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें भादो के उमड़े तालों की तरह लग रही थीं, जिनका पानी काँपता रहता है। कुसुम उसी तरह निर्विकार थी, चुप। कोई उत्तर उसने नहीं दिया था। एक सूखा मौन पसरा था उसके चेहरे पर वैशाख का ताप।

फिर सुंदरी बोली, ”ये कुसुम! हमार ई शरीर कोनो काम का है क्या? चइला जैसा है देह! चढ़ जाएगा अगिन पर। कुसुम! तुम पहली बार जाओगी हमरे साथ हमरे गाँव। देखना मेरा घर कइसा है। जिसके भाग में जेतना लिखा रहता है न, ओतने मिलता है। मेरे भाग में क्या लिखा था? यही दुआरे-दुआरे नाचना। सो नाच रहे हैं। जिसके भाग में कोठा-अटारी रही, उसकै मिली। हमें तो कोई जानता भी नहीं कि हम किसकी कोख से जनमे? हमारे भीतर किस स्त्री-पुरुष का खून दौड़ रहा है? हमारे महतारी-बाप कौन हैं? पर कोई तो हैं? नाहीं तो यह देह नए होती। कौन जानना चाहता है? कोई चाहेगा तो भी ओके मालूम नहीं होने देंगे सब। आउर क्या करना? क्यों बताना? हम भी थोड़े कहेंगे? अपने महतारी-बाप का नाम नए हँसवाएँगे। कहना हमारा काम भी नहीं। अब तो जो हैं, जहाँ हैं वही सब कुछ। वही रास्ता हमारा। हमारा रास्ता अलग है सभी से। जाए रहे हैं माय को देखने। एगो ओही से माया-ममता है।” यह कहते हुए उसने आँखें पोंछी।

यह सुनकर कुसुम की आँखों से भी एक बूँद लुढ़की और गाल पर अटक गई। फिर सुंदरी बोली, ”और जानती हो? अब तो मन भी नहीं होता भेंट करने का? क्या करना है मिलके? हमैं सब त्याग दिए, भूल गए। एक बहिन है और एक भाई। मेरे बाद पहिले बहन रेनु हुई। ओकरा बाद गोपी। दोनों मेरे घर से निकल जाने के बाद हुए। उनको बचपन में, फिर एक बार जवान होने पर देखा था। फिर अबकी बार कहीं। फिर अब। नहीं – अब शायद देखना न हो पाएगा – इसके बाद। उ, अपना घर-दुआर में मगन है। दुलहा, बाल-बच्चा, खेत-पथार। हमको याद रखी होगी एक खिस्सा की तरह…। उसको बहुतै बाद में, होसमंद होने पर पता चला था कि एक उसकी बहिन है जो खोजवा है।”

कुसुम बोली, ”ये सुंदरी! तुमको तो उहो मालूम कि तुम्हारा जनमभूमि कहाँ है? मतारी-बाप कौन है? हमें तो ओहू नय पता। हम तो जानते ही नहीं कि कौन हमरा माय-बाप है? हम कौन हैं?”

फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद कुसुम बोली,”जाने दे सुंदर की। हम सबको उ, सब नहीं सोचना चाहिए। हमको भी तो उसी ने बनाया जिसने मरद-मानुस बनाया, जनी-जात बनाया। काहे सोच करैं हम? पेड़ में भी देख तो सब पेड़ों में फूल-बीज कहाँ होत है? हम भी हैं उसी तरह। लेकिन हैं तो उसी के हाथ के बनाए। वही रामजी हमें भी बनाए हैं।” कुसुम कभी-कभी उसको सुंदर की बोल देती थी।

”हाँ, पर कोन सोचता है अइसे? फिर हमें सबसे अलग क्यों रखा गया जैसे अछूत हैं हम? हमें कौन गुदानता है? रास्ते चलते सब देखिकै हँस देते हैं? का हम हँसने की चीज हैं?” सुंदरी बोली।

”नहीं मानेगा तो क्या हुआ? सच्चाई तो इहे है न कि हम भी भगवान के बनाए हुए हैं।”

”अपना को संतोष दे ले कुसुमी! बाकी सोच के देख कि पिलुआ-पतारी में भी एक ठो मरद होत है त एगो मउगी।” दुख से उसका चेहरा तमतमा उठा।

इसके बाद दोनों ही चुप हो गई। कोई शब्द न फूटा किसी के मुँह से।

दूसरे दिन सवेरे-सवेरे दोनों निकल पड़ीं। उन्होंने सुबह वाली रेल पकड़ ली थी कि रेल में गाते हुए जाएँगी। रास्ते में कुछ कमाई भी हो जाएगी। एक डब्बे में सुंदरी चढ़ी। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। दरवाजे से भीतर घुसकर जब बर्थ के पास पहुँचीं तो दोनों खड़ी हो गई। उन्हें देखकर कुछ लोग मुस्कुराने लगे। औरतें शरमा गई उनके चेहरे पर पसरी पुरुष की छाया देख। पुरुषों को उनके चेहरे में औरतों के चेहरे की मूर्ति दिख रही थी। इन दोनों अर्धनारीश्वरों को देखकर पूरा डब्बा कौतुक के मूड में आ गया था। एक छिपी-छिपी मुस्कुराहट सबके चेहरे पर तैरने लगी थी। सुंदरी ने आहत होकर कुसुम की ओर देखा जैसे कहती हो, ”देख – ये लोग कैसे मुस्कुरा रहे हैं!”

कुसुम को यह सब देखते हुए एक जमाना बीत चुका थाय क्योंकि वह उम्र में सुंदरी से काफी बड़ी थी। वह निर्विकार बनी रही। अभी तो पैसे कमाना जरूरी था। अतः सुंदरी ने एक फिल्मी गीत शुरू कर दिया। वह गाते हुए आगे-आगे चल रही थी। पीछे-पीछे कुसुम हाथ पसारे हुए चल रही थी। कुछ लोगों ने पैसे निकाले, परंतु कुछ कंजूस इन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहे थे और गंभीर बने बैठे थे कि कुछ देना न पड़े। गाते-गाते उनकी यह भाव-भंगिमा देखकर सुंदरी का दिल घृणा से भर गया – संवेदनहीन। ईश्वर ने सब कुछ दिया है। सारे अंग बनाकर भी ईश्वर इन लोगों के भीतर दिल रखना भूल गया। मन तो किया कुसुम से बोले, ”कुसुमी! ये जो मुँह छुपा रहे हैं, इनके आगे तो हाथ पसार मत।” लेकिन मजबूरीवश कुछ कह न पाई। वह देखती रह गई थी, कुसुम का हाथ उन पत्थरों के आगे भी पसरा हुआ था। नोट-सिक्के बटोरते हुए दोनों आगे बढ़ती चली रही थीं। डिब्बे का अंत आ गया तो सुंदरी ने कुसुम से पूछा, ”क्या कहती है? आगे चलें?”

यह कहने के बाद उसने अपने नकली उरोजों पर आँचल डालकर उन्हें इतनी हिफाजत से ढँक लिया था कि वैसे कोई स्त्री भी न करती। ऐसे उसके नारी-रूप की बराबरी करने वाली कोई न थी। कुसुम ने कहा, ”एक डिब्बा अउर देख लें।” यह कहते हुए दोनों अगले डब्बे की ओर चलीं।

कुसुम ने डब्बे में चढ़ते हुए कहा, ”अब हम गाते हैं।”

सुंदरी ने पूछा, ”कौन वाला गाओगी?”

कुसुम बोली, ”झूठी देखी प्रीत जगत की।”

सुंदरी बोली, ”फिर वही गितवा। अपन गीत रख अपने पास। भजन सुनिके इहाँ कोई पइसा न टसकाएगा। इन सालन के चटकदार गीत सुनाव, नैन मटक्का कर, तबही मिली पइसा। तू छोड़ दे। हम ही गाते हैं।”

यह सुनकर सदा शांत रहने वाली कुसुम की भी हँसी छूट गई। बोली, ”ठीक है। तो तू ही गा।”

सुंदरी ने दूसरा फिल्मी गीत शुरू किया। कुसुम के मन में वह भजन गूँजता रह गया जिसे गाने का वह मन बना चुकी थी, ”ऐसी देखी प्रीत जगत की” और जिसे अक्सर वह खुद के लिए गाती थी, खुद ही सुनती थी।

रेल रुकी तो दोनों उतरीं और गाँव जाने वाली बस में सवार हो गई। बस में खलासी और ड्राइवर की आँखें उन्हें वैसे ही घूर रही थीं, जैसे वे गर्म-गर्म जलेबियाँ हों। उन्हें देखकर सुंदरी ने हिकारत से मुँह चमकाकर घुमा लिया।

बस ने उन्हें गाँव के सीमांत पर उतार दिया। यहाँ से मिट्टी वाली सड़क थी जो गाँव तक जाती थी। उसके बाद खेतों की पगडंडी। दोनों चल दीं उस ओर। सुंदरी का मन हरे-भरे खेतों को देखकर हरा हो गया था। दिशाओं के पट खोलकर खुली हवा चली आ रही थी। दोनों के चेहरों पर ताजगी छा गई। सुंदरी का गोरा रंग खिलकर खूब चिकना और गुलाबी हो गया। दोनों ने पान खा लिया था। एक अजब उल्लास से भरी हुई दोनों चली जा रही थीं। खेतों की पगडंडी पर सँभाल-सँभालकर पैर डाल रही थीं। गाँव आने पर कुछ बच्चे, कुछ नौजवान इन्हें मुस्कुराकर देखने लगे थे। सब सोच रहे थे कि क्या बात है कि दोनों खोजवा चली आ रही हैं। किसी पर ध्यान न देते हुए सुंदरी ने कहा, ”चल अपने घर की ओर ले चलती हूँ। देखना। पर इहाँ किसी से मिलना नहीं है। सिर्फ जाना है अनजान बनकर।”

वे एक बड़े घर के बाहर पहुँची। वह घर पूरा संपन्न लग रहा था देखने से। कुसुम हैरत से देखती रह गई थी अपनी ठुड्डी पर ओठों के नीचे उँगली दबाएँ हुए। कुछ गर्व में भरकर सुंदरी ने उसे देखा। वे दोनों कुछ देर रुक गई वहाँ पर।

कुसुम बोल उठी, ”हाँ, बहुते हैं तुम्हारे माई-बाउजी।”

सुंदरी बोली, ‘त ओसे का? हमें क्या मिला उनका? बस, खाली जनम दिए। अउर त कुछो नाहीं। छोड़ – कुसुम।”

”तो माई से भेंट कैसे करोगी?”

”हाँ, शिवाला पर। बाकिर अभी जना तो दें कि हम आ गए हैं।”

वे दोनों अहाते के भीतर चली गई। सुंदरी अपने ही घर के भीतर जाने में ठिठक रही थी। कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे, लग रहा था जैसे किसी अपरिचित के आँगन में जा रही हो। उसने पहले बाहर से ही झाँका। एक औरत दिखाई दी। वह पहचान गई कि यह उसकी बहन रेनु थी जो अब बहुत बदल गई थी। उसकी देह गदरा गई थी और अब वह पूरी तरह से प्रौढ़ा दिखाई दे रही थी।

बहन को देखने के बाद वह आँगन के भीतर गई और नाटक करते हुए बोली, ”इहाँ पर सादी-ब्याह हुआ है? हमको मालूम हुआ।”

स्त्री-पुरुष के बीच की कड़ी आवाज सुनकर रेनु ने उलटकर देखा और उसके पास चली आई। अपनी किन्नर बहन को देखकर उसकी नजर में पहचान उभर आई। उस पहचान को उसने आवाज में घुलने से रोक दिया। पर खुशी की मुस्कुराहट बिखेरे बिना न रह सकी। बोली, ”हाँऽऽ, तुम लोग आ गई? अच्छा, माई से कहती हूँ।”

वह सामने वाली कोठरी में चली गई जहाँ उसकी माँ बैठी हुई थी पलंग पर। उसने कहा, ”माई! माया दीदी आई है।”

माया सुंदरी का वास्तविक नाम था, उसके माता-पिता द्वारा दिया हुआ। जिंदगी में वह क्षण कभी न आया कि वह अपने नाम को अपने माता-पिता द्वारा पुकारे जाते हुए सुनती। यह सुनते ही उसकी माँ बाहर आँगन में आई। पर सुंदरी को सामने खड़ी देखकर भी उसे संबोधित न कर सकी। क्या बोले, समझ नहीं पा रही थी। बस खड़ी देखती रही। आवाज मुँह तक आकर रुक गई थी। आँखों में खुशी के साथ एक बेबसी थी। सुंदरी ने ही कहा, ”सादी-ब्याह हुआ है। बहुरिया को दिखाओ। आसीरवाद दे देवें।”

सुंदरी आँगन में एक ओर खड़ी चारों ओर नजर दौड़ा रही थी कि परिवार का कोई सदस्य दिखाई दे जाए। पिता अब नहीं रहे थे। न भाई दिखाई दे रहा था और न ही बहन का बेटा। बहू तो कोठरी में होगी।

तभी अपनी पायल की झंकार से आँगन को गुँजाती हुई एक ओर से बहू आती दिखाई दी। उसके हाथों में कुछ खाने की सामग्री थी। सुंदरी की माँ का दिल तड़प रहा था कि वह सुंदरी को कलेजे से लगा ले। बुलाकर भीतर बैठाए। परंतु मजबूर थी। अतः खड़ी-खड़ी सारे दृश्य को निहार रही थी चुपचाप। कुछ न कह सकती थी। नौकर-दाई, नाते-रिश्ते सब जैसे छिपे हुए कैमरे थे। कहाँ क्या क्लिक हो जाए? सतर्क थी। दो महरियाँ आँगन में काम कर रही थीं। अभी उनकी नजर भी सुंदरी और कुसुम पर थी कि वे क्या करती हैं? क्या गाती हैं?

बहू सुंदरी के पास आई तो उसने कहा, ”आय-हाय! चाँद जैसी बहू उतार लाई हो। एहवात बना रहे बहू का। दूधे नहाय पूतों फले।”

सुंदरी ने अपना झोला फैलाकर कागज में बाँधी खाद्य-सामग्री ले ली। फिर जैसे उसने एलान किया, ”अब हम जा रही हैं शिवाला की ओर।” यह कहकर अर्थ-भरी आँखों से एक बार माँ को, फिर रेनु को देखा।

उसके बाद अपनी नजरें आँगन में चारो ओर दौड़ाई। बड़ा-सा आँगन। काम करती हुई महरियाँ। भरा-पूरा घर। फिर सूनी नजरों से माँ और बहन को देखते हुए मुँह घुमाकर बाहर निकल गई। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। उन दोनों के जाते ही एक महरी ने कहा, ”ये लो। ये तो बिना नाचे-गाए चली गई।”

”तो आई किसलिए थीं?” दूसरी ने कहा।

”हूँऽऽ देखो न!” दूसरी व्यंग्य से मुस्कुराई।

इस पर सुंदरी की माँ ने तड़पकर कहा,”बिचारियों ने कुछ नेग-निछावर भी तो नहीं लिया। आई, आशीर्वाद देकर चली गईं।”

घर से बाहर निकलकर सुंदरी और कुसुम कच्ची सड़क पर आई तो कुसुम ने पूछा, ”माई से कैसे मिलोगी? अभी तो देखा-देखी भी नए हुई ठीक से?”

”माने-मतलब से सुनाए तो दिया कि जा रहे हैं शिवाला पर। उँहें आएगी सब।”

दोनों एक निर्जन शिवालय पर पहुँच गई थीं जो गाँव के बाहर पड़ता था। वह शिवालय काफी प्राचीन था जिससे सटा हुआ एक विशाल बरगद का पेड़ था। दूर-दूर तक फैली उसकी डालियों से मोटी-मोटी जड़ें लटक-लटककर को छू रही थीं। गाँव के लोग कहते थे कि इस पर शंकर जी का साँप रहता है, जो काटता नहीं है, पर अक्सर आस-पास घूमता हुआ दिखाई दे जाता है। वहीं पास में एक कनेर का पेड़ था। दुनिया-भर के पीले फूल उसके नीचे झर-झर कर गिरे हुए थे।

मंदिर के आस-पास पसरी हुई नीरवता बरगद की घनी पत्तियों में छिपी चिड़ियों की निश्चिंत और निर्भय बतियाहट के स्वरों से टूट रही थी। कभी-कभी दूर से टेरते किसी पंछी का तेज स्वर सुनाई दे जाता। ऐसे तो सन्नाटे की झंकार ही गूँज रही थी।

कुसुम चली उसकी छाया में बैठने तो सुंदरी ने कहा, ”वहीं बैठेगी? शंकर जी के साँप से भेंट करेगी क्या?”

कुसुम डर गई, ”क्याऽऽ? साँप?”

”अरे नहीं कुछ नहीं बैठ, जहाँ मन करता हो। कुछ नए होगा।”

”नहीं-नही, चल मंदिरवा के ओसारे में। वहीं बैठेंगी।”

सुंदरी ने देखा वहाँ एक खूब साफ-सुथरा कुआँ है तो उसका मन कुएँ के गर्भ का पानी पीने के लिए मचल उठा। वह चल दी कुएँ से पानी निकालने। डोल कुएँ में गिराने लगी तो कुसुम भी चली आई। सुंदरी ने पानी का डोल ऊपर खींचा और बोली, ”पहिले तू पी ले पानी।”

कुसुम अपने पैरों पर बैठ गई और ओक से पानी पीने लगी। ऊपर से सुंदरी पानी गिरा रही थी। जब वह पीकर उठी तो उसकी जगह सुंदरी बैठ गई ओक मुँह तक ले जाकर। कुसुम डोल से पानी गिराकर उसे पानी पिलाने लगी। बहुत दिनों बाद शैवाल की महक वाला ठंडा पानी सुंदरी के कंठ से फिसलता हुआ कलेजे तक उतर रहा था। बहुत दिनों बाद पानी में बसे हरेपन के स्वाद से वह तृप्त हो गई। पीकर उसने डकार ली। फिर चल दी आँचल से मुँह पोंछती मंदिर के ओसारे में बैठने। दूर से आती हुई ठंडी हवा से दोनों की आँखें झपकने लगीं तो वहीं चादर बिछाकर दोनों लेट गई।

लेटे-लेटे सुंदरी कुसुम से बोली, ”हाँ तो तुम्हें साँप का खिस्सा नहीं मालूम न?”

”नाहीं।”

”इहाँ ई बरगद की जड़ी में एक जोड़ा नाग-नागिन रहता है कौना जमाना से, कोई नहीं जाने। कोई कहता है कि शंकर जी का साँप है तो कोई कहता है कि शंकरे जी हैं। पर एक बार तो हमहीं देखैं रहें। ठीक हमरा सामने छत्तर काढ़ के खड़ा हो गया। साक्षात भोले बाबा लेखन। बाकिर काटा-उटा नए, जैसे आसीरबाद दे रहा होय”

ऐसा कहते हुए सुंदरी के रोंगटे खड़े हो गए। उसने कहा, ”देख, हमरे रोएँ खड़े हो गए हैं। उ, भोले बाबा रहें और साथ में पारबत्ती जी। एक अउर साँप था।” कुसुम ने आश्चर्य से कहा, ”हूँ? बाप रे! हम तो डरिए जाते।”

”नाहीं, कौनो डर नाहीं – ईहा के कौनो लड़िका-बूढ़-जवान से पूछो। सबकै मालूम है ई बात। सब कहेगा हम ईहा देखा, उहाँ देखा। बाकि साँप आज तक केहुको काटा नए है। बड़ा जगता मंदिर है। भागे से कोई उ, साँप को देख पाता है।”

फिर तरह-तरह की बातें होने लगीं। कहते-सुनते कुछ समय बीता। तब सुंदरी ने सूने रास्ते की ओर देखा जिस पर दो स्त्री चली आ रही थीं।

वह बोली, ”देख, उहे, माय आय रही है। उसके साथ रेनु है। पता नहीं आज गोपी क्यों नहीं दिखाई दिया? बहिन पुत भी नहीं।”

उन दोनों के नजदीक पहुँचते ही वह उठी। पहले माँ से, फिर बहन से गले लगकर मिली।

वृद्धा ने पूछा, ”कैसी है तू माया? मेरी बेटी! तू आँगन में आई, पर मैं किसी से कह न सकी कि मेरा बच्चा आया है। तुझे आँगन में अजनबी की तरह खड़ा रहने दिया। बैठा न सकी। पानी तक के लिए पूछ न सकी तुझे। यही तो मेरा भाग्य है।” यह कहकर वह अपनी आँखों से निकलते हुए आँसुओं को पोंछने लगी।

”अच्छा-अच्छा! अब रोय मत। अभी थोड़ा देर हमरे साथ बोल-बतिया ले। रो नहीं। हमैं अच्छी तो हूँ। देखिए रही है।” सुंदरी अपनी माँ को मंदिर के ओसारे में बैठाते हुए बोली। उसे बैठाने के बाद उसके बगल में बैठ गई। रेनु भी वहीं बैठी हुई थी। थोड़ी दूर पर कुसुम थी। शायद यह दूरी उसने स्वयं बना ली थी कि उनकी आपसी बातों में उसके कारण कोई खलल न पहुँचे। सब खुलकर अपना दुख-सुख कह-सुन सकें। ”अच्छा, तू अपनै बारे में बता। तू एतना दुब्बर काहे होए गई है? हड्डी-हड्डी तो निकल आई है।” सुंदरी बोली।

”मुझे छोड़ दे। अब क्या करना है मुझे? उठ जाऊँ संसार से, अब तो यही चाहती हूँ। जीकर क्या करना है? अब सारी पिछली बातें याद आने लगी है।” वृद्धा बोली।

”क्या?”

”तुम्हें इतना रूप दिया भगवान ने, पर उसका माथा खराब हो गया था कि तुझे ऐसा बना दिया। फिर भी, जैसी भी थी रहती मेरे आँगन में। पर सब उठा ले गए मुझसे छल करके। मैं सो रही थी। हमेशा इसी डर से दरवाजा बंद करके सोती थी। उस दिन तुझे लेकर सोई तो आँख लग गई। किवाड़ खुले हुए थे। तभी सब उठा ले गए दे दिया तुम्हें खोजवा को अहँ… हँ… हँ…।” कहकर वह अपनी छाती पीटने लगी थी।

सुंदरी ने कहा, ”माई! भूल जा उ सब बात। जो हमरे किस्मत में था, सोई हुआ। किस्मत का लिखा ना मिटत है, माई। तू काहे रोती अउर छाती पीटती है? एमे तोहार दोस ना है।”

वृद्धा ने उसकी ठुड्डी पकड़ ली और कहा, ”अब तो जाने कब मिलना होगा। मैं रहूँ… न रहूँ।”

”नहीं-नहीं, ई सब मत बोल। हम फिर आएँगे भेंट करने।”

सुंदरी अपने झोले में से मिठाई का डब्बा निकाल लाई। माँ को देते हुए बोली, ”लो माई, बड़का दोकान से खरीदा है। खाना।”

बहन की ओर देखते हुए बोली, ”तुझे अब देख रही हूँ जब तुम्हारे बेटा का बियाह होय गया। चलो, देखकर संतोष तो हुआ। माई को देखना। गोपी तो है ही। पर तू भी देखना। हम तो रमता जोगी। संसार के माया-मोह से तो अभिए छूटि गए हैं… गोपी कइसा है? दिखाई नए दिया।”

”ठीक है। वह शहर गया है। सवेरे ही निकल गया।” रेनु बोली।

और ”राजू?”

‘वह भी साथ में गया है।”

”हमरा भागे खराब है। उसकी दुलहिन को तो देखे, बाकिर उसको नए देख सके। अब पता नहीं कब देख भी पाएँगे, कि नाहीं।” सुंदरी कुछ उदास होती हुई बोली।

”नहीं दिदिया, ऐसे क्यों कहती हो? देखोगी क्यों नहीं?”

”हाँ सायद कहीं देख पाए! पर कोय उम्मेद नाहीं।”

मंदिर के ओसारे पर ये तीन औरतें पास-पास बैठी रहीं। बातें जितनी हुर्इं, उससे अधिक स्नेह-भरी दृष्टि का लेन-देन हुआ। जितना कुछ कहा गया, उससे अधिक अनकहे को सुना और महसूसा गया। झिर-झिर हवा चल रही थी और एक अजीब शांति से नहाया हुआ था सब कुछ मंदिर, प्रांगण, बरगद, कनेर का पेड़, कुआँ और सामने कुछ दूर तक फैला हुआ मैदान।

अचानक सुंदरी उठी। अपना आँचल सँभालते हुए बोली, ”अच्छा माई! अब साँझ होय रही है। हमें बस पकड़ना है। तुझे भी घर जाना है। तू भी चलते-चलते थक जाएगी। धीरे-धीरे जाना। फिर मिलेंगे। कोनो बात का चिंता मत करना।”

उसकी माँ भी उठी। स्नेहकातर होकर अपने कमजोर हाथों से सुंदरी का गाल छूती हुई उसकी ठुड्डी पकड़कर उसे कई पलों तक देखती रही। कुछ बोल न सकी। सुंदरी ने माँ को पकड़ लिया और उसके गाल से अपना सटा लिया। माँ के गाल की गोरी कोमल त्वचा बुढ़ा के और भी कोमल लग रही थी सटने पर। सीने से चिपकी उसकी सूती साड़ी का मुलायम एहसास वह अपने कलेजे में सँजोती रही। अलग हुई तो देखा माँ रो रही थी। सुंदरी ने उसकी बुढ़ाई झुर्रीदार पलकों को उँगलियों से पोंछ दिया।

सुंदरी की माँ डगमगाते कदमों से सीढ़ियाँ उतरने लगी। उसके पैरों की डगमगाहट बुढ़ापे की कम और भावविह्वलता अधिक थी। रेनु ने उसे सँभाल रखा था। वह उसे पकड़कर ले जा रही थी। जब वे दोनों कुछ दूर निकल गई तो सुंदरी और कुसुम भी चल दीं अपनी राह पर।

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा

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Maa Thi Vo - Abhinav Kumar Tripathi

माँ, माँ थी वह

Maa Thi Vo - Abhinav Kumar Tripathi

तक़रीबन दो-ढाई साल पहले मैं अपने आप में बहुत व्यस्त रहा करता था। मुझे मार्केटिंग लाइन में नौकरी मिली थी। मैं सुबह 9 बजे के आस पास घर से निकल जाता था और शाम में कब वापस आता इसकी किसी को कोई ख़बर नही रहती थी। हालाकि मुझे मार्केटिंग लाइन में पैसे अच्छे मिलते थे इसलिए मैं इस नौकरी को छोड़ना भी नही चाहता था। मुझे पता था कि मैं अपने परिवार के साथ समय नही बिता पाता।

मेरा परिवार बहुत छोटा था। मैं, पत्नी और हम दोनों के प्यार की निशानी एक छोटी सी नन्ही सी बच्ची। बच्ची अभी एक साल की नहीं हुई थी। मेरे घर से सुबह निकलने के बाद से शाम को वापस आने तक मेरी पत्नी उसकी देखभाल करती थी। मेरे आते है मेरी नन्ही सी गुड़िया मुझे देख के किलकारी लगाके हँसने लगती। उसकी किलकारी सुन के मेरी दिन भर की थकान गायब हो जाती। शाम को मैं घर पर आने के बाद उसको गोद में लेके घर के ऊपर की छत पर चला जाया करता था। शायद यही वजह थी कि मेरी नन्ही सी गुड़िया मुझे देखते ही किलकारी लगा कर उचकने लगती थी। जैसे कि उसको आभास था कि मैं उसको छत पर घुमाने जरूर ले जाऊंगा।

मैं अपनी पत्नी के साथ समय नहीं गुजार पाता इसकी चिंता मुझे होती थी पर मैं बेबस हो जाता था। उसके लिए मैं समय निकालने की कोशिश में था। मेरे गाँव के घर पर माँ और बाबू जी ही रहते थे। मां को चलने में तकलीफ़ होती थी। उनकी कमर और पैर की दवा लगभग हमेशा चला करती थी। बाबू जी महीने में एक-आध बार दो-चार घंटे के लिए आ जाया करते थे तो सबका दिल बहल जाता था। काफी समय, तक़रीबन एक साल बाद मुझे पांच दिन की लगातार छुट्टी मिलने वाली थी । हम लोगों ने बहुत सी प्लानिंग की। पर मैं अपनी प्लानिंग अपनी पत्नी के अनुसार बदल लेता था।  आखिर इतने दिनों के बाद उसके लिए कुछ समय जो निकाल पाया था।

मुझे पांच दिन की लगातार छुट्टी मिलने वाली है ये बात माँ और बाबू जी; किसी को नही पता थी। जब मैं घर पर बात करता तो माँ और बाबू जी एक साथ बैठे होते थे। मेरा फ़ोन स्पीकर पर कर देते थे। और दोनों लोग एक साथ बोला करते थे। तब कुछ पल के लिए ऐसा प्रतीत होता था कि मानो सब एक साथ में हो। छुट्टी मिलने के एक दिन पहले मैंने बहुत ख़ुशी से घर पर फ़ोन करके बोला कि बाबू जी मुझे पांच दिन की छुट्टी मिली है, यह सुनते ही माँ तुरन्त बोल उठी । बहुत अच्छा है बेटा , तुम बहू और बेटी को लेके घर घूम जाओ। दो साल होने को है तुमसे नही मिली। अब तो मेरी बच्ची के भी दो साल पूरे होने को है। मेरे चेहरे पर की ख़ुशी उतर चुकी थी।

मेरे कुछ बोलने से पहले ही जैसे माँ को आभास हो गया था कि मेरा कुछ और प्लान था। माँ ने तुरंत पूछा – कही जाना है क्या? मैंने धीरे से बोला, हां माँ नैनीताल जाने का सोच रहे थे। माँ ने जैसेे अपनी इच्छा तुरंत मार ली और बोली ठीक है बेटा जाओ घूम आओ।

अगले दिन मैं सुबह घर से निकला । शाम तक नैनीताल पहुँच गया। वहां पर पहुँच कर मैंने होटल का एक कमरा किराये पर लिया। और जैसे मैं कमरे में बैठा तुरंत माँ का फ़ोन आया, पहुँच गए बेटा, कमरा लिया रहने के लिए, कुछ खाया पिया? बहू और बच्ची को कुछ खिलाया?

मैंने कहा- हां माँ !

कमरा भी किराये पर ले लिया और सबको खिलाया पिलाया भी।  मेरी बेटी दो साल की होने वाली थी। बहुत चंचल थी। वह अपने बिस्तर से ही चिल्ला के बोली – दादी माँ , यहाँ मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। पता है आपको यहाँ पर हमारे कमरे की खिड़की से बहुत सुंदर पहाड़ दिखाई देता है। हम लोग जब सुबह हो जायेगी तब पहाड़ पर घूमने जायेंगे। और बहुत सारी सेल्फी लेंगे। उसकी बातें सुनके उसकी दादी माँ बहुत खुश हो रही थी। पर मुझे अंदर से प्रतीत हो रहा था कि माँ हम लोगों को देखना चाहती थी। मैं घूमने तो आया था पर माँ की बात टलने का मुझे थोड़ा सा अफ़सोस भी था।

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अगली दिन सुबह हम लोग मॉल रोड से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लवर्स पॉइंट पर गए। वहां पर बड़े-बड़े पत्थरों  के बीच में बहुत गहरी खाई थी जो की लोहे के जाल से घिरी हुई थी। वहाँ पर सामने बहुत ही अच्छा प्राकृतिक नजारा दिखाई दे रहा था। हवा बहुत ही ठंढी और मनोहारी चल रही थी। हम लोगों ने वहाँ पर जलपान किया । और बहुत ढेर सारी फोटो खींची।

उसके बाद वही से थोड़ी दूरी पर स्थित ऊपर पहाड़ की ऊँचाई पर टिफिन टॉप नाम की जगह है, जहाँ पर घोड़े-खच्चर की सहायता से पगडंडियों के रास्ते से जंगली परिवेश का मजा लेते हुए गये। ये ऊपर पहाड़ी पर स्थित एक खुला हरियाली का परिवेश है। जहाँ की सुंदरता वाकई में काबिल-ए-तारीफ़ है।

शाम होने वाली थी । वहां से हम लोग वापस अपने कमरे पर आ गए थे। कमरे पर आने के बाद हम लोग भोजन करके सो गए। सुबह हुई, हम लोग तैयार हुए और नाश्ता करने के बाद हम लोग खुरपाताल गए। यह नैनीताल क्षेत्र में स्थित झीलों और तालों में सबसे छोटा ताल हैं। ऊपर से देखने पर इसका आकार बैल के खुर जैसा दिखता हैं, इसलिए इसे खुरपा ताल के नाम से जाना जाता हैं।

यहाँ का रास्ता बहुत ही घुमावदार था।

मौसम बहुत अच्छा हो रहा था। हम लोग वहाँ से होकर दूसरी तरफ बढ़ रहे थे। तभी बहुत तेज बारिश होने लगी। मेरी कार की स्पीड बहुत ही कम थी। पूरे रास्ते पर धुंध-सा छाया था। तभी अचानक मुझे मेरे कार के सामने एक सफ़ेद साड़ी में उलझे बालो वाली युवती दिखाई पड़ी। वह बीच रास्ते में खड़ी होके हाथ हिला रही थी।

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उसके आस-पास कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था। उसको देख के हम लोग भयभीत हो गए थे। वो युवती मेरे कार के पास आई और कुछ बोली । मेरे कार का शीशा बंद था इसलिए आवाज़ बिलकुल नहीं सुनाई दी। पर मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह मदद मांग रही थी। मेरी पत्नी भी बहुत डरी हुई थी। वह दरवाजा खोलने से मना कर रही थी। पर युवती के बार-बार बोलने से मैंने बहुत ही डर से दरवाजा खोला। तब युवती ने मुझसे मदद मांगी। वह हाथ जोड़ कर बोली कि पास के खाई में मेरी कार गिर गई है, उसमें मेरी बच्ची है। उसको बचा लो। मैं कार से नीचे उतरा और उसके साथ उसके कार के पास गया तो मुझे दिखा कि कार में एक छोटी-सी बच्ची किसी मरी औरत के गोद में रो रही थी। और उसके बाद जो देखा मेरे रोम-रोम खड़े हो गए।

मैंने देखा कि आगे के चालक के सीट पर एक युवक मरा हुआ पड़ा था और उसके बगल वाली सीट पर एक युवती।जिसके गोद में वह नन्ही से बच्ची रो रही थी और वह औरत और कोई नहीं बल्कि वही थी जिसने उससे मदद मांगी थी।  मैं उस बच्ची को अपने कार के पास ले आया । तब पत्नी ने पूछा – कौन थी वह औरत?

