कुँअर बेचैन की ग़ज़लें

(1) दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिए चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास हमने खुशी के पाँवों में काँटे चुभा लिए सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ... Continue Reading →

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ख्वाब आँखों में जितने पाले थे -अभिषेक कुमार अम्बर

ख्वाब आँखों में जितने पाले थे, टूट कर के बिखर ने वाले थे। जिनको हमने था पाक दिल समझा, उन्हीं लोगों के कर्म काले थे। पेड़ होंगे जवां तो देंगे फल, सोच कर के यही तो पाले थे। सबने भर पेट खा लिया खाना, माँ की थाली में कुछ निवाले थे। आज सब चिट्ठियां जला... Continue Reading →

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है – दुष्यंत कुमार

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे रास्तों में एक भी बरगद नहीं है मैकदे का रास्ता अब... Continue Reading →

है गली में आख़िरी घर लाम का – आदिल मंसूरी

है गली में आख़िरी घर लाम का तीसवां आता है नंबर लाम का डूबना निर्वाण की मंज़िल समझ पानी के नीचे है गौहर लाम का बंद दरवाज़ों पे सबके कान थे शोर था कमरे के अंदर लाम का देखते हैं हर्फ़ काग़ज़ फाड़ कर मीम की गर्दन में ख़ंजर लाम का भर गया है ख़ूने-फ़ासिद... Continue Reading →

रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था – आदिल रशीद

रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था सुब्ह तक नूर का चश्मा [1] मेरी दहलीज़ पे था रात फिर एक तमाशा मेरी दहलीज़ पे था घर के झगडे में ज़माना मेरी दहलीज़ पे था मैं ने दस्तक के फ़राइज़ [2] को निभाया तब भी जब मेरे खून का प्यासा मेरी दहलीज़ पे था... Continue Reading →

ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र हो गए – बलजीत सिंह मुन्तज़िर

ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र[1] हो गए । बे-सरोसामाँ[2] तो थे ही, अब तो बेघर हो गए । तुमसे मिलने पर बड़े आशुफ़्तासर[3] थे उन दिनों, तुमसे बिछड़े तो हमारे दर्द बेहतर हो गए । एक क़तरे[4] भर की आँखों में थी उनकी हैसियत, अश्क[5] जब पलकों से निकले तो समन्दर हो गए । कितनी... Continue Reading →

ज़िंदगी – अजनबी राजा

ज़िंदगी इक पहेली है अनदेखी इक सहेली है कही बेबाक़ नादानियाँ है कही थोडी बचकानियां है खुशियों की बरसात है वही ग़मो का अन्धेरा है कही तपती धूप है तो कही नीम की छाँव है हसरतें है इसमें बचपन की ललक है इसमें ज़िंदगी क्या है चले तो उम्र भर की हमसफ़र है वही पल... Continue Reading →

यह  अश्क  जो बहते हैं – ओनिका सेतिया ”अनु ”

यह   अश्क   जो   बहते  है  इस तरह  , जिंदगी से  इनका   नाता  है इस तरह . जिंदगी  चाहे हालातों  से  ना उबर  पाए , अश्क अपना रास्ता  बनायेगे ही इसी तरह . जज्बातों  की जहाँ  में  कोई कद्र नहीं   , अनदेखी  अश्कों  की होती है इस तरह . तकदीर और ज़माने  के सताए  हुए हम... Continue Reading →

ग़ज़ल – दाग़ देहलवी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा आरज़ू ही न रही... Continue Reading →

3 ग़ज़ल – लेफ़्टिनेंट डॉ.मोहसिन ख़ान

(1) क्यों आजकल लोगों पे अच्छी बातों का असर नहीं होता। क्यों आदमी का आदमी के साथ अब गुज़र नहीं होता। मजलिसों, तक़रीरों और नारों से कुछ हासिल हुआ नहीं, क्यों मुल्क का बिगड़ा हुआ निज़ाम बेहतर नहीं होता। भूखे, प्यासे, बेघर लोग देखते हैं शीशमहल हैरत से, क्यों अब इनके हाथों में कोई पत्थर... Continue Reading →

ग़ज़ल – मनीष कुमार ‘सुमन’

लोग कहते हैं वो यहीं का है, ग़म से बिखरा हुआ है वो, बेबसी का है। कल तलक आसमाँ में उसके ही चर्चे थे, गौर से देख लो, आज वो जमीं का है। किसलिये नफ़रतें हैं फैली यहाँ, आदमी दुश्मन आदमी का है। किसने किये हैं कत्ल? है खंजर किसका? घायल मैं हूँ, ये खंजर... Continue Reading →

कोई ये कैसे बताये की वो तनहा क्यों है-कैफ़ी आज़मी

कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैं वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन उसके सीने में समा जाये हमारी... Continue Reading →

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