हम सिसक सिसक सो जाते है

तेरा मेरी गली से गुजरना, मेरी नजरों पे आके वो रुकना । उन यादों के दामन थामे, हम संभल-संभल रुक जाते हैं।।   तेरी बातों पे मेरा बिखरना, मेरे साये से तेरा लिपटना। उन लम्हों को पास यू पाके, हम मचल-मचल रह जाते हैं।। तेरी रातों में मेरा वो सपना, मेरी सुबहो में तेरा वो … पढ़ना जारी रखें हम सिसक सिसक सो जाते है

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भुलाना न आसान होगा

दी खुशियां तूने जो मुझको, भुलाना न आसान होगा, मेरी हर कामयाबी पे, तेरा ही नाम होगा। रखूँगा तेरे हर तर्ज़ को, खुद में समां कर इस तरह, भूल कर भी खुद को, भुलाना न आसान होगा । खुदा भी तुझे मेरा कर, यह सोचता होगा, बेमिसाल इस प्यार को, भुलाना न आसान होगा। तेरी … पढ़ना जारी रखें भुलाना न आसान होगा

कुँअर बेचैन की ग़ज़लें

Kunwar Bechain Ghazal

(1) दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिए चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास हमने खुशी के पाँवों में काँटे चुभा लिए सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ … पढ़ना जारी रखें कुँअर बेचैन की ग़ज़लें

ख्वाब आँखों में जितने पाले थे -अभिषेक कुमार अम्बर

Mother's Day

ख्वाब आँखों में जितने पाले थे, टूट कर के बिखर ने वाले थे। जिनको हमने था पाक दिल समझा, उन्हीं लोगों के कर्म काले थे। पेड़ होंगे जवां तो देंगे फल, सोच कर के यही तो पाले थे। सबने भर पेट खा लिया खाना, माँ की थाली में कुछ निवाले थे। आज सब चिट्ठियां जला … पढ़ना जारी रखें ख्वाब आँखों में जितने पाले थे -अभिषेक कुमार अम्बर

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है – दुष्यंत कुमार

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे रास्तों में एक भी बरगद नहीं है मैकदे का रास्ता अब … पढ़ना जारी रखें ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है – दुष्यंत कुमार

है गली में आख़िरी घर लाम का – आदिल मंसूरी

है गली में आख़िरी घर लाम का तीसवां आता है नंबर लाम का डूबना निर्वाण की मंज़िल समझ पानी के नीचे है गौहर लाम का बंद दरवाज़ों पे सबके कान थे शोर था कमरे के अंदर लाम का देखते हैं हर्फ़ काग़ज़ फाड़ कर मीम की गर्दन में ख़ंजर लाम का भर गया है ख़ूने-फ़ासिद … पढ़ना जारी रखें है गली में आख़िरी घर लाम का – आदिल मंसूरी

रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था – आदिल रशीद

रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था सुब्ह तक नूर का चश्मा [1] मेरी दहलीज़ पे था रात फिर एक तमाशा मेरी दहलीज़ पे था घर के झगडे में ज़माना मेरी दहलीज़ पे था मैं ने दस्तक के फ़राइज़ [2] को निभाया तब भी जब मेरे खून का प्यासा मेरी दहलीज़ पे था … पढ़ना जारी रखें रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था – आदिल रशीद