फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है…पढ़िए पूरा मामला

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फोटो में दिख रहा लड़का रांची का है। इलाहाबाद में एसएससी की तैयारी करता है। अपना खर्चा निकालने के लिए लक्ष्मी टाकीज के पास चिकन रोस्ट की दुकान लगाता है। दुकान की आमदनी से अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ घर वालों को भी पैसे भेजता है। घर वालों को इस बारे में कुछ नहीं पता है। पहली बार जब उसने पैसे बचाकर १५ हज़ार रुपए में ठेला लिया था तो वो दूसरे दिन ही चोरी हो गया था। पहले दिन की कमाई मात्र तीस रुपए थी। लेकिन लड़के ने हार नहीं मानी। उसने तय किया कि अब वो ये जरूर कर के रहेगा। कुछ महीने बाद उसने किराए के ठेले पर फिर से दुकान शुरू की। अब महीने में अच्छी खासी कमाई कर लेता है।

अनुभव पूछने पर बता रहा था कि शुरू में ये सब करने में शर्म आती थी। बाद में उसे यह एहसास हुआ कि मेहनत करना और आत्मनिर्भर होना शर्म की बात नहीं है।

उसके प्रेरणाश्रोत उसके गुरु है जिससे उसने यह काम सीखा है। वह दिल्ली में यही काम करते थे। आज वह सेंट्रल गवर्मेंट में अच्छी खासी नौकरी करते हैं। नौकरी के साथ पुराना काम भी देखते हैं। दिल्ली में उनकी तीन शटर की दुकान है जहां हर तरह के नानवेज आईटम मिलते हैं। दुकान से महीने में लगभग ५ लाख रुपए की कमाई होती है। कर्मचारियों की सैलरी देने के बाद ४ लाख बचते हैं। कर्मचारी के रूप में ऐसे लड़के रखे और प्रशिक्षित किए जाते हैं – जो जरूरतमंद और पढ़ने लिखने वाले होते हैं ।

यह देखकर अच्छा लगा कि भारत में इस तरह का बिजनेस और स्टडी कल्चर धीरे-धीरे डेवलप हो रहा है। यह यहां के युवाओं के लिए अच्छा संकेत है। अपनी पढ़ाई के लिए स्किल्ड और आत्मनिर्भर होना कोई बुरी बात नहीं है। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। दुनिया में वही इंसान असल मायने में सफल है जो अपने पैरो पर खड़ा होकर आगे बढ़ता है। चरम बेरोजगारी के दौर में इस कल्चर को अपनाने और प्रोत्साहित किए जाने की सख्त जरूरत है ।

इनको और इनके गुरु को सलाम !

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प्रद्युम्न यादव

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Congress planned Mandsaur Violence behind Farmers protest against Shivraj Singh Chauhan

खुलासा: कांग्रेस की साजिश है मंदसौर किसान आन्दोलन, पूरी प्लानिंग के तहत हुआ उपद्रव

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भारत के दिल में बसा मध्यप्रदेश इन दिनों सुलग रहा है| शिवराज सरकार पर संकट के बादल छाये हुए है, कारण है उग्र हो छुआ किसान आन्दोलन| उग्र हो चुके आन्दोलन को शांत करने हेतु मध्यप्रदेश पुलिस और सीआरपीएफ़ को तथाकथित रूप से गोली चलानी पड़ी जिसमे ६ किसानो की मौत हो गयी|

मध्यप्रदेश आखिर किसानो की मांग क्या है:

1) किसानों को कर्ज माफी मिले।
2) सरकारी डेयरी दूध के ज्यादा दाम दे।
3) स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू हों।
4) किसानों पर दायर केस वापस लिए जाएं।

आखिर क्या है स्वामीनाथन कमेटी रिपोर्ट? दैनिक ट्रिब्यून में एक लेख छपा था, २ मार्च को छपी इस रिपोर्ट में यशपाल ने पूर्ण जानकारी उपलब्ध करायी थी:

“सभी को भरपेट व गुणवत्ता वाला भोजन मिले, यह देश के लिए 21वीं सदी की मुख्य चुनौती है। इस चुनौती को पूरा करने में अन्नदाता किसान का अहम योगदान है। लेकिन यदि वही किसान कर्ज की चपेट में से निकलने को छटपटा रहा हो, उसकी हालत दयनीय हो और आत्महत्या तक की नौबत आ जाए तो चिंताजनक बात है। मुख्यत: अन्न की आपूर्ति यकीनी बनाने और किसान की आर्थिक हालत को बेहतर करने के दो मकसदों को लेकर सन‍् 2004 में केंद्र सरकार ने डाक्टर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन किया। इसे आम लोग स्वामीनाथन आयोग कहते हैं। इस आयोग ने अपनी पांच रिपोर्टें सौंपी। अंतिम व पांचवीं रिपोर्ट 4 अक्तूबर, 2006 में सौंपी गयी। रिपोर्ट ‘तेज व ज्यादा समग्र आर्थिक विकास’ के 11वीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य को लेकर बनी है।

क्यों बनाया गया आयोग

सबको अच्छा भोजन उपलब्ध हो, उत्पादकता बढ़े, खेती से किसान को पर्याप्त लाभ हो, खेती की सस्टेनेबल तकनीक विधियां अपनाई जाएं, किसानों को आसान व पर्याप्त ऋण मिले, सूखे, तटवर्ती एवं पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि की विशेष प्रोत्साहन योजनाएं लागू हों, कृषि लागत घटे और उत्पादन की क्वालिटी बढ़े, कृषि पदार्थों के आयात की दशा में किसान को सरकारी संरक्षण मिले तथा पर्यावरण संरक्षण के मकसद को पंचायतों के माध्यम से हासिल किया जाए- उक्त सभी उद्देश्यों के साथ इस आयोग का गठन किया गया था। नालेज व स्किल बढ़ाना, टेक्नोलोजी का खेती में ज्यादा इस्तेमाल व मार्केटिंग सुविधाएं बढ़ाना भी आयोग की प्राथमिकतों में शुमार था। पानी की कमी दूर करने संबंधी योजनाओं को बढ़ावा देना भी उक्त कमीशन की मंशा थी।

आयोग में कौन क्या था

चेयरमैन : एमएस स्वामीनाथन, पूर्णकालिक सदस्य : राम बदन सिंह, वाईसी नंदा, पार्टटाइम मेंबर : आरएल पिटाले, जगदीश प्रधान, अतुल कुमार अंजान। सदस्य सचिव : अतुल सिन्हा, आयोग के अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कृषि वैज्ञानिक डाक्टर एमएस स्वामीनाथन को भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है जिसके जरिये बढ़ती जनसंख्या को पर्याप्त अन्न मुहैया करवाना संभव हुआ। उनका लक्ष्य पूरी दुनिया को भूख से निजात दिलाने के साथ ही खेती को पर्यावरण मित्र बनाना भी था।

कौन-कौन सी सिफारिशें थी रिपोर्ट में

भूमि सुधारों की गति को बढ़ाने पर आयोग की रपट में खास जोर है। सरप्लस व बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने के हक यकीनी बनाना व राष्ट्रीय भूमि उपयोग सलाह सेवा सुधारों के विशेष अंग हैं। सिंचाई के लिए सभी को पानी की सही मात्रा मिले, इसके लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग व वाटर शेड परियोजनाओं को बढ़ावा देने की बात रिपोर्ट में वर्णित है। इस लक्ष्य से पंचवर्षीय योजनाओं में ज्यादा धन आवंटन की सिफारिश की गई है। भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के साथ ही खेती के लिए ढांचागत विकास संबंधी भी रिपोर्ट में चर्चा है। मिट्टी की जांच व संरक्षण भी एजेंडे में है। रिपोर्ट में बैंकिंग व आसान वित्तीय सुविधाओं को आम किसान तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। क्रॉप लोन सस्ती दरों पर, कर्ज उगाही में नरमी, किसान क्रेडिट कार्ड व फसल बीमा भी सभी किसानों तक पहुंचाने की बात है। मिलेनियम डेवलपमेंट गोल (यानी 2015 तक भूखों की तादाद आधी रह जाए) पूरे हों व प्रति व्यक्ति भोजन उपलब्धता बढ़े, इस मकसद से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आमूल सुधारों पर बल दिया गया है। कम्युनिटी फूड व वाटर बैंक बनाने व राष्ट्रीय भोजन गारंटी कानून की संस्तुति भी रिपोर्ट में है। किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने व वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी आयोग ने विशेष जोर दिया। मार्केटिंग सुधार भी इन्हीं के साथ-साथ अहम स्थान रखते हैं। किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछेक नकदी फसलों तक सीमित न रहें, इस लक्ष्य से ग्रामीण ज्ञान केंद्र व मार्केट दखल स्कीम भी लांच करने की सिफारिश रिपोर्ट में है। एमएसपी औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं, यही ध्येय खास है।”

