सात दिन की माँ – नीरू मोहन

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यह कथा सत्य घटना पर आधारित है| गोपनीयता बनाए रखने के लिए पात्रों के नाम और स्थान बदल दिए गए हैं|

कहते हैं, ईश्वर की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती और ईश्वर जो करता है भले के लिए ही करता है| यह कहानी उस माँ की है जिसे मातृत्व का सुख सिर्फ सात दिन के लिए ही प्राप्त हुआ| नीरा राजस्थान के एक छोटे से कस्बे बूंदी में रहती है| नीरा के परिवार में उसकी बुआ और बहन मातृत्व सुख से वंचित हैं जिन्हें अपनी कोई संतान नहीं है| नीरा की शादी को आज तेरह वर्ष बीत चुके हैं उसके पास भी अपनी कोई संतान नहीं है उसे कोई माँ कहने वाला नहीं है| नीरा और उसके पति साहिल बच्चे को गोद लेने की सोचते हैं| वह अनाथ आश्रम जाते हैं मगर वहाँ से निराश वापस आते हैं| निराशा के चलते-चलते दोनों बहुत टूट जाते हैं| लोगों के ताने, घरवालों का विपरीत व्यवहार उनको आघात पहुँचाता है|

एक दिन उन्हें किसी रिश्तेदार के संपर्क से पता चलता है कि उनके किसी सगे-संबंधी ने चौथी बेटी को जन्म दिया है और वह उसे गोद देना चाहते हैं| सूचना प्राप्त होते ही दोनों पति-पत्नी उनके घर पहुँचते हैं| बच्ची को देखते ही दोनों पति-पत्नी के मन में ममता और प्यार उमड़ पड़ता है| उन्हें लगता है कि शायद भगवान को यही मंजूर है कि वह जन्मदाता न होकर पालनकर्ता कहलाएँ| ईश्वर की सौगात उन्हें इस रूप में प्राप्त होगी उन्हें अंदाजा भी नहीं था|दोनों बहुत खुश हैं बच्ची के मुख के तेज को देखकर दोनों उसे गोद में लेने के लिए उत्सुक उसके माता-पिता से बातचीत करने के पश्चात नीरा और साहिल बच्ची को अपने घर ले आते हैं|

दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं है नीरा और साहिल बेटी के लिए खूब खरीदारी करते हैं खिलौने, कपड़े, दुनिया भर की वस्तुएँ बच्ची के लिए एक ही दिन में खरीद ली जाती हैं| दोनों बहुत खुश हैं| बच्ची के घर आने से घर के सभी सदस्य भी खुश हैं सास-ससुर देवर देवरानी सभी के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है जो पलभर भी उनके साथ बातचीत नहीं करते थे,जली-कटी सुनाते थे आज वह नीरा के पास बैठे हैं उस की बच्ची को प्यार दुलार दे रहे हैं| नीरा और साहिल बहुत खुश है मानो उनको तेरह साल बाद कोई चलता खिलौना मिल गया है जिसके साथ वह खेल सकते हैं बात कर सकते हैं|

ऐसा खिलौना जो उनकी आवाज सुनकर प्रतिक्रिया दर्शाता है| ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे दोनों को खुशी का खजाना मिल गया है|मगर शायद ईश्वर को उनकी यह खुशी ज्यादा समय तक बर्दाश्त नहीं होती| बच्ची को घर लाने के एक सप्ताह पश्चात अचानक बच्ची के जन्म देने वाले माता-पिता उनके दरवाजे पर खड़े होते हैं|रात का समय है, वह अपनी बच्ची को वापस ले जाने के लिए आए हैं| दोनों नीरा और साहिल से कहते हैं कि वह अपनी बच्ची को गोद नहीं देना चाहते| वह उसे वापस ले जाने आए हैं| नीरा और साहिल के पैरों तले की जमीन निकल जाती है|उनकी ममता का कुंद्र हनन ऐसे होगा उन्होंने अनुमान भी नहीं लगाया था| दोनों की सारी अभिलाषाएँ नष्ट हो जाती हैं| बच्ची के मुख से मम्मी और पापा सुनने की इच्छा शायद अब कभी पूरी नहीं हो पाएगी दोनों शुब्द्घ खड़े थे और बच्ची के असली माता-पिता अपनी बेटी को उठा कर ले जा रहे थे| नीरा और साहिल कुछ नहीं कर पाए| ईश्वर ने उन्हें वासुदेव और जानकी बनने का मौका तो दिया ही नहीं था साथ ही नंद और यशोदा बनने के अवसर को भी छीन लिया| सब एक सपना प्रतीत हो रहा था और सात दिन की माँ की ममता चीख-चीखकर अपनी ममता का गला घुटते देख रही थी| शायद तभी कहते हैं ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता|जितना हम वहाँ से लिखवाकर आए हैं उतना ही हमें यहाँ प्राप्त होता है|

मैं किसी अंधविश्वास की बात नहीं कर रही हूं बल्कि उस लीलाधारी की लीला की बात कर रही हूँ जिसकी डोर स्वम् उसी के हाथ में है हम तो मात्र कठपुतलियाँ है जो उसकी डोर के हिलने से नाचती हैं| आज नीरा और साहिल उस बच्ची को लक्ष्मी स्वरूपा मानते हैं| उसके कदम इतने शुभ हुए कि आज नीरा और साहिल स्वयं के मकान में है नीरा बच्चों को पढ़ाने का कार्य करती है| साहिल भी अपनी नौकरी से संतुष्ट है| रोज़ बच्ची को याद करते हैं और भगवान की मर्जी समझ कर संतुष्ट हो जाते हैं| मीरा की चचेरी बहन को भी मातृत्व सुख नहीं प्राप्त हुआ था उसकी अपनी कोई संतान नहीं थी| उसने अनाथ आश्रम से एक लड़का गोद लिया था और आज वह लड़का बारह साल का है| नीरा की बुआ आज सत्तर साल की हैं जो आज भी संतान सुख से वंचित हैं| नीरा सात दिन की माँ बन कर संतुष्ट है, अपने आप को सौभाग्यशाली समझती है और भगवान की मर्जी के आगे नतमस्तक है| आज वह बच्ची एक साल की हो गई है| नीरा और साहिल के लिए सात दिन जीवन के सुनहरे दिन रहेंगे जो उनकी यादों में मृत्युपर्यंत उनके साथ रहेंगे|

