प्राण तुम्हारी पदरज फूली – अज्ञेय

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प्राण तुम्हारी पदरज फूली
मुझको कंचन हुई तुम्हारे चरणों की
यह धूली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

आई थी तो जाना भी था –
फिर भी आओगी, दुःख किसका?
एक बार जब दृष्टिकरों के पद चिह्नों की
रेखा छू ली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी,
गीत शब्द का कब अभिलाषी?
अंतर में पराग-सी छाई है स्मृतियों की
आशा धूली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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उड़ चल हारिल – अज्ञेय

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उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में
यही अकेला ओछा तिनका।
उषा जाग उठी प्राची में –
कैसी बाट, भरोसा किन का!

शक्ति रहे तेरे हाथों में –
छूट न जाय यह चाह सृजन की,
शक्ति रहे तेरे हाथों में –
स्र्क न जाय यह गति जीवन की!

ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर
बढ़ा चीर चल दिग्मंडल
अनथक पंखों की चोटों से
नभ में एक मचा दे हलचल!

तिनका? तेरे हाथों में है
अमर एक रचना का साधन-
तिनका? तेरे पंजे में है
विधना के प्राणों का स्पंदन!

काँप न यद्यपि दसों दिशा में
तुझे शून्य नभ घेर रहा है,
स्र्क न यदपि उपहास जगत का
तुझको पथ से हेर रहा है

तू मिट्टी था, किन्तु आज
मिट्टी को तूने बाँध लिया है
तू था सृष्टि किन्तु सृष्टा का
गुर तूने पहचान लिया है !

मिट्टी निश्चय है यथार्थ, पर
क्या जीवन केवल मिट्टी है?
तू मिट्टी, पर मिट्टी से
उठने की इच्छा किसने दी है?

आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का
तू है दुर्निवार हरकारा
दृढ़ ध्वज दण्ड बना यह तिनका
सूने पथ का एक सहारा!

मिट्टी से जो छीन लिया है
वह तज देना धर्म नहीं है,
जीवन साधन की अवहेला
कर्मवीर का कर्म नहीं है!

तिनका पथ की धूल स्वयं तू
है अनंत की पावन धूली-
किन्तु आज तूने नभ पथ में
क्षण में बद्ध अमरता छू ली!

उषा जाग उठी प्राची में –
आवाहन यह नूतन दिन का
उड़ चल हरियल लिये हाथ में
एक अकेला पावन तिनका!

Sachchidanandan Vatsyayan Agyeya

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ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

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ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

आँख जो तुझपे उठी तो, हम दुश्मन को मिटा देंगे ।।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

वतन हम तेरे दीवाने, तुझपे सबकुछ लूटा देंगे ।

शाख पे जो आंच आई तो, हम शीश कटा देंगे ।।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

जिसने तेरा साथ निभाया, उसपे प्यार लूटा देंगे ।

बदले अहसान के उसके, हम पलकें बिछा देंगें ।।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

जिसने तेरा मान घटाया, हम उसको मिटा देंगे।

बदले अपमान के उसके, हम लाशें बिछा देंगे ।।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

शिक्षा है तेरी खेती, हम दुनिया में बता देंगे।

माटी है तेरी महकती, हम दुनिया में जता देंगे ।।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

ऐ वतन तेरी शान क्या है, दुनिया को दिखा देंगें ।

तेरी खातिर जान क्या है, मालों दौलत लूटा देंगे ।।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

एक “आबिद” तू ही क्या, हर ओर दीवाने दिखा देंगे ।

फ़िदा तुझपे जिंदगी क्या, खुदको दीवाना बना देंगें।।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

 

रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

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रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

रहें ज़िन्दा वतन के लिए, वतन के लिए ही खाक हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

करें मुहब्बत सभी से, मुहब्बत के हम शैदाई हो
करें उल्फ़त सदा वतन से, ना हमारी वतन से जुदाई हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

यहाँ कोई पराया ना हो, सभी अपने ही अपने हो
गम मिलकर सब का मिटाएं, बेगानों के गम भी अपने हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

महके खुशियों के चमन से वतन, गम हमसे कौसों दूर हो
फैले रौशनी सभी सिम्त इल्म की, चारों ओर नूर ही नूर हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

करें परदेश में ऐसे अमल, मक़सद भारत का मान हो
कहें देखकर हमें विदेशी सारे, मुल्क हमारे भी भारत समान हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

