दिया है तो जलूँगा भी, जलूँगा तो बुझूंगा भी – प्रमोद तिवारी

कि जो कहना है कहूँगा भी, जो करना है करूँगा भी अंधेरो को खलूँगा भी, हवाओं से लडूंगा भी   न सोचा है मिला क्या है, न सोचूंगा मिलेगा क्या दिया है तो जलूँगा भी, जलूँगा तो बुझूंगा भी अँधियारा है बहुत यहाँ, अब तुम दहलो या मैं दहलू औ एक कहानी उजियारो की तुम कह लो या मैं कह लूँ   ज़ख्म भले ही … पढ़ना जारी रखें दिया है तो जलूँगा भी, जलूँगा तो बुझूंगा भी – प्रमोद तिवारी

प्राण तुम्हारी पदरज फूली – अज्ञेय

प्राण तुम्हारी पदरज फूली मुझको कंचन हुई तुम्हारे चरणों की यह धूली! प्राण तुम्हारी पदरज फूली! आई थी तो जाना भी था – फिर भी आओगी, दुःख किसका? एक बार जब दृष्टिकरों के पद चिह्नों की रेखा छू ली! प्राण तुम्हारी पदरज फूली! वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी, गीत शब्द का कब अभिलाषी? अंतर में पराग-सी छाई है स्मृतियों की आशा धूली! प्राण तुम्हारी पदरज … पढ़ना जारी रखें प्राण तुम्हारी पदरज फूली – अज्ञेय

उड़ चल हारिल – अज्ञेय

उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में यही अकेला ओछा तिनका। उषा जाग उठी प्राची में – कैसी बाट, भरोसा किन का! शक्ति रहे तेरे हाथों में – छूट न जाय यह चाह सृजन की, शक्ति रहे तेरे हाथों में – स्र्क न जाय यह गति जीवन की! ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर बढ़ा चीर चल दिग्मंडल अनथक पंखों की चोटों से नभ में एक मचा दे हलचल! तिनका? तेरे … पढ़ना जारी रखें उड़ चल हारिल – अज्ञेय

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे । आँख जो तुझपे उठी तो, हम दुश्मन को मिटा देंगे ।। ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे । वतन हम तेरे दीवाने, तुझपे सबकुछ लूटा देंगे । शाख पे जो आंच आई तो, हम शीश कटा देंगे ।। ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे । जिसने तेरा साथ निभाया, उसपे प्यार लूटा … पढ़ना जारी रखें ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो रहें ज़िन्दा वतन के लिए, वतन के लिए ही खाक हो रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो करें मुहब्बत सभी से, मुहब्बत के हम शैदाई हो करें उल्फ़त सदा वतन से, ना हमारी वतन से जुदाई हो रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो यहाँ कोई पराया ना हो, सभी अपने … पढ़ना जारी रखें रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

Love Sex and Dhokha

चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम – रमाकांत अवस्थी

चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम और रवि के भाल से ज्यादा गरम है नहीं कुछ और केवल प्यार है ढूँढने को मैं अमृतमय स्वर नया सिन्धु की गहराइयों में भी गया मृत्यु भी मुझको मिली थी राह पर देख मुझको रह गई थी आह भर मृत्यु से जिसका नहीं कुछ वास्ता मुश्किलों को जो दिखाता रास्ता वह नहीं कुछ और केवल प्यार है जीतने … पढ़ना जारी रखें चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम – रमाकांत अवस्थी

Holi Geet

साजन! होली आई है!

साजन! होली आई है! सुख से हँसना जी भर गाना मस्ती से मन को बहलाना पर्व हो गया आज- साजन ! होली आई है! हँसाने हमको आई है! साजन! होली आई है! इसी बहाने क्षण भर गा लें दुखमय जीवन को बहला लें ले मस्ती की आग- साजन! होली आई है! जलाने जग को आई है! साजन! होली आई है! रंग उड़ाती मधु बरसाती कण-कण … पढ़ना जारी रखें साजन! होली आई है!

Rishte

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं – गुलज़ार

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं पढ़ना जारी रखें रिश्ते बस रिश्ते होते हैं – गुलज़ार

Sad Couple

दर्द दिया है – गोपालदास “नीरज”

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है,
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा पढ़ना जारी रखें दर्द दिया है – गोपालदास “नीरज”

Jai Hind

बढ़े चलो – जयशंकर प्रसाद

हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती
‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ, विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवड़वाग्नि से चलो,
प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो! पढ़ना जारी रखें बढ़े चलो – जयशंकर प्रसाद

साथी घर जाकर मत कहना,संकेतों में बतला देना

युद्ध में जख्मी सैनिक साथी से कहता है: ‘साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना; यदि हाल मेरी माता पूछे तो, जलता दीप बुझा देना! इतने पर भी न समझे तो, दो आंसू तुम छलका देना!! यदि हाल मेरी बहना पूछे तो, सूनी कलाई दिखला देना! इतने पर भी न समझे तो, राखी तोड़ दिखा देना !! यदि हाल मेरी पत्नी पूछे तो, … पढ़ना जारी रखें साथी घर जाकर मत कहना,संकेतों में बतला देना

कबहू उझकि कबहू उलटि !

कबहू उझकि कबहू उलटि ! (मधुगीति १६०३०६ ब) कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि; रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही ! पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी; हर चित्र वह देखा किया, ग्रह घूम कर जाना किया ! लोरी सुने बतियाँ सुने, गुनगुनाने उर में लगे; कीर्तन भजन मन भावने, लागा है शिशु सिख बूझने ! नानी कहानी … पढ़ना जारी रखें कबहू उझकि कबहू उलटि !