Neeru Mohan| Niru Mohan

नाम -नीरू मोहन
जन्म तिथि -1 अगस्त 1973
जन्म स्थान -दिल्ली
शिक्षा -एम ए हिंदी , राजनीति विज्ञान
बी एड – हिंदी ,सामाजिक विज्ञान
एम फिल – हिंदी साहित्य
शोध कार्य – आदिकाल और रीतिकाल
कार्यक्षेत्र –  शिक्षिका ,साहित्य लेखन
विद्या – लेख ,लघु कथा ,संस्मरण ,छंद युक्त और छंदमुक्त कविताएँ ,दोहे, हाइकु, ताँका, चोका, उद्धरण /अवतरण, सुविचार, कुंडलियाँ , नाटक , नुक्कड़ नाटक इत्यादि |
प्रकाशन – रचनाएँ साहित्यपीडिया मंच पर, हिंदी लेखक मंच,काव्य संगम, काव्य संग्रह पुस्तक , वेब और ब्लॉक पर प्रकाशित
सम्मान -साहित्य पीडिया मंच पर 2000  साहित्यकारों में शीर्ष बत्तीस साहित्यकारों मे नाम, उदीप्त प्रकाशन की ओर से रचनाकार सम्मान पत्र
ईमेल पता –neerumohan6@gmail.com
ब्लॉग पता – http//myneerumohan.blogspot.com

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गर्मियों के दिन – कमलेश्वर

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चुंगी-दफ्तर खूब रँगा-चुँगा है । उसके फाटक पर इंद्रधनुषी आकार के बोर्ड लगे हुए हैं । सैयदअली पेंटर ने बड़े सधे हाथ से उन बोर्ड़ों को बनाया है । देखते-देखते शहर में बहुत-सी ऐसी दुकानें हो गई हैं, जिन पर साइनबोर्ड लटक गए हैं । साइनबोर्ड लगना यानी औकात का बढ़ना । बहुत दिन पहले जब दीनानाथ हलवाई की दूकान पर पहला साइनबोर्ड लगा था तो वहाँ दूध पीने वालों की संख्या एकाएक बढ़ गई थी । फिर बाढ़ आ गई, और नए-नए तरीके और बैलबूटे ईजाद किए गए । ‘ऊँ’ या ‘जयहिन्द’ से शुरु करके ‘एक बार अवश्य परीक्षा कीजिए’ या ‘मिलावट साबित करने वाले को सौ रुपया नगद इनाम’ की मनुहारों या ललकारों पर लिखावट समाप्त होने लगी ।

चुंगी-दफ्तर का नाम तीन भाषाओं में लिखा है । चेयरमैंन साहब बड़े अक्किल के आदमी हैं, उनकी सूझ-बूझ का डंका बजता है, इसलिए हर साइनबोर्ड हिंदी, उर्दू और अंगरेज़ी में लिखा जाता है । दूर-दूर के नेता लोग भाषण देने आते हैं, देश-विदेश के लोग आगरे का ताजमहल देखकर पूरब की ओर जाते हुए यहाँ से गुज़रते हैं…उन पर असर पड़ता है, भाई । और फिर मौसम की बात – मेले-तमाशे के दिनों में हलवाइयों, जुलाई-अगस्त में किताब-कागज़ वालों, सहालग में कपड़े वालों और खराब मौसम में वैद्य-हकीमों के साइनबोर्डों पर नया रोगन चढ़ता है । शुद्ध देसी घी वाले सबसे अच्छे, जो छप्परों के भीतर दीवार पर गेरू या हिरमिजी से लिखकर काम चला लेते हैं । इसके बगैर काम नहीं चलता । अहमियत बताते हुए वैद्यजी ने कहा- “बगैर पोस्टर चिपकाए सिनेमा वालों का भी काम नहीं चलता । बड़े-बड़े शहरों में जाइए, मिट्टी का तेल बेचने वाले की दुकान पर साइनबोट मिल जाएगा। बड़ी ज़रूरी चीज़ है। बाल-बच्चों के नाम तक साइनबोट हैं, नहीं तो नाम रखने की जरूरत क्या है ? साइनबोट लगाके सुखदेव बाबू कंपौंडर से डॉक्टर हो गए, बेग लेके चलने लगे।”

पास बैठे रामचरन ने एक और नए चमत्कार की खबर दी– ल उन्होंने बुधईवाला इक्का-घोड़ा खरीद लिया …

— हाँकेगा कौन ? -टीन की कुर्सी पर प्राणायाम की मुद्रा में बैठे पंडित ने पूछा।

— ये सब जेब कतरने का तरीका है –वैद्यजी का ध्यान इक्के की तरफ अधिक था– मरीज़ से किराया वसूल करेंगे। सईस को बख्शीश दिलाएंगे, बड़ शहरों के डॉक्टरों की तरह । इसी से पेशे की बदनामी होती है । पूछो, मरीज़ का इलाज करना है कि रोब-दाब दिखाना है। अंगरेज़ी आले लगातार मरीज़ की आधी जान पहले सुखा डालते हैं। आयुर्वेदी नब्ज़ देखना तो दूर, चेहरा देख के रोग बता दे ! इक्का-घोड़ा इसमें क्या करेगा ? थोड़े दिन बाद देखना, उनका सईस कंपौंडर हो जाएगा –कहते-कहते वैद्यजी बड़ी घिसी हुई हँसी में हँस पड़े । फिर बोले– कौन क्या कहे भाई ? डॉक्टरी तो तमाशा बन गई है । वकील मुख्तार के लड़के डॉक्टर होने लगे ! खून और संस्कार से बात बनती है हाथ में जस आता है, वैद्य का बेटा वैद्य होता है । आधी विद्या लड़कपन में जड़ी-बुटियाँ कूटते-पीसते आ जाती है । तोला, माशा, रत्ती का ऐसा अंदाज़ हो जाता है कि औषधि अशुद्ध हो ही नहीं सकती है । औषधि का चमत्कार उसके बनाने की विधि में है । धन्वंतरि” वैद्यजी आगे कहने जा ही रहे थे कि एक आदमी को दुकान की ओर आते देख चुप हो गए, और बैठे हुए लोगों की ओर कुछ इस तरह देखने-गुनने लगे कि यह गप्प लड़ाने वाले फालतू आदमी न होकर उनके रोगी हों ।