तब मेरे मुंह से सिर्फ एक बात निकली। माँ, माँ थी वह। जो मरने के बाद भी अपने बच्ची की फ़िक्र कर रही थी।

अभिनव कुमार त्रिपाठी

आत्माराम – मुंशी प्रेमचंद

Aatma Ram - Munshi Premchand

1

वेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रात: से संध्या तक अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी। वह नित्य-प्रति एक बार प्रात:काल अपने तोते का पिंजड़ा लिए कोई भजन गाता हुआ तालाब की ओर जाता था। उस धँधले प्रकाश में उसका जर्जर शरीर, पोपला मुँह और झुकी हुई कमर देखकर किसी अपरिचित मनुष्य को उसके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था। ज्यों ही लोगों के कानों में आवाज आती—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,’ लोग समझ जाते कि भोर हो गयी। महादेव का पारिवारिक जीवन सूखमय न था। उसके तीन पुत्र थे, तीन बहुऍं थीं, दर्जनों नाती-पाते थे, लेकिन उसके बोझ को हल्का करने-वाला कोई न था। लड़के कहते—‘तब तक दादा जीते हैं, हम जीवन का आनंद भोग ले, फिर तो यह ढोल गले पड़ेगी ही।’ बेचारे महादेव को कभी-कभी निराहार ही रहना पड़ता। भोजन के समय उसके घर में साम्यवाद का ऐसा गगनभेदी निर्घोष होता कि वह भूखा ही उठ आता, और नारियल का हुक्का पीता हुआ सो जाता। उनका व्यापसायिक जीवन और भी आशांतिकारक था। यद्यपि वह अपने काम में निपुण था, उसकी खटाई औरों से कहीं ज्यादा शुद्धिकारक और उसकी रासयनिक क्रियाऍं कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं, तथापि उसे आये दिन शक्की और धैर्य-शून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़ते थे, पर महादेव अविचिलित गाम्भीर्य से सिर झुकाये सब कुछ सुना करता था। ज्यों ही यह कलह शांत होता, वह अपने तोते की ओर देखकर पुकार उठता—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्तदाता।’ इस मंत्र को जपते ही उसके चित्त को पूर्ण शांति प्राप्त हो जाती थी।

2

एक दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिंजड़े का द्वार खोल दिया। तोता उड़ गया। महादेव ने सिह उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा, तो उसका कलेजा सन्न-से हो गया। तोता कहॉँ गया। उसने फिर पिंजड़े को देखा, तोता गायब था। महादेव घबड़ा कर उठा और इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा। उसे संसार में कोई वस्तु अगर प्यारी थी, तो वह यही तोता। लड़के-बालों, नाती-पोतों से उसका जी भर गया था। लड़को की चुलबुल से उसके काम में विघ्न पड़ता था। बेटों से उसे प्रेम न था; इसलिए नहीं कि वे निकम्मे थे; बल्कि इसलिए कि उनके कारण वह अपने आनंददायी कुल्हड़ों की नियमित संख्या से वंचित रह जाता था। पड़ोसियों से उसे चिढ़ थी, इसलिए कि वे अँगीठी से आग निकाल ले जाते थे। इन समस्त विघ्न-बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी, तो यही तोता था। इससे उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था। वह अब उस अवस्था में था जब मनुष्य को शांति भोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती।

तोता एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने पिंजरा उतार लिया और उसे दिखाकर कहने लगा—‘आ आ’ सत्त गुरुदत्त शिवदाता।’ लेकिन गॉँव और घर के लड़के एकत्र हो कर चिल्लाने और तालियॉँ बजाने लगे। ऊपर से कौओं ने कॉँव-कॉँव की रट लगायी? तोता उड़ा और गॉँव से बाहर निकल कर एक पेड़ पर जा बैठा। महादेव खाली पिंजडा लिये उसके पीछे दौड़ा, सो दौड़ा। लोगो को उसकी द्रुतिगामिता पर अचम्भा हो रहा था। मोह की इससे सुन्दर, इससे सजीव, इससे भावमय कल्पना नहीं की जा सकती।

दोपहर हो गयी थी। किसान लोग खेतों से चले आ रहे थे। उन्हें विनोद का अच्छा अवसर मिला। महादेव को चिढ़ाने में सभी को मजा आता था। किसी ने कंकड़ फेंके, किसी ने तालियॉँ बजायीं। तोता फिर उड़ा और वहाँ से दूर आम के बाग में एक पेड़ की फुनगी पर जा बैठा । महादेव फिर खाली पिंजड़ा लिये मेंढक की भॉँति उचकता चला। बाग में पहुँचा तो पैर के तलुओं से आग निकल रही थी, सिर चक्कर खा रहा था। जब जरा सावधान हुआ, तो फिर पिंजड़ा उठा कर कहने लगे—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ तोता फुनगी से उतर कर नीचे की एक डाल पी आ बैठा, किन्तु महादेव की ओर सशंक नेत्रों से ताक रहा था। महादेव ने समझा, डर रहा है। वह पिंजड़े को छोड़ कर आप एक दूसरे पेड़ की आड़ में छिप गया। तोते ने चारों ओर गौर से देखा, निश्शंक हो गया, अतरा और आ कर पिंजड़े के ऊपर बैठ गया। महादेव का हृदय उछलने लगा। ‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ का मंत्र जपता हुआ धीरे-धीरे तोते के समीप आया और लपका कि तोते को पकड़ लें, किन्तु तोता हाथ न आया, फिर पेड़ पर आ बैठा।

शाम तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता, कभी उस डाल पर। कभी पिंजड़े पर आ बैठता, कभी पिंजड़े के द्वार पर बैठे अपने दाना-पानी की प्यालियों को देखता, और फिर उड़ जाता। बुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था, तो तोता मूर्तिमयी माया। यहॉँ तक कि शाम हो गयी। माया और मोह का यह संग्राम अंधकार में विलीन हो गया।

3

रात हो गयी ! चारों ओर निबिड़ अंधकार छा गया। तोता न जाने पत्तों में कहॉँ छिपा बैठा था। महादेव जानता था कि रात को तोता कही उड़कर नहीं जा सकता, और न पिंजड़े ही में आ सकता हैं, फिर भी वह उस जगह से हिलने का नाम न लेता था। आज उसने दिन भर कुछ नहीं खाया। रात के भोजन का समय भी निकल गया, पानी की बूँद भी उसके कंठ में न गयी, लेकिन उसे न भूख थी, न प्यास ! तोते के बिना उसे अपना जीवन निस्सार, शुष्क और सूना जान पड़ता था। वह दिन-रात काम करता था; इसलिए कि यह उसकी अंत:प्रेरणा थी; जीवन के और काम इसलिए करता था कि आदत थी। इन कामों मे उसे अपनी सजीवता का लेश-मात्र भी ज्ञान न होता था। तोता ही वह वस्तु था, जो उसे चेतना की याद दिलाता था। उसका हाथ से जाना जीव का देह-त्याग करना था।

महादेव दिन-भर का भूख-प्यासा, थका-मॉँदा, रह-रह कर झपकियॉँ ले लेता था; किन्तु एक क्षण में फिर चौंक कर ऑंखे खोल देता और उस विस्तृत अंधकार में उसकी आवाज सुनायी देती—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।’

आधी रात गुजर गयी थी। सहसा वह कोई आहट पा कर चौका। देखा, एक दूसरे वृक्ष के नीचे एक धुँधला दीपक जल रहा है, और कई आदमी बैंठे हुए आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। वे सब चिलम पी रहे थे। तमाखू की महक ने उसे अधीर कर दिया। उच्च स्वर से बोला—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ और उन आदमियों की ओर चिलम पीने चला गया; किन्तु जिस प्रकार बंदूक की आवाज सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसी प्रकार उसे आते देख सब-के-सब उठ कर भागे। कोई इधर गया, कोई उधर। महादेव चिल्लाने लगा—‘ठहरो-ठहरो !’ एकाएक उसे ध्यान आ गया, ये सब चोर हैं। वह जारे से चिल्ला उठा—‘चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो !’ चोरों ने पीछे फिर कर न देखा।

महादेव दीपक के पास गया, तो उसे एक मलसा रखा हुआ मिला जो मोर्चे से काला हो रहा था। महादेव का हृदय उछलने लगा। उसने कलसे मे हाथ डाला, तो मोहरें थीं। उसने एक मोहरे बाहर निकाली और दीपक के उजाले में देखा। हॉँ मोहर थी। उसने तुरंत कलसा उठा लिया, और दीपक बुझा दिया और पेड़ के नीचे छिप कर बैठ रहा। साह से चोर बन गया।

उसे फिर शंका हुई, ऐसा न हो, चोर लौट आवें, और मुझे अकेला देख कर मोहरें छीन लें। उसने कुछ मोहर कमर में बॉँधी, फिर एक सूखी लकड़ी से जमीन की की मिटटी हटा कर कई गड्ढे बनाये, उन्हें माहरों से भर कर मिटटी से ढँक दिया।

4

महादेव के अतर्नेत्रों के सामने अब एक दूसरा जगत् था, चिंताओं और कल्पना से परिपूर्ण। यद्यपि अभी कोष के हाथ से निकल जाने का भय था; पर अभिलाषाओं ने अपना काम शुरु कर दिया। एक पक्का मकान बन गया, सराफे की एक भारी दूकान खुल गयी, निज सम्बन्धियों से फिर नाता जुड़ गया, विलास की सामग्रियॉँ एकत्रित हो गयीं। तब तीर्थ-यात्रा करने चले, और वहॉँ से लौट कर बड़े समारोह से यज्ञ, ब्रह्मभोज हुआ। इसके पश्चात एक शिवालय और कुऑं बन गया, एक बाग भी लग गया और वह नित्यप्रति कथा-पुराण सुनने लगा। साधु-सन्तों का आदर-सत्कार होने लगा।

अकस्मात उसे ध्यान आया, कहीं चोर आ जायँ , तो मैं भागूँगा क्यों-कर? उसने परीक्षा करने के लिए कलसा उठाया। और दो सौ पग तक बेतहाशा भागा हुआ चला गया। जान पड़ता था, उसके पैरो में पर लग गये हैं। चिंता शांत हो गयी। इन्हीं कल्पनाओं में रात व्यतीत हो गयी। उषा का आगमन हुआ, हवा जागी, चिड़ियॉँ गाने लगीं। सहसा महादेव के कानों में आवाज आयी—

‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,

राम के चरण में चित्त लगा।’

यह बोल सदैव महादेव की जिह्वा पर रहता था। दिन में सहस्रों ही बार ये शब्द उसके मुँह से निकलते थे, पर उनका धार्मिक भाव कभी भी उसके अन्त:कारण को स्पर्श न करता था। जैसे किसी बाजे से राग निकलता हैं, उसी प्रकार उसके मुँह से यह बोल निकलता था। निरर्थक और प्रभाव-शून्य। तब उसका हृदय-रुपी वृक्ष पत्र-पल्लव विहीन था। यह निर्मल वायु उसे गुंजरित न कर सकती थी; पर अब उस वृक्ष में कोपलें और शाखाऍं निकल आयी थीं। इन वायु-प्रवाह से झूम उठा, गुंजित हो गया।

अरुणोदय का समय था। प्रकृति एक अनुरागमय प्रकाश में डूबी हुई थी। उसी समय तोता पैरों को जोड़े हुए ऊँची डाल से उतरा, जैसे आकाश से कोई तारा टूटे और आ कर पिंजड़े में बैठ गया। महादेव प्रफुल्लित हो कर दौड़ा और पिंजड़े को उठा कर बोला—आओ आत्माराम तुमने कष्ट तो बहुत दिया, पर मेरा जीवन भी सफल कर दिया। अब तुम्हें चॉँदी के पिंजड़े में रखूंगा और सोने से मढ़ दूँगा।’ उसके रोम-रोम के परमात्मा के गुणानुवाद की ध्वनि निकलने लगी। प्रभु तुम कितने दयावान् हो ! यह तुम्हारा असीम वात्सल्य है, नहीं तो मुझ पापी, पतित प्राणी कब इस कृपा के योग्य था ! इस पवित्र भावों से आत्मा विन्हल हो गयी ! वह अनुरक्त हो कर कह उठा—

‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,

राम के चरण में चित्त लागा।’

उसने एक हाथ में पिंजड़ा लटकाया, बगल में कलसा दबाया और घर चला।

5

महादेव घर पहुँचा, तो अभी कुछ अँधेरा था। रास्ते में एक कुत्ते के सिवा और किसी से भेंट न हुई, और कुत्ते को मोहरों से विशेष प्रेम नहीं होता। उसने कलसे को एक नाद में छिपा दिया, और कोयले से अच्छी तरह ढँक कर अपनी कोठरी में रख आया। जब दिन निकल आया तो वह सीधे पुराहित के घर पहुँचा। पुरोहित पूजा पर बैठे सोच रहे थे—कल ही मुकदमें की पेशी हैं और अभी तक हाथ में कौड़ी भी नहीं—यजमानो में कोई सॉँस भी लेता। इतने में महादेव ने पालागन की। पंड़ित जी ने मुँह फेर लिया। यह अमंगलमूर्ति कहॉँ से आ पहुँची, मालमू नहीं, दाना भी मयस्सर होगा या नहीं। रुष्ट हो कर पूछा—क्या है जी, क्या कहते हो। जानते नहीं, हम इस समय पूजा पर रहते हैं। महादेव ने कहा—महाराज, आज मेरे यहॉँ सत्यनाराण की कथा है।

पुरोहित जी विस्मित हो गये। कानों पर विश्वास न हुआ। महादेव के घर कथा का होना उतनी ही असाधारण घटना थी, जितनी अपने घर से किसी भिखारी के लिए भीख निकालना। पूछा—आज क्या है?

महादेव बोला—कुछ नहीं, ऐसा इच्छा हुई कि आज भगवान की कथा सुन लूँ।

प्रभात ही से तैयारी होने लगी। वेदों के निकटवर्ती गॉँवो में सूपारी फिरी। कथा के उपरांत भोज का भी नेवता था। जो सुनता आश्चर्य करता आज रेत में दूब कैसे जमी।

संध्या समय जब सब लोग जमा हो, और पंडित जी अपने सिंहासन पर विराजमान हुए, तो महादेव खड़ा होकर उच्च स्वर में बोला—भाइयों मेरी सारी उम्र छल-कपट में कट गयी। मैंने न जाने कितने आदमियों को दगा दी, कितने खरे को खोटा किया; पर अब भगवान ने मुझ पर दया की है, वह मेरे मुँह की कालिख को मिटाना चाहते हैं। मैं आप सब भाइयों से ललकार कर कहता हूँ कि जिसका मेरे जिम्मे जो कुछ निकलता हो, जिसकी जमा मैंने मार ली हो, जिसके चोखे माल का खोटा कर दिया हो, वह आकर अपनी एक-एक कौड़ी चुका ले, अगर कोई यहॉँ न आ सका हो, तो आप लोग उससे जाकर कह दीजिए, कल से एक महीने तक, जब जी चाहे, आये और अपना हिसाब चुकता कर ले। गवाही-साखी का काम नहीं।

सब लोग सन्नाटे में आ गये। कोई मार्मिक भाव से सिर हिला कर बोला—हम कहते न थे। किसी ने अविश्वास से कहा—क्या खा कर भरेगा, हजारों को टोटल हो जायगा।

एक ठाकुर ने ठठोली की—और जो लोग सुरधाम चले गये।

महादेव ने उत्तर दिया—उसके घर वाले तो होंगे।

किन्तु इस समय लोगों को वसूली की इतनी इच्छा न थी, जितनी यह जानने की कि इसे इतना धन मिल कहॉँ से गया। किसी को महादेव के पास आने का साहस न हुआ। देहात के आदमी थे, गड़े मुर्दे उखाड़ना क्या जानें। फिर प्राय: लोगों को याद भी न था कि उन्हें महादेव से क्या पाना हैं, और ऐसे पवित्र अवसर पर भूल-चूक हो जाने का भय उनका मुँह बन्द किये हुए था। सबसे बड़ी बात यह थी कि महादेव की साधुता ने उन्हीं वशीभूत कर लिया था। अचानक पुरोहित जी बोले—तुम्हें याद हैं, मैंने एक कंठा बनाने के लिए सोना दिया था, तुमने कई माशे तौल में उड़ा दिये थे।

महादेव—हॉँ, याद हैं, आपका कितना नुकसान हुआ होग।

पुरोहित—पचास रुपये से कम न होगा।

महादेव ने कमर से दो मोहरें निकालीं और पुरोहित जी के सामने रख दीं।

पुरोहितजी की लोलुपता पर टीकाऍं होने लगीं। यह बेईमानी हैं, बहुत हो, तो दो-चार रुपये का नुकसान हुआ होगा। बेचारे से पचास रुपये ऐंठ लिए। नारायण का भी डर नहीं। बनने को पंड़ित, पर नियत ऐसी खराब राम-राम ! लोगों को महादेव पर एक श्रद्धा-सी हो गई। एक घंटा बीत गया पर उन सहस्रों मनुष्यों में से एक भी खड़ा न हुआ। तब महादेव ने फिर कहॉँ—मालूम होता है, आप लोग अपना-अपना हिसाब भूल गये हैं, इसलिए आज कथा होने दीजिए। मैं एक महीने तक आपकी राह देखूँगा। इसके पीछे तीर्थ यात्रा करने चला जाऊँगा। आप सब भाइयों से मेरी विनती है कि आप मेरा उद्धार करें।

एक महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा। रात को चोंरो के भय से नींद न आती। अब वह कोई काम न करता। शराब का चसका भी छूटा। साधु-अभ्यागत जो द्वार पर आ जाते, उनका यथायोग्य सत्कार करता। दूर-दूर उसका सुयश फैल गया। यहॉँ तक कि महीना पूरा हो गया और एक आदमी भी हिसाब लेने न आया। अब महादेव को ज्ञान हुआ कि संसार में कितना धर्म, कितना सद्व्यवहार हैं। अब उसे मालूम हुआ कि संसार बुरों के लिए बुरा हैं और अच्छे के लिए अच्छा।

6

इस घटना को हुए पचास वर्ष बीत चुके हैं। आप वेदों जाइये, तो दूर ही से एक सुनहला कलस दिखायी देता है। वह ठाकुरद्वारे का कलस है। उससे मिला हुआ एक पक्का तालाब हैं, जिसमें खूब कमल खिले रहते हैं। उसकी मछलियॉँ कोई नहीं पकड़ता; तालाब के किनारे एक विशाल समाधि है। यही आत्माराम का स्मृति-चिन्ह है, उसके सम्बन्ध में विभिन्न किंवदंतियॉँ प्रचलित है। कोई कहता हैं, वह रत्नजटित पिंजड़ा स्वर्ग को चला गया, कोई कहता, वह ‘सत्त गुरुदत्त’ कहता हुआ अंतर्ध्यान हो गया, पर यर्थाथ यह हैं कि उस पक्षी-रुपी चंद्र को किसी बिल्ली-रुपी राहु ने ग्रस लिया। लोग कहते हैं, आधी रात को अभी तक तालाब के किनारे आवाज आती है—

‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,

राम के चरण में चित्त लागा।’

महादेव के विषय में भी कितनी ही जन-श्रुतियॉँ है। उनमें सबसे मान्य यह है कि आत्माराम के समाधिस्थ होने के बाद वह कई संन्यासियों के साथ हिमालय चला गया, और वहॉँ से लौट कर न आया। उसका नाम आत्माराम प्रसिद्ध हो गया।

आत्म-संगीत – मुंशी प्रेमचंद

Atma Sangeet-Munshi Premchand

1
आधी रात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिबिम्ब लहरों के साथ चंचल। एक स्वर्गीय संगीत की मनोहर और जीवनदायिनी, प्राण-पोषिणी घ्वनियॉँ इस निस्तब्ध और तमोमय दृश्य पर इस प्रकाश छा रही थी, जैसे हृदय पर आशाऍं छायी रहती हैं, या मुखमंडल पर शोक।

रानी मनोरमा ने आज गुरु-दीक्षा ली थी। दिन-भर दान और व्रत में व्यस्त रहने के बाद मीठी नींद की गोद में सो रही थी। अकस्मात् उसकी ऑंखें खुलीं और ये मनोहर ध्वनियॉँ कानों में पहुँची। वह व्याकुल हो गयी—जैसे दीपक को देखकर पतंग; वह अधीर हो उठी, जैसे खॉँड़ की गंध पाकर चींटी। वह उठी और द्वारपालों एवं चौकीदारों की दृष्टियॉँ बचाती हुई राजमहल से बाहर निकल आयी—जैसे वेदनापूर्ण क्रन्दन सुनकर ऑंखों से ऑंसू निकल जाते हैं।

सरिता-तट पर कँटीली झाड़िया थीं। ऊँचे कगारे थे। भयानक जंतु थे। और उनकी डरावनी आवाजें! शव थे और उनसे भी अधिक भयंकर उनकी कल्पना। मनोरमा कोमलता और सुकुमारता की मूर्ति थी। परंतु उस मधुर संगीत का आकर्षण उसे तन्मयता की अवस्था में खींचे लिया जाता था। उसे आपदाओं का ध्यान न था।

वह घंटों चलती रही, यहॉँ तक कि मार्ग में नदी ने उसका गतिरोध किया।

2

मनोरमा ने विवश होकर इधर-उधर दृष्टि दौड़ायी। किनारे पर एक नौका दिखाई दी। निकट जाकर बोली—मॉँझी, मैं उस पार जाऊँगी, इस मनोहर राग ने मुझे व्याकुल कर दिया है।

मॉँझी—रात को नाव नहीं खोल सकता। हवा तेज है और लहरें डरावनी। जान-जोखिम हैं

मनोरमा—मैं रानी मनोरमा हूँ। नाव खोल दे, मुँहमॉँगी मजदूरी दूँगी।

मॉँझी—तब तो नाव किसी तरह नहीं खोल सकता। रानियों का इस में निबाह नहीं।

मनोरमा—चौधरी, तेरे पॉँव पड़ती हूँ। शीघ्र नाव खोल दे। मेरे प्राण खिंचे चले जाते हैं।

मॉँझी—क्या इनाम मिलेगा?

मनोरमा—जो तू मॉँगे।

‘मॉँझी—आप ही कह दें, गँवार क्या जानूँ, कि रानियों से क्या चीज मॉँगनी चाहिए। कहीं कोई ऐसी चीज न मॉँग बैठूँ, जो आपकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध हो?

मनोरमा—मेरा यह हार अत्यन्त मूल्यवान है। मैं इसे खेवे में देती हूँ। मनोरमा ने गले से हार निकाला, उसकी चमक से मॉझी का मुख-मंडल प्रकाशित हो गया—वह कठोर, और काला मुख, जिस पर झुर्रियॉँ पड़ी थी।

अचानक मनोरमा को ऐसा प्रतीत हुआ, मानों संगीत की ध्वनि और निकट हो गयी हो। कदाचित कोई पूर्ण ज्ञानी पुरुष आत्मानंद के आवेश में उस सरिता-तट पर बैठा हुआ उस निस्तब्ध निशा को संगीत-पूर्ण कर रहा है। रानी का हृदय उछलने लगा। आह ! कितना मनोमुग्धकर राग था ! उसने अधीर होकर कहा—मॉँझी, अब देर न कर, नाव खोल, मैं एक क्षण भी धीरज नहीं रख सकती।

मॉँझी—इस हार हो लेकर मैं क्या करुँगा?

मनोरमा—सच्चे मोती हैं।

मॉँझी—यह और भी विपत्ति हैं मॉँझिन गले में पहन कर पड़ोसियों को दिखायेगी, वह सब डाह से जलेंगी, उसे गालियॉँ देंगी। कोई चोर देखेगा, तो उसकी छाती पर सॉँप लोटने लगेगा। मेरी सुनसान झोपड़ी पर दिन-दहाड़े डाका पड़ जायगा। लोग चोरी का अपराध लगायेंगे। नहीं, मुझे यह हार न चाहिए।

मनोरमा—तो जो कुछ तू मॉँग, वही दूँगी। लेकिन देर न कर। मुझे अब धैर्य नहीं है। प्रतीक्षा करने की तनिक भी शक्ति नहीं हैं। इन राग की एक-एक तान मेरी आत्मा को तड़पा देती है।

मॉँझी—इससे भी अच्दी कोई चीज दीजिए।

मनोरमा—अरे निर्दयी! तू मुझे बातों में लगाये रखना चाहता हैं मैं जो देती है, वह लेता नहीं, स्वयं कुछ मॉँगता नही। तुझे क्या मालूम मेरे हृदय की इस समय क्या दशा हो रही है। मैं इस आत्मिक पदार्थ पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सकती हूँ।

मॉँझी—और क्या दीजिएगा?

मनोरमा—मेरे पास इससे बहुमूल्य और कोई वस्तु नहीं है, लेकिन तू अभी नाव खोल दे, तो प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुझे अपना महल दे दूँगी, जिसे देखने के लिए कदाचित तू भी कभी गया हो। विशुद्ध श्वेत पत्थर से बना है, भारत में इसकी तुलना नहीं।

मॉँझी—(हँस कर) उस महल में रह कर मुझे क्या आनन्द मिलेगा? उलटे मेरे भाई-बंधु शत्रु हो जायँगे। इस नौका पर अँधेरी रात में भी मुझे भय न लगता। ऑंधी चलती रहती है, और मैं इस पर पड़ा रहता हूँ। किंतु वह महल तो दिन ही में फाड़ खायगा। मेरे घर के आदमी तो उसके एक कोने में समा जायँगे। और आदमी कहॉँ से लाऊँगा; मेरे नौकर-चाकर कहॉँ? इतना माल-असबाब कहॉँ? उसकी सफाई और मरम्मत कहॉँ से कराऊँगा? उसकी फुलवारियॉँ सूख जायँगी, उसकी क्यारियों में गीदड़ बोलेंगे और अटारियों पर कबूतर और अबाबीलें घोंसले बनायेंगी।

मनोरमा अचानक एक तन्मय अवस्था में उछल पड़ी। उसे प्रतीत हुआ कि संगीत निकटतर आ गया है। उसकी सुन्दरता और आनन्द अधिक प्रखर हो गया था—जैसे बत्ती उकसा देने से दीपक अधिक प्रकाशवान हो जाता है। पहले चित्ताकर्षक था, तो अब आवेशजनक हो गया था। मनोरमा ने व्याकुल होकर कहा—आह! तू फिर अपने मुँह से क्यों कुछ नहीं मॉँगता? आह! कितना विरागजनक राग है, कितना विह्रवल करने वाला! मैं अब तनिक धीरज नहीं धर सकती। पानी उतार में जाने के लिए जितना व्याकुल होता है, श्वास हवा के लिए जितनी विकल होती है, गंध उड़ जाने के लिए जितनी व्याकुल होती है, मैं उस स्वर्गीय संगीत के लिए उतनी व्याकुल हूँ। उस संगीत में कोयल की-सी मस्ती है, पपीहे की-सी वेदना है, श्यामा की-सी विह्वलता है, इससे झरनों का-सा जोर है, ऑंधी का-सा बल! इसमें वह सब कुछ है, इससे विवेकाग्नि प्रज्ज्वलित होती, जिससे आत्मा समाहित होती है, और अंत:करण पवित्र होता है। मॉँझी, अब एक क्षण का भी विलम्ब मेरे लिए मृत्यु की यंत्रणा है। शीघ्र नौका खोल। जिस सुमन की यह सुगंध है, जिस दीपक की यह दीप्ति है, उस तक मुझे पहुँचा दे। मैं देख नहीं सकती इस संगीत का रचयिता कहीं निकट ही बैठा हुआ है, बहुत निकट।

मॉँझी—आपका महल मेरे काम का नहीं है, मेरी झोपड़ी उससे कहीं सुहावनी है।

मनोरमा—हाय! तो अब तुझे क्या दूँ? यह संगीत नहीं है, यह इस सुविशाल क्षेत्र की पवित्रता है, यह समस्त सुमन-समूह का सौरभ है, समस्त मधुरताओं की माधुरताओं की माधुरी है, समस्त अवस्थाओं का सार है। नौका खोल। मैं जब तक जीऊँगी, तेरी सेवा करुँगी, तेरे लिए पानी भरुँगी, तेरी झोपड़ी बहारुँगी। हॉँ, मैं तेरे मार्ग के कंकड़ चुनूँगी, तेरे झोंपड़े को फूलों से सजाऊँगी, तेरी मॉँझिन के पैर मलूँगी। प्यारे मॉँझी, यदि मेरे पास सौ जानें होती, तो मैं इस संगीत के लिए अर्पण करती। ईश्वर के लिए मुझे निराश न कर। मेरे धैर्य का अन्तिम बिंदु शुष्क हो गया। अब इस चाह में दाह है, अब यह सिर तेरे चरणों में है।

यह कहते-कहते मनोरमा एक विक्षिप्त की अवस्था में मॉँझी के निकट जाकर उसके पैरों पर गिर पड़ी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ, मानों वह संगीत आत्मा पर किसी प्रज्ज्वलित प्रदीप की तरह ज्योति बरसाता हुआ मेरी ओर आ रहा है। उसे रोमांच हो आया। वह मस्त होकर झूमने लगी। ऐसा ज्ञात हुआ कि मैं हवा में उड़ी जाती हूँ। उसे अपने पार्श्व-देश में तारे झिलमिलाते हुए दिखायी देते थे। उस पर एक आमविस्मृत का भावावेश छा गया और अब वही मस्ताना संगीत, वही मनोहर राग उसके मुँह से निकलने लगा। वही अमृत की बूँदें, उसके अधरों से टपकने लगीं। वह स्वयं इस संगीत की स्रोत थी। नदी के पास से आने वाली ध्वनियॉँ, प्राणपोषिणी ध्वनियॉँ उसी के मुँह से निकल रही थीं। मनोरमा का मुख-मंडल चन्द्रमा के तरह प्रकाशमान हो गया था, और ऑंखों से प्रेम की किरणें निकल रही थीं।

आख़िरी मंज़िल – मुंशी प्रेमचंद

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आह ? आज तीन साल गुजर गए, यही मकान है, यही बाग है, यही गंगा का किनारा, यही संगमरमर का हौज। यही मैं हूँ और यही दरोदीवार। मगर इन चीजों से दिल पर कोई असर नहीं होता। वह नशा जो गंगा की सुहानी और हवा के दिलकश झौंकों से दिल पर छा जाता था। उस नशे के लिए अब जी तरस-जरस के रह जाता है। अब वह दिल नही रहा। वह युवती जो जिंदगी का सहारा थी अब इस दुनिया में नहीं है।

मोहिनी ने बड़ा आकर्षक रूप पाया था। उसके सौंदर्य में एक आश्चर्यजनक बात थी। उसे प्यार करना मुश्किल था, वह पूजने के योग्य थी। उसके चेहरे पर हमेशा एक बड़ी लुभावनी आत्मिकता की दीप्ति रहती थी। उसकी आंखे जिनमें लाज और गंभीरता और पवित्रता का नशा था, प्रेम का स्रोत थी। उसकी एक-एक चितवन, एक-एक क्रिया; एक-एक बात उसके ह्रदय की पवित्रता और सच्चाई का असर दिल पर पैदा करती थी। जब वह अपनी शर्मीली आंखों से मेरी ओर ताकती तो उसका आकर्षण और असकी गर्मी मेरे दिल में एक ज्वारभाटा सा पैदा कर देती थी। उसकी आंखों से आत्मिक भावों की किरनें निकलती थीं मगर उसके होठों प्रेम की बानी से अपरिचित थे। उसने कभी इशारे से भी उस अथाह प्रेम को व्यक्त नहीं किया जिसकी लहरों में वह खुद तिनके की तरह बही जाती थी। उसके प्रेम की कोई सीमा न थी। वह प्रेम जिसका लक्ष्य मिलन है, प्रेम नहीं वासना है। मोहिनी का प्रेम वह प्रेम था जो मिलने में भी वियोग के मजे लेता है। मुझे खूब याद है एक बार जब उसी हौज के किनारे चॉँदनी रात में मेरी प्रेम – भरी बातों से विभोर होकर उसने कहा था-आह ! वह आवाज अभी मेरे ह्रदय पर अंकित है, ‘मिलन प्रेम का आदि है अंत नहीं।’ प्रेम की समस्या पर इससे ज्यादा शनदार, इससे ज्यादा ऊंचा ख्याल कभी मेरी नजर में नहीं गुजरा। वह प्रेम जो चितावनो से पैदा होता है और वियोग में भी हरा-भरा रहता है, वह वासना के एक झोंके को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। संभव है कि यह मेरी आत्मस्तुति हो मगर वह प्रेम, जो मेरी कमजोरियों के बावजूद मोहिनी को मुझसे था उसका एक कतरा भी मुझे बेसुध करने के लिए काफी था। मेरा हृदय इतना विशाल ही न था, मुझे आश्चर्य होता था कि मुझमें वह कौन-सा गुण था जिसने मोहिनी को मेरे प्रति प्रेम से विह्वल कर दिया था। सौन्दर्य, आचरण की पवित्रता, मर्दानगी का जौहर यही वह गुण हैं जिन पर मुहब्बत निछावर होती है। मगर मैं इनमें से एक पर भी गर्व नहीं कर सकता था। शायद मेरी कमजोरियॉँ ही उस प्रेम की तड़प का कारण थीं।

मोहिनी में वह अदायें न थीं जिन पर रंगीली तबीयतें फिदा हो जाया करती हैं। तिरछी चितवन, रूप-गर्व की मस्ती भरी हुई आंखें, दिल को मोह लेने वाली मुस्कराहट, चंचल वाणी, उनमें से कोई चीज यहॉँ न थी! मगर जिस तरह चॉँद की मद्धिम सुहानी रोशनी में कभी-कभी फुहारें पड़ने लगती हैं, उसी तरह निश्छल प्रेम में उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट कौंध जाती और आंखें नम हो जातीं। यह अदा न थी, सच्चे भावों की तस्वीर थी जो मेरे हृदय में पवित्र प्रेम की खलबली पैदा कर देती थी।

शाम का वक्त था, दिन और रात गले मिल रहे थे। आसमान पर मतवाली घटायें छाई हुई थीं और मैं मोहिनी के साथ उसी हौज के किनारे बैठा हुआ था। ठण्डी-ठण्डी बयार और मस्त घटायें हृदय के किसी कोने में सोते हुए प्रेम के भाव को जगा दिया करती हैं। वह मतवालापन जो उस वक्त हमारे दिलों पर छाया हुआ था उस पर मैं हजारों होशमंदियों को कुर्बान कर सकता हूँ। ऐसा मालूम होता था कि उस मस्ती के आलम में हमारे दिल बेताब होकर आंखों से टपक पड़ेंगे। आज मोहिनी की जबान भी संयम की बेड़ियों से मुक्त हो गई थी और उसकी प्रेम में डूबी हुई बातों से मेरी आत्मा को जीवन मिल रहा था।

एकाएक मोहिनी ने चौंककर गंगा की तरफ देखा। हमारे दिलों की तरह उस वक्त गंगा भी उमड़ी हुई थी। पानी की उस उद्विग्न उठती-गिरती सतह पर एक दिया बहता हुआ चला जाता था और और उसका चमकता हुआ अक्स थिरकता और नाचता एक पुच्छल तारे की तरह पानी को आलोकित कर रहा था। आह! उस नन्ही-सी जान की क्या बिसात थी! कागज के चंद पुर्जे, बांस की चंद तीलियां, मिट्टी का एक दिया कि जैसे किसी की अतृप्त लालसाओं की समाधि थी जिस पर किसी दुख बँटानेवाले ने तरस खाकर एक दिया जला दिया था मगर वह नन्हीं-सी जान जिसके अस्तित्व का कोई ठिकाना न था, उस अथाह सागर में उछलती हुई लहरों से टकराती, भँवरों से हिलकोरें खाती, शोर करती हुई लहरों को रौंदती चली जाती थी। शायद जल देवियों ने उसकी निर्बलता पर तरस खाकर उसे अपने आंचलों में छुपा लिया था।

जब तक वह दिया झिलमिलाता और टिमटिमाता, हमदर्द लहरों से झकोरे लेता दिखाई दिया। मोहिनी टकटकी लगाये खोयी-सी उसकी तरफ ताकती रही। जब वह आंख से ओझल हो गया तो वह बेचैनी से उठ खड़ी हुई और बोली- मैं किनारे पर जाकर उस दिये को देखूँगी।

जिस तरह हलवाई की मनभावन पुकार सुनकर बच्चा घर से बाहर निकल पड़ता है और चाव-भरी आंखों से देखता और अधीर आवाजों से पुकारता उस नेमत के थाल की तरफ दौड़ता है, उसी जोश और चाव के साथ मोहिनी नदी के किनारे चली।

बाग से नदी तक सीढ़ियॉँ बनी हुई थीं। हम दोनों तेजी के साथ नीचे उतरे और किनारे पहुँचते ही मोहिनी ने खुशी के मारे उछलकर जोर से कहा-अभी है! अभी है! देखो वह निकल गया!