दैनिक भास्कर में खबरों के अनुसार:

“- महाराष्ट्र में पुणतांबा के किसानों से प्रभावित हो कर छोटे-बड़े किसान संगठन, नेता इकट्ठा हो गए। 1 जून से किसान क्रांति मोर्चा के नाम से आंदोलन शुरू कर दिया गया। पश्चिम महाराष्ट्र के किसानों ने आंदोलन शुरू किया। नासिक और अहमदनगर आंदोलन का केंद्र है।
– मध्यप्रदेश में 2 जून से इस आंदोलन की शुरुआत हुई। यहां इंदौर, धार, उज्जैन, नीमच, मंदसौर, रतलाम, खंडवा और खरगोन के किसान आंदोलन कर रहे हैं।”
मंदसौर में तनाव क्यों है?
– मंदसौर और पिपलियामंडी के बीच बही पार्श्वनाथ फोरलेन पर मंगलवार सुबह 11.30 बजे एक हजार से ज्यादा किसान सड़कों पर उतर आए। पहले चक्का जाम करने की कोशिश की। पुलिस ने सख्ती दिखाई तो पथराव शुरू कर दिया। पुलिस किसानों के बीच घिर गई। किसानों का आरोप है कि सीआरपीएफ और पुलिस ने बिना वॉर्निंग दिए फायरिंग शुरू कर दी। इसमें 6 लोगों की मौत हो गई।

एसपी-कलेक्टर पर कहां हमला हुआ?

– मंदसौर जिले के बरखेड़ा पंत में फायरिंग में मारे गए स्टूडेंट अभिषेक का शव रोड पर रखकर किसान चक्का जाम कर रहे थे। इनकी मांग थी कि सीएम शिवराज सिंह यहां आएं और फायरिंग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का वादा करें। एसपी ओपी त्रिपाठी और कलेक्टर स्वतंत्र कुमार सिंह इसी मामले को सुलझाने के लिए बरखेड़ा पंत पहुंचे थे। तभी एक किसान ने कलेक्टर को पीछे से सिर पर चांटा मारा। लोगों ने उनके साथ बदतमीजी की। उनके कपड़े फाड़ दिए।
– हालांकि, बाद में अभिषेक के परिजन अंतिम संस्कार करने के लिए राजी हो गए। कलेक्टर ने अभिषेक के परिजनों को उसका स्मारक बनाने का आश्वासन दिया।

देवास में ट्रेन रोकी, बस में आग लगाई

– देवास में किसानों ने दो ट्रेनों को स्टेशन पर रोक लिया। करीब आधे घंटे तक समझाने के बाद इन्होंने ट्रेन को जाने दिया। इस प्रदर्शन का नीमच-रतलाम रेल ट्रैफिक पर असर पड़ा है। कुछ ट्रेन को इन स्टेशन पर ही रोक दिया है।
– वहीं, भोपाल से आ रही चार्टर्ड बस को सोनकच्छ में रोककर उसमें आग लगा दी। पैसेंजर्स ने भागकर जान बचाई। इससे पहले आंदोलनकारियों ने बस के शीशे तोड़ दिए गए। जब तोड़फोड़ की जा रही थी, तब बच्चे और महिलाएं बस के अंदर थीं। घटना के जो वीडियो सामने आए हैं, उनमें बच्चों के चिल्लाने की आवाज सुनी जा सकती है।
कहां-कहां लगा है कर्फ्यू?
– मंदसौर, पिपलिया मंडी, नारायणगढ़ और मल्हारगढ़ में कर्फ्यू लगा रहा। वहीं, दलोदा और सुमात्रा में भी धारा 144 लगा गई। मंदसौर में सभी मोबाइल सर्विसेस सस्पेंड कर दी गईं। इंदौर में मंगलवार को शांति रही, लेकिन बुधवार को पड़ोसी जिले देवास के हाट पिपलिया में आंदोलनकारियों ने थाने के अंदर खड़ी गाड़ियों में आग लगा दी।
कांग्रेस ने रखा था बंद, आने वाले थे राहुल गांधी
– दिग्विजय सिंह ने कहा था कि बुधवार को मध्य प्रदेश में बंद रहेगा। लोग इसमें मदद करें। बंद का असर सबसे ज्यादा इंदौर, धार और मंदसौर जिले में दिखा। इंदौर जिले में राऊ, सांवेर, मांगलिया, देवगुराड़िया इलाकों में बंद का ज्यादा असर दिखा। उज्जैन में भी ज्यादातर मार्केट बंद रहे। जो खुले थे, उन्हें कांग्रेस वर्कर्स ने बंद करवा दिए।
– धार में भी बंद का असर दिखा। बाजार पूरी तरह बंद रहे। उधर, सीहोर में कल किसानों के प्रदर्शन के बाद बंद का मिला-जुला असर रहा। आष्टा में दुकानें बंद रहीं, जबकि इछावर में कम असर रहा।
– राहुल गांधी के मंदसौर पहुंचने की खबर थी। लेकिन बुधवार को वे नहीं आए। वे एक-दो दिन में मंदसौर आ सकते हैं।

एकजुट होने की कोशिश में विपक्ष, मांगा शिवराज का इस्तीफा

– विपक्षी दल शिवराज सिंह चौहान की सरकार को घेरने की कोशिश में हैं। जेडीयू नेता शरद यादव ने बुधवार को राहुल गांधी से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि हम एक साथ मंदसौर जाने की योजना बना रहे हैं। हमने इस तरह का आंदोलन पहले नहीं देखा। मध्य प्रदेश सरकार 6 मौतों का आंकड़ा दे रही है, लेकिन हमें लगता है कि मौतें ज्यादा हुई हैं।
– कांग्रेस नेता कमलनाथ ने कहा कि शिवराज सिंह चौहान को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। वे अपनी जिम्मेदारी किसी पुलिस अफसर पर नहीं मढ़ सकते। मंदसौर में लाशों पर बोलियां लगाई जा रही हैं। 5 लाख, 10 लाख, 1 करोड़ (मुआवजे) की बात की जा रही है। ये शर्मनाक है।

बड़ा सवाल : किसने चलाई गोली?

– एमपी के होम मिनिस्टर भूपेंद्र सिंह का एक बयान मंगलवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसमें वे यह कहते सुनाई दिए कि पुलिस ने किसानों पर फायरिंग की। ‘भास्कर’ ने जब ऑडियो टेप के बारे में सिंह से पूछा तो उन्होंने कहा कि सब कुछ ज्यूडिशियल इन्क्वायरी से सामने आ जाएगा। उधर, मंदसौर के कलेक्टर ने घटना के बाद कहा था कि हमने गोली चलाने के आदेश नहीं दिए।

शिवराज ने क्या कहा?