आदमी के दुकान पर चढ़ते ही वैद्यजी ने भाँप लिया । कुंठित होकर उन्होंने उसे देखा और उदासीन हो गए । लेकिन दुनिया-दिखावा भी कुछ होता है । हो सकता है, कल यही आदमी बीमार पड़ जाए या इसके घर में किसी को रोग घेर ले । इसलिए अपना व्यवहार और पेशे की गरिमा चौकस रहना चाहिए । अपने को बटोरते हुए उन्होंने कहा, “कहो भाई, राजी-खुशी ।” उस आदमी ने जवाब देते हुए सीरे की एक कनस्टरिया सामने कर दी, “यह ठाकुर साहब ने रखवाई है । मंडी से लौटते हुए लेते जाएँगे । एक-डेढ़ बजे के करीब ।”

— उस वक्त दुकान बंद रहेगी, –वैद्यजी ने व्यर्थ के काम से ऊबते हुए कहा– हकीम-वैद्यों की दुकानें दिनभर नहीं खुली रहतीं । व्यापारी थोड़े ही हैं, भाई ! –पर फिर किसी अन्य दिन और अवसर की आशा ने जैसे ज़बरदस्ती कहलावाया- –खैर, उन्हें दिक्कत नहीं होगी, हम नहीं होंगे तो बगल वाली दुकान से उठा लें । मैं रखता जाऊँगा।

आदमी के जाते ही वैद्य जी बोले– शराब-बंदी से क्या होता है ? जब से हुई तब से कच्ची शराब की भट्टियाँ घर-घर चालू हो गईं । सीरा घी के भाव बिकने लगा। और इन डॉक्टरों को क्या कहिए…इनकी दुकानें हौली बन गई हैं। लैसंस मिलता है दवा की तरह इस्तेमाल करने का, पर खुले आम जिंजर बिकता है। कहीं कुछ नहीं होता । हम भंग-अफीम की एक पुड़िया चाहें तो तफसील देनी पड़ती है।”

— ज़िम्मेदारी की बात है –पंडित जी ने कहा।

— अब ज़िम्मेदार वैद्य ही रह गए हैं। सबकी रजिस्टरी हो चुकी, भाई। ऐसे गैर-पंचकल्यानी जितने घुस आए थे, उनकी सफाई हो गई। अब जिसके पास रजिस्टरी होगी वही वैद्यक कर सकता है। चूरन वाले वैद्य बन बैठे थे…सब खतम हो गए । लखनऊ में सरकारी जाँच-पड़ताल के बाद सही मिली है….

वैद्य जी की बात में रस न लेते हुए पंडित उठ गए। वैद्यजी ने भीतर की तरफ कदम बढ़ाए, और औषधालय का बोर्ड लिखते हुए चंदर से बोले– सफेदा गाढ़ा है बाबू, तारपीन मिला लो। –वे एक बोतल उठा लाए जिस पर अशोकारिष्ट का लेबल गला था।

इसी तरह न जाने किन-किन औषधियों की शरीर रूपी बोतलों में किस-किस पदार्थ की आत्मा भरी है। सामने की अकेली अलमारी में बड़ी-बड़ी बोतलें रखी है; जिन पर तरह-तरह के अरिष्टों और आसवों के नाम चिपके हैं। सिर्फ़ पहली कतार में ये शीशियाँ खड़ी हैं…उनके पीछे ज़रूरत का और सामान है। सामने की मेज़ पर सफेद शीशियों की एक पंक्ति है, जिसमें कुछ स्वादिष्ट चूरन… लवण-भास्कर आदि है, बाकी में जो कुछ भरा है उसे केवल वैद्यजी जानते हैं।

तारपीन का तेल मिलाकर चंदर आगे लिखने लगा- ‘प्रो. कविराज नित्यानंद तिवारी’ ऊपर की पंक्ति ‘श्री धन्वंतरि औषधालय’ स्वयं वैद्यजी लिख चुके थे । सफेदे के वे अच्छर ऐसे लग रहे थे जैसे रुई के फाहे चिपका दिए हों । ऊपर जगह खाली देखकर बैद्यजी बोले, “बाबू, ऊपर जयहिंद लिख देना और यह जो जगह बच रही है, इसमें एक ओर द्राक्षासव की बोतल, दूसरी ओर खरल की तसवीर…आर्ट हमारे पास मिडिल तक था लेकिन यह तो हाथ सधने की बात है।”

चंदर कुछ ऊँघ रहा था । खामखा पकड़ गया। लिखावट अच्छी हो का यह पुरस्कार उसकी समझ नहीं आ रहा था। बोला, “किसी पेंटर से बनवाते ..अच्छा-खासा लिख देता, वो बात नहीं आएगी…अपना पसीना पोंछते हुए उसने कूची नीचे रख दी।

— पाँच रुपए माँगता था बाबू…दो लाइनों के पाँच रुपए ! अब अपनी मेहनत के साथ यह साइनबोर्ड दस-बारह आने का पड़ा । ये रंग एक मरीज़ दे गया। बिजली कंपनी का पेंटर बदहज़मी से परेशान था । दो खुराकें बनाकर दे दीं, पैसे नहीं लिए । सो वह दो-तीन रंग और थोड़ी-सी बार्निश दे गया। दो बक्से रँग गए ..यह बोट बन गया और अकाध कुर्सी रँग जाएगी…तुम बस इतना लिख दो, लाल रंग का शेड हम देते रहेंगे…हाशिया तिरंगा खिलेगा ?” वैद्यजी ने पूछा और स्वयं स्वीकृति भी दे दी।

चंदर गर्मी से परेशान था। जैसे-जैसे दोपहरी नज़दीक आती जा रही थी, सड़क पर धूल और लू का ज़ोर बढ़ता जा रहा था, मुलाहिज़े में चंदर मना नहीं कर पाया। पंखे से अपनी पीठ खुजलाते हुए बैद्यजी ने उजरत के काम वाले , पटवारियों के बड़े-बड़े रजिस्टर निकालकर फैलाना शुरू किए ।

सूरज की तपिश से बचने के लिए दुकान का एक किवाड़ा भेड़कर बैद्यजी खाली रजिस्टरों पर खसरा-खतौनियों से नकल करने लगे। चंदर ने अपना पिंड छुड़ाने के लिए पूछा,”ये सब क्या है वैद्यजी ?”