वह बच्चों का-सा उत्साह और उद्विग्न अधीरता जो मोहिनी के चेहरे पर उस समय थी, मुझे कभी न भूलेगी। मेरे दिल में सवाल पैदा हुआ, उस दिये से ऐसा हार्दिक संबंध, ऐसी विह्वलता क्यों? मुझ जैसा कवित्वशून्य व्यक्ति उस पहेली को जरा भी न बूझ सका।

मेरे हृदय में आशंकाएं पैदा हुई। अंधेरी रात है, घटायें उमड़ी हुई, नदी बाढ़ पर, हवा तेज, यहॉँ इस वक्त ठहरना ठीक नहीं। मगर मोहिनी! वह चाव-भरे भोलेपन की तस्वीर, उसी दिये की तरफ आँखें लगाये चुपचाप खड़ी थी और वह उदास दिया ज्यों हिलता मचलता चला जाता था, न जाने कहॉँ किस देश!

मगर थोड़ी देर के बाद वह दिया आँखों से ओझल हो गया। मोहिनी ने निराश स्वर में पूछा-गया! बुझ गया होगा? और इसके पहले कि मैं जवाब दूँ वह उस डोंगी के पास चली गई, जिस पर बैठकर हम कभी-कभी नदी की सैरें किया करते थे, और प्यार से मेरे गले लिपटकर बोली-मैं उस दिये को देखने जाऊँगी कि वह कहॉँ जा रहा है, किस देश को।

यह कहते-कहते मोहिनी ने नाव की रस्सी खोल ली। जिस तरह पेड़ों की डालियॉँ तूफान के झोंकों से झंकोले खाती हैं उसी तरह यह डोंगी डॉँवाडोल हो रही थी। नदी का वह डरावना विस्तार, लहरों की वह भयानक छलॉँगें, पानी की वह गरजती हुई आवाज, इस खौफनाक अंधेरे में इस डोंगी का बेड़ा क्योंकर पार होगा! मेरा दिल बैठ गया। क्या उस अभागे की तलाश में यह किश्ती भी डूबेगी! मगर मोहिनी का दिल उस वक्त उसके बस में न था। उसी दिये की तरह उसका हृदय भी भावनाओं की विराट, लहरों भरी, गरजती हुई नदी में बहा जा रहा था। मतवाली घटायें झुकती चली आती थीं कि जैसे नदी के गले मिलेंगी और वह काली नदी यों उठती थी कि जैसे बदलों को छू लेंगी। डर के मारे आँखें मुंदी जाती थीं। हम तेजी के साथ उछलते, कगारों के गिरने की आवाजें सुनते, काले-काले पेड़ों का झूमना देखते चले जाते थे। आबादी पीछे छूट गई, देवताओं को बस्ती से भी आगे निकल गये। एकाएक मोहिनी चौंककर उठ खड़ी हुई और बोली- अभी है! अभी है! देखों वह जा रहा है।

मैंने आंख उठाकर देखा, वह दिया ज्यों का त्यों हिलता-मचलता चला जाता था।

उस दिये को देखते हम बहुत दूर निकल गए। मोहिनी ने यह राग अलापना शुरू किया:

मैं साजन से मिलन चली

कैसा तड़पा देने वाला गीत था और कैसी दर्दभरी रसीली आवाज। प्रेम और आंसुओं में डूबी हुई। मोहक गीत में कल्पनाओं को जगाने की बड़ी शक्ति होती है। वह मनुष्य को भौतिक संसार से उठाकर कल्पनालोक में पहुँचा देता है। मेरे मन की आंखों में उस वक्त नदी की पुरशोर लहरें, नदी किनारे की झूमती हुई डालियॉँ, सनसनाती हुई हवा सबने जैसे रूप धर लिया था और सब की सब तेजी से कदम उठाये चली जाती थीं, अपने साजन से मिलने के लिए। उत्कंठा और प्रेम से झूमती हुई ऐ युवती की धुंधली सपने-जैसी तस्वीर हवा में, लहरों में और पेड़ों के झुरमुट में चली जाती दिखाई देती और कहती थी- साजन से मिलने के लिए! इस गीत ने सारे दृश्य पर उत्कंठा का जादू फूंक दिया।

मैं साजन से मिलन चली
साजन बसत कौन सी नगरी मैं बौरी ना जानूँ
ना मोहे आस मिलन की उससे ऐसी प्रीत भली
मैं साजन से मिलन चली

मोहिनी खामोश हुई तो चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था और उस सन्नाटे में एक बहुत मद्धिम, रसीला स्वप्निल-स्वर क्षितिज के उस पार से या नदी के नीचे से या हवा के झोंकों के साथ आता हुआ मन के कानों को सुनाई देता था।

मैं साजन से मिलन चली

मैं इस गीत से इतना प्रभावित हुआ कि जरा देर के लिए मुझे खयाल न रहा कि कहॉँ हूँ और कहॉँ जा रहा हूँ। दिल और दिमाग में वही राग गूँज रहा था। अचानक मोहिनी ने कहा-उस दिये को देखो। मैंने दिये की तरफ देखा। उसकी रोशनी मंद हो गई थी और आयु की पूंजी खत्म हो चली थी। आखिर वह एक बार जरा भभका और बुझ गया। जिस तरह पानी की बूँद नदी में गिरकर गायब हो जाती है, उसी तरह अंधेरे के फैलाव में उस दिये की हस्ती गायब हो गई ! मोहिनी ने धीमे से कहा, अब नहीं दिखाई देता! बुझ गया! यह कहकर उसने एक ठण्डी सांस ली। दर्द उमड़ आया। आँसुओं से गला फंस गया, जबान से सिर्फ इतना निकला, क्या यही उसकी आखिरी मंजिल थी? और आँखों से आँसू गिरने लगे।

मेरी आँखों के सामने से पर्दा-सा हट गया। मोहिनी की बेचैनी और उत्कंठा, अधीरता और उदासी का रहस्य समझ में आ गया और बरबस मेरी आंखों से भी आँसू की चंद बूंदें टपक पड़ीं। क्या उस शोर-भरे, खतरनाक, तूफानी सफर की यही आखिरी मंजिल थी?

दूसरे दिन मोहिनी उठी तो उसका चेहरा पीला था। उसे रात भर नींद नहीं आई थी। वह कवि स्वभाव की स्त्री थी। रात की इस घटना ने उसके दर्द-भरे भावुक हृदय पर बहुत असर पैदा किया था। हँसी उसके होंठों पर यूँ ही बहुत कम आती थी, हॉँ चेहरा खिला रहता थां आज से वह हँसमुखपन भी बिदा हो गया, हरदम चेहरे पर एक उदासी-सी छायी रहती और बातें ऐसी जिनसे हृदय छलनी होता था और रोना आता था। मैं उसके दिल को इन ख्यालों से दूर रखने के लिए कई बार हँसाने वाले किस्से लाया मगर उसने उन्हें खोलकर भी न देखा। हॉँ, जब मैं घर पर न होता तो वह कवि की रचनाएं देखा करती मगर इसलिए नहीं कि उनके पढ़ने से कोई आनन्द मिलता था बल्कि इसलिए कि उसे रोने के लिए खयाल मिल जाता था और वह कविताएँ जो उस जमाने में उसने लिखीं दिल को पिघला देने वाले दर्द-भरे गीत हैं। कौन ऐसा व्यक्ति है जो उन्हें पढ़कर अपने आँसू रोक लेगा। वह कभी-कभी अपनी कविताएँ मुझे सुनाती और जब मैं दर्द में डूबकर उनकी प्रशंसा करता तो मुझे उसकी ऑंखों में आत्मा के उल्लास का नशा दिखाई पड़ता। हँसी-दिल्लगी और रंगीनी मुमकिन है कुछ लोगों के दिलों पर असर पैदा कर सके मगर वह कौन-सा दिल है जो दर्द के भावों से पिघल न जाएगा।

एक रोज हम दोनों इसी बाग की सैर कर रहे थे। शाम का वक्त था और चैत का महीना। मोहिनी की तबियत आज खुश थी। बहुत दिनों के बाद आज उसके होंठों पर मुस्कराहट की झलक दिखाई दी थी। जब शाम हो गई और पूरनमासी का चॉँद गंगा की गोद से निकलकर ऊपर उठा तो हम इसी हौज के किनारे बैठ गए। यह मौलसिरियों की कतार ओर यह हौज मोहिनी की यादगार हैं। चॉँदनी में बिसात आयी और चौपड़ होने लगी। आज तबियत की ताजगी ने उसके रूप को चमका दिया था और उसकी मोहक चपलतायें मुझे मतवाला किये देती थीं। मैं कई बाजियॉँ खेला और हर बार हारा। हारने में जो मजा था वह जीतने में कहॉँ। हल्की-सी मस्ती में जो मजा है वह छकने और मतवाला होने में नहीं।

चांदनी खूब छिटकी हुई थी। एकाएक मोहिनी ने गंगा की तरफ देखा और मुझसे बोली, वह उस पार कैसी रोशनी नजर आ रही है? मैंने भी निगाह दौड़ाई, चिता की आग जल रही थी लेकिन मैंने टालकर कहा- सॉँझी खाना पका रहे हैं।

मोहिनी को विश्वास नहीं हुआ। उसके चेहरे पर एक उदास मुस्कराहट दिखाई दी और आँखें नम हो गईं। ऐसे दुख देने वाले दृश्य उसके भावुक और दर्दमंद दिल पर वही असर करते थे जो लू की लपट फूलों के साथ करती है।

थोड़ी देर तक वह मौन, निश्चला बैठी रही फिर शोकभरे स्वर में बोली-‘अपनी आख़िरी मंज़िल पर पहुँच गया!’

अलग्योझा – मुंशी प्रेमचंद

Algyojha - Munshi Premchand

1

भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने बाद दूसरी सगाई की, तो उसके लड़के रग्घू के लिए बुरे दिन आ गए। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैन से गॉँव में गुल्ली-डंडा खेलता फिरता था। मॉँ के आते ही चक्की में जुतना पड़ा। पन्ना रुपवती स्त्री थी और रुप और गर्व में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों से कोई काम न करती। गोबर रग्घू निकालता, बैलों को सानी रग्घू देता। रग्घू ही जूठे बरतन मॉँजता। भोला की ऑंखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे रग्घू में सब बुराइयॉँ-ही- बुराइयॉँ नजर आतीं। पन्ना की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार ऑंखें बंद करके मान लेता था। रग्घू की शिकायतों की जरा परवाह न करता। नतीजा यह हुआ कि रग्घू ने शिकायत करना ही छोड़ दिया। किसके सामने रोए? बाप ही नहीं, सारा गॉँव उसका दुश्मन था। बड़ा जिद्दी लड़का है, पन्ना को तो कुद समझता ही नहीं: बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती-पिलाती हैं यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह तो कहा, पन्ना इतनी सीधी-सादी है कि निबाह होता जाता है। सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता! रग्घू का हृदय मॉँ की ओर से दिन-दिन फटता जाता था। यहां तक कि आठ साठ गुजर गए और एक दिन भोला के नाम भी मृत्यु का सन्देश आ पहुँचा।

पन्ना के चार बच्चे थे-तीन बेटे और एक बेटी। इतना बड़ खर्च और कमानेवाला कोई नहीं। रग्घू अब क्यों बात पूछने लगा? यह मानी हुई बात थी। अपनी स्त्री लाएगा और अलग रहेगा। स्त्री आकर और भी आग लगाएगी। पन्ना को चारों ओर अंधेरा ही दिखाई देता था: पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत बनकर घर में रहेगी। जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लौंडी न बनेगी। जिस लौंडे को अपना गुलाम समझा, उसका मुंह न ताकेगी। वह सुन्दर थीं, अवस्था अभी कुछ ऐसी ज्यादा न थी। जवानी अपनी पूरी बहार पर थी। क्या वह कोई दूसरा घर नहीं कर सकती? यहीं न होगा, लोग हँसेंगे। बला से! उसकी बिरादरी में क्या ऐसा होता नहीं? ब्राह्मण, ठाकुर थोड़ी ही थी कि नाक कट जायगी। यह तो उन्ही ऊँची जातों में होता है कि घर में चाहे जो कुछ करो, बाहर परदा ढका रहे। वह तो संसार को दिखाकर दूसरा घर कर सकती है, फिर वह रग्घू कि दबैल बनकर क्यों रहे?

भोला को मरे एक महीना गुजर चुका था। संध्या हो गई थी। पन्ना इसी चिन्ता में पड़ हुई थी कि सहसा उसे ख्याल आया, लड़के घर में नहीं हैं। यह बैलों के लौटने की बेला है, कहीं कोई लड़का उनके नीचे न आ जाए। अब द्वार पर कौन है, जो उनकी देखभाल करेगा? रग्घू को मेरे लड़के फूटी ऑंखों नहीं भाते। कभी हँसकर नहीं बोलता। घर से बाहर निकली, तो देखा, रग्घू सामने झोपड़े में बैठा ऊख की गँडेरिया बना रहा है, लड़के उसे घेरे खड़े हैं और छोटी लड़की उसकी गर्दन में हाथ डाले उसकी पीठ पर सवार होने की चेष्टा कर रही है। पन्ना को अपनी ऑंखों पर विश्वास न आया। आज तो यह नई बात है। शायद दुनिया को दिखाता है कि मैं अपने भाइयों को कितना चाहता हूँ और मन में छुरी रखी हुई है। घात मिले तो जान ही ले ले! काला सॉँप है, काला सॉँप! कठोर स्वर में बोली-तुम सबके सब वहॉँ क्या करते हो? घर में आओ, सॉँझ की बेला है, गोरु आते होंगे।

रग्घू ने विनीत नेत्रों से देखकर कहा—मैं तो हूं ही काकी, डर किस बात का है?

बड़ा लड़का केदार बोला-काकी, रग्घू दादा ने हमारे लिए दो गाड़ियाँ बना दी हैं। यह देख, एक पर हम और खुन्नू बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और झुनियॉँ। दादा दोनों गाड़ियॉँ खींचेंगे।

यह कहकर वह एक कोने से दो छोटी-छोटी गाड़ियॉँ निकाल लाया। चार-चार पहिए लगे थे। बैठने के लिए तख्ते और रोक के लिए दोनों तरफ बाजू थे।

पन्ना ने आश्चर्य से पूछा-ये गाड़ियॉँ किसने बनाई?

केदार ने चिढ़कर कहा-रग्घू दादा ने बनाई हैं, और किसने! भगत के घर से बसूला और रुखानी मॉँग लाए और चटपट बना दीं। खूब दौड़ती हैं काकी! बैठ खुन्नू मैं खींचूँ।

खुन्नू गाड़ी में बैठ गया। केदार खींचने लगा। चर-चर शोर हुआ मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है।

लछमन ने दूसरी गाड़ी में बैठकर कहा-दादा, खींचो।

रग्घू ने झुनियॉँ को भी गाड़ी में बिठा दिया और गाड़ी खींचता हुआ दौड़ा। तीनों लड़के तालियॉँ बजाने लगे। पन्ना चकित नेत्रों से यह दृश्य देख रही थी और सोच रही थी कि य वही रग्घू है या कोई और।

थोड़ी देर के बाद दोनों गाड़ियॉँ लौटीं: लड़के घर में जाकर इस यानयात्रा के अनुभव बयान करने लगे। कितने खुश थे सब, मानों हवाई जहाज पर बैठ आये हों।

खुन्नू ने कहा-काकी सब पेड़ दौड़ रहे थे।

लछमन-और बछियॉँ कैसी भागीं, सबकी सब दौड़ीं!

केदार-काकी, रग्घू दादा दोनों गाड़ियॉँ एक साथ खींच ले जाते हैं।

झुनियॉँ सबसे छोटी थी। उसकी व्यंजना-शक्ति उछल-कूद और नेत्रों तक परिमित थी-तालियॉँ बजा-बजाकर नाच रही थी।

खुन्नू-अब हमारे घर गाय भी आ जाएगी काकी! रग्घू दादा ने गिरधारी से कहा है कि हमें एक गाय ला दो। गिरधारी बोला, कल लाऊँगा।

केदार-तीन सेर दूध देती है काकी! खूब दूध पीऍंगे।

इतने में रग्घू भी अंदर आ गया। पन्ना ने अवहेलना की दृष्टि से देखकर पूछा-क्यों रग्घू तुमने गिरधारी से कोई गाय मॉँगी है?

रग्घू ने क्षमा-प्रार्थना के भाव से कहा-हॉँ, मॉँगी तो है, कल लाएगा।

पन्ना-रुपये किसके घर से आऍंगे, यह भी सोचा है?

रग्घू-सब सोच लिया है काकी! मेरी यह मुहर नहीं है। इसके पच्चीस रुपये मिल रहे हैं, पॉँच रुपये बछिया के मुजा दे दूँगा! बस, गाय अपनी हो जाएगी।

पन्ना सन्नाटे में आ गई। अब उसका अविश्वासी मन भी रग्घू के प्रेम और सज्जनता को अस्वीकार न कर सका। बोली-मुहर को क्यों बेचे देते हो? गाय की अभी कौन जल्दी है? हाथ में पैसे हो जाऍं, तो ले लेना। सूना-सूना गला अच्छा न लगेगा। इतने दिनों गाय नहीं रही, तो क्या लड़के नहीं जिए?

रग्घू दार्शनिक भाव से बोला-बच्चों के खाने-पीने के यही दिन हैं काकी! इस उम्र में न खाया, तो फिर क्या खाऍंगे। मुहर पहनना मुझे अच्छा भी नही मालूम होता। लोग समझते होंगे कि बाप तो गया। इसे मुहर पहनने की सूझी है।

भोला महतो गाय की चिंता ही में चल बसे। न रुपये आए और न गाय मिली। मजबूर थे। रग्घू ने यह समस्या कितनी सुगमता से हल कर दी। आज जीवन में पहली बार पन्ना को रग्घू पर विश्वास आया, बोली-जब गहना ही बेचना है, तो अपनी मुहर क्यों बेचोगे? मेरी हँसुली ले लेना।

रग्घू-नहीं काकी! वह तुम्हारे गले में बहुत अच्छी लगती है। मर्दो को क्या, मुहर पहनें या न पहनें।

पन्ना-चल, मैं बूढ़ी हुई। अब हँसुली पहनकर क्या करना है। तू अभी लड़का है, तेरा गला अच्छा न लगेगा?

रग्घू मुस्कराकर बोला—तुम अभी से कैसे बूढ़ी हो गई? गॉँव में है कौन तुम्हारे बराबर?

रग्घू की सरल आलोचना ने पन्ना को लज्जित कर दिया। उसके रुखे-मुरछाए मुख पर प्रसन्नता की लाली दौड़ गई।

2

पाँच साल गुजर गए। रग्घू का-सा मेहनती, ईमानदार, बात का धनी दूसरा किसान गॉँव में न था। पन्ना की इच्छा के बिना कोई काम न करता। उसकी उम्र अब 23 साल की हो गई थी। पन्ना बार-बार कहती, भइया, बहू को बिदा करा लाओ। कब तक नैह में पड़ी रहेगी? सब लोग मुझी को बदनाम करते हैं कि यही बहू को नहीं आने देती: मगर रग्घू टाल देता था। कहता कि अभी जल्दी क्या है? उसे अपनी स्त्री के रंग-ढंग का कुछ परिचय दूसरों से मिल चुका था। ऐसी औरत को घर में लाकर वह अपनी शॉँति में बाधा नहीं डालना चाहता था।

आखिर एक दिन पन्ना ने जिद करके कहा-तो तुम न लाओगे?

‘कह दिया कि अभी कोई जल्दी नहीं।’

‘तुम्हारे लिए जल्दी न होगी, मेरे लिए तो जल्दी है। मैं आज आदमी भेजती हूँ।’

‘पछताओगी काकी, उसका मिजाज अच्छा नहीं है।’

‘तुम्हारी बला से। जब मैं उससे बोलूँगी ही नहीं, तो क्या हवा से लड़ेगी? रोटियॉँ तो बना लेगी। मुझसे भीतर-बाहर का सारा काम नहीं होता, मैं आज बुलाए लेती हूँ।’

‘बुलाना चाहती हो, बुला लो: मगर फिर यह न कहना कि यह मेहरिया को ठीक नहीं करता, उसका गुलाम हो गया।’

‘न कहूँगी, जाकर दो साड़ियाँ और मिठाई ले आ।’

तीसरे दिन मुलिया मैके से आ गई। दरवाजे पर नगाड़े बजे, शहनाइयों की मधुर ध्वनि आकाश में गूँजने लगी। मुँह-दिखावे की रस्म अदा हुई। वह इस मरुभूमि में निर्मल जलधारा थी। गेहुऑं रंग था, बड़ी-बड़ी नोकीली पलकें, कपोलों पर हल्की सुर्खी, ऑंखों में प्रबल आकर्षण। रग्घू उसे देखते ही मंत्रमुग्ध हो गया।

प्रात:काल पानी का घड़ा लेकर चलती, तब उसका गेहुऑं रंग प्रभात की सुनहरी किरणों से कुन्दन हो जाता, मानों उषा अपनी सारी सुगंध, सारा विकास और उन्माद लिये मुस्कराती चली जाती हो।

3

मुलिया मैके से ही जली-भुनी आयी थी। मेरा शौहर छाती फाड़कर काम करे, और पन्ना रानी बनी बैठी रहे, उसके लड़े रईसजादे बने घूमें। मुलिया से यह बरदाश्त न होगा। वह किसी की गुलामी न करेगी। अपने लड़के तो अपने होते ही नहीं, भाई किसके होते हैं? जब तक पर नहीं निकते हैं, रग्घू को घेरे हुए हैं। ज्यों ही जरा सयाने हुए, पर झाड़कर निकल जाऍंगे, बात भी न पूछेंगे।

एक दिन उसने रग्घू से कहा—तुम्हें इस तरह गुलामी करनी हो, तो करो, मुझसे न होगी।

रग्घू—तो फिर क्या करुँ, तू ही बता? लड़के तो अभी घर का काम करने लायक भी नहीं हैं।

मुलिया—लड़के रावत के हैं, कुछ तुम्हारे नहीं हैं। यही पन्ना है, जो तुम्हें दाने-दाने को तरसाती थी। सब सुन चुकी हूं। मैं लौंडी बनकर न रहूँगी। रुपये-पैसे का मुझे हिसाब नहीं मिलता। न जाने तुम क्या लाते हो और वह क्या करती है। तुम समझते हो, रुपये घर ही में तो हैं: मगर देख लेना, तुम्हें जो एक फूटी कौड़ी भी मिले।

रग्घू—रुपये-पैसे तेरे हाथ में देने लगूँ तो दुनिया कया कहेगी, यह तो सोच।

मुलिया—दुनिया जो चाहे, कहे। दुनिया के हाथों बिकी नहीं हूँ। देख लेना, भॉँड लीपकर हाथ काला ही रहेगा। फिर तुम अपने भाइयों के लिए मरो, मै। क्यों मरुँ?

रग्घू—ने कुछ जवाब न दिया। उसे जिस बात का भय था, वह इतनी जल्द सिर आ पड़ी। अब अगर उसने बहुत तत्थो-थंभो किया, तो साल-छ:महीने और काम चलेगा। बस, आगे यह डोंगा चलता नजर नहीं आता। बकरे की मॉँ कब तक खैर मनाएगी?

एक दिन पन्ना ने महुए का सुखावन डाला। बरसाल शुरु हो गई थी। बखार में अनाज गीला हो रहा था। मुलिया से बोली-बहू, जरा देखती रहना, मैं तालाब से नहा आऊँ?

मुलिया ने लापरवाही से कहा-मुझे नींद आ रही है, तुम बैठकर देखो। एक दिन न नहाओगी तो क्या होगा?

पन्ना ने साड़ी उतारकर रख दी, नहाने न गयी। मुलिया का वार खाली गया।

कई दिन के बाद एक शाम को पन्ना धान रोपकर लौटी, अँधेरा हो गया था। दिन-भर की भूखी थी। आशा थी, बहू ने रोटी बना रखी होगी: मगर देखा तो यहॉँ चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ था, और बच्चे मारे भूख के तड़प रहे थे। मुलिया से आहिस्ता से पूछा-आज अभी चूल्हा नहीं जला?

केदार ने कहा—आज दोपहर को भी चूल्हा नहीं जला काकी! भाभी ने कुछ बनाया ही नहीं।

पन्ना—तो तुम लोगों ने खाया क्या?

केदार—कुछ नहीं, रात की रोटियॉँ थीं, खुन्नू और लछमन ने खायीं। मैंने सत्तू खा लिया।

पन्ना—और बहू?

केदार—वह पड़ी सो रह है, कुछ नहीं खाया।

पन्ना ने उसी वक्त चूल्हा जलाया और खाना बनाने बैठ गई। आटा गूँधती थी और रोती थी। क्या नसीब है? दिन-भर खेत में जली, घर आई तो चूल्हे के सामने जलना पड़ा।

केदार का चौदहवॉँ साल था। भाभी के रंग-ढंग देखकर सारी स्थित समझ् रहा था। बोला—काकी, भाभी अब तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती।

पन्ना ने चौंककर पूछा—क्या कुछ कहती थी?

केदार—कहती कुछ नहीं थी: मगर है उसके मन में यही बात। फिर तुम क्यों नहीं उसे छोड़ देतीं? जैसे चाहे रहे, हमारा भी भगवान् है?

पन्ना ने दॉँतों से जीभ दबाकर कहा—चुप, मरे सामने ऐसी बात भूलकर भी न कहना। रग्घू तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा बाप है। मुलिया से कभी बोलोगे तो समझ लेना, जहर खा लूँगी।

4

दशहरे का त्यौहार आया। इस गॉँव से कोस-भर एक पुरवे में मेला लगता था। गॉँव के सब लड़के मेला देखने चले। पन्ना भी लड़कों के साथ चलने को तैयार हुई: मगर पैसे कहॉँ से आऍं? कुंजी तो मुलिया के पास थी।

रग्घू ने आकर मुलिया से कहा—लड़के मेले जा रहे हैं, सबों को दो-दो पैसे दे दो।

मुलिया ने त्योरियॉँ चढ़ाकर कहा—पैसे घर में नहीं हैं।

रग्घू—अभी तो तेलहन बिका था, क्या इतनी जल्दी रुपये उठ गए?

मुलिया—हॉँ, उठ गए?

रग्घू—कहॉँ उठ गए? जरा सुनूँ, आज त्योहार के दिन लड़के मेला देखने न जाऍंगे?

मुलिया—अपनी काकी से कहो, पैसे निकालें, गाड़कर क्या करेंगी?

खूँटी पर कुंजी हाथ पकड़ लिया और बोली—कुंजी मुझे दे दो, नहीं तो ठीक न होगा। खाने- पहने को भी चाहिए, कागज-किताब को भी चाहिए, उस पर मेला देखने को भी चाहिए। हमारी कमाई इसलिए नहीं है कि दूसरे खाऍं और मूँछों पर ताव दें।

पन्ना ने रग्घू से कहा—भइया, पैसे क्या होंगे! लड़के मेला देखने न जाऍंगे।

रग्घू ने झिड़ककर कहा—मेला देखने क्यों न जाऍंगे? सारा गॉँव जा रहा है। हमारे ही लड़के न जाऍंगे?

यह कहकर रग्घू ने अपना हाथ छुड़ा लिया और पैसे निकालकर लड़कों को दे दिये: मगर कुंजी जब मुलिया को देने लगा, तब उसने उसे आंगन में फेंक दिया और मुँह लपेटकर लेट गई! लड़के मेला देखने न गए।

इसके बाद दो दिन गुजर गए। मुलिया ने कुछ नहीं खाया और पन्ना भी भूखी रही रग्घू कभी इसे मनाता, कभी उसे:पर न यह उठती, न वह। आखिर रग्घू ने हैरान होकर मुलिया से पूछा—कुछ मुँह से तो कह, चाहती क्या है?

मुलिया ने धरती को सम्बोधित करके कहा—मैं कुछ नहीं चाहती, मुझे मेरे घर पहुँचा दो।

रग्घू—अच्छा उठ, बना-खा। पहुँचा दूँगा।

मुलिया ने रग्घू की ओर ऑंखें उठाई। रग्घू उसकी सूरत देखकर डर गया। वह माधुर्य, वह मोहकता, वह लावण्य गायब हो गया था। दॉँत निकल आए थे, ऑंखें फट गई थीं और नथुने फड़क रहे थे। अंगारे की-सी लाल ऑंखों से देखकर बोली—अच्छा, तो काकी ने यह सलाह दी है, यह मंत्र पढ़ाया है? तो यहॉँ ऐसी कच्चे नहीं हूँ। तुम दोनों की छाती पर मूँग दलूँगी। हो किस फेर में?

रग्घू—अच्छा, तो मूँग ही दल लेना। कुछ खा-पी लेगी, तभी तो मूँग दल सकेगी।

मुलिया—अब तो तभी मुँह में पानी डालूँगी, जब घर अलग हो जाएगा। बहुत झेल चुकी, अब नहीं झेला जाता।

रग्घू सन्नाटे में आ गया। एक दिन तक उसके मुँह से आवाज ही न निकली। अलग होने की उसने स्वप्न में भी कल्पना न की थी। उसने गॉँव में दो-चार परिवारों को अलग होते देखा था। वह खूब जानता था, रोटी के साथ लोगों के हृदय भी अलग हो जाते हैं। अपने हमेशा के लिए गैर हो जाते हैं। फिर उनमें वही नाता रह जाता है, जो गॉँव के आदमियों में। रग्घू ने मन में ठान लिया था कि इस विपत्ति को घर में न आने दूँगा: मगर होनहार के सामने उसकी एक न चली। आह! मेरे मुँह में कालिख लगेगी, दुनिया यही कहेगी कि बाप के मर जाने पर दस साल भी एक में निबाह न हो सका। फिर किससे अलग हो जाऊँ? जिनको गोद में खिलाया, जिनको बच्चों की तरह पाला, जिनके लिए तरह-तरह के कष्ठ झेले, उन्हीं से अलग हो जाऊँ? अपने प्यारों को घर से निकाल बाहर करुँ? उसका गला फँस गया। कॉँपते हुए स्वर में बोला—तू क्या चाहती है कि मैं अपने भाइयों से अलग हो जाऊँ? भला सोच तो, कहीं मुँह दिखाने लायक रहूँगा?

मुलिया—तो मेरा इन लोगों के साथ निबाह न होगा।

रग्घू—तो तू अलग हो जा। मुझे अपने साथ क्यों घसीटती है?

मुलिया—तो मुझे क्या तुम्हारे घर में मिठाई मिलती है? मेरे लिए क्या संसार में जगह नहीं है?