– सीएम ने बुधवार को मीडिया में विज्ञापन जारी कर किसानों से अपील की। उन्होंने कहा- दो दिन में किसानों से जो चर्चा हुई, उसके मुताबिक मांगें मंजूर कर ली गई हैं। कुछ असामाजिक तत्व अपने स्वार्थ के कारण प्रदेश में अशांति फैलाना चाहते हैं। आप उनसे सावधान रहें। बहकावे में ना आएं। अभी भी कोई समस्या है तो हम आपस में मिल-बैठकर, चर्चाकर उसका समाधान निकाल लेंगे।
किसानों की सरकार से क्या मांगें हैं?
– किसान जमीन के बदले मुआवजे के लिए कोर्ट जाने का अधिकार देने, फसल पर आए खर्च का डेढ़ गुना दाम देने, किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने, कर्ज माफ करने और दूध खरीदी के दाम बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
– सीएम चौहान ने दो दिन की चर्चा के बाद किसानों पर केस खत्म करने, जमीन मामले में किसान विरोधी प्रावधानों को हटाने, फसल बीमा को ऑप्शनल बनाने, मंडी में किसानों को 50% कैश पेमेंट और 50% आरटीजीएस से देने का एलान किया था। यह भी कहा था कि सरकार किसानों से इस साल 8 रु. किलो प्याज और गर्मी में समर्थन मूल्य पर मूंग खरीदेगी। खरीदी 30 जून तक चलेगी।

घाटे में सरकार

मध्य प्रदेश सरकार किसानों से आठ रुपए प्रति किलो प्याज खरीद कर उसे खुले बाजार में दो रुपए प्रति किलो बेचेगी। यह कम से कम 10 किलो के बैग में मिलेगा। प्याज की पैदावार करने वाले जिलों में सरकार की एजेंसी मार्कफेड ने खरीदी शुरू कर दी है। साफ है कि इस बार फिर सरकार को प्याज की खरीदी में बड़ा नुकसान होगा। स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट मिलाकर सरकार को प्याज 14 रुपए प्रति किलो की पड़ेगी। पिछली बार भी प्याज से सरकार को 50 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।

ये सब जानकारी हमने आपको इसलिए दी ताकि आपको पता लग सके कि आखिर ये आन्दोलन क्यों हुआ, कहाँ हुआ और कैसे हुआ? इन खबरों में आप सिर्फ ऊपर-ऊपर की जानकारी से अवगत हुए हैं लेकिन अब हम आपको इस आन्दोलन की वास्तविक वजह और तह तक ले जायेंगे| हम आपको यह बताएँगे कि कैसे भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ने पूरे योजनाबद्ध तरीके से किसानो के शांतिपूर्ण और प्रतीकात्मक आन्दोलन को हिंसक बनाने हेतु महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| कैसे कांग्रेस के लोकल, वरिष्ठ नेताओं और उपद्रवियों ने किसान आन्दोलन की आड़ में अपनी राजनितिक रोटियां सेंकी है|

महाराष्ट्र में चल रहे शांतिपूर्ण आन्दोलन की आंच जैसे ही मध्यप्रदेश को पहुंची; किसान संगठनों ने सड़क पर उतर कर प्रतीकात्मक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान कर दिया| किसानों की दुखती रगों पर हाथ पड़ते ही किसान खुद-ब-खुद सड़कों पर उतर आये| भारी संख्या में सड़क पर उतर चुके किसानों से राजनीतिक लाभ लेने के लिए कांग्रेस के मध्यप्रदेश संगठन ने दिल्ली से आये आदेश को अपने लोकल नेताओं तक पहुँचाया| उन्हें निर्देश दिया गया कि किसी भी तरह आन्दोलन को हिंसक करो, पटरियां उखाड़ो, दूध ले जा रही डेयरी की गाडियों पर हमला करो, यातायात को बाधित करो और सरकारी तंत्र एवं पुलिस को कार्यवाही हेतु उकसाओ ताकि जवाब में किसान भी उग्र हो जाए और शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे आन्दोलन को हिंसा की चपेट में आने पर मजबूर होना पड़े|

यह सब पर्दे के पीछे हो जाता और किसी को कानों-कान ख़बर तक नहीं होती| लेकिन मदमस्त मध्यप्रदेश कांग्रेस संगठन ने नौसिखिया नेताओं को ज़िम्मेदारी थमा अपने षड्यंत्र की पोल खुद ही खोल दी|

सबसे पहले आप इंडियन यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्याम गुर्जर का फेसबुक प्रोफाइल देखिये और उसका फेसबुक पोस्ट देखिये| हाई कमान के आदेश पर यह युवा नेता आह्वान कर रहा है कि कार्यकर्ताओं तैयार हो जाओ, डेयरी पर हमला कर ४०००० लीटर दूध तबाह करना है और भारी संख्या में उपस्थित होकर उपद्रव मचाना है|

Congress local leaders behind Mandsaur Farmer Protest and Violence

Congress workers inciting violence behind farmers

दूसरे पोस्ट में वह फिर अनुरोध या यूँ कहे कि आदेश दे रहा है कि जो इस उपद्रव में शामिल न हो, कांग्रेस के बाहुबलियों उनपर हमला कर दो|

Congress workers in Madhya Pradesh Mandsaur provoking farmers and threatening for violence

दूसरे लोकल नेता और कांग्रेस आईटी सेल के प्रदेश सचिव की प्रोफाइल देखिये और फिर कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किसान बनकर सड़क जाम और उपद्रव भरा पोस्ट देखिये|

Jitu Patwari and Jyotiraj Sindhiya behind Mandsaur ViolenceCongress workers blocked road and set ablaze vehicles in Mandsaur

कुछ लोग यह भी कह सकते है कि माना यह इन लोकल नेताओं ने किया है लेकिन इससे यह साबित तो नहीं हो जाता कि इसमें कांग्रेस का हाथ है| लेकिन अब हमें जो सबूत हाथ लगा है उससे यह साबित हो जाता है कि यह पूरी साजिश के तहत किया गया उपद्रव है| नीचे दिए गये सन्देश में आप पढ़ सकते है कि वही श्याम गुर्जर कांग्रेस कार्यकर्ताओं से जानकारी ले रहा है कि प्लान के मुताबित पटरी उखड़ी की नहीं? इसके जवाब में दूसरा कार्यकर्ता कहता है कि जेसीबी चाहिए| तीसरा कहता है कि “खोद डालो और मरवा दो” जवाब में श्याम बोलता है कि जेसीबी ज़रूरी है क्या?

कार्यवाही के दर से चौथा कार्यकर्ता कहता है कि उनसे (हाई कमान) से कहियेगा कि हमारी सजा कुछ कम करवा देंगे

A whatsapp chat is viral where local congress leaders and workers are planning for violence in Mandsaur

अपने इस सबूत को हमने पुख्ता करने के लिए यह जानने की कोशिश कि क्या यह नंबर श्याम गुर्जर का ही है| और हमारी पड़ताल में यह नंबर श्याम गुर्जर का ही निकला|

Mandsaur violence is congress stroke, confirmed by whatsapp chat

इस सबसे एक बात तो साफ़ होती है कि यह सब आकस्मिक उपजा आक्रोश नहीं बल्कि कांग्रेस के आदेश पर एक सोचा समझा षड्यंत्र है|

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनितिक फायदे के लिए कोई दल या समूह इतना नीचे गिर सकता है? क्या किसानों की लाश पर राजनीति जायज़ है?

(नोट: आगे की रिपोर्ट जल्द ही प्रकाशित की जाएगी)

 

लिंगभेदी मानसिकता की वजह से कम हो रही हैं बेटियां

Gender Discrimination in India

 

हम एक लिंगभेदी मानसिकता वाले समाज हैं जहां लड़कों और लड़कियों में फर्क किया जाता है।यहाँ लड़की होकर पैदा होना आसान नहीं है और पैदा होने के बाद एक औरत के रूप में जिंदा रखना  भी उतना ही चुनौतीपूर्ण है। यहां बेटी पैदा होने पर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोगों की ख़ुशी काफूर हो जाती है। नई तकनीक ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। अब गर्भ में बेटी है या बेटा, यह पता करने के लिए कि किसी ज्योतिष या बाबा के पास नहीं जाना पड़ता है। इसके लिए अस्पताल और डॉक्टर हैं जिनके पास आधुनिक मशीनें है जिनसे भ्रूण का लिंग बताने में कभी चूक नहीं होती है। आज तकनीक ने अजन्मे बच्चे की लिंग जांच करवा कर मादा भ्रूण को गर्भ में ही मार देने को बहुत आसान बना दिया है।