वैद्य जी का चेहरा उतर गया, बोले,”खाली बैठने से अच्छा है कुछ काम किया जाए, नए लेखपालों को काम-धाम आता नहीं, रोज़ कानूनगो या नायब साहब से झाड़ें पड़ती हैं… झक मारके उन लोगों को यह काम उजरत पर कराना पड़ता है। उब पुराने घाघ पटवारी कहाँ रहे, जिनके पेट में गँवई कानून बसता था। रोटियाँ छिन गईं बेचारों की; लेकिन सही पूछो तो अब भी सारा काम पुराने पटवारी ही ढो रहे हैं । नए लेखपालों की तनख्वाह का सारा रूपया इसी उजरत में निकल जाता है। पेट उनका भी है…तिया-पाँचा करके किसानों से निकाल लाते हैं। लाएँ न तो खाएँ क्या । दो-तीन लेखपाल अपने हैं, उन्हीं से कभी-कभार हलका-भारी काम मिल जाता है । नकल का काम, रजिस्टर भरते हैं ।

बाहर सड़क वीरान होती जा रही थी । दफ्तर के बाबू लोग जा चुके थे । सामने चुंगी में खस की टट्टियों पर छिड़काव शुरु हो गया । दूर हरहराते पीपल का शोर लू के साथ आ रहा था । तभी एक आदमी ने किवाड़ से भीतर झाँका । वैद्यजी की बात, जो शायद क्षण-दो क्षण बाद दर्द से बोझिल हो जाती, रुक गई । उनकी निगाह ने आदमी को पहचाना और वे सतर्क हो गए । फौरन बोले, “एक बोट आगरा से बनवाया है, जब तक नहीं आता, इसी से काम चलेगा; फुर्सत कहाँ मिलती है जो इस सब में सिर खपाएँ…..” और एकदम व्यस्त होते हुए उन्होंने उस आदमी से प्रश्न किया, “कहो भाई, क्या बात है ?”

–डाकदरी सरटीफिकेट चाहिए…. कोसमा टेशन पर खलासी हैंगे साब ।” रेलवे की नीली वर्दी पहने वह खलासी बोला ।

उसकी ज़रुरत का पूरा अंदाज़ करते हुए वैद्यजी बोले, “हाँ, किस तारीख से कब तक का चाहिए ।”

— पंद्रह दिन पहले आए थे साब, सात दिन को और चाहिए ।”

कुछ हिसाब जोड़कर वैद्यजी बोले, “देखो भाई, सर्टीफिकेट पक्का करके देंगे, सरकार का रजिस्टर नंबर देंगे, रुपैया चार लगेंगे ।” वैद्यजी ने जैसे खुट चार रुपए पर उसके भड़क जाने का अहसास करते हुए कहा, “अगर पिछला न लो तो दो रुपये में काम चल जाएगा….”

खलासी निराश हो गया । लेकिन उसकी निराशा से अधिक गहन हताशा वैद्यजी के पसीने से नम मुख पर व्याप गई । बड़े निरपेक्ष भाव से खलासी बोला, “सोबरन सिंह ने आपके पास भेजा था ।” उसके कहने से कुछ ऐसा लगा जैसे यह उसका काम न होकर सोबरन सिंह का काम हो । पर वैद्यजी के हाथ नब्ज़ आ गई, बोले, “वो हम पहले ही समझ रहे थे । बगैर जान-पहचान के हम देते भी नहीं, इज़्ज़त का सवाल है । हमें क्या मालूम तुम कहाँ रहे, क्या करते रहे ? अब सोचने की बात है…. विश्वास पर जोखिम उठा लेंगे….. पंद्रह दिन पहले से तुम्हारा नाम रजिस्टर में चढा़एँगे, रोग लिखेंगे… हर तारीख पर नाम चढ़ाएँगे तब कहीं काम बनेगा । ऐसे घर की खेती नहीं है…” कहते-कहते उन्होंने चंदर की ओर मदद के लिए ताका । चंदर ने साथ दिया, “अब उन्हें क्या पता कि तुम बीमार रहे कि डाका डालते रहे… सरकारी मामला है…..”

— पाँच से कम में दुनिया-छोर का डॉक्टर नहीं दे सकता…..” कहते-कहते वैद्यजी ने सामने रखा लेखपाल वाला रजिस्टर खिसकाते हुए जोश से कहा, “अरे, दम मारने को फुर्सत नहीं है । ये देखो, देखते हो नाम….. । एक-एक रोगी का नाम, मर्ज़, आमदनी…. उन्हीं में तुम्हारा नाम चढ़ाना पड़ेगा । अब बताओ कि मरीजों को देखना ज़्यादा ज़रुरी है कि दो-चार रुपए के लिए सर्टीफिकेट देकर इस सरकारी पचड़े में फँसना ।” कहते हुए उन्होंने तहसील वाला रजिस्टर एकदम बंद करके सामने से हटा दिया और केवल उपकार कर सकने के लिए तैयार होने जैसी मुद्रा बनाकर कलम से कान करोदने लगे ।

रेलवे का खलासी एक मिनट तक बैठा कुछ सोचता रहा । और वैद्यजी को सिर झुकाए अपने काम में मशगूल देख दुकान से नीचे उतर गया । एकदम वैद्यजी ने अपनी गलती महसूस की, लगा उन्होंने बात गलत जगह तोड़ दी और ऐसी तोड़ी कि टूट ही गई । एकाएक कुछ समझ में न आया, तो उसे पुकारकर बोले, “अरे सुनो, ठाकुर सोबरन सिंह से हमारी जैरामजी की कह देना….उनके बाल-बच्चे तो राजी खुशी है ?”

