भुलाना न आसान होगा

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दी खुशियां तूने जो मुझको, भुलाना न आसान होगा,


मेरी हर कामयाबी पे, तेरा ही नाम होगा।

रखूँगा तेरे हर तर्ज़ को, खुद में समां कर इस तरह,

भूल कर भी खुद को, भुलाना न आसान होगा ।

खुदा भी तुझे मेरा कर, यह सोचता होगा,


बेमिसाल इस प्यार को, भुलाना न आसान होगा।

तेरी रफ़ाक़त से निकल कर, देख ली दुनिया,

तेरी शख्शियत को, भूलना न आसान होगा।

अपना कर तूने मुझे, बड़ा एहसान कर दिया।

तेरे हर सुख़न को, भुलाना न आसान होगा ।

तारीफ क्या करूँ अब तेरी “माज़, तू तो एक फूल है,

तेरी खुशबू को, भुलाना न आसान होगा।

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माज़ अंसारी
 युवा शायर
(गौसगंज जिला हरदोई उत्तर प्रदेश)

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Kunwar Bechain Ghazal

कुँअर बेचैन की ग़ज़लें

(1)

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दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए
रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर
अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिए
चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास
हमने खुशी के पाँवों में काँटे चुभा लिए
सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ
दुख, बिजलियों की आग में बादल नहा लिए
जब हो सकी न बात तो हमने यही किया
अपनी गजल के शेर कहीं गुनगुना लिए
अब भी किसी दराज में मिल जाएँगे तुम्हें
वो खत जो तुम्हें दे न सके लिख लिखा लिए।
– कुँअर बेचैन

(2)

Maa - Kunwar Bechain

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया
जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया
सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया
आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया
आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया
अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया
गम मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया
अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे `कुँअर’ रूठ के जाने का शुक्रिया
– कुँअर बेचैन
(3)

Ghazal Kunwar Bechain

उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे
उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे
बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे
छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे
दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे
होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे

वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे `कुँअर’ हँस के बिठाया था जिसे
– कुँअर बेचैन

Kunwar Bechain

Mother's Day

ख्वाब आँखों में जितने पाले थे -अभिषेक कुमार अम्बर

Mother Love

ख्वाब आँखों में जितने पाले थे,
टूट कर के बिखर ने वाले थे।
जिनको हमने था पाक दिल समझा,
उन्हीं लोगों के कर्म काले थे।
पेड़ होंगे जवां तो देंगे फल,
सोच कर के यही तो पाले थे।
सबने भर पेट खा लिया खाना,
माँ की थाली में कुछ निवाले थे।
आज सब चिट्ठियां जला दी वो,
जिनमें यादें तेरी संभाले थे।
हाल दिल का सुना नहीं पाये,
मुँह पे मजबूरियों के ताले थे।

Abhishek Kumar Ambar

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है – दुष्यंत कुमार

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ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है
एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है
राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर
इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है
आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है
हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है

पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे
रास्तों में एक भी बरगद नहीं है
मैकदे का रास्ता अब भी खुला है
सिर्फ़ आमद—रफ़्त ही ज़ायद नहीं
इस चमन को देख कर किसने कहा था
एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है.

है गली में आख़िरी घर लाम का – आदिल मंसूरी

है गली में आख़िरी घर लाम का
तीसवां आता है नंबर लाम का
डूबना निर्वाण की मंज़िल समझ
पानी के नीचे है गौहर लाम का
बंद दरवाज़ों पे सबके कान थे
शोर था कमरे के अंदर लाम का
देखते हैं हर्फ़ काग़ज़ फाड़ कर
मीम की गर्दन में ख़ंजर लाम का
भर गया है ख़ूने-फ़ासिद जिस्म में
आप भी नश्तर लगायें लाम का
चे चमक चेहरे पे बाक़ी है अभी
है मज़ा मुंह में मगर कुछ लाम का
काफ़ की कुर्सी पे काली
चांदनी
गाफ़ में गिरता समंदर लाम का
शहर में अपने भी दुश्मन हैं बहुत
जेब में रखते हैं पत्थर लाम का
नून नुक़्ता नक़्द लो इनआम में
काट कर लाओ कोई सर लाम का