भारतीय समाज इस आसानी का भरपूर फायदा उठा रहा है, समाज में लिंग अनुपात संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। वर्ष 1961 से लेकर 2011 तक की जनगणना पर नजर डालें तो यह बात साफतौर पर उभर कर सामने आती है कि 0-6 वर्ष आयु समूह के बाल लिंगानुपात में 1961 से लगातार गिरावट आई है। पिछले 50 सालों में बाल लिंगानुपात में 63 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन पिछले दशक के दौरान इसमें ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2001 की जनगणना में जहां छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों में प्रति एक हजार बालक पर बालिकाओं की संख्या 927 थी लेकिन 2011 की जनगणना में यह घटकर 914 (पिछले दशक से -1.40 प्रतिशत कम) हो गई है। ध्यान देने वाली बात यह है कि अब तक की हुई सभी जनगणनाओं में यह अनुपात न्यूनतम है।

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भारत में हर राज्य की अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक पहचान है जो कि अन्य राज्य से अलग है। इसी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक विभिन्नता के कारण हम देखते हैं कि एक ही देश में बाल लिंगानुपात की स्थिति अलग—अलग हैं। राज्यों की बात करें तो देश के सबसे निम्नतम बाल लिंगानुपात वाले तीन राज्य हरियाणा (830), पंजाब (846), जम्मू कष्मीर (859) हैं जबकि सबसे ज्यादा बाल लिंगानुपात वाले तीन राज्य मिजोरम (971), मेघालय (970), अंमान निकोबार (966) हैं। देश में सबसे कम बाल लिंगानुपात हरियाणा के झझर में 774 है। जम्मू कश्मीर में 2001 की तुलना में 2011 में सबसे ज्यादा गिरावट (-8.71) प्रतिशत देखी गई है। वहीं दादर नागर हवेली तथा लक्ष्यद्वीप में 2001 की तुलना में 2011 में यह गिरावट क्रमश: -5.62 तथा -5.32 है, जो कि एक दशक में बाल लिंगानुपात में गंभीर गिरावट के मामले में देश में दूसरे तथा तीसरे स्थान पर हैं।

भारत में लगातार घटते जा रहे इस बाल लिंगानुपात के कारण को गंभीरता देखने और समझने की जरुरत है। जाहिर है लिंगानुपात कम होने का कारण प्राकृतिक नहीं है और न ही इसका संबंध अमीरी या गरीबी से है। यह एक मानव निर्मत समस्या है जो कमोबेश देश के सभी हिस्सों, जातियों, वर्गों और समुदायों में व्याप्त है। भारतीय समाज में गहराई तक व्याप्त लड़कियों के प्रति नजरिया, पितृसत्तात्मक सोच, सांस्कृतिक व्यवहार, पूर्वागृह, सामाजिक-आर्थिक दबाव, असुरक्षा, आधुनिक तकनीक का गलत इस्तेमाल इस समस्या के प्रमुख कारण हैं।

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मौजूदा समय में लिंगानुपात के घटने के प्रमुख कारणों में से एक कारण चयनात्‍मक गर्भपात के आसान विकल्प के रूप में उपलब्धता भी है। वैसे तो अल्ट्रासाउंड, एम्नियोसिंटेसिस इत्यादि तकनीकों की खोज गर्भ में भ्रूण की विकृतियों की जांच के लिए की गई थी लेकिन समाज के पितृसत्तात्मक सोच के चलते धीरे धीरे इसका इस्तेमाल भ्रूण का लिंग पता करने और अगर लड़की हो तो उसका गर्भपात करने में किया जाने लगा। इस आधुनिक तकनीक से पहले भी बालिकाओं को अन्य पारंपरिक तरीकों जैसे जहर देना, गला घोंटना, जमीन में गाड़ देना, नमक-अफीम-पुराना गुड़ या पपीते के बीज देकर इत्यादि का उपयोग कर मार दिया जाता था।

समाज में घटती महिलाओं की संख्या पर ‘मातृभूमि: अ नेशन विदाउट वुमेन’ नाम से एक फिल्म 2003 में आई थी। इसमें एक ऐसे भविष्य के गांव को दर्शाया गया था जहां वर्षों से चली आ रही महिला शिशु हत्या के चलते अब यहां एक भी लड़की या महिला ज़िंदा नहीं है। दरअसल, यह भविष्य की चेतावनी देने वाली फिल्म थी जिसमें बताया गया था कि बेटियों के प्रति अनचाहे रुख से स्थिति कितनी भयावह हो सकती है। आज इस फिल्म की कई चेतावनियां हकीकत बन कर हमारे सामने हैं। हमारे देश के कई हिस्सों में लड़कियों की लगातार गिरती संख्या के कारण दुल्हनों की खरीद-फरोख्त हो रही है। बड़ी संख्या में लड़कों को कुंवारा रहना पड़ रहा है और दूसरे राज्यों से बहुएं लानी पड़ रही हैं।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लिंगानुपात को बढ़ाने के लिए अनेकों प्रयास किये गए हैं लेकिन स्थिति सुधरने बिगड़ती ही गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी इस दिशा में लगातार चिंता जताई जाती रही है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भ्रूण लिंग जांच से जुड़े विज्ञापन और कॉन्टेंट दिखाने पर सुप्रीम कोर्ट ने गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट जैसी सर्च इंजन कंपनियों को यह कहते हुए फटकार लगाई ‘गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां मुनाफा कमाना तो जानती हैं, लेकिन भारतीय कानून की कद्र नहीं करतीं.’ कोर्ट ने तीनों सर्च इंजन्स को अपने यहां आंतरिक विशेषज्ञ समिति बनाने के निर्देश दिए हैं जो समिति भ्रूण लिंग जांच से जुड़े आपत्तिजनक शब्द पहचानकर उससे जुड़े कॉन्टेंट को ब्लॉक करेगी।

लेकिन अनुभव बताते हैं कि कानून, योजना और सुप्रीम कोर्ट के प्रयास जरूरी तो हैं लेकिन सिर्फ यहीं काफी नहीं हैं। इस समस्या के कारक समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता, लड़के की चाह, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, लिंग आधारित गर्भपात, कन्या शिशु की देखभाल न करना,दहेज इत्यादि हैं। यह जटिल और चुनौतीपूर्ण समस्याएं हैं। लेकिन समाज और सरकार को इन समस्याओं पर प्राथमिकता के साथ चोट करने की जरूरत है।

( ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं )

लगभग 5000 कत्लेआम को सब लोग ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से जानते हैं

25 years of Operation Bluestar

चित्र में: स्वर्णमंदिर के पास वाली ईमारत से मोर्चा संभाले हुए जवान

लगभग 5000 सिख महिलाएं ,बच्चों ,बूढ़े , जवान और सेवादारों के कत्लेआम को आज 33 साल हो गए। इसे आप सब लोग ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से जानते हैं। इंदिरा गांधी की सरकार ने खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों के खिलाफ ये ऑपरेशन चलाया था, जिसमें उनके 200 लोगों ने सरेंडर किया वहीँ भिंडरावाले भी मारे गए।

Operation Blue Star6

चित्र में: आत्मसमर्पण करने के लिए स्वर्णमंदिर से बाहर आते हुए कुछ युवा, बच्चे एवं महिलाएं

भारतीय सेना बताती है कि 35 औरतें और 5 बच्चे इस ऑपरेशन में मारे गए और कुल 492 जानें गईं। जबकि असली आंकड़े वहीँ है जो मैंने पहली पंक्ति में लिखा है। ऑपरेशन ब्लू स्टार से पैदा हुई आक्रोश ने इंदिरा गाँधी की जान ले ली। प्रधानमंत्री की हत्या के बाद शुरू हुए दंगों ने फिर से तीन हजार लोगों की जान ले ली। इनमें से ज्यादातर सिख थे।

Operation Blue STar 4

चित्र में: कार्यवाही स्थल का मुआयना करते हुए सैन्य अफसर

किताबें बताती है कि 06 जून 1984 को स्वर्ण मंदिर परिसर के अंदर सिर्फ खून ही खून था। इसमें महिलाओं और बच्चों के खून ज्यादा थे।वहां 5 जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस मनाया गया था। लगभग सात हजार श्रद्धालु वहां कीर्तन कर रहे थे तभी वहां सेना के द्वारा बम से हमला किया गया जिससे अफरातफरी मच गई और दबकर ही कई लोग मारे गए। इसके बाद जो खूनखराबा हुआ उसे भारतीय इतिहास में अल्पसंख्यकों पर हुआ पहला बड़ा हमला कह सकते हैं।