रग्घू—तेरी जैसी मर्जी, जहॉँ चाहे रह। मैं अपने घर वालों से अलग नहीं हो सकता। जिस दिन इस घर में दो चूल्हें जलेंगे, उस दिन मेरे कलेजे के दो टुकड़े हो जाऍंगे। मैं यह चोट नहीं सह सकता। तुझे जो तकलीफ हो, वह मैं दूर कर सकता हूँ। माल-असबाब की मालकिन तू है ही: अनाज- पानी तेरे ही हाथ है, अब रह क्या गया है? अगर कुछ काम-धंधा करना नहीं चाहती, मत कर। भगवान ने मुझे समाई दी होती, तो मैं तुझे तिनका तक उठाने न देता। तेरे यह सुकुमार हाथ-पांव मेहनत-मजदूरी करने के लिए बनाए ही नहीं गए हैं: मगर क्या करुँ अपना कुछ बस ही नहीं है। फिर भी तेरा जी कोई काम करने को न चाहे, मत कर: मगर मुझसे अलग होने को न कह, तेरे पैरों पड़ता हूँ।

मुलिया ने सिर से अंचल खिसकाया और जरा समीप आकर बोली—मैं काम करने से नहीं डरती, न बैठे-बैठे खाना चाहती हूँ: मगर मुझ से किसी की धौंस नहीं सही जाती। तुम्हारी ही काकी घर का काम-काज करती हैं, तो अपने लिए करती हैं, अपने बाल-बच्चों के लिए करती हैं। मुझ पर कुछ एहसान नहीं करतीं, फिर मुझ पर धौंस क्यों जमाती हैं? उन्हें अपने बच्चे प्यारे होंगे, मुझे तो तुम्हारा आसरा है। मैं अपनी ऑंखों से यह नहीं देख सकती कि सारा घर तो चैन करे, जरा-जरा-से बच्चे तो दूध पीऍं, और जिसके बल-बूते पर गृहस्थी बनी हुई है, वह मट्ठे को तरसे। कोई उसका पूछनेवाला न हो। जरा अपना मुंह तो देखो, कैसी सूरत निकल आई है। औरों के तो चार बरस में अपने पट्ठे तैयार हो जाऍंगे। तुम तो दस साल में खाट पर पड़ जाओगे। बैठ जाओ, खड़े क्यों हो? क्या मारकर भागोगे? मैं तुम्हें जबरदस्ती न बॉँध लूँगी, या मालकिन का हुक्म नहीं है? सच कहूँ, तुम बड़े कठ-कलेजी हो। मैं जानती, ऐसे निर्मोहिए से पाला पड़ेगा, तो इस घर में भूल से न आती। आती भी तो मन न लगाती, मगर अब तो मन तुमसे लग गया। घर भी जाऊँ, तो मन यहॉँ ही रहेगा और तुम जो हो, मेरी बात नहीं पूछते।

मुलिया की ये रसीली बातें रग्घू पर कोई असर न डाल सकीं। वह उसी रुखाई से बोला—मुलिया, मुझसे यह न होगा। अलग होने का ध्यान करते ही मेरा मन न जाने कैसा हो जाता है। यह चोट मुझ से न सही जाएगी।

मुलिया ने परिहास करके कहा—तो चूड़ियॉँ पहनकर अन्दर बैठो न! लाओ मैं मूँछें लगा लूं। मैं तो समझती थी कि तुममें भी कुछ कल-बल है। अब देखती हूँ, तो निरे मिट्टी के लौंदे हो।

पन्ना दालान में खड़ी दोनों की बातचीत सुन नहीं थी। अब उससे न रहा गया। सामने आकर रग्घू से बोली—जब वह अलग होने पर तुली हुई है, फिर तुम क्यों उसे जबरदस्ती मिलाए रखना चाहते हो? तुम उसे लेकर रहो, हमारे भगवान् ने निबाह दिया, तो अब क्या डर? अब तो भगवान् की दया से तीनों लड़के सयाने हो गए हैं, अब कोई चिन्ता नहीं।

रग्घू ने ऑंसू-भरी ऑंखों से पन्ना को देखकर कहा—काकी, तू भी पागल हो गई है क्या? जानती नहीं, दो रोटियॉँ होते ही दो मन हो जाते हैं।

पन्ना—जब वह मानती ही नहीं, तब तुम क्या करोगे? भगवान् की मरजी होगी, तो कोई क्या करेगा? परालब्ध में जितने दिन एक साथ रहना लिखा था, उतने दिन रहे। अब उसकी यही मरजी है, तो यही सही। तुमने मेरे बाल-बच्चों के लिए जो कुछ किया, वह भूल नहीं सकती। तुमने इनके सिर हाथ न रखा होता, तो आज इनकी न जाने क्या गति होती: न जाने किसके द्वार पर ठोकरें खातें होते, न जाने कहॉँ-कहॉँ भीख मॉँगते फिरते। तुम्हारा जस मरते दम तक गाऊँगी। अगर मेरी खाल तुम्हारे जूते बनाने के काम आते, तो खुशी से दे दूँ। चाहे तुमसे अलग हो जाऊँ, पर जिस घड़ी पुकारोगे, कुत्ते की तरह दौड़ी आऊँगी। यह भूलकर भी न सोचना कि तुमसे अलग होकर मैं तुम्हारा बुरा चेतूँगी। जिस दिन तुम्हारा अनभल मेरे मन में आएगा, उसी दिन विष खाकर मर जाऊँगी। भगवान् करे, तुम दूधों नहाओं, पूतों फलों! मरते दम तक यही असीस मेरे रोऍं-रोऍं से निकलती रहेगी और अगर लड़के भी अपने बाप के हैं। तो मरते दम तक तुम्हारा पोस मानेंगे।

यह कहकर पन्ना रोती हुई वहॉँ से चली गई। रग्घू वहीं मूर्ति की तरह बैठा रहा। आसमान की ओर टकटकी लगी थी और ऑंखों से ऑंसू बह रहे थे।

5

पन्ना की बातें सुनकर मुलिया समझ गई कि अपने पौबारह हैं। चटपट उठी, घर में झाड़ू लगाई, चूल्हा जलाया और कुऍं से पानी लाने चली। उसकी टेक पूरी हो गई थी।

गॉँव में स्त्रियों के दो दल होते हैं—एक बहुओं का, दूसरा सासों का! बहुऍं सलाह और सहानुभूति के लिए अपने दल में जाती हैं, सासें अपने में। दोनों की पंचायतें अलग होती हैं। मुलिया को कुऍं पर दो-तीन बहुऍं मिल गई। एक से पूछा—आज तो तुम्हारी बुढ़िया बहुत रो-धो रही थी।

मुलिया ने विजय के गर्व से कहा—इतने दिनों से घर की मालकिन बनी हुई है, राज-पाट छोड़ते किसे अच्छा लगता है? बहन, मैं उनका बुरा नहीं चाहती: लेकिन एक आदमी की कमाई में कहॉँ तक बरकत होगी। मेरे भी तो यही खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने के दिन हैं। अभी उनके पीछे मरो, फिर बाल-बच्चे हो जाऍं, उनके पीछे मरो। सारी जिन्दगी रोते ही कट जाएगी।

एक बहू-बुढ़िया यही चाहती है कि यह सब जन्म-भर लौंडी बनी रहें। मोटा-झोटा खाएं और पड़ी रहें।

दूसरी बहू—किस भरोसे पर कोई मरे—अपने लड़के तो बात नहीं पूछें पराए लड़कों का क्या भरोसा? कल इनके हाथ-पैर हो जायेंगे, फिर कौन पूछता है! अपनी-अपनी मेहरियों का मुंह देखेंगे। पहले ही से फटकार देना अच्छा है, फिर तो कोई कलक न होगा।

मुलिया पानी लेकर गयी, खाना बनाया और रग्घू से बोली—जाओं, नहा आओ, रोटी तैयार है।

रग्घू ने मानों सुना ही नहीं। सिर पर हाथ रखकर द्वार की तरफ ताकता रहा।

मुलिया—क्या कहती हूँ, कुछ सुनाई देता है, रोटी तैयार है, जाओं नहा आओ।

रग्घू—सुन तो रहा हूँ, क्या बहरा हूँ? रोटी तैयार है तो जाकर खा ले। मुझे भूख नहीं है।

मुलिया ने फिर नहीं कहा। जाकर चूल्हा बुझा दिया, रोटियॉँ उठाकर छींके पर रख दीं और मुँह ढॉँककर लेट रही।

जरा देर में पन्ना आकर बोली—खाना तैयार है, नहा-धोकर खा लो! बहू भी भूखी होगी।

रग्घू ने झुँझलाकर कहा—काकी तू घर में रहने देगी कि मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊँ? खाना तो खाना ही है, आज न खाऊँगा, कल खाऊँगा, लेकिन अभी मुझसे न खाया जाएगा। केदार क्या अभी मदरसे से नहीं आया?

पन्ना—अभी तो नीं आया, आता ही होगा।

पन्ना समझ गई कि जब तक वह खाना बनाकर लड़कों को न खिलाएगी और खुद न खाएगी रग्घू न खाएगा। इतना ही नहीं, उसे रग्घू से लड़ाई करनी पड़ेगी, उसे जली-कटी सुनानी पड़ेगी। उसे यह दिखाना पड़ेगा कि मैं ही उससे अलग होना चाहती हूँ नहीं तो वह इसी चिन्ता में घुल- घुलकर प्राण दे देगा। यह सोचकर उसने अलग चूल्हा जलाया और खाना बनाने लगी। इतने में केदार और खुन्नू मदरसे से आ गए। पन्ना ने कहा—आओ बेटा, खा लो, रोटी तैयार है।

केदार ने पूछा—भइया को भी बुला लूँ न?

पन्ना—तुम आकर खा लो। उसकी रोटी बहू ने अलग बनाई है।

खुन्नू—जाकर भइया से पूछ न आऊँ?

पन्ना—जब उनका जी चाहेगा, खाऍंगे। तू बैठकर खा: तुझे इन बातों से क्या मतलब? जिसका जी चाहेगा खाएगा, जिसका जी न चाहेगा, न खाएगा। जब वह और उसकी बीवी अलग रहने पर तुले हैं, तो कौन मनाए?

केदार—तो क्यों अम्माजी, क्या हम अलग घर में रहेंगे?

पन्ना—उनका जी चाहे, एक घर में रहें, जी चाहे ऑंगन में दीवार डाल लें।

खुन्नू ने दरवाजे पर आकर झॉँका, सामने फूस की झोंपड़ी थी, वहीं खाट पर पड़ा रग्घू नारियल पी रहा था।

खुन्नू— भइया तो अभी नारियल लिये बैठे हैं।

पन्ना—जब जी चाहेगा, खाऍंगे।

केदार—भइया ने भाभी को डॉँटा नहीं?

मुलिया अपनी कोठरी में पड़ी सुन रही थी। बाहर आकर बोली—भइया ने तो नहीं डॉँटा अब तुम आकर डॉँटों।

केदार के चेहरे पर रंग उड़ गया। फिर जबान न खोली। तीनों लड़कों ने खाना खाया और बाहर निकले। लू चलने लगी थी। आम के बाग में गॉँव के लड़के-लड़कियॉँ हवा से गिरे हुए आम चुन रहे थे। केदार ने कहा—आज हम भी आम चुनने चलें, खूब आम गिर रहे हैं।

खुन्नू—दादा जो बैठे हैं?

लछमन—मैं न जाऊँगा, दादा घुड़केंगे।

केदार—वह तो अब अलग हो गए।

लक्षमन—तो अब हमको कोई मारेगा, तब भी दादा न बोलेंगे?

केदार—वाह, तब क्यों न बोलेंगे?

रग्घू ने तीनों लड़कों को दरवाजे पर खड़े देखा: पर कुछ बोला नहीं। पहले तो वह घर के बाहर निकलते ही उन्हें डॉँट बैठता था: पर आज वह मूर्ति के समान निश्चल बैठा रहा। अब लड़कों को कुछ साहस हुआ। कुछ दूर और आगे बढ़े। रग्घू अब भी न बोला, कैसे बोले? वह सोच रहा था, काकी ने लड़कों को खिला-पिला दिया, मुझसे पूछा तक नहीं। क्या उसकी ऑंखों पर भी परदा पड़ गया है: अगर मैंने लड़कों को पुकारा और वह न आयें तो? मैं उनकों मार-पीट तो न सकूँगा। लू में सब मारे-मारे फिरेंगे। कहीं बीमार न पड़ जाऍं। उसका दिल मसोसकर रह जाता था, लेकिन मुँह से कुछ कह न सकता था। लड़कों ने देखा कि यह बिलकुल नहीं बोलते, तो निर्भय होकर चल पड़े।

सहसा मुलिया ने आकर कहा—अब तो उठोगे कि अब भी नहीं? जिनके नाम पर फाका कर रहे हो, उन्होंने मजे से लड़कों को खिलाया और आप खाया, अब आराम से सो रही है। ‘मोर पिया बात न पूछें, मोर सुहागिन नॉँव।’ एक बार भी तो मुँह से न फूटा कि चलो भइया, खा लो।

रग्घू को इस समय मर्मान्तक पीड़ा हो रह थी। मुलिया के इन कठोर शब्दों ने घाव पर नमक छिड़क दिया। दु:खित नेत्रों से देखकर बोला—तेरी जो मर्जी थी, वही तो हुआ। अब जा, ढोल बजा!

मुलिया—नहीं, तुम्हारे लिए थाली परोसे बैठी है।

रग्घू—मुझे चिढ़ा मत। तेरे पीछे मैं भी बदनाम हो रहा हूँ। जब तू किसी की होकर नहीं रहना चाहती, तो दूसरे को क्या गरज है, जो मेरी खुशामद करे? जाकर काकी से पूछ, लड़के आम चुनने गए हैं, उन्हें पकड़ लाऊँ?

मुलिया अँगूठा दिखाकर बोली—यह जाता है। तुम्हें सौ बार गरज हो, जाकर पूछो।

इतने में पन्ना भी भीतर से निकल आयी। रग्घू ने पूछा—लड़के बगीचे में चले गए काकी, लू चल रही है।

पन्ना—अब उनका कौन पुछत्तर है? बगीचे में जाऍं, पेड़ पर चढ़ें, पानी में डूबें। मैं अकेली क्या- क्या करुँ?

रग्घू—जाकर पकड़ लाऊँ?

पन्ना—जब तुम्हें अपने मन से नहीं जाना है, तो फिर मैं जाने को क्यों कहूँ? तुम्हें रोकना होता , तो रोक न देते? तुम्हारे सामने ही तो गए होंगे?

पन्ना की बात पूरी भी न हुई थी कि रग्घू ने नारियल कोने में रख दिया और बाग की तरफ चला।

6

रग्घू लड़कों को लेकर बाग से लौटा, तो देखा मुलिया अभी तक झोंपड़े में खड़ी है। बोला—तू जाकर खा क्यों नहीं लेती? मुझे तो इस बेला भूख नहीं है।

मुलिया ऐंठकर बोली—हॉँ, भूख क्यों लगेगी! भाइयों ने खाया, वह तुम्हारे पेट में पहुँच ही गया होगा।

रग्घू ने दॉँत पीसकर कहा—मुझे जला मत मुलिया, नहीं अच्छा न होगा। खाना कहीं भागा नहीं जाता। एक बेला न खाऊँगा, तो मर न जाउँगा! क्या तू समझती हैं, घर में आज कोई बात हो गई हैं? तूने घर में चूल्हा नहीं जलाया, मेरे कलेजे में आग लगाई है। मुझे घमंड था कि और चाहे कुछ हो जाए, पर मेरे घर में फूट का रोग न आने पाएगा, पर तूने घमंड चूर कर दिया। परालब्ध की बात है।

मुलिया तिनककर बोली—सारा मोह-छोह तुम्हीं को है कि और किसी को है? मैं तो किसी को तुम्हारी तरह बिसूरते नहीं देखती।

रग्घू ने ठंडी सॉँस खींचकर कहा—मुलिया, घाव पर नोन न छिड़क। तेरे ही कारन मेरी पीठ में धूल लग रही है। मुझे इस गृहस्थी का मोह न होगा, तो किसे होगा? मैंने ही तो इसे मर-मर जोड़ा। जिनको गोद में खेलाया, वहीं अब मेरे पट्टीदार होंगे। जिन बच्चों को मैं डॉँटता था, उन्हें आज कड़ी ऑंखों से भी नहीं देख सकता। मैं उनके भले के लिए भी कोई बात करुँ, तो दुनिया यही कहेगी कि यह अपने भाइयों को लूटे लेता है। जा मुझे छोड़ दे, अभी मुझसे कुछ न खाया जाएगा।

मुलिया—मैं कसम रखा दूँगी, नहीं चुपके से चले चलो।

रग्घू—देख, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अपना हठ छोड़ दे।

मुलिया—हमारा ही लहू पिए, जो खाने न उठे।

रग्घू ने कानों पर हाथ रखकर कहा—यह तूने क्या किया मुलिया? मैं तो उठ ही रहा था। चल खा लूँ। नहाने-धोने कौन जाए, लेकिन इतनी कहे देता हूँ कि चाहे चार की जगह छ: रोटियॉँ खा जाऊँ, चाहे तू मुझे घी के मटके ही में डुबा दे: पर यह दाग मेरे दिल से न मिटेगा।

मुलिया—दाग-साग सब मिट जाएगा। पहले सबको ऐसा ही लगता है। देखते नहीं हो, उधर कैसी चैन की वंशी बज रही है, वह तो मना ही रही थीं कि किसी तरह यह सब अलग हो जाऍं। अब वह पहले की-सी चॉँदी तो नहीं है कि जो कुछ घर में आवे, सब गायब! अब क्यों हमारे साथ रहने लगीं?

रग्घू ने आहत स्वर में कहा—इसी बात का तो मुझे गम है। काकी ने मुझे ऐसी आशा न थी।

रग्घू खाने बैठा, तो कौर विष के घूँट-सा लगता था। जान पड़ता था, रोटियॉँ भूसी की हैं। दाल पानी-सी लगती। पानी कंठ के नीचे न उतरता था, दूध की तरफ देखा तक नहीं। दो-चार ग्रास खाकर उठ आया, जैसे किसी प्रियजन के श्राद्ध का भोजन हो।

रात का भोजन भी उसने इसी तरह किया। भोजन क्या किया, कसम पूरी की। रात-भर उसका चित्त उद्विग्न रहा। एक अज्ञात शंका उसके मन पर छाई हुई थी, जेसे भोला महतो द्वार पर बैठा रो रहा हो। वह कई बार चौंककर उठा। ऐसा जान पड़ा, भोला उसकी ओर तिरस्कार की आँखों से देख रहा है।

वह दोनों जून भोजन करता था: पर जैसे शत्रु के घर। भोला की शोकमग्न मूर्ति ऑंखों से न उतरती थी। रात को उसे नींद न आती। वह गॉँव में निकलता, तो इस तरह मुँह चुराए, सिर झुकाए मानो गो-हत्या की हो।

7

पाँच साल गुजर गए। रग्घू अब दो लड़कों का बाप था। आँगन में दीवार खिंच गई थी, खेतों में मेड़ें डाल दी गई थीं और बैल-बछिए बॉँध लिये गए थे। केदार की उम्र अब उन्नीस की हो गई थी। उसने पढ़ना छोड़ दिया था और खेती का काम करता था। खुन्नू गाय चराता था। केवल लछमन अब तक मदरसे जाता था। पन्ना और मुलिया दोनों एक-दूसरे की सूरत से जलती थीं। मुलिया के दोनों लड़के बहुधा पन्ना ही के पास रहते। वहीं उन्हें उबटन मलती, वही काजल लगाती, वही गोद में लिये फिरती: मगर मुलिया के मुंह से अनुग्रह का एक शब्द भी न निकलता। न पन्ना ही इसकी इच्छुक थी। वह जो कुछ करती निर्व्याज भाव से करती थी। उसके दो-दो लड़के अब कमाऊ हो गए थे। लड़की खाना पका लेती थी। वह खुद ऊपर का काम-काज कर लेती। इसके विरुद्ध रग्घू अपने घर का अकेला था, वह भी दुर्बल, अशक्त और जवानी में बूढ़ा। अभी आयु तीस वर्ष से अधिक न थी, लेकिन बाल खिचड़ी हो गए थे। कमर भी झुक चली थी। खॉँसी ने जीर्ण कर रखा था। देखकर दया आती थी। और खेती पसीने की वस्तु है। खेती की जैसी सेवा होनी चाहिए, वह उससे न हो पाती। फिर अच्छी फसल कहॉँ से आती? कुछ ऋण भी हो गया था। वह चिंता और भी मारे डालती थी। चाहिए तो यह था कि अब उसे कुछ आराम मिलता। इतने दिनों के निरन्तर परिश्रम के बाद सिर का बोझ कुछ हल्का होता, लेकिन मुलिया की स्वार्थपरता और अदूरदर्शिता ने लहराती हुई खेती उजाड़ दी। अगर सब एक साथ रहते, तो वह अब तक पेन्शन पा जाता, मजे में द्वार पर बैठा हुआ नारियल पीता। भाई काम करते, वह सलाह देता। महतो बना फिरता। कहीं किसी के झगड़े चुकाता, कहीं साधु-संतों की सेवा करता: वह अवसर हाथ से निकल गया। अब तो चिंता-भार दिन-दिन बढ़ता जाता था।

आखिर उसे धीमा-धीमा ज्वर रहने लगा। हृदय-शूल, चिंता, कड़ा परिश्रम और अभाव का यही पुरस्कार है। पहले कुछ परवाह न की। समझा आप ही आप अच्छा हो जाएगा: मगर कमजोरी बढ़ने लगी, तो दवा की फिक्र हुई। जिसने जो बता दिया, खा लिया, डाक्टरों और वैद्यों के पास जाने की सामर्थ्य कहॉँ? और सामर्थ्य भी होती, तो रुपये खर्च कर देने के सिवा और नतीजा ही क्या था? जीर्ण ज्वर की औषधि आराम और पुष्टिकारक भोजन है। न वह बसंत-मालती का सेवन कर सकता था और न आराम से बैठकर बलबर्धक भोजन कर सकता था। कमजोरी बढ़ती ही गई।

पन्ना को अवसर मिलता, तो वह आकर उसे तसल्ली देती: लेकिन उसके लड़के अब रग्घू से बात भी न करते थे। दवा-दारु तो क्या करतें, उसका और मजाक उड़ाते। भैया समझते थे कि हम लोगों से अलग होकर सोने और ईट रख लेंगे। भाभी भी समझती थीं, सोने से लद जाऊँगी। अब देखें कौन पूछता है? सिसक-सिसककर न मरें तो कह देना। बहुत ‘हाय! हाय!’ भी अच्छी नहीं होती। आदमी उतना काम करे, जितना हो सके। यह नहीं कि रुपये के लिए जान दे दे।

पन्ना कहती—रग्घू बेचारे का कौन दोष है?

केदार कहता—चल, मैं खूब समझता हूँ। भैया की जगह मैं होता, तो डंडे से बात करता। मजाक थी कि औरत यों जिद करती। यह सब भैया की चाल थी। सब सधी-बधी बात थी।

आखिर एक दिन रग्घू का टिमटिमाता हुआ जीवन-दीपक बुझ गया। मौत ने सारी चिन्ताओं का अंत कर दिया।

अंत समय उसने केदार को बुलाया था: पर केदार को ऊख में पानी देना था। डरा, कहीं दवा के लिए न भेज दें। बहाना बना दिया।

8

मुलिया का जीवन अंधकारमय हो गया। जिस भूमि पर उसने मनसूबों की दीवार खड़ी की थी, वह नीचे से खिसक गई थी। जिस खूँटें के बल पर वह उछल रही थी, वह उखड़ गया था। गॉँववालों ने कहना शुरु किया, ईश्वर ने कैसा तत्काल दंड दिया। बेचारी मारे लाज के अपने दोनों बच्चों को लिये रोया करती। गॉँव में किसी को मुँह दिखाने का साहस न होता। प्रत्येक प्राणी उससे यह कहता हुआ मालूम होता था—‘मारे घमण्ड के धरती पर पॉँव न रखती थी: आखिर सजा मिल गई कि नहीं !’ अब इस घर में कैसे निर्वाह होगा? वह किसके सहारे रहेगी? किसके बल पर खेती होगी? बेचारा रग्घू बीमार था। दुर्बल था, पर जब तक जीता रहा, अपना काम करता रहा। मारे कमजोरी के कभी-कभी सिर पकड़कर बैठ जाता और जरा दम लेकर फिर हाथ चलाने लगता था। सारी खेती तहस-नहस हो रही थी, उसे कौन संभालेगा? अनाज की डॉँठें खलिहान में पड़ी थीं, ऊख अलग सूख रही थी। वह अकेली क्या-क्या करेगी? फिर सिंचाई अकेले आदमी का तो काम नहीं। तीन-तीन मजदूरों को कहॉँ से लाए! गॉँव में मजदूर थे ही कितने। आदमियों के लिए खींचा-तानी हो रही थी। क्या करें, क्या न करे।

इस तरह तेरह दिन बीत गए। क्रिया-कर्म से छुट्टी मिली। दूसरे ही दिन सवेरे मुलिया ने दोनों बालकों को गोद में उठाया और अनाज मॉँड़ने चली। खलिहान में पहुंचकर उसने एक को तो पेड़ के नीचे घास के नर्म बिस्तर पर सुला दिया और दूसरे को वहीं बैठाकर अनाज मॉँड़ने लगी। बैलों को हॉँकती थी और रोती थी। क्या इसीलिए भगवान् ने उसको जन्म दिया था? देखते-देखते क्या वे क्या हो गया? इन्हीं दिनों पिछले साल भी अनाज मॉँड़ा गया था। वह रग्घू के लिए लोटे में शरबत और मटर की घुँघी लेकर आई थी। आज कोई उसके आगे है, न पीछे: लेकिन किसी की लौंडी तो नहीं हूँ! उसे अलग होने का अब भी पछतावा न था।

एकाएक छोटे बच्चे का रोना सुनकर उसने उधर ताका, तो बड़ा लड़का उसे चुमकारकर कह रहा था—बैया तुप रहो, तुप रहो। धीरे-धीरे उसके मुंह पर हाथ फेरता था और चुप कराने के लिए विकल था। जब बच्चा किसी तरह न चुप न हुआ तो वह खुद उसके पास लेट गया और उसे छाती से लगाकर प्यार करने लगा: मगर जब यह प्रयत्न भी सफल न हुआ, तो वह रोने लगा।

उसी समय पन्ना दौड़ी आयी और छोटे बालक को गोद में उठाकर प्यार करती हुई बोली—लड़कों को मुझे क्यों न दे आयी बहू? हाय! हाय! बेचारा धरती पर पड़ा लोट रहा है। जब मैं मर जाऊँ तो जो चाहे करना, अभी तो जीती हूँ, अलग हो जाने से बच्चे तो नहीं अलग हो गए।

मुलिया ने कहा—तुम्हें भी तो छुट्टी नहीं थी अम्मॉँ, क्या करती?

पन्ना—तो तुझे यहॉँ आने की ऐसी क्या जल्दी थी? डॉँठ मॉँड़ न जाती। तीन-तीन लड़के तो हैं, और किसी दिन काम आऍंगे? केदार तो कल ही मॉँड़ने को कह रहा था: पर मैंने कहा, पहले ऊख में पानी दे लो, फिर आज मॉड़ना, मँड़ाई तो दस दिन बाद भ हो सकती है, ऊख की सिंचाई न हुई तो सूख जाएगी। कल से पानी चढ़ा हुआ है, परसों तक खेत पुर जाएगा। तब मँड़ाई हो जाएगी। तुझे विश्वास न आएगा, जब से भैया मरे हैं, केदार को बड़ी चिंता हो गई है। दिन में सौ-सौ बार पूछता है, भाभी बहुत रोती तो नहीं हैं? देख, लड़के भूखे तो नहीं हैं। कोई लड़का रोता है, तो दौड़ा आता है, देख अम्मॉँ, क्या हुआ, बच्चा क्यों रोता है? कल रोकर बोला—अम्मॉँ, मैं जानता कि भैया इतनी जल्दी चले जाऍंगे, तो उनकी कुछ सेवा कर लेता। कहॉँ जगाए-जगाए उठता था, अब देखती हो, पहर रात से उठकर काम में लग जाता है। खुन्नू कल जरा-सा बोला, पहले हम अपनी ऊख में पानी दे लेंगे, तब भैया की ऊख में देंगे। इस पर केदार ने ऐसा डॉँटा कि खुन्नू के मुँह से फिर बात न निकली। बोला, कैसी तुम्हारी और कैसी हमारी ऊख? भैया ने जिला न लिया होता, तो आज या तो मर गए होते या कहीं भीख मॉँगते होते। आज तुम बड़े ऊखवाले बने हो! यह उन्हीं का पुन- परताप है कि आज भले आदमी बने बैठे हो। परसों रोटी खाने को बुलाने गई, तो मँड़ैया में बैठा रो रहा था। पूछा, क्यों रोता है? तो बोला, अम्मॉँ, भैया इसी ‘अलग्योझ’ के दुख से मर गए, नहीं अभी उनकी उमिर ही क्या थी! यह उस वक्त न सूझा, नहीं उनसे क्यों बिगाड़ करते?

यह कहकर पन्ना ने मुलिया की ओर संकेतपूर्ण दृष्टि से देखकर कहा—तुम्हें वह अलग न रहने देगा बहू, कहता है, भैया हमारे लिए मर गए तो हम भी उनके बाल-बच्चों के लिए मर जाऍंगे।

मुलिया की आंखों से ऑंसू जारी थे। पन्ना की बातों में आज सच्ची वेदना, सच्ची सान्त्वना, सच्ची चिन्ता भरी हुई थी। मुलिया का मन कभी उसकी ओर इतना आकर्षित न हुआ था। जिनसे उसे व्यंग्य और प्रतिकार का भय था, वे इतने दयालु, इतने शुभेच्छु हो गए थे।

आज पहली बार उसे अपनी स्वार्थपरता पर लज्जा आई। पहली बार आत्मा ने अलग्योझे पर धिक्कारा।

9

इस घटना को हुए पॉँच साल गुजर गए। पन्ना आज बूढ़ी हो गई है। केदार घर का मालिक है। मुलिया घर की मालकिन है। खुन्नू और लछमन के विवाह हो चुके हैं: मगर केदार अभी तक क्वॉँरा है। कहता हैं— मैं विवाह न करुँगा। कई जगहों से बातचीत हुई, कई सगाइयॉँ आयीं: पर उसे हामी न भरी। पन्ना ने कम्पे लगाए, जाल फैलाए, पर व न फँसा। कहता—औरतों से कौन सुख? मेहरिया घर में आयी और आदमी का मिजाज बदला। फिर जो कुछ है, वह मेहरिया है। मॉँ-बाप, भाई-बन्धु सब पराए हैं। जब भैया जैसे आदमी का मिजाज बदल गया, तो फिर दूसरों की क्या गिनती? दो लड़के भगवान् के दिये हैं और क्या चाहिए। बिना ब्याह किए दो बेटे मिल गए, इससे बढ़कर और क्या होगा? जिसे अपना समझो, व अपना है: जिसे गैर समझो, वह गैर है।

एक दिन पन्ना ने कहा—तेरा वंश कैसे चलेगा?

केदार—मेरा वंश तो चल रहा है। दोनों लड़कों को अपना ही समझता हूं।

पन्ना—समझने ही पर है, तो तू मुलिया को भी अपनी मेहरिया समझता होगा?

केदार ने झेंपते हुए कहा—तुम तो गाली देती हो अम्मॉँ!

पन्ना—गाली कैसी, तेरी भाभी ही तो है!

केदार—मेरे जेसे लट्ठ-गँवार को वह क्यों पूछने लगी!

पन्ना—तू करने को कह, तो मैं उससे पूछूँ?

केदार—नहीं मेरी अम्मॉँ, कहीं रोने-गाने न लगे। पन्ना—तेरा मन हो, तो मैं बातों-बातों में उसके मन की थाह लूँ?

केदार—मैं नहीं जानता, जो चाहे कर।

पन्ना केदार के मन की बात समझ गई। लड़के का दिल मुलिया पर आया हुआ है: पर संकोच और भय के मारे कुछ नहीं कहता।

उसी दिन उसने मुलिया से कहा—क्या करुँ बहू, मन की लालसा मन में ही रह जाती है। केदार का घर भी बस जाता, तो मैं निश्चिन्त हो जाती।

मुलिया—वह तो करने को ही नहीं कहते।

पन्ना—कहता है, ऐसी औरत मिले, जो घर में मेल से रहे, तो कर लूँ।

मुलिया—ऐसी औरत कहॉँ मिलेगी? कहीं ढूँढ़ो।

पन्ना—मैंने तो ढूँढ़ लिया है।

मुलिया—सच, किस गॉँव की है?

पन्ना—अभी न बताऊँगी, मुदा यह जानती हूँ कि उससे केदार की सगाई हो जाए, तो घर बन जाए और केदार की जिन्दगी भी सुफल हो जाए। न जाने लड़की मानेगी कि नहीं।

मुलिया—मानेगी क्यों नहीं अम्मॉँ, ऐसा सुन्दर कमाऊ, सुशील वर और कहॉँ मिला जाता है? उस जनम का कोई साधु-महात्मा है, नहीं तो लड़ाई-झगड़े के डर से कौन बिन ब्याहा रहता है। कहॉँ रहती है, मैं जाकर उसे मना लाऊँगी।

पन्ना—तू चाहे, तो उसे मना ले। तेरे ही ऊपर है।

मुलिया—मैं आज ही चली जाऊँगी, अम्मा, उसके पैरों पड़कर मना लाऊँगी।

पन्ना—बता दूँ, वह तू ही है!

मुलिया लजाकर बोली—तुम तो अम्मॉँजी, गाली देती हो।

पन्ना—गाली कैसी, देवर ही तो है!

मुलिया—मुझ जैसी बुढ़िया को वह क्यों पूछेंगे?