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रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था – आदिल रशीद

रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था
सुब्ह तक नूर का चश्मा [1] मेरी दहलीज़ पे था
रात फिर एक तमाशा मेरी दहलीज़ पे था
घर के झगडे में ज़माना मेरी दहलीज़ पे था
मैं ने दस्तक के फ़राइज़ [2] को निभाया तब भी
जब मेरे खून का प्यासा मेरी दहलीज़ पे था
अब कहूँ इस को मुक़द्दर के कहूँ खुद्दारी
प्यास बुझ सकती थी दरिया
मेरी दहलीज़ पे था

सांस ले भी नहीं पाया था अभी गर्द आलूद
हुक्म फिर एक सफ़र का मेरी दहलीज़ पे था
रात अल्लाह ने थोडा सा नवाज़ा [3] मुझको
सुब्ह को दुनिया का रिश्ता मेरी दहलीज़ पे था
होसला न हो न सका पाऊँ बढ़ने का कभी
कामयाबी का तो रस्ता

मेरी दहलीज़ पे था

उस के चेहरे पे झलक उस के खयालात की थी
वो तो बस रस्मे ज़माना मेरी दहलीज़ पे था
तन्ज़(व्यंग) करने के लिए उसने तो दस्तक दी थी
मै समझता था के भैया मेरी दहलीज़ पे था
कौन आया था दबे पांव अयादत को मेरी
सुब्ह इक मेहदी का धब्बा

मेरी दहलीज़ पे था

कैसे ले दे के अभी लौटा था निपटा के उसे
और फिर इक नया फिरका मेरी दहलीज़ पे था
सोच ने जिस की कभी लफ़्ज़ों को
मानी बख्शे
आज खुद मानी ए कासा

मेरी दहलीज़ पे था

खाब में बोली लगाई जो अना की आदिल
क्या बताऊँ तुम्हे क्या -क्या मेरी दहलीज़ पे था
जंग ओ जदल[4]
शब्दार्थ:
1. ↑ जमीं से फूट कर निकलने वाला प्रकाश
2. ↑ फ़र्ज़ क बहुवचन
3. ↑ ईश्वर की तरफ़ से वरदान
4. ↑ लड़ाई-झगड़ा

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ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र हो गए – बलजीत सिंह मुन्तज़िर

ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र[1] हो गए ।
बे-सरोसामाँ[2] तो थे ही, अब तो बेघर हो गए ।

तुमसे मिलने पर बड़े आशुफ़्तासर[3] थे उन दिनों,
तुमसे बिछड़े तो हमारे दर्द बेहतर हो गए ।

एक क़तरे[4] भर की आँखों में थी उनकी हैसियत,
अश्क[5] जब पलकों से निकले तो समन्दर हो गए ।

कितनी बे-परवाह उड़ानों में थी पहले ज़िन्दगी,
जब ज़मीँ पाई परिन्दे दिल के बे-पर[6] हो गए ।

मौसम दयारे यार[7] का बदला भी तो कुछ इस तरहा,
जो ख़ुद मिसालें[8] थे बहारों की वो पतझर हो गए ।

आशनाई[9] के मुरव्वत[10] दौर में यूँ भी हुआ,
बे-मुरव्वत[11] लोग भी हमदर्द[12] अक्सर हो गए ।

बे-पनाह[13] तन्हाइयों की शाख़[14] से लिपटे हुए,
जो भी गुल उम्मीद के थे नामे दिलबर[15] हो गए ।

कितने तो अरमान दिल में सीfपयों से बन्द थे,
जब खुली राहें वफ़ाओं की तो गौहर[16] हो गए ।

थे बहुत ज़रख़ेज़[17] सपने, सब्ज़[18] थे एहसास भी
पर हक़ीक़त के क़हत[19] से सब ही बंजर हो गए ।।

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शब्दार्थ:

1- हालात, परिदृश्य, 2-सामान रहित, 3-खुश, आनन्दित, 4-बून्द, 5-आँसू, 6-पंख रहित

7-माशूक का घर, 8-उदाहरण, 9-मित्रता, 10-कृपा, दया, 11-कृपाहीन, 12-दुःख के साथी

13-आश्रयहीन, 14-टहनी, 15-माशूक के नाम, 16-मोती, 17-उपजाऊ, 18-हरे-भरे

19-अकाल, दुfर्भक्ष

 