Operation Blue Star

ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर सिखों के मन में टीस आज भी है क्योंकि सरकार ने न सिर्फ उनके आस्था के केंद्र पर सेना घुसाया बल्कि अकाल तख्त को गोलियों से नेस्तनाबूद किया। हरमिंदर साहिब की तरफ गोलियां चलाई गई। ये गहरे जख्म आज भी नहीं भर पाए है और न ही भर पाएंगे। ऑपरेशन ब्लू स्टार में सेना के गोलियों के निशाना बने बेगुनाहों के परिवार के हम आसूं नहीं पोंछ पाए है। वहीँ 84 दंगा पीड़ितों के साथ भी न्याय नहीं कर पाए हैं। एक बड़े पेड़ के गिरने से धरती इतनी हिली कि 3000 सिखों को धरती में समाना पड़ा। यह कत्लेआम माफ़ी योग्य तो नहीं फिर भी आज देश को सिखों से माफ़ी मांगना चाहिए।

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चित्र में: घटनास्थल पर गोलियों के निशान दिखाते हुए सेवादार

Vikram Singh Chauhan's profile photo

विक्रम सिंह चौहान

(ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं)

उत्तरप्रदेश पुलिस संवेदना, साहस एवं दायित्व के सफ़र में गंभीर

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उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री पद को सँभालने के बाद ही जिस प्रकार योगी आदित्यनाथ ताबड़तोड़ फैसले कर रहे थे उससे यह साफ़ ज़ाहिर हो गया था कि मौजूदा योगी सरकार महिला सुरक्षा हेतु अति गंभीर है| इसी क्रम में योगी सरकार ने जैसे ही ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ का गठन किया, ठीक उसी वक़्त उत्तरप्रदेश पुलिस की जिम्मेदारियां और बढ़ गयी|

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जनसँख्या के हिसाब से सबसे बड़े सूबे की पुलिस की कमान सँभालते ही उत्तरप्रदेश पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह अपनी बढ़ती जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर दिख रहे है, इसीलिए जनता और महिलाओं के साथ पुलिस के उचित व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार पुलिस कर्मियों को बाकायदा प्रशिक्षण दिया जा रहा है|

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उत्तरप्रदेश पुलिस की ट्विटर सेवा के लिए सम्मान को स्वीकार करते हुए महानिदेशक पीआरओ श्री राहुल श्रीवास्तव 

उत्तरप्रदेश पुलिस की ट्विटर सेवा की जिम्मेदारियों का वहन कर रहे पुलिस महानिदेशक के पीआरओ राहुल श्रीवास्तव की सक्रियता एवं लोकप्रियता किसी से छुपी नहीं है|

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वीमेन पॉवर लाइन 1090 में प्रशिक्षण कार्यक्रम

हमने पूर्व में ही उत्तरप्रदेश पुलिस की नई जिम्मेदारियों और तकनिकी के माध्यम से जनमानस की सेवा के लिए तत्परता को प्रमुखता से प्रकाशित किया था|

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पुलिस अधिकारीयों को प्रशिक्षण का एक दृश्य

आज पुलिस महानिदेशक, उ०प्र० के निर्देश पर एन्टी रोमियो स्क्वाड की टीमों का वीमेन पॉवर लाइन 1090 में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाने से यह तो साफ ज़ाहिर हो गया है कि उत्तरप्रदेश पुलिस महिला सुरक्षा हेतु गंभीर है एवं इस दिशा में  प्रभावी कार्यवाही हेतु सदैव तत्पर है|

 

 

लाशों की बस्ती से राष्ट्रपति को 4500 ख़त!

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“शमा को क्या पता, परवाना क्यों जलता है,
वो सोचती है कोई भुला-भटका राहगीर है |”

प्रणाम,

बात सन 2004-2005 की है । मेरे गाँव – तेम्हुआ  में मेरे घर से तक़रीबन  500-600 मीटर की दूरी पर ग़रीबों की बस्ती है- थलही और बिरती । यहाँ  के बाशिंदे लगभग भूमिहीन है । रोज़ दूसरे के खेतों तथा ईंट-भाठ्ठों में काम करते है तो खाते है, वरना भूखे सोते है| उस वक़्त इसकी आबादी मुश्किल से 700 के करीब रही होगी । अचानक दोनों बस्ती में कालाजार बीमारी ने अपना पाँव पसारना शुरू किया और धीरे-धीरे इस बीमारी ने पूरी बस्ती को अपने आगोश में इस तरह लपेट लिया, जिस तरह अजगर सांप किसी शिकार को अपने आगोश में लपेट लेता है। लोग स्थानीय स्तर पर सुविधा न मिलने के कारण यहाँ से दूर के स्थान जाले, जोगियारा, मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर तथा पड़ोसी देश नेपाल के शहर मलंगवा तक जाकर इलाज़ करवाने लगे। लोगों के सामने पैसे की समस्या आई । किसी ने कर्ज लिया तो किसी ने जेवर जेवरात बेचे । किसी ने घरारी बेचीं तो किसी ने घर के बर्तन तथा मवेशी बेचे। जो व्यक्ति कमाने वाले थे, वे अपने बीमार परिजन की सेवा में व्यस्त हो गए ।

इस कारण घर में खाने के लाले पड़ने लगे । तब हम इन मरते हुए लोगों की जान बचाने की ख़ातिर स्थानीय स्तर पर हाथ-पांव मारने लगे। मगर जब कोई ‘पॉजिटिव रेस्पोन्स’ नहीं मिला तो मेरे मन में ये यह भावना जागी कि क्यूं न इन मरते हुए लोगों की बात डायरेक्ट मैं मुल्क के संवैधानिक प्रमुख – राष्ट्रपति जी के सामने रखूं। इसके लिए हमने राष्ट्रपति कार्यालय का संपर्क नंबर व्यवस्था किया और एक अटूट विश्वास के साथ राष्ट्रपति कार्यालय में फोन और ईमेल किया । फोन पर मैंने कहा कि मुझे राष्ट्रपति जी से मिलकर अपनी समस्या सुनानी है। तब मुझे कहा गया कि राष्ट्रपति जी न ऐसे मिलते है और न ऐसे आपकी बात सुनेंगे। बल्कि इसके लिए आपको राष्ट्रपति जी के नाम से एक अर्ज़ीनामा लिखना पड़ेगा ।

अर्ज़ीनामा लिखते वक़्त जब हमने उन मरते हुए लोगों से यह कहा कि आप लोगों की समस्या को मै सीधे आपके सम्राट अर्थात राष्ट्रपति जी के पास भेज रहा हूँ| अब आपके राष्ट्रपति जी आपको मरने नहीं देंगे, तो हमारी इन बातों को सुनकर बस्ती के लोगो का बीमार चेहरा ऐसे चमक उठा था जैसे डूबते सूरज की किरणों से बादल तथा उगते सूरज की किरणों से ओस की बूंदे। मगर राष्ट्रपति भवन से कोई जवाब नहीं आया। जवाब न पाकर हमने आनन-फ़ानन में 9 सितम्बर 2004 को सप्तक्रांति ट्रेन पकड़ी और हम दिल्ली पहुंच गए। 17 सितम्बर 2004 के रोज़ मैंने दस पृष्ठों का एक लेटर दिल्ली के नेहरू प्लेस में टाइप करवाया और 24 सितम्बर 2004 को राष्ट्रपति कार्यालय में जाकर खुद अपने हाथों से जमा किया !