— हाँ सब ठीक-ठाक हैं।” रुककर खलासी ने कहा । उसे सुनाते हुए वैद्यजी चंदर से बोले, “दस गाँव-शहर के ठाकुर सोबरन सिंह इलाज के लिए यहीँ आते हैं । भई, उनके लिए हम भी हमेशा हाज़िर रहे……” चंदर ने बोर्ड पर आखिरी अक्षर समाप्त करते हुए पूछा, “चला गया”

— लौट-फिर के आएगा… –वैद्य जी ने जैसे अपने को समझाया, पर उसके वापस आने की अनिवार्यता पर विश्वास करते हुए बोले– गँवई गाँव के वैद्य और वकील एक ही होते हैं । सोबरन सिंह ने अगर हमारा नाम उसे बताया है तो ज़रुर वापस आएगा… गाँव वालों की मुर्री ज़रा मुश्किल से खुलती है । कहीं बैठके सोचे-समझेगा, तब आएगा…

— और कहीं से ले लिया, तो? –चंदर ने कहा तो वैद्य जी ने बात काट दी– नहीं, नहीं बाबू । –कहते हुए उन्होंने बोर्ड की ओर देखा और प्रशंसा से भरकर बोले– वाह भाई चंदर बाबू! साइनबोट जँच गया….काम चलेगा । ये पाँच रुपए पेंटर को देकर मरीजों से वसूल करना पड़ता । इक्का-घोड़ा और ये खर्चा! बात एक है । चाहे नाक सामने से पकड़ लो, चाहे घुमाकर । सैयदअली के हाथ का लिखा बोट रोगियों को चंगा तो कर नहीं देता । अपनी-अपनी समझ की बात है । –कहते हुए वे धीरे से हँस पड़े । पता नहीं, वले अपनी बात समझकर अपने पर हँसे थे या दूसरों पर ।

तभी एक आदमी ने प्रवेश किया । सहसा लगा कि खलासी आ गया । पर वह पांडु रोगी था । देखते ही वैद्यजी के मुख पर संतोष चमक आया । वे भीतर गए । एक तावीज़ लाते हुए बोले, “अब इसका असर देखो । बीस-पच्चीस रोज़ में इसका चमत्कार दिखाई पड़ेगा ।” पांडु-रोगी की बाँह में तावीज़ बाँधकर और उसके कुछ आने पैसे जेब में डालकर वे गंभीर होकर बैठ गए । रोगी चला गया तो बोले, “यह विद्या भी हमारे पिताजी के पास थी । उनकी लिखी पुस्तकें पड़ी हैं… बहुत सोचता हूँ, उन्हें फिर से नकल कर लूँ….. बड़े अनुभव की बातें हैं । विश्वास की बात है, बाबू! एक चुटकी धूल से आदमी चंगा हो सकता है । होम्योपैथिक और भला क्या है ? एक चुटकी शक्कर । जिस पर विश्वास जम जाए, बस ।”

चंदर ने चलते हुए कहा– एब तो औषधालय बंद करने का समय हो गया, खाना खाने नहीं जाइएगा ?

— तुम चलो, हम दम-पाँच मिनट बाद आएँगे । –वैद्यजी ने तहसील वाला काम अपने आगे सरका लिया । दुकान का दरवाज़ा भटखुला करके बैठ गए । बाहर धूप की ओर देखकर दृष्टि चौंधिया जाती थी ।

बगल वाले दुकानदार बच्चनलाल ने दुकान बंद करके, घर जाते हुए वैद्यजी की दुकान खुली देखकर पूछा– आप खाना खाने नहीं गए…

— हाँ, ऐसे ही एक ज़रुरी काम है । अभी थोड़ी देर में चले जाएँगे । –वैद्य जी ने कहा और ज़मीन पर चटाई बिछाई; रजिस्टर मेज़ से उठाकर नीचे फैला लिए । लेकिन गर्मी तो गर्मी… पसीना थमता ही न था । रह-रहकर पंखा झलते, फिर नकल करने लगते । कुछ देर मन मारकर काम किया पर हिम्मत छूट गई । उठकर पुरानी धूल पड़ी शीशियाँ झाड़ने लगे । उन्हें लाइन से लगाया । लेकिन गर्मी की दोपहर…. समय स्थिर लगता था । एक बार उन्होंने किवाड़ों के बीच से मुँह निकालकर सड़क की ओर निहारा । एकाध लोग नज़र आए । उन आते-जाते लोगों की उपस्थिति से बड़ा सहारा मिल गया । भीतर आए, बोर्ड का तार सीधा किया और दुकान ने सामने लटका दिया। धन्वंतरि औषधालय का बोर्ड दुकान की गरदन में तावीज़ की तरह लटक गया ए।

कुछ समय और बीता । आखिर उन्होंने हिम्मत की । एक लोटा पानी पिया और जाँझों तक धोती सरका कर मुस्तैदी से काम में जूट गए । बाहर कुछ आहट हुई । चिंता से उन्होंने देखा ।

— आज आराम करने नहीं गए वैद्य जी । –घर जाते हुए जान-पहचान के दुकानदार ने पूछा ।

— बस जाने की सोच रहा हूँ… कुछ काम पसर गया था, सोचा, करता चलूँ… -कहकर वैद्य जी दीवार से पीठ टिका कर बैठ गए । कुरता उतारकर एक ओर रख दिया । इकहरी छत की दुकान आँवे-सी तप रही थी । वैद्यजी की आँखें बुरी तरह नींद से बोझिल हो रही थीं । एक झपकी आ गई….कुछ समय ज़रुर बीत गया था । नहीं रहा गया तो रजिस्टरों का तकिया बनाकर उन्होंने पीठ सीधी की । पर नींद….आती और चली जाती, न जाने क्या हो गया था ।

सहसा एक आहट ने उन्हें चौंका दिया । आँखें खोलते हुए वे उठकर बैठ गए । बच्चनलाल दोपहर बिताकर वापस आ गया था ।

— अरे, आज आप अभी तक गए ही नहीं… –उसने कहा ।

वैद्य जी ज़ोर-ज़ोर से पंखा झलने लगे । बच्चनलाल ने दुकान से उतरते हुए पूछा– किसी का इंतज़ार है क्या ?

