मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें

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मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
यूं पेड़ों की औट में छुपकर सोते हुए
जागती आंखों से ताकते मानुष
और छदम भूख् में उजड़े उदास चेहरों पर उभरी विभत्स झुर्रियों से डरकर,मैनें देखा है बुद्ध तुम्हें
यूं नदियों में डूबते हुए जलमग्न
कांपते हुए थर्राते हुए,
दिव्यस्वप्न की आस्था लिए मज़बूर गुर्राते
परातें लिए इमारतों से गिरते
सड़क किनारे परांठे सेकते
चाय की चुस्कियों संगे बतियाते
घूंघट पर्दों दीवारों की ओट में खिसियाते
निरंकुश राजा की जूतियों में पैबंद जड़ते
इंसान के रंग को पसीने में घुलते देख नहीं सके तुम,
कोषों दूर विलाप था
विलासिता थी
हठधर्म था
तुम बेबस लाचार हो कूद गए समंदर में
जरा, मरण, दुखों से मुक्ति की आस लिए
दिव्य ज्ञान खोजते भटकते रहे रातों रातों
चिपक गए पहाड़ों से
लिपट गए पेड़ों , चट्टानों से बुत बनकर ।

मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
त्यागते यशोधरा का प्रेम
तजते पुत्र , मातृ , पित्र मोह का धर्म

मैंने देखा तुम्हें
प्रबुद्ध साम्राज्य अधिपति होकर जोगी होते हुए
जोगी से कुशीनगर का पुनर्जन्म
पुनर्जन्म से गौतम होकर सिद्धार्थ होते हुए
सिद्धार्थ से होकर मगध की यात्रा करते
मगध से लुम्बिनी में लीन होते हुए
मेने देखा है बुद्ध तुम्हें
शांत अविचिलत होकर
बौद्धि व्रक्ष में समाते हुए
आसन लगाते हुए

मैंने देखा है बुद्ध तुम्हें
आंसू पोंछते हुए मगर आंसू बहाते हुए
अनन्त से अंतर्ध्यान की और लौटते हुए
अंतर्ध्यान से अनन्त की और जाते हुए
मैनें देखा है तुम्हें ।।

Shaktoi_Baraith
शक्ति बारैठ पेशे से डिजिटल मार्केटिंग एक्सपर्ट हैं. थिएटर और लेखन इनके जीवन की नब्ज़ हैं। इतिहास में चारण कलम ने हमेशा डंका बजाया है और उसी क्रम में एक और कलम शक्ति बरेठ की। स्क्रिप्ट से लेकर लीरिक्स तक और हिंदी कविता से लेकर उर्दू ग़ज़ल तक इनकी स्याही ने वाह वाही बटोरी है. हाल के दिनों में स्लम एरिया, कच्ची बस्ती के बच्चों और एक शहर से दूर वृद्धाश्रम में रंगमंच के माध्यम से मुस्कान बिखेर रहे हैं |

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कृष्णवट : सुशोभित सक्तावत

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“गीता” में श्रीकृष्ण ने स्वयं को “अश्वत्थ वृक्ष” कहा है। “समस्त वृक्षों में मैं “अश्वत्थ” हूं।” “अश्वत्थ” यानी पीपल का पेड़।

किंतु श्रीकृष्ण केवल अश्वत्थ ही नहीं हैं, वे स्वयं में एक “महावन” हैं!

ब्रज में एक नहीं दो नहीं सोलह वन हैं!

और वनखंडियां तो अगणित!

मैं उसी ब्रज की भूमि में “वंशीवट” की तरह स्वयं को रोप देना चाहता हूं!

इन सोलह वनों में सबसे कृष्णमय है “वृन्दावन”। “वृन्दा” यानी तुलसी। “वृन्दावन” यानी तुलसी का वन।

यह वही तुलसी हैं, जो “शालिग्राम” से ब्याही हैं। “कौस्तुभ” मणि के मुकुट वाले शालिग्राम। यह भी स्मरण रहे कि “राधारानी” के सोलह नामों में से एक “वृन्दा” भी है। उसी “वृन्दा” का वह वन है, ब्रज का “आनंदघन”!

“वृन्दावनधाम” के “रमणरेती” में जो “बांकेबिहारी” का विग्रह है, उसकी “त्र‍िभंग” छवि को मैं नतशिर होकर निहारना चाहता हूं!

ब्रज में ही “मधुवन” है, जहां श्रीकृष्ण “राधिके! ललिते! विशाखे!” की टेर लगाते थे।

उनकी वह टेर “भांडीरवन” तक गूंजती थी। “निधिवन” में जहां “ललिता सखी” के आराधक हरिदासजी की पर्णकुटी थी, वहां तक भी। सुखमा, कामा, कुमुदा, प्रमदा गोपियां जहां श्रीकृष्ण निकुंज लीलाओं की साक्षी थीं, उस “महावन” तक भी। “भद्रवन” से “तालवन” तक वृक्षों की पंक्त‍ियां श्रीकृष्ण की उस डाक में डूबी रहतीं!