पन्ना—वह तुझी पर दॉँत लगाए बैठा है। तेरे सिवा कोई और उसे भाती ही नहीं। डर के मारे कहता नहीं: पर उसके मन की बात मैं जानती हूँ।

वैधव्य के शौक से मुरझाया हुआ मुलिया का पीत वदन कमल की भॉँति अरुण हो उठा। दस वर्षो में जो कुछ खोया था, वह इसी एक क्षण में मानों ब्याज के साथ मिल गया। वही लवण्य, वही विकास, वहीं आकर्षण, वहीं लोच।

अमृत – मुंशी प्रेमचंद

Amrit -Munshi Premchand

मेरी उठती जवानी थी जब मेरा दिल दर्द के मजे से परिचित हुआ। कुछ दिनों तक शायरी का अभ्यास करता रहा और धीर-धीरे इस शौक ने तल्लीनता का रुप ले लिया। सांसारिक संबंधो से मुंह मोड़कर अपनी शायरी की दुनिया में आ बैठा और तीन ही साल की मश्क़ ने मेरी कल्पना के जौहर खोल दिये। कभी-कभी मेरी शायरी उस्तादों के मशहूर कलाम से टक्कर खा जाती थी। मेरे क़लम ने किसी उस्ताद के सामने सर नहीं झुकाया। मेरी कल्पना एक अपने-आप बढ़ने वाले पौधे की तरह छंद और पिंगल की क़ैदो से आजाद बढ़ती रही और ऐसे कलाम का ढंग निराला था। मैंने अपनी शायरी को फारस से बाहर निकाल कर योरोप तक पहुँचा दिया। यह मेरा अपना रंग था। इस मैदान में न मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी था, न बराबरी करने वाला बावजूद इस शायरों जैसी तल्लीनता के मुझे मुशायरों की वाह-वाह और सुभानअल्लाह से नफ़रत थी। हां, काव्य-रसिकों से बिना अपना नाम बताये हुए अक्सर अपनी शायरी की अच्छाइयों और बुराइयों पर बहस किया करता। तो मुझे शायरी का दावा न था मगर धीरे-धीरे मेरी शोहरत होने लगी और जब मेरी मसनवी ‘दुनियाए हुस्न’ प्रकाशित हुई तो साहित्य की दुनिया में हल-चल-सी मच गयी। पुराने शायरों ने काव्य-मर्मज्ञों की प्रशंसा-कृपणता में पोथे के पोथे रंग दिये हैं मगर मेरा अनुभव इसके बिलकुल विपरीत था । मुझे कभी-कभी यह ख़याल सताया करता कि मेरे कद्रदानों की यह उदारता दूसरे कवियों की लेखनी की दरिद्रता का प्रमाण है। यह ख़याल हौसला तोउ़ने वाला था। बहरहाल, जो कुछ हुआ, ‘दुनियाए हुस्न’ ने मुझे शायरी का बादशाह बना दिया। मेरा नाम हरेक ज़बान पर था। मेरी चर्चा हर एक अखबार में थी। शोहरत अपने साथ दौलत भी लायी। मुझे दिन-रात शेरो-शायरी के अलावा और कोई काम न था। अक्सर बैठे-बैठे रातें गुज़र जातीं और जब कोई चुभता हुआ शेर कलम से निकल जाता तो मैं खुशी के मारे उछल पड़ता। मैं अब तक शादी-ब्याह की कैंदों से आजाद़ था या यों कहिए कि मैं उसके उन मजों से अपरिचित था जिनमें रंज की तल्खी भी है और खुशी की नमकीनी भी। अक्सर पश्चिमी साहित्यकारों की तरह मेरा भी ख्याल था कि साहित्य के उन्माद और सौन्दर्य के उन्माद में पुराना बैर है। मुझे अपनी जबान से कहते हुए शर्मिन्दा होना पड़ता है कि मुझे अपनी तबियत पर भरोसा न था। जब कभी मेरी आँखों में कोई मोहिनी सूरत घूम जाती तो मेरे दिल-दिमाग पर एक पागलपन-सा छा जाता। हफ्तों तक अपने को भूला हुआ-सा रहता। लिखने की तरफ तबियत किसी तरह न झुकती। ऐसे कमजोर दिल में सिर्फ एक इश्क की जगह थी। इसी डर से मैं अपनी रंगीन ततिबयत के खिलाफ आचरण शुद्ध रखने पर मजबूर था। कमल की एक पंखुड़ी, श्यामा के एक गीत, लहलहाते हुए एक मैदान में मेरे लिए जादू का-सा आकर्षण था मगर किसी औरत के दिलफ़रेब हुस्न को मैं चित्रकार या मूर्तिकार की बैलौस ऑंखों से नहीं देख सकता था। सुंदर स्त्री मेरे लिए एक रंगीन, क़ातिल नागिन थी जिसे देखकर ऑंखें खुश होती हैं मगर दिल डर से सिमट जाता है।

खैर, ‘दुनियाए हुस्न’ को प्रकाशित हुए दो साल गुजर चुके थे। मेरी ख्याति बरसात की उमड़ी हुई नदी की तरह बढ़ती चली जाती थी। ऐसा मालूम होता था जैसे मैंने साहित्य की दुनिया पर कोई वशीकरण कर दिया है। इसी दौरान मैंने फुटकर शेर तो बहुत कहे मगर दावतों और अभिनंदनपत्रों की भीड़ ने मार्मिक भावों को उभरने न दिया। प्रदर्शन और ख्याति एक राजनीतिज्ञ के लिए कोड़े का काम दे सकते हैं, मगर शायर की तबियत अकेले शांति से एक कोने के बैठकर ही अपना जौहर दिखालाती है। चुनांचे मैं इन रोज-ब-रोज बढ़ती हुई बेहूदा बातों से गला छुड़ा कर भागा और पहाड़ के एक कोने में जा छिपा। ‘नैरंग’ ने वहीं जन्म लिया।

नैरंग’ के शुरु करते हुए ही मुझे एक आश्चर्यजनक और दिल तोड़ने वाला अनुभव हुआ। ईश्वर जाने क्यों मेरी अक्ल और मेरे चिंतन पर पर्दा पड़ गया। घंटों तबियत पर जोर डालता मगर एक शेर भी ऐसा न निकलता कि दिल फड़के उठे। सूझते भी तो दरिद्र, पिटे हुए विषय, जिनसे मेरी आत्मा भागती थी। मैं अक्सर झुझलाकर उठ बैठता, कागज फाड़ डालता और बड़ी बेदिली की हालत में सोचने लगता कि क्या मेरी काव्यशक्ति का अंत हो गया, क्या मैंने वह खजाना जो प्रकृति ने मुझे सारी उम्र के लिए दिया था, इतनी जल्दी मिटा दिया। कहां वह हालत थी कि विषयों की बहुतायत और नाजुक खयालों की रवानी क़लम को दम नहीं लेने देती थी। कल्पना का पंछी उड़ता तो आसमान का तारा बन जाता था और कहां अब यह पस्ती! यह करुण दरिद्रता! मगर इसका कारण क्या है? यह किस क़सूर की सज़ा है। कारण और कार्य का दूसरा नाम दुनिया है। जब तक हमको क्यों का जवाब न मिले, दिल को किसी तरह सब्र नहीं होता, यहां तक कि मौत को भी इस क्यों का जवाब देना पड़ता है। आखिर मैंने एक डाक्टर से सलाह ली। उसने आम डाक्टरों की तरह आब-हवा बदलने की सलाह दी। मेरी अक्ल में भी यह बात आयी कि मुमकिन है नैनीताल की ठंडी आब-हवा से शायरी की आग ठंडी पड़ गई हो। छ: महीने तक लगातार घूमता-फिरता रहा। अनेक आकर्षक दृश्य देखे, मगर उनसे आत्मा पर वह शायराना कैफियत न छाती थी कि प्याला छलक पड़े और खामोश कल्पना खुद ब खुद चहकने लगे। मुझे अपना खोया हुआ लाल न मिला। अब मैं जिंदगी से तंग था। जिंदगी अब मुझे सूखे रेगिस्तान जैसी मालूम होती जहां कोई जान नहीं, ताज़गी नहीं, दिलचस्पी नहीं। हरदम दिल पर एक मायूसी-सी छायी रहती और दिल खोया-खोया रहता। दिल में यह सवाल पैदा होता कि क्या वह चार दिन की चांदनी खत्म हो गयी और अंधेरा पाख आ गया? आदमी की संगत से बेजार, हमजिंस की सूरत से नफरत, मैं एक गुमनाम कोने में पड़ा हुआ जिंदगी के दिन पूरे कर रहा था। पेड़ों की चोटियों पर बैठने वाली, मीठे राग गाने वाली चिड़िया क्या पिंजरे में ज़िंदा रह सकती हैं? मुमकिन है कि वह दाना खाये, पानी पिये मगर उसकी इस जिंदगी और मौत में कोई फर्क नहीं है।

आखिर जब मुझे अपनी शायरी के लौटने की कोई उम्मीद नहीं रही, तो मेरे दिल में यह इरादा पक्का हो गया कि अब मेरे लिए शायरी की दुनिया से मर जाना ही बेहतर होगा। मुर्दा तो हूँ ही, इस हालत में अपने को जिंदा समझना बेवकूफी है। आखिर मैने एक रोज कुछ दैनिक पत्रों का अपने मरने की खबर दे दी। उसके छपते ही मुल्क में कोहराम मच गया, एक तहलका पड़ गया। उस वक्त मुझे अपनी लोकप्रियता का कुछ अंदाजा हुआ। यह आम पुकार थी, कि शायरी की दुनिया की किस्ती मंझधार में डूब गयी। शायरी की महफिल उखड़ गयी। पत्र-पत्रिकाओं में मेरे जीवन-चरित्र प्रकाशित हुए जिनको पढ़ कर मुझे उनके एडीटरों की आविष्कार-बुद्धि का क़ायल होना पड़ा। न तो मैं किसी रईस का बेटा था और न मैंने रईसी की मसनद छोड़कर फकीरी अख्तियार की थी। उनकी कल्पना वास्तविकता पर छा गयी थी। मेरे मित्रों में एक साहब ने, जिन्हे मुझसे आत्मीयता का दावा था, मुझे पीने-पिलाने का प्रेमी बना दिया था। वह जब कभी मुझसे मिलते, उन्हें मेरी आखें नशे से लाल नजर आतीं। अगरचे इसी लेख में आगे चलकर उन्होनें मेरी इस बुरी आदत की बहुत हृदयता से सफाई दी थी क्योंकि रुखा-सूखा आदमी ऐसी मस्ती के शेर नहीं कह सकता था। ताहम हैरत है कि उन्हें यह सरीहन गलत बात कहने की हिम्मत कैसे हुई।

खैर, इन गलत-बयानियों की तो मुझे परवाह न थी। अलबत्ता यह बड़ी फिक्र थी, फिक्र नहीं एक प्रबल जिज्ञासा थी, कि मेरी शायरी पर लोगों की जबान से क्या फतवा निकलता है। हमारी जिंदगी के कारनामे की सच्ची दाद मरने के बाद ही मिलती है क्योंकि उस वक्त वह खुशामद और बुराइयों से पाक-साफ होती हैं। मरने वाले की खुशी या रंज की कौन परवाह करता है। इसीलिए मेरी कविता पर जितनी आलोचनाऍं निकली हैं उसको मैंने बहुत ही ठंडे दिल से पढ़ना शुरु किया। मगर कविता को समझने वाली दृष्टि की व्यापकता और उसके मर्म को समझने वाली रुचि का चारों तरफ अकाल-सा मालूम होता था। अधिकांश जौहरियों ने एक-एक शेर को लेकर उनसे बहस की थी, और इसमें शक नहीं कि वे पाठक की हैसियत से उस शेर के पहलुओं को खूब समझते थे। मगर आलोचक का कहीं पता न था। नजर की गहराई गायब थी। समग्र कविता पर निगाह डालने वाला कवि, गहरे भावों तक पहुँचने वाला कोई आलोचक दिखाई न दिया।

एक रोज़ मैं प्रेतों की दुनिया से निकलकर घूमता हुआ अजमेर की पब्लिक लाइब्रेरी में जा पहुँचा। दोपहर का वक्त था। मैंने मेज पर झुककर देखा कि कोई नयी रचना हाथ आ जाये तो दिल बहलाऊँ। यकायक मेरी निगाह एक सुंदर पत्र की तरफ गयी जिसका नाम था ‘कलामें अख्तर’। जैसे भोला बच्चा खिलौने कि तरफ लपकता है उसी तरह झपटकर मैंने उस किताब को उठा लिया। उसकी लेखिका मिस आयशा आरिफ़ थीं। दिलचस्पी और भी ज्यादा हुई। मैं इत्मीनान से बैठकर उस किताब को पढ़ने लगा। एक ही पन्ना पढ़ने के बाद दिलचस्पी ने बेताबी की सूरत अख्तियार की। फिर तो मैं बेसुधी की दुनिया में पहुँच गया। मेरे सामने गोया सूक्ष्म अर्थो की एक नदी लहरें मार रही थी। कल्पना की उठान, रुचि की स्वच्छता, भाषा की नर्मी। काव्य-दृष्टि ऐसी थी कि हृदय धन्य-धन्य हो उठता था। मैं एक पैराग्राफ पढ़ता, फिर विचार की ताज़गी से प्रभावित होकर एक लंबी सॉँस लेता और तब सोचने लगता, इस किताब को सरसरी तौर पर पढ़ना असम्भव था। यह औरत थी या सुरुचि की देवी। उसके इशारों से मेरा कलाम बहुत कम बचा था मगर जहां उसने मुझे दाद दी थी वहां सच्चाई के मोती बरसा दिये थे। उसके एतराजों में हमदर्दी और प्रशंसा में भक्ति था। शायर के कलाम को दोषों की दृष्टियों से नहीं देखना चाहिये। उसने क्या नहीं किया, यह ठीक कसौटी नहीं। बस यही जी चाहता था कि लेखिका के हाथ और कलम चूम लूँ। ‘सफ़ीर’ भोपाल के दफ्तर से एक पत्रिका प्रकाशित हुई थी। मेरा पक्का इरादा हो गया, तीसरे दिन शाम के वक्त मैं मिस आयशा के खूबसूरत बंगले के सामने हरी-हरी घास पर टहल रहा था। मैं नौकरानी के साथ एक कमरे में दाखिल हुआ। उसकी सजावट बहुत सादी थी। पहली चीज़ पर निगाहें पड़ीं वह मेरी तस्वीर थी जो दीवार पर लटक रही थी। सामने एक आइना रखा हुआ था। मैंने खुदा जाने क्यों उसमें अपनी सूरत देखी। मेरा चेहरा पीला और कुम्हलाया हुआ था, बाल उलझे हुए, कपड़ों पर गर्द की एक मोटी तह जमी हुई, परेशानी की जिंदा तस्वीर थी।

उस वक्त मुझे अपनी बुरी शक्ल पर सख्त शर्मिंदगी हुई। मैं सुंदर न सही मगर इस वक्त तो सचमुच चेहरे पर फटकार बरस रही थी। अपने लिबास के ठीक होने का यकीन हमें खुशी देता है। अपने फुहड़पन का जिस्म पर इतना असर नहीं होता जितना दिल पर। हम बुजदिल और बेहौसला हो जाते हैं।

मुझे मुश्किल से पांच मिनट गुजरे होंगे कि मिस आयशा तशरीफ़ लायीं। सांवला रंग था, चेहरा एक गंभीर घुलावट से चमक रहा था। बड़ी-बड़ी नरगिसी आंखों से सदाचार की, संस्कृति की रोशनी झलकती थी। क़द मझोले से कुछ कम। अंग-प्रत्यंग छरहरे, सुथरे, ऐसे हल्की-फुल्की कि जैसे प्रकृति ने उसे इस भौतिक संसार के लिए नहीं, किसी काल्पनिक संसार के लिए सिरजा है। कोई चित्रकार कला की उससे अच्छी तस्वीर नही खींच सकता था।

मिस आयशा ने मेरी तरफ दबी निगाहों से देखा मगर देखते-देखते उसकी गर्दन झुक गयी और उसके गालों पर लाज की एक हल्की-परछाईं नाचती हुई मालूम हुई। जमीन से उठकर उसकी ऑंखें मेरी तस्वीर की तरफ गयीं और फिर सामने पर्दे की तरफ जा पहुँचीं। शायद उसकी आड़ में छिपना चाहती थीं।

मिस आयशा ने मेरी तरफ दबी निगाहों से देखकर पूछा—आप स्वर्गीय अख्तर के दोस्तों में से हैं?

मैंने सिर नीचा किये हुए जवाब दिया–मैं ही बदनसीब अख्तर हूँ।

आयशा एक बेखुदी के आलम में कुर्सी पर से खड़ी हुई और मेरी तरफ हैरत से देखकर बोलीं—‘दुनियाए हुस्न’ के लिखने वाले?

अंधविश्वास के सिवा और किसने इस दुनिया से चले जानेवाले को देखा है? आयशा ने मेरी तरफ कई बार शक से भरी निगाहों से देखा। उनमें अब शर्म और हया की जगह के बजाय हैरत समायी हुई थी। मेरे कब्र से निकलकर भागने का तो उसे यकीन आ ही नहीं सकता था, शायद वह मुझे दीवाना समझ रही थी। उसने दिल में फैसला किया कि इस आदमी मरहूम शायर का कोई क़रीबी अजीज है। शकल जिस तरह मिल रही थी वह दोनों के एक खानदान के होने का सबूत थी। मुमकिन है कि भाई हो। वह अचानक सदमे से पागल हो गया है। शायद उसने मेरी किताब देखी होगी ओर हाल पूछने के लिए चला आया। अचानक उसे ख़याल गुजरा कि किसी ने अखबारों को मेरे मरने की झूठी खबर दे दी हो और मुझे उस खबर को काटने का मौका न मिला हो। इस ख़याल से उसकी उलझन दूर हुई, बोली—अखबारों में आपके बारे में एक निहायत मनहूस खबर छप गयी थी? मैंने जवाब दिया—वह खबर सही थी।

अगर पहले आयशा को मेरे दिवानेपन में कुछ था तो वह दूर हो गया। आखिर मैने थोड़े लफ़्जो में अपनी दास्तान सुनायी और जब उसको यकीन हो गया कि ‘दुनियाए हुस्न’ का लिखनेवाला अख्तर अपने इन्सानी चोले में है तो उसके चेहरे पर खुशी की एक हल्की सुर्खी दिखायी दी और यह हल्का रंग बहुत जल्द खुददारी और रुप-गर्व के शोख रंग से मिलकर कुछ का कुछ हो गया। ग़ालिबन वह शर्मिंदा थी कि क्यों उसने अपनी क़द्रदानी को हद से बाहर जाने दिया। कुछ देर की शर्मीली खामोशी के बाद उसने कहा—मुझे अफसोस है कि आपको ऐसी मनहूस खबर निकालने की जरुरत हुई।

मैंने जोश में भरकर जवाब दिया—आपके क़लम की जबान से दाद पाने की कोई सूरत न थी। इस तनक़ीद के लिए मैं ऐसी-ऐसी कई मौते मर सकता था।

मेरे इस बेधड़क अंदाज ने आयशा की जबान को भी शिष्टाचार और संकोच की क़ैद से आज़ाद किया, मुस्कराकर बोली—मुझे बनावट पसंद नहीं है। डाक्टरों ने कुछ बतलाया नहीं? उसकी इस मुस्कराहट ने मुझे दिल्लगी करने पर आमादा किया, बोला—अब मसीहा के सिवा इस मर्ज का इलाज और किसी के हाथ नहीं हो सकता।

आयशा इशारा समझ गई, हँसकर बोली—मसीहा चौथे आसमान पर रहते हैं।

मेरी हिम्मत ने अब और कदम बढ़ाये—रुहों की दुनिया से चौथा आसमान बहुत दूर नहीं है।

आयशा के खिले हुए चेहरे से संजीदगी और अजनबियत का हल्का रंग उड़ गया। ताहम, मेरे इन बेधड़क इशारों को हद से बढ़ते देखकर उसे मेरी जबान पर रोक लगाने के लिए किसी क़दर खुददारी बरतनी पड़ी। जब मैं कोई घंटे-भर के बाद उस कमरे से निकला तो बजाय इसके कि वह मेरी तरफ अपनी अंग्रेजी तहज़ीब के मुताबिक हाथ बढ़ाये उसने चोरी-चोरी मेरी तरफ देखा। फैला हुआ पानी जब सिमटकर किसी जगह से निकलता है तो उसका बहाव तेज़ और ताक़त कई गुना ज्यादा हो जाती है आयशा की उन निगाहों में अस्मत की तासीर थी। उनमें दिल मुस्कराता था और जज्बा नाजता था। आह, उनमें मेरे लिए दावत का एक पुरजोर पैग़ाम भरा हुआ था। जब मैं मुस्लिम होटल में पहुँचकर इन वाक़यात पर गौर करने लगा तो मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि गो मैं ऊपर से देखने पर यहां अब तक अपरिचित था लेकिन भीतरी तौर पर शायद मैं उसके दिल के कोने तक पहुँच चुका था।

जब मैं खाना खाकर पलंग पर लेटा तो बावजूद दो दिन रात-रात-भर जागने के नींद आंखों से कोसों दूर थी। जज्बात की कशमकश में नींद कहॉँ। आयशा की सूरत, उसकी खातिरदारियॉँ और उसकी वह छिपी-छिपी निगाह दिल में एकसासों का तूफान-सा बरपा रही थी उस आखिरी निगाह ने दिल में तमन्नाओं की रुम-धूम मचा दी। वह आरजुएं जो, बहुत अरसा हुआ, मर मिटी थीं फिर जाग उठीं और आरजुओं के साथ कल्पना ने भी मुंदी हुई आंखे खोल दीं। दिल में जज्ब़ात और कैफ़ियात का एक बेचैन करनेवाला जोश महसूस हुआ। यही आरजुएं, यही बेचैनिया और यही कोशिशें कल्पना के दीपक के लिए तेल हैं। जज्बात की हरारत ने कल्पना को गरमाया। मैं क़लम लेकर बैठ गया और एक ऐसी नज़म लिखी जिसे मैं अपनी सबसे शानदार दौलत समझता हूँ।

मैं एक होटल मे रह रहा था, मगर किसी-न-किसी हीले से दिन में कम-से-कम एक बार जरुर उसके दर्शन का आनंद उठाता । गो आयशा ने कभी मेरे यहॉँ तक आने की तकलीफ नहीं की तो भी मुझे यह यकीन करने के लिए शहादतों की जरुरत न थीकि वहॉँ किस क़दर सरगर्मी से मेरा इंतजार किया जाता था, मेरे क़दमो की पहचानी हुई आहटे पाते ही उसका चेहरा कैसे कमल की तरह खिल जाता था और आंखों से कामना की किरणें निकलने लगती थीं। यहां छ: महीने गुजर गये। इस जमाने को मेरी जिंदगी की बहार समझना चाहिये। मुझे वह दिन भी याद है जब मैं आरजुओं और हसरतों के ग़म से आजाद था। मगर दरिया की शांतिपूर्ण रवानी में थिरकती हुई लहरों की बहार कहां, अब अगर मुहब्बत का दर्द था तो उसका प्राणदायी मज़ा भी था। अगर आरजुओं की घुलावट थी तो उनकी उमंग भी थी। आह, मेरी यह प्यासी आंखें उस रुप के स्रोत से किसी तरह तप्त न होंती। जब मैं अपनी नशें में डूबी हुई आंखो से उसे देखता तो मुझे एक आत्मिक तरावट-सी महसूस होती। मैं उसके दीदार के नशे से बेसुध-सा हो जाता और मेरी रचना-शक्ति का तो कुछ हद-हिसाब न था। ऐसा मालूम होता था कि जैसे दिल में मीठे भावों का सोता खुल गया था। अपनी कवित्व शक्ति पर खुद अचम्भा होता था। क़लम हाथ में ली और रचना का सोता-सा बह निकला। ‘नैरंग’ में ऊँची कल्पनाऍं न हो, बड़ी गूढ़ बातें न हों, मगर उसका एक-एक शेर प्रवाह और रस, गर्मी और घुलावट की दाद दे रहा है। यह उस दीपक का वरदान है, जो अब मेरे दिल में जल गया था और रोशनी दे रहा था। यह उस फुल की महक थी जो मेरे दिल में खिला हुआ था। मुहब्बत रुह की खुराक है। यह अमृत की बूंद है जो मरे हुए भावों को जिंदा कर देती है। मुहब्बत आत्मिक वरदान है। यह जिंदगी की सबसे पाक, सबसे ऊँची, मुबारक बरक़त है। यही अक्सीर थी जिसकी अनजाने ही मुझे तलाश थी। वह रात कभी नहीं भूलेगी जब आयशा दुल्हन बनी हुई मेरे घर में आयी। ‘नैरंग’ उसकी मुबारक जिंदगी की यादगार है। ‘दुनियाए हुस्न’ एक कली थी, ‘नैरंग’ खिला हुआ फूल है और उस कली को खिलाने वाली कौन-सी चीज है? वही जिसकी मुझे अनजाने ही तलाश थी और जिसे मैं अब पा गया था।

अनाथ लड़की

Anaath Ladki

सेठ पुरुषोत्तमदास पूना की सरस्वती पाठशाला का मुआयना करने के बाद बाहर निकले तो एक लड़की ने दौड़कर

उनका दामन पकड़ लिया। सेठ जी रुक गये और मुहब्बत से उसकी तरफ देखकर पूछा—क्या नाम है?

लड़की ने जवाब दिया—रोहिणी।

सेठ जी ने उसे गोद में उठा लिया और बोले—तुम्हें कुछ इनाम मिला?

लड़की ने उनकी तरफ बच्चों जैसी गंभीरता से देखकर कहा—तुम चले जाते हो, मुझे रोना आता है, मुझे भी साथ लेते चलो।

सेठजी ने हँसकर कहा—मुझे बड़ी दूर जाना है, तुम कैसे चालोगी?

रोहिणी ने प्यार से उनकी गर्दन में हाथ डाल दिये और बोली—जहॉँ तुम जाओगे वहीं मैं भी चलूँगी। मैं तुम्हारी बेटी हूँगी।

मदरसे के अफसर ने आगे बढ़कर कहा—इसका बाप साल भर हुआ नही रहा। मॉँ कपड़े सीती है, बड़ी मुश्किल से गुजर होती है।

सेठ जी के स्वभाव में करुणा बहुत थी। यह सुनकर उनकी आँखें भर आयीं। उस भोली प्रार्थना में वह दर्द था जो पत्थर-से दिल को पिघला सकता है। बेकसी और यतीमी को इससे ज्यादा दर्दनाक ढंग से जाहिर करना नामुमकिन था। उन्होंने सोचा—इस नन्हें-से दिल में न जाने क्या अरमान होंगे। और लड़कियॉँ अपने खिलौने दिखाकर कहती होंगी, यह मेरे बाप ने दिया है। वह अपने बाप के साथ मदरसे आती होंगी, उसके साथ मेलों में जाती होंगी और उनकी दिलचस्पियों का जिक्र करती होंगी। यह सब बातें सुन-सुनकर इस भोली लड़की को भी ख्वाहिश होती होगी कि मेरे बाप होता। मॉँ की मुहब्बत में गहराई और आत्मिकता होती है जिसे बच्चे समझ नहीं सकते। बाप की मुहब्बत में खुशी और चाव होता है जिसे बच्चे खूब समझते हैं।

सेठ जी ने रोहिणी को प्यार से गले लगा लिया और बोले—अच्छा, मैं तुम्हें अपनी बेटी बनाऊँगा। लेकिन खूब जी लगाकर पढ़ना। अब छुट्टी का वक्त आ गया है, मेरे साथ आओ, तुम्हारे घर पहुँचा दूँ।

यह कहकर उन्होंने रोहिणी को अपनी मोटरकार में बिठा लिया। रोहिणी ने बड़े इत्मीनान और गर्व से अपनी सहेलियों की तरफ देखा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें खुशी से चमक रही थीं और चेहरा चॉँदनी रात की तरह खिला हुआ था।

सेठ ने रोहिणी को बाजार की खूब सैर करायी और कुछ उसकी पसन्द से, कुछ अपनी पसन्द से बहुत-सी चीजें खरीदीं, यहॉँ तक कि रोहिणी बातें करते-करते कुछ थक-सी गयी और खामोश हो गई। उसने इतनी चीजें देखीं और इतनी बातें सुनीं कि उसका जी भर गया। शाम होते-होते रोहिणी के घर पहुँचे और मोटरकार से उतरकर रोहिणी को अब कुछ आराम मिला। दरवाजा बन्द था। उसकी मॉँ किसी ग्राहक के घर कपड़े देने गयी थी। रोहिणी ने अपने तोहफों को उलटना-पलटना शुरू किया—खूबसूरत रबड़ के खिलौने, चीनी की गुड़िया जरा दबाने से चूँ-चूँ करने लगतीं और रोहिणी यह प्यारा संगीत सुनकर फूली न समाती थी। रेशमी कपड़े और रंग-बिरंगी साड़ियों की कई बण्डल थे लेकिन मखमली बूटे की गुलकारियों ने उसे खूब लुभाया था। उसे उन चीजों के पाने की जितनी खुशी थी, उससे ज्यादा उन्हें अपनी सहेलियों को दिखाने की बेचैनी थी। सुन्दरी के जूते अच्छे सही लेकिन उनमें ऐसे फूल कहॉँ हैं। ऐसी गुड़िया उसने कभी देखी भी न होंगी। इन खयालों से उसके दिल में उमंग भर आयी और वह अपनी मोहिनी आवाज में एक गीत गाने लगी। सेठ जी दरवाजे पर खड़े इन पवित्र दृश्य का हार्दिक आनन्द उठा रहे थे। इतने में रोहिणी की मॉँ रुक्मिणी कपड़ों की एक पोटली लिये हुए आती दिखायी दी। रोहिणी ने खुशी से पागल होकर एक छलॉँग भरी और उसके पैरों से लिपट गयी। रुक्मिणी का चेहरा पीला था, आँखों में हसरत और बेकसी छिपी हुई थी, गुप्त चिंता का सजीव चित्र मालूम होती थी, जिसके लिए जिंदगी में कोई सहारा नहीं।

मगर रोहिणी को जब उसने गोद में उठाकर प्यार से चूमा तो जरा देर के लिए उसकी ऑंखों में उन्मीद और जिंदगी की झलक दिखायी दी। मुरझाया हुआ फूल खिल गया। बोली—आज तू इतनी देर तक कहॉँ रही, मैं तुझे ढूँढ़ने पाठशाला गयी थी।

रोहिणी ने हुमककर कहा—मैं मोटरकार पर बैठकर बाजार गयी थी। वहॉँ से बहुत अच्छी-अच्छी चीजें लायी हूँ। वह देखो कौन खड़ा है?

मॉँ ने सेठ जी की तरफ ताका और लजाकर सिर झुका लिया।

बरामदे में पहुँचते ही रोहिणी मॉँ की गोद से उतरकर सेठजी के पास गयी और अपनी मॉँ को यकीन दिलाने के लिए भोलेपन से बोली—क्यों, तुम मेरे बाप हो न?

सेठ जी ने उसे प्यार करके कहा—हॉँ, तुम मेरी प्यारी बेटी हो।

रोहिणी ने उनसे मुंह की तरफ याचना-भरी आँखों से देखकर कहा—अब तुम रोज यहीं रहा करोगे?

सेठ जी ने उसके बाल सुलझाकर जवाब दिया—मैं यहॉँ रहूँगा तो काम कौन करेगा? मैं कभी-कभी तुम्हें देखने आया करूँगा, लेकिन वहॉँ से तुम्हारे लिए अच्छी-अच्छी चीजें भेजूँगा।

रोहिणी कुछ उदास-सी हो गयी। इतने में उसकी मॉँ ने मकान का दरवाजा खोला ओर बड़ी फुर्ती से मैले बिछावन और फटे हुए कपड़े समेट कर कोने में डाल दिये कि कहीं सेठ जी की निगाह उन पर न पड़ जाए। यह स्वाभिमान स्त्रियों की खास अपनी चीज है।

रुक्मिणी अब इस सोच में पड़ी थी कि मैं इनकी क्या खातिर-तवाजो करूँ। उसने सेठ जी का नाम सुना था, उसका पति हमेशा उनकी बड़ाई किया करता था। वह उनकी दया और उदारता की चर्चाएँ अनेकों बार सुन चुकी थी। वह उन्हें अपने मन का देवता समझा करती थी, उसे क्या उमीद थी कि कभी उसका घर भी उसके कदमों से रोशन होगा। लेकिन आज जब वह शुभ दिन संयोग से आया तो वह इस काबिल भी नहीं कि उन्हें बैठने के लिए एक मोढ़ा दे सके। घर में पान और इलायची भी नहीं। वह अपने आँसुओं को किसी तरह न रोक सकी।

आखिर जब अंधेरा हो गया और पास के ठाकुरद्वारे से घण्टों और नगाड़ों की आवाजें आने लगीं तो उन्होंने जरा ऊँची आवाज में कहा—बाईजी, अब मैं जाता हूँ। मुझे अभी यहॉँ बहुत काम करना है। मेरी रोहिणी को कोई तकलीफ न हो। मुझे जब मौका मिलेगा, उसे देखने आऊँगा। उसके पालने-पोसने का काम मेरा है और मैं उसे बहुत खुशी से पूरा करूँगा। उसके लिए अब तुम कोई फिक्र मत करो। मैंने उसका वजीफा बॉँध दिया है और यह उसकी पहली किस्त है। यह कहकर उन्होंने अपना खूबसूरत बटुआ निकाला और रुक्मिणी के सामने रख दिया। गरीब औरत की आँखें में आँसू जारी थे। उसका जी बरबस चाहता था कि उसके पैरों को पकड़कर खूब रोये। आज बहुत दिनों के बाद एक सच्चे हमदर्द की आवाज उसके मन में आयी थी।

जब सेठ जी चले तो उसने दोनों हाथों से प्रणाम किया। उसके हृदय की गहराइयों से प्रार्थना निकली—आपने एक बेबस पर दया की है, ईश्वर आपको इसका बदला दे।

दूसरे दिन रोहिणी पाठशाला गई तो उसकी बॉँकी सज-धज आँखों में खुबी जाती थी। उस्तानियों ने उसे बारी-बारी प्यार किया और उसकी सहेलियॉँ उसकी एक-एक चीज को आश्चर्य से देखती और ललचाती थी। अच्छे कपड़ों से कुछ स्वाभिमान का अनुभव होता है। आज रोहिणी वह गरीब लड़की न रही जो दूसरों की तरफ विवश नेत्रों से देखा करती थी। आज उसकी एक-एक क्रिया से शैशवोचित गर्व और चंचलता टपकती थी और उसकी जबान एक दम के लिए भी न रुकती थी। कभी मोटर की तेजी का जिक्र था कभी बाजार की दिलचस्पियों का बयान, कभी अपनी गुड़ियों के कुशल-मंगल की चर्चा थी और कभी अपने बाप की मुहब्बत की दास्तान। दिल था कि उमंगों से भरा हुआ था। एक महीने बाद सेठ पुरुषोत्तमदास ने रोहिणी के लिए फिर तोहफे और रुपये रवाना किये। बेचारी विधवा को उनकी कृपा से जीविका की चिन्ता से छुट्टी मिली। वह भी रोहिणी के साथ पाठशाला आती और दोनों मॉँ-बेटियॉँ एक ही दरजे के साथ-साथ पढ़तीं, लेकिन रोहिणी का नम्बर हमेशा मॉँ से अव्वल रहा सेठ जी जब पूना की तरफ से निकलते तो रोहिणी को देखने जरूर आते और उनका आगमन उसकी प्रसन्नता और मनोरंजन के लिए महीनों का सामान इकट्ठा कर देता।

इसी तरह कई साल गुजर गये और रोहिणी ने जवानी के सुहाने हरे-भरे मैदान में पैर रक्खा, जबकि बचपन की भोली-भाली अदाओं में एक खास मतलब और इरादों का दखल हो जाता है।

रोहिणी अब आन्तरिक और बाह्य सौन्दर्य में अपनी पाठशाला की नाक थी। हाव-भाव में आकर्षक गम्भीरता, बातों में गीत का-सा खिंचाव और गीत का-सा आत्मिक रस था। कपड़ों में रंगीन सादगी, आँखों में लाज-संकोच, विचारों में पवित्रता। जवानी थी मगर घमण्ड और बनावट और चंचलता से मुक्त। उसमें एक एकाग्रता थी ऊँचे इरादों से पैदा होती है। स्त्रियोचित उत्कर्ष की मंजिलें वह धीरे-धीरे तय करती चली जाती थी।

सेठ जी के बड़े बेटे नरोत्तमदास कई साल तक अमेरिका और जर्मनी की युनिवर्सिटियों की खाक छानने के बाद इंजीनियरिंग विभाग में कमाल हासिल करके वापस आए थे। अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित कालेज में उन्होंने सम्मान का पद प्राप्त किया था। अमेरिका के अखबार एक हिन्दोस्तानी नौजवान की इस शानदार कामयाबी पर चकित थे। उन्हीं का स्वागत करने के लिए बम्बई में एक बड़ा जलसा किया गया था। इस उत्सव में शरीक होने के लिए लोग दूर-दूर से आए थे। सरस्वती पाठशाला को भी निमंत्रण मिला और रोहिणी को सेठानी जी ने विशेष रूप से आमंत्रित किया। पाठशाला में हफ्तों तैयारियॉँ हुई। रोहिणी को एक दम के लिए भी चैन न था। यह पहला मौका था कि उसने अपने लिए बहुत अच्छे-अच्छे कपड़े बनवाये। रंगों के चुनाव में वह मिठास थी, काट-छॉँट में वह फबन जिससे उसकी सुन्दरता चमक उठी। सेठानी कौशल्या देवी उसे लेने के लिए रेलवे स्टेशन पर मौजूद थीं। रोहिणी गाड़ी से उतरते ही उनके पैरों की तरफ झुकी लेकिन उन्होंने उसे छाती से लगा लिया और इस तरह प्यार किया कि जैसे वह उनकी बेटी है। वह उसे बार-बार देखती थीं और आँखों से गर्व और प्रेम टपक पड़ता था।

इस जलसे के लिए ठीक समुन्दर के किनारे एक हरे-भरे सुहाने मैदान में एक लम्बा-चौड़ा शामियाना लगाया गया था। एक तरफ आदमियों का समुद्र उमड़ा हुआ था दूसरी तरफ समुद्र की लहरें उमड़ रही थीं, गोया वह भी इस खुशी में शरीक थीं।

जब उपस्थित लोगों ने रोहिणी बाई के आने की खबर सुनी तो हजारों आदमी उसे देखने के लिए खड़े हो गए। यही तो वह लड़की है। जिसने अबकी शास्त्री की परीक्षा पास की है। जरा उसके दर्शन करने चाहिये। अब भी इस देश की स्त्रियों में ऐसे रतन मौजूद हैं। भोले-भाले देशप्रेमियों में इस तरह की बातें होने लगीं। शहर की कई प्रतिष्ठित महिलाओं ने आकर रोहिणी को गले लगाया और आपस में उसके सौन्दर्य और उसके कपड़ों की चर्चा होने लगी। आखिर मिस्टर पुरुषोत्तमदास तशरीफ लाए। हालॉँकि वह बड़ा शिष्ट और गम्भीर उत्सव था लेकिन उस वक्त दर्शन की उत्कंठा पागलपन की हद तक जा पहुँची थी। एक भगदड़-सी मच गई। कुर्सियों की कतारे गड़बड़ हो गईं। कोई कुर्सी पर खड़ा हुआ, कोई उसके हत्थों पर। कुछ मनचले लोगों ने शामियाने की रस्सियॉँ पकड़ीं और उन पर जा लटके कई मिनट तक यही तूफान मचा रहा। कहीं कुर्सियां टूटीं, कहीं कुर्सियॉँ उलटीं, कोई किसी के ऊपर गिरा, कोई नीचे। ज्यादा तेज लोगों में धौल-धप्पा होने लगा।

तब बीन की सुहानी आवाजें आने लगीं। रोहिणी ने अपनी मण्डली के साथ देशप्रेम में डूबा हुआ गीत शुरू किया। सारे उपस्थित लोग बिलकुल शान्त थे और उस समय वह सुरीला राग, उसकी कोमलता और स्वच्छता, उसकी प्रभावशाली मधुरता, उसकी उत्साह भरी वाणी दिलों पर वह नशा-सा पैदा कर रही थी जिससे प्रेम की लहरें उठती हैं, जो दिल से बुराइयों को मिटाता है और उससे जिन्दगी की हमेशा याद रहने वाली यादगारें पैदा हो जाती हैं। गीत बन्द होने पर तारीफ की एक आवाज न आई। वहीं ताने कानों में अब तक गूँज रही थीं।

गाने के बाद विभिन्न संस्थाओं की तरफ से अभिनन्दन पेश हुए और तब नरोत्तमदास लोगों को धन्यवाद देने के लिए खड़े हुए। लेकिन उनके भाषाण से लोगों को थोड़ी निराशा हुई। यों दोस्तो की मण्डली में उनकी वक्तृता के आवेग और प्रवाह की कोई सीमा न थी लेकिन सार्वजनिक सभा के सामने खड़े होते ही शब्द और विचार दोनों ही उनसे बेवफाई कर जाते थे। उन्होंने बड़ी-बड़ी मुश्किल से धन्यवाद के कुछ शब्द कहे और तब अपनी योग्यता की लज्जित स्वीकृति के साथ अपनी जगह पर आ बैठे। कितने ही लोग उनकी योग्यता पर ज्ञानियों की तरह सिर हिलाने लगे।

अब जलसा खत्म होने का वक्त आया। वह रेशमी हार जो सरस्वती पाठशाला की ओर से भेजा गया था, मेज पर रखा हुआ था। उसे हीरो के गले में कौन डाले? प्रेसिडेण्ट ने महिलाओं की पंक्ति की ओर नजर दौड़ाई। चुनने वाली आँख रोहिणी पर पड़ी और ठहर गई। उसकी छाती धड़कने लगी। लेकिन उत्सव के सभापति के आदेश का पालन आवश्यक था। वह सर झुकाये हुए मेज के पास आयी और कॉँपते हाथों से हार को उठा लिया। एक क्षण के लिए दोनों की आँखें मिलीं और रोहिणी ने नरोत्तमदास के गले में हार डाल दिया।

दूसरे दिन सरस्वती पाठशाला के मेहमान विदा हुए लेकिन कौशल्या देवी ने रोहिणी को न जाने दिया। बोली—अभी तुम्हें देखने से जी नहीं भरा, तुम्हें यहॉँ एक हफ्ता रहना होगा। आखिर मैं भी तो तुम्हारी मॉँ हूँ। एक मॉँ से इतना प्यार और दूसरी मॉँ से इतना अलगाव!