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प्रतीकात्मक

मुझे लगा कि मै इतनी दूर से आया हूँ तो दो-चार-दस दिन में हमें राष्ट्रपति जी से मिलने का वक़्त मिल जायेगा। मगर वहां कार्यालय के अधिकारी ने मुझे बताया कि आप घर चले जाइए, राष्ट्रपति जी जब आपसे मिलना चाहेंगे तो हम आपको सूचित कर देंगे। जवाब सुनकर थोड़ी देर के लिए हमारी उम्मीदों का महल नाउम्मीदी के धरती पर ठीक उसी तरह ओंधे मुंह गिर गया, जिस तरह हवा के झोको से फूलों के सुखी पंखुड़ियाँ जमीन पर ओंधे मुंह गिर जाती है। फिर अपने आप को सँभालते हुए हम बैरंग हाथ अपने गाँव चले आये जहाँ कालाजार बीमारी अपना तांडव दिखाना शुरू कर दी थी।

लगभग ढाई महीने तक इंतज़ार करने के बाद जब हमें कोई सूचना नहीं मिली तो मैंने “पत्र सत्याग्रह अभियान” चलाने का निश्चय किया। जिसके तहत दिनांक 6 दिसंबर 2004 से मैंने हर रोज़ भारत के माननीय राष्ट्रपति जी के नाम एक लेटर डालना शुरू किया। बीच-बीच में मैंने जब भी राष्ट्रपति कार्यालय के अधिकारी से संपर्क किया, हमें वही पुराना जवाब मिला-“राष्ट्रपति जी जब आपसे मिलना चाहेंगे तो हम आपको सूचित कर देंगे”। गुजरते वक़्त के साथ मेरे कमरे की दीवार पर टंगे कैलेंडर पुराने हो कर उतरते गए और उसकी जगह नए कैलेंडर चढ़ते गए। हर रोज़ एक तारीख़ की मौत होती गयी और एक नयी तारीख़ जन्म लेती गई। हर नयी तारीख़ को मैं राष्ट्रपति जी के पास पत्र लिखता गया और उन पत्रों में समस्याओ की गगरी उड़ेलता गया ।

इन सब के बीच राष्ट्रपति जी के कार्यालय से दो-चार जवाबी पत्र आये जिसके माध्यम से मुझे यह कहा गया कि “राष्ट्रपति जी अन्य कार्यों में व्यस्त है। इस कारण वे आपको मिलने का समय नहीं दे सकते है।” इन पत्रो को पढ़कर एक घायल हिरण की तरह मैं तड़प उठा। सरकते लम्हों के साथ राष्ट्रपति भवन से निकलने वाली इंकार की हर निर्दयी तीर हमारे ह्रदय में गहराई तक धंसती चली गयी और बदस्तूर घायल होते-होते वह भी दिन शुरू हो गया जब इंकार की हर निरंकुश तीर हमारे लहूलुहान बदन के अंग-अंग से यह सवाल पूछने लगी कि – “बता, अब मै तुझे कहाँ घायल करूँ?”

प्रतीकात्मक

प्रतीकात्मक

एक तरफ राष्ट्रपति भवन से इंकार की बेरहम तीर इस बस्ती पर बरसती रही और दूसरी तरफ कालाजार बीमारी मौत बनकर पागलों की तरह इन गरीबो की जिंदगी का पीछा करती रही । इलाज के आभाव में उन लोगों की हालत पंख कटे उस पंछी के समान हो गयी जो फुफकार मारते सांप को अपनी ओर आते देखकर भी कुछ नहीं कर पाता है। बस्ती में लोग जाने से डरने लगे। एक लाश दफ़न हो भी नहीं पाती थी कि दूसरी अर्थी सजने लगती थी। एक विधवा के आँखों के आँसू सुख भी नहीं पाते थे कि दूसरी महिला की ह्रदय विदारक चीख बस्ती के रोम – रोम को थर्रा डालती थी। एक बहन अपनी मांग की सिंदूर धो भी नहीं पाती थी कि दूसरी बहन अपने हाथों की चूड़िया फोड़ने पर विवश हो जाती थी। एक बेटा अपने बाप को कंधे पर उठाये कब्रिस्तान पहुंच भी नहीं पाता था कि दूसरे बेटे को अपनी माँ को आग देने के लिए तैयार हो जाना पड़ता था। एक बाप अपने जिगर के टुकड़े को मिट्टी में दफ़न कर भी नहीं पाता था कि दूसरा बूढ़ा बाप अपने जवान बेटे की लाश को कंधे पर उठाये शमशान घाट की तरफ चल पड़ता था ।

कुछ परिवार ऐसे थे जिसमें कई सदस्य एक साथ मौत की नींद सो गए । ग़ुरबत में जीते लोग अपनी टूटी-फूटी झोपड़ियों में अपने सख्त बिस्तरों पर चिल्लाते रहे। दर्द से कराहते रहे। बस्ती का कण-कण अपनी जिंदगी की पनाह मांगती रही और राष्ट्रपति जी अपने आलीशान तथा अज्जिमुश्शन राष्ट्रपति भवन में बंशी बजाते रहे। जिसका परिणाम हुआ 50 इंसानों की दर्दनाक मौत और इस तरह जीते-जागते इंसानो की यह बस्ती “लाशों की बस्ती” में तब्दील हो गई| बेशक, माननीय राष्ट्रपति जी के नाम पिछले 12 वर्षो में 4500 से अधिक पत्र लिखने के बाबजूद आज भी यह बस्ती ख़ामोशी से अपनी जिंदगी का वजूद मांग रही है । इसकी चिंतित आँखें अपनी जिंदगी की तबाही का हाल बता रही हैं क्योकि इसकी बुझी हुई आँखों में कालाजार बीमारी भय बनकर नाच रही है। अनाथ मासूम कंगाली के आँगन में पल-बढ़कर बाल मजदूरी के चचौराहे पर खड़ा है ।

माँ की आखों में अपने मासूमों के असुरक्षित भविष्य का सपना तैर रहा है। दुःख और दर्द लोगों के सूखे चेहरों के साथ इस तरह खेल रहे है जैसे बिल्ली अपने पन्जों से चूहे के साथ खेलती है । यहाँ के बदनसीब लोग दिन के उजालो में अपनी जिंदगी की उदास परछाईयों से बातें करते है तथा रात होने पर आंसुओ से सने अँधेरे के टुकड़े को गिना करते है। गम और आंसुओं के साथ जीने के लिए यह बस्ती उसी तरह विवश है जिस तरह किसी मुसाफिर की परछाई उसके साथ चलने के लिए विवश होती है। अपने वर्तमान और भविष्य में बदलाव की कोई उम्मीद न देखकर बस्ती यह सोचने पर विवश है कि क्या करें ? क्या न करें? कहाँ जाएँ? कहाँ न जाएँ? किससे कहें? किससे न कहें…क्योंकि इन्हें लगता है कि मेरे राजा अर्थात राष्ट्रपति जी मेरे घर इसलिए नहीं आ रहे है क्योंकि मैं जीते-जागते इंसानो का बसेरा नहीं बल्कि शमशान घाट की जलती हुई कोई चिता हूँ। मैं दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क का अंग नहीं बल्कि बर्बाद जिंदगी की दुर्गन्ध फैलाता हुआ कोई मलबा हूँ। लिहाजा, इस बस्ती, राष्ट्र तथा इंसानियत की सलामती के वास्ते हम दोनों भाई एक बार फिर आपको यहाँ आने का निमंत्रण देते हुए यह गुजारिश  करते है –

“अपने महलों से कभी, आप भी निकल कर देख लें ।
जिंदगी कितनी परेशान है, यह घर-घर देख लें ॥
आहों की अब्र, अश्कों की बरसात देख लें ।
कभी फुरसत मिले तो आकर, हम गरीब गाँव वालों की भी दिन रात देख लें||