“राधिके! ललिते! विशाखे!”

ब्रज में सोलह वन और तीन वट हैं : “कृष्णवट”, “वंशीवट”, “श्रीदामवट”।

“श्रीहितहरिवंश” के चौरासी पदों में जिन “त्रिवटों” का वर्णन है, मैं प्रलय तक उन्हीं “न्यग्रोधवृक्ष” का करना चाहता हूं अनुगायन!

और ब्रज में “कदम्ब” है।

श्रीकृष्णरूप से उज्जवल सभी वृक्ष एक तरफ़ और “कदम्ब” का पेड़ दूसरी तरफ़।

श्रीरूपगोस्वामी के “विदग्धमाधव” का यदुनन्दन दास ठाकुर ने पद्यानुवाद किया तो उसका नाम रखा :

“राधाकृष्णलीलारसकदम्ब”!

यूं ही कदम्ब को “सुरद्रुम” नहीं कहा है। “सुरद्रुम” यानी “देवतरु”। देवताओं का वृक्ष!

ब्रज में ही “कुमुदवन” भी है, जिसमें कदम्बों के पूरे के पूरे कुंज : “कदम्बखंडियां।”

मुझे ऐसी ही किसी “कदम्बखंडी” में चैत्र का समीरण बनकर तैरना है!

“कदम्ब” भी तीन होते हैं : “राजकदम्ब”, “धूलिकदम्ब” और “कदम्ब‍िका”।

यह वृक्ष श्रीकृष्णलीलास्वरूप का प्रतीक बन गया है। यहां तक कि “महानिर्वाणतंत्र” में भी ललिता सखी को “कदम्बवनसंचारा” और “कदम्बवनवासिनी” कहकर इंगित किया गया है।

“भागवत” और “पद्मपुराण” ने कदम्ब को श्रीकृष्णलीला का अविच्छेद्य रूप माना है। और कौन जाने, महाकवि बाणभट्ट ने अपनी नायिका को जब “कदम्ब” के नाम पर “कादम्बरी” कहकर पुकारा था तो उनके मन में कौन-सी लीला रही होगी!

श्रीकृष्ण भले ही स्वयं को “अश्वत्थ” वृक्ष कहें, मथुराजी के जनवृन्द भले ही बरगदों को “कृष्णवट” की संज्ञा से अभिहित करें, मैं तो श्रीकृष्ण को “कदम्ब” का पेड़ कहकर ही पुकारूंगा।

श्रीटीकारीरानी की “ठाकुरबाड़ी” का नतग्रीव कदम्ब!

मैं उसी कदम्ब का उपासक बनना चाहता हूं, “शतभिषा” नक्षत्र का जातक जो ठहरा!

“जौ खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन” — इस देवतरु की संज्ञा में ही वह भाव है, जो मुझे बना देता है रसखान!

“महाभारत” में अनेक वृक्षों का वर्णन है, जिनकी पहचान अब खो रही। जैसे “अरिष्ट”, “मेषश्रंग”, “प्लक्ष” वृक्ष और “श्लेषमातकी”। केवल गूलर, कुटज, बिल्व, करील को पहचान पाता हूं। और पहचानता हूं वृन्दा को, कदम्ब को, मलयज को।

मैं “श्रीकृष्णविग्रह” के ललाट पर लिपा “गोपी-चन्दन” का वृत्त बनना चाहता हूं, ब्रज के मलयजवन का गंधवाह चन्दन!

एक ऐसा भी वृक्ष है, जिसे स्वयं एक “वन” कहकर पुकारा गया है। वह है “छितवन”। “सप्तपर्ण” वृक्ष।

सागौन नहीं, शीशम नहीं, मैं “छितवन” की छांह में देखना चाहता हूं स्वप्न, यदि श्रीकृष्ण स्वयं को कहकर पुकारें “सप्तपर्ण”। मैं उस सप्तपर्ण की छाल बनना चाहता हूं!

वृक्षों की वंदना देवताओं की तरह बहुत कर ली, अब मैं देवताओं की उपासना वृक्षों की भांति करना चाहता हूं!

मैं “श्रीकृष्णस्वरूप” को “व्यक्ति” नहीं, “विग्रह” नहीं, एक “वृक्ष” की तरह देखना चाहता हूं।

कल्पद्रुम-सा “कृष्णवट”!

