ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे ।

ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे । आँख जो तुझपे उठी तो, हम दुश्मन को मिटा देंगे ।। ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको मिटा देंगे । वतन हम तेरे दीवाने, तुझपे सबकुछ लूटा देंगे । शाख पे जो आंच आई तो, हम शीश कटा देंगे ।। ऐ भारत तेरी खातिर, हम खुदको... Continue Reading →

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रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो

रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो रहें ज़िन्दा वतन के लिए, वतन के लिए ही खाक हो रहें सलामत वतन हमारा, वतन का ही नाम हो करें मुहब्बत सभी से, मुहब्बत के हम शैदाई हो करें उल्फ़त सदा वतन से, ना हमारी वतन से जुदाई हो रहें सलामत वतन हमारा, वतन का... Continue Reading →

चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम – रमाकांत अवस्थी

चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम और रवि के भाल से ज्यादा गरम है नहीं कुछ और केवल प्यार है ढूँढने को मैं अमृतमय स्वर नया सिन्धु की गहराइयों में भी गया मृत्यु भी मुझको मिली थी राह पर देख मुझको रह गई थी आह भर मृत्यु से जिसका नहीं कुछ वास्ता मुश्किलों को जो... Continue Reading →

साजन! होली आई है!

साजन! होली आई है! सुख से हँसना जी भर गाना मस्ती से मन को बहलाना पर्व हो गया आज- साजन ! होली आई है! हँसाने हमको आई है! साजन! होली आई है! इसी बहाने क्षण भर गा लें दुखमय जीवन को बहला लें ले मस्ती की आग- साजन! होली आई है! जलाने जग को आई... Continue Reading →

दर्द दिया है – गोपालदास “नीरज”

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है, जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है ! मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य चिनगारी जिसकी भाषा, किसी निठुर की एक फूँक का हूँ बस खेल-तमाशा

बढ़े चलो – जयशंकर प्रसाद

हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती ‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’ असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ, विकीर्ण दिव्य दाह-सी सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी! अराति सैन्य सिंधु में, सुवड़वाग्नि से चलो, प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो!

साथी घर जाकर मत कहना,संकेतों में बतला देना

युद्ध में जख्मी सैनिक साथी से कहता है: ‘साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना; यदि हाल मेरी माता पूछे तो, जलता दीप बुझा देना! इतने पर भी न समझे तो, दो आंसू तुम छलका देना!! यदि हाल मेरी बहना पूछे तो, सूनी कलाई दिखला देना! इतने पर भी न समझे तो, राखी... Continue Reading →

कबहू उझकि कबहू उलटि !

कबहू उझकि कबहू उलटि ! (मधुगीति १६०३०६ ब) कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि; रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही ! पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी; हर चित्र वह देखा किया, ग्रह घूम कर जाना किया ! लोरी सुने बतियाँ सुने, गुनगुनाने उर में लगे; कीर्तन भजन... Continue Reading →

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