— हाँ, एक मरीज़ आने को कह गया था… अभी तक आया नहीं –वैद्य जी ने बच्चनलाल को जाते देखा तो बात बीच में ही तोड़कर चुप हो गए और अपना पसीना पोंछने लगे ।

kamleshwar

कमलेश्वर

मर्द – चित्रा मुद्गल

mard

आधी रात में उठकर कहां गई थी?”

शराब में धुत्त पति बगल में आकर लेटी पत्नी पर गुर्राया।

“आंखों को कोहनी से ढांकते हुए पत्नी ने जवाब दिया, “पेशाब करने!”

“एतना देर कइसे लगा?”

“पानी पी-पीकर पेट भरेंगे तो पानी निकलने में टेम नहीं लगेगा?”

“हरामिन, झूठ बोलती है? सीधे-सीधे भकुर दे, किसके पास गयी थी?”

पत्नी ने सफाई दी-“कऊन के पास जाएंगे मौज-मस्ती करने!”

माटी गारा ढोती देह पर कऊन पिरान छिनकेगा ?”

“कुतिया..”

“गरियाब जिन, जब एतना मालुम है किसी के पास जाते हैं तो खुद ही जाके काहे नहीं ढूंढ लेता?”

“बेसरम, बेहया…जबान लड़ाती है ! आखिरी बार पूछ रहे हैं-बता किसके पास गयी थी?”

पत्नी तनतनाती उठ बैठी- “तो लो सुन लो, गए थे किसी के पास। जाते रहते हैं। दारू चढ़ाके तो तू किसी काबिल रहता नहीं…”

“चुप्प हरामिन, मुँह झौंस दूंगा, जो मुँह से आँय-बाँय बकी। दारू पी के मरद-मरद नहीं रहता?”

“नहीं रहता…”

“तो ले देख, दारू पी के मरद-मरद रहता है या नहीं?”

मरद ने बगल में पड़ा लोटा उठाया और औरत की खोपड़ी पर दे मारा।…

चित्रा मुद्गल

चुनौती – रामकुमार आत्रेय

A Hindu priest throws coloured powder and garlands at the devotees during Holi celebrations at Bankey Bihari temple in Vrindavan

A Hindu priest (L) throws coloured powder and garlands at the devotees during Holi celebrations at Bankey Bihari temple in Vrindavan, in the northern Indian state of Uttar Pradesh, March 13, 2014. Holi, also known as the Festival of Colours, heralds the beginning of spring and is celebrated all over India. REUTERS/Ahmad Masood (INDIA – Tags: RELIGION SOCIETY)

वृन्दावन गया था। बाँके बिहारी के दर्शन करने के पश्चात् मन में आया कि यमुना के पवित्र जल में भी डुबकी लगाता चलूँ। पवित्र नदियों में स्नान करने का अवसर रोज-रोज थोड़े ही मिलता है।

यमुना के घाट सुनसान से थे। हाँ, बन्दरों की सेना अवश्य अपनी इच्छानुसार वहाँ विचरण कर रही थी। सीढ़ियाँ और बारादरियाँ टूटी-फूटी पड़ी थी। लगा कि वहाँ महीनों से सफाई नहीं हुई है। परन्तु मुझे तो स्नान करना ही था। जल में प्रवेश करने से पूर्व मैंने दोर्नो हाथ जोड़कर ऊँची आवाज में कहा-“यमुना मैया, तुम्हारी जय!”

”मुझे मैया नहीं, अपनी दासी कहो बेटा। और दासियों की जय कभी नहीं बोली जाती।” अचानक एक उदास-सा स्वर मेरे कानों में पड़ा, जैसे कि कोई दुखिया बूढ़ी औरत बोल रही हो।

मैंने चौंक कर इधर-उधर देखा। घाट पर मेरे अतिरिक्त अन्य कोई था ही नहीं। सोचा कि मेरे मन का वहम रहा होगा। कोई बूढ़ी औरत वहाँ होती तो दिखाई ज़रूर देती।

मैंने झुककर हाथ से जल का स्पर्श किया, उसे माथे से छुआते हुए कहा-“माँ, मुझे अपने पवित्र जल में स्नान करने की आज्ञा दें।”

इतना कहकर मैंने अपना दायाँ पाँव आगे बढ़ाया ही था कि फिर से वही स्वर सुनाई दिया- “बेटा, दासियों से आज्ञा माँगना कब से शुरू कर दिया तुम लोगों ने? इसमें डुबकी लगाकर क्यों अपनी सेंट लगी देह को गंदी और बदबूदार बनाना चाहते हो?”

आवाज सुनकर एक तरह से जड़ होकर रह गया था मैं। मैं समझ गया था कि आवाज यमुना के भीतर से ही आ रही है। इसलिए साहस करके कहा- “माँ जी, हम भारतवासियों के लिए तो आप हमेशा से ही माँ से बढ़कर वंदनीय तथा पवित्र रही हैं और रहेंगी। कृपया, स्वयं को दासी मत कहिए।”

“बेटा, तुम लोगों ने मेरे साथ जैसा व्यवहार किया है, ऐसा सिर्फ दास-दासियों के साथ ही हुआ करता है। मुझ पर बाँध बनाए, विद्युत पैदा की। खेतों की सिंचाई की, पीने को जल लिया। बदले में मेरी सूखती जलधार में सभी नगरों के गन्दे नाले तथा कारखानों के उत्सृज्य पदार्थ मुझमें धकेल दिए। मेरे किनारों पर खड़े पेड़ों को काटकर वहां सुन्दर-सुन्दर भवन बना डाले । इस प्रकार अब मैं सूर्य-पुत्री कालिन्दी नहीं, मानव मात्र के टट्टी-पेशाब, थूक और मवाद को बहा ले जाने वाली एक गन्दी नाली बनकर रह गई हूँ। चलो छोड़ो, यदि आज तुम आँख व नाक बंद किये बिना एक डुबकी लगाकर दिखा दो तो, तभी मैं तुम्हें अपना पुत्र मानकर आर्शीवाद दूँगी। ” यमुना मैया मुझे चुनौती दे रही थी।