आपका
दिलीप अरुण “तेम्हुआवाला”
सीतामढ़ी (बिहार)
+919334405517

राष्ट्रपति कार्यालय से प्राप्त जवाब 

लाशों की बस्ती को राष्ट्रपति का पत्र

भारत के राष्ट्रपति के नाम 4500 वां पत्र
तेम्हुआ
30-03-2017
सेवा में,
आदरणीय महामहिम भारतीय राष्ट्रपति जी,
चरणस्पर्श।
हम सही नहीं हैं मगर आपकी सलामती की कामना करते हैं। हे राष्ट्रपति जी, पिछले बारह [12] वर्षों से हर रोज आपके नाम हम पत्र लिख रहे हैं और यह हमारा 4500 वां पत्र है। हर पत्र में मैंने लिखा है कि-“प्लीज हमें आपसे मिलने के लिए थोड़ा -सा वक़्त दिया जाय तथा हमारे गांव के उन ग़रीबों को उनका वाज़िब हक़ दिया जाय जिनके परिवार के लोग बिमारी के कारण असमय मर चुके हैं।” मगर आज तक आपने हमें मिलने का वक़्त नहीं दिया है।
लिहाज़ा हे मेरे पिता तुल्य सम्राट,क्या आप हमें यह बता सकते हैं कि आज की तारीख़ में 4500 चिट्ठी लिखने के बावजूद आपके महल का फ़ाटक मेरे लिए क्यों नहीं खुला है? इतने पत्र भेजने के बावजूद आपने हमें मिलने की इजाज़त क्यों नहीं दी हैं?
चन्द पत्रों के आलावा बाकी के हमारे सारे-के-सारे पत्र आपके कार्यालय में पहुंचे या नहीं पहुंचे? अगर नहीं पहुंचे तो क्यों नहीं पहुंचे? आखिर कहाँ चले गए वे सारे-के-सारे पत्र? और अगर पहुंचे तो क्या उसकी ख़बर आपको मिली या नहीं मिली? अगर नहीं मिली तो क्यों नहीं मिली? और अगर मिली तो फिर आपने मुझे मिलने की इजाज़त नहीं दी?
क्या आपने मुझे मिलने की इजाजत इसलिए नहीं दी हैं क्योंकि मैं कोई राजनेता नहीं हूँ या किसी बड़े औद्योगिक घराने से मेरा कोई रिश्ता नहीं है? क्या आपने मुझे मिलने की इजाजत इसलिए नहीं दी हैं क्योंकि मैं कोई खिलाड़ी या फिल्म स्टार नहीं हूँ? मैं पूछता हूँ आपसे कि इस मुल्क के राजनेता या खिलाड़ी आपसे मिल सकते हैं, उद्योगपति या फिल्म स्टार आपसे मिल सकते हैं तो मैं आपसे क्यों नहीं मिल सकता हूँ? इन सबसे मिलने के लिए आपके पास वक्त है तो मुझसे मिलने के लिए आपके पास वक्त क्यों नहीं है? क्या मेरा गुनाह सिर्फ इतना है कि मैं इस प्रजातान्त्रिक मुल्क के सुदूर गांव-देहात में रहने वाला एक आम नागरिक हूँ? क्या हिंदुस्तान के सम्राट की नजरों में एक आम नागरिक की कोई अहमियत नहीं है? क्या इस मुल्क में एक आम नागरिक द्वारा अपने दिल में राजा से मिलने की ख्वाहिश पैदा करना गुनाह है?
अगर “हाँ”, तो क्या यह मान लिया जाय कि दिल्ली स्थित रायसीना के सीने पर खड़े आलिशान और अज़ीमुश्शान राष्ट्रपति भवन केवल ख़ास लोगों को अपनी सीढियाँ चढ़ने की मंजूरी देते हैं? क्या यह मान लिया जाय कि राष्ट्रपति भवन केवल ख़ास लोगों को अपनी चौखट लांघने की अनुमति देते हैं? क्या यह मान लिया जाय कि हिंदुस्तान के जहाँपनाह केवल ख़ास लोगों को अपने दीदार की इजाज़त देते हैं? अगर “नहीं”, तो हे भारतीय लोकतंत्र के पहरेदार,आप हमारे लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा करें क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि पिता समान और जनता पुत्र समान होती है,और पुत्र का यह अधिकार है कि वह अपने पिता से मिलकर अपनी बातों को रखे और पिता होने के नाते हमारे हर अधिकार की रक्षा करना आपका कर्तव्य है।
आपके जवाब के इंतजार में —
आपका विश्वासी
दिलीप अरुण “तेम्हुआवाला”
सीतामढ़ी (बिहार)
+919334405517

निवेदन:

1. बारह वर्ष, 4500 से अधिक दिन और
रातें, 4500 से अधिक पत्रों के माध्यम से मैंने यह मांग की है कि “प्लीज़
हमें मिलने का मौक़ा दिया जाय। अपने लिए, अपने गांव में बिमारी से मरे
गरीब भाई-बहनों के लिए और भारतवर्ष के लिए।”
2. आखिर क्या कारण है कि इस छोटी- सी बस्ती थलहि और बिरति में बिमारी से
चन्द वर्षों में तक़रीबन 50 लोगों की मौतें हो गयी तथा सैकड़ों लोग पीड़ित हो
गए। इसकी जाँच कराई जाय और फिर उस जाँच में निकले कारणों के समाधान के
लिए समुचित कार्यवाई की जाय ताकि भविष्य में यहाँ के लोग फिर से इस
बीमारी का शिकार न बनें।
3. बीमारी से मरे हुए लोगों के पीड़ित परिवारों का हक़ उन्हें दिया जाय।

सेक्स की लत से लड़ते शख़्स की कहानी

Dante-Infero-Anger

एक ऐसे शख़्स की कहानी जो सेक्स की लत से भयानक तरीके से पीड़ित है. वह इस कदर बेकाबू है कि कहानी पढ़ते हुए आप ख़ुद हैरान रह जाएंगे. पढ़ें, उसी शख़्स की ज़ुबानी यह कहानी-

मैं 10 साल की उम्र से ही कई बुरी लतों से पीड़ित था. अगर आप ड्रग की लत से पीड़ित हैं तो आपका जीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है.

यहां सेक्स सबसे जटिल होता है. आप इसे बिना किसी बाहरी डर के सालों कर सकते हैं. लोग कहते हैं कि लत एक बीमारी है, लेकिन मेरा मानना है कि यह भावनात्मक सदमे का एक लक्षण है.

जब मैं तीन साल का था तो मेरे माता-पिता के बीच तलाक़ हो चुका था. मैं अपनी मां के साथ रहता था और उन्हें एहसास हुआ कि मैं आत्मकामी और भावनात्मक रूप से सताने वाला शख़्स हूं.

उन्हें मुझसे और मेरे भाई से बहुत ज़्यादा उम्मीदें थीं. हमलोग कभी पर्याप्त रूप से अच्छे नहीं हुए. हमलोगों ने जो कुछ भी किया उसमें कुछ न कुछ ग़लत ज़रूर हुआ. इसका कोई मतलब नहीं था कि हमने कितनी मेहनत की.

मैं चीनी से काफ़ी आसक्त था और कुकीज़ बहुत ज़्यादा खाता था. भावनाओं को सुन्न करने का एक तरीका था. अपनी ज़िंदगी से निपटने के लिए पलायनवाद का सहारा लेता था. 12 साल की उम्र में मुझे पता चला कि मैं गे हूं. मैं एक छोटे गांव में पला-बढ़ा था. मेरी कामुकता सामान्य नहीं थी.

मैंने 11 साल की उम्र से हस्तमैथुन शुरू कर दिया था. 14 साल की उम्र में मुझे पहला कंप्यूटर मिला और मैंने हर दिन जमकर पॉर्न देखना शुरू कर दिया. मेरी मां तड़के 4.30 बजे सुबह काम पर निकल जाती थीं.

मां के घर छोड़ने के बाद मैं और भाई जागते थे. मेरा भाई प्ले स्टेशन पर खेलना चाहता था और मैं कंप्यूटर पर पॉर्न देखना चाहता था. सुबह सात बजे मैं हमेशा स्कूल बस के वक़्त पर तैयार रहता था, हर दिन इसमें कटौती होती गई. जितना ज़्यादा संभव हो सके मैं हस्तमैथुन करने की कोशिश करता. मैं बिल्कुल किनारे पर था.

बचपन में मैं हफ़्ते में दो दिन तैराकी की ट्रेनिंग लेता था. कुछ दूरी तक तैरना होता था और उसके बाद 20 मिनट तक चेंजिंग रूम में हस्तमैथुन करता था. वीकेंड में पूरा दिन अपने कमरे में बिताता था और काम करने का दावा करता था. सच यह था कि मैं दिन भर पॉर्न देखता था.

बचपन में आप ख़ुद के लिए निजी जगह की तलाश करते हैं. यदि मैं अपनी मां से कुछ भी छुपाने की कोशिश करता तो अजीब तरह से बहस शुरू हो जाती थी. मेरा मानना है कि मां की नाक के नीचे पॉर्न देखने से मुझे ख़ुद को काबू में रखने की सीख मिली.