हिन्दू हो या हो मुस्लिम, या देश का कोई बिरादर हो
करें हर एक खिदमत-ए-वतन, जहां में भारत का आदर हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

रहें जज़्बा हमारा हिमालय सा, हर भारतवासी तेरा रखवाला हो
रहें मोम अपनों के लिए, दुश्मनों को जलाएं ऐसी ज्वाला हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

मक़सद रहे सभी का, मेरे वतन का निहार हो
रहे तेरे लिए सदा, जान को तुझपे ही करार हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

रहें तन्हा या हो साथ, सब वतन पर निसार हो
तेरे लिए ही जीना वतन, जान तुझ पे ही निसार हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

दुःख में हो या सुख में, चाहें कैसे भी गुजारा हो
रहें हम किसी भी हाल में, ज़हन में अमन का नजारा हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

गुनाहों से हमारी दूरी हो, ज़ुल्मत का वतन से ख़ात्मा हो
फैले रौशनी जहाँ में हमारी, भारत जहाँ का महात्मा हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

रहें गर्दिशों में सदा हम, सदा हमारे ऐसे जतन हो
रहें सारे जहाँ में चमकता, सितारों सा हमारा वतन हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

ये दिल-ए-“आबिद” की दुआ, कयामत तक वतन आबाद हो
सर सब्ज़ हो वतन हमारा, कायनात में सदा शादाब हो
रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो |

आबिद हुसैन शेख़

आबिद हुसैन शेख़

बागोर तह मंडल, भिल्वारा, राजस्थान

Love Sex and Dhokha

चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम – रमाकांत अवस्थी

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चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम
और रवि के भाल से ज्यादा गरम
है नहीं कुछ और केवल प्यार है

ढूँढने को मैं अमृतमय स्वर नया
सिन्धु की गहराइयों में भी गया
मृत्यु भी मुझको मिली थी राह पर
देख मुझको रह गई थी आह भर

मृत्यु से जिसका नहीं कुछ वास्ता
मुश्किलों को जो दिखाता रास्ता
वह नहीं कुछ और केवल प्यार है

जीतने को जब चला संसार मैं
और पहुँचा जब प्रलय के द्वार मैं
बह रही थी रक्त की धारा वहाँ
थे नहाते अनगिनत मुर्दे जहाँ

रक्त की धारा बनी जल, छू जिसे
औे मुर्दों ने कहा जीवन जिसे
वह नही कुछ और केवल प्यार है

मन हुआ मेरा कि ईश्वर से कहूँ
दूर तुमसे और कितने दिन रहूँ
देखकर मुझको हँसी लाचारियाँ
और दुनियाँ ने बजाई तालियाँ

पत्थरो को जो बनाता देवता
जानती दुनिया नहीं जिसका पता
वह नहीं कुछ और केवल प्यार है

काल से मैंने कहा थम जा जरा
बात सुन मेरी दिया वह मुस्करा
मेघ से मैंने कहा रोना नहीं
वह लगा कहने कि यह होना नहीं

काल भी है चूमता जिसके चरण
मेघ जिसके वास्ते करता रुदन
वह नहीं कुछ और केवल प्यार है

– रमाकांत अवस्थी

Holi Geet

साजन! होली आई है!

Holiसाजन! होली आई है!
सुख से हँसना
जी भर गाना
मस्ती से मन को बहलाना
पर्व हो गया आज-
साजन ! होली आई है!
हँसाने हमको आई है!

साजन! होली आई है!
इसी बहाने
क्षण भर गा लें
दुखमय जीवन को बहला लें
ले मस्ती की आग-
साजन! होली आई है!
जलाने जग को आई है!

साजन! होली आई है!
रंग उड़ाती
मधु बरसाती
कण-कण में यौवन बिखराती,
ऋतु वसंत का राज-
लेकर होली आई है!
जिलाने हमको आई है!

साजन ! होली आई है!
खूनी और बर्बर
लड़कर-मरकर-
मधकर नर-शोणित का सागर
पा न सका है आज-
सुधा वह हमने पाई है !
साजन! होली आई है!

साजन ! होली आई है !
यौवन की जय !
जीवन की लय!
गूँज रहा है मोहक मधुमय
उड़ते रंग-गुलाल
मस्ती जग में छाई है
साजन! होली आई है!