ज़िंदगी – अजनबी राजा

ज़िंदगी इक पहेली है
अनदेखी इक सहेली है
कही बेबाक़ नादानियाँ है
कही थोडी बचकानियां है
खुशियों की बरसात है
वही ग़मो का अन्धेरा है
कही तपती धूप है
तो कही नीम की छाँव है
हसरतें है इसमें
बचपन की ललक है इसमें
ज़िंदगी क्या है

चले तो उम्र भर की हमसफ़र है
वही पल दो पल की हमराह
बस की भीड़ है ज़िंदगी
तो कही बुलेट ट्रेन की रफ़्तार है ज़िंदगी
स्कूल की मोहब्बत है
अधूरी
तो कॉलेज की आज़ादी है ज़िंदगी
किसी शायर की मयखाने की वो शाम है ज़िंदगी तो
कभी उस ने सराय में गुज़ारी, वो रात है ज़िंदगी
बदलते हालात की तस्वीर है
तो कही अंधेरों में दिखाई देती एक रोशनी की झलक है ज़िंदगी
लफ्ज कम पड़  रहे है
कभी ना खत्म हो
वो कहानी है ज़िंदगी
मेने जो लिखी
वो तो बस लफज़ो की रुमानी है ज़िंदगी

© अजनबी राजा (राजेश मिडल )

रामदेव  कोलोनी, केरू
जोधपुर
राजस्थान

यह  अश्क  जो बहते हैं – ओनिका सेतिया ”अनु ”

यह   अश्क   जो   बहते  है  इस तरह  ,
जिंदगी से  इनका   नाता  है इस तरह .

जिंदगी  चाहे हालातों  से  ना उबर  पाए ,
अश्क अपना रास्ता  बनायेगे ही इसी तरह .

जज्बातों  की जहाँ  में  कोई कद्र नहीं   ,
अनदेखी  अश्कों  की होती है इस तरह .

तकदीर और ज़माने  के सताए  हुए हम ,
यह  बेवजह तो नहीं बहते  इस तरह .

अपने   अश्क  खुद पोंछने होते है” अनु ”,
ग़मों  को अपने  संभालो  किसी तरह

अनु_सेतिया

ओनिका सेतिया ”अनु ”

३ इ /४८ ,एन .आई  .टी
फरीदाबाद  (हरियाणा )

ग़ज़ल – दाग़ देहलवी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा
अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा

तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है
किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा
आरज़ू ही न रही सुबहे वतन की मुझको
शामे ग़ुरबत है अजब वक़्त सुहाना तेरा

ये समझकर तुझे ऐ मौत लगा रक्खा है
काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा
ऐ दिले शेफ़्ता में आग लगाने वाले
रंग लाया है ये लाखे का जमाना तेरा

तू ख़ुदा तो नहीं ऐ नासहे नादाँ मेरा
क्या ख़ता की जो कहा मैंने न माना तेरा
रंज क्या वस्ले अदू का जो तअल्लुक़ ही नहीं
मुझको वल्लाह हँसाता है रुलाना तेरा

काबा ओ देर में या चश्म ओ दिलेआशिक़ में
इन्हीं तीन-चार घरों में है ठिकाना तेरा
तर्के आदत से मुझे नींद नहीं आने की
कहीं नीचा न हो ऐ गौर सिरहाना तेरा

मैं जो कहता हूँ उठाए हैं बहुत रंजेफ़िराक़
वो ये कहते हैं बड़ा दिल है तवाना तेरा
बज़्मे दुश्मन से तुझे कौन उठा सकता है
इक क़यामत का उठाना है उठाना तेरा

अपनी आँखों में अभी कून्द गई बिजली सी
हम न समझे के ये आना है या जाना तेरा
यूँ वो क्या आएगा फ़र्ते नज़ाकत से यहाँ
सख्त दुश्वार है धोके में भी आना तेरा