रोहिणी कुछ जवाब न दे सकी।

यह सारा हफ्ता कौशल्या देवी ने उसकी विदाई की तैयारियों में खर्च किया। सातवें दिन उसे विदा करने के लिए स्टेशन तक आयीं। चलते वक्त उससे गले मिलीं और बहुत कोशिश करने पर भी आँसुओं को न रोक सकीं। नरोत्तमदास भी आये थे। उनका चेहरा उदास था। कौशल्या ने उनकी तरफ सहानुभूतिपूर्ण आँखों से देखकर कहा—मुझे यह तो ख्याल ही न रहा, रोहिणी क्या यहॉँ से पूना तक अकेली जायेगी? क्या हर्ज है, तुम्हीं चले जाओ, शाम की गाड़ी से लौट आना।

नरोत्तमदास के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी, जो इन शब्दों में न छिप सकी—अच्छा, मैं ही चला जाऊँगा। वह इस फिक्र में थे कि देखें बिदाई की बातचीत का मौका भी मिलता है या नहीं। अब वह खूब जी भरकर अपना दर्दे दिल सुनायेंगे और मुमकिन हुआ तो उस लाज-संकोच को, जो उदासीनता के परदे में छिपी हुई है, मिटा देंगे।

रुक्मिणी को अब रोहिणी की शादी की फिक्र पैदा हुई। पड़ोस की औरतों में इसकी चर्चा होने लगी थी। लड़की इतनी सयानी हो गयी है, अब क्या बुढ़ापे में ब्याह होगा? कई जगह से बात आयी, उनमें कुछ बड़े प्रतिष्ठित घराने थे। लेकिन जब रुक्मिणी उन पैमानों को सेठजी के पास भेजती तो वे यही जवाब देते कि मैं खुद फिक्र में हूँ। रुक्मिणी को उनकी यह टाल-मटोल बुरी मालूम होती थी।

रोहिणी को बम्बई से लौटे महीना भर हो चुका था। एक दिन वह पाठशाला से लौटी तो उसे अम्मा की चारपाई पर एक खत पड़ा हुआ मिला। रोहिणी पढ़ने लगी, लिखा था—बहन, जब से मैंने तुम्हारी लड़की को बम्बई में देखा है, मैं उस पर रीझ गई हूँ। अब उसके बगैर मुझे चैन नहीं है। क्या मेरा ऐसा भाग्य होगा कि वह मेरी बहू बन सके? मैं गरीब हूँ लेकिन मैंने सेठ जी को राजी कर लिया है। तुम भी मेरी यह विनती कबूल करो। मैं तुम्हारी लड़की को चाहे फूलों की सेज पर न सुला सकूँ, लेकिन इस घर का एक-एक आदमी उसे आँखों की पुतली बनाकर रखेगा। अब रहा लड़का। मॉँ के मुँह से लड़के का बखान कुछ अच्छा नहीं मालूम होता। लेकिन यह कह सकती हूँ कि परमात्मा ने यह जोड़ी अपनी हाथों बनायी है। सूरत में, स्वभाव में, विद्या में, हर दृष्टि से वह रोहिणी के योग्य है। तुम जैसे चाहे अपना इत्मीनान कर सकती हो। जवाब जल्द देना और ज्यादा क्या लिखूँ। नीचे थोड़े-से शब्दों में सेठजी ने उस पैगाम की सिफारिश की थी।

रोहिणी गालों पर हाथ रखकर सोचने लगी। नरोत्तमदास की तस्वीर उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई। उनकी वह प्रेम की बातें, जिनका सिलसिला बम्बई से पूना तक नहीं टूटा था, कानों में गूंजने लगीं। उसने एक ठण्डी सॉँस ली और उदास होकर चारपाई पर लेट गई।

5

सरस्वती पाठशाला में एक बार फिर सजावट और सफाई के दृश्य दिखाई दे रहे हैं। आज रोहिणी की शादी का शुभ दिन। शाम का वक्त, बसन्त का सुहाना मौसम। पाठशाला के दारो-दीवार मुस्करा रहे हैं और हरा-भरा बगीचा फूला नहीं समाता।

चन्द्रमा अपनी बारात लेकर पूरब की तरफ से निकला। उसी वक्त मंगलाचरण का सुहाना राग उस रूपहली चॉँदनी और हल्के-हल्के हवा के झोकों में लहरें मारने लगा। दूल्हा आया, उसे देखते ही लोग हैरत में आ गए। यह नरोत्तमदास थे। दूल्हा मण्डप के नीचे गया। रोहिणी की मॉँ अपने को रोक न सकी, उसी वक्त जाकर सेठ जी के पैर पर गिर पड़ी। रोहिणी की आँखों से प्रेम और आनन्द के आँसू बहने लगे।

मण्डप के नीचे हवन-कुण्ड बना था। हवन शुरू हुआ, खुशबू की लपेटें हवा में उठीं और सारा मैदान महक गया। लोगों के दिलो-दिमाग में ताजगी की उमंग पैदा हुई।

फिर संस्कार की बारी आई। दूल्हा और दुल्हन ने आपस में हमदर्दी; जिम्मेदारी और वफादारी के पवित्र शब्द अपनी जबानों से कहे। विवाह की वह मुबारक जंजीर गले में पड़ी जिसमें वजन है, सख्ती है, पाबन्दियॉँ हैं लेकिन वजन के साथ सुख और पाबन्दियों के साथ विश्वास है। दोनों दिलों में उस वक्त एक नयी, बलवान, आत्मिक शक्ति की अनुभूति हो रही थी।

जब शादी की रस्में खत्म हो गयीं तो नाच-गाने की मजलिस का दौर आया। मोहक गीत गूँजने लगे। सेठ जी थककर चूर हो गए थे। जरा दम लेने के लिए बागीचे में जाकर एक बेंच पर बैठ गये। ठण्डी-ठण्डी हवा आ रही आ रही थी। एक नशा-सा पैदा करने वाली शान्ति चारों तरफ छायी हुई थी। उसी वक्त रोहिणी उनके पास आयी और उनके पैरों से लिपट गयी। सेठ जी ने उसे उठाकर गले से लगा लिया और हँसकर बोले—क्यों, अब तो तुम मेरी अपनी बेटी हो गयीं?

अंजाम-ए-नजीर

bloody rioting between Hindus and Muslims 2 Calcutta (Kolkata) 1946

बटवारे के बाद जब फ़िर्का-वाराना फ़सादात शिद्दत इख़्तियार कर गए और जगह जगह हिंदूओं और मुस्लमानों के ख़ून से ज़मीन रंगी जाने लगी तो नसीम अख़तर जो दिल्ली की नौ-ख़ेज़ तवाइफ़ थी अपनी बूढ़ी माँ से कहा “चलो माँ यहां से चलें”

बूढ़ी बाइका ने अपने पोपले मुँह में पानदान से छालिया के बारीक बारीक टुकड़े डालते हुए उस से पूछा “कहाँ जाऐंगे बेटा ”

“पाकिस्तान।” ये कह कर वो अपने उस्ताद ख़ानसाहब अच्छन ख़ान से मुख़ातब हूई।

“ख़ानसाहब आप का क्या ख़याल है यहां रहना अब ख़तरे से ख़ाली नहीं।”

ख़ानसाहब ने नसीम अख़तर की हाँ में हाँ मिलाई। “तुम कहती हो मगर बाई जी को मना लो तो सब चलेंगे।”

नसीम अख़तर ने अपनी माँ से बहुतर कहा। “कि चलो अब यहां हिंदूओं का राज होगा। कोई मुस्लमान बाक़ी नहीं छोड़ेंगे।”

बुढ़िया ने कहा “तो क्या हुआ। हमारा धंदा तो हिंदूओं की बदौलत ही चलता है और तुम्हारे चाहने वाले भी सब के सब हिंदू ही हैं मुस्लमानों में रख्खा ही क्या है”

“ऐसा न कहो। उन का मज़हब और हमारा मज़हब एक है। क़ैद-ए-आज़म ने इतनी मेहनत से मुस्लमानों के लिए पाकिस्तान बनाया है हमें अब वहीं रहना चाहिए।”

मांडू मीरासी ने अफ़ीम के नशा में अपना सर हिलाया और ग़नूदगी भरी आवाज़ में कहा।

“छोटी बाई। अल्लाह सलामत रख्खे तुम्हें क्या बात कही है। मैं तो अभी चलने के लिए तैय्यार हूँ मेरी क़ब्र भी बनाओ तो रूह ख़ुश रहेगी।”

दूसरे मीरासी थे वो भी तैय्यार होगए लेकिन बड़ी बाई दिल्ली छोड़ना नहीं चाहती थी बाला-ख़ाने पर उसी का हुक्म चलता था। इस लिए सब ख़ामोश हो गए।

बड़ी बाई ने सेठ गोबिंद प्रकाश की कोठी पर आदमी भेजा और उस को बुला कर कहा:

“मेरी बच्ची आजकल बहुत डरी हुई है। पाकिस्तान जाना चाहती थी। मगर मैंने समझाया। वहां किया धरा है। यहां आप ऐसे मेहरबान सेठ लोग मौजूद हैं वहां जा कर हम उपले थापेंगे आप एक करम कीजिए।”

सेठ बड़ी बाई की बातें सुन रहा था मगर उस का दिमाग़ कुछ और ही सोच रहा था। एक दम चौंक कर उस ने बड़ी बाई से पूछा।

“तू क्या चाहती है”

“हमारे कोठे के नीचे दो तीन हिंदूओं वाले सिपाहियों का पहरा खड़ा कर दीजिए ताकि बच्ची का सहम दूर हो।”

सेठ गोबिंद प्रकाश ने कहा। “ये कोई मुश्किल नहीं। मैं अभी जा कर सुपरिंटेंडेंट पुलिस से मिलता हूँ शाम से पहले पहले सिपाही मौजूद होंगे।”

नसीम अख़तर की माँ ने सेठ को बहुत दुआएँ दीं। जब वो जाने लगा तो उस ने कहा हम आप अपनी बाई का मुजरा सुनने आयेंगे।

बुढ़िया ने उठ कर ताज़ीमन कहा। “हाय जम जम आईए आप का अपना घर है बच्ची को आप अपनी क़मीस समझीए खाना यहीं खाईएगा।”

“नहीं मैं आज-कल परहेज़ी खाना खा रहा हूँ ” ये कह कर वो अपनी तोंद पर हाथ फेरता चला गया।

शाम को नसीम की माँ ने चाँदनियां बदलवाईं, गाव तकियों पर नए ग़िलाफ़ चढ़ाए, ज़्यादा रोशनी के बल्ब लगवाए आला क़िस्म के सिगरेटों का डिब्बा मंगवाने भेजा।

थोड़ी ही देर के बाद नौकर हवास-बाख़्ता हाँपता काँपता वापस आ गया। उस के मुँह से एक बात ना निकलती थी। आख़िर जब वो कुछ देर के बाद सँभला तो उस ने बताया कि “चौक में पाँच छः सिख्खों ने एक मुस्लमान ख़वांचा-फ़रोश को किरपाणों से उस की आँखों के सामने टुकड़े टुकड़े कर डाला है” जब उस ने ये देखा तो सर पर पांव रख कर भागा और यहां आन के दम लिया।

नसीम अख़तर ये ख़बर सुन कर बेहोश होगई। बड़ी मुश्किलों से ख़ानसाहब अच्छन ख़ान उसे होश में लाए मगर वो बहुत देर तक निढाल रही और ख़ामोश ख़ला में देखती रही। आख़िर उस की माँ ने कहा “खूनखराबे होते ही रहते हैं क्या इस से पहले क़तल नहीं होते थे।”

दम दिलासा देने के बाद नसीम अख़तर सँभल गई तो उस की माँ ने इस से बड़े दुलारावर प्यार से कहा।

“उठो मेरी बच्ची जाओ पिशवाज़ पहनो सेठ आते ही होंगे।”

नसीम ने बादल-ए-नख़्वास्ता पिशवाज़ पहनी सोला सिंघार किए और मस्नद पर बैठ गई उस का जी भारी भारी था। उस को ऐसा महसूस होता था। कि उस मक़्तूल ख़वांचा-फ़रोश का सारा ख़ून उस के दिल-ओ-दिमाग़ में जम गया है उस का दिल अभी तक धड़क रहा था वो चाहती थी कि ज़र्क़-बर्क़ पिशवाज़ की बजाय सादा शलवार क़मीस पहन ले और अपनी माँ से हाथ जोड़ कर बल्कि इस के पांव पड़ कर कहे कि “ख़ुदा के लिए मेरी बात सुनो और भाग चलो यहां से मेरा दिल गवाही देता है कि हम पर कोई न कोई आफ़त आने वाली है।”

बुढ़िया ने झुँझला कर कहा। “हम पर क्यों आफ़त आने लगी हम ने किसी का क्या बिगाड़ा है ”

नसीम ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया “उस ग़रीब ख़ुवांचा-फ़रोश ने किसी का क्या बिगाड़ा था जो ज़ालिमों ने उस के टुकड़े टुकड़े कर डाले। बिगाड़ने वाले बच जाते हैं। मारे जाते हैं जिन्हों ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा होता ”

“तुम्हारा दिमाग़ ख़राब होगया है।”

“ऐसे हालात में किस का दिमाग़ दुरुस्त रह सकता है। चारों तरफ़ ख़ून की नदियां बह रही हैं” ये कह कर वो उठी। बालकोनी में खड़ी होगई और नीचे बाज़ार में देखने लगी। उसे बिजली के खंबे के पास चार आदमी खड़े दिखाई दिए। जिन के पास बंदूक़ें थीं उस ने ख़ान अच्छन को बताया और वो आदमी दिखाए ऐसा लगता था कि वही सिपाही हैं जिन को सेठ ने भेजा होगा।

ख़ानसाहब ने ग़ौर से देखा।

“नहीं ये सिपाही नहीं। सिपाहियों की तो वर्दी होती है मुझे तो ये गुंडे मालूम होते हैं।”

नसीम अख़तर का कलेजा धक से रह गया गुंडे

“अल्लाह बेहतर जानता है। कुछ कहा नहीं जा सकता लो ये तुम्हारे कोठे की तरफ़ आ रहे हैं। देख नसीम किसी बहाने से ऊपर कोठे पर चली जाओ मैं तुम्हारे पीछे आता हूँ। मुझे दाल में काला नज़र आता है।”

नसीम अख़तर चुपके से बाहर निकली और अपनी माँ से नज़र बचा कर ऊपर की मंज़िल पर चली गई। थोड़ी देर के बाद ख़ानसाहब अच्छन ख़ान अपनी चिंधी आँखें झपकाता ऊपर आया और जल्दी से दरवाज़ा बंद कर के कुंडी चढ़ा दी।

नसीम अख़तर जिस का दिल जैसे डूब रहा था। ख़ानसाहब से पूछा।

“क्या बात है”

वही जो मैंने समझा था। “तुम्हारे मुतअल्लिक़ पूछ रहे थे कहते थे सेठ गोबिंद प्रकाश ने कार भेजी है और बुलवाया है।”

“तुम्हारी माँ बड़ी ख़ुश हुई बड़ी मेहरबानी है उन की। मैं देखती हूँ कहाँ है शायद ग़ुसलख़ाने में हो। इतनी देर में मैं तैय्यार हो जाऊं”

उन गुंडों में से एक ने कहा “तुम्हें क्या शहद लगा कर चाटेंगे बैठी रहो जहां बैठी हो ख़बरदार जो तुम वहां से हिलीं हम ख़ुद तुम्हारी बेटियों को ढूंढ निकालेंगे”

“मैंने जब ये बातें सुनीं और उन गुंडों के बिगड़े हुए तीवर देखे तो खिसकता खिसकता यहां पहुंच गया हूँ ”

नसीम अख़तर हवास बाख़्ता थी। “अब क्या किया जाये।?”

ख़ान ने अपना सर खुजाया और जवाब दिया “देखो मैं कोई तरकीब सोचता हूँ बस यहां से निकल भागना चाहिए।”

“और माँ ”

“इस के मुतअल्लिक़ मैं कुछ नहीं कह सकता उस को अल्लाह के हवाले कर के ख़ुद बाहर निकलना चाहिए ऊपर चारपाई पर दो चादरें पड़ी हुई थीं ख़ानसाहब ने उन को गांठ दे कर रस्सा सा बनाया और मज़बूती से एक कुंडे के साथ बांध कर दूसरी तरफ़ लटकाया नीचे लांड्री की छत थी वहां अगर वो पहुंच जाएं तो रास्ता आगे साफ़ है लांड्री की छत की सीढ़ियां दूसरी तरफ़ थीं उस के ज़रिये से वो तवीले में पहुंच जाते और वहां साईं से जो मुस्लमान था ताँगा लेते और स्टेशन का रुख़ करते।

नसीम अख़तर ने बड़ी बहादुरी दिखाई। आराम आराम से नीचे उतर कर लांड्री की छत तक पहुंच गई। ख़ानसाहब अच्छन ख़ान भी बहिफ़ाज़त तमाम उतर गए। अब वो तवीले में थे साईं इत्तिफ़ाक़ से तांगे में घोड़ा जोत रहा था दोनों इस में बैठे और स्टेशन का रुख़ किया मगर रास्ते में उन को मिल्ट्री का ट्रक मिल गया उस में मुसल्लह फ़ौजी मुस्लमान थे जो हिन्दुओं के ख़तरनाक महलों से मुस्लमानों को निकाल निकाल कर महफ़ूज़ मुक़ामात पर पहुंचा रहे थे जो पाकिस्तान जाना चाहते उन को स्पैशल ट्रेनों में जगह दिलवा देते।

ताँगा से उतर कर नसीम अख़तर और इस का उस्ताद ट्रक में बैठे और चंद ही मिनटों में स्टेशन पर पहुंच गए स्पैशल ट्रेन इत्तिफ़ाक़ से तैय्यार थी इस में उन को अच्छी जगह मिल गई और वो बख़ैरीयत लाहौर पहुंच गए यहां वो क़रीब क़रीब एक महीने तक वालटन कैंप में रहे। निहायत कसमपुर्सी की हालत में इस के बाद वो शहर चले आए नसीम अख़तर के पास काफ़ी ज़ेवर था जो उस ने उस रात पहना हुआ था जब सेठ गोबिंद प्रकाश इस का मुजरा सुनने आरहा था ये उस ने उतार कर ख़ानसाहब अच्छन ख़ान के हवाले कर दिया था इन ज़ेवरों में से कुछ बेच कर उन्हों ने होस्टल में रहना शुरू कर दिया लेकिन मकान की तलाश जारी रही आख़िर बदिक़्क़त-ए-तमाम हीरा मंडी में एक मकान मिल गया जो अच्छा ख़ासा था अब ख़ानसाहब अच्छन ख़ान ने नसीम अख़तर से कहा “गद्दे और चांदनियाँ वग़ैरा ख़रीद लें और तुम बिसमिल्लाह कर के मुजरा शुरू कर दो।”

नसीम ने कहा। “नहीं ख़ानसाहब मेरा जी उकता गया है मैं तो उस मकान में भी रहना पसंद नहीं करती किसी शरीफ़ मुहल्ले में कोई छोटा सा मकान तलाश कीजिए। कि मैं वहां उठ जाऊं मैं अब ख़ामोश ज़िंदगी बसर करना चाहती हूँ।”

ख़ानसाहब को ये सुन कर बड़ी हैरत हुई। “क्या होगया है तुम्हें”

“बस जी उचाट हो गया है मैं इस ज़िंदगी से किनारा-कशी इख़्तियार करना चाहती हूँ दुआ कीजिए ख़ुदा मुझे साबित क़दम रख्खे” ये कहते हुए नसीम की आँखों में आँसू आगए।

ख़ानसाहब ने उस को बहुत तरग़ीब दी पर वो टस से मस न हुई एक दिन उस ने अपने उस्ताद से साफ़ कह दिया कि वो “शादी कर लेना चाहती है अगर किसी ने उसे क़बूल न किया तो वो कुंवारी रहेगी।”

ख़ानसाहब बहुत हैरान था। कि नसीम में ये तबदीली कैसे आई फ़सादात तो इस का बाइस नहीं हो सकते फिर क्या वजह थी कि वो पेशा तर्क करने पर तुली हुई है।

जब वो उसे समझा समझा कर थक गया तो उसे एक मुहल्ले में जहां शुरफ़ा रहते थे एक छोटा सा मकान ले दिया और ख़ुद हीरा मंडी की एक मालदार तवाइफ़ को तालीम देने लगा। नसीम ने थोड़े से बर्तन ख़रीदे एक चारपाई और बिस्तर वग़ैरा भी एक छोटा लड़का नौकर रख लिया और सुकून की ज़िंदगी बसर करने लगी पांचों नमाज़ें पढ़ती।

रोज़े आए तो उस ने सारे के सारे रख्खे एक दिन वो ग़ुसलख़ाने में नहा रही थी कि सब कुछ भूल कर अपनी सुरीली आवाज़ में गाने लगी उस के हाँ एक और औरत का आना जाना था नसीम अख़तर को मालूम नहीं था कि ये औरत शरीफ़ों के मुहल्ले की बहुत बड़ी फफा कटनी है शरीफ़ों के मुहल्ले में कई घर तबाह-ओ-बर्बाद कर चुकी है कई लड़कियों की इस्मत औने पौने दामों बिकवा चुकी है कई नौ-जवानों को ग़लत रास्ते पर लगा कर अपना उल्लू सीधा करती रहती है जब उस औरत ने जिस का नाम जन्नते है नसीम की सुरीली और मँझी हुई आवाज़ सुनी तो उस को फ़ौरन ख़याल आया कि उस लड़की का आग़ा है ना पीछा

बड़ी मार्के की तवाइफ़ बन सकती है चुनांचे उस ने उस पर डोरे डालने शुरू कर दिए उस को उस ने कई सबज़ बाग़ दिखाए मगर वो उस के क़ाबू में न आई आख़िर उस ने एक रोज़ उस को गले लगाया और चट चट उस की बलाऐं लेना शुरू कर दीं। “जीती रहो बेटा। मैं तुम्हारा इम्तिहान ले रही थी तुम इस में सोला आने पूरी उतरी हो।” नसीम अख़तर उस के फ़रेब में आगई एक दिन उस को यहां तक बता दिया कि “वो शादी करना चाहती है क्योंकि एक यतीम कुंवारी लड़की का अकेले रहना ख़तरे से ख़ाली नहीं होता।”

जन्नते को मौक़ा हाथ आया। उस ने नसीम से कहा। “बेटा ये क्या मुश्किल है मैंने यहां शादियां कराई हैं सब की सब कामयाब रही हैं अल्लाह ने चाहा तो तुम्हारे हस्ब-ए-मंशा मियां मिल जाएगा जो तुम्हारे पांव धो धो कर पिएगा।”

जन्नते कई फ़र्ज़ी रिश्ते लाई मगर उस ने उन की कोई ज़्यादा तारीफ़ न की आख़िर में वो एक रिश्ता लाई जो उस के कहने के मुताबिक़ फ़िरिश्ता सीरत और साहिब-ए-जायदाद था नसीम मान गई तारीख़ मुक़र्रर की गई और उस की शादी अंजाम पा गई।

नसीम अख़तर ख़ुश थी कि उस का मियां बहुत अच्छा है उस की हर आसाइश का ख़याल रखता है लेकिन उस दिन उस के होश-ओ-हवास गुम होगए जब उस को दूसरे कमरे से औरतों की आवाज़ें सुनाई दीं दरवाज़े में से झांक कर उस ने देखा कि उस का शौहर दो बूढ़ी तवाइफ़ों से उस के मुतअल्लिक़ बातें कर रहा है जन्नते भी पास बैठी थी। सब मिल कर उस का सौदा तय कर रहे थे उस की समझ में न आया क्या करे और क्या न करे बहुत देर रोती सोचती रही आख़िर उठी और अपनी पिशवाज़ निकाल कर पहनी और बाहर निकल कर सीधी अपने उस्ताद अच्छन ख़ान के पास पहुंची और मुजरे के साथ साथ पेशा भी शुरू कर दिया एक इंतिक़ामी क़िस्म के जज़्बे के तहत वो खेलने लगी।

सआदत हसन मंटो

1919 की एक बात

मंटो

ये 1919-ई- की बात है भाई जान जब रौलट ऐक्ट के ख़िलाफ़ सारे पंजाब में एजीटेशन हो रही थी। मैं अमृतसर की बात कररहा हूँ। सर माईकल ओडवायर ने डीफ़ैंस आफ़ इंडिया रूल्ज़ के मातहत गांधी जी का दाख़िला पंजाब में बंद कर दिया था। वो इधर आरहे थे कि पलवाल के मुक़ाम पर उन को रोक लिया गया और गिरफ़्तार करके वापस बमबई भेज दिया गया। जहां तक में समझता हूँ भाई जान अगर अंग्रेज़ ये ग़लती न करता तो जलीयाँ वाला बाग़ का हादिसा उस की हुक्मरानी की स्याह तारीख़ में ऐसे ख़ूनीं वर्क़ का इज़ाफ़ा कभी न करता।

क्या मुस्लमान, किया हिंदू, क्या सिख, सब के दिल में गांधी जी की बेहद इज़्ज़त थी। सब उन्हें महात्मा मानते थे। जब उन की गिरफ़्तारी की ख़बर लाहौर पहुंची तो सारा कारोबार एक दम बंद होगया। यहां से अमृतसर वालों को मालूम हुआ, चुनांचे यूं चुटकियों में मुकम्मल हड़ताल होगई।

कहते हैं कि नौ अप्रैल की शाम को डाक्टर सत्य पाल और डाक्टर किचलू की जिला वतनी के अहकाम डिप्टी कमिशनर को मिल गए थे। वो उन की तामील के लिए तैय्यार नहीं था। इस लिए कि उस के ख़्याल के मुताबिक़ अमृतसर में किसी हैजान-ख़ेज बात का ख़तरा नहीं था। लोग पुरअम्न तरीक़े पर एहितजाजी जल्से वग़ैरा करते थे। जिन से तशद्दुद का सवाल ही पैदा नहीं होता था। मैं अपनी आँखों देखा हाल बयान करता हूँ। नौ को रामनवमी था। जलूस निकला मगर मजाल है जो किसी ने हुक्काम की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक क़दम उठाया हो, लेकिन भाई जान सर माईकल अजब औंधी खोपरी का इंसान था। उस ने डिप्टी कमिशनर की एक ना सुनी। इस पर बस यही ख़ौफ़ सवार था कि ये लीडर महात्मा गांधी के इशारे पर सामराज का तख़्ता उल्टने के दर पे हैं, और जो हड़तालें होरही हैं और जल्से मुनअक़िद होते हैं उन के पस-ए-पर्दा यही साज़िश काम कर रही है।

डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्य पाल की जिला वतनी की ख़बर आनन फ़ानन शहर में आग की तरह फैल गई। दिल हर शख़्स का मुकद्दर था। हर वक़्त धड़का सा लगा रहता था कि कोई बहुत बड़ा हादिसा बरपा होने वाला है, लेकिन भाई जान जोश बहुत ज़्यादा था। कारोबार बंद थे। शहर क़ब्रिस्तान बना हुआ था, पर इस क़ब्रिस्तान की ख़ामोशी में भी एक शोर था। जब डॉ किचलू और सत्य पाल की गिरफ़्तारी की ख़बर आई तो लोग हज़ारों की तादाद में इकट्ठे हुए कि मिल कर डिप्टी कमिशनर बहादुर के पास जाएं और अपने महबूब लीडरों की जिला वतनी के अहकाम मंसूख़ कराने की दरख़ास्त करें। मगर वो ज़माना भाई जान दरख़ास्तें सुनने का नहीं था। सर माईकल जैसा फ़िरऔन हाकिम-ए-आला था। उस ने दरख़ास्त सुनना तो कुजा लोगों के इस इजतिमा ही को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया।

अमृतसर…….वो अमृतसर जो कभी आज़ादी की तहरीक का सब से बड़ा मर्कज़ था। जिस के सीने पर जलीयाँ वाला बाग़ जैसा क़ाबिल-ए-फ़ख़्र ज़ख़्म था। आज किस हालत में है?…….लेकिन छोड़ीए इस क़िस्से को। दिल को बहुत दुख होता है। लोग कहते हैं कि इस मुक़द्दस शहर में जो कुछ आज से पाँच बरस पहले हुआ उस के ज़िम्मेदार भी अंग्रेज़ हैं। होगा भाई जान, पर सच्च पूछिए तो इस लहू में जो वहां बहा है हमारे अपने ही हाथ रंगे हुए नज़र आते हैं। ख़ैर!…….

डिप्टी कमिशनर साहब का बंगला सिविल लाईन्ज़ में था। हर बड़ा अफ़्सर और हर बड़ा टोडी शहर के इस अलग थलग हिस्से में रहता था……. आप ने अमृतसर देखा है तो आप को मालूम होगा कि शहर और सिविल लाईन्ज़ को मिलाने वाला एक पुल है जिस पर से गुज़र कर आदमी ठंडी सड़क पर पहुंचता है। जहां हाकिमों ने अपने लिए ये अर्ज़ी जन्नत बनाई हुई थी।

हुजूम जब हाल दरवाज़े के क़रीब पहुंचा तो मालूम हुआ कि पुल पर घोड़ सवार गोरों का पहरा है। हुजूम बिलकुल न रूका और बढ़ता गया। भाई जान मैं इस में शामिल था। जोश कितना था, मैं बयान नहीं कर सकता, लेकिन सब निहत्ते थे। किसी के पास एक मामूली छड़ी तक भी नहीं थी। असल में वो तो सिर्फ़ इस ग़रज़ से निकले थे कि इजतिमाई तौर पर अपनी आवाज़ हाकिम-ए-शहर तक पहुंचाएं और उस से दरख़ास्त करें कि डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्य पाल को ग़ैरमशरूत तौर पर रहा करदे। हुजूम पुल की तरफ़ बढ़ता रहा। लोग क़रीब पहुंचे तो गोरों ने फ़ायर शुरू करदिए। इस से भगदड़ मच गई। वो गिनती में सिर्फ़ बीस पच्चीस थे और हुजूम सैंकड़ों पर मुश्तमिल था, लेकिन भाई गोली की दहश्त बहुत होती है। ऐसी अफ़रातफ़री फैली कि अलामां। कुछ गोलीयों से घायल हुए और कुछ भगदड़ में ज़ख़मी हूए।

दाएं हाथ को गंदा नाला था। धक्का लगा तो मैं इस में गिर पड़ा। गोलीयां चलनी बंद हुईं तो मैंने उठ कर देखा। हुजूम तित्र बित्तर हो चुका था। ज़ख़मी सड़क पर पड़े थे और पुल पर गोरे खड़े हंस रहे थे। भाई जान मुझे क़तअन याद नहीं कि उस वक़्त मेरी दिमाग़ी हालत किस क़िस्म की थी। मेरा ख़्याल है कि मेरे होश-ओ-हवास पूरी तरह सलामत नहीं थे। गंदे नाले में गिरते वक़्त तो क़तअन मुझे होश नहीं था। जब बाहर निकला तो जो हादिसा वक़ूअ पज़ीर हुआ था, उस के ख़द्द-ओ-ख़ाल आहिस्ता आहिस्ता दिमाग़ में उभरने शुरू हुए।

दूर शोर की आवाज़ सुनाई दे रही थी जैसे बहुत से लोग ग़ुस्से में चीख़ चिल्ला रहे हैं। मैं गंदा नाला उबूर कर के ज़ाहिरा पीर के तकीए से होता हुआ हाल दरवाज़े के पास पहुंचा तो देखा कि तीस चालीस नौजवान जोश में भरे पत्थर उठा उठा कर दरवाज़े के घड़ियाल पर मार रहे हैं। इस का शीशा टूट कर सड़क पर गिरा तो एक लड़के ने बाक़ीयों से कहा। “चलो……. मलिका का बुत तोड़ें!”