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Sushobhit Singh Saktawat

 

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वक़्त के साथ बदलते बाबाओं के अवतार

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आज एक बाबा ने कहर ढा रखा है। रेप के आरोप में दोषी पाए गए हैं और उनके भक्त दो राज्यों में आपातकाल जैसे हालात लाने पर उतारू हैं। 25 से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं और जगह-जगह आगजनी की खबरें सामने आ रही हैं। हर कोई सोच रहा है कि बाबा में ऐसा क्या है जो लोग जान लेने-देने पर उतारू हैं। दरअसल यह बाबा बाकियों से अलग हैं, नाम है बाबा गुरमीत राम रहीम जी इंसां.. हर धर्म से कुछ न कुछ उधार ले लिया है और राम, रहीम से पहले इंसान होने का दावा करते हैं। यह कूल टाइप बाबा हैं, रॉकस्टार हैं और मल्टी-टैलंटेड भी। अब जब रेप के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं तो पंजाब और हरियाणा को जलने के लिए छोड़ दिया है।

समझना जरूरी है कि एक के बाद एक बाबा और उनके अलग-अलग अवतार आते कहां से हैं। दरअसल बाबाओं से पहले संत महात्मा और भगवान का कॉन्सेप्ट आया। भगवान की परिकल्पना ही इसलिए की गई थी जिससे लोगों का जब खुद पर भरोसा टूटने लगे तो किसी तीसरी शक्ति पर भरोसा करके काम पूरा करने की हिम्मत करें। पहले यह शक्ति तकलीफ के वक़्त याद की जाती थी, फिर इसका नाम लेकर डराया जाने लगा। बात तो तब बिगड़ी जब भगवान को धरती पर उतारने का दावा करके अलग-अलग तरह के सेंटर खोल दिए गए। यहां लोगों को तकलीफ के वक़्त खुशी मिलने उम्मीद में और तकलीफ न होने पर डराकर बुलाया जाने लगा।

अगला कदम भगवान के सेंटरों में काम करने वालों ने उठाया और भगवान से सीधा कनेक्शन होने का दावा करने लगे। जिन लोगों का अट्रैक्शन पहले भगवान और फिर उनके सेंटरों तक ही था, अब भगवान के दूतों से अट्रैक्ट होने लगे। ये दूत संत और बाबा बनकर लोगों की मदद करने लगे। कुछ सच में दूसरों की मदद करना चाहते थे और कुछ अपनी। रोज़ सैकड़ों लोग उनके सामने सिर झुकाने लगे और उन्हें लगने लगा कि वह खुद ही भगवान हैं। भक्तों को भी इस बात पर यकीन करने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

पहले ऋषि, महात्मा और सन्यासी होते थे जो सब कुछ छोड़कर सत्य की तलाश में जंगल और पर्वतों पर निकल जाते थे। वह हमेशा सत्य और ईश्वर की तलाश में लगे रहे लेकिन उतना सुख-शांति न पा सके, जितना नए जमाने के बाबाओं को बिना जंगल गए ही मिल गया। जंगल जाने में कोई फायदा नहीं मिलता इसलिए अब बाबा जंगल और पर्वतों के बजाय लोगों के बीच में रहने लगे हैं। लोगों की डिमांड और अपनी जरूरतों के हिसाब से बाबा ने अपना नाम रखना, मेकअप करना और प्रसाद देना शुरू कर दिया है। अब नए अवतार हैं राधे मां, गोल्डन बाबा, निर्मल बाबा, बिजनस बाबा, फ्रॉड बाबा और राम रहीम सिंह इंसां…

यह बाबा भगवान की नहीं अपनी भक्ति करवाते हैं। ये बाबाओं के अपडेटेड और लेटेस्ट वर्जन हैं। मॉल में शॉपिंग करने वालों और फाइव स्टार होटल में रहने वालों को पेड़ के नीचे या फूस की झोपड़ी में बैठे बाबा रास नहीं आने इसलिए नए बाबा आसमान से उड़कर या लाइट्स से सजे रंगबिरंगे स्टेज से निकलकर आते हैं। प्रसाद बताशों का नहीं, चॉकलेट और पेस्ट्री का होता है। भक्तों की अपने भगवान से बात करने की चाह ये बाबा पूरी कर रहे हैं। भक्त अपने नए भगवान के साथ अठखेलियां कर सकते हैं, उनके हाथ से प्रसाद खा सकते हैं। चंद दान-दक्षिणा के बदले राधे मां अपने भक्तों की गोदी में बैठकर उन्हें दुलार सकती हैं, आई लव यू कह सकती हैं… कहां मिलेगा ऐसा भगवान! बाबा राम रहीम को ‘पापा जी’ कहने वाले उनके रॉक म्यूजिक पर ठुमके लगाते हैं और खुद को भगवान का रूप कहने वाले अपने पसंदीदा कैरक्टर के साथ सच्चा सुख उठाते हैं।