दाग़ को यूँ वो मिटाते हैं, ये फ़रमाते हैं
तू बदल डाल, हुआ नाम पुराना तेरा

दाग़ देहलवी

3 ग़ज़ल – लेफ़्टिनेंट डॉ.मोहसिन ख़ान

(1)
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क्यों आजकल लोगों पे अच्छी बातों का असर नहीं होता।
क्यों आदमी का आदमी के साथ अब गुज़र नहीं होता।

मजलिसों, तक़रीरों और नारों से कुछ हासिल हुआ नहीं,
क्यों मुल्क का बिगड़ा हुआ निज़ाम बेहतर नहीं होता।

भूखे, प्यासे, बेघर लोग देखते हैं शीशमहल हैरत से,
क्यों अब इनके हाथों में कोई पत्थर नहीं होता।

मार डाला दरिंदों ने ख़ूबसूरत परिंदे को बड़ी बेरहमी से,
क्यों आसमान में उड़ रहे परिंदों में कबूतर नहीं होता।

सूख जाएँगी एक-एक करके सारी तेहज़ीबों की नदियाँ,
क्यों इन कश्तियों से पार अब समंदर नहीं होता।

अब समझा, बेटी नहीं नूर को बिदा किया था कल मैंने,
क्यों रौशनी होने पर भी घर मेरा मुनव्वर नहीं होता।

राहों की मुसीबतें तो कब की पार कर चुका हूँ ‘तनहा’,
क्यों अब इन पैरों से तय आगे का सफ़र नहीं होता।

©-मोहसिन ‘तनहा’

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(2)
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कभी कुछ ज़्यादा, कभी कमतर हुआ है।
मेरे साथ यही खेल अक्सर हुआ है।

सोचा था पनप जाएगा जगह बदल दें।
फिर पौधा कहाँ हरा उखड़कर हुआ है।

सबकी अपनी अना, सबके अपने मसले,
घर के अन्दर, एक और घर हुआ है।

पहले भी प्यासे थे अब भी प्यासे ही हैं,
जहाँ सहारा था अब वहाँ समंदर हुआ है।

जो जितना सख़्त है उसकी उतनी क़ीमत,
‘तनहा’ दिल तेरा भी क्या पत्थर हुआ है।

©-मोहसिन ‘तनहा’

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(3)
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कितने बदले-बदले से क़िरदार हो गए।
जबसे हम-तुम कुछ समझदार हो गए।

कुछ मशीनों ने किया भूख का सौदा तो,
मर गए हुनर, कुछ हाथ बेकार हो गए।

दोनों थे लोहा, बस एक फ़र्क़ था यही,
हम ढाल बने और तुम तलवार हो गए।

घर के लिए ताले बड़े मज़बूत ख़रीदे,
कितने कमज़ोर अब एतबार हो गए।

‘तनहा’ देखा आईना तो झुका दीं नज़रें,
अपने आप से ही हम शर्मसार हो गए।
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©लेफ़्टिनेंट डॉ.मोहसिन ख़ान
NCC अधिकारी एवं स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष, शोध निर्देशक, जे.एस.एम. महाविद्यालय, अलीबाग- ज़िला-रायगढ़ (महाराष्ट्र) पिन-402 201

ग़ज़ल – मनीष कुमार ‘सुमन’

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लोग कहते हैं वो यहीं का है,
ग़म से बिखरा हुआ है वो, बेबसी का है।

कल तलक आसमाँ में उसके ही चर्चे थे,
गौर से देख लो, आज वो जमीं का है।

किसलिये नफ़रतें हैं फैली यहाँ,
आदमी दुश्मन आदमी का है।

किसने किये हैं कत्ल? है खंजर किसका?
घायल मैं हूँ, ये खंजर भी हमीं का है।

अँधेरी रात में वो घर से निकलता है “सुमन”,
डर उसे शायद रौशनी का है।

©मनीष_कुमार_सुमन

स्थायी पता :-
ग्रा0 पो0:-  संजात
थाना :- भगवानपुर
जिला :- बेगुसराय
बिहार 851120

वर्तमान पता:-
क्वार्टर न0 390A
रेलवे कॉलोनी, गांधीधाम
कच्छ, गुजरात
370201

कोई ये कैसे बताये की वो तनहा क्यों है-कैफ़ी आज़मी

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कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैं
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं
एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों हैं
तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों हैं
कुर्बत=समीपता ; मसर्रत=खुशी