दूसरे ने कहा। “नहीं यार…….कोतवाली को आग लगाऐं!”

तीसरे ने कहा। “और सारे बैंकों को भी!”

चौथे ने उन को रोका। “ठहरो……. इस से किया फ़ायदा…….चलो पुल पर उन लोगों को मारें।”

मैंने उस को पहचान लिया। ये थैला कंजर था……. नाम मोहम्मद तुफ़ैल था मगर थैला कंजर के नाम से मशहूर था। इस लिए कि एक तवाइफ़ के बतन से था। बड़ा आवारागर्द था। छोटी उम्र ही में उस को जोय और शराबनोशी की लत पड़ गई थी। इस की दो बहनें शमशाद और अलमास अपने वक़्त की हसीन-तरीन तवाइफ़ें थीं। शमशाद का गला बहुत अच्छा था। उस का मुजरा सुनने के लिए रईस बड़ी बड़ी दूर से आते थे। दोनों अपने भाई के करतूतों से बहुत नालां थीं। शहर में मशहूर था कि उन्हों ने एक क़िस्म का उस को आक़ कर रखा है। फिर भी वो किसी न किसी हीले अपनी ज़रूरीयात के लिए उन से कुछ न कुछ वसूल कर ही लेता था। वैसे वो बहुत ख़ुशपोश रहता था। अच्छा खाता था, अच्छा पीता था। बड़ा नफ़ासतपसंद था। बज़्लासंजी और लतीफ़ा गोई मिज़ाज में कोट कोट के भरी थी। मीरासियों और भांडों के सोक़याना पन से बहुत दूर रहता था। लंबा क़द, भरे भरे हाथ पांव, मज़बूत कसरती बदन। नाक नक़्शे का भी ख़ासा था।

पुरजोश लड़कों ने उस की बात न सुनी और मलिका के बुत की तरफ़ चलने लगे। उस ने फिर उन से कहा। “मैंने कहा मत ज़ाए करो अपना जोश। इधर आओ मेरे साथ……. चलो उन को मारें जिन्हों ने हमारे बेक़सूर आदमीयों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है……. ख़ुदा की क़सम हम सब मिल कर उन की गर्दन मरोड़ सकते हैं…….चलो!”

कुछ रवाना हो चुके थे। बाक़ी रुक गए। थैला पुल की तरफ़ बढ़ा तो उस के पीछे चलने लगे। मैंने सोचा कि माओं के ये लाल बेकार मौत के मुँह में जा रहे हैं। फव्वारे के पास दुबका खड़ा था। वहीं मैंने थैले को आवाज़ दी और कहा। “मत जाओ यार…….क्यों अपनी और उन की जान के पीछे पड़े हो।”

थैले ने ये सुन कर एक अजीब सा क़हक़हा बुलंद किया और मुझ से कहा। “थैला सिर्फ़ ये बताने चला है कि वो गोलीयों से डरने वाला नहीं।” फिर वो अपने साथीयों से मुख़ातब हुआ। “तुम डरते हो तो वापस जा सकते हो।”

ऐसे मौक़ों पर बढ़े हुए क़दम उल्टे कैसे हो सकते हैं। और फिर वो भी उस वक़्त जब लीडर अपनी जान हथेली पर रख कर आगे आगे जा रहा हो। थैले ने क़दम तेज़ किए तो इस के साथीयों को भी करने पड़े।

हाल दरवाज़े से पुल का फ़ासिला कुछ ज़्यादा नहीं……. होगा कोई साठ सत्तर गज़ के क़रीब…….थैला सब से आगे आगे था। जहां से पुल का दोरौया मुतवाज़ी जंगला शुरू होता है, वहां से पंद्रह बीस क़दम के फ़ासले पर दो घुड़सवार गोरे खड़े थे। थैला नारे लगाता जब बंगले के आग़ाज़ के पास पहुंचा तो फ़ायर हुआ, मैं समझा कि वो गिर पड़ा है…….लेकिन देखा कि वो उसी तरह…….ज़िंदा आगे बढ़ रहा है। उस के बाक़ी साथी डर के भाग उठे हैं। मुड़ कर उस ने पीछे देखा और चिल्लाया। “भागो नहीं…….आओ!”

उस का मुँह मेरी तरफ़ था कि एक और फ़ायर हुआ। पलट कर उस ने गोरों की तरफ़ देखा और पीठ पर हाथ फेरा……. भाई जान नज़र तो मुझे कुछ नहीं आना चाहिए था, मगर मैंने देखा कि उस की सफ़ैद बोसकी की क़मीज़ पर लाल लाल धब्बे थे……. वो और तेज़ी से बढ़ा, जैसे ज़ख़्मी शेर……. एक और फ़ायर हुआ। वो लड़खड़ा या मगर एक दम क़दम मज़बूत करके वो घर सवार गोरे पर लपका और चशमज़दन में जाने क्या हुआ……. घोड़े की पीठ ख़ाली थी। गोरा ज़मीन था और थैला इस के ऊपर……. दूसरे गोरे ने जो क़रीब था और पहले बौखला गया था, बिदकते हुए घोड़े को रोका और धड़ा धड़ फ़ायर शुरू करदिए……. इस के बाद जो कुछ हुआ मुझे मालूम नहीं। मैं वहां फव्वारे के पास बेहोश हो कर गिर पड़ा।

भाई जान जब मुझे होश आया तो में अपने घर में था। चंद पहचान के आदमी मुझे वहां से उठा लाए थे। उन की ज़बानी मालूम हुआ कि पुल पर से गोलीयां खा कर हुजूम मुश्तइल होगया था। नतीजा इस इश्तिआल का ये हुआ कि मलिका के बुत को तोड़ने की कोशिश की गई। टाउन हाल और तीन बैंकों को आग लगी और पाँच या छः यूरोपीयन मारे गए। ख़ूब लूट मची।

लूट खसूट का अंग्रेज़ अफ़िसरों को इतना ख़्याल नहीं था। पाँच या छः यूरोपीयन हलाक हुए थे इस का बदला लेने के लिए चुनांचे जलीयाँ वाला बाग़ का ख़ूनीं हादिसा रौनुमा हुआ। डिप्टी कमिशनर बहादुर ने शहर की बाग दौड़ जनरल डावर के सपुर्द करदी। चुनांचे जनरल साहिब ने बारह अप्रैल को फ़ौजीयों के साथ शहर के मुख़्तलिफ़ बाज़ारों में मार्च किया और दर्जनों बेगुनाह आदमी गिरफ़्तार किए। तेराह को जलीयाँ वाला बाग़ में जलसा हुआ। क़रीब क़रीब पच्चीस हज़ार का मजमा था। शाम के क़रीब जनरल डावर मुसल्लह गोरों और सिखों के साथ वहां पहुंचा और निहत्ते आदमीयों पर गोलीयों की बारिश शुरू करदी।

उस वक़्त तो किसी को नुक़्सान जान का ठीक अंदाज़ा नहीं था। बाद में जब तहक़ीक़ हुई तो पता चला कि एक हज़ार हलाक हुए हैं और तीन या चार हज़ार के क़रीब ज़ख़मी…….लेकिन मैं थैले की बात कररहा था……. भाई जान आँखों देखी आप को बता चुका हूँ……. बे-ऐब ज़ात ख़ुदा की है। मरहूम में चारों ऐब शरई थे। एक पेशा तवाइफ़ के बतन से था मगर जियाला था……. मैं अब यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस मलऊन गोरे की पहली गोली भी उस के लगी थी। आवाज़ सुन कर उस ने जब पलट कर अपने साथीयों की तरफ़ देखा था, और उन्हें हौसला दिलाया था जोश की हालत में उस को मालूम नहीं हुआ था कि उसकी छाती में गर्मगर्म सीसा उतर चुका है। दूसरी गोली उस की पीठ में लगी। तीसरी फिर सीने में…….मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो इस के दोनों हाथ उस की गर्दन में इस बरी तरह पैवस्त थे कि अलाहिदा नहीं होते थे……. गोरा जहन्नुम वासिल हो चुका था…….

दूसरे रोज़ जब थैले की लाश कफ़न दफ़न के लिए उस के घर वालों के सपुर्द की गई तो उस का बदन गोलीयों से छलनी होरहा था…….दूसरे गोरे ने तो अपना पूरा पिस्तौल उस पर ख़ाली कर दिया था……. मेरा ख़्याल है उस वक़्त मरहूम की रूह क़फ़स-ए-उंसुरी से परवाज़ कर चुकी थी। इस शैतान के बच्चे ने सिर्फ़ उस के मुर्दा जिस्म पर चांद मारी की थी।

कहते हैं जब थैले की लाश मुहल्ले में पहुंची तो कुहराम मच गया। अपनी बिरादरी में वो इतना मक़बूल नहीं था, लेकिन उस की क़ीमा क़ीमा लाश देख कर सब धाड़ें मार मार कर रोने लगे। उस की बहनें शमशाद और अलमास तो बेहोश होगईं। जब जनाज़ा उठा तो इन दोनों ने ऐसे बीन किए कि सुनने वाले लहू के आँसू रोते रहे।

भाई जान, मैंने कहीं पढ़ा था कि फ़्रांस के इन्क़िलाब में पहली गोली वहां की एक टखयाई के लगी थी। मरहूम मुहम्मद तुफ़ैल एक तवाइफ़ का लड़का था। इन्क़िलाब की इस जद्द-ओ-जहद में इस को जो पहली गोली लगी थी दसवीं थी या पचासवें। इस के मुताल्लिक़ किसी ने भी तहक़ीक़ नहीं की। शायद इस लिए कि सोसाइटी में इस ग़रीब का कोई रुतबा नहीं था। मैं तो समझता हूँ पंजाब के इस ख़ूनीं ग़ुसल में नहाने वालों की फ़हरिस्त में थैले कंजर का नाम-ओ-निशान तक भी नहीं होगा……. और ये भी कोई पता नहीं कि ऐसी कोई फ़हरिस्त तैय्यार भी हुई थी।

सख़्त हंगामी दिन थे। फ़ौजी हुकूमत का दौर दौरा था। वो देव जिसे मार्शल ला कहते हैं। शहर के गली गली कूचे कूचे में डकारता फिरता था। बहुत अफ़रातफ़री के आलम में उस ग़रीब को जल्दी जल्दी यूं दफ़न किया गया जैसे उस की मौत उस के सोगवार अज़ीज़ों का एक संगीन जुर्म थी जिस के निशानात वो मिटा देना चाहते थे।

बस भाई जान थैला मर गया। थैला दफ़ना दिया गया और…….और ये कह कर मेरा हमसफ़र पहली मर्तबा कुछ कहते कहते रुका और ख़ामोश होगया। ट्रेन दनदनाती हुई जा रही थी। पटड़ियों की खटाखट ने ये कहना शुरू कर दिया। थैला मर गया…….थैला दफ़ना दिया गया…….थैला मर गया…….थैला दफ़ना दिया गया। इस मरने और दफ़नाने के दरमयान कोई फ़ासिला नहीं था, जैसे वो इधर मरा और उधर दफ़ना दिया गया। और खट खट के साथ इन अलफ़ाज़ की हम-आहंगी कुछ इस क़दर जज़्बात से आरी थी कि मुझे अपने दिमाग़ से इन दोनों को जुदा करना पड़ा। चुनांचे मैंने अपने हम-सफ़र से कहा। “आप कुछ और भी सुनाने वाले थे?”

चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा। “जी हाँ……. इस दास्तान का एक अफ़सोसनाक हिस्सा बाक़ी है।”

मैंने पूछा। “क्या?”

उस ने कहना शुरू किया। “मैं आप से अर्ज़ कर चुका हूँ कि थैले की दो बहनें थीं। शमशाद और अलमास। बहुत ख़ूबसूरत थीं। शमशाद लंबी थी। पतले पतले नक़्श। ग़लाफ़ी आँखें। ठुमरी बहुत ख़ूब गाती थी। सुना है ख़ां साहब फ़तह अली ख़ां से तालीम लेती रही थी। दूसरी अलमास थी। उस के गले में सुर नहीं था, लेकिन बतावे में अपना सानी नहीं रखती थी। मुजरा करती थी तो ऐसा लगता था कि इस का अंग अंग बोल रहा है। हर भाव में एक घात होती थी……. आँखों में वो जादू था जो हर एक के सर पर चढ़ के बोलता था।”

मेरे हम-सफ़र ने तारीफ़-ओ-तौसीफ में कुछ ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लिया। मगर मैंने टोकना मुनासिब न समझा। थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद इस लंबे चक्कर से निकला और दास्तान के अफ़सोनाक हिस्से की तरफ़ आया। “क़िस्सा ये है भाई जान कि इन आफ़त की परकाला दो बहनों के हुस्न-ओ-जमाल का ज़िक्र किसी ख़ुशामदी ने फ़ौजी अफ़िसरों से कर दिया……. बल्वे में एक मेम…….क्या नाम था उस चुड़ैल का?

…….मिस…….मिस शरवड मारी गई थी…….तय ये हुआ कि उन को बुलवाया जाये और……. और……. जी भर के इंतिक़ाम लिया जाये……. आप समझ गए ना भाई जान?”

मैंने कहा। “जी हाँ!”

मेरे हम-सफ़र ने एक आह भरी “ऐसे नाज़ुक मुआमलों में तवाइफ़ें और कसबीयाँ भी अपनी माएं बहनें होती हैं……. मगर भाई जान ये मुल्क अपनी इज़्ज़त-ओ-नामूस को मेरा ख़्याल है पहचानता ही नहीं। जब ऊपर से इलाक़े के थानेदार को आर्डर मिला तो वो फ़ौरन तैय्यार होगया। चुनांचे वो ख़ुद शमशाद और अलमास के मकान पर गया और कहा कि साहब लोगों ने याद किया है। वो तुम्हारा मुजरा सुनना चाहते हैं…….भाई की क़ब्र की मिट्टी भी अभी तक ख़ुशक नहीं हुई थी। अल्लाह को प्यारा हुए उस ग़रीब को सिर्फ़ दो दिन हुए थे कि ये हाज़िरी का हुक्म सादिर हुआ कि आओ हमारे हुज़ूर नाचो……. अज़िय्यत का इस से बढ़ कर पुर-अज़िय्यत तरीक़ा क्या हो सकता है…….? ……. मुस्तबइद तम्सख़ुर की ऐसी मिसाल मेरा ख़्याल है शायद ही कोई और मिल सके……. क्या हुक्म देने वालों को इतना ख़्याल भी न आया कि तवाइफ़ भी ग़ैरत मंद होती है? …….हो सकती है…….क्यों नहीं हो सकती?” उस ने अपने आप से सवाल किया, लेकिन मुख़ातब वो मुझ से था।

मैंने कहा। “हो सकती है!”

“जी हाँ” …….थैला आख़िर इन का भाई था। उस ने किसी क़िमार ख़ाने की लड़ाई भिड़ाई में अपनी जान नहीं दी थी। वो शराब पी कर दंगा फ़साद करते हुए हलाक नहीं हुआ था। उस ने वतन की राह में बड़े बहादुराना तरीक़े पर शहादत का जाम पिया था। वो एक तवाइफ़ के बतन से था। लेकिन वो तवाइफ़ माँ थी और शमशाद और अलमास उसी की बेटियां थीं और ये थैले की बहनें थीं……. तवाइफ़ें बाद में थीं……. और वो थैले की लाश देख कर बेहोश होगई थीं। जब उस का जनाज़ा उठा था। तो उन्हों ने ऐसे बीन किए थे कि सुन कर आदमी लहू रोता था…….

मैंने पूछा। “वो गईं?”

मेरे हम-सफ़र ने इस का जवाब थोड़े वक़फ़े के बाद अफ़्सुर्दगी से दिया। “जी हाँ……. जी हाँ गईं……. ख़ूब सज बन कर।” एक दम उस की अफ़्सुर्दगी तीखा पन इख़्तियार करगई। “सोला सिंगार करके अपने बुलाने वालों के पास गईं…….कहते हैं कि ख़ूब महफ़िल जमी……. दोनों बहनों ने अपने जौहर दिखाए……. ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ों में मलबूस वो कोह-ए-क़ाफ़ की परियां मालूम होती थीं…….शराब के दौर चलते रहे और वो नाचती गाती रहीं…….ये दोनों दौर चलते रहे …….और कहते हैं कि…….रात के दो बजे एक बड़े अफ़्सर के इशारे पर महफ़िल बरख़ास्त हुई…….” वो उठ खड़ा हूआ और बाहर भागते हुए दरख़्तों को देखने लगा।

पहीयों और पटड़ियों की आहनी गड़गड़ाहट की ताल पर इस के आख़िरी दो लफ़्ज़ नाचने लगे। “बरख़ास्त हुई…….बरख़ास्त हुई।”

मैंने अपने दिमाग़ में उन्हें, आहनी गड़गड़ाहट से नोच कर अलाहिदा करते हुए उस से पूछा। “फिर क्या हुआ?”

भागते हुए दरख़्तों और खंबों से नज़रें हटा कर उस ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा। “उन्हों ने अपनी ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ें नोच डालें और अलिफ़ नंगी होगईं और कहने लगीं…….लो देख लो……. हम थैले की बहनें हैं……. उस शहीद की जिस के ख़ूबसूरत जिस्म को तुम ने सिर्फ़ इस लिए अपनी गोलीयों से छलनी छलनी किया था कि उस में वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी……. हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं…….आओ, अपनी शहवत के गर्मगर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो……. मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुँह पर थूक लेने दो……. ”

ये कह कर वो ख़ामोश होगया। कुछ इस तरह कि और नहीं बोलेगा। मैंने फ़ौरन ही पूछा। “फिर क्या हुआ?”

उस की आँखों में आँसू डबडबा आए। “उन को……. उन को गोली से उड़ा दिया गया।”

मैंने कुछ न कहा। गाड़ी आहिस्ता होकर स्टेशन पर रुकी तो उस ने क़ुली बुला कर अपना अस्बाब उठवाया। जब जाने लगा तो मैं ने उस से कहा। “आप ने जो दास्तान सुनाई, इस का अंजाम मुझे आप का ख़ुद साख़्ता मालूम होता है।”

एक दम चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा। “ये आप ने कैसे जाना?”

मैंने कहा। “आप के लहजे में एक नाक़ाबिल-ए-बयान कर्ब था।”

मेरे हम-सफ़र ने अपने हलक़ की तल्ख़ी थोक के साथ निगलते हुए कहा। “जी हाँ…….उन हराम……. ” वो गाली देते देते रुक गया। “उन्हों ने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया।” ये कह कर वो प्लेटफार्म पर उतर गया।

11-12अक्तूबर1951-ई-

 
सआदत हसन मंटो

रौशनी का टुकड़ा – अभिनव शुक्ल

Raushni Ka Tukda

सूरज की किरणें आकाश में अपने पंख पसार चुकी थीं। एक किरण खिड़की पर पड़े टाट के परदे को छकाती हुई कमरे के भीतर आ गई और सामने की दीवार पर छोटे से सूरज की भाँति चमकने लगी। पीले की बदरंग दीवार अपने उखड़ते हुए प्लास्टर को सँभालती हुई उस किरण का स्वागत कर रही थी।

बिस्तर पर पड़े-पड़े अनिमेष ने अपनी आँखें खोल कर एक बार उस किरण की ओर देखा और फिर आँखें मूँद कर उस अधूरे सपने की कड़ियों को पूरा करने की उधेड़बुन में जुट गया जिसे वह पिछले काफ़ी समय से देख रहा था, पर सपना था कि अपनी पिछली कड़ियों से जुड़ ही नहीं पा रहा था।

कई बार पुतलियों पर ज़ोर डालने के बावज़ूद जब सपना पूरा नहीं हुआ तो उसने अपनी आँखों को दुबारा खोला और दीवार पर पड़ती हुई किरण को देखने लगा। खिड़की से दीवार तक वह किरण वातावरण में उपस्थित छोटे-छोटे रेशों-रजकणों को प्रकाशित करती हुई दीवार पर स्थिर हो रही थी। कमरे का वह वातावरण जो नितांत गतिविधिहीन एवं शांत-सा लग रहा था, एक किरण मात्र के प्रवेश से गतिमान हो उठा था।
वास्तविकता तो यह थी कि किरण ने उस वेग को दृष्टि प्रदान कर दी थी जो अब तक दीप्यमान नहीं था।

दीवार पर पड़ते प्रकाश के बिंब को देखते हुए वह अपने बचपन के उस पड़ाव पर पहुँच गया जब उसका परिवार इलाहाबाद के कटरा मोहल्ले की चूड़ी वाली गली में बने अपने पुश्तैनी मकान में रहता था। वहाँ सब उसे अन्नी पुकारते थे। वह और उसके ताऊजी का बेटा रमन आईने से दीवार पर सूरज की किरणों को चमकाते और फिर उस बिंब को पकड़ने के लिए दौड़ते, पर वह बिंब कभी हाथ में नहीं आता और यदि कभी उनकी नन्हीं-नन्हीं उँगलियाँ रोशनी के उस टुकड़े तक पहुँचती भी तो वह रोशनी उनके हाथों पर बिखर कर रह जाती। फिर भी सूरज के उस बिंब को छूने में जो सुख मिलता वह अतुलनीय था। अनिमेष बिस्तर से उठा और एक बार फिर सूरज की उस किरण को अपने हाथों में कैद करने का प्रयास करने लगा।

समय कितनी तेज़ी से बीतता है। रमन का ब्याह हो गया था और उसने वहीं इलाहाबाद में एक मेडिकल स्टोर खोल लिया था। कल का अन्नी आज का अनिमेष भगत बन चुका था। अनिमेष भगत एक बेरोज़गार, जिसने नौकरी के लिए अपने अलग मापदंड बना रखे थे, एक पुत्र जो अब घर से पैसे मँगाने में शर्म का अनुभव करने लगा था, एक गुमनाम लेखक जिसकी रचनाओं को नगर का कोई भी बड़ा पत्र छापने को तैयार नहीं होता था। वास्तव में अनिमेष अपने भीतर छिपे लेखक को अपने सबसे निकट पाता, धीरे-धीरे घर से पैसे माँगने में शर्म आनी ख़त्म सी होती जा रही थी, वैसे भी अब घरवाले पैसे देने में हिचकिचाने लगे थे। वह चार बार माँगता तो कभी एक बार पैसे आते तो कभी वो भी ना आते। बेरोज़गारी तो अपनी आदत ही डाल चुकी थी। वैसे भी वह लेखक ही था जिसकी बदौलत वह अपनी थोड़ी-सी ज़रूरतों को पूरा करने भर के पैसे जुटा पाता। इलाहाबाद से दिल्ली आए उसे लगभग तीन वर्ष बीत चुके थे। नौकरी की तलाश उसे यहाँ खींच लाई थी, उसने सुना था कि दिल्ली में आने वाले वर्षों में दो लाख से भी अधिक लोगों को रोज़गार उपलब्ध होगा। नौकरियाँ थीं अभियंताओं के लिए, बावर्चियों के लिए, मज़दूरों के लिए, तकनीशियनों के लिए, अंग्रेज़ी को अंग्रेज़ों की तरह बोलने वालों के लिए, पर हिंदी के स्नातक के लिए कोई जगह किसी के पास नहीं थी। इधर उधर प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में कुछ लिख लिखा कर वह अपना जीवन यापन कर रहा था।
समय के साथ पत्रकारिता ने अपना स्वरूप बदला है। समाचार पत्र पढ़ने के स्थान पर अब लोग न्यूज़ चैनल्स पर जीवंत समाचार देखना अधिक पसंद करते हैं। आज के समय में लेखक की जो स्थिति है वो भी किसी से छिपी नहीं है। पत्रकारिता के क्षेत्र में जो बदलाव आया है उसकी तीव्र गति में अनेक लेखक और कवि ऐसे हैं जो अचानक पीछे छूट गए हैं। अनिमेष लिखता तो अच्छा था परंतु नवयुग जिस गति और जिस लयात्मकता की माँग उससे करता वह उसके पास न थी। संपादक चाहते थे कि वह कुछ चटपटा लिखे, कुछ ऐसा जिसको पढ़कर उत्तेजना पैदा की जा सके पर वह जो लिखता था उसको यह कहकर नहीं छापा जाता था कि ऐसा तो पहले भी बहुत बार लिखा जा चुका है।

इस सबके बावजूद नगर में छपने वाले एक साप्ताहिक समाचार पत्र ”उजागर” में अनिमेष की रचना अवश्य छपती थी। प्रत्येक रविवार को प्रकाशित होने वाले इस पत्र में लेख, कहानी, कविता या जो कुछ भी उसने लिखा होता वह छप जाता और दो सौ रुपए अनिमेष के हाथ पर रख दिए जाते। इस पत्र के संपादक थे श्रीमान राकेश पराशर। अनिमेष आज तक संपादक जी के इस स्नेह को समझ नहीं पाया था, न तो वह उनकी जाति का था, न उनके क्षेत्र से था और न ही संपादक महोदय को कोई लाभ पहुँचाने की स्थिति में ही था, फिर भी उसकी रचनाएँ निर्बाध रूप से छपती आ रही थीं।

ऐसा सुनते हैं कि राकेश जी भी बहुत दिनों तक अपनी रचनाओं को छपवाने हेतु इधर उधर भेजते रहे थे और अंतत: थक हार कर उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस का काम शुरू किया। काम अच्छा चल पड़ा तो अंदर छिपे लेखक ने एक बार फिर अंगड़ाइयाँ लेना प्रारंभ कर दिया तथा उन्होंने अपने स्वयं के अख़बार ”उजागर” की नींव रखी। आस-पास के परिचित दुकानदारों से कुछ विज्ञापन मिल जाते और बाकी पैसे वे अपनी जेब से लगाते थे। नए लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करने में उन्हें आनंद आता था। सुनते तो ऐसा भी हैं कि आजकल के कुछ प्रतिष्ठित लेखक उनके आँगन से होकर ही अपने लक्ष्य तक पहुँचे हैं परंतु उन लेखकों के नाम किसी को पता नहीं थे। अनिमेष को ऐसा नहीं लगता था कि वह भी दूसरे प्रसिद्ध लेखकों की तरह यहीं से अपने आपको लेखन की दुनिया में सिद्ध कर सकेगा।

अनिमेष को कई बार यह सोचकर दुख होता था कि उसकी रचनाओं को बहुत कम लोग ही पढ़ते थे। कलम से क्रांति का जो स्वप्न वह एक अरसे से देखता आ रहा था वह उसको टूटता-सा लगता। ”उजागर” की कुल दो हज़ार प्रतियाँ छपती थीं जिसमें से अधिकतर आस पास के दुकानदारों में मुफ़्त बाँट दी जातीं और बाकी प्रेस से ही कबाड़ी वाले के पास पहुँच जातीं। स्कूलों के बाहर खड़े फेरीवाले आमतौर पर ”उजागर” पर ही चने कुरमुरे आदि बेचते थे। कुल सौ-दो सौ प्रतियाँ ही असली पाठकों तक पहुँचतीं जिसमें से अधिकतर मुख्य ख़बरों के आगे कम ही बढ़ते थे। ऐसे में चौथे पृष्ठ पर छपने वाले लेख को कितने लोग पढ़ते होंगे यह कहना कठिन नहीं था।

अनिमेष अन्य नामी-गिरामी पत्रों में भी यदा-कदा अपनी रचनाएँ भेजता रहता था। परंतु उन पत्रों ने तो जैसे उसकी रचनाओं को न छापने की कसम खा रखी थी। ”दैनिक प्रकरण” से कल ही उसका लेख वापस आया था, वह लेख जो उसने हिंदू मुस्लिम एकता पर लिखा था, इसी एकता की कड़ियों में उलझकर एक लिफ़ाफ़े के रूप में उसके सिरहाने पड़ा था। अलसाए हुए अनिमेष ने एक दृष्टि उस लिफ़ाफ़े की ओर डाली, उठकर टूथपेस्ट को अपने ब्रश में लगाया तथा कमरे से बाहर निकल आया। बरामदे में लगे आईने पर जब उसकी नज़र पड़ी तो अपनी आँखों के नीचे उभरती हुई कालिख को देखकर वह एक बार ठिठका और फिर मन ही मन अपने आपसे कुछ कहता हुआ आगे बढ़ा।

“उठो भाई एक और दिन तैयार है तुमसे दो-दो हाथ करने के लिए। अभी बाबूलाल भी किराया-किराया चिल्लाता हुआ आ रहा होगा। यहाँ आँखों के नीचे तो ऐसी कालिख जम रही है कि मानो रात भर इन्होंने कोयले की खान में काम किया हो। अम्मा अगर इस हालत में देख लें तो पहचान भी ना पाएँ। चलूँ, राकेश जी को ये लेख देता हूँ जाकर, एक वही हैं जो इसको छाप सकते हैं वरना यदि बाकी पत्रों का बस चले तो हिंदू मुस्लिम एकता को शब्दकोष से ही बाहर करवा दें।”
खैऱ, चाहे जितने लोग उस अख़बार को पढ़ते हों पर कोई एक पाठक ऐसा था जो एक पोस्टकार्ड पर अपनी प्रतिक्रिया लिखकर अवश्य भेजता था। पच्चीस पैसे का वह पोस्टकार्ड भले ही हज़ारों का ना होता हो पर अनिमेष के लिए वह दो सौ रुपए का तो हो ही जाता क्यों कि उसको पाने के बाद ही वह अपने अगले लेख को लिखने की हिम्मत जुटा पाता। अनिमेष को ऐसा लगता कि यदि कोई उसकी रचना पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है तो हो ना हो कहीं ना कहीं उसकी कलम अपने उद्देश्य में सफल हो रही है। कमरे में वापस आकर उसने एक बार फिर पोस्टकार्ड को देखा,
“प्रिय लेखक जी,
आज आपका लेख पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ऐसी मनोहारी रम्य रचना पढ़े एक अरसा बीत गया था। भ से भारत, भ से भूख और भ से भ्रष्टाचार की श्रृंखलाओं को आपने एक कुशल चितेरे की तरह अपने कैनवस पर उतारा है। लेख की भाषा और शैली भी बहुत अच्छी लगी। व्यंग्यात्मकता के पुट के कारण लेख और भी सुंदर बन पड़ा है। आशा है कि आगे भी आप ऐसे ही उत्तम लेखों से हम पाठकों की तृष्णा को शांत करते रहेंगे।
आपका
पाठक

अब तक कम से कम बीस बार वह इसको पढ़ चुका था। पर उसे ऐसा लगता मानो प्रशंसा अथवा प्रतिक्रिया के यह शब्द उसको असीम शक्ति प्रदान कर रहे हों। कभी-कभी तो उसको ऐसा लगता कि यदि यह पोस्टकार्ड उसके पास ना आए तो वह आगे कुछ भी लिख ना पाए। वैसे वह यह भी जानता था कि उसका ऐसा सोचना एक अंधविश्वास से अधिक कुछ भी नहीं था परंतु ऐसा अंधविश्वास जिससे व्यक्ति को प्रेरणा मिलती हो, विश्वास करने योग्य होता है। पोस्टकार्ड के अक्षर-अक्षर को एक बार पुन: अपने मानस में बिठाकर अनिमेष ने अपनी सायकिल उठाई और ”उजागर” के दफ़्तर की ओर बढ़ चला। कुछ ही समय में अपने लेख को बगल में दबाए वह राकेश जी के सामने खड़ा था। उसने लेख को राकेश जी के आगे बढ़ाया, राकेश ने अनिमेष की आँखों में आँखें डालते हुए कहा,
“अरे, ये खेद सहित का पर्चा तो हटा देते। कितनी बार समझाया है तुम्हें कि तुम हमारे पेटेंट लेखक हो, मगर तुम मानते नहीं हो। बडे पत्रों में छपने के लिए बड़ा नाम, बड़ी जान पहचान का होना बहुत आवश्यक है। लिफ़ाफ़ा वापस आने पर होने वाले दुख से मैं भी परिचित हूँ पर ऐसे ही कोई प्रेमचंद थोड़े ही बन जाता है। देखूँ तो क्या लिखा है तुम्हारी आग उगलती धारदार कलम ने, हमम ह़िंदु मुस्लिम बढ़िया है, छप जाएगा, ये लो भाई हमारा आशीर्वाद।” इतना कहते हुए उन्होंने दो सौ रुपए अनिमेष को पकड़ा दिए। अनिमेष रुपए लेकर चुपचाप अपने घर की ओर चल पड़ा।

अनिमेष के जीवन में एक और बड़ा ही महत्वपूर्ण प्राणी था, उसका मकान मलिक बाबूलाल जो उसके कमरे के सामने वाले कमरे में ही रहता था। कभी वह किसी से बोलता तो ऐसे मानो कोई बहुत बड़ा एहसान कर रहा हो। उसकी बातचीत को झगड़े में बदलते ज़्यादा समय नहीं लगता था। पिछले चार महीनों में अनिमेष को कई बार बत्ती जलती छोड़ देने की वजह से फटकार पड़ चुकी थी। कमरे का किराया पाँच सौ रुपए था, कमरे के अलावा एक कुर्सी, एक मेज़ और एक तखत भी उस कमरे में पहले से पड़े थे, बिजली का अलग से कुछ नहीं लिया जाता था अत: यदि बाबूलाल बिना मतलब बत्ती जलती देख लेता तो आगबबूला हो उठता। इधर हमारे लेखक बाबू को लिखते-लिखते सोने की आदत थी, तो सामन्यत: कई बार लाईट बुझाना भूल भी जाते थे।