मैं तो स्नान करने के लिए तैयार ही था। अपने दोनों पाँव अभी मैंने पानी में रखे ही थे कि हवा के एक तेज झोंके के साथ तीखी बदबू बलपूर्वक मेरे नथुनों में घुस गई। मेरी आँखों के ठीक सामने से किसी इनसान की टट्टी का एक लौंदा जल में तैरता हुआ निकल रहा था। मन कच्चा हो आया, लगा कि उलटी होगी। मैं उलटे पाँव घाट से बाहर की ओर दौड़ पड़ा।

किसी बुढ़िया के सिसकने का स्वर मेरा पीछा कर रहा था।

– रामकुमार आत्रेय
साभार – छोटी-सी बात

इनाम – नागार्जुन

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हिरन का मांस खाते-खाते भेड़ियों के गले में हाड़ का एक काँटा अटक गया।

बेचारे का गला सूज आया। न वह कुछ खा सकता था, न कुछ पी सकता था। तकलीफ के मारे छटपटा रहा था। भागा फिरता था-इधर से उधर, उधर से इधऱ। न चैन था, न आराम था। इतने में उसे एक सारस दिखाई पड़ा-नदी के किनारे। वह घोंघा फोड़कर निगल रहा था।

भेड़िया सारस के नजदीक आया। आँखों में आँसू भरकर और गिड़गिड़ाकर उसने कहा-”भइया, बड़ी मुसीबत में फँस गया हूँ। गले में काँटा अटक गया है, लो तुम उसे निकाल दो और मेरी जान बचाओ। पीछे तुम जो भी माँगोगे, मैं जरूर दूँगा। रहम करो भाई !”

सारस का गला लम्बा था, चोंच नुकीली और तेज थी। भेड़िये की वैसी हालत देखकर उसके दिल को बड़ी चोट लगी भेड़िये ने मुंह में अपना लम्बा गला डालकर सारस ने चट् से काँटा निकाल लिया और बोला-”भाई साहब, अब आप मुझे इनाम दीजिए !”

सारस की यह बात सुनते ही भेड़िये की आँखें लाल हो आई, नाराजी के मारे वह उठकर खड़ा हो गया। सारस की ओर मुंह बढ़ाकर भेडिया दाँत पीसने लगा और बोला-”इनाम चाहिए ! जा भाग, जान बची तो लाखों पाये ! भेड़िये के मुँह में अपना सिर डालकर फिर तू उसे सही-सलामत निकाल ले सका, यह कोई मामूली इनाम नहीं है। बेटा ! टें टें मत कर ! भाग जा नहीं तो कचूमर निकाल दूँगा।”

सारस डर के मारे थर-थर काँपने लगा। भेड़िये को अब वह क्या जवाब दे, कुछ सूझ ही नहीं रहा था। गरीब मन-ही-मन गुनगुना उठा-

रोते हों, फिर भी बदमाशों पर करना न यकीन।
मीठी बातों से मत होना छलियों के अधीन।
करना नहीं यकीन, खलों पर करना नहीं यकीन।।

Nagarjun

Nagarjun

नागार्जुन

दंगा – विजय कुमार सप्पत्ति

कल से इस छोटे से शहर में दंगे हो रहे थे. कर्फ्यू लगा हुआ था. घर, दूकान सब कुछ बंद थे. लोग अपने अपने घरो में दुबके हुए थे. किसी की हिम्मत नहीं थी कि बाहर निकले. पुलिस सडको पर थी.

ये शहर छोटा सा था, पर हर ६ – ८ महीने में शहर में दंगा हो जाता था. हिन्दू और मुसलमान दोनों ही लगभग एक ही संख्या में थे. कोई न कोई ऊन्हे भड़का देता था और बस दंगे हो जाते थे. पुलिस की नाक में दम हो गया था, हर बार के दंगो से निपटने में. नेता लोग अपनी अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकते थे. पंडित और मुल्ला मिलकर इस दंगो में आग में घी का काम करते थे. आम जनता को समझ नहीं आता था कि क्या किया जाए कि दंगे बंद हो जाए. उनके रोजगार में, उनकी ज़िन्दगी में इन दंगो की वजह से हर बार परेशानी होती थी.

एक फ़क़ीर जो कुछ महीने पहले ही इस शहर में आया था, वो भी सोच में बैठा था. उससे मिलने वाले मुरीदो में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही थे और आज दो दिन से कोई भी उसके पास नहीं आ पाया था.

आज वो शहर में निकल पड़ा है, हर गली जा रहा है. और लोगो से गुहार लगा रहा है. न कोई उससे मिल पा रहा है और न ही कोई भी उसे कुछ भी नहीं दे पा रहा है. फ़कीर को दोपहर तक कुछ भी नहीं मिला.

वो थक कर एक कोने में बैठ गया. एक बच्चा कही से आया और फ़क़ीर के पास बैठ गया, फ़क़ीर ने उससे पुछा क्या हुआ, तुम बाहर क्यों आये हो, देखते नहीं शहर में दंगा हो गया है.

बच्चा बोला, “मुझे भूख लगी है, घर में खाना नहीं बना है. माँ भी भूखी है, बाबा को कोई काम नहीं मिला आज. हम क्या करे. हमारा क्या कसूर है. हम क्यों भूखे रहे इन दंगो के कारण !”

फ़क़ीर का मन द्रवित हो गया. फ़क़ीर के पास ५० रूपये थे. उसने वो ५० रूपये बच्चे को दे दिए और कहा, “जाओ घर जाओ और बाबा को कहो कि गली के मोड़ पर पंसारी के घर में बनी हुई दूकान से कुछ ले आये और खा ले.”

बच्चा ख़ुशी ख़ुशी घर की ओर दौड़ पड़ा. फ़क़ीर उसे जाते हुए देखता रहा.

थोड़ी देर बाद कुछ सोचकर फ़क़ीर पुलिस स्टेशन पंहुचा. वहां के अधिकारी भी फ़क़ीर को जानते थे. उन्होंने फ़क़ीर को बिठाया और चाय पिलाई. फ़क़ीर ने कहा, “कर्फ्यू खोल दो बाबा.” अधिकारी बोले, “फ़कीर बाबा नहीं, दंगा बढ़ जायेंगा. पता नहीं कितने लोग घायल हो जाए.”

फ़क़ीर ने कहा, “आप शहर में खबर करवा दो कि फ़क़ीर बाबा मिलना चाहते है.”

और फिर वैसा ही हुआ लोग आये. फ़क़ीर ने बहुत सी बाते कही, एक दुसरे के साथ मिलकर रहने की बात कही, ये भी कहा कि आज के बाद कोई अगर दंगा करेंगा तो फ़क़ीर अपनी जान दे देंगे. लोगो पर असर हो ही रहा था कि किसी बदमाश ने कहा, “फ़क़ीर तो नाटक करता है, सब झूठ बोलता है.” इसी तरह की बाते होने लगी और वहां फिर संप्रदाय और जातिवाद का जहर फैलने लगा.

कुछ लोगो ने गुस्से से उस बोलने पर हमला कर दिया, वो किसी और जाति का निकला, फिर उस जाति के लोगो ने इन लोगो पर हमला कर दिया, खूब मारपीट होने लगी, फ़कीर बीच में पहुंचे बीचबचाव के लिए, तब तक मारपीट फिर से दंगे में बदल गया था.

पुलिस ने लाठीचार्ज किया, सबको अलग किया तो देखा, फ़क़ीर बाबा, इस छोटे से दंगे में फंसकर मर चुके थे.

सारे लोगो में सन्नाटा छा गया. उसी वक़्त शहर में ये तय हुआ कि कोई भी दंगा नहीं होंगा. उस दिन से शहर में शान्ति छा गयी. फिर कभी उस छोटे शहर में दंगा नहीं हुआ.

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घूँघट – डिम्पल गौड़ ‘अनन्या’

“देखो अब घूँघट हटा भी दो !”
“नहीं बिल्कुल नहीं…यह घूंघट नहीं हटेगा…कहे देती हूँ |”
“अरे ! अभी से धमकी भरे अल्फाज़ ! विवाह के 10 साल पश्चात क्या करोगी !”
“जो भी करुँगी आपको बर्दाश्त करना होगा ! आखिर पत्नी हूँ तुम्हारी ! और हाँ एक बात और… मुझे कॉफ़ी पीने की इच्छा है जाइए बनाकर लाइए अभी कि अभी !”
“हे भगवान् तुमको पहले मिला था तो होंठों से फूल झर रहे थे ! आज अचानक क्या हो गया ! किसी बात पर नाराज़ हो !” कहते हुए विनय हाथों से घूँघट हटाने का प्रयास करने लगा |
“तुम्हारी इतनी हिम्मत ! दफा हो जाओ यहाँ से..और कॉफ़ी लेकर ही अन्दर आना समझे !”
विनय घबरा सा गया | यह आज एकदम से …चित्रा इतनी विचित्र स्वभाव की कैसे हो गयी ! उसके सरल और शांत स्वभाव के कारण ही तो मैं उससे प्रभावित हुआ था | अपने ही विचारों में खोया विनय चुपचाप कमरे से बाहर चला गया |
घर के हर कोने में सन्नाटा पसरा था | रसोईघर में पहुँच ज्यों ही बत्ती जलाई सामने चाँद से मुखड़े वाली अपनी दुल्हन को देख चौक सा गया |
“अरे तुम यहाँ ! तो वहां कौन है !! तुम्हारा भूत !
“हा हा हा हा भूत से डर कर भाग आए आप ! अरे वो मैं नहीं आपकी साली निधि है ! यह सारा खेल उसी का रचा हुआ है !”

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डिम्पल गौड़ ‘अनन्या’
अहमदाबाद

छोटी भाभी – डिम्पल गौड़ अनन्या

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गुलाल में लिपटी छोटी भाभी पूरी गुलाबी नज़र आ रही थी ! मैंने  निशा की तरफ देखा वह एक कोने में बेरंग ही बैठी हुई थी |
“क्या है निशा ! आज के दिन भी तुम सब से अलग थलग ही रहोगी ! त्योहार का तो मान रख लिया करो कम से कम !”

“मेरी तबियत सही नहीं है ! तुम खेलो होली तुम्हें मैंने मना किया है क्या ? वो है न तुम्हारी छोटी भाभी !! देखो कैसे रंगों में तरबतर हो रही है ! जाओ तुम भी लगा दो थोड़ा और रंग! अजीब हो तुम भी ! न खुद खुश रहती हो न दूसरों को रहने देती हो…और हाँ छोटी भाभी के  पैरों की धूल भी नहीं हो तुम… समझी न ! रात के नौ बजते ही तुम्हें तो तुम्हें सोना होता है ! मेरी फ़िक्र है कहाँ तुम्हें ! एक छोटी भाभी ही है जो रात के ग्यारह बजे भी मुझे गरम रोटियाँ सेक कर देती है ! एक वही है जिसकी वजह से यह घर दौड़ रहा है ! एक तो बड़े भैया अपने परिवार को साथ ले कर अमेरिका बस गए…और ऊपर से तुम !

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उह्ह ! तुम और तुम्हारी छोटी भाभी ! ऐसा कहती हुई पैर पटक कर अपने कमरे में चली गयी निशा | तभी होली मिलन के लिए बहुत से रिश्तेदार आ पहुँचे | छोटी भाभी ने सबके जलपान की व्यवस्था करवाई…मेहमानों की आवभगत करने में छोटी भाभी का कोई जवाब ही नहीं था |

अरे विवेक ! तुम्हारी बहु कहाँ है ? सबसे छुपा कर रखते हो भई !”

“ आज उसे बुखार है न इसीलिए अन्दर कमरे में है…मैंने ही जबर्दस्ती भेजा उसे…वरना वो कहाँ काम छोड़ने वाली थी ! छोटी भाभी मेरी पत्नी निशा की तारीफें किये जा रही थी और अन्दर कमरे में वह जलभुन कर राख हुए जा रही थी |
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डिम्पल गौड़ अनन्या

अहमदाबाद (गुजरात)