आज शाम है बहुत उदास

लोहामंडी... कृषि कुंज... इंदरपुरी... टोडापुर... ठक ठक ठक... खटारा ब्लू लाइन के कंडक्टर ने खिड़की से एक हाथ बाहर निकाल बस के टीन को पीटते हुए जोर से गला फाड़कर आवाज लगाई, मानो सवारियों के घर-दफ्तरों तक से उन्हें खींच लाने का मंसूबा हो। उस ठक-ठक में आस्था अक्सर टीन का रुदन सुना करती थी, … पढ़ना जारी रखें आज शाम है बहुत उदास

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आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

हिमावृत चोटियों की श्रेणी, अनन्त आकाश के नीचे क्षुब्ध समुद्र! उपत्यका की कन्दरा में, प्राकृतिक उद्यान में खड़े हुए युवक ने युवती से कहा-''प्रिये!'' ''प्रियतम! क्या होने वाला है?'' ''देखो क्या होता है, कुछ चिन्ता नहीं-आसव तो है न?'' ''क्यों प्रिय! इतना बड़ा खेल क्या यों ही नष्ट हो जायेगा?'' ''यदि नष्ट न हो, खेल … पढ़ना जारी रखें आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

हॉर्स रेस

शिखर बहुराष्ट्रीय कंपनी के वातानुकूलित कमरे में बैठा हुआ था। उम्र होगी यही कोई पैंतीस के आस-पास। चेहरे पर थकान ने अपना बसेरा बना लिया था, फिर भी गाल और ललाट आत्मविश्वास से दमक रहे थे। अभी वह थोड़ा रिलैक्सड महसूस कर रहा था, क्योंकि कंपनी के टारगेट पूरे हो चुके थे। जो बाकी थे … पढ़ना जारी रखें हॉर्स रेस

यहाँ-वहाँ हर कहीं

उस दिन शाम को पाँच बजे ही संजीव ऑफिस से वापस आ गया था। लिफ्ट से ऊपर जाकर उसने अपार्टमेंट की घंटी बजाई तो रोज की तरह दरवाजा नहीं खुला। वह बाहर खड़ा इंतजार करता रहा। फिर दूसरी और तीसरी बार भी बजाई तो दरवाजा वैसे ही बंद रहा। तब उसे लगा कि उसके पापा … पढ़ना जारी रखें यहाँ-वहाँ हर कहीं

पेड़ का तबादला

सुदूर कहीं निर्जन में एक अनाम पेड़ था जिसे वहाँ के लोग अब तक पहचान नहीं सके थे। धरती की गहराई से एक जीवन निकला था - हरे रंग का जीवन, एक बिरवा। कोमल-कोमल दो चार पत्तियों को लेकर इठलाता हुआ। उसके भीतर पूरी जिजीविषा भरी हुई थी। वह अपने चारों ओर फैले निसर्ग को … पढ़ना जारी रखें पेड़ का तबादला

नंदन पार्क – अंजना वर्मा

इस बार जोर की ठंड पड़ रही थी और सूरज भी कोहरे की लिहाफ ओढ़ कर सो गया था। कहाँ सब सोच रहे थे कि अब ठंड चली गई। समय भी तो उसके जाने का हो गया था, पर अब जाते-जाते वह अपना असली चेहरा दिखा रही थी। मेहनतकश लोगों में जवान लोग तो ठीक … पढ़ना जारी रखें नंदन पार्क – अंजना वर्मा

कौन तार से बीनी चदरिया

खामोश हवा अचानक गीत पर मृदंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, ''जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग'' सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई … पढ़ना जारी रखें कौन तार से बीनी चदरिया