बाबा बदलते गए लेकिन भक्त नहीं बदले। भक्त कल भी अपने भगवान के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते थे, आज भी नहीं सुनेंगे। भक्त कल भी अपने भगवान के लिए जान लेने-देने की हिम्मत रखते थे, आज भी रखते हैं। चुनौती बहुत बड़ी है क्योंकि चुनौती है नए भगवान पैदा न होने देने की… जो बदलते माहौल में लगभग नामुमकिन हो चुका है। पुराने भगवान तस्वीरों और मूर्तियों में हैं जिन्हें अपडेट नहीं किया जा सकता और नए भगवान हर जगह तैयार हो रहे हैं… जिनसे सवाल नहीं किए जा सकते।

(उपरोक्त विचार लेखक के अपने हैं| इससे लिटरेचर इन इंडिया समूह का कोई सम्बन्ध नहीं है|)

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गौरक्षा किसी एक वर्ग का कॉपीराइट नहीं है

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गौरक्षा का अर्थ है गाय की रक्षा करना। गौरक्षा किसी एक वर्ग का कॉपीराइट नहीं है। ये हर भारतीय का मानवीय धर्म है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिन्दू गौरक्षा कर सकता है और बाकी धर्मों के लोगों से इसका कोई सरोकार नहीं है। या सिर्फ बीजेपी गौरक्षा करेगी और बाकी राजनैतिक पार्टियां नहीं करेंगी।

ये हर एक हिंदुस्तानी का कर्त्तव्य है कि वो गौरक्षा करे। गाय सिर्फ एक पशु नहीं है, यह एक आस्था है मानवीय मूल्यों की। गाय का सर्वाधिक उपयोग दुग्ध उत्पादन में किया जाता है और दूध पिलाने वाली माँ से कम नहीं है। इसीलिए हर भारतीय की अप्रत्यक्ष रूप से गाय माता समान है। अगर सही वर्णों में कहा जाए तो गाय हमारी माता ही है।

प्रकृति के सिर्फ दो नियम है – एक सही तो एक गलत। सही और गलत के इलावा और कुछ नही हो सकता। जीवों में सर्वोपरि गाय है। और जीव हत्या एक पाप है। उसी प्रकार गौहत्या महापाप है। क्योंकि गौहत्या, माता की हत्या है। और माँ की हत्या से बड़ा कोई पाप नहीं है।

एक होता है गौरक्षक और एक होता है गौपालक। गौरक्षक वो होता है जो गाय की रक्षा करता है किसी भी प्रकार की चोट पहुँचने से। गौपालक वो होता है जो गाय को पालता है, सेवा करता है। गौपालक और गौरक्षक में समानता भी है। हर गौपालक गौरक्षक होता है। लेकिन हर गौरक्षक गौपालक नहीं हो सकता। जो प्राण देता है भगवान है, प्राण बचाने वाला वैद्य और प्राण की रक्षा करने वाला क्षत्रिय। उसी तरह गौरक्षक का ये सामाजिक धर्म है कि वो गाय की रक्षा करे। इस धर्म का एक महत्वपूर्ण बिंदु ये भी है कि गौरक्षक रक्षा करे सिर्फ भक्षकों से। किसी निहत्ते, गरीब, और बेकसूर को प्रताड़ित करने का उनके पास कोई नैतिक हक नहीं है। अगर कोई ऐसा करता है तो वो भी उन भक्षकों की श्रेणी में आ जायेगा। क्योंकि भक्षक सिर्फ जीव हत्या करता है, चाहे वो जीव गाय हो, बैल हो, पक्षी हो या मनुष्य हो या कोई और हो।

मेरा आप सभी से अनुरोध है कि हम किसी भी धर्म-जाति से क्यो न हो, हैं तो हम एक इंसान ही। और इंसानियत ये नही सिखाती की जीव हत्या करो। और गौहत्या तो कभी भी नही। इसलिए गौरक्षा को अपना मानवीय कर्तव्य मानिये और इंसानियत का रास्ता चुनिए। किसी निहत्ते और बेकसूर को प्रताड़ित न करिए। ये गौहत्या के पाप से थोड़ा ही कम है लेकिन है एक पाप ही।

मीराबाई | Meerabai

अब तो हरि नाम लौ लागी |

सब जग को यह माखनचोर, नाम धर्यो बैरागी।
कहं छोडी वह मोहन मुरली, कहं छोडि सब गोपी।
मूंड मुंडाई डोरी कहं बांधी, माथे मोहन टोपी।
मातु जसुमति माखन कारन, बांध्यो जाको पांव।
स्याम किशोर भये नव गोरा, चैतन्य तांको नांव।
पीताम्बर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
दास भक्त की दासी मीरा, रसना कृष्ण रटे॥

Meera Bai

मीराबाई