Shahabuddin Vs Rajdev Journalist

सिवान से पटना – विनय मूर्ति शर्मा

शहाबुद्दीन

शहाबुद्दीन

बात कितनी चले, वजन के लिए घटना जरुरी है।
चीज चमकदार सही, कीमत के लिए बिकना जरूरी है।

आया तूफ़ां तो लगा इक बारगी सब साफ होगा अब।
गर्द ओ गुबार मगर,सच के लिए हटना जरूरी है।।
है जंगलराज तभी ‘सीवान’पर हैवान हावी है।
जुल्म ओ कानून की, खाई के लिए ‘पटना’जरुरी है।।

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हम किसी से कम नही

हम किसी से कम नही – मनीषा जाजोरिया

हम किसी से कम नही

हम किसी से कम नही

न जाने कैसा हुआ ये समां
वो कैसे आया एक झोंका हवा का
दिल तोड़ गया सारे अरमानों का
पिघला गया बने हुए खरे सोने को
कर गया उनका मोल रिश्तो से
जो बनने से पहले बिखर गये
तो उन फूलों का आशियाना बनाये भी तो कैसे
जो खिलनें से पहले ही मुरझा गये
बात करते है निभाने की अपना धर्म
जिन्हें ये ही नही पता क्या है उनका कर्म

ले जा तू ये सन्देशा उनको
और जा के बता दे कि यहाँ वो हीरा रहता है
जो भले ही पत्थर से बना हो
फिर भी किसी के सिर का ताज बना हुआ हैं।
अब देख लो, देखने वालो
सुन लो सुनने वालो, हम क्या है
भले ही छोटा-सा पत्थर ही सही
लेकिन अनमोल कोहिनूर का हीरा हैं।

मनीषा जाजोरिया

मनीषा जाजोरिया

(नव लेखन प्रोत्साहन हेतु प्रकाशित)

छोटी औरत – चंद्र रेखा ढडवाल

क़दमताल करती है औरत
कभी तेज़ कभी धीमे
जैसी बजती है धुन
नाचती है उसपर
कभी हँस कर
कभी रो कर

पाँवों को एक क्रम से
उठाने-बिठाने के
उसके बेढब प्रयासों को देखते
उससे बड़ी उम्र की एक औरत
मुँह बिचकाती है

उसके पल्लू को
अँगुली से लिपेटती
साथ-साथ ठुमकती है
घर की एक
छोटी औरत

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चंद्र रेखा ढडवाल

वे रात भर अन्त की – उदयन वाजपेयी

वे रात भर अन्त की
प्रतीक्षा करते रहे जो
घुप्प आकाश के एक अदृश्य
कोने में पड़ा
सोता रहा रात भर

उसने मुझे कन्धे हिलाकर
जगाया, बोली धीरे से
मेरे पंख ! मेरे पंख !!
नींद में चलते मैंने वे
चुपचाप उसके हाथों में रख दिए
जैसे वह उन हाथों से
गुसलख़ाने से भूले हुए
कपड़े माँग रही हो, धीरे से

चित्र:Udayan.jpg

शिवा -पंकज त्रिवेदी

खड़ा गिरिवर गंभीरा
गहन गुहा बस अँधेरा
निज दर्शन में अधीरा
पलपल बनता है धीरा
सूक्ष्म सकल तव शिवा

नाम : पंकज त्रिवेदी
ईमेल : vishwagatha@gmail.com

आवासीय पता :
संपादक -विश्वगाथा
गोकुल पार्क सोसाइटी, ८० फीट रोड, सुरेंद्रनगर-३६३००२

गुजरात
माता का नाम : शशिकला
पिता का नाम : अमृत लाल

उषा की लाली; पूर्णिमा; परदेशी – नाम : डॉ महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘नन्द’

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उषा की लाली

रवि रजनी का मिलन मिटा,
मिट गयी क्षितिज काली रेखा।
परकीया निज प्रिय संग लखिके,
छिटकी ऊषा की लाली।।1।।
दहने लगा प्रबल इष्र्यानल,
झुलसी हिय की हरियाली।
नैन बरसने लगे वदन पर,
मोती सी सीकर माली।।2।।
प्रिया प्रीति विपरीत रीति से,
द्विज व्याकुल चिन्ताशाली।
स्व सर्वस्व स्वकीया अर्पी,
सरस प्रणय नव नय पाली।।3।।
मिथुन सार अभिसार मिला जब,
श्वेत हुआ स्वर्णिम थाली।
पथ परिवेक्षणि निरखि निशा फिर,
उमड़ी ऊषा की लाली।।4।।

पूर्णिमा
हीरक नीलाम्बर आवेष्टित,
विहॅस रही राका बाला।
शुभ सुहाग सिन्दूरी टीका,
सोहत है मंगल वाला।।1।।

अलंकृता कल कला प्रेय संग,
पहुँची मानो मधुशाला।
छिन्न भिन्न छकि छकि क्रीड़ा में,
विखरत मोती की माला।।2।।
परदेशी
मोहक अनुरागी अनपरिचित,
दूर देश के वासी।
मायिक आकर्षित तन्त्री की,

बांधेग्रीवा फॉसी।।1।।

अतिथि अनिश्चित वास तुम्हारा,
अन्तिम अमित उदासी।

नाम : डॉ महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘नन्द’
ईमेल : mp_pandey123@yahoo.co.in

आवासीय पता :

राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बिरिया मझोला
पोस्ट- बिरिया मझोला
खटीमा, जिला- ऊधम सिंह नगर
उत्तराखण्ड 262308
माता का नाम : श्रीमती विद्यावती पाण्डेय
पिता का नाम : डॉ विश्वनाथ प्रसाद पाण्डेय
परदेशी जाना है निश्चित,
प्रीति न कर उपहासी।।2।।

भाई की चिठ्ठी-एकांत श्रीवास्तव

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हर पंक्ति जैसे फूलों की क्यारी है
जिसमें छुपे काँटों को वह नहीं जानता
वह नहीं जानता कि दो शब्दों के बीच
भयंकर साँपों की फुँफकार है
और डोल रही है वहाँ यम की परछाईं
उसने लिखी होगी यह चिट्ठी
धानी धूप में
हेमंत की
यह जाने बिना
कि जब यह पहुँचेगी गंतव्य तक
भद्रा के मेघ घिर आए होंगे
आकाश में।

भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं-अटल बिहारी वाजपेयी

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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग
पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।