बाबूलाल को बीड़ी और शराब पीने की लत थी। शराब पीने के बाद तो कभी-कभी वो बड़ी ऊलजलूल हरकतें करता, कभी किसी के दरवाज़े पर जाकर ज़ोर-ज़ोर से कोई पुराने ज़माने का फ़िल्मी गीत गाता और कभी आसमान की ओर देखकर चाँद तारों को गालियाँ बकता रहता। कई बार वह घर के बाहर खड़े यूकेलिप्टस के पेड़ से चिपक-चिपक कर रोता रहता, ऐसे ही एक दिन उसने अनिमेष को बतलाया कि उसके पिता ने यह वृक्ष उसी दिन लगाया था जिस दिन उसका जन्म हुआ था, इस रिश्ते से वह पेड़ बाबूलाल को अपने जुड़वाँ भाई की तरह लगता था। इसके अलावा भी वह अनेक बेतुकी हरकतें किया करता था। एक दिन शराब के नशे में धुत होकर उसने अपने पड़ोसी के लड़के को बिना बात के ही बहुत पीटा। उस दिन के बाद से आस पास के लोगों ने बाबूलाल का एक प्रकार से बहिष्कार ही करना प्रारंभ कर दिया। उसकी ऐसी ही हरकतों से तंग आकर उसका पुत्र टीटू अपने परिवार के संग एक दूसरे मोहल्ले में रहने लगा था, परंतु बाबूलाल सबसे यही कहते थे कि उसने अपने बेटे और बहू से तंग आकर घर से निकाल दिया है।
जैसे ही अनिमेष घर में घुसा बाबूलाल ने उसका दरवाज़ा खटखटाया।
“आज एक तारीख़ है किराया कहाँ है।”
“जी, अभी तो मेरे पास दो सौ रुपए ही हैं।”
“लाओ, अभी इतने ले रहा हूँ पर याद रहे कि बाकी के तीन सौ रुपए भी जल्दी मिल जाने चाहिए, नहीं तो मुझे समाज सेवा करने का कोई शौक नहीं है।”
“बाकी के पैसे आपको दो दिन में लाकर दे दूँगा।” इतना कहकर अनिमेष अपने कमरे में आ गया।
तीन दिन बीत चुके थे, अनिमेष रात को देर से सोया था अत: अभी तक उठा नहीं था। बाबूलाल उसके कमरे के बाहर खड़ा अंदर जलती हुई बत्ती को देख रहा था। ना जाने जलते हुए एक बल्ब को देखकर कितने वॉट का करंट उसके शरीर में दौड़ जाता था। लेकिन उसने सोचा कि किराया लेने के बाद ही कुछ बोलेगा। कहीं ये लड़का बिदक गया तो? उसने आवाज़ दी,
”उठो भैया, ज़रा बाहर आओ।”
अनिमेष आँखे मलता हुआ बाहर आ गया।
”तीन दिन हो गए हैं, बाकी के तीन सौ रुपए?”
”अभी नहीं हैं मेरे पास, जब होंगे तब दे जाऊँगा। सुबह-सुबह जगा दिया आपने, अब तो आज का पूरा दिन ख़राब होगा।”
”देखो भाई, मैंने कोई खैऱाती अस्पताल नहीं खोल रखा है, मुझको अभी पैसे चाहिए।”
”अभी नहीं हैं मेरे पास, कहाँ से दूँ?”
एक तो रात भर बल्ब जला था और दूसरा अनिमेष पैसे भी नहीं दे रहा था, अब तक बाबूलाल का पारा चढ़ चुका था। वह गुस्साते हुए बोला,
”तुमको शर्म नहीं आती है, मेरे पैसे मारकर बैठे हो, मेरे इतनी बार समझाने पर भी लाईट जलाकर सोते हो, तुम्हारे जैसे किराएदार से निभा पाना मेरे लिए और अधिक संभव नहीं है। निकल जाओ मेरे घर से, मैं शरीफ़ आदमी हूँ इसलिए तुमको कल सुबह तक का समय देता हूँ कि अपने लिए कोई जगह देख लो और भगवान के लिए मेरा पीछा छोड़ो। इतने नखरे तो मैंने अपने बेटे के नहीं देखे और एक बात याद रखना, मेरे पैसे दिए बिना तुम अपना सामान यहाँ से नहीं ले जा सकते हो।”
अनिमेष इस अचानक हुए आक्रमण के लिए तैयार नहीं था। परंतु वह भी रोज़-रोज़ की इस चिक-चिक से तंग आ चुका था अत: उसने बाबूलाल से कह दिया कि वह घर छोड़ देगा।
घर से निकलकर अनिमेष सीधे ”उजागर” के दफ़्तर पहुंचा। आज अनिमेष बहुत दुखी था, एक तो सुबह-सुबह बाबूलाल से झगड़ा हुआ और दूसरी ओर उसके पाठक का पत्र जो लेख छपने के दो दिन के अंदर अख़बार के दफ़्तर पहुँच जाता था, अभी तक नहीं पहुँचा था। अपने आप को सांत्वना देते हुए मन ही मन उसने सोचा कि,
“जो होता है अच्छे के लिए ही होता है, राकेश जी ने मुझे चार सौ रुपए एडवांस दे दिए हैं तथा पास ही एक जगह रहने की बात भी कर ली है, मैं अभी जाकर ये पैसे बाबूलाल के मुँह पर मारता हूँ। सुबह तक वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं है, जहाँ स्नेह नहीं है वहाँ रहना भी नहीं है।”

ऐसे भावों को मन में लिए अनिमेष दफ़्तर से उठा और सीधे बाबूलाल के कमरे की ओर चल पड़ा। बाबूलाल उस समय अपनी बीड़ी जलाने के लिए माचिस ढूँढ रहा था, उसने चुपचाप पैसे लिए तथा फिर माचिस ढूँढ़ने के कर्म में लीन हो गया। अनिमेष अपने कमरे में आया और एक-एक करके सामान रखने लगा।
“कह तो ऐसे रहा था कि सामान रख लूँगा जैसे मेरी कोई इज़्ज़त नहीं है। पर सामान है ही क्या, मेरे पास ये चार डायरियाँ हैं, एक पेन है, एक दरी है, एक तकिया और ये बल्ब और कुछ कपड़े। शायद तीन सौ रुपए से ज़्यादा का ही हो। अब मुझे क्या करना, पैसे तो दे ही दिए हैंं, अब चलता हूं।”
कोने में पड़ी कुर्सी मेज को देखकर वह ठिठका, इसपर बैठ कर उसने कितने ही लेख लिखे थे। खिड़की खुली हुई थी, लगा बाहर यूकेलिप्टस मानो कुछ कहना चाहता था। अनिमेष कुछ देर खिड़की के बाहर देखता रहा, उसे लगा मानो आज वह वृक्ष ही उससे रुकने के लिए कह रहा हो। उसने अपनी कलम उठाई और बैठकर कुछ सोचने लगा।

”मैंने पैसे तो दे ही दिए हैं, अब यदि कल सुबह तक रुक जाऊँ तो कोई ग़लत बात नहीं है। वैसे भी इस कुर्सी से, इस मेज़ से इस तखत से और बाहर लगे इस यूकेलिप्टस से मुझको अपनापन भी मिला है और प्रेरणा भी, भले ही इनके मालिक ने मुझे दुत्कारा हो। अब जो अपने बेटे का न हुआ वह किसी और का क्या होगा। मनुष्य को न जाने किस चीज़ की भूख है और न जाने यह कैसे शांत होगी। बाबूलाल कितना पैसा दबाए बैठा है पर और-और की रट तो जैसे छूटती ही नहीं या फिर शायद मकान मालिक बनने के बाद मानव का स्वभाव ऐसा ही हो जाता है, पता नहीं, अगर वो अपने आपको तीस मार खाँ समझता है तो मैं भी कुछ कम नहीं हूँ, आज नहीं जाऊँगा, कल सुबह ही खाली करूंगा।”

अनिमेष काफ़ी देर तक कुर्सी पर बैठा रहा परंतु कुछ लिख नहीं पाया। बैठे-बैठे ही कब उसकी आँख लग गई उसे पता ही न चला। रात के लगभग दो बजे किसी ने दरवाज़े को ज़ोर से खटखटाया, अनिमेष ने उठकर जब किवाड़ खोला तो देखा कि बाबूलाल सामने खड़ा है, उसका चेहरा पसीने से लथपथ था।
“दर्द से छाती फटी जा रही है। ज़रा डाक्टर को बुला लाओ।”
इतना कहकर बाबूलाल वहीं दरवाज़े पर बैठ गया।

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था, पहले भी कई बार कभी खांसी तो कभी ज़ुकाम, कुछ न कुछ होता ही रहता था। बूढ़ी देह थी, ऊपर से बीड़ी पीने का शौक तो रोग कितने दिन दूर रहते। जब भी बाबूलाल को कोई समस्या होती तो वह दौड़ा-दौड़ा अनिमेष के पास ही आता। आज अनिमेष का पारा भी सातवें आसमान पर था लेकिन बाबूलाल को कराहते देख अनिमेष उसे सहारा देकर उसके कमरे तक ले गया, बिस्तर पर लिटा कर पानी पिलाया और बाहर आ गया।
“मुझे तो लगा कि बत्ती जलती हुई देखकर एक बार फिर अपने स्नेह की वर्षा मुझ पर करने आया है। मुझसे मकान खाली करने को कह रहा था। मैं नहीं जाऊँगा किसी डाक्टर को बुलाने और वैसे भी इस समय रात के तीन बजे कौन से डाक्टर साहब राज़ी हो जाएँगे यहाँ आने के लिए और मान लो मैं शाम को ही चला गया होता तो।”
मन ही मन ऐसा सोचते हुए अनिमेष ने बाबूलाल के कमरे में झाँक कर देखा, बाबूलाल गहरी नींद में सो चुका था। अनिमेष ने अंदर जाकर उसे चादर ओढ़ाई और अपने कमरे की ओर चल पड़ा।
“कल सुबह जाने से पहले डॉ साहब को ले ही आऊँगा, लगता है कि दर्द ज़्यादा हो रहा था नहीं तो इतनी रात गए मेरे कमरे में ना आता।”

सुबह-सुबह अनिमेष डॉ पवार को अपने साथ लेकर आ गया। दरवाज़ा खोलकर जब वह अंदर पहुँचा तो उसने देखा कि बाबूलाल का शरीर अकड़ रहा है। डॉ साहब ने बताया कि बाबूलाल की मौत तो चार पाँच घंटे पहले ही हो चुकी है। अनिमेष ने घड़ी में देखा तो सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। बाहर लगे यूकेलिप्टस के पत्ते झर रहे थे। कुछ ही देर में टीटू अपने परिवार के साथ पहुँच गया। उसके आते ही रोना धोना चालू हो गया। अनिमेष स्तब्ध-सा सबकुछ देख रहा था। बाबूलाल के शरीर को बिस्तर से उठाकर ज़मीन पर रख दिया गया। बिस्तर पर पड़ी चादर और गद्दे को भी हटाया गया। चादर के नीचे एक पोस्टकार्ड पड़ा था जिसपर लिखा था कि,
“प्रिय लेखक जी,
आज आपका लेख पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। हमारे नेताओं ने भी अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो वाली पालिसी ही अपना रखी है। आपके लेख में एक आम आदमी के मज़हब की जो बातें बताई गई हैं वे प्रशंसनीय हैं। इधर स्वास्थ्य में कुछ गड़बड़ी की वजह से आज मैं पत्र डाल नहीं पा रहा हूँ। एक दो दिन में अवश्य पोस्ट कर दूँगा।
आपके अगले लेख के इंतज़ार में,
आपका,
पाठक”

टीटू ने पत्र को एक ओर रखा तथा अर्थी तैयार करने लगा। अचानक अनिमेष दहाड़ें मार-मार कर रोने लगा, आस पास के सब लोगों ने उसे सांत्वना देने के अनेक प्रयास किए पर अनिमेष की आँखों से बहती हुई अश्रुधारा रुक ही नहीं रही थी। लोग कह रहे थे कि देखो मकान मालिक और किराएदार में पिता पुत्र-सा स्नेह था, तभी सूरज की एक किरण परदे के पीछे से आई और दीवार पर स्थिर हो गई।

Terrorism, Terrorist in US

वे – सुशांत सुप्रिय

रेलगाड़ी के इस डिब्बे में वे चार हैं, जबकि मैं अकेला । वे हट्टे-कट्टे हैं , जबकि मैं कमज़ोर-सा । वे लम्बे-तगड़े हैं, जबकि मैं औसत क़द-काठी का । जल्दबाज़ी में शायद मैं ग़लत डिब्बे में चढ़ गया हूँ । मुझे इस समय यहाँ इन लोगों के बीच नहीं होना चाहिए — मेरे भीतर कहीं कोई मुझे चेतावनी दे रहा है ।

देश के कई हिस्सों में दंगे हो रहे हैं । हालाँकि हमारा इलाक़ा अभी इससे अछूता है पर कौन जाने कब कहाँ क्या हो जाए । अगले एक घंटे तक मुझे इनसे सावधान रहना होगा । तब तक जब तक मेरा स्टेशन नहीं आ जाता ।

मैं चोर-निगाहों से उन चारों की तरफ़ देखता हूँ । दो की लम्बी दाढ़ी है । चारों ने हरा कुर्ता- पायजामा और जाली वाली सफ़ेद टोपी पहन रखी है । वे चारों मुझे घूर क्यों रहे हैं? कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं? कहीं उनके इरादे ख़तरनाक तो नहीं ?

भय की एक महीन गंध हवा में घुली हुई है । मैं उसे न सूँघना चाहूँ तो भी वह मेरी नासिकाओं में आ घुसती है और फिर दिमाग़ तक पैग़ाम पहुँच जाता है जिससे मैं अशांत हो उठता हूँ । किसी अनहोनी, किसी अनिष्ट का मनहूस साया मुझ पर पड़ने लगता है और बेचैनी मेरे भीतर पंख फड़फड़ाने लगती है ।

देश के कई शहरों में आतंकवादियों ने बम-विस्फोट कर दिए हैं जिनमें कई लोग मारे गए हैं । इसके बाद कई जगह अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ दंगे शुरू हो गए हैं । पथराव, आगज़नी , और लूट-मार के बाद कई जगह कर्फ़्यू लगाना पड़ा है । मैं चैन से जीना चाहता हूँ लेकिन ‘चैन’ आज एक दुर्लभ वस्तु बन गया है । दुर्लभ और अप्राप्य । नरभक्षी जानवरों-सी शंकाएँ मुझे चीरने-फाड़ने लगी हैं ।

एक बार फिर मेरी निगाह उन चारों से मिलती है । उनके धूप-विहीन चेहरों पर उगी ऊष्मा-रहित आँखें मेरी ओर ही देख रही हैं ।वे लोग हमसे कितने अलग हैं । हम
सूरज की पूजा करते हैं जबकि उनको चाँद प्यारा है । हम बाएँ से दाईं ओर लिखते हैं जबकि वे लोग इसके ठीक उल्टे दाएँ से बाईं ओर लिखते हैं । हमारे सबसे पवित्र स्थल इसी देश में हैं जबकि उनके इस देश से बाहर हैं । उनकी नाक, उनके चेहरे की बनावट, उनकी क़द-काठी, उनका रूप-रंग — सब हमसे कितना अलग है ।

वे मुझे घूर क्यों रहे हैं ? कहीं वे चारों आतंकवादी तो नहीं ? कहीं उनके बैग में ए. के. ४७ और बम तो नहीं ? ठण्ड की शाम में भी मुझे पसीना आ रहा है । बदन में कँपकँपी-सी महसूस हो रही है । एक तीखी लाल मिर्च मेरी आँखों में घुस गई है । प्यास के मारे मेरा गला सूखा जा रहा है । जीभ तालू से चिपक कर रह गई है । मैं चीख़ना चाहूँ तो भी गले से आवाज़ नहीं निकलेगी । मेरी बग़लें पसीने से भींग गई हैं । माथे से गंगा-जमुना-सरस्वती बह निकली है ं । क्या आज मैंने बी. पी. की गोली नहीं खाई ? मेरे माथे की नसों में इतना तनाव क्यों भर गया है? मेरी आँखों के सामने यह अँधेरा क्यों छा रहा है ? क्या मुझे चक्कर आ रहा है? मुझे साँस लेने में तकलीफ़ क्यों हो रही है ? मेरे सीने पर यह भारी पत्थर किसने रख दिया है…

अरे, वह दाढ़ी वाला शख़्स उठ कर मेरी ओर क्यों बढ़ा आ रहा है… क्या वह मुझे छुरा मार देगा… हे भगवान् , डिब्बे में कोई पुलिसवाला भी नहीं है … आज मैं नहीं बचूँगा… इनकी गोलियों और बमों का निवाला बन जाऊँगा… इनके छुरों का ग्रास बन जाऊँगा… दीवार पर टँगी फ्रेम्ड फ़ोटो बन जाऊँगा… अतीत और इतिहास बन जाऊँगा… तो यूँ मरना था मुझे… दंगाइयों के हाथों… भरी जवानी में… रेलगाड़ी के ख़ाली डिब्बे में … अकारण… पर अभी मेरी उम्र ही क्या है… मेरे बाद मेरे बीवी-बच्चों का क्या होगा… नहीं-नहीं… रुको… मेरे पास मत आओ… मैं अभी नहीं मरना चाहता… तुम्हें तुम्हारे ख़ुदा का वास्ता , मेरी जान बख़्श दो…ओह, मेरे ज़हन में ये मक्खियाँ क्यों भिनभिना रही हैं …

“भाईजान, क्या आपकी तबीयत ख़राब है? इतनी ठण्ड में भी आपको पसीना आ रहा है! आप तो काँप भी रहे हैं । लगता है , आपको डाॅक्टर की ज़रूरत है । आप घबराइए नहीं । हौसला रखिए । हम आपके साथ हैं । अल्लाह सब ठीक करेगा ।” वह आदमी मेरी चेतना के मुहाने पर दस्तक दे रहा है ।

वह कोई नेक आदमी लगता है…अब उस आदमी की शक्ल १९६५ के हिंद-पाक युद्ध के हीरो अब्दुल हमीद की शक्ल में बदल रही है… नहीं-नहीं , अब उसकी शक्ल हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अबुल कलाम में तब्दील हो गई है … अरे, अब उसकी शक्ल मशहूर ग़ज़ल-गायक ग़ुलाम अली जैसी जानी-पहचानी लग रही है… अब वह शख़्स ग़ुलाम अली के अंदाज़ में गा रहा है–

ये बातें झूठी बातें हैं
ये लोगों ने फैलाई हैं …

आह, ये सिर-दर्द… ओह, ये अँधेरा…

गाड़ी रुक चुकी है… शायद स्टेशन आ चुका है… वे लोग मुझे सहारा दे कर गाड़ी से उतार रहे हैं… अब वे मुझे कहीं ले जा रहे हैं… अब मैं अस्पताल में हूँ… उन्होंने मुझसे नंबर ले कर फ़ोन करके मेरी पत्नी सुमी को बुला लिया है… नहीं-नहीं, मैं ग़लत था… वे अच्छे लोग हैं… इंसानियत अभी ज़िंदा है…

“इनका बी. पी. बहुत हाई हो गया था । मैडम, आप इन चारों का शुक्रिया अदा करें कि ये लोग आपके हसबेंड को समय से यहाँ ले आए । दवा देने से बी. पी. अब कंट्रोल में है । अब आप इन्हें घर ले जा सकती हैं । इन्हें ज़्यादा-से-ज़्यादा आराम करने दें ।” डाॅक्टर सुमी से कह रहे हैं ।

अब मैं पहले से ठीक हूँ । पत्नी और वे चारों मुझे अस्पताल से बाहर ले कर आ रहे हैं । हम टैक्सी में बैठ गए हैं ।

“भाई साहब, मैं आप सब की अहसानमंद हूँ । मैं आप सब का शुक्रिया कैसे अदा करूँ? आप सब की वजह से ही आज इनकी जान…।” सुमी की आँखों में कृतज्ञता के आँसू हैं ।

“कैसी बात करती हो, बहन ! हमने जो किया, इंसानियत के नाते किया । अपने भाई के लिए किया । अल्लाह की यही मर्ज़ी थी । “

मैं बेहद शर्मिंदा हूँ । अपना सारा काम-काज छोड़ कर वे चारों मेरी मदद करते रहे । हम सब एक ही माँ की संतानें हैं । हम एक इंसान की दो आँखें हैं । हम एक ही मुल्क़ के बाशिंदे हैं । हमारा ख़ून-पसीना एक है । वे ग़ैर नहीं, हममें से एक हैं…

” ख़ुदा हाफ़िज़ , भाई । अपना ख़याल रखिए ।”

” ख़ुदा हाफ़िज़ । “

टैक्सी चल पड़ी है । दूर जाती हुई उन चारों की पीठ बड़ी जानी-पहचानी-सी लग रही है । जैसे उनकी पीठ मेरे पिता की पीठ हो । जैसे उनकी पीठ मेरे भाई की पीठ हो । ऐसा लग रहा है जैसे मैं उन्हें बरसों से जानता था ।

टैक्सी मेरे घर की ओर जा रही है । बाहर आकाश में सितारे टिमटिमा रहे हैं।
देर से उगने वाला चाँद भी अब आसमान में ऊपर चढ़ कर चमक रहा है और मेरी राह रोशन कर रहा है ।

और सुमी मेरा माथा सहलाते हुए कह रही है: ” वे इंसान नहीं, फ़रिश्ते थे…”

सुशांत सुप्रिय
मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा
५१७४, श्यामलाल बिल्डिंग ,
बसंत रोड , ( निकट पहाड़गंज ) ,
नई दिल्ली – ११००५५
मो: 09868511282 / 8512070086
ई-मेल: sushant1968@gmail.com

Child Abuse, Child in India, Khel, Play, Childhood

खेल – जैनेन्द्र कुमार

Indian Abuse, Indian Girl, Indian Child Abuse

मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुकास्थल पर एक बालक और बालिका सारे विश्व को भूल, गंगा-तट के बालू और पानी से खिलवाड़ कर रहे थे।
बालक कहीं से एक लकड़ी लाकर तट के जल को उछाल रहा था। बालिका अपने पैर पर रेत जमाकर और थोप-थोपकर एक भाड़ बना रही थी।

बनाते-बनाते बालिका भाड़ से बोली- “देख ठीक नहीं बना, तो मैं तुझे फोड़ दूंगी।” फिर बड़े प्यार से थपका-थपकाकर उसे ठीक करने लगी। सोचती जाती थी- “इसके ऊपर मैं एक कुटी बनाउंगी, वह मेरी कुटी होगी। और मनोहर…? नहीं, वह कुटी में नहीं रहेगा, बाहर खड़ा-खड़ा भाड़ में पत्ते झोंकेगा। जब वह हार जाएगा, बहुत कहेगा, तब मैं उसे अपनी कुटी के भीतर ले लूंगी।
मनोहर उधर पानी से हिल-मिलकर खेल रहा था। उसे क्या मालूम कि यहाँ अकारण ही उस पर रोष और अनुग्रह किया जा रहा है।

बालिका सोच रही थी- “मनोहर कैसा अच्छा है, पर वह दंगाई बड़ा है। हमें छेड़ता ही रहता है। अबके दंगा करेगा, तो हम उसे कुटी में साझी नहीं करेंगे। साझी होने को कहेगा, तो उससे शर्त करवा लेंगे, तब साझी करेंगे।‘ बालिका सुरबाला सातवें वर्ष में थी। मनोहर कोई दो साल उससे बड़ा था।

बालिका को अचानक ध्यान आया-‘भाड़ की छत तो गरम हो गई होगी। उस पर मनोहर रहेगा कैसे?’ फिर सोचा-‘उससे मैं कह दूंगी, भाई, छत बहुत तप रही है। तुम जलोगे, तुम मत आओ। पर वह अगर नहीं माना, मेरे पास वह बैठने को आया ही, तो मैं कहूंगी, भाई, ठहरो, मैं ही बाहर आती हूं। पर वह मेरे पास आने की जिद करेगा क्या…? जरूर करेगा, वह बड़ा हठी है। …पर मैं उसे आने नहीं दूंगी। बेचारा तपेगा – भला कुछ ठीक है! …ज्यादा कहेगा, तो मैं धक्का दे दूंगी, और कहूंगी, अरे, जल जाएगा मूर्ख!’ यह सोचने पर उसे बड़ा मजा-सा आया, पर उसका मुंह सूख गया। उसे मानो सचमुच ही धक्का खाकर मनोहर के गिरने का हास्योत्पादक और करुण दृश्य सत्य की भांति प्रत्यक्ष हो गया ।

बालिका ने दो-एक पक्के हाथ भाड़ पर लगाकर देखा-भाड़ अब बिलकुल बन गया है । मां जिस सतर्क सावधानी के साथ अपने नवजात शिशु को बिछौने पर लेटाने को छोड़ती है, वैसे ही सुरबाला ने अपना पैर धीरे-धीरे भाड़ के नीचे से खींच लिया । इस क्रिया में वह सचमुच भाड़ को पुचकारती-सी जाती थी । उसके पांव ही पर तो भाड़ टिका है, उसी का आश्रय हट जाने पर बेचारा कहीं टूट न पड़े पैर साफ निकालने पर भाड़ जब ज्यों का त्यों टिका रहा, तब बालिका एक बार आह्लाद से नाच उठी ।

बालिका एकबारगी ही बेवकूफ मनोहर को इस अलौकिक चातुर्य से परिपूर्ण भाड़ के दर्शन के लिए दौड़कर खींच लाने को उद्यत हो गई । मूर्ख लड़का पानी से उलझ रहा है, यहां कैसी जबरदस्त कारगुजारी हुई है-सो नहीं देखता! ऐसा पक्का भाड़ उसने कहीं देखा भी है!

पर सोचा-अभी नहीं; पहले कुटी तो बना लूं । यह सोचकर बालिका ने रेत की एक चुटकी ली और बड़े धीरे से भाड़ के सिर पर छोड़ दी । फिर दूसरी, फिर तीसरी, फिर चौथी । इस प्रकार चार चुटकी रेत धीरे-धीरे छोड्कर सुरबाला ने भाड़ के सिर पर अपनी कुटी तैयार कर ली ।

भाड़ तैयार हो गया । पर पड़ोस का भाड़ जब बालिका ने पूरा-पूरा याद किया, तो पता चला, एक कमी रह गई । धुआ कहां से निकलेगा? तनिक सोचकर उसने एक सींक टेढ़ी करके उसमें गाड़ दी । बस, ब्रह्मांड का सबसे संपूर्ण भाड़ और विश्व की सबसे सुंदर वस्तु तैयार हो गई ।

वह उस उजड्ड मनोहर को इस अपूर्व कारीगरी का दर्शन कराएगी पर अभी जरा थोड़ा देख तो और ले । सुरबाला मुंह बाए, आँखें स्थिर करके इस भाड़-श्रेष्ठ को देखकर विस्मित और पुलकित होने लगी । परमात्मा कहां विराजते हैं, कोई इस बाला से पूछे, तो वह बताए इस भाड़ के जादू में ।

मनोहर अपनी ‘सुरी-सुरो-सुर्री’ की याद कर, पानी से नाता तोड़, हाथ की लकड़ी को भरपूर जोर से गंगा की धारा में फेंककर जब मुड़ा, तब सुश्री सुरबाला देवी एकटक अपनी परमात्म लीला के जादू को बूझने और सुलझने में लगी हुई थीं ।

मनोहर ने बाला की दृष्टि का अनुसरण कर देखा-श्रीमती जी बिलकुल अपने भाड़ में अटकी हुई हैं । उसने जोर से कहकहा लगाकर एक लात में भाड़ का काम तमाम कर दिया ।

न जाने क्या किला फतह किया हो, ऐसे गर्व से भरकर निर्दयी मनोहर चिल्लाया, “सुर्रो रानी! ”

सुर्रो रानी मूक खड़ी थीं । उनके मुंह पर जहां अभी परम विशुद्ध रस था, वहां एक शून्य फैल गया । रानी के सामने एक स्वर्ग आ खड़ा हुआ था । वह उन्हीं के हाथों का बनाया हुआ था और वह एक व्यक्ति को अपने साथ लेकर उस स्वर्ग की एक-एक मनोरमता और स्वर्गीयता को दिखलाना चाहती थीं । हा, हंत ! वही व्यक्ति आरग और उसने अपनी लात से उसे तोड़-फोड़ डाला! रानी हमारी बड़ी व्यथा से भर गई ।

हमारे विद्वान पाठकों में से कोई होता, तो उन मूर्खों को समझाता-यह संसार क्षणभंगुर है । इसमें दुख क्या और सुख क्या : जो जिससे बनाया गया है वह उसी में लय हो जाता है-इसमें शोक और उद्वेग की क्या बात है? यह संसार जल का है, किसी रोज जल में ही मिल जाने में ही की बुदबुदा फूटकर जाएगा । फूट बुदबुदे
सार्थकता है । जो यह नहीं समझते, वे दया के पात्र हैं । री, मर्खा लड़की, तू समझ । सब ब्रह्मांड ब्रह्म का है, और उसी में लीन हो जाएगा । इससे तू किसलिए व्यर्थ व्यथा सह रही है? रेत का तेरा भाड़ क्षणिक था, क्षण में लुप्त हो गया, रेत में मिल गया । इस पर खेद मत कर, इससे शिक्षा ले । जिसने लात मारकर तोड़ा है वह तो परमात्मा का केवल साधन मात्र है । परमात्मा तुझे नवीन शिक्षा देना चाहते हैं । लड़की, तू मूर्ख क्यों बनती है? परमात्मा इस शिक्षा को समझ और परमात्मा तक पहुंचने का प्रयास कर । आदि-आदि ।

पर बेचारी बालिका का दुर्भाग्य, कोई विज्ञ धीमान पंडित तत्वोपदेश के लिए गंगा तट पर नहीं पहुंच सका । हमें यह भी संदेह है कि सुर्री एकदम इतनी जड़-मूर्खा है कि यदि कोई परोपकार-रत पंडित परमात्म-निर्देश से वहां पहुंचकर उपदेश देने भी लगते तो वह उनकी बात को नहीं सुनती और न समझती । पर, अब तो वहां निर्बुद्धि शठ मनोहर के सिवा कोई नहीं है, और मनोहर विश्व-तत्व की एक भी बात नहीं जानता । उसका मन न जाने कैसा हो रहा है । कोई जैसे उसे भीतर-ही-भीतर मसोले डालता रहा है । लेकिन उसने बनकर कहा, सुर्री, दुत्त पगली! रूठती है? ”
सुरबाला वैसे ही खड़ी रही ।

“सुर्री, रूठती क्यों है? ”

बाला तनिक न हिली ।

“सुरी सुरी .. ओ, सुरी”

अब बनना न हो सका । मनोहर की आवाज हठात कंपी-सी निकली ।

सुरबाला अब और मुंह फेरकर खड़ी हो गई । स्वर के इस कंपन का सामना
शायद उससे न हो सका ।

“सुरी-ओ सुरिया मैं मनोहर हूं मनोहर! मुझे मारती नहीं!”

यह मनोहर ने उसके पीठ पीछे से कहा और ऐसे कहा, जैसे वह यह प्रकट करना चाहता है कि वह रो नहीं रहा है ।

”हम नहीं बोलते ।” बालिका से बिना बोले रहा न गया । उसका भाड़ शायद स्वर्गविलीन हो गया । उसका स्थान और बाला की सारी दुनिया का स्थान कांपती हुई मनोहर की आवाज ने ले लिया ।

मनोहर ने बड़ा बल लगाकर कहा, सुरी, मनोहर तेरे पीछे खड़ा है । वह बड़ा दुष्ट है । बोल मत, पर उस पर रेत क्यों नहीं फेंक देती, मार क्यों नहीं देती! उसे एक थप्पड़ लगा-वह अब कभी कसूर नहीं करेगा ।”

बाला ने कड़ककर कहा, ”चुप रहो !”

”चुप रहता हूं पर मुझे देखोगी भी नहीं ?”

”नहीं देखते ।”

”अच्छा मत देखो । मत ही देखो । मैं अब कभी सामने न आऊंगा, मैं इसी लायक हूं ।”

”कह दिया तुमसे, तुम चुप रहो । हम नहीं बोलते ।”

बालिका में व्यथा और क्रोध कभी का खत्म हो चुका था । वह तो पिघलकर बह चुका था । यह कुछ और ही भाव था । यह एक उल्लास था जो ब्याज-कोप का रूप धर बैठा था । दूसरे शब्दों में यह स्त्रीत्व था ।

मनोहर बोला, ”लो सुरी, मैं नहीं बोलता । में बैठ जाता हूं । यहीं बैठा रहूंगा । तुम जब तक न कहोगी, न उठूंगा न बोलूंगा ।”

मनोहर चुप बैठ गया । कुछ क्षण बाद हारकर सुरबाला बोली, ”हमारा भाड़ क्यों तोड़ा? हमारा भाड़ बना के दो !”

”लो अभी लो ।”
”हम वैसा ही लेंगे ।”

– वैसा ही लो, उससे भी अच्छा ।”

उसपै हमारी कुटी थी, उसपै धुएं का रास्ता था ।”

”लो, सब लो । तुम बताती जाओ, मैं बनाता जाऊं ।”

”हम नहीं बताएंगे । तुमने क्यों तोड़ा? तुमने तोड़ा, तुम्हीं बनाओ ।”

”अच्छा, पर तुम इधर देखो तो ।”

”हम नहीं देखते, पहले भाड़ बना के दो ।”

मनोहर ने एक भाड़ बनाकर तैयार किया । कहा, ”लो, भाड़ बन गया ।”

”बन गया ?”

“हां ।”
”धुएं का रास्ता बनाया? कुटी बनाई ?”

”सो कैसे बनाऊं-बताओ तो ।”

”पहले बनाओ तब बताऊंगी ।”

भाड़ के सिर पर एक सींक लगाकर और एक-एक पत्ते की ओट लगाकर कहा, ”बना दिया । ”

तुरंत मुड़कर सुरबाला ने कहा, ”अच्छा दिखाओ ।”

”सींक ठीक नहीं लगी जी”, ”पत्ता ऐसे लगेगा” आदि-आदि संशोधन कर चुकने पर मनोहर को हुकुम हुआ-
”थोड़ा पानी लाओ, भाड़ के सिर पर डालेंगे ।”

मनोहर पानी लाया ।

गंगाजल से कर-पात्रों द्वारा – वह भाड़ का अभिषेक करना ही चाहता था कि सुरा रानी ने एक लात से भाड़ के सिर को चकनाचूर कर दिया ।

सुरबाला रानी हंसी से नाच उठी । मनोहर उत्फुल्लुता से कहकहा लगाने लगा । उस निर्जन प्रांत में वह निर्मल शिशु हास्य-रव लहरें लेता हुआ व्याप्त हो गया । सूरज महाराज बालकों जैसे लाल-लाल मुंह से गुलाबी-गुलाबी हँसी हँस रहे थे । गंगा मानो जान-बूझकर किलकारियां भर रही थी । और-और वे लंबे ऊंचे-ऊंचे दिग्गज पेड़ दार्शनिक पंडितों की भांति, सब हास्य की सार-शून्यता पर मानो मन-ही-मन गंभीर तत्वालोचन कर, हँसी में भूले हुए मूर्खों पर थोड़ी दया बखाना चाह रहे थे!

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जैनेन्द्र कुमार