-फणीश्वर नाथ ‘रेणु’

Phanishwar Nath 'Renu'
‘होली’ – फणीश्वरनाथ रेणु की पहली कविता थी।

Rishte

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं – गुलज़ार

Family

Family

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से
बरसों के तले गलते-गलते
हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते हैं
रिश्ता वह अगर मर जाये भी
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

Gulzar

Gulzar

Sad Couple

दर्द दिया है – गोपालदास “नीरज”

Dard Diya Hai

Dard Diya Hai

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है,
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा

पग-तल लेटी निशा, भाल पर
बैठी ऊषा गोरी,
एक जलन से बाँध रखी है
साँझ-सुबह की डोरी

सोये चाँद-सितारे, भू-नभ, दिशि-दिशि स्वप्न-मगन है
पी-पीकर निज आग जग रही केवल मेरी प्यास है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

Gopal Das Neeraj

Gopal Das Neeraj

Jai Hind

बढ़े चलो – जयशंकर प्रसाद

Tiranga

हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती
‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ, विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवड़वाग्नि से चलो,
प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो!

जयशंकर प्रसाद

 

साथी घर जाकर मत कहना,संकेतों में बतला देना

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युद्ध में जख्मी सैनिक साथी से कहता है:

‘साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरी माता पूछे तो, जलता दीप बुझा देना!
इतने पर भी न समझे तो, दो आंसू तुम छलका देना!!
यदि हाल मेरी बहना पूछे तो, सूनी कलाई दिखला देना!
इतने पर भी न समझे तो, राखी तोड़ दिखा देना !!
यदि हाल मेरी पत्नी पूछे तो, मस्तक तुम झुका लेना!
इतने पर भी न समझे तो, मांग का सिन्दूर मिटा देना!!

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यदि हाल मेरे पापा पूछे तो, हाथों को सहला देना!
इतने पर भी न समझे तो, लाठी तोड़ दिखा देना!!
यदि हाल मेरा बेटा पूछे तो, सर उसका सहला देना!
इतने पर भी ना समझे तो, सीने से उसको लगा लेना!!
यदि हाल मेरा भाई पूछे तो, खाली राह दिखा देना!
इतने पर भी ना समझे तो, सैनिक धर्म बता देना!!


साभार दैनिक भास्कर

कबहू उझकि कबहू उलटि !

कबहू उझकि कबहू उलटि !
(मधुगीति १६०३०६ ब)
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कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि;
रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही !
पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी;
हर चित्र वह देखा किया, ग्रह घूम कर जाना किया !
लोरी सुने बतियाँ सुने, गुनगुनाने उर में लगे;
कीर्तन भजन मन भावने, लागा है शिशु सिख बूझने !
नानी कहानी समझता, वह बीच कुछ कह डालता;
हाथों परश पग डोलता, कर उठा कर कुछ बोलता !
दिन चवालीस भव को परख, चुटकी व ताली शब्द सुन;
‘मधु’ वत्स बोधा सा लगा, प्रभु की प्रभा का उत्स लखि !

चहकित चकित चेतन चलत !

(मधुगीति १६०३१० ब)

चहकित चकित चेतन चलत, चैतन्य की चितवन चुरा;
जग चमक पर हो कर फ़िदा, उन्मना हो हर्षित घना !
शिशु तपस्वी गति प्रस्फुरा, विहँसित बदन हो चुलबुला;
हुलसित चला हो कर जुदा, गुरु मात पित संगति भुला !
बाधा विपद ना लख रही, थी द्रष्टि ओझल हो रही;
झलमल लखे रुनझुन चले, धुनि मनोहारा वे रमे !
अनुभव अमित अनुभूति चित, उर्वर हुए भास्वर प्रमित;
थरथर चलाचल भव निरख, धावत फिरत त्रिभुवन तकत !
उल्लास हर पग लड़खड़ा, आनन्द की लड़ियाँ दिखा;
उर माधुरी ‘मधु’ को चखा, माया से महका कर मना !
रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा
(अध्यक्ष – अखिल विश्व हिंदी समिति
कनाडियन प्रेसिडेंट – अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, नई दिल्ली
सेक्रेटरी – हिंदी साहित्य सभा, कनाडा
सदस्य – हिंदी राइटर्स गिल्ड, कनाडा)