Lust

जब मैं 18 साल का था तब मुझे एक जंगल में पहला यौन अनुभव ओरल सेक्स के रूप में हुआ. मैंने ऑनलाइन पुरुषों से चैट करना शुरू किया. मेरे लिए असली ज़िंदगी में लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं था. वह 34 साल का था और ख़ासकर आकर्षक नहीं था, लेकिन मेरा मानना था कि वह शुरू करने के लिहाज से अच्छा था.

जब इंजीनियरिंग स्कूल में मैं 21 साल का हुआ तो एक और गे से ऑनलाइन मुलाक़ात हुई. वह पहले मुझे भाप से स्नान कराने के लिए ले गया और यह मेरे लिए रहस्य खुलने की तरह था. अचानक मैं उस जगह पर पहुंच चुका था जहां सभी गे सेक्स कर रहे थे. मुझे उस आज़ादी को देख बहुत अच्छा लगा.

मैंने महीने में तीन बार सौना (भाप स्नान का कमरा) जाना शुरू किया. मैं तब सुरक्षित सेक्स का पक्का समर्थक था, लेकिन एक साल बाद मैंने उस गे को देखना शुरू कर दिया था जो असुरक्षित सेक्स करना चाहता था. मैं उसके साथ हो लिया. मुझे उस पर भरोसा था.

कुछ महीने बाद मैंने हर रात सौना में गुज़ारना शुरू कर दिया. तब असुरक्षित सेक्स ही करता था. मुझे पता है कि यह अजीब लगता है, लेकिन लत में नयापन महत्वपूर्ण होता है. सेक्स के दौरान हम डोपामाइन का इस्तेमाल करते थे.

मैंने दो बार उन लोगों के साथ असुरक्षित सेक्स किया जिनके बारे में पता था कि वे एचआईवी पॉज़ीटिव हैं. मैं ख़तरों से पूरी तर वाकिफ़ था. मैं न्यूक्लियर इंजीनियर था और मुझे सब पता था. मैं कोई बेवकूफ़ नहीं था, लेकिन जब आप ये सब शुरू करते हैं तो सब कुछ दिमाग़ से बाहर हो जाता है.

जब तनाव में रहता या परेशान होता तो मैं अपने भीतर अपनी मां की वह आवाज़ सुनता था कि मैं अच्छा नहीं हूं. एचआईवी पॉज़िटिव लोग एक समुदाय के रूप में जुड़े होते हैं. यदि आप सोचते हैं कि आप उन्हीं में से एक हैं तो वे आपका ख़्याल रखना शुरू कर देते हैं और आप फिर उस ग्रुप में शामिल हो जाते हैं.

मैं जानता हूं कि यह मूर्खतापूर्ण लगता है. यदि आप किसी के शरीर में एचआईवी जान-बूझकर पहुंचाते हैं तो यह अपराध है. मैंने ऐसा कभी नहीं किया क्योंकि मैं अब भी नेगेटिव हूं. लेकिन मैं इसके बारे में सोचता हूं. इसे स्वीकार करना काफ़ी कठिन है. दूसरों के नुक़सान पहुंचाने के बारे में इसलिए सोचता हूं क्योंकि मैं अपनी भावनाओं से निपटने में असमर्थ हूं.

बीबीसी थ्री पर प्रकाशित मूल लेख

एक इंजीनियर की उसकी कविता के लिए जनून(युवा रचनाकार दिनेश गुप्ता जी का दैनिक जागरण द्वारा साक्षात्कार)

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शब्द नए चुनकर गीत नया हर बार लिखूं मैं
उन दो आंखों में अपना सारा संसार लिखूं मैं
विरह की वेदना या मिलन की झंकार लिखूं मैं
कैसे चंद लफ्जों में सारा प्यार लिखूं मैं।

ये पंक्तियां हैं कवि दिनेश गुप्ता की किताब ‘कैसे चंद लफ्जों में सारा प्यार लिखूं मैं’ की, जिसका विमोचन पिछले दिनों मुंबई प्रेस क्लब में किया गया। इस अवसर पर हमने दिनेश से उनकी उनकी कविता की प्रेरणा और किताब तक के सफर और आगे की योजना के बारे में बातचीत की।

प्रस्तुत है उसके कुछ अंश:-

इंजीनियर हो कर हिंदी में प्रेम काव्य-संग्रह की रचना करने के पीछे आपका मकसद क्या है?
दिनेश:- मैंने 8वीं कक्षा से ही भाषण लिखना शुरू कर दिया था और इसके लिए मुझे कई पुरस्कार भी मिले। मुझे अपने अंदर की रचनात्मकता का अंदाजा था लेकिन वह इंजीनियरिंग के पीछे कहीं दब गई थी। कविता के लिए मेरे अंदर जनून डा. कुमार विश्वास को सुनने के बाद पैदा हुआ। प्रेम इस दुनिया की सबसे सुंदर अनुभूति है। इस काव्य संग्रह को पढऩे के बाद आप खुद इसे महसूस कर सकेंगे। जहां तक हिंदी लेखन का सवाल है, मेरे साहित्यिक जीवन का एक उद्देश्य हिदी किताबों की घटती लोकप्रियता को वापस लौटाना है।

प्र. फिलहाल कविता के क्षेत्र में काफी किताबें प्रकाशित हो रही हैं। क्या युवा पीढ़ी में कविता के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है?
दिनेश:- जी हां। हिंदी में लिखने वाले कवियों की एक नई पीढ़ी तैयार हो रही है। आजकल कई युवा मित्र हिंदी में कविताएं लिखने और पढऩे में खासी रुचि दिखा रहे हैं। हां, यह अलग बात है कि पाठक किताबें खरीद कर पढऩे से कतरा रहे हैं। कविता एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से कम शब्दों में अधिक बातें कही जा सकती हैं। कविता में लोगों के दिलों को छू लेने की क्षमता है। अपने अंदर की चेतना और अनुभूति की अभिव्यक्ति है कविता।

प्र. लेखन के बारे में आपकी भावी योजना क्या है?
दिनेश:- फिलहाल में कविता की कुछ और किताबें लिखना चाहता हूं, अंदर अभी कुछ है जो बाहर आने को परेशान कर रहा है। इसके बाद कुछ कहानी की पुस्तकें लिखने की भी योजना है। इसके बाद देश भर में होने वाले कवि सम्मेलनों में भी भाग लेने की योजना है। बॉलीवुड से भी कुछ प्रस्ताव मिले हैं जिसपर बातचीत अंतिम दौर में है।

प्र. युवा कवियों के लिए आप कुछ संदेश देना चाहते है?
दिनेश:- बाजार की कविता न लिखें। अपने दिल से लिखें और उसका बाजार खड़ा करें। मैं प्रेम का कवि होने के नाते युवा कवियों से निवेदन करना चाहूंगा कि प्रेम पढ़ें, प्रेम लिखें और प्रेम में ही जिंदगी को जिएं। मोहब्बत बड़ा ही सुखद एहसास है, एक बार इससे होकर गुजरें। मनोरंजन के लिए लिखने में भी कोई बुराई नहीं है।

प्र. भारतीय प्रकाशन उद्योग की हिंदी और खासकर कविता संग्रह के प्रकाशन में रुचि कम होती जा रही है। इसके बारे में आपका क्या कहना है?
दिनेश:- मुझे भी शुरुआत में छोटे-बड़े लगभग सभी प्रकाशकों से नकारात्मक प्रतिक्रिया ही मिली थी लेकिन मैंने अपना प्रयास जारी रखा। काफी संघर्ष के बाद अपने शब्दों को स्याही में भींगे देखने की हसरत पूरी हो सकी।

प्र. अपनी पुस्तक ‘कैसे चंद लफ्जों में सारा प्यार लिखूं मैं’ के बारे में कुछ बताएं?
दिनेश:- यह पुस्तक शायरी, गजल, गीत जैसे कविता के विविध रूपों में लिखा गया सुंदर और रोमांटिक काव्य संग्रह है जो निश्चित रूप से अपनी उम्मीदों पर खड़ा उतरेगा।

प्र. इस कविता संग्रह का कोई मुक्तक जो आप पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे?
दिनेश:-
मेरी आंखों में मोहब्बत के जो मंजर हैं
तुम्हारी ही चाहतों के समंदर हैं।
हर रोज चाहता हूं कि तुमसे वो कह दूं मगर,
लबों तक नहीं आता जो मेरे दिल के अंदर है।