Vetican City - Short Story by Savita Mishta Akshaja

वेटिकनसिटी – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

“मेरी बच्ची ! तू सोच रही होगी कि मैंने इस तीसरे अबॉर्शन के लिए सख्ती से मना क्यों नहीं किया !!” ओपीडी के स्ट्रेचर पड़ी बिलखती हुई माँ ने अपने पेट को हथेली से सहलाते हुए कहा। पेट में बच्ची की हल्की-सी हलचल हुई। “तू कह रही होगी कि माँ डायन है ! अपनी ही बच्ची को खाए जा रही है। नहीं! मेरी प्यारी गुड़िया, … पढ़ना जारी रखें वेटिकनसिटी – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

सात दिन की माँ – नीरू मोहन

यह कथा सत्य घटना पर आधारित है| गोपनीयता बनाए रखने के लिए पात्रों के नाम और स्थान बदल दिए गए हैं| कहते हैं, ईश्वर की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती और ईश्वर जो करता है भले के लिए ही करता है| यह कहानी उस माँ की है जिसे मातृत्व का सुख सिर्फ सात दिन के लिए ही प्राप्त हुआ| नीरा राजस्थान के एक … पढ़ना जारी रखें सात दिन की माँ – नीरू मोहन

गर्मियों के दिन – कमलेश्वर

चुंगी-दफ्तर खूब रँगा-चुँगा है । उसके फाटक पर इंद्रधनुषी आकार के बोर्ड लगे हुए हैं । सैयदअली पेंटर ने बड़े सधे हाथ से उन बोर्ड़ों को बनाया है । देखते-देखते शहर में बहुत-सी ऐसी दुकानें हो गई हैं, जिन पर साइनबोर्ड लटक गए हैं । साइनबोर्ड लगना यानी औकात का बढ़ना । बहुत दिन पहले जब दीनानाथ हलवाई की दूकान पर पहला साइनबोर्ड लगा था तो वहाँ दूध पीने वालों की संख्या एकाएक बढ़ गई थी । फिर बाढ़ आ गई, और नए-नए तरीके और बैलबूटे ईजाद किए गए । ‘ऊँ’ या ‘जयहिन्द’ से शुरु करके ‘एक बार अवश्य परीक्षा कीजिए’ या ‘मिलावट साबित करने वाले को सौ रुपया नगद इनाम’ की मनुहारों या ललकारों पर लिखावट समाप्त होने लगी । पढ़ना जारी रखें गर्मियों के दिन – कमलेश्वर

मर्द – चित्रा मुद्गल

आधी रात में उठकर कहां गई थी?”

शराब में धुत्त पति बगल में आकर लेटी पत्नी पर गुर्राया।

“आंखों को कोहनी से ढांकते हुए पत्नी ने जवाब दिया, “पेशाब करने!”

“एतना देर कइसे लगा?”

“पानी पी-पीकर पेट भरेंगे तो पानी निकलने में टेम नहीं लगेगा?” पढ़ना जारी रखें मर्द – चित्रा मुद्गल

चुनौती – रामकुमार आत्रेय

वृन्दावन गया था। बाँके बिहारी के दर्शन करने के पश्चात् मन में आया कि यमुना के पवित्र जल में भी डुबकी लगाता चलूँ। पवित्र नदियों में स्नान करने का अवसर रोज-रोज थोड़े ही मिलता है।

यमुना के घाट सुनसान से थे। हाँ, बन्दरों की सेना अवश्य अपनी इच्छानुसार वहाँ विचरण कर रही थी। सीढ़ियाँ और बारादरियाँ टूटी-फूटी पड़ी थी। लगा कि वहाँ महीनों से सफाई नहीं हुई है। परन्तु मुझे तो स्नान करना ही था। जल में प्रवेश करने से पूर्व मैंने दोर्नो हाथ जोड़कर ऊँची आवाज में कहा-“यमुना मैया, तुम्हारी जय!” पढ़ना जारी रखें चुनौती – रामकुमार आत्रेय

इनाम – नागार्जुन

भेड़िया सारस के नजदीक आया। आँखों में आँसू भरकर और गिड़गिड़ाकर उसने कहा-”भइया, बड़ी मुसीबत में फँस गया हूँ। गले में काँटा अटक गया है, लो तुम उसे निकाल दो और मेरी जान बचाओ। पीछे तुम जो भी माँगोगे, मैं जरूर दूँगा। रहम करो भाई !”
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दंगा – विजय कुमार सप्पत्ति

कल से इस छोटे से शहर में दंगे हो रहे थे. कर्फ्यू लगा हुआ था. घर, दूकान सब कुछ बंद थे. लोग अपने अपने घरो में दुबके हुए थे. किसी की हिम्मत नहीं थी कि बाहर निकले. पुलिस सडको पर थी. ये शहर छोटा सा था, पर हर ६ – ८ महीने में शहर में दंगा हो जाता था. हिन्दू और मुसलमान दोनों ही लगभग … पढ़ना जारी रखें दंगा – विजय कुमार सप्पत्ति

घूँघट – डिम्पल गौड़ ‘अनन्या’

“देखो अब घूँघट हटा भी दो !” “नहीं बिल्कुल नहीं…यह घूंघट नहीं हटेगा…कहे देती हूँ |” “अरे ! अभी से धमकी भरे अल्फाज़ ! विवाह के 10 साल पश्चात क्या करोगी !” “जो भी करुँगी आपको बर्दाश्त करना होगा ! आखिर पत्नी हूँ तुम्हारी ! और हाँ एक बात और… मुझे कॉफ़ी पीने की इच्छा है जाइए बनाकर लाइए अभी कि अभी !” “हे भगवान् … पढ़ना जारी रखें घूँघट – डिम्पल गौड़ ‘अनन्या’

छोटी भाभी – डिम्पल गौड़ अनन्या

गुलाल में लिपटी छोटी भाभी पूरी गुलाबी नज़र आ रही थी ! मैंने  निशा की तरफ देखा वह एक कोने में बेरंग ही बैठी हुई थी | “क्या है निशा ! आज के दिन भी तुम सब से अलग थलग ही रहोगी ! त्योहार का तो मान रख लिया करो कम से कम !” “मेरी तबियत सही नहीं है ! तुम खेलो होली तुम्हें मैंने … पढ़ना जारी रखें छोटी भाभी – डिम्पल गौड